तिरुपावै 14 वाँ पासूर

गोदा नौंवीं सखी को जगाती हैं । यह गोपी अत्यंत चतुर है । इसने सभी सखियों से वादा किया था कि वह सबसे पहले उठकर सबको जगा देगी परन्तु आज वह स्वयं सो रही है और सभी सखियाँ उसके दरवाजे पर खड़े हैं, उसे जगाने हेतु ।

उन्गळ् पुळैक्कडैत् तोट्टत्तु वावियुळ्

  सेन्गळुनीर् वाय् नेगिळ्न्दु आम्बल् वाय् कूम्बिन काण्

सेन्गल् पोडिक्कूऱै वेण् पल् तवत्तवर्

  तन्गळ् तिरुक्कोयिल् सन्गिडुवान् पोदन्दार्

एन्गळै मुन्नम् एळुप्पुवान् वाय् पेसुम्

  नन्गाय् एळुन्दिराय् नाणादाय् नावुडैयाय्

सन्गोडु चक्करम् एन्दुम् तडक्कैयन्

  पन्गयक् कण्णानैप् पाडु एलोर् एम्बावाय्

ओह ! वह जो सभी प्रकार से पूर्ण है, वह जिसने प्रातः सभी को निद्रा से जगाने की जिम्मेदारी ली है, वह जो निसंकोच है, वह जो सुन्दर बातें बतियाती है।

अपने घर के पिछवाड़े के तालाब में प्रातः की सुचना देते नीलकमल मुरझा गये है, लाल कमल दल खिल रहे है, सन्यासी काषाय वस्त्र धारण किये, जिनके मुख की धवल दन्त पंक्ति दृष्टिगोचर हो रही है, मंदिर की तरफ प्रस्थान कर रहे है, मंदिर के किवाड़ खुलने के प्रतिक में शंखनाद कर रहे है।

उठो ! कमलनयन सा नेत्रों में मंद लालिमा लिये, अपने दोनों दिव्य हस्तों में दिव्य शंख  चक्र धारण किये भगवान् के गुणानुवाद करो ।

अर्थ

उन्गळ् पुळैक्कडैत् तोट्टत्तु वावियुळ् :उस तालाब में जो आपके घर के पीछे है

सेन्गळुनीर् वाय् नेगिळ्न्दु : लाल कमल के फूल खिल गए हैं

आम्बल् वाय् कूम्बिन काण् : नीलकमल के फूल बंद हो गए हैं; देखो!

प्रभात लक्षण : रक्त-पद्मानि विकसितानि कुमुद-मुखानी च संकुचितानि

1. साहित्य में स्त्री के नयनों नीले रंग से और पुरुष के नयनों को लाल रंग से तुलना किया गया है । नीले कमल के अस्त होने और लाल कमल के उदय होने से गोपियों का अर्थ कन्हैया ने पीछे से चुपके से आकर गोपी के नीले आँखों को बंद कर दिया और इस खुशी से भगवान के लाल नेत्र खुल कर बड़े हो गए ।

2. हमारा ह्रदय भी एक तालाब है जहाँ जीवात्मा और परमात्मा निवास करते हैं । उपनिषदों में इसे डहर आकाश कहते हैं । यह उल्टे कमल के फूल के आकार का है और इसमें 101 नाड़ियाँ हैं| मध्य नाड़ी को सुषुम्ना नाड़ी कहते हैं । जो जीवात्मा उस नाड़ी से जाता है वो वापस कर्म-बंधन में नहीं आता । वह अर्चिरादी मार्ग से भगवान के धाम चला जाता है ।

नीला कमल : हमारे पाप-पूण्य रूपी कर्म

रक्त-कमल : भगवत अहैतुकी कृपा, जीवात्मा में ज्ञान का उदय  

भगवान शरणागतों के सभी कर्म नष्ट कर देते हैं और अंत समय में उसका गाढ़ आलिंगन कर उसे सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश कराते हैं जहाँ से अर्चिरादी मार्ग को अग्रसर होता है । अन्य 100 नाड़ी से जाने वाला मार्ग ‘धूमादी मार्ग’ कहलाता है ।

