विलक्षण मोक्षाधिकार निर्णय (51-75)

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः

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विलक्षण मोक्षाधिकार निर्णय (1-25)

विलक्षण मोक्षाधिकार निर्णय (51-75)

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विलक्षण मोक्षाधिकार निर्णय(51-75)

पोस्ट – ५१

अतः , सदाचार्य के उपदेश के बिना , जीव में विवेक न होने से , इसे ज्ञान और अनुष्ठान युक्त बनाकर , भगवान इस जीव का उद्धार करता है । इसप्रकार के अधिकारी इस समय दुर्लभ ही है , यदि ऐसा कहोगे तो , शास्त्र में भी , इन्हें दुर्लभ ही कहा गया है । ” वासुदेव सर्वमिति – समहात्मा सुदुर्लभं ” ( गीता ७-१९ वासुदेव ही धारक, पोषण, भोग्य है ऐसा माननेवाला अधिकारी , मेरे लिये अति दुर्लभ ही है ) , ” कश्चित् मां वेत्ति तत्वतः ” ( गीता ७-३ हजारों में कोई एक ही मुझे यथार्थ जानता है ) , ” कोई एक मिलना भी अति दुर्लभ है ” ( उपदेश रत्नमाला -५५)
इसप्रकार भगवान ने गीता में और श्रीवरवरमुनि ने उपदेश रत्नमाला में भी , ऐसा शुद्ध अधिकारी को दुर्लभ ही बताया है न !

अतः , सदाचार्य के उपदेश के बिना , जीव में विवेक न होने से , इसे ज्ञान और अनुष्ठान युक्त बनाकर , भगवान इस जीव का उद्धार करता है । इसप्रकार के अधिकारी इस समय दुर्लभ ही है , यदि ऐसा कहोगे तो , शास्त्र में भी , इन्हें दुर्लभ ही कहा गया है । ” वासुदेव सर्वमिति – समहात्मा सुदुर्लभं ” ( गीता ७-१९ वासुदेव ही धारक, पोषण, भोग्य है ऐसा माननेवाला अधिकारी , मेरे लिये अति दुर्लभ ही है ) , ” कश्चित् मां वेत्ति तत्वतः ” ( गीता ७-३ हजारों में कोई एक ही मुझे यथार्थ जानता है ) ,

” इसप्रकार भगवान ने गीता में और श्रीवरवरमुनि ने उपदेश रत्नमाला में भी , ऐसा शुद्ध अधिकारी को दुर्लभ ही बताया है न !आचार्याभिमान मात्र से । यहाँ पर ज्ञान का होना अपवाद मात्र है।( exception )

 

Discussion:

Q: तमेव विद्वान अमृत इह भवति, ज्ञानहीन वृक्षों को मोक्ष कैसे मिल सकता ? ऋते ज्ञानान मोक्ष:

  •  The realization of bhagwat-paaratantriyam is expected from Human as shastric injunctions are for them. Only they have kaaran kalevar to realize so
  • This is important point. In Tattvatrayam, Sri Manavala Mamunigal raises this question as to how non-human chetanas who do not have jnaanaadhikaara can obtain moksha.

He answers that they obtain it through vaiṣṇava samāśrayaṇa where that vaiṣṇava has obtained the jñāna pauṣkalya in tattva. That is, by vaiṣnavābhimāna they can be liberated

  • Then the question arises whether vaiṣnavābhimāna applies only to animals, birds or trees.

The answer is according to the vacana “paśur-manuṣya-pakṣī vā”, the human is placed between animals and birds as if belonging to their category. So, even a human who does feel confident in the tattva-s can take refuge in a learned vaiṣṇava’s abhimāna and this person is usually the ācārya.

  • Then, Mamunigal rises another question: how can one become even a mumukṣu without tattva jñāna?

