श्रृष्टि स्थिति संहार

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श्रृष्टि

 असत-कार्य वाद: श्रृष्टि के मूल में कोई जीवित कारण नहीं है। प्रकृति यानि अचित तत्त्व से चेतन का उद्भव होता है।

सत-कार्य वाद: हर श्रृष्टि के मूल में कोई जीवित कारण अवश्य होता है। आधुनिक विज्ञान और वेदान्त दर्शन, दोनों ही सत-कार्यवाद ही मानते हैं। विज्ञान के अनुसार सूक्ष्म से स्थूल का उद्भव होता है। वेदांत दर्शन के अनुसार स्थूल (ब्रह्म) से सूक्ष्म (जीवात्मा) की श्रृष्टि होती है। इस जगत के आदि कारण , जगत-कारण (कारणस्य करणं) भगवान श्रीमन नारायण को ही ‘ब्रह्म’, ‘परमात्मा’ और ‘भगवान’ से संबोधित किया गया है। ब्रह्म का अर्थ है बृहद, विशाल। वेदों का उपदेश है:- “कारणं तु ध्येय”। जगत-कारणत्वं ब्रह्म का ध्यान करो।

श्रृष्टि का अर्थ है:

  • सूक्ष्म पदार्थों का सकल पदार्थों में परिवर्तन। श्रृष्टि से पहले सबकुछ निराकार, नामविहीन होता है।
  • जीवात्माओं को देह और इन्द्रियाँ प्रदान करना
  • जीवात्मा के ज्ञान (धर्मभूत ज्ञान) का विस्तार करना

उदाहरण:

एक मिट्टी के बर्तन के श्रृष्टि में तीन कारणों का होना आवश्यक है:

  1. मिट्टी: मिट्टी के स्वरुप परिवर्तन से ही बर्तन का निर्माण होता है। क्या बर्तन मिट्टी से अलग है? नहीं, बल्कि बर्तन तो मिट्टी का ही परिवर्तित स्वरुप है। इसे ही उपादान कारण कहते हैं।
  2. कुम्हार: अब, खुद के द्वारा मिट्टी एक बर्तन में बदल नहीं सकता। कुम्हार मिट्टी को एक बर्तन में बदलता है तो, बनाने में बर्तन, कुम्हार भी मिट्टी की तरह कारण है। कुम्हार बर्तन के श्रृष्टि में निमित्त कारण है। निमित्त कारण का स्वरुप-परिवर्तन नहीं होता। वह श्रृष्टि की प्रक्रिया का नियंत्रक होता है।
  3. चक्का: अब, केवल मिट्टी के साथ, कुम्हार मटका नहीं बना सकता है, उसे लकड़ी के पहिये और कुछ अन्य की आवश्यकता होती है। पहिया बर्तन के श्रृष्टि में सहायक है। इसे सहकारी कारण कहते हैं।

एक अन्य उदाहरण लेते हैं। कपड़े के निर्माण में धागा उपादान कारण है, बुनकर निमित्त कारण और मशीन सहकारी कारण? बिना इन तीन कारणों जब किसी सांसारिक वस्तु की श्रृष्टि संभव नहीं है तो फिर इस ब्रह्माण्ड या भौतिक जगत की श्रृष्टि इन तीन कारणों क बिना कैसे संभव है? इस ब्रह्माण्ड की श्रृष्टि में उपादान कारण, निमित्त कारण और सहकारी कौन-कौन हैं? ब्रह्म ही सृष्टि का उपादान कारण, निमित्त कारण और सहकारी कारण है।

  1. उपादान कारण: ब्रह्म ही इस जगत की श्रृष्टि में उपादान कारण है।

एको अहम् बहु श्याम

उपादान कारण तो परिवर्तित होता है, फिर ‘निर्विकार’ भगवान उपादान कारण कैसे हो सकते हैं। यहाँ भी शरीर-आत्मा भाव है। शरीर-आत्मा भाव, घटक श्रुति

