विलक्षण मोक्षाधिकार निर्णय (76-100)

पूर्व के भाग:-

विलक्षण मोक्षाधिकार निर्णय (1-25)

विलक्षण मोक्षाधिकार निर्णय (26-50)

विलक्षण मोक्षाधिकार निर्णय (51-75)

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ग्रंथ रचनाकार श्री अष्टदिग्गज देवराज मुनि

पोस्ट ७६,७७/76,77

दिव्यप्रबंध के अध्ययन का फल कहते समय कहा गया है, ” ज्ञान सहित अध्ययन करनेवालों को वैष्णवत्व सिद्धि ” । इस प्रमाणानुसार ,जानकर अनुष्ठान करने पर ही वैष्णवत्व सिद्धि हो सकती है । ” गान और नृत्य करने पर वैकुंठ प्राप्ति “, इस प्रमाणानुसार केवल कंठस्थ करने पर मुक्त नही हो सकते क्योंकि ” दर्वीपाकरसं यथा ” ( चम्मच को , भोजन का रस , नही पता होता है ) प्रमाणानुसार बिना अर्थानुसंधान के, यदि मात्र कंठस्थ पाठ करने से , मुझे ३००० पासुर कंठस्थ है , मुझे ४००० पासुर कंठस्थ है , ऐसा अहंकार का हेतु बनकर, विफलता ही प्राप्त होगा ।
परन्तु, पाठादेवप्रसमित तमः ( शास्त्र पडने से मात्र , अज्ञान रूपी अंधकार का नाश होता है ) कहा गया है; परन्तु शब्दार्थ रहित ज्ञान से, त्याज्य उपादेय विवेक उत्पन्न न होने से, अंधकार की निवृत्ति संभव नही है न !
फिर भी ऐसा कहने का तात्पर्य , शास्त्र का प्रभाव का स्तुति मात्र ही है ।
पाठ करने में सक्षम होने से वैकुंठ प्राप्ति ” ( सहस्त्रगीति २-५-११) प्रमाणानुसार उन दस पासुरों का अनुसन्धान से मुक्ति प्राप्त है, ऐसा मानकर, उन पासुरों का पाठ मात्र करके, तद् विरुद्ध  भगवद्-भागवत-अपचारों में प्रवृत्त होने से मुक्त नही हो सकता है न !
इसका तात्पर्य यह भी हो सकता है कि, ” यदि प्रतिकूल अनुष्ठान का निवृत्ति हो , तो पाठ मात्र पर्याप्त है ” । अतः सक्षम का अर्थ है “शब्दार्थ ज्ञान सहित तद् अनुरूप अनुष्ठान ” ।

पोस्ट ७८,७९/78,79

जैसे शास्त्र और आल्वार् आदि ने मूल ग्रन्थों में कहा है, वैसे ही उनके अर्थो को , क्यों नही ग्रहण करना चाहिए ? इसके उत्तर में कहते हैं कि सहस्त्रगीति में एक जगह, फलाश्रुति में कहा गया है, ” इस दस पासुरों को गानेवाले , कामिनीयों के प्रिय हो जायेंगे “; इसका अर्थ यह तो नही हो सकता है न ! इसका तात्पर्य अर्थ है , ” जिसप्रकार कामी , कामिनी के लिये भोग्य होते हैं, उसीप्रकार पासुरों को अभ्यास करनेवाले, नित्यसूरियों के लिये भोग्य होंगे ” । तो यह सिद्ध हुआ कि पासुरों का केवल पाठ ही पर्याप्त नही है, साथ साथ अर्थ ज्ञान और उसके अनुसार अनुष्ठान भी आवश्यक है। इसीप्रकार वेदों, ऋषियों, आल्वारों और आचार्यों का कथन कभी कभी प्रशंसा मात्र होते हैं, अतः उनके तात्पर्य का ज्ञान और अनुष्ठान अनिवार्य ही है ।

चक्रं बिभर्त्ति वपुषा अभितप्तं फलं देवानां अमृतस्य विष्णोः स एति नाकं दुरिता विधूय विशन्तियद्यतयो वीतरागः “(अथर्व णम् )  इन्द्रियों के विषयों में  अनासक्त व्यक्तियों द्वारा प्राप्त परमपद को विष्णु के चक्र का तप्त मुद्रा धारण करने से प्राप्त कर सकते हैं ।) प्रमाणानुसार , तप्त चक्र धारण मात्र से, शब्दादि विषयों में आसक्ति रहित सन्यासी परमपद को प्राप्त होते है; ऐसा अर्थ न लगाकर , देवतांतर में आसक्त , पर हिंसा आदि निषिद्ध अनुष्ठानवालों को भी चक्र धारण मात्र से परमपद प्राप्त होगा , ऐसा कहना उचित नही होगा न !

तो , ऐसा कहना उचित है कि भगवान के शंख चक्र को धारण करना ज्ञानीयों के लिये श्रेष्ठ संस्कार है , परन्तु शंख चक्र का धारण मात्र ही पर्याप्त है , ऐसा कहना अनुचित ही हैं । यहाँ प , वेदमें , पंच संस्कारों का श्रेष्ठता का स्तुति मात्र की गयी है , ऐसा ही मानना चाहिए ।

पोस्ट ८० -८२/80-82

ये पापिनः अपि शिशुपाल सुयोधनाद्याः वैरानुबन्धमतयः परुषं वदन्तः , मुक्तिंगताः ये ” ( शिशुपाल , दुर्योधन आदि पापी , बैर के कारण , भगवान को कटु वचनों से गाली देकर मुक्त हो गये ) प्रमाणानुसार पापी शिशुपालादि भी गाली देकर मुक्त हुए ; ऐसा कहने का तात्पर्य उनके अंतिम भगवद् स्मरण का प्रभाव ही है क्योंकि भगवद् निन्दा करनेवालों को  परमपद की प्राप्ति कदापि नही हो सकता

आल्वार् भी तोताद्री दिव्यदेश के महलों का वर्णन करते समय कहते हैं कि महल इतने ऊंचे हैं कि चंद्र को छू रहे हैं ( सहस्त्रगीति ५-७-२) । यह तो प्रत्यक्ष के विरुद्ध है । अतः इन्हें प्रशंसा मात्र ही मानना चाहिए ।

” यथा तथावापि सकृत् कृतोंजलिः “ ( स्तोत्ररत्न २८) , प्रमाण में अंजलि का स्तुति करते समय “ केनचित् ” , ” कदापि ” कहकर यह बताया गया है कि, किसी एक समय में एक अंजलि कर देने से , व्यक्ति के सभी पाप मिट जाते हैं और अभीष्ट फल प्राप्त होते हैं । इसका यह मतलब तो नही है न कि , एक अंजलि मात्र करके , परन्तु भगवद् आज्ञा का उल्लंघन करके , दुराचारों में प्रवृत्त होकर , भागवतों का अपचार करने से , उसके अनिष्ट की निवृत्ति पूर्वक इष्ट की प्राप्ति हो जायेगी ? यदि ऐसा ही मतलब मान लिया जाय , तो इस जगत में एक अंजलि भी न करनेवाले नही होने से , देवतांतर भजन करनेवाले , परम पुरुषार्थ के व्यतिरिक्त अन्य फलों को चाहनेवाले , दुराचारी , भागवत अपचार करनेवाले सभी चेतन को मुक्ति की प्राप्ति स्वीकारना पडेगा , जिससे वैष्णवत्व आदि योग्यताओं की आवश्यकता , व्यर्थ सिद्ध हो जायेगा ।
अतः , “ महतामपि केशांचिदतिवादाः प्रथग्विधाः तत्तदर्थ प्रशंसादि तत्परत्वाद बाधिताः ” ( कुछ महात्माओं का विविध प्रकार के अतिशयोक्ति शब्द का तात्पर्य प्रशंसा मात्र ही होने से स्वीकार्य है ) प्रमाणानुसार , ऐसे उक्तियों को प्रशंसा मात्र मान लेने से , दोष नही होता है ।

Discussion:

जय श्री सीता राम; अडियेन; दास की एक जिज्ञासा है.

आज के श्लोक में जो विधि निषेध पालन का वर्णन है.  क्या यह साधन का ही एक स्वरूप माना जाये, क्योंकि शरणागत होने के बाद भी उपरोक्त विधी निषेध का पालन न करना मोक्षप्राप्ति के विरोधी है.
अतः शरणागत होने के पश्चात विधी निषेध पालन करना, भाव पूर्ण और चिंतनपूर्ण भगवद् विषय अनुसंधान करना ये कही न कही साधना के समान परिलक्षित होते है. एक भक्ति मार्ग का पथिक भी इन्हें करता है और शरणागत भी 🙏🙏🙏

पूर्व में ही कहा तो गया है कि ” सर्व धर्मान् परित्यज्य ” में अधर्म निवृत्ति रूपी धर्म का समावेश नही है । यदि सही माने में प्रपन्न होगा तो विधी निषेध का पालन भगवद्-प्रीत्यर्थ ही करेगा न कि साधन मानकर । जब हम संध्या वंदन या अन्य वैदिक कार्यों में संकल्प करते हैं तब यही कहते हैं कि “ भगवद् आज्ञा भगवद् कैंकर्य रूपम् ” । अतः हमारे लिये सब कुछ कैंकर्य ही है । इसलिए सदा गुरु परंपरा पूर्वक द्वयमंत्र का अनुसंधान का विधि , प्रपन्न के लिये आवश्यक है ताकि विरुद्ध आचार में मन न लगे और यह अनुसंधान भगवान के लिये अत्यन्त प्रिय है ।शिष्टाचार में जितना विधि का पालन है उतना ही करना है; उदाहरण: शास्त्र में हर एक मास के आरंभ में पितृ तर्पण का विधान है; परन्तु शिष्टाचार में चार मात्र मास ही है , महालय पक्ष में श्राद्ध का विधि है परन्तु तर्पण मात्र का शिष्टाचार है । हमारे आचार्यों ने ही विधियों को कम कर दिया है, परन्तु उतना तो शिष्टाचार के अनुसार, भगवद् कैंकर्य मानकर करना चाहिए ।

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दिव्यप्रबंध के अर्थ का अनुसंधान करके, अनुष्ठान करने का प्रकार का वर्णन :