To this, he cites the timeless efforts taken by Bhagavān to redeem the souls including jāyamāna kaṭākṣa Through these, one at least attains interest in liberation at some point leading to learning the tattva-s which in turn lead to upāyatva of God and prapatti

Thus any knowledge we obtain is bhagavad-upakāra-kṛṣi-phalam

Hence, whenever Āzvārs do anusandhāna of their benefit, they refer to Bhagavān as pirān which means upakār. In our saṃpradāya, prapatti is not the acceptance of Bhagavān  as upāya but the realization that Bhagavān is always upāya.

tasya upākareṇaiva asya kalyāṇasya saṃsiddhiḥ

sa eva tatad-daśayām utpanna-prāpti-pratibandhaka-sarva-virodhi-varga-nirāsakaḥ

In Śrīrāmāyaṇa, it is seen that even a duṣṭa like Rāvaṇa benefited when he dropped his bow. cacāla cāpañca mumoca vīraḥ. Immediately, Perumāḷ says, “go now and come later”. Like this, we may unknowingly do svapravṛtti nivṛtti and slowly get ourselves open to bhagavad-rakṣaṇa. That is why we have become vaiṣṇava-s today. This pramāṇa is quoted by Śrī Piḷḷai Lokācārya in Mumumkṣuppaḍi

Thus, the arising of jñāna leading to mokṣa is not contradictory to bhagavad-upāya. It is the result of His grace. For example when Villi daasar asks Emperumanar – even for Vibhishana, there was a debate on accepting even though he had realized Bhagavan as saranya and left completely everything Emperumanar told – I am there for you, Periya Nambi is for me. Do not worry. Likewise in Arthi Prabandham, Mamunigal takes refuge in Emperumanar to overcome defects in himself

Adiyen will carefully say that jnaana praapti is desirable on approaching acharya but each person has individual limitations and if acharya is convinced that this is the best the sishya will get despite being sincere and has abhimaanam out of compassion for him / her, that is also sufficient. That is how we may explain Alavandar asking Emperuman to see Nathamunigal and do him grace Or the milk / curd seller taking letter from Emperumanar to Thiruvenkadamudaiyaan

 

पोस्ट – ५२,५३/52,53

अतः आचार्य समाश्रयण करके ,पंचसंस्कार प्राप्त करके , पवित्र तिलक,शिखा, तुलसी माला आदि धारण करके , परन्तु रहस्यत्रय मंत्रार्थों के विरुद्ध , देह को ही आत्मा मानकर , अन्य शेषत्व होकर , अथवा स्वतंत्र मानकर , अहंकार , ममकार , काम , क्रोध , मद , मात्सर्य युक्त बद्ध संसारी होकर , पुत्र-धन- धान्य आदि में आसक्त होकर, एक दूसरे से, धन के निमित्त अहंकार के कारण , स्पर्धा करते हुए , अयोग्य लोगों का चाकर बनकर रहनेवाले लोग , कुछ दिनों के लिये , भगवान के लीला (जन्म मृत्यु ) का विषय बनते हैं ।

परन्तु , जीवन के अंतिम समय में भी , यदि , ” पितरं मातरं दारान् पुत्रान् ” ( शरणागति गद्य – ६ ) ( भगवन् ! माता , पिता , पत्नी , पुत्र , रिश्ते नाते आदि सब कुछ छोड़कर , आपके श्रीचरणों में शरण आया हूँ ) , इस प्रमाणानुसार , भगवान के व्यतिरिक्त , अन्यों में वैराग्य प्राप्त होकर , पश्चाताप होने से , जैसे नदी में बाढ आने से पहले कुछ लक्षण दिखाई पड़ता है , उसीप्रकार इस व्यक्ति में मुक्त के लक्षण दिखाई देने लगते हैं ।
सदा परगुणाविष्टः द्रष्टव्यस्सर्व देहिभिः ” ( विष्णु तंत्रम् ) ( सदा भगवान के कल्याणगुणों का अनुभव करानेवाले वैष्णवों का दर्शन , सभी देहधारियों के लिये करने योग्य है ) , प्रमाणानुसार सभी के दर्शन योग्य होकर , स्वयं को भी एहसास हो जाता है कि यह अपना अंतिम शरीर है ।
परन्तु , जीवन के अंतिम समय तक भी , शास्त्र विरुद्ध आचरण करनेवाला हो , तो उसे पुनर्जन्म लेना ही पडेगा ।

पोस्ट – ५४/54

न खलु भागवता यमविषयं गच्छन्ति ” ( वेद वाक्य ) ( भागवत यम लोक को नहीं जाते ) , प्रमाणानुसार , नम्रता रहित होने पर भी , भागवत यम लोक नहीं जाता है , ऐसा ” प्रमेयरत्न ” नामक ग्रन्थ में पूर्वाचार्यों द्वारा कहा गया है ।