चेतन-अचेतन विशिष्ट ब्रह्म, उपादान कारणं।

पूर्व में चर्चा हो चुकी है कि चेतन (आत्मा) और अचेतन (जड़) ब्रह्म के शरीर हैं और ब्रह्म समस्त चेतन और अचेतन के अन्तर्यामी आत्मा। ब्रह्म चेतन और अचेतन से विशिष्ट है, चेतन और अचेतन उसके विशेषण हैं। प्रलय-काल में समस्त चेतन और अचेतन सूक्ष्म रूप में होते हैं। उस वक्त चेतन आत्मा भी अचेतन की भाँती ज्ञानहीन और चेतनाहीन होता है। जीव की इस अवस्था को देख दया के अपार सागर भगवान द्रवित होकर श्रृष्टि करते हैं, जगत का निर्माण करते हैं। सूक्ष्म रूप में स्थित आत्मा को भगवान कर्म-योग्य शरीर और मन-बुद्धि देकर, इस जन्म-मृत्यु, सूक्ष्म-स्थूल और श्रृष्टि-प्रलय के चक्र से मुक्त होकर नित्य वैकुण्ठ जाने का अवसर देते हैं। श्रृष्टि करने के पीछे भगवान की यह आशा होती है कि हम अपने स्वरुप को पहचाने और भगवान की शरणागति कर इस संसार-सागर के परे भगवान के नित्य धाम जाने को तत्पर हों।

सूक्ष्म चेतन अचेतन वस्तु विशिष्ट ब्रह्म जगत-करणं।

स्थूल चेतन अचेतन वस्तु विशिष्ट ब्रह्म जगतकारी।।

वास्तव में सूक्ष्म रूप में स्थित चेतन और अचेतन ही उपादान कारण हैं। ब्रह्म चेतन और अचेतन के अंतरात्मा हैं और दोनों के धारक और पालक हैं, इसलिए वेदान्त ने ब्रह्म को ही उपादान कारण कहा है।

2.निमित्त कारण:

संकल्प विशिष्ट ब्रह्म एव निमित्त कारणं

भगवान अपने संकल्प-शक्ति मात्र से जगत की सृष्टि करते हैं, इसलिए भगवान निमित्त कारण हैं। निमित्त कारण का ज्ञानमय होना आवश्यक है। यदि निमित्त कारण ज्ञानमय न होगा तो श्रृष्टि कैसे करेगा। प्रकृत्ति निमित्त कारण नहीं हो सकती क्योंकि वह ज्ञानहीन है। इसलिए यह सिद्धांत कि प्रकृत्ति ही जगत-कारणत्वं है, गलत सिद्ध होता है। (अभिन्न निमित्तोपादान कारणं ब्रह्म

3.सहकारी कारण:

ज्ञान शक्ति विशिष्ट ब्रह्म एव सहकारी कारणं

ब्रह्म का ज्ञान, शक्ति और बल ही सहकारी कारण है। जो गुणरहित हो वो जगत-कारणत्वं कैसे हो सकता है? इसलिए ब्रह्म का निर्गुण होना गलत सिद्ध होता है। निर्गुण शब्द का अर्थ समस्त दूषणों से हीन होना है। अखिल हेय प्रत्यनिक

 

श्रृष्टि की प्रक्रिया

जगत प्रलय के काल में सूक्ष्म अवस्था में होता है। सूक्ष्म अचित तत्त्व से ‘मूल प्रकृति’; मूल प्रकृति से ‘महान’ और फिर उससे ‘अहंकार तत्त्व’ का उदय होता है। यह अहंकार तत्त्व, गुण रूपी अहंकार से अलग है। अहंकार  से कई तत्त्वों का सृजन होता है।

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कुल २४ अचेतन तत्त्व हैं (मूल प्रकृति, महान, अहंकार, मन, ५ कर्मेन्द्रियाँ, ५ ज्ञानेन्द्रियाँ, पंचभूत और पञ्च-तन्मात्र)। आत्मा २५ वाँ तत्त्व है और २६ वाँ तत्त्व ईश्वर हैं। पञ्च-तन्मात्र पंचभूत (सकल तत्वों) की सूक्ष्म अवस्था है।

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समष्टि श्रृष्टि (अद्वारक श्रृष्टि):

पञ्च-भूतों तक की श्रृष्टि भगवान स्वयं करते हैं।

व्यष्टि श्रृष्टि (सद्वारक श्रृष्टि)

अंडकटाकाओं के बाद की श्रृष्टि भगवान अन्तर्यामी होकर करते हैं।  यह कार्य भगवान ब्रह्मा, प्रजापतियों और काल के अन्तःमन में विराजकर करते हैं। हर अंडकटाका के एक ब्रह्मा होते हैं।

पंचीकरणं

पञ्चीकरणं उस प्रक्रिया का नाम है जब भगवान भिन्न-भिन्न तत्त्वों का मिश्रण कर प्राकृत संसार का निर्माण करते हैं।

आकाशात वायु: वायोर अग्निः

आकाश से वायु , वायु से अग्नि, अग्नि से भूमि और भूमि से आपः (जल) का निर्माण होता है। यहाँ भी शरीर-आत्मा भाव है। वास्तव में भगवान स्वयं ही पञ्च-भूतों का निर्माण करते हैं।