असत्य का ज्ञान ” ( तिरुवृत्तम् -१) कथनानुसार , देहात्माभिमान रूपी असत्य ज्ञान , सांसारिक दुष्कर्म प्रवृत्ति से मैला हुआ शरीर आदि त्याज्य है ऐसा जानकर , इनसे छुटकारा पाने के लिये भगवान से प्रार्थना करके , ” सबका त्याग करके , आत्मा को उसके मालिक में लगाओ ” ( सहस्त्रगीति – १-२-१) कथनानुसार, पिता, माता, पत्नी, पुत्र, घर, धन आदि जो भगवद् व्यतिरिक्त पदार्थ हैं; उन सबका परित्याग के पश्चात ही  भगवान के प्रति आत्म समर्पण करके, ” आप और आपका , इन्हें समूल नष्ट करके ” ( सहस्त्रगीति १-२-३) कथनानुसार , संसार बीज रूपी अहंकार , ममकार को समूल नष्ट करके , ” मन के मल को धोकर ” ( सहस्त्रगीति १-३-८) कथनानुसार , स्वगुण और परदोषों का निरीक्षण रूपी मन के मल को  दूर करके, ” मैं नीच हूँ , पापी हूँ ” ऐसे अपने दोषों को कहकर , ” किस दिन  मैं आकर  तुम से मिलूंगा “( सहस्त्रगीति ३-२-१) कथनानुसार , प्रतिकूल शरीर , इन्द्रियों को अन्य विषयों से निवृत्त करके , कब मैं तुम से आ मिलूंगा , ऐसे दुःखित होकर , ” सदा सर्व काल सेवा करना चाहिए ” ( सहस्त्रगीति ३-३-१) कथनानुसार , भगवान के प्रति , सर्व काल , सर्व देशों में , सर्व प्रकार के सेवा करने में , रुचि युक्त होकर , ” सभी चित् अचित् वस्तु वही है ” ( सहस्त्रगीति ३-४-१०) कथनानुसार , सभी जड , चेतन वस्तुओं का आत्मा भगवान ही है , ऐसा मानकर , उनके प्रति राग द्वेष रहित होकर , “हमारे सोच के अनुसार , रूप धारण करता है, भगवान ” ( सहस्त्रगीति ३-६-९) कथनानुसार , अर्चावतार के गुण पूर्ति का अनुसन्धान करके , उसमें अत्यन्त प्रीति युक्त होकर , “ भगवद् भक्त जो भी हैं , वे ही हमारे स्वामी हैं ” ( सहस्त्रगीति ३-७-१) कथनानुसार , भगवद् गुणों के अनुभव में मग्न , परम विलक्षण वैष्णव ही हमारे लिये उपेय हैं ऐसा अनुसंधान करके , अनधिकारी लोगों के सेवा से निवृत्त होकर , “ इन्द्रिय सुख- अल्प सुख ” ( सहस्त्रगीति ४-९-१०) कथनानुसार , ऐश्वर्य , कैवल्य को तुच्छ मानकर , ” यह कैसा संसार है ? ” ( सहस्त्रगीति ४-९-१) , ” दुष्ट संसार का दर्शन न कराओ(सहस्त्रगीति ४-९-७) कथनानुसार , इस संसार का व्यवहार असह्य होने से , इस संसार से घृणा करके , ” कोई कर्मयोग नही है , ज्ञानयोग नही है ” ( सहस्त्रगीति ५-७-१) कथनानुसार , अपने साधन रहित अवस्था का अनुसन्धान करके, विषयांतरों के दर्शन से दुःखित होकर , ” दिन रात , आँखें नींद से अनजान हैं ” ( सहस्त्रगीति ७-२-१) कथनानुसार , भगवान को न पाने से , निद्रा और आहार में रुचि रहित होकर , ” मेरे पिता , दर्शन देने की कृपा करो ” ( सहस्त्रगीति ८-१-१) कथनानुसार , भगवान को बुलाते हुए , ” मल्लिका पुष्प के गंध से युक्त शीतल पवन दाह देता है ” (सहस्त्रगीति ९-९-१) कथनानुसार ,भगवान के वियोग के समय में , भोग्य पदार्थ भी आग जैसे प्रतीत होते हुए , ” तुम्हारा शपथ ” ( सहस्त्रगीति १०-१०-२) , ” तुम्हारे सिवाय अन्य कोई उपाय न जानता हूं ” ( सहस्त्रगीति १०-१०-३) कथनानुसार , शपथ पूर्वक भगवान से प्रार्थना करके , प्रकृति संबंध का विच्छेद करा लेने में , परम व्याकुल होना ही , दिव्यप्रबंध का अध्ययन का फल है ।

तो हमें गुरु परंपरा पूर्वक द्वयमंत्र का जप करते रहना चाहिए , तब यह सब गुण आहिस्ता आहिस्ता हमारे में उदित हो जायेंगे ।

पोस्ट ८७,८८/87,88

श्रीवैष्णव दर्शन के दिव्यप्रबंधों के अर्थ के ज्ञान रहित लोग जन्म मरण रूपी संसार बंधन में जकडे होते हैं । परन्तु इन अर्थों को जानकर भी , जो विषयों में आसक्त होकर , पत्नी , पुत्र आदि में मग्न होकर , अहंकार और ममकार के वश में होकर , भागवत अपचारादि के प्रति बिना कोई भय के , एक दूसरों को , शास्त्र चर्चा रूपी स्पर्धा में , पराजित करके , ” गुरुं त्वगंकृत्य हुंकृत्य विप्रं निर्जित्य वादतः अरण्ये निर्जले देशे भवति ब्रम्हराक्षसः ” ( कार करके , वाद विवाद में उन्हें जो पराजित करता है , वह निर्जल वन में , ब्रम्हराक्षस का जन्म को प्राप्त होता है ) इस प्रमाण के अर्थ को उपेक्षित करके , राजा के महलों में सेवा के अयोग्य व्यक्तियों का सेवा करके , अधम क्षुद्र पुरुष को ” आप ही सर्वोत्कृष्ट पुरुष है ” ऐसे उनका स्तुति आदि करके जीवन चलानेवाला व्यक्ति आस्तिक-नास्तिक कहा जाता है ।
शास्त्र के ज्ञान रहित अज्ञानी और इस आस्तिकनास्तिक में अधिक अंतर है ।

शास्त्र अज्ञानी को शास्त्र ज्ञान प्रदान करके , सुधारा जा सकता है ; परंतु शास्त्र का ज्ञान होते हुए भी , अहंकार से दुराचारी आस्तिकनास्तिक को सुधारा नहीं जा सकता ।

विदुशोतिक्रमे दंड भूयस्त्वम् ” ( जानकारी होते हुए भी , जो ज्ञानी शास्त्र विधि का उल्लंघन करता है , उसके लिये दंड , ( साधारण व्यक्ति से ) अधिक होता है ।) प्रमाणानुसार आस्तिक-नास्तिक का अपराध बहुत माना जाता है । अतः , शिष्य व्यक्ति को , ऐसे आस्तिक-नास्तिक व्यक्ति के साथ सहवास नहीं करना चाहिए ।
यदि सहवास किया तो , ” दुर्गंध पदार्थ के संसर्ग से , (अच्छे पदार्थों में) दुर्गंध चढ जाता है ” ( उपदेशरत्नमाला – ७०) प्रमाणानुसार , उस व्यक्ति के दुर्वासना , इस पर हावी होकर , इसे संसार में बद्ध कर देगा ।

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यह अर्थ भगवान के अभिप्राय से भी सिद्ध होता है । ”

महत्सेवां द्वारं आहुः विमुक्तेः तमोद्वारं योषी तां संगिसंगं – महान्तः ते समचित्ताः प्रशांताः विमन्यवः सुहृदस्साधवो ये –

ये वा मयीशेकृत सौहृदार्थाः जनेषु देहं भरवार्त्ति केषू , गृहेषुजाया – आत्मजराति – मत्सु न प्रीतियुक्ता यावदर्थाश्च लोके ” ( महानुभावों के प्रति की गयी सेवा , मोक्ष के लिये मार्ग है , ऐसा कहा जाता है ; पत्नी , पुत्र में आसक्ति , अज्ञान रूपी अंधकार के लिये मार्ग है , ऐसा भी कहा गया है ; वे महानुभाव सम चित्तवाले , जगत के आसक्ति से मुक्त , क्रोध रहित, सबके मित्र, मुझ ईश्वर में प्रेम युक्त, शरीर, घर, पत्नी, बच्चे इनमें अनासक्त, जगत में जो मिला है उसीमें तृप्त होते हैं “।)

प्रमाणानुसार , महात्माओं की सेवा ही मुक्ति का द्वार है और पत्नी , पुत्र आदि में आसक्ति ही , अंधकार रूपी अज्ञान का द्वार है । वे महात्मा कौन हैं ?

समश्शत्रौच मित्रेच तदा मान अवमानयोः – शीतोष्ण सुखदुःखेषु समस्संग विवर्जितः ” ( गीता १२-१८) ( शत्रु और मित्र , मान और अपमान , शीत और उष्ण , सुख और दुःख आदि में समता बुद्धि रखनेवाला , किसी में आसक्ति रहित रहनेवाला ) , ” तुल्य निन्दा स्तुतिर्मौनी संतुष्टो येन केनचित् ” ( गीता – १२-१९) ( निन्दा और स्तुति को सम मानकर , मौन धारण करके , जो मिलता है उसमें तृप्त होकर रहता है ) प्रमाणानुसार , शत्रु – मित्र , मान- अपमान , शीत- उष्ण , सुख- दुःख , लाभ- नष्ट , निन्दा – स्तुति आदि में समता चित्त युक्त होकर , प्रशांत चित्त होकर , क्रोध रहित , सर्व प्राणी के प्रति मित्रता भाव युक्त होकर , परम साधु , मेरे प्रति अति प्रेम युक्त होकर , पत्नी – पुत्र- गृह- क्षेत्र- धन आदि में विरक्त , जो मिलता है उसमें संतुष्ट होकर जो विचरण करते हैं , वे ही महात्मा हैं । इसप्रकार जो महात्मा हैं , उनका सहवास ही मुक्ति – द्वार है , ऐसा भगवान स्वयं ने कहा है न!

नास्तिक , सदाचार युक्त आस्तिक , आस्तिक-नास्तिक – इन पर विचार करके , पूर्वोक्त और उत्तर उक्त दोनों को मूर्ख मानकर , मध्य भाग में जिस आस्तिक को अकहा है , उसका अनुसरण कर ” ( उपदेशरत्नमाला ६८) प्रमाणानुसार , शास्त्र ज्ञान विहीन होकर , निषिद्ध अनुष्ठान करनेवाले नास्तिक , सारतम शास्त्र का प्रतिपाद्य , सन्मार्ग का अनुसरण करनेवाले आस्तिक , शास्त्रार्थ को जानकर भी मनमानी आचरण करनेवाले आस्तिक-नास्तिक , इन पर अच्छी तरह विचार करके , पूर्वोत्तर में कहे गये व्यक्तियों को , मूर्ख मानकर त्याग करके, बीच में कहे गये आस्तिक व्यक्ति का अनुसरण करना चाहिए , ऐसे हमारे आचार्य ” पेरिय जीयर् ” ( महा जीयर् – श्रीवरवरमुनि ) ने कहा है न !