पेरियवाच्चान् पिल्लै ( कृष्णसूरी ) के पास आकर , एक श्रीवैष्णव ने पूछा , ” क्या हम भगवान के लीला ( जन्म मरण ) का विषय हैं या उनके कृपा ( परमपद प्राप्ति ) का विषय हैं ? ” , तब आचार्य ने कहा , ” यदि हम , हमें देह मानते हैं तो लीला का विषय बनते हैं और यदि आत्मा मानते हैं , तो कृपा का विषय होते हैं ।”

त्वग्ंमांस रधिरस्नायु मेधो मज्जास्थिः संहतौ – देहे चेत् प्रीतिमान् मूढो भविता नरकेपि सः ” ( जो मूर्ख व्यक्ति , इस शरीर में , जो कि चर्म, मांस , रक्त , मज्जा , हड्डी आदि का समूह है , सुख का अनुभव है , वह नरक में भी सुख का अनुभव करेगा ) प्रमाणानुसार , जो व्यक्ति देहाभिमानी होने से , तेल , घी आदि से देह को बढाकर , विषयासक्त होकर,देह संबंधित पत्नी , पुत्र आदि में अनुरागी होकर , शास्त्रों का वश न होकर , स्वतन्त्र आचरण करता है , वह भगवान के लीला का विषय बनेगा ।
जो आत्मस्वरूप के अनुरूप , आकारत्रय संपन्न है ( अनन्यार्हशेषत्व – भगवान का ही है जीव , अन्य किसी का नही , अनन्यशरणत्व – अन्य उपायों को छोड़कर , भगवान को शरण जाना , अनन्यभोग्यत्व – भगवान के व्यतिरिक्त , अन्य किसी में भी भोग्य बुद्धि न करना) , अर्थपंचक तत्व ज्ञान , संपन्न है , विवेक युक्त होकर , स्वरूप विरोधी प्रतिकूल विषयों का त्याग करता है , तिल में से , जैसा तेल को पृथक करना कठिन है , वैसे ही पृथक करने में कठिन अपने शरीर को शत्रु मानकर भयभीत होकर , उसे बढाने की इच्छा रहित होकर, प्राण धारण मात्र के लिये नियत आहार को स्वीकार करके , शास्त्रों के वशीभूत होकर , अहंकार रहित होकर , जो क्रियाशील है , वह भगवान के कृपा का विषय बनता है । “

पोस्ट – ५५-५६/55-56

अतः सदाचार्य का आश्रित होकर , उनके द्वारा प्राप्त उपदेशानुसार , ज्ञान और अनुष्ठान संपन्न होने पर ही , मुक्ति के योग्य हो सकते हैं । इसप्रकार आचार्य वरण करनेवाले अधिकारी , प्रथम प्रपन्न और चरम प्रपन्न , ऐसे दो प्रकार के होते हैं ।
प्रथम अधिकारी – अपने आचार्य के उपदेशानुसार , भगवान के अत्यन्त परतंत्र होकर , उस भगवान का प्रेमभक्त होकर , सहस्त्रगीति में शठकोप मुनि के वचनानुसार , भगवान से ही सभी प्रकार के रिश्तों को जोडकर , ” वासुदेव सर्वम् ” ( गीता – ७-१९) गीता वचनानुसार , वासुदेव को ही धारक, पोषक और भोग्य मानता है ।

चरम अधिकारी – आचार्य द्वारा प्राप्त , विलक्षण भगवान के स्वरूप रूप गुण आदि का मनन करके , ऐसे परम विलक्षण वस्तु को प्रदान करके महा उपकार करनेवाले आचार्य के प्रति कृतज्ञ होकर , ” माता पिता युवतयस्सर्वम् ” ( स्तोत्ररत्न – ५) प्रमाणानुसार आचार्य को ही माता , पिता मानकर , अन्य वस्तुओं का भान रहित होकर , भगवान को भी त्यागकर , मधुरकवि, जिसप्रकार शठकोप मुनी में आसक्त थे , उसीप्रकार मनोभाव युक्त होता हैं ।

इसप्रकार के भेद होने पर भी , दोनों अधिकारियों के लिये , प्रतिकूल विषयों से निवृत्त होना आवश्यक है ।