सेन्गल् पोडिक्कूऱै : जो काषाय वस्त्र पहनते हैं

वेण् पल् : जिनके दांत सफेद हैं

तवत्तवर् : तप करने वाले सन्यासी

तन्गळ् तिरुक्कोयिल् : मंदिर में  

सन्गिडुवान् : शंखनाद हेतु

पोदन्दार् : जा रहे हैं

सुबह होने का प्रमाण यह भी है कि सन्यासी अपने सन्ध्यावन्दन को पूर्ण कर भगवत-अराधना हेतु मंदिर जा रहे हैं ।   

अनंताचार्य स्वामी इस पासूर का अर्थ करते हैं, “ जीयर स्वामी भगवान के कैंकर्य हेतु तिरुवेंकट पहाड़ पर पधार रहे हैं”

प्राचीन काल में मंदिर किसी मठ से सम्बंधित होते थे और उनकी जिम्मेदारी जीयर सन्यासी के हाथों होती थी । आजकल तो हर चौक-चौराहे और रेलवे स्टेशन पर मंदिर हैं । धर्म की ऐसी अवनती हो चुकी है ।

एन्गळै मुन्नम् एळुप्पुवान् : सुबह सबको जगाओगी

वाय् पेसुम् : ऐसा वादा किया था

नन्गाय् : ओ हमारी स्वामिनी

तुम हमारी स्वामिनी कैसे हो सकती हो जब तुम्हारे वाणी और आचरण में तारतम्य नहीं है ।

एळुन्दिराय् : निद्रा त्यागो

नाणादाय् : अहंकार-रहित

तुम बेशर्म हो । पहले तो तुमने सबको जगाने का वादा किया, अब हमारे आने के बाद भी सोयी हो ।

नावुडैयाय् : वाचाल / वाक् शिखामणि

तुम बहस करने में निपुण हो । वाक्-युद्ध छोड़ो और बाहर आओ

सन्गोडु चक्करम् : शंख और चक्र

एन्दुम् : धारण करने वाले

तडक्कैयन् : अपने लम्बे हाथों में

पन्गयक् कण्णानैप् : कमलनयन प्यारे कन्हैया

पाडु : उनके गुण गायेंगे

एलोर् एम्बावाय् : व्रत हेतु बाहर आओ

श्री प्रतिवादी भयंकर स्वामी इस गोपी के तीन संबोंधनों की विस्तृत व्याख्या करते हैं । उत्तम पुरुष को नम्पी और उत्तम स्त्री को नन्गाई कहते हैं । नन्गाई कहने से तात्पर्य है कि गोपी को सभी विभागों का पूर्ण ज्ञान है (सकल पांडित्य) और अनुष्ठान-संपत है ।

नान का अर्थ है मैं| इस प्रकार यह अहंकार का प्रतीक है । ‘नानादाई’ कहने का अर्थ है अहंकार-रहित होना ।

नाक का अर्थ है (तमिल भाषा में) जीभ । जीभ वही सफल है जो भगवान का गुणगान करे । सा जिह्वा या हरिं स्तुति । नावुडैयाय् कहने का अर्थ है आचार्य जो अपनी वाणी से सारे जगत का मंगल करते हैं । हनुमान के वाक-कौशल की प्रशंसा सीता करती हैं ।

आगे श्री प्रतिवादी भयंकर स्वामी ‘प्रमाण-निर्धारण-रूप-शास्त्रार्थ’ की व्याख्या करते हैं । वेदांत में तीन प्रमाण मान्य हैं : प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द (शास्त्र) ।

प्रत्यक्ष प्रमाण: लाल कमल का खिलना और नील कमल का अस्त होना

अनुमान प्रमाण: कषाय वस्त्र वाले सन्यासी का शंखध्वनि हेतु मंदिर जाना

शब्द प्रमाण : सबको सुबह जगाओगी, ऐसा तुमने वादा किया था

Author: ramanujramprapnna

studying Ramanuj school of Vishishtadvait vedant

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