Ras-Krida (रास-लीला)

Excerts from various lectures and my notes.

There are various questions that people raise on Krishna’s character. today’s youth are not aware of krishna’s timeline .he was not young when he was in Vrindavan. he was a small little kid of vrindavan when he danced with gopis (7-10years differs with versions). What today’s ppl are collectively doing wrong is showing krishna in painting and daily soaps as if he was a grown up young boy which gives a wrong thought that he romanced with gopis. And even if he does ras krida there is nothing wrong in that because it was in consent of gopis. gopis themselves wanted manohar.

The gopis were actually rishis of dandakaranya so,though disguised as householders they were completely detached. They took next birth only with a dream of experiencing the madhurya of Rama (Krishna). they took next birth only with a dream of experiencing the madhurya of Rama (Krishna ).
AS per Padm Puran

/ drishtva Ramam hari tatra, bhoktumaichhan suvigraham|

te sarve stritvamapannah samudbutaasch gokule|| //

Meaning: When the Rishis of Dandkaranya wished to be the consorts of Ram, when they were filled with ‘kaam’ toward Ram; Ram assured them to be loved by him in Dwapar Yuga. The Rishis were then born near Gokul.

padm puran


 

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Even Parikishit had this doubt. Let’s visit the pastime.

Ras-krida was a particular form of dance. One Krishna-one gopika, one Krishna-one gopika, they alternated. Krishna decided to perform Ras-krida, a type of dance. He invited many girls, even wives of other husbands arrived to dance with Krishna. Krishna said, “why are you here? You have your home. Mind your responsibility. Why did you come”? They replied, “We are here for you. Don’t reject us. Don’t send us away”. Krishna accepted and started dancing with them.

रास-क्रिडा एक विशेष प्रकार का नृत्य था। एक कृष्ण-एक गोपीका, एक कृष्णा-एक गोपीका, इस प्रकार वो । कृष्णा ने रास-क्रिडा, एक विशेष प्रकार का नृत्य करने का फैसला किया। उन्होंने कई लड़कियों को आमंत्रित किया, यहां तक तक ​​की अन्य पतियों की पत्नियां भी कृष्णा के साथ नृत्य करने आईं। कृष्णा ने कहा, “तुम यहाँ क्यों आयी हो? तुम्हारा आपका घर है अपनी ज़िम्मेदारी याद रखो। तुमलोग क्यों आए”? उन्होंने जवाब दिया, “हम यहां आपके लिए हैं। हमें अस्वीकार मत करो। हमें दूर मत भेजो “। कृष्ण ने उनकी प्रार्थना स्वीकार किया और उनके साथ नृत्य शुरू किया।

Quickly Parikshit asked Shukacharya, “Is it right? Can Krishna do this? Is it not wrong”?

 

Shukacharya replied, “It’s perfectly right. It’s perfectly in order. Be the gopikas or her husbands or her parents or her children; Krishna resides in everyone. It’s not her husband, parent or children but ‘Krishna-rupam’. Every aatman has Krishna as their antaryaami. Every aatman is the body of Krishna. Bhagwaan creates everything and permeates. He is omnipresent (Sarv-vyapak). He is not found in Vaikunth or ksheerabdhi alone, even Prahlaad confirms.

urvyAm asti, udakEshu cha asti, vidikshu Vayu nabhasO tiryakshu atiryakshu cha asti anta:

bahirasti sati asati vA sArEshu asArEshu vA sarvatra asti sadA asti kim bahunA tvayi asti mayi asti cha (Srimad Bhagwatam)

Meaning: the Lord was to be found on the earth, in water, in air, in the sky and in the four directions. He is ever present inside and outside all animals and others. “He is present everywhere all the time, present in you and me”, concludes Prahlada.

He is found in everyone. We all are his body. Aatma has many limbs. It has eyes, head, legs, and nose.Now see, if a girl is married to her husband, will she only love only the nose, only the ears or only the hands? Not at all. She loves all parts of her husband and husband loves all parts of her wife.