भगवान एक तत्त्व को दो भागों में बाटते हैं और तत्पश्चात प्रत्येक भाग को ४ भागों में। उस १/८ भाग का मिश्रण दूसरे तत्त्व के साथ करते हैं। इसी प्रकार, हर तत्त्व का एक दूसरे से मिश्रण कर प्राकृत संसार का निर्माण होता है।

  आकाश वायु अग्नि जल भूमि
आकाश १/२ (५०%) १/८ (१२.५%) १/८ (१२.५%) १/८ (१२.५%) १/८ (१२.५%)
वायु १/८ (१२.५%) १/२ (५०%) १/८ (१२.५%) १/८ (१२.५%) १/८ (१२.५%)
अग्नि १/८ (१२.५%) १/८ (१२.५%) १/२ (५०%) १/८ (१२.५%) १/८ (१२.५%)
जल १/८ (१२.५%) १/८ (१२.५%) १/८ (१२.५%) १/२ (५०%) १/८ (१२.५%)
भूमि १/८ (१२.५%) १/८ (१२.५%) १/८ (१२.५%) १/८ (१२.५%) १/२ (५०%)

 

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भगवान हर अंडकटाका १४ लोकों का निर्माण करते हैं। सत्यलोक (ब्रह्मलोक) में भगवान एक पुण्यात्मा को ब्रह्मा का पद देते हैं। इसके बाद की श्रृष्टि का भार ब्रह्मा पे होता है। ब्रह्मा संहार के कार्य के लिये रूद्र की उत्पत्ति करते हैं। संसार के पालन हेतु भगवान नारायण स्वयं विष्णु के रूप में ब्रह्मा और रूद्र के बीच अवतार लेते हैं। इसके बाद ब्रह्मा मनु आदि जीवों का निर्माण करते हैं।

 

स्थिति (रक्षण-पोषण)

जिस प्रकार जल उपज का पोषण करता है उसी प्रकार करता है, उसी प्रकार भगवान अपने जीवात्माओं का पोषण-पालन करते हैं:

  • श्री विष्णु इस संसार में श्रीमन नारायण के प्रथम अवतार हैं।
  • भगवान हंस अवतार लेकर ब्रह्मा को वेदों का ज्ञान देते हैं और हयग्रीव अवतार लेकर वेदों की रक्षा करते हैं।
  • मनु और ऋषियों के द्वारा शास्त्र को स्थापित करते हैं।
  • स्वयं मृत्यु-लोक में अवतार लेकर जीवात्माओं को प्रशिक्षित करने हेतु विभिन्न लीलाएं करते हैं और गीता आदि शास्त्रों का उपदेश देते हैं।
  • धर्म और सत्य के मार्ग पर जीवात्माओं का मार्गदर्शन करने हेतु सभी प्राणियों और काल में अन्तर्यामी परमात्मा के रूप में रहते हैं।

जीवात्मा की आयु १०० वर्ष है। हमारा उत्तरायण देवताओं के लिये दिन और दक्षिणायन रात होता है। इस प्रकार हमारे एक वर्ष का देवताओं का एक दिन होता है। १२००० देव-वर्षों का एक चतुर्युग (एक युग-चक्र)। १००० चतुर्युगों का ब्रह्मा का एक दिन होता है और इतने ही समय की रात्रि। ब्रह्मा के रात्रि-काल में नैमित्यिक प्रलय (अवांतर प्रलय) होता है। ब्रह्मा के एक दिन (कल्प) में १४ मनु होते हैं। हर मनु की आयु ७१ चतुर्युगों की होती है। अभी हमलोग ब्रह्मा के द्वितीय परार्ध (दूसरा ५० वर्ष) में श्वेत-वाराह कल्प में वैवश्वत मन्वंतर के २८वें चतुर्युग के कलियुग में हैं। (द्वितीय परार्धे, श्वेतवाराह कल्पे, वैवश्वत मन्वंतरे, अष्टाविंशतितमे, कलियुगे)   ब्रह्मा के १०० वर्ष होने पर प्राकृत प्रलय होता है और सारी श्रृष्टि पुनः श्रीमन नारायण में समाहित हो जाती है। हर चतुर्युग में भगवान के अवतार होते हैं, यद्यपि उनके क्रम बदलते रहते हैं।

संहार (प्रलय)

संहार का अर्थ है जीवात्माओं को सूक्ष्म स्थिति में वापस खींचना ताकि लौकिक आकांक्षाओं के प्रति उनका आकर्षण काम हो। जैसे उद्दंड पुत्र को उसके हितार्थ पिता कुछ समय के लिये बंदी बनाकर रखते हैं। रूद्र, अग्नि, काल और अन्तर्यामी भगवान संघार को संचालित करते हैं।