पोस्ट – ५७-५९/57-59

परन्तु , भगवद् के आश्रित होना दुर्लभ है और आचार्य के आश्रित होना सुलभ है ,ऐसा क्यों कहा जाता है ?
इसका उत्तर इसप्रकार है:

शास्त्रों में प्रतिपादित भगवान के बारेमें सुनाने पर , उसे समझ पाने का ज्ञान और अनुष्ठान करने का सामर्थ्य रहित होते हुए भी , मूक , बधिर आदि को आचार्य समाश्रयण का फल प्राप्त होगा । भगवान को, जैसे शास्त्रों द्वारा ही समझ पा सकते हैं , वैसे नही हैं आचार्य । उनको प्रत्यक्ष रूप से देख सकते हैं । जब शिष्य दुर्मार्ग पर चलता है , तब भगवान उसके रुचि के अनुसार अनुमति प्रदान करता है , परन्तु आचार्य तो शिष्य को अंत तक , एनकेन प्रकारेण जबरदस्ती करके , सुधारकर , भगवान के योग्य बना देता है ।
अतः , ” सिद्धिर्भवति वा नेति संशयोच्युत सेविनां – न संशयोस्ति तद्भक्त परिचर्यायेतात्मनाम् ” ( शाण्डिल्य स्मृति ११-९५) प्रमाण में कहा गया है कि भगवान अच्युत के आश्रितों को मोक्ष प्राप्त होगा या न होगा, इसमें संदेह है ; परन्तु उसके भक्तों के आश्रित हो जाने पर , मोक्ष प्राप्ति में शंका नही हो सकता है
परन्तु , सदाचार्य के , शास्त्रोक्त रीति द्वारा किये हुए आदेशों का , पालन न करके , अपने इच्छानुसार आलस्य के कारण , आचरण करने से , शिष्य को मोक्ष प्राप्त हो जायेगा , ऐसे तो नहीं कह सकते हैं न ! यदि ऐसा कहेंगे , तो इसका अर्थ यह हुआ कि भागवत अपचारादि प्रतिकूल आचरण से कोई हानि नही है ; यह तो पूर्वाचार्यों के वचन और अनुष्ठान का विरुद्ध है ।
भगवान को दुर्लभ इसलिये बताया है क्योंकि उसे देखा नहीं जा सकता ; अर्चा रूप में दिखाई देने पर भी , वह मुखसे कुछ बोलता नही ; मनुष्य , अपने दुर्वासना के कारण विषयासक्त होकर , दुराचार में प्रवृत्त होने पर भी , उसके रुचि को देखकर , अनुमति प्रदान करके , उसके कर्मों के अनुरूप फलों को प्रदान करता है । यह मनुष्य भोग के योग्य हो अथवा लीला के योग्य हो , भगवान के लिये दोनों समान ही है ; यदि शास्त्रों के अनुसार आचरण करता है , तो उसे परमानंद प्रदान करके , अपने भोग में शामिल कर लेता है ; यदि , शास्त्र रूपी आज्ञा का उल्लंघन करता है , तो उसे जन्म मरण रूपी , अपने लीलामें शामिल कर देता है ।