If that is not found wrong, similarly, if Parmatma is the atma, he permeates and all the the jeevatmas are part and parcel of his body, then what is wrong in aatma loving the body? When Krishna is residing inside everyone, it’s nothing wrong for him to dance with everyone. Krishna permeates (vyapaka) and we all are permeated (vyapya). So, Shukacharya clarifies, “don’t worry, there is nothing wrong in this happening”.

Afterall, when any father weds his daughter with a husband, there is a mantra, “Vishnurupaay varaay dadaami”. When every husband is Vishnu-rupa, of course, there is nothing wrong.

‘Striyam prayam itaram jagat.’ As per Vedas, Krishna is the husband of all the aatmas. He is the only Purusha. Entire prakriti is female.

So, Ras-Krida is the accepted practice for Krishna, not for us.

तुरंत परीक्षित ने शुकाचार्य से पूछा, “क्या यह सही है? क्या कृष्ण ऐसा कर सकते हैं? क्या यह गलत नहीं है “?

शुकाचार्य ने जवाब दिया, “यह बिल्कुल सही है। यह पूरी तरह से क्रम में है। गोपीका, उसके पति, उसके माता-पिता या उसके बच्चे; कृष्ण सभी में वास करते हैं। ये पति, माता-पिता या बच्चे नहीं बल्कि ‘कृष्णा-रुपम’ है। कृष्ण हर आत्मा के अन्तर्यामी हैं। हर आत्मा कृष्ण का शरीर है। भगवन सब कुछ बनाता है और पारगम्य बनाता है। वह सर्वव्यापी है। वह अकेले वैकुंठ या क्षीराब्धि में नहीं पाए जाते हैं।

वह हर किसी में पाए जाते हैं। हम सब उनके शरीर हैं।

  1. यः पृथिव्यां तिष्ठन्। पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरो यमयति स त आत्मान्तर्याम्यमृतः – {शतपथब्राह्मणम् १४.६.७.[७]} satpath Brahman 14.6.7 (7)

  2. य आत्मनि तिष्ठन् आत्मनोऽन्तरो यमात्मा न वेद यस्यात्मा शरीरं य आत्मानमन्तरो यमयति स त आत्मान्तर्याम्यमृतः – {शतपथब्राह्मणम् १४.६.७.[३०]}           Satpath Brahman 14.6.7 (30)    ‘जो आत्मा में स्थित होकर आत्मा की अपेक्षा भी आन्तरिक है, जिसको आत्मा नहीं जानता, आत्मा जिसका शरीर है, जो आत्मा के अन्दर रहकर उसका नियमन करता है, वह अन्तर्यामी अमृत तेरा आत्मा है।’

  1. यः सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्सर्वेभ्यो भूतेभ्योऽन्तरो यं सर्वाणि भूतानि न विदुः। यस्य सर्वाणि भूतानि शरीरं यः सर्वाणि भूतायन्तरो यमयति। एष त आत्मान्तर्याम्यमृतः (बृहदाअरण्यक उ0 3।7।15Brihadaranyak Upanishad 3.7.15

‘जो सब भूतों में स्थित होकर समस्त भूतों की अपेक्षा आन्तरिक है, जिसको सब भूत नहीं जानते, सब भूत जिसके शरीर हैं, तथा जो सब भूतों के अन्दर रहकर उनका नियमन करता है, वह सर्वान्तर्यामी अमृत तेरा आत्मा है।

  1. जगत् सर्वं शरीरं ते  (वालमीकि रामायण-युद्धकाण्ड-117/25)
  2. हमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः। अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च।। गीता 10.20।।(अर्जुन! सब भूतों के हृदय में स्थ्ति आत्मा मैं हूँ और मैं ही सारे भूतों का आदि, मध्य और अन्त हूँ)।।

 

शरीर के कई अंग हैं- आंखे, सिर, पैर, नाक। क्या कोई विवाहित स्त्री अपने पति के केवल नाक, केवल कान या केवल हाथों से प्यार करेगी? बिल्कुल नहीं। वह अपने पति के सभी हिस्सों से प्यार करती है और पति अपनी पत्नी के सभी हिस्सों से प्यार करता है।