अतः , मोक्षाधिकारी को , सारतम शास्त्र मार्ग के अनुसरण करनेवाले , परम विलक्षण भागवतों का सहावास करते हुए आचार्य पद का अभिमान युक्त होकर , परन्तु सदाचार्य के कोई भी लक्षण के बिना , ” पूर्वों के वचन का अध्ययन करके , पश्चात उसका मनन करके , उसे न कहकर , अपने बुद्धि से विपरीत अर्थों को कहकर, यही शुद्ध उपदेश है , ऐसा कहनेवाले मूर्ख ही है ” ( उपदेशरत्नमाला – ७१) प्रमाणानुसार , पूर्वाचार्यों के श्रीसूक्तियों को सुनकर , पश्चात उस अर्थ के अनुकूल , अविरुद्ध अर्थ को न कहकर , मनमानी अर्थ लगाकर , यही शुद्ध संप्रदायार्थ है , ऐसे कहनेवाले मूर्ख है , ऐसे जीयर् के कथनानुसार , सही अर्थ का परित्याग करके , एक परम विपरीत सौ अर्थों का कल्पना करके , प्रतिकूल देहात्माभिमानादि का त्याग न करके , बद्ध संसारी बनकर , ” सदाचार्य कटाक्ष मुझपर है , मुझे किस चीज का भय…

 

पोस्ट ९२-९६/92-96

अतः , मोक्षाधिकारी को , सारतम शास्त्र मार्ग के अनुसरण करनेवाले , परम विलक्षण भागवतों का सहावास करते हुए आचार्य पद का अभिमान युक्त होकर , परन्तु सदाचार्य के कोई भी लक्षण के बिना , ” पूर्वों के वचन का अध्ययन करके , पश्चात उसका मनन करके , उसे न कहकर , अपने बुद्धि से विपरीत अर्थों को कहकर, यही शुद्ध उपदेश है , ऐसा कहनेवाले मूर्ख ही है ” ( उपदेशरत्नमाला – ७१) प्रमाणानुसार , पूर्वाचार्यों के श्रीसूक्तियों को सुनकर , पश्चात उस अर्थ के अनुकूल , अविरुद्ध अर्थ को न कहकर , मनमानी अर्थ लगाकर , यही शुद्ध संप्रदायार्थ है , ऐसे कहनेवाले मूर्ख है , ऐसे जीयर् के कथनानुसार , सही अर्थ का परित्याग करके , एक परम विपरीत सौ अर्थों का कल्पना करके , प्रतिकूल देहात्माभिमानादि का त्याग न करके , बद्ध संसारी बनकर , ” सदाचार्य कटाक्ष मुझपर है , मुझे किस चीज का भय है ” , ” मोहान्ध व्यक्ति एकान्त में , अंधकार के भय बिना , पाप कार्यों को करते हैं ” ( आर्तिप्रबंधम् ४४) प्रमाणानुसार , मोह से अंधा होकर (ज्ञान रहित होकर ), स्वयं पाप से भय रहित होकर , अपने शिष्य को भी पाप करने में , भय रहित करके , दोनों मिलकर चोर की तरह , आचार्य , भागवत , शिष्ट व्यक्ति , इन तीनों के लिये जो निंदनीय है , वह निषिद्ध अनुष्ठान से , अपने शिष्य का हत्या करके स्वयं नाश को प्राप्त करनेवाले , विपरीत अर्थों को उपदेश करनेवाले इस नीच आचार्य पर विश्वास न करके , आचार्य के लक्षणों से पूर्ण , एक सदाचार्य का आश्रय ग्रहण करके चिंता रहित होना चाहिए ।

” भक्तों में श्रेष्ठ और जाति से भी ब्राह्मण होते हुए ” ( तिरुमाला – ४३) प्रमाणानुसार , उत्कृष्ट वर्ण में जन्म लेकर , स्वयं को भागवतों में श्रेष्ठ मानकर , वैष्णव उचित तिलक, तुलसी माला आदि धारण करके, परन्तु मन और इन्द्रियों पर नियंत्रण ऐसे महाभागवतों के लक्षण बिना , ( बिना स्नान काये ) पैर और हाथों को अच्छी तरह धोकर , शुभ्र वस्त्रों को पहनकर , द्वादश ऊर्ध्वपुण्ड्रों और उंगली में पवित्र ( दर्भ से अंगुठी ) धारण करके , वेदों का अध्ययन और अध्यापन आदि में प्रवीण बताकर , वेश्या के जैसे सर्वजन मनोहर वेषधारी बनकर , अहंकार और ममकार युक्त होकर , घर- क्षेत्र-पत्नी – पुत्र आदि में आसक्त होकर , रागद्वेश युक्त होकर , पैसे कमाने को ही अपना लक्ष्य बनाकर , दूसरों के संपत्ति को छीनकर , घमंड और धन में आसक्ति के कारण भागवत अपचारों को करनेवाले , बद्ध संसारी को देखकर , उनके पास जाने के लिये भयभीत होकर , परन्तु वैष्णव चिन्हों को देखने से , उनका अपमान न करके , इनसे मित्रता या शत्रुता न करके , अपने शक्ति के अनुसार कैंकर्य करके , विनम्रता से प्रणाम आदि से उन्हें प्रसन्न करके , अधिक नजदीक न जाकर , दूर रहकर ,
अर्थपंचक के तत्वज्ञ , आकार त्रय से ( अनन्यार्हशेषत्व , अनन्य उपायत्व, अनन्यभोग्यत्व ) संपन्न , महाभागवतों के साथ मिलकर , ” बोधयन्तः परस्परम् ” ( मेरे गुणों को एक दूसरे से कहकर संतुष्ट होते हैं – गीता १०-१) प्रमाणानुसार , स्वरूप के अनुरूप , एक दूसरे से भगवद् विषयों का आदान प्रदान करते हुए , जीवित काल में भगवद् गुणानुभव और कैंकर्यों में समय बिताते हुए , अहंकार रहित होकर , भागवत अपचार के प्रति भयभीत होकर , जो सावधानी से जीवन चलाते हैं , वे ही मोक्ष के अधिकारी है , ऐसे हमारे आचार्य (श्रीवरवरमुनि ) का कहना है ।

Discussion:-

जय श्रीसीताराम    
स्वामी जी थोडा क्लिष्ट लग रहा है. पूर्णतः नही समझपारहाहूं🙏🙏🙇‍♂

क्लिष्ट ही है । यहाँ पर महाराज कह रहे हैं कि मोक्षाधिकारी को कपट आचार्यों को त्यागकर सदाचार्य का आश्रय ग्रहण करना चाहिए । वेशधारी कपट आचार्य स्वयं का और शिष्य का अहित करता है जिससे दोनों डूब मरते हैं ।परन्तु ऐसे वेशधारीयों के नजदीक न जाकर दूर रहकर ही उनका यथाशक्ति सेवा आदि करनी चाहिए ।

अंतिम में , मोक्षाधिकारी के का अनुष्ठान बताया गया ह

 

 

पोस्ट ९७_९८/97-98

परन्तु , दो तीन आल्वार्-आचार्यों को छोड़कर , अनेक आल्वार् और आचार्य ,संसार में , पुत्र , पत्नी आदि के साथ रहते थे ; परंतु वे तो मुक्ति के अधिकारी थे न ! इसका उत्तर : श्रीमन्नाथमुनी से लेकर अस्मदाचार्य ( श्रीवरवरमुनि ) पर्यन्त , सभी को सन्यासी ही मानना चाहिए क्योंकि ” निवृत्त रागस्य गृहं तपोवनं , प्रवसित इव गेह वर्तते यस्स मुक्ताः ” ( इतिहास संहिता अध्याय१३) ( अहंकार , ममकार का गर्व को छोड़कर , राग द्वेष से निवृत्त , जो रहते हैं , उनका घर ही तपोवन है ; उनको वन में निवास करने की आवश्यकता नही है ; ऐसे व्यक्ति को मुक्त ही जानना चाहिए ) प्रमाणानुसार , जो रागद्वेष से निवृत्त है , अहंकार और ममकार रहित है , शम दम गुणों से युक्त है , सर्वभूतों पर दया करनेवाले हैं , शत्रु और मित्र को समान रूप से देखनेवाले हैं , धन में आसक्ति रहित है , उंचवृत्ति आदि से साधुजीवन चलानेवाले हैं , आचार्य के आदेश के कारण अथवा दया के कारण , भोग्यता बुद्धि को त्यागकर , एक दो बच्चे के लिये पत्नी से कुछ दिन संबंध जोडकर , पश्चात विहित संभोग को भी त्यागकर अथवा संन्यास लेकर जो रहते हैं , परंतु यदि पत्नी ज्ञानी हो तो , परस्पर विषय से विरक्त होकर , कूरेषजी और उनके पत्नी आण्डाल् जैसे , भगवद् गुणानुभव कैंकर्यों को करते हुए जीते हैं , वे सन्यासी के तुल्य ही हैं ।

पोस्ट ९९ – १०१ / 99 – 100

अहं ममेति चण्डालः ” ( अहंकार और ममकार नीच है ) प्रमाणानुसार , मनुष्य को कर्मचण्डाल बना देते हैं अहंकार और ममकार ।

नाहं देवो न मर्त्यो वा न तिर्यक् स्थावरोपिवा , ज्ञानानन्दमयस्त्वात्मा शेषोहि परमात्मनः

न अहं विप्रो न च नरपति नापि वैश्ये न शूद्रोर्वा इन्दु

श्रीमद्भुवन भवनस्थित्यपायैक हेतोः , लक्ष्मी  भर्त्तुः नरहरी तनोः दासदासस्य दासः “

( न मैं देव हूँ , न मनुष्य , न पशु , न पक्षी , न स्थावर , ज्ञानानंद स्वरूप , भगवान का शेषभूत , आत्मा हूँ ; न मैं ब्राह्मण हूँ , न राजा , न वैश्य , न शूद्र , न ब्रह्मचारी , न गृहस्थ , न वानप्रस्थ , न सन्यासी ; परन्तु जगत की सृष्टि , स्थिति , संहार का कारण , लक्ष्मी पति नरसिंह का दासानुदास का दास हूँ )