पोस्ट ६०,६१/60,61

सदाचार्य का , अपने आश्रित हुए शिष्य को , भगवान के लीला के योग्य बनते हुए देख , न छोड़कर , उसे भगवान के भोग के योग्य बनाना ही कर्तव्य है । एक राजा , एक दासी का भोग करने की इच्छा करता था ; परन्तु उसे रोग ग्रस्त देखकर , वैद्य को बुलाकर , उस दासी के रोग को दूर करने के लिये आदेश दिया । तब उस वैद्य का कर्तव्य , दिव्य औषधि , पथ्य आदि से , दासी को रोग से मुक्त करके , राजा के पास भेजना है । परन्तु यदि , उसे, रोग युक्त अवस्था में ही , हल्दी , कुंकुम , चंदन , काजल आदि लगाकर , फूल , वस्त्र , आभूषणों से अलंकृत करके , राजा के पास ले जाता है , तो राजा क्रोधित होकर , दोनों के सिर काटने के लिये , आज्ञा दे देगा ।
उसीप्रकार , भगवद् परतंत्र आचार्य ने भी , शिष्य को , निर्दोष भगवान के योग्य बनाने के लिये , अनंत काल से विषयासक्त शिष्य के अविद्या , वासना , रुचि आदि दोष भीतर रहते हुए , उसे दास्य नाम , शंख चक्र मुद्रा , तिलक आदि वैष्णव के बाहरी चिन्हों से अलंकृत करके , भगवान को समर्पित किया , तो आचार्य और शिष्य दोनों का विनाश ही होगा । अतः सदाचार्य , शिष्य को अच्छी तरह से ( मन और अनुष्ठान को ) शुद्ध करके , भगवान को समर्पण करता है । इसीलिये , सदाचार्य का संबंध , भगवद् संबंध से भी , शीघ्र फलदायक है , ऐसा कहा गया है ।
श्रीरामानुजाचार्य के संबंध को पाकर भी , रंगमहल नामक एक व्यक्ति , विषयासक्त था ; उसे अनेक प्रकार से सुधारकर , गीता के अठारह अध्यायों को अर्थ के साथ उसे समझाकर , भोजन और निद्रा भुलाकर, विषयों से विरक्त बनाकर , भगवान के कृपा पात्र बना दिया था । इसलिए , शिष्यका दुराचारी होने पर भी , उसे सुधारकर , सदाचार्य , उसकी रक्षा करता है , यह बात सत्य ही है ।

पोस्ट – ६२,६३, ६४/62,63,64

इस अर्थ को प्रपन्न गायत्री में रंगअमृतकवी ने भी कहा है न ! वे कहते हैं , ” भगवद् रामानुजाचार्य को विश्वास पूर्वक शरण जाने पर, क्या वे हमें , हमारे विषय वासना के कारण दुराचारी होकर , स्वर्ग नरक की यात्रा करने के लिये छोड़ देंगे ? कभी नहीं ; बल्कि हमें सन्मार्ग में जाने के लिये प्रवृत्त करके , सुधारकर भगवद् प्राप्ति करा देंगे ; अतः तू चिंता को त्याग दे ।”
इसके बावजूद , यदि भगवद् प्रपन्न , भ्रम आदि के कारण से , कुछ दोषी बन भी जाय तो भी , ” अविज्ञाता हि भक्तानां अघः कमलेक्षणः ” ( कमलनयन भगवान अपने भक्तों के दोषों को नहीं देखता ) , ” दोषोयद्यपि तस्यस्यात् ” ( भक्तों में यदि दोष है तो रहने दो ; ऐसे भक्तों को स्वीकार करना , शिष्टों के लिये निंदनीय नही है ) ( श्रीरामायण युद्ध काण्ड १८-३) , ” साधुरेव समंतव्यः ” ( गीता ९-३०, दुराचारी होने पर भी , मेरा भक्त को साधु ही मानना चाहिए ) , इन प्रमाणानुसार , सर्वशक्त और निरंकुश स्वतंत्र भगवान , परम कृपालु होने से , अपने भक्तों की रक्षा करता है ।

परन्तु आचार्य , भगवद् परतंत्र होने से , जैसे सोनार , सोने को शुद्ध करने के पश्चात ही आभूषण बनाकर , राजा को देता है , उसीप्रकार , शिष्य को भगवद् भोग के योग्य बनाकर , भौतिक भोगों से निवृत्त करके , और भी अनेक प्रपन्नालंकारों से युक्त बनाकर , विशेष कृपा करता है ।

वीरसुन्दर नामक राजा, जो कूरेषजी का शिष्य था , श्रीरंगम में एक दीवार बांध रहा था ; उसके लिये उसने , एक श्रीवैष्णव के घर को तोड़ना चाहा ; इसे पराशर भट्ट ने मना किया था , परन्तु राजा ने उनकी परवाह न करके, दीवार को बांध दिया था । इससे आचार्य अपचार हो गया था जिसके कारण उसका अदृष्ट फल नष्ट हो गया । वह दीवार बांधकर भगवद् कैंकर्य ही कर रहा था , परन्तु आचार्य अपचार के कारण परमपद प्राप्ति खो बैठा । अतः भगवद् प्रपन्न से अधिक सावधानी आचार्य प्रपन्न में होना चाहिए ।