यदि यह गलत नहीं पाया जाता है, वैसे ही, अगर परमात्मा अन्तर्यामी है, वह आत्मा में प्रवेश करते हैं और सभी आत्मा उनके शरीर का अभिन्न हिस्सा हैं, तो आत्मा का शरीर से प्रेम करने में क्या गलत है? जब कृष्णा हर किसी के अंदर रहते हैं, तो उसके लिए हर किसी के साथ नृत्य करना गलत नहीं है। कृष्ण पारगम्य (व्यापाका) और हम सभी पारगम्य (व्याप्त) हैं। शुक्राचार्य ने स्पष्ट किया, “इस घटना में कुछ भी गलत नहीं है”।

आखिरकार, जब कोई पिता अपनी बेटी को पति को दान करता है, तो वैदिक मंत्र है, “विष्णुरूपाय वराय ददामि“। जब हर पति विष्णु-रूप है, तो विष्णु का गोपियों के संग नृत्य करने में निश्चित रूप से कुछ भी गलत नहीं है।वेदों के अनुसार, कृष्ण सभी जीवात्माओं के पति है। वह एकमात्र पुरुष है। पूरी प्रकृति स्त्री-स्वरुप है।

रास-क्रिडा कृष्ण के लिए स्वीकार्य अभ्यास है, न कि हमारे लिए।

There are many types of questions on the theme of Srimad Bhagwat’s Ras that people raise in today’s environment. It is described in five chapters (Ras-Panchaydani). Kamdev was very egoistic that I had not even put any less in distraction of Shankar. Although Shankar ji got angry and burnt Kamdev, the anger did not left him.  Cupid’s aspiration did not fall, but rather high. Kamdev promised that I would have got a rival. In the full moon moonlight of Autumn, the waist came tightly to fight Kamdev. Kamdev also started attacking his Krishna with his five arrows.

Shyam Sundar accepted the challenge of Cupid and defeated Kamdev so that his name became Madan-Mohan. Also, That is why at the end of the Ras-Panchaydya, it is written that by reading and meditation everyone can conquer Kaam-Dev.

रसानां समूहो रासः

श्रीमदभागवत के रास के प्रसंग पे बहुत तरह के प्रश्न आज के वातावरण में लोग करते हैं। पाँच अध्यायों में (रास-पंचाध्यायी) इसका वर्णन है। कामदेव बहुत अहंकार में था कि मैंने तो शंकर को भी विचलित करने में कोई कोर-कसर नहीं रखा था। शंकर जी यद्यपि क्रोध में आ गए और कामदेव को जला दिया पर क्रोध ने तो उनको पटक ही दिया न। कामदेव का मनोरथ गिरा नहीं बल्कि ऊँचा हो गया। कामदेव ने प्रतिज्ञा किया की मेरा जोड़ देने वाला कोई प्रतिद्वंदी मिले। शरद ऋतू की पूर्णिमा चाँदनी में कामदेव लड़ने के लिये कमर कसकर आया था। कामदेव भी अपने पाँच बाणों को लेकर श्री कृष्ण पे प्रहार करने लगा।

श्याम-सुन्दर ने कामदेव की चुनौती स्वीकार की और कामदेव को ऐसा परास्त किया कि उनका नाम हो गया मदन-मोहन। कामदेव को भी मोह देने वाला। इसलिए रास-पंचाध्यायी के अंत में लिखा है कि इसका पाठ और चिंतन करने से हर मनुष्य कामदेव पर विजय प्राप्त कर सकता है।

 

Why Can’t I do Ras if Krishna did?

Oriya baba of Vrindavan used to say, “O fools! if you want to copy Krishna, then, before Ras-nritya, there is naag-nritya, Krishna danced on 101-hooded snake. If u think that you too can enjoy Ras-nritya then at least dance over ordinary snakes. Dance over cobra”.