प्रमाणानुसार आत्मा के , भगवद् दासानुदास स्वरूप को भुलाकर ,

विद्या मदो धनमदः तृतीयोभिजनोमदः ” ( भारतम् उद्योग पर्वा ३४-४६)

( विद्या , धन और कुल के कारण घमंड )

प्रमाणानुसार , अहंकार ममकार रूपी मदिरा का पान करके उन्माद होकर , द्वारिका के यादव लोग जिसप्रकार अपने नाश के कारण बने , उसीप्रकार एक दूसरे से बैर करके , दस बारह बच्चे पैदा करके , निन्दनीय देह के वर्धन में आसक्त , आत्मस्वरूप के विरोधी पत्नी और संसार वर्धक स्वरूप के अत्यन्त प्रतिकूल पुत्रों के वश होकर , उनके अत्यन्त परतंत्र बनकर , उनमें आसक्त होकर , देहांत तक उन्हें अपने आत्मस्वरूप के विरोधी न मानकर ,इसे देख शिष्य जन घृणा करेंगे इस लज्जा को भी छोड़कर , भगवान के अप्रिय , इन सांसारिक दुष्कर्म प्रवृत्ति के भय से रहित होकर , एक भगवद् प्रपन्न का भी पोषण न करके , पत्नी , पुत्र आदि भी भगवान के ही हैं ऐसा विपरीत ज्ञान युक्त होकर , ” स्वयं को शत्रु मानकर , अपने से संबंधित पत्नी , पुत्र आदि को सांप , आग आदि मानकर भयभीत होना चाहिए , एक प्रपन्न को ” ( श्रीवचनभूषण २४४) प्रमाणानुसार , ऐसा भयभीत न होकर , उन पत्नी , पुत्र के रक्षा के लिये , राजदरबार में अनेक बार जाकर , अवंदनीय व्यक्तियों की सेवा करके , दूसरों के धन को छीनकर , अयोग्य व्यक्तियों से याचना करके , अनधिकारियों को शिष्य बनाकर , अहंकार से दिया हुआ उनके धन को स्वीकार करके , जीवन नहीं चलाते थे हमारे गृहस्थ पूर्वाचार्य । अतः उनका उदाहरण देकर , हम भी क्यों न सांसारिक जीवन में रहें , ऐसा विचार करना अनुचित है ।

विलक्षण मोक्षाधिकार निर्णय (51-75)

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः

previous parts:

विलक्षण मोक्षाधिकार निर्णय (1-25)

विलक्षण मोक्षाधिकार निर्णय (51-75)

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विलक्षण मोक्षाधिकार निर्णय(51-75)

पोस्ट – ५१

अतः , सदाचार्य के उपदेश के बिना , जीव में विवेक न होने से , इसे ज्ञान और अनुष्ठान युक्त बनाकर , भगवान इस जीव का उद्धार करता है । इसप्रकार के अधिकारी इस समय दुर्लभ ही है , यदि ऐसा कहोगे तो , शास्त्र में भी , इन्हें दुर्लभ ही कहा गया है । ” वासुदेव सर्वमिति – समहात्मा सुदुर्लभं ” ( गीता ७-१९ वासुदेव ही धारक, पोषण, भोग्य है ऐसा माननेवाला अधिकारी , मेरे लिये अति दुर्लभ ही है ) , ” कश्चित् मां वेत्ति तत्वतः ” ( गीता ७-३ हजारों में कोई एक ही मुझे यथार्थ जानता है ) , ” कोई एक मिलना भी अति दुर्लभ है ” ( उपदेश रत्नमाला -५५)
इसप्रकार भगवान ने गीता में और श्रीवरवरमुनि ने उपदेश रत्नमाला में भी , ऐसा शुद्ध अधिकारी को दुर्लभ ही बताया है न !

अतः , सदाचार्य के उपदेश के बिना , जीव में विवेक न होने से , इसे ज्ञान और अनुष्ठान युक्त बनाकर , भगवान इस जीव का उद्धार करता है । इसप्रकार के अधिकारी इस समय दुर्लभ ही है , यदि ऐसा कहोगे तो , शास्त्र में भी , इन्हें दुर्लभ ही कहा गया है । ” वासुदेव सर्वमिति – समहात्मा सुदुर्लभं ” ( गीता ७-१९ वासुदेव ही धारक, पोषण, भोग्य है ऐसा माननेवाला अधिकारी , मेरे लिये अति दुर्लभ ही है ) , ” कश्चित् मां वेत्ति तत्वतः ” ( गीता ७-३ हजारों में कोई एक ही मुझे यथार्थ जानता है ) ,

” इसप्रकार भगवान ने गीता में और श्रीवरवरमुनि ने उपदेश रत्नमाला में भी , ऐसा शुद्ध अधिकारी को दुर्लभ ही बताया है न !आचार्याभिमान मात्र से । यहाँ पर ज्ञान का होना अपवाद मात्र है।( exception )

 

Discussion:

Q: तमेव विद्वान अमृत इह भवति, ज्ञानहीन वृक्षों को मोक्ष कैसे मिल सकता ? ऋते ज्ञानान मोक्ष:

  •  The realization of bhagwat-paaratantriyam is expected from Human as shastric injunctions are for them. Only they have kaaran kalevar to realize so
  • This is important point. In Tattvatrayam, Sri Manavala Mamunigal raises this question as to how non-human chetanas who do not have jnaanaadhikaara can obtain moksha.

He answers that they obtain it through vaiṣṇava samāśrayaṇa where that vaiṣṇava has obtained the jñāna pauṣkalya in tattva. That is, by vaiṣnavābhimāna they can be liberated

  • Then the question arises whether vaiṣnavābhimāna applies only to animals, birds or trees.

The answer is according to the vacana “paśur-manuṣya-pakṣī vā”, the human is placed between animals and birds as if belonging to their category. So, even a human who does feel confident in the tattva-s can take refuge in a learned vaiṣṇava’s abhimāna and this person is usually the ācārya.

  • Then, Mamunigal rises another question: how can one become even a mumukṣu without tattva jñāna?

To this, he cites the timeless efforts taken by Bhagavān to redeem the souls including jāyamāna kaṭākṣa Through these, one at least attains interest in liberation at some point leading to learning the tattva-s which in turn lead to upāyatva of God and prapatti

Thus any knowledge we obtain is bhagavad-upakāra-kṛṣi-phalam

Hence, whenever Āzvārs do anusandhāna of their benefit, they refer to Bhagavān as pirān which means upakār. In our saṃpradāya, prapatti is not the acceptance of Bhagavān  as upāya but the realization that Bhagavān is always upāya.

tasya upākareṇaiva asya kalyāṇasya saṃsiddhiḥ

sa eva tatad-daśayām utpanna-prāpti-pratibandhaka-sarva-virodhi-varga-nirāsakaḥ

In Śrīrāmāyaṇa, it is seen that even a duṣṭa like Rāvaṇa benefited when he dropped his bow. cacāla cāpañca mumoca vīraḥ. Immediately, Perumāḷ says, “go now and come later”. Like this, we may unknowingly do svapravṛtti nivṛtti and slowly get ourselves open to bhagavad-rakṣaṇa. That is why we have become vaiṣṇava-s today. This pramāṇa is quoted by Śrī Piḷḷai Lokācārya in Mumumkṣuppaḍi

Thus, the arising of jñāna leading to mokṣa is not contradictory to bhagavad-upāya. It is the result of His grace. For example when Villi daasar asks Emperumanar – even for Vibhishana, there was a debate on accepting even though he had realized Bhagavan as saranya and left completely everything Emperumanar told – I am there for you, Periya Nambi is for me. Do not worry. Likewise in Arthi Prabandham, Mamunigal takes refuge in Emperumanar to overcome defects in himself

Adiyen will carefully say that jnaana praapti is desirable on approaching acharya but each person has individual limitations and if acharya is convinced that this is the best the sishya will get despite being sincere and has abhimaanam out of compassion for him / her, that is also sufficient. That is how we may explain Alavandar asking Emperuman to see Nathamunigal and do him grace Or the milk / curd seller taking letter from Emperumanar to Thiruvenkadamudaiyaan

 

पोस्ट – ५२,५३/52,53

अतः आचार्य समाश्रयण करके ,पंचसंस्कार प्राप्त करके , पवित्र तिलक,शिखा, तुलसी माला आदि धारण करके , परन्तु रहस्यत्रय मंत्रार्थों के विरुद्ध , देह को ही आत्मा मानकर , अन्य शेषत्व होकर , अथवा स्वतंत्र मानकर , अहंकार , ममकार , काम , क्रोध , मद , मात्सर्य युक्त बद्ध संसारी होकर , पुत्र-धन- धान्य आदि में आसक्त होकर, एक दूसरे से, धन के निमित्त अहंकार के कारण , स्पर्धा करते हुए , अयोग्य लोगों का चाकर बनकर रहनेवाले लोग , कुछ दिनों के लिये , भगवान के लीला (जन्म मृत्यु ) का विषय बनते हैं ।

परन्तु , जीवन के अंतिम समय में भी , यदि , ” पितरं मातरं दारान् पुत्रान् ” ( शरणागति गद्य – ६ ) ( भगवन् ! माता , पिता , पत्नी , पुत्र , रिश्ते नाते आदि सब कुछ छोड़कर , आपके श्रीचरणों में शरण आया हूँ ) , इस प्रमाणानुसार , भगवान के व्यतिरिक्त , अन्यों में वैराग्य प्राप्त होकर , पश्चाताप होने से , जैसे नदी में बाढ आने से पहले कुछ लक्षण दिखाई पड़ता है , उसीप्रकार इस व्यक्ति में मुक्त के लक्षण दिखाई देने लगते हैं ।
सदा परगुणाविष्टः द्रष्टव्यस्सर्व देहिभिः ” ( विष्णु तंत्रम् ) ( सदा भगवान के कल्याणगुणों का अनुभव करानेवाले वैष्णवों का दर्शन , सभी देहधारियों के लिये करने योग्य है ) , प्रमाणानुसार सभी के दर्शन योग्य होकर , स्वयं को भी एहसास हो जाता है कि यह अपना अंतिम शरीर है ।
परन्तु , जीवन के अंतिम समय तक भी , शास्त्र विरुद्ध आचरण करनेवाला हो , तो उसे पुनर्जन्म लेना ही पडेगा ।