भगवान , अपने स्वातंत्र्य के कारण , जिसे स्वीकारता है , उससे अधिक प्रेम , आचार्य से सुधरा हुआ अधिकारी से करता है । यह अधिकारी , विवेकपूर्ण व्यवहार करने से , भगवान कहता है कि , ” मम मद्भक्त भक्तेषु प्रीतिरभ्यधिका भवेत् ” ( महाभारत आश्रवमेधिक पर्व – मेरे भक्त (आचार्य ही भक्त है ) से भक्ति करनेवाला मुझे अधिक प्रिय है )।

अतः चरमपर्व निष्ठ अधिकारी ( आचार्य निष्ठ) को ही श्रेष्ठ अनुष्ठान युक्त होना आवश्यक है ।

पोस्ट ६५-६८/ 65-68


इस अधिकारी में , रहस्यत्रय के अनुसंधान के पूर्व , “ अन्य सभी आसक्तियों का , वासना सहित त्याग करना चाहिये “ ( मुमुक्षुपडी ) इस प्रमाणानुसार , वैष्णवाधिकारी के सभी लक्षण उत्पन्न होना चाहिए । उन लक्षणों का वर्णन मुमुक्षुपडि ग्रन्थ में पिल्लै लोकाचार्य इसप्रकार करते हैं :
पितरं मातरं, दारान् पुत्रान् बन्धून् “ ( विहगेन्द्र संहिता , अध्याय २ ) ( माता , पिता , पत्नी , बच्च , रिश्तेदार आदि को सर्वथा त्यागना ) , “ क्षेत्राणि मित्राणि धनानि “ ( हस्तिगिरी माहात्म्य ) ( खेत, मित्र , धन , बच्चे , पत्नी , गाय, घर , रिश्तेदार “ ) आदि को अग्नि के समान मानकर , रुचि वासना के सहित उनका त्याग करना , भगवान ही सब कुछ है ऐसे मानकर उसके शरण जाना , इस प्रकार त्याग और स्वीकार के कारण पुरुषार्थ लाभ अवश्य होगा ऐसा विश्वास करके , पुरूषार्थ लाभ के लिये उतावले होना , जीवित काल में , दिव्यदेशों में प्रेम युक्त होना , भगवान के गुणानुभव , कैंकर्यों में समय बिताना , ऐसे विलक्षण अधिकारीयों के श्रेष्ठता को देखकर प्रसन्न होना , रहस्यत्रय मंत्रानुसार अनुष्ठान करना , आचार्य के साथ रहना आदि ।
अब आल्वारों के दिव्यप्रबंध के अनुभव के लिये , जीवनमुक्त ही अधिकारी हैं ; जीवनमुक्त का वर्णन इसप्रकार है :
न शब्दशास्त्राभिरतस्य मोक्षो नचैवरं याव सथप्रियस्य – न भोजनाच्छादानतत्परस्य न लोक चित्तग्रहणेरतस्य – एकांत शीलस्य दृढ व्रतस्य पंचेन्द्रियप्रीति निवर्त्तकस्य – अध्यात्मविद्यारत मानसस्य मोक्षे धृवो नित्यमहिंसकस्य – शमदमनियतात्मा सर्व भूतानुकंपी विषय सुखविरक्तोज्ञानतृप्तः अनियतनियत अन्नो नैव हृष्टो नहृष्टः प्रवसितइवगेहे वर्तते यस्स मुक्तः “ ( वृत्त हारीत स्मृति १०-१४-१५) , प्रमाणानुसार , व्याकरण आदि भगवद् संबध रहित प्राकृत शास्त्रों में रुचि युक्त ; घर आदि में आसक्त ; भोजन ,वस्त्र आदि में आसक्त ; सांसारिक दुष्कर्म प्रवृत्तियों में रुचि युक्त व्यक्ति को , मोक्ष प्राप्ति करने के लिये , योग्यता नही है ।
इन सभी विषयों को त्यागकर ; सांसारिक लोगों के संग रहित होकर ; एकान्तशील ; ईश्वर भी जिसके शिष्टाचार में दृढ़ता को भंग करने में अशक्त हो ; शब्दादि विषयों में विरक्त , अध्यात्म शास्त्रों में चिंतन युक्त , दूसरों को हानिकारक न होकर परम दयालु व्यक्ति को , मोक्ष प्राप्ति निश्चित ही है ।
इसप्रकार का व्यक्ति जो , मन इन्द्रियों को वश में करके , आत्मगुणों से पूर्ण ,सर्व भूतों पर दया करता हुआ , विषय सुख में विरक्त , भगवद् अनुभव युक्त , अज्ञानी सांसारिक लोगों द्वारा निंदित और अपमानित होने पर भी प्रशांत चित्त होकर , रुचिकर पदार्थों का हठ रहित होकर , भूख मिटाने के लिये कोई भी शुद्ध आहार ग्रहण करके , भौतिक लाभ और नष्ट से हर्ष शोक रहित , घर को त्यागे बिना गृहस्थ होने पर भी , वही जीवनमुक्त कहलाता है ।
इसप्रकार का अधिकारी ही , दिव्यप्रबंध के अनुभव के लिये योग्य व्यक्ति है , ऐसे “ गुरुपरंपरा “ ग्रन्थ में , पृष्ठसुन्दर नामक आचार्य ने कहा है ।