You face turns pale on the name of dancing on snake, but you are ready to dance with girls? Now-a-days even elders and gaurdians are dancing with their siblings on leud songs. What would be the character of younger generation?

वृन्दावन के उड़िया बाबा कहा करते थे कि तु कृष्ण को देखकर यह कहते हो हम भी रास करेंगे? अरे अभागे! रास-नृत्य से पहले है नाग-नृत्य। रास-पंचाध्यायी से पहले भगवान ने १०१ फन वाले नाग को नाथा था। नाग-लीला करने वाले को रास-लीला करने का अधिकार है। नाग लीला न सही, गेहुमना-लीला ही कर दो।  नाग-लीला करने में नानी मरती है और रास-लीला करने आगे आ जाते हो?

आजकल तो डिस्को चला है। किसको क्या कहा जाए? नृत्य करना अपराध नहीं है पर नृत्य के नाम पर फूहड़पना और बच्चों को उसमें शामिल करना, यह आने वाली पीढ़ी के लिये अभिशाप होगा, वरदान नहीं। दिलेरी दिखाना है तो कोसी के बाढ़ में, रोटी-कपड़ा के अभाव में कितने लोग मर जाते हैं, जरा उसमें दिलेरी दिखाओ। ये नहीं कि आप फूहड़पना के द्वारा छोटे-छोटे बच्चे को बिगाड़ दो।

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Krishna was just seven years old at the time of Ras-nritya

जिस समय भगवान का रास हुआ था वृन्दावन में, उस समय उनकी आयु कितनी थी? सात वर्ष। आज भी सात-आठ वर्ष के बालकों में काम-वासना नहीं होता। आयुर्वेद भी मानता है। उसके लिये काम-से-काम १४-१५ वर्ष की आयु चाहिए। इसलिए आज के ५००० वर्ष पहले ७ वर्ष की आयु में काम-वासना का आविर्भाव हुआ, यह मत उचित नहीं है।

At the time of Ras-nritya in Vrindavan, at that time how old was his age? Seven years Even today, seven-eight-year-olds do not have sexual desire. Ayurveda also believes in affirmative. For him, minimum age should be 14-15 years old. Therefore, saying that 5000 years ago, there was an appearance of lust in the age of 7, this opinion is not appropriate.

आत्मारामो परिरवत।

जो अपनी आत्मा में रमण करते हैं। उनका नाम योग-योगेश्वर है। अखंडानंद सरस्वती का मत है कि जो कालिया नाग के विष से बेअसर है, उसके लिये कामदेव का मान-मर्दन करना कोई अतिश्योक्ति या काल्पनिक बात नहीं है।

aatmaramo parirvat.

Who who takes pleasure in his soul. His name is Yoga-Yogeshwar. He doesn’t need anything outside to experiance pleasure. Akhandanand Saraswati is of the opinion that it is not an exaggeration or a fictitious thing to say that Krishna doomed over Kaam-dev as  with the venom the Kaliya is ineffective over him.

 

 

Possible interpolation?

Another argument that Vidwans provide is that, these 5 chapters are later additions or interpolations by people like those of Sakhi-sampraday who dresses like women. Krishna, who preached karma-Yoga, can never present such an example.

Sishupala gave 101 abuses to Krishna but did not say that you danced with the other’s women. “Makhan-thief, cow-herd, woman-kidnapper” etc. – these all he said. Why such an envious enemy doesn’t mention the incident that is vastely quoted today to raise questions over the character of Krishna?

yadyadācarati śrēṣṭhastattadēvētarō janaḥ.

sa yatpramāṇaṅ kurutē lōkastadanuvartatē৷৷3.21৷৷

Whatever ‘an eminent man,’ i.e., he, who is famous for his knowledge of all the scriptures and for his observance of the scriptural dictates, performs, others who have incomplete knowledge of the scriptures will also perform, following his example.

This argument stands no ground. All the commentators on Bhagwatam has commented on the 5 chapters including Madhvacharya. Problem lies in their understanding.