प्रलय ४ प्रकार के होते हैं:

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  1. नित्य प्रलय: मनुष्य की आयु १०० वर्षों की है, उसके बाद उसे शरीर बदलना होता है।
  2. नैमित्यिक प्रलय: ब्रह्मा के १ दिन पूर्ण होने पर रूद्र ३ लोकों (भू:, भुवः, स्वः) को प्रलय जल में डुबो देते हैं। ब्रह्मा की रात्रि के पश्चात जब पुनः दिन आता है तो ब्रह्मा फिर से श्रृष्टि की प्रक्रिया शुरू करते हैं।
  3. आत्यातिक प्रलय: जीवात्मा लीला विभूति को त्यागकर नित्य विभूति को जाता है और फिर कभी वापस लौट कर नहीं आता।
  4. प्राकृत प्रलय: ब्रह्मा की आयु पूर्ण होने पर रूद्र समस्त लोकों का विनाश कर देते हैं और स्वयं ब्रह्मा में समा जाते हैं। सारे ब्रह्मा और समस्त लीला विभूति एक बार फिर से भगवान श्रीमन नारायण में समा जाते हैं।

 

श्रृष्टि स्थिति संहार का उद्देश्य

भगवान के लिये श्रृष्टि, स्थिति और संहार लीला मात्र है पर जीवात्मा के लिये यह कर्म-बंधन से मुक्त होने का मौका है। हम सभी अनादि काल से मृत्यु-लोक में अपने शुभ-अशुभ कर्मों का फल भोग रहे हैं। शुभ कर्मों के फलस्वरूप हमें सुख की प्राप्ति होती है और अशुभ कर्मों के फलस्वरूप दुःख की। इस तरह से शुभ (पुण्य) और अशुभ (पाप), दोनों ही प्रकार के कर्म हमें संसार में बंधने वाले हैं। हमारे कर्मों का अनंत कोष ‘संचित कर्म’ कहलाता है। उस संचित का वो भाग जो हमें इस जन्म में भोगना होता है, वो ‘प्रारब्ध कर्म’ कहलाता है। एक ‘कर्म योगी’ हमेशा पाप-कर्मों से दूर रहता है और पुण्य कर्मों को भगवान की सेवा के रूप में करता है एवं उसका फल भगवान को समर्पित करके ही उपभोग करता है।

अगर हम श्रृष्टि का उद्देश्य न समझें तो श्रृष्टि निरर्थक हो जायेगा पर निर्हेतुक कृपा के स्वामी भगवान प्रलय के पश्चात फिर से श्रृष्टि करते हैं। यह प्रक्रिया अनंत काल से जारी है।

श्रृष्टि और प्रलय, दोनों ही अवस्था में हम भगवान के अभिन्न अंश हैं। पूर्वाचार्यों ने ये बात विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से समझाया है:

१) नृत्य करता हुआ मोर:  जिस प्रकार मोर बादल को देख प्रसन्नचित्त होकर नृत्य करता है, उसी प्रकार भगवान भी हमारी माता महालक्ष्मी को देखकर प्रसन्न होते हैं और श्रृष्टि करते हैं। समझने हेतु अगर हम मोर को ब्रह्म, पंख को अचित और मोर की आँखों को चित (आत्मा) मान लें तो मोर का पंख फैलाकर नृत्य करना श्रृष्टि है और पंखों को समेट लेना ही संहार। दोनों ही स्थति में चित, अचित ब्रह्म से अभिन्न होते हैं। क्या पंख और मोर एक ही हैं? नहीं। क्या मोर पंख से भिन्न है? नहीं। उसी प्रकार चित और अचित भी ब्रह्म नहीं हैं पर ब्रह्म के अभिन्न अंश हैं।

२) समुद्र की लहरें: जिस प्रकार वायु के कारण समुद्र में लहरों का निर्माण होता है, उसी प्रकार भगवान के संकल्प शक्ति मात्र से संसार की श्रृष्टि होती है। अगर लहरों को चित, अचित  और समुद्र को ब्रह्ममान लें तो श्रृष्टि को संहार की प्रक्रिया स्पष्ट समझ आती है।

३) मकड़ी का जाल: इस उदाहरण में मकड़ी ब्रह्म है और जाल चित, अचित। जिस प्रकार मकड़ी जाल को फैलाती है और अंततः वापस अपने अन्दर खींच लेती है, उसी प्रकार भगवान भी चित, अचित को नाम, रूप आदि देकर इस संसार की श्रृष्टि करते हैं और प्रलय-काल में सारे चित,अचित भगवान में ही समा जाते हैं।

Author: ramanujramprapnna

studying Ramanuj school of Vishishtadvait vedant

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