पोस्ट ६९,७०/69,70

प्रपन्न को , मंत्र हो या दिव्यप्रबंध हो , उनके अर्थानुसंधान के साथ ही शब्दानुसंधान करना चाहिए । ” द्वयं अर्थानुसंधानेन सह ” ऐसे शरणागति गद्य में श्रीरामानुजाचार्य ने और सहस्त्रगीति में शठकोप मुनी ने , अर्थ के साथ द्वयमंत्र और दिव्यप्रबंध का अनुसंधान का विधी प्रसादित किया हैं । जप , होमादि शब्द शक्ति से रक्षा करना , उपासक के लिये ही है । प्रपन्न के लिये तो , अर्थ का ज्ञान ही , त्याज्य उपादेय ( त्यागने योग्य और स्वीकारने योग्य ) का विवेक को जन्म देकर , त्याज्य विषयों को त्याग कराकर , उपादेय विषयों को स्वीकार कराकर , प्रपन्न का रक्षा करता है । रक्षा का मतलब है , रक्षक (भगवान) के अनुग्रह का पात्रभूत बनाना ।

देहासक्त आत्मबुद्धिर् यदि भवति पदं साधु विद्यात् तृतीयं , स्वातंत्र्यान्धो यदि स्यात् प्रथमं इतर शेषत्वधीश्चेत् द्वितीयं , आत्मत्राणोन् मुखश्चेत् नम इति च पदं बान्धवाभासलोलः शब्दं नारायणाख्यं विषय चपलधीश्चेत् चतुर्थीं प्रपन्नः “ ( अष्टश्लोकी ४) प्रमाणानुसार , प्रपन्न में , प्रकृति के बंधन के कारण , आत्मस्वरूप के विरोधीयों का प्रवेश अनिवार्य है ; उस समय , विरोधियों के निवृत्ति के लिये , अष्ठाक्षर मंत्र के पदों के अर्थानुसंधान करना चाहिए ; परन्तु यदि ऐसा नहीं किया , तो पूर्ववत् अज्ञानी ही रह जायेगा ।