विद्वानों द्वारा प्रदान किया जाने वाला एक अन्य तर्क यह है कि, इन 5 अध्यायों में बाद में जोड़ दिया गया, या हस्तक्षेप हैं जो सखी-संप्रदाय जैसे महिलाओं की तरह कपड़े पहनते वाले भक्तों ने किया है। कृष्ण, जिन्होंने कर्म-योग का प्रचार किया, कभी ऐसा उदाहरण नहीं दे सकते।

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।

स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।3.21।।

श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है अन्य लोग भी वैसा ही अनुकरण करते हैं वह पुरुष जो कुछ प्रमाण कर देता है लोग भी उसका अनुसरण करते हैं।।

शिशुपाल ने भगवान को १०१ गालियाँ दी लेकिन यह नहीं कि तु दूसरे कि स्त्रियों के संग नाचने वाले हो “माखन-चोर, ग्वाला, स्त्री-हरण करने वाला”  इत्यादि कहा। कृष्ण के चरित्र पर प्रश्न उठाने के लिए इतने ईर्ष्यापूर्ण दुश्मन इस घटना का जिक्र क्यों नहीं किया, जो आजकल के लोग प्रायः उठाया करते हैं?

(Thanking my sis Tanuja for her contributions)

Gopi Geet

जब गोपियों के मन में आया कि श्रीकृष्ण तो हमारे कठपुतली हैं, जैसा नचाते हैं, वैसा नाच रहे हैं; तभी श्रीकृष्ण उनके बीच से गायब हो गए।  अब गोपियाँ व्याकुल, बिह्वल हो गयीं, खोज रहीं हैं पर खोजना व्यर्थ हो गया। भगवान कहीं मिले नहीं। बड़ा सुन्दर भाव हमारे गुरुदेव ने व्यक्त किया है:

When the Gopis came to understanding that Shri krishna is our puppet, as we dance,he is dancing like this; Then Shr ikrishna vanished from them. Now the gopis are distraught, have become disturbed, are searching, but the search was in vain. They couldn’t find Krishna anywhere. Our gurudev has expressed great beauty

दृष्टो वा कश्चित् अस्वथ?

अस्वथ नाम है पीपल के पेड़ का संस्कृत में। तिष्ठति इति थ, यानि खड़ा रहने वाला। स्व यानि सोने वाला और अस्व यानि कभी न सोने वाला। गोपियाँ ‌‍‍‌पीपल से कहति हैं, “तुम तो हमेशा खड़े रहते हो। कृष्ण अभी रास-मंडली में थे पर अब निकल गए। तुम्हें तो दूर तक दिखाई पड़ता है क्योंकि लम्बे हो न। दृष्टो वा? तुमलोगों ने देखा? नंदनंदन श्रीकृष्ण चला गया। चला भी गया तो खाली नहीं गया, हमलोगों के मन को चुराकर चला गया।

मन तो भीतर होता है, चुराया कैसे? गोपियाँ कहतीं हैं, “प्रेमहासा अवलोकनी”।पहले तो उसने प्रेम का प्रस्ताव रखा, मीठे-मीठे प्रेम भरे वचनों से हँस दिया। जब हँस दिया तो हमें भी हँसी आ गयी, हमारा मुँह खुल गया और मुँह खुलने से भीतर घुसकर मन को चुरा लिया। जैसे तालाब के बीच में खिले कमल के फूल के सौरभ/पराग को भौंरा लेकर उड़ जाता है, वैसे ही काला-काला कन्हैया हमारे मन को लेकर भाग गया। जब उद्धव जी ज्ञान देने आये थे तो गोपियों ने यही कहा था, “तुम्हारे ज्ञान की बात सुने कौन उद्धव। एक ही मन तो सबके पास होता है, उस मन को तो कन्हैया लेकर भाग गए। जब मन नहीं है, संकल्प-विकल्प करने वाला साधन नहीं है तो तुम्हारे कर्म, ज्ञान और उपासना की हमें कैसे समझ पड़ेगा? तुम्हारे उपदेश देने का कोई प्रयोजन नहीं रह गया।”