पोस्ट – ५४/54

न खलु भागवता यमविषयं गच्छन्ति ” ( वेद वाक्य ) ( भागवत यम लोक को नहीं जाते ) , प्रमाणानुसार , नम्रता रहित होने पर भी , भागवत यम लोक नहीं जाता है , ऐसा ” प्रमेयरत्न ” नामक ग्रन्थ में पूर्वाचार्यों द्वारा कहा गया है ।

पेरियवाच्चान् पिल्लै ( कृष्णसूरी ) के पास आकर , एक श्रीवैष्णव ने पूछा , ” क्या हम भगवान के लीला ( जन्म मरण ) का विषय हैं या उनके कृपा ( परमपद प्राप्ति ) का विषय हैं ? ” , तब आचार्य ने कहा , ” यदि हम , हमें देह मानते हैं तो लीला का विषय बनते हैं और यदि आत्मा मानते हैं , तो कृपा का विषय होते हैं ।”

त्वग्ंमांस रधिरस्नायु मेधो मज्जास्थिः संहतौ – देहे चेत् प्रीतिमान् मूढो भविता नरकेपि सः ” ( जो मूर्ख व्यक्ति , इस शरीर में , जो कि चर्म, मांस , रक्त , मज्जा , हड्डी आदि का समूह है , सुख का अनुभव है , वह नरक में भी सुख का अनुभव करेगा ) प्रमाणानुसार , जो व्यक्ति देहाभिमानी होने से , तेल , घी आदि से देह को बढाकर , विषयासक्त होकर,देह संबंधित पत्नी , पुत्र आदि में अनुरागी होकर , शास्त्रों का वश न होकर , स्वतन्त्र आचरण करता है , वह भगवान के लीला का विषय बनेगा ।
जो आत्मस्वरूप के अनुरूप , आकारत्रय संपन्न है ( अनन्यार्हशेषत्व – भगवान का ही है जीव , अन्य किसी का नही , अनन्यशरणत्व – अन्य उपायों को छोड़कर , भगवान को शरण जाना , अनन्यभोग्यत्व – भगवान के व्यतिरिक्त , अन्य किसी में भी भोग्य बुद्धि न करना) , अर्थपंचक तत्व ज्ञान , संपन्न है , विवेक युक्त होकर , स्वरूप विरोधी प्रतिकूल विषयों का त्याग करता है , तिल में से , जैसा तेल को पृथक करना कठिन है , वैसे ही पृथक करने में कठिन अपने शरीर को शत्रु मानकर भयभीत होकर , उसे बढाने की इच्छा रहित होकर, प्राण धारण मात्र के लिये नियत आहार को स्वीकार करके , शास्त्रों के वशीभूत होकर , अहंकार रहित होकर , जो क्रियाशील है , वह भगवान के कृपा का विषय बनता है । “

पोस्ट – ५५-५६/55-56

अतः सदाचार्य का आश्रित होकर , उनके द्वारा प्राप्त उपदेशानुसार , ज्ञान और अनुष्ठान संपन्न होने पर ही , मुक्ति के योग्य हो सकते हैं । इसप्रकार आचार्य वरण करनेवाले अधिकारी , प्रथम प्रपन्न और चरम प्रपन्न , ऐसे दो प्रकार के होते हैं ।
प्रथम अधिकारी – अपने आचार्य के उपदेशानुसार , भगवान के अत्यन्त परतंत्र होकर , उस भगवान का प्रेमभक्त होकर , सहस्त्रगीति में शठकोप मुनि के वचनानुसार , भगवान से ही सभी प्रकार के रिश्तों को जोडकर , ” वासुदेव सर्वम् ” ( गीता – ७-१९) गीता वचनानुसार , वासुदेव को ही धारक, पोषक और भोग्य मानता है ।

चरम अधिकारी – आचार्य द्वारा प्राप्त , विलक्षण भगवान के स्वरूप रूप गुण आदि का मनन करके , ऐसे परम विलक्षण वस्तु को प्रदान करके महा उपकार करनेवाले आचार्य के प्रति कृतज्ञ होकर , ” माता पिता युवतयस्सर्वम् ” ( स्तोत्ररत्न – ५) प्रमाणानुसार आचार्य को ही माता , पिता मानकर , अन्य वस्तुओं का भान रहित होकर , भगवान को भी त्यागकर , मधुरकवि, जिसप्रकार शठकोप मुनी में आसक्त थे , उसीप्रकार मनोभाव युक्त होता हैं ।

इसप्रकार के भेद होने पर भी , दोनों अधिकारियों के लिये , प्रतिकूल विषयों से निवृत्त होना आवश्यक है ।

पोस्ट – ५७-५९/57-59

परन्तु , भगवद् के आश्रित होना दुर्लभ है और आचार्य के आश्रित होना सुलभ है ,ऐसा क्यों कहा जाता है ?
इसका उत्तर इसप्रकार है:

शास्त्रों में प्रतिपादित भगवान के बारेमें सुनाने पर , उसे समझ पाने का ज्ञान और अनुष्ठान करने का सामर्थ्य रहित होते हुए भी , मूक , बधिर आदि को आचार्य समाश्रयण का फल प्राप्त होगा । भगवान को, जैसे शास्त्रों द्वारा ही समझ पा सकते हैं , वैसे नही हैं आचार्य । उनको प्रत्यक्ष रूप से देख सकते हैं । जब शिष्य दुर्मार्ग पर चलता है , तब भगवान उसके रुचि के अनुसार अनुमति प्रदान करता है , परन्तु आचार्य तो शिष्य को अंत तक , एनकेन प्रकारेण जबरदस्ती करके , सुधारकर , भगवान के योग्य बना देता है ।
अतः , ” सिद्धिर्भवति वा नेति संशयोच्युत सेविनां – न संशयोस्ति तद्भक्त परिचर्यायेतात्मनाम् ” ( शाण्डिल्य स्मृति ११-९५) प्रमाण में कहा गया है कि भगवान अच्युत के आश्रितों को मोक्ष प्राप्त होगा या न होगा, इसमें संदेह है ; परन्तु उसके भक्तों के आश्रित हो जाने पर , मोक्ष प्राप्ति में शंका नही हो सकता है
परन्तु , सदाचार्य के , शास्त्रोक्त रीति द्वारा किये हुए आदेशों का , पालन न करके , अपने इच्छानुसार आलस्य के कारण , आचरण करने से , शिष्य को मोक्ष प्राप्त हो जायेगा , ऐसे तो नहीं कह सकते हैं न ! यदि ऐसा कहेंगे , तो इसका अर्थ यह हुआ कि भागवत अपचारादि प्रतिकूल आचरण से कोई हानि नही है ; यह तो पूर्वाचार्यों के वचन और अनुष्ठान का विरुद्ध है ।
भगवान को दुर्लभ इसलिये बताया है क्योंकि उसे देखा नहीं जा सकता ; अर्चा रूप में दिखाई देने पर भी , वह मुखसे कुछ बोलता नही ; मनुष्य , अपने दुर्वासना के कारण विषयासक्त होकर , दुराचार में प्रवृत्त होने पर भी , उसके रुचि को देखकर , अनुमति प्रदान करके , उसके कर्मों के अनुरूप फलों को प्रदान करता है । यह मनुष्य भोग के योग्य हो अथवा लीला के योग्य हो , भगवान के लिये दोनों समान ही है ; यदि शास्त्रों के अनुसार आचरण करता है , तो उसे परमानंद प्रदान करके , अपने भोग में शामिल कर लेता है ; यदि , शास्त्र रूपी आज्ञा का उल्लंघन करता है , तो उसे जन्म मरण रूपी , अपने लीलामें शामिल कर देता है ।

पोस्ट ६०,६१/60,61

सदाचार्य का , अपने आश्रित हुए शिष्य को , भगवान के लीला के योग्य बनते हुए देख , न छोड़कर , उसे भगवान के भोग के योग्य बनाना ही कर्तव्य है । एक राजा , एक दासी का भोग करने की इच्छा करता था ; परन्तु उसे रोग ग्रस्त देखकर , वैद्य को बुलाकर , उस दासी के रोग को दूर करने के लिये आदेश दिया । तब उस वैद्य का कर्तव्य , दिव्य औषधि , पथ्य आदि से , दासी को रोग से मुक्त करके , राजा के पास भेजना है । परन्तु यदि , उसे, रोग युक्त अवस्था में ही , हल्दी , कुंकुम , चंदन , काजल आदि लगाकर , फूल , वस्त्र , आभूषणों से अलंकृत करके , राजा के पास ले जाता है , तो राजा क्रोधित होकर , दोनों के सिर काटने के लिये , आज्ञा दे देगा ।
उसीप्रकार , भगवद् परतंत्र आचार्य ने भी , शिष्य को , निर्दोष भगवान के योग्य बनाने के लिये , अनंत काल से विषयासक्त शिष्य के अविद्या , वासना , रुचि आदि दोष भीतर रहते हुए , उसे दास्य नाम , शंख चक्र मुद्रा , तिलक आदि वैष्णव के बाहरी चिन्हों से अलंकृत करके , भगवान को समर्पित किया , तो आचार्य और शिष्य दोनों का विनाश ही होगा । अतः सदाचार्य , शिष्य को अच्छी तरह से ( मन और अनुष्ठान को ) शुद्ध करके , भगवान को समर्पण करता है । इसीलिये , सदाचार्य का संबंध , भगवद् संबंध से भी , शीघ्र फलदायक है , ऐसा कहा गया है ।
श्रीरामानुजाचार्य के संबंध को पाकर भी , रंगमहल नामक एक व्यक्ति , विषयासक्त था ; उसे अनेक प्रकार से सुधारकर , गीता के अठारह अध्यायों को अर्थ के साथ उसे समझाकर , भोजन और निद्रा भुलाकर, विषयों से विरक्त बनाकर , भगवान के कृपा पात्र बना दिया था । इसलिए , शिष्यका दुराचारी होने पर भी , उसे सुधारकर , सदाचार्य , उसकी रक्षा करता है , यह बात सत्य ही है ।