पोस्ट ७१-७३/ 71-73

देहात्मबुद्धि याने देह ही आत्मा है ऐसे विचार आने पर , ” म ” कारार्थ का अनुसंधान करके , हम ज्ञानानंद लक्षण युक्त आत्मा है जो देह , इन्द्रिय , मन , बुद्धि से भिन्न है , ऐसा मानकर , देहात्मबुद्धि के विचार को दूर करना चाहिए । देहात्मबुद्धि का निवृत्ति का अर्थ है – देह संबंध से आनेवाले वर्णाश्रमाभिमान के कारण , ” आढ्यो अभिजनवानस्मि कोन्योस्ति सदृशोमया ” ( गीता १६-१५) (मैं धनवान हूँ , उच्च जाति का हूँ , मेरे समान वैभवशाली कोन है ? ) , प्रमाणानुसार अहंकार युक्त होकर , इस देह को कटु वचनों से निंदा करनेवालों को ( देहात्माभिमान के कारण ) शत्रु मानकर उस पर क्रोधित न होना चाहिये ।
इतना ही नहीं बल्कि , ” नाहं विप्रो न च नरपतिर् नापि वैश्यो न शूद्रः ” ( न मैं ब्राह्मण हूँ , न ही राजा , न ही वैश्य और न ही शूद्र हूँ ” ) , ” लक्ष्मी भर्तुर्नरहरीतनोर्दासदासस्य दासः ” ( लक्ष्मी के पति नृसिंह भगवान का दास के दासानुदास हूँ ) प्रमाणानुसार , ब्राह्मणादि वर्ण तो , देह का विकार होने से , मुझे , जो देहातिरिक्त आत्मा हूँ , इनसे संबंध नही है और मैं तो वैष्णवदास हूँ , ऐसा मानना चाहिए । यह देह हमारे लिये त्याज्य , हेय है ; विपरीत ज्ञान का हेतु है ; काम क्रोध आदि शत्रुओं का संग्रह है ; अपने स्वरूप और भगवान के स्वरूप को भुला देनेवाला एक कारागृह जैसे अनर्थ हेतु है ; इस देह को पीड़ा देना तो हमारा ही तो कर्तव्य है , ऐसा मानकर , जो इस देह को पीड़ा देते हैं , उन्हें क्षमा करके , उनपर कृपा करनी चाहिए । उनके प्रति कृतज्ञ होना चाहिए ।
यह सब होने से ही , मकारार्थ की सिद्धि है । इस देहाभिमान का निवृत्ति ही प्रपन्न का प्रथम अधिकार है । इसकी प्राप्ति से , संसार का बीज नष्ट हो जाता है और स्वरूप की सिद्धि प्राप्त हो जाती है ।

आत्मा स्वतन्त्र है , ऐसी बुद्धि होने पर , कारणत्व, रक्षकत्व , शेषत्व वाची ” अ ” कार का अर्थ का अनुसंधान करके , हम भगवद् शेषभूत हैं , हमें स्वतन्त्रता के योग्य नही है ऐसा मानकर , स्वतंत्रता बुद्धि से निवृत्त होना चाहिए

पोस्ट – ७४-७५/74-75

अन्य शेषत्व बुद्धि होने पर , अनन्यार्ह के अर्थ को दर्शानेवाले ” उ ” कार के अर्थ का अनुसंधान करके , हम तो मात्र भगवान के ही शेष है ; अतः अन्यशेषत्व अनुचित है , ऐसे सोचकर , अन्यशेषत्व से निवृत्त होना चाहिए ।

स्वरक्षण में स्वप्रयत्न की बुद्धि होने पर , ” नमः ” शब्दार्थ का अनुसन्धान करके , भगवान ही मेरा रक्षक है , ऐसा मानकर , उस बुद्धि से निवृत्त होना चाहिए ।

आपत्ति के समय , हमारे बंधु हमारे रक्षक है , ऐसे बुद्धि होने पर , ” अयन “ पद के अर्थ का अनुसंधान करके , भगवान जो हमारा प्राप्य है, वही हमारा सर्व प्रकार का बंधु है , ऐसा मानकर , उस बुद्धि से निवृत्त होना चाहिए ।( नार + अयन = नारायण )

विषय भोगने की चापल्य होने पर, चतुर्थी ” आय ” का अनुसंधान करके , हमारा स्वरूप तो अनन्यभोग्यत्व है , अतः हम, भगवान के भोग वस्तु होने पर , हमारे लिये अन्य विषयों का अनुभव अनुचित है , ऐसा मानकर , विषय भोग की इच्छा से निवृत्त होना चाहिए ।

इसप्रकार , मंत्रार्थ ज्ञान से , त्याज्योपादेय ( त्यागने योग्य , स्वीकार के योग्य पदार्थ ) को जानकर , देहाभिमानादि का परित्याग करके , (भगवद् ) शेषत्व ,पारतंत्र्य ,कैंकर्य को स्वीकार करके , उनके अनुरूप अनुष्ठान करने से , स्वरूप की सिद्धि हो जायेगी और उसके कारण भगवद् अनुग्रह के पात्र होकर , मुक्ति प्राप्ति के लिये योग्य हो जायेंगे । परन्तु ऐसे अनुष्ठान न होने पर , मंत्रार्थ का कालक्षेप नित्य सौ बार करने से भी , नित्य संसारी ही बनकर रह जायेगा , ऐसे श्री पराशर भट्टजी का कहना है ।

Also go through:

श्री त्रिदंडी स्वामी जी के दिव्य ग्रंथ

Author: ramanujramprapnna

studying Ramanuj school of Vishishtadvait vedant

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