उद्धव मनन भये दस बीस

एकहूँ तो सो गयो श्याम संग, थोड़ा 

मन जिस विषय में नहीं लगेगा, उस विषय का आकरन आप नहीं कर सकते हैं। सुनने के बाद शब्द कान के द्वारा कहा जाता है? मन के पास। मन बुद्धि को पहुंचाता है और बुद्धि आत्मा से संपर्क करती है।

गीता का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण है- “व्यक्ति जब किसी के पास कुछ पाने की आशा लेकर जाता है और वह मिल जाता है तो व्यक्ति को लोभ हो जाता है। नहीं प्राप्त हुआ तो क्रोध”। ऐसे गए गुजरे के पास गए की हमको कुछ दिया नहीं।  हर हालत में आप मनोविकार पर विजय प्राप्त नहीं कर सकते हैं। इसलिए मैंने शुरुआत में कहा था कि भीतर की लड़ाई संत लोग लड़ते हैं- काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, मात्सर्य से। पराजित हो जाने पर उनका संत होना सिद्ध नहीं होता। बाहर की लड़ाई तो रोज लोग लड़ रहे हैं- पद, पैसा, प्रतिष्ठा, परिवार के लिये।  पेड़ कभी जबाब देते हैं। गोपियों को जबाब नहीं मिला। श्री राम भी कहते हैं: हे खग मृग हे मधुकर श्रेणी, तुम देखी सीता मृगनयनी? यहाँ लक्ष्मण जी राम को समझा रहे हैं, वहाँ गोपियों को उद्धव जी समझा रहे हैं।

जब पीपल ने उत्तर नहीं दिया तो पलाश (पाकड़) से पूछ रही हैं। पलाश में नए-नए लाल-लाल पत्ते निकले थे। गोपियाँ कहती हैं, “ऐसा प्रतीत होता है कि तु भी रास देख रहा था। रात भरे जगे हो तभी तुम्हारी आँखे लाल-लाल हैं। किसलय को आँख समझ रही हैं। जब पलाश ने उत्तर नहीं दिया तो उलाहना देते हुए कहने लगीं, “तभी तो तुम पाप का परिणाम मिल रहा है। दिन-रात धूप में, पानी में, ठण्ड में सिकुड़ते हो”। बरगद के पास गयीं। सबके पास गयीं पर निराशा के सिवा कुछ न मिला। जब जीव परमात्मा की खोज में व्याकुल हो जाता है, व्याकुलता के बाद भी सफल नहीं होता है; जब अनाथ होकर रोने लग जाता है तो निश्चय ही परमात्मा की प्राप्ति हो जाती है। जब गोपिकाएं विह्वल होकर रोने लग जाती हैं, भाव-विभोर हो जातीं हैं तो श्याम-सुन्दर अचानक प्रकट हो जाते हैं। जब काम में व्यस्त माँ बच्चे पर ध्यान नहीं देती है तो बच्चा कुछ नहीं करता बस रोने लग जाता है। जब रोते हुए बच्चे को देख माँ सारे काम को छोड़कर दौड़ आती है, तो उस माँ से कई गुना अधिक वात्सल्यमय परमात्मा क्यों नहीं आयेंगे? आप ह्रदय से रोयें। पत्नी और बेटे के वियोग में रोते हो, पैसा-मोबाइल खो जाए तो रोते हो पर परमात्मा के लिये कहाँ कभी रोते हो? कभी ह्रदय से रोकर देखो। जिस दिन तेरे ह्रदय से करुण पुकार निकलेगी, परमात्मा निश्चय तेरे पास होंगे।

Author: ramanujramprapnna

studying Ramanuj school of Vishishtadvait vedant

2 thoughts on “Ras-Krida (रास-लीला)”

  1. Excellent, Youngester’s problem for Shri Krishna solved. Lack of knowledge leads youngesters to think bad about Shri Krishna. May krishna bless them all and let them know about his dramas.

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