पोस्ट – ६२,६३, ६४/62,63,64

इस अर्थ को प्रपन्न गायत्री में रंगअमृतकवी ने भी कहा है न ! वे कहते हैं , ” भगवद् रामानुजाचार्य को विश्वास पूर्वक शरण जाने पर, क्या वे हमें , हमारे विषय वासना के कारण दुराचारी होकर , स्वर्ग नरक की यात्रा करने के लिये छोड़ देंगे ? कभी नहीं ; बल्कि हमें सन्मार्ग में जाने के लिये प्रवृत्त करके , सुधारकर भगवद् प्राप्ति करा देंगे ; अतः तू चिंता को त्याग दे ।”
इसके बावजूद , यदि भगवद् प्रपन्न , भ्रम आदि के कारण से , कुछ दोषी बन भी जाय तो भी , ” अविज्ञाता हि भक्तानां अघः कमलेक्षणः ” ( कमलनयन भगवान अपने भक्तों के दोषों को नहीं देखता ) , ” दोषोयद्यपि तस्यस्यात् ” ( भक्तों में यदि दोष है तो रहने दो ; ऐसे भक्तों को स्वीकार करना , शिष्टों के लिये निंदनीय नही है ) ( श्रीरामायण युद्ध काण्ड १८-३) , ” साधुरेव समंतव्यः ” ( गीता ९-३०, दुराचारी होने पर भी , मेरा भक्त को साधु ही मानना चाहिए ) , इन प्रमाणानुसार , सर्वशक्त और निरंकुश स्वतंत्र भगवान , परम कृपालु होने से , अपने भक्तों की रक्षा करता है ।

परन्तु आचार्य , भगवद् परतंत्र होने से , जैसे सोनार , सोने को शुद्ध करने के पश्चात ही आभूषण बनाकर , राजा को देता है , उसीप्रकार , शिष्य को भगवद् भोग के योग्य बनाकर , भौतिक भोगों से निवृत्त करके , और भी अनेक प्रपन्नालंकारों से युक्त बनाकर , विशेष कृपा करता है ।

वीरसुन्दर नामक राजा, जो कूरेषजी का शिष्य था , श्रीरंगम में एक दीवार बांध रहा था ; उसके लिये उसने , एक श्रीवैष्णव के घर को तोड़ना चाहा ; इसे पराशर भट्ट ने मना किया था , परन्तु राजा ने उनकी परवाह न करके, दीवार को बांध दिया था । इससे आचार्य अपचार हो गया था जिसके कारण उसका अदृष्ट फल नष्ट हो गया । वह दीवार बांधकर भगवद् कैंकर्य ही कर रहा था , परन्तु आचार्य अपचार के कारण परमपद प्राप्ति खो बैठा । अतः भगवद् प्रपन्न से अधिक सावधानी आचार्य प्रपन्न में होना चाहिए ।

भगवान , अपने स्वातंत्र्य के कारण , जिसे स्वीकारता है , उससे अधिक प्रेम , आचार्य से सुधरा हुआ अधिकारी से करता है । यह अधिकारी , विवेकपूर्ण व्यवहार करने से , भगवान कहता है कि , ” मम मद्भक्त भक्तेषु प्रीतिरभ्यधिका भवेत् ” ( महाभारत आश्रवमेधिक पर्व – मेरे भक्त (आचार्य ही भक्त है ) से भक्ति करनेवाला मुझे अधिक प्रिय है )।

अतः चरमपर्व निष्ठ अधिकारी ( आचार्य निष्ठ) को ही श्रेष्ठ अनुष्ठान युक्त होना आवश्यक है ।

पोस्ट ६५-६८/ 65-68


इस अधिकारी में , रहस्यत्रय के अनुसंधान के पूर्व , “ अन्य सभी आसक्तियों का , वासना सहित त्याग करना चाहिये “ ( मुमुक्षुपडी ) इस प्रमाणानुसार , वैष्णवाधिकारी के सभी लक्षण उत्पन्न होना चाहिए । उन लक्षणों का वर्णन मुमुक्षुपडि ग्रन्थ में पिल्लै लोकाचार्य इसप्रकार करते हैं :
पितरं मातरं, दारान् पुत्रान् बन्धून् “ ( विहगेन्द्र संहिता , अध्याय २ ) ( माता , पिता , पत्नी , बच्च , रिश्तेदार आदि को सर्वथा त्यागना ) , “ क्षेत्राणि मित्राणि धनानि “ ( हस्तिगिरी माहात्म्य ) ( खेत, मित्र , धन , बच्चे , पत्नी , गाय, घर , रिश्तेदार “ ) आदि को अग्नि के समान मानकर , रुचि वासना के सहित उनका त्याग करना , भगवान ही सब कुछ है ऐसे मानकर उसके शरण जाना , इस प्रकार त्याग और स्वीकार के कारण पुरुषार्थ लाभ अवश्य होगा ऐसा विश्वास करके , पुरूषार्थ लाभ के लिये उतावले होना , जीवित काल में , दिव्यदेशों में प्रेम युक्त होना , भगवान के गुणानुभव , कैंकर्यों में समय बिताना , ऐसे विलक्षण अधिकारीयों के श्रेष्ठता को देखकर प्रसन्न होना , रहस्यत्रय मंत्रानुसार अनुष्ठान करना , आचार्य के साथ रहना आदि ।
अब आल्वारों के दिव्यप्रबंध के अनुभव के लिये , जीवनमुक्त ही अधिकारी हैं ; जीवनमुक्त का वर्णन इसप्रकार है :
न शब्दशास्त्राभिरतस्य मोक्षो नचैवरं याव सथप्रियस्य – न भोजनाच्छादानतत्परस्य न लोक चित्तग्रहणेरतस्य – एकांत शीलस्य दृढ व्रतस्य पंचेन्द्रियप्रीति निवर्त्तकस्य – अध्यात्मविद्यारत मानसस्य मोक्षे धृवो नित्यमहिंसकस्य – शमदमनियतात्मा सर्व भूतानुकंपी विषय सुखविरक्तोज्ञानतृप्तः अनियतनियत अन्नो नैव हृष्टो नहृष्टः प्रवसितइवगेहे वर्तते यस्स मुक्तः “ ( वृत्त हारीत स्मृति १०-१४-१५) , प्रमाणानुसार , व्याकरण आदि भगवद् संबध रहित प्राकृत शास्त्रों में रुचि युक्त ; घर आदि में आसक्त ; भोजन ,वस्त्र आदि में आसक्त ; सांसारिक दुष्कर्म प्रवृत्तियों में रुचि युक्त व्यक्ति को , मोक्ष प्राप्ति करने के लिये , योग्यता नही है ।
इन सभी विषयों को त्यागकर ; सांसारिक लोगों के संग रहित होकर ; एकान्तशील ; ईश्वर भी जिसके शिष्टाचार में दृढ़ता को भंग करने में अशक्त हो ; शब्दादि विषयों में विरक्त , अध्यात्म शास्त्रों में चिंतन युक्त , दूसरों को हानिकारक न होकर परम दयालु व्यक्ति को , मोक्ष प्राप्ति निश्चित ही है ।
इसप्रकार का व्यक्ति जो , मन इन्द्रियों को वश में करके , आत्मगुणों से पूर्ण ,सर्व भूतों पर दया करता हुआ , विषय सुख में विरक्त , भगवद् अनुभव युक्त , अज्ञानी सांसारिक लोगों द्वारा निंदित और अपमानित होने पर भी प्रशांत चित्त होकर , रुचिकर पदार्थों का हठ रहित होकर , भूख मिटाने के लिये कोई भी शुद्ध आहार ग्रहण करके , भौतिक लाभ और नष्ट से हर्ष शोक रहित , घर को त्यागे बिना गृहस्थ होने पर भी , वही जीवनमुक्त कहलाता है ।
इसप्रकार का अधिकारी ही , दिव्यप्रबंध के अनुभव के लिये योग्य व्यक्ति है , ऐसे “ गुरुपरंपरा “ ग्रन्थ में , पृष्ठसुन्दर नामक आचार्य ने कहा है ।

पोस्ट ६९,७०/69,70

प्रपन्न को , मंत्र हो या दिव्यप्रबंध हो , उनके अर्थानुसंधान के साथ ही शब्दानुसंधान करना चाहिए । ” द्वयं अर्थानुसंधानेन सह ” ऐसे शरणागति गद्य में श्रीरामानुजाचार्य ने और सहस्त्रगीति में शठकोप मुनी ने , अर्थ के साथ द्वयमंत्र और दिव्यप्रबंध का अनुसंधान का विधी प्रसादित किया हैं । जप , होमादि शब्द शक्ति से रक्षा करना , उपासक के लिये ही है । प्रपन्न के लिये तो , अर्थ का ज्ञान ही , त्याज्य उपादेय ( त्यागने योग्य और स्वीकारने योग्य ) का विवेक को जन्म देकर , त्याज्य विषयों को त्याग कराकर , उपादेय विषयों को स्वीकार कराकर , प्रपन्न का रक्षा करता है । रक्षा का मतलब है , रक्षक (भगवान) के अनुग्रह का पात्रभूत बनाना ।

देहासक्त आत्मबुद्धिर् यदि भवति पदं साधु विद्यात् तृतीयं , स्वातंत्र्यान्धो यदि स्यात् प्रथमं इतर शेषत्वधीश्चेत् द्वितीयं , आत्मत्राणोन् मुखश्चेत् नम इति च पदं बान्धवाभासलोलः शब्दं नारायणाख्यं विषय चपलधीश्चेत् चतुर्थीं प्रपन्नः “ ( अष्टश्लोकी ४) प्रमाणानुसार , प्रपन्न में , प्रकृति के बंधन के कारण , आत्मस्वरूप के विरोधीयों का प्रवेश अनिवार्य है ; उस समय , विरोधियों के निवृत्ति के लिये , अष्ठाक्षर मंत्र के पदों के अर्थानुसंधान करना चाहिए ; परन्तु यदि ऐसा नहीं किया , तो पूर्ववत् अज्ञानी ही रह जायेगा ।

पोस्ट ७१-७३/ 71-73

देहात्मबुद्धि याने देह ही आत्मा है ऐसे विचार आने पर , ” म ” कारार्थ का अनुसंधान करके , हम ज्ञानानंद लक्षण युक्त आत्मा है जो देह , इन्द्रिय , मन , बुद्धि से भिन्न है , ऐसा मानकर , देहात्मबुद्धि के विचार को दूर करना चाहिए । देहात्मबुद्धि का निवृत्ति का अर्थ है – देह संबंध से आनेवाले वर्णाश्रमाभिमान के कारण , ” आढ्यो अभिजनवानस्मि कोन्योस्ति सदृशोमया ” ( गीता १६-१५) (मैं धनवान हूँ , उच्च जाति का हूँ , मेरे समान वैभवशाली कोन है ? ) , प्रमाणानुसार अहंकार युक्त होकर , इस देह को कटु वचनों से निंदा करनेवालों को ( देहात्माभिमान के कारण ) शत्रु मानकर उस पर क्रोधित न होना चाहिये ।
इतना ही नहीं बल्कि , ” नाहं विप्रो न च नरपतिर् नापि वैश्यो न शूद्रः ” ( न मैं ब्राह्मण हूँ , न ही राजा , न ही वैश्य और न ही शूद्र हूँ ” ) , ” लक्ष्मी भर्तुर्नरहरीतनोर्दासदासस्य दासः ” ( लक्ष्मी के पति नृसिंह भगवान का दास के दासानुदास हूँ ) प्रमाणानुसार , ब्राह्मणादि वर्ण तो , देह का विकार होने से , मुझे , जो देहातिरिक्त आत्मा हूँ , इनसे संबंध नही है और मैं तो वैष्णवदास हूँ , ऐसा मानना चाहिए । यह देह हमारे लिये त्याज्य , हेय है ; विपरीत ज्ञान का हेतु है ; काम क्रोध आदि शत्रुओं का संग्रह है ; अपने स्वरूप और भगवान के स्वरूप को भुला देनेवाला एक कारागृह जैसे अनर्थ हेतु है ; इस देह को पीड़ा देना तो हमारा ही तो कर्तव्य है , ऐसा मानकर , जो इस देह को पीड़ा देते हैं , उन्हें क्षमा करके , उनपर कृपा करनी चाहिए । उनके प्रति कृतज्ञ होना चाहिए ।
यह सब होने से ही , मकारार्थ की सिद्धि है । इस देहाभिमान का निवृत्ति ही प्रपन्न का प्रथम अधिकार है । इसकी प्राप्ति से , संसार का बीज नष्ट हो जाता है और स्वरूप की सिद्धि प्राप्त हो जाती है ।

आत्मा स्वतन्त्र है , ऐसी बुद्धि होने पर , कारणत्व, रक्षकत्व , शेषत्व वाची ” अ ” कार का अर्थ का अनुसंधान करके , हम भगवद् शेषभूत हैं , हमें स्वतन्त्रता के योग्य नही है ऐसा मानकर , स्वतंत्रता बुद्धि से निवृत्त होना चाहिए

पोस्ट – ७४-७५/74-75

अन्य शेषत्व बुद्धि होने पर , अनन्यार्ह के अर्थ को दर्शानेवाले ” उ ” कार के अर्थ का अनुसंधान करके , हम तो मात्र भगवान के ही शेष है ; अतः अन्यशेषत्व अनुचित है , ऐसे सोचकर , अन्यशेषत्व से निवृत्त होना चाहिए ।

स्वरक्षण में स्वप्रयत्न की बुद्धि होने पर , ” नमः ” शब्दार्थ का अनुसन्धान करके , भगवान ही मेरा रक्षक है , ऐसा मानकर , उस बुद्धि से निवृत्त होना चाहिए ।

आपत्ति के समय , हमारे बंधु हमारे रक्षक है , ऐसे बुद्धि होने पर , ” अयन “ पद के अर्थ का अनुसंधान करके , भगवान जो हमारा प्राप्य है, वही हमारा सर्व प्रकार का बंधु है , ऐसा मानकर , उस बुद्धि से निवृत्त होना चाहिए ।( नार + अयन = नारायण )

विषय भोगने की चापल्य होने पर, चतुर्थी ” आय ” का अनुसंधान करके , हमारा स्वरूप तो अनन्यभोग्यत्व है , अतः हम, भगवान के भोग वस्तु होने पर , हमारे लिये अन्य विषयों का अनुभव अनुचित है , ऐसा मानकर , विषय भोग की इच्छा से निवृत्त होना चाहिए ।

इसप्रकार , मंत्रार्थ ज्ञान से , त्याज्योपादेय ( त्यागने योग्य , स्वीकार के योग्य पदार्थ ) को जानकर , देहाभिमानादि का परित्याग करके , (भगवद् ) शेषत्व ,पारतंत्र्य ,कैंकर्य को स्वीकार करके , उनके अनुरूप अनुष्ठान करने से , स्वरूप की सिद्धि हो जायेगी और उसके कारण भगवद् अनुग्रह के पात्र होकर , मुक्ति प्राप्ति के लिये योग्य हो जायेंगे । परन्तु ऐसे अनुष्ठान न होने पर , मंत्रार्थ का कालक्षेप नित्य सौ बार करने से भी , नित्य संसारी ही बनकर रह जायेगा , ऐसे श्री पराशर भट्टजी का कहना है ।

Also go through:

श्री त्रिदंडी स्वामी जी के दिव्य ग्रंथ

विलक्षण मोक्षाधिकार निर्णय (26-50)

विलक्षण मोक्षाधिकार निर्णय (26-50)

(अनुवादक: श्री वासन श्रीरंगाचारी स्वामी)

(Edited by:- रमा श्रीनिवास रामानुज दासी)

ग्रंथ रचनाकार: देवराज मुनि।: 

https://guruparamparaihindi.wordpress.com/2015/10/02/erumbiappa/

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पोस्ट – २६/26

शिष्ट जनों से निंदित व्यक्ति , वर्ण धर्मों का अनुष्ठान न करने से पतित व्यक्ति , चण्डाल आदि इनका दिया हुआ पदार्थ ; श्राद्ध , शांति निमित्त किये गये अनुष्ठान आदि में उपयोग किया हुआ पदार्थ ; केश , उच्छिष्ट , कुत्ता आदि जन्तुओं से संबंधित पदार्थ; इन सब खाद्य पदार्थों का सेवन न करना ही आहार नियति है ।

सहवास नियति – देहात्ममानि ( देह को ही आत्मा माननेवाले ) , देवतांतर भजन करनेवाले , भगवद् भक्ति भी कैवल्य, ऐश्वर्य आदि पाने के लिये करनेवाले , मुमुक्षु होने पर भी , मोक्ष के लिये कर्म, ज्ञान आदि साधनांतर का अनुष्ठान करनेवाले , अपने को स्वतंत्र माननेवाले , इन सब प्रतिकूल वृत्ति के मनुष्यों को सर्प, अग्नि के समान मानकर उनसे दूर रहकर , ज्ञान और उसके अनुरूप अनुष्ठान करनेवाले परमार्थ निष्ठ व्यक्तियों का सहवास करना ।

पोस्ट २७/27

अनुवर्तन नियति – धन कमाने के निमित्त , राजद्वार में जाकर , वहाँ के मंत्री , अधिकारी आदि लोगों का खुशामद न करके , हमारे पूर्व जन्म कर्मों का फल के अनुरूप ही हमारा देहयात्रा चलेगी , ऐसा मानकर , अपने आचार्य के आज्ञा का पालन करते हुए , उनके कैंकर्यों का करना ही अनुवर्तन नियति है ।

इसप्रकार आहार नियति , सहवास नियति , अनुवर्तन नियति आदि का ज्ञान और अनुष्ठान से युक्त व्यक्ति ही सदाचार्य कहलाने योग्य है । ज्ञान हीन आचार्य अंधे के समान होता है ; अनुष्ठान हीन आचार्य पंगु के समान होता है । जो आचार्य ज्ञान और अनुष्ठान से युक्त होता है , वही स्वयं का और शिष्य का उद्धार कर सकता है ।
” उभाभ्यामेव पक्षाभ्यां आकाशे पक्षिणां गतिः । तथैव ज्ञानकर्माभ्यां प्राप्यते भगवान हरि: ” प्रमाणानुसार जिस पक्षि के पास दोनों पंख होते हैं , वही आसमान में उड सकता है ; उसीप्रकार जिस जीव में , ज्ञान और उसके अनुरूप अनुष्ठान होता है , वही हरि को प्राप्त करता है ।

पोस्ट- २८ -३०/28-30

” त्यज धर्ममधर्मंच ” ( महाभारत – शांति पर्वा – मोक्ष – ३३७-४०)( धर्म और अधर्म को छोड़ ) ,
” उपायापाय निर्मुक्तो मध्यमां स्थितिमास्थितः ” ( उपाय धर्म और अपाय अधर्म से मुक्त होकर मध्य स्थिति में स्थित व्यक्ति ) , “
” उपायापायसम्योगे निष्ठया हीयतेनया ” ( लक्ष्मी तंत्र १७-९२)( अन्य उपाय और अपाय का संबंध यदि शरणागत को हो जाय , तो उसका शरणागत निष्ठा छूट जायेगा )
इन प्रमाणानुसार , शरणागत मुमुक्षु के लिये शास्त्रों में वर्णित विधि निषेध दोनों त्याज्य है ।
ऐसे में , राजसिक और तामसिक बुद्धि से दूषित होकर ,

” यया धर्मं अधर्मंच पकार्यंचाकार्यंच । अयथावत् प्रजानाति बुद्धिस्सा पार्थ राजसी ।। ( गीता १८/३१)
( अर्जुन !जिस बुद्धि से , इहलोक का धन आदि और मोक्ष को पाने के लिये , दो प्रकार के धर्म , अधर्म और उन्हें करने योग्य , अयोग्य का यथा स्वरूप का ज्ञान नहीं होता हो , वह बुद्धि राजसिक है , ऐसा जान ” ।)


” अधर्मं धर्ममितिया मन्यते तमसावृता । सर्वार्थान् विपरीतांच बुद्धिस्सा पार्थ तामसी ।। ( गीता १८/३२) ( अर्जुन ! जो बुद्धि अंधकार से ( अज्ञान से ) घिरा हो , जिससे अधर्म को धर्म मान लिया जाता हो , सभी अर्थों को विपरीत रूप से ग्रहण किया हो , उस बुद्धि को तामसिक मान । )

इन प्रमाणानुसार , अर्थों का अनर्थ करके , स्वयं विपरीत अनुष्ठान युक्त होकर , जो आचार्य , दूसरों को भी उपदेश करता हो , वह

श्रृतिस्मृतिर्ममैवाज्ञा यस्तामुल्लंघ्यवर्तते , आज्ञाच्छेदी मम द्रोही मद्भक्तोपि न वैष्णवः ” ( विष्णु धर्म ७६/३१) ( वेद और धर्मशास्त्र दोनो मेरे आज्ञा हैं ; उनका उल्लंघन करनेवाला मेरा द्रोही है ; वह मेरा भक्त होते हुए भी वैष्णव नहीं है )
प्रियाय मम विष्णोश्च देवदेवस्य शांर्गिणः मनीषी वैदीकाचारं मनसिपि न लंघयेत् ” ( भगवद् शास्त्र – पांचरात्र) ( मेरे और देवदेव विष्णु के प्रसन्नता हेतु , बुद्धिमान व्यक्ति को , वेदों में कहे हुए सदाचारों का मन से भी उल्लंघन नही करना चाहिए – यह महालक्ष्मीजी के वचन है )

” यथा हि वल्लभोराज्ञो नदींराज्ञा प्रवर्तितां – लोकोपयोगिनीं रम्यां बहूसस्य विवर्थिनीं , लंघयन् शूलमारोहेदनपेक्षोपि तां प्रति , एवंविलंघयन् मर्त्यो मर्यदां वेदनिर्मितां , प्रियोपि न प्रियोसौमे मदाज्ञाव्यतिवर्तनात् ” ( श्री पांचरात्रम् )
( राजा का प्रिय और उस राजा के दिये हुए धन से जीवन चलानेवाला व्यक्ति ,यदि उस राज्य में बहनेवाली लोकोपयोगि नदी को दूषित करता है , तो वह राजा उसे सूली पर चढा देता है ; उसीप्रकार जो व्यक्ति वेदों में कहे हुए नीतियों और सदाचारों को दूषित करता है , मेरे प्रति प्रेम होते हुए भी , वह मेरे आज्ञा का उल्लंघन करने से , मेरे लिये अप्रिय ही है ।)


इन प्रमाणानुसार , भगवद् आज्ञारूपी वैदिक मर्यादा का उल्लंघन करके , वेद विरुद्ध दुराचारों के कारण , भगवान के घृणा का पात्र बनकर , स्वयं भी नष्ट होकर , अपने शिष्य का भी नाश करता है । कुछ अन्य लोग , इसके दुराचार का अनुसरण करने से और कुछ इसके दुराचार का निंदा करने से , भगवान के कोप का पात्र बनकर , नष्ट होते हैं ।

इसप्रकार स्वयं दुराचारी होकर , ख्याति लाभ पूजा सेवा निमित्त , विपरीत आचार युक्त शिष्यों को साथ लेकर , उनके अहंकार ममकार से दूषित धन को पाकर अपना देह यात्रा चलाता है ।
परन्तु एक सदाचार्य कैसा होना चाहिए ?
नाथमुनि , आलवन्दार , रामानुज , कूरेष , एम्बार् , भट्ट , नम्पिल्लै , पिल्लै लोकाचार्य , वरवरमुनि आदि पूर्वाचार्यों के उपदेश और अनुष्ठान का विचारपूर्वक मनन करके , भगवान के कृपा से प्राप्त निर्दोष ज्ञान , भक्ति युक्त आल्वारों के दिव्यप्रबंधों में , उन प्रबंधों के अर्थों को विस्तृत व्याख्यान रूपी श्रीवचनभूषण आदि सभी रहस्य ग्रन्थों में जीवों के उद्धार निमित्त , वर्णित मर्यादाओं का उल्लंघन न करते हुए , वेद शास्त्र विरुद्ध दुरनुष्ठानों का परित्याग करके , दयालु होने से , शिष्य , पुत्र के उज्जीवनार्थ , लोकसंग्रहार्थ , शिष्टों द्वारा परिगृहीत शास्त्र विदित कर्मों में उपाय बुद्धि को महापातक मानकर , वासना (गन्ध) सहित त्यागकर , महानुभावों के आचरण का अनुसरण करते हुए , स्वयं को अपने आचार्य का परतंत्र मानकर , शिष्य को सहपाठी मानकर , उपदेश करना चाहिए ।

पोस्ट ३१,३२

शिष्य को उपदेश करने का फल , उसे मंगलाशासन के लिये योग्य बनाना ही है , ऐसा आचार्य मानता है । इसप्रकार अच्छी तरह सुधरा हुए शिष्य , अपना सब कुछ आचार्य को समर्पित करके , स्वयं भार रहित रहता है । उन सबको , आचार्य पुनः शिष्य को वापस करके आदेश देता है कि , ” आपने, स्वयं सहित , सब कुछ आचार्य के अधीन कर दिया है ; अब उन वस्तुओं को , जैसा उचित हो , वैसे भगवद् भागवत विषयों में और अपने देहयात्रा के विषय में , उपयोग कीजिए ” ।

इस आदेशानुसार , शिष्य धनको , भगवद् भागवत विषयों में और अपने जीवन के लिये उपयोग करता है ।
आचार्य भी ” मेरा प्राण और मैं क्या चीज है , तुम्हारा ही दिया हुआ है ; अब पुनः तुमही उन्हें स्वीकारते हो ” (सहस्त्रगीति २-३-४) , इस प्रमाणानुसार ममकार रहित दिया हुआ द्रव्य को, शिष्य के खुशी के लिये , स्वीकार करके , उसे भगवद् भागवत विषयों में उपयोग करता है ।
” ऋतामृताभ्यां जीवेत प्रपन्नो यावदायुषम् “ ( प्रपन्न, जीवन के अंत तक, ऋतम् और अमृतम् से जीवन चलाना चाहिए ; ऋतम् – खेतों में जमीन पर पडे हुए धान्य , अमृतम् – बिना याचिका के , सज्जनों द्वारा दिया हुआ धान्य ), इसप्रकार बिना मांगे , सदाचार निष्ठ , शुद्ध सज्जनों द्वारा दिये गये पदार्थों से जीवन चलाता हुआ , शिष्य के प्रति कृपा करता हुआ , अपने आचार्य के प्रति पारतंत्र्य का अनुसंधान करता हुआ , अपने देहयात्रा में उपेक्षा के भाव से , वस्तुओं में ममकार रहित होकर , शिष्टों के सदाचार को अपनाता है , एक सदाचार्य ।

पोस्ट ३३,३५

प्राकृतिक वासना के कारण, यदि शिष्य गलती कर बैठता है , तो उस पर दया करके , स्वरूपानुरूप उसे सुधारकर , साथ में रहकर , उसके स्वरूप की रक्षा करनेवाला ही आचार्य कहलाता है । यह रक्षा दो प्रकार का होता है : घटकत्व और उपायत्व
घटकत्व – सुधारकर कैंकर्य लेने योग्य शिष्य के इरादों का ” संवत्सरं तदर्धं वा मासत्रयमथापिवा ” ( शाण्डिल्य संहिता १-११६) ( एक वर्ष अथवा आधा वर्ष अथवा तीन महीने शिष्य का अनेक प्रकार से परीक्षा लेकर ) , इस प्रमाणानुसार परीक्षा लेकर , उसके स्वाभाविक विषय वासना रुचि मिट जाने पर , जब परमार्थ में मन दृढ़ होकर , वह अन्य फलों को त्यागकर भगवान के मंगलाशासन के योग्य हो जाता है , तब उसे भगवान के चरणों में शरणागत कराकर , उसके शेषत्व पारतंत्र्य स्वरूप के अनुरूप उसे शिक्षा देकर , उसके अनुरूप आचरण भी कराता है ।
उपायत्व – आत्मा के स्वरूपानुरूप भगवद् भागवत विषयों में कैंकर्य आदि को कहने पर , उसे समझ पाने योग्य बुद्धि हीन , उनका अनुष्ठान करने योग्य शक्ति हीन , मूक, अंधा , पंगु, बधिर आदि व्यक्तियों पर जब भगवान का निर्हेतुक कृपा का वर्षा होती है , तब उन्हें सांसारिक कर्म प्रवृत्ति में वैराग्य हो जाता है और वे जन्म , जरा , मरणादि से दुःख से भयभीत हो जाते हैं । ऐसे ज्ञान और अनुष्ठान के उपदेश के योग्यता रहित लोगों पर , दया के कारण , आचार्य , उनके लिये , स्वयं भगवान के चरणों में शरणागति करता है ।
जिसप्रकार औषध सेवन करने अयोग्य शिशु के निमित्त , माता स्वयं औषध सेवन करके , शिशु को स्तन्यपान कराकर , उसके रोग को दूर करती है , उसीप्रकार आचार्य भी ऐसे शिष्यों को अपनाकर , अपने तीर्थ , प्रसाद का सेवन कराकर , उनके प्रभाव से , इन्हें संसारसे मुक्त कराता है ।
एक मूक व्यक्ति के संसार दुःख से निवृत्ति की इच्छा को देखकर , श्रीरामानुजाचार्य ने , दया के कारण , उसे अपने श्रीचरणों को हृदय में रख लेने के लिये संकेत करके , चरणों को उसके सिर पर रख दिया । इस दृश्य को कूरेष देखकर कह उठे , ” हाय ! कूरकुल में जन्म लेकर , शास्त्र अभ्यास करके हमारी बडी हानि हो गयी ; एक मूक जन्म मिला होता , तो परगत स्वीकृति प्राप्त हुआ होता न ! ” ( परगत स्वीकृति – भगवान या आचार्य स्वयं हमें , हमारी बिना कुछ यत्न किये , स्वीकार करना ।)

उस समय वह वृक्ष का दो भाग हो गया और उसके बीच से बडे घोष के साथ एक दिव्य तेज निकलकर , अंतरिक्ष में पहुँचकर , सूरज के प्रकाश में समा गया । इस दृश्य को देखकर , जब लोग आश्चर्यचकित रह गये , तब उस ब्राह्मण ने नम्पिल्लै के कृपा कार्य का वर्णन किया । जब यह समाचार , दूसरे दिन नम्पिल्लै ने सुना , तब उन्होंने तेल आदि लेकर श्रीचूर्ण परिपालन क्रियाओं को करके , श्रीअध्ययन ( श्राद्ध ) भी कराया था । इस वृत्तांत को श्रीवरवरमुनि ने प्रसादित किया था ।

पोस्ट – ३६- ३८

पहले बताये हुए लोग , ज्ञान अनुष्ठान के लिये अशक्त होने पर भी , वे प्रवृत्ति निवृत्ति करने योग्य चेतन हैं । अतः प्रतिकूल आचरण से निवृत्त होना आवश्यक है । अहंकार , ममकार , परहिंसा , परनिन्दा , परस्तुती , परस्त्री अपहरण, परधन अपहरण आदि प्रतिकूल प्रवृत्तियाँ हैं । सत्व गुण के लिये हानिकारक , राजसिक तामसिक गुणों को बढ़ानेवाले अभक्ष्य पदार्थों का भक्षण , अपेय पदार्थों का पान , देवतांतर – साधनांतर – विषयांतर आसक्ति , भगवद् भागवत अपचार आदि भी प्रतिकूल प्रवृत्तियाँ ही हैं । इन प्रतिकूल आचरण के निवृत्ति के बिना , आचार्य अभिमान भी रक्षा नहीं कर सकेगा ।
एक खेत में जब जल भरा होता है , वह जल , समीप के खेत में भी फलदायक होता है । परन्तु उस समीप के खेत में , जंगली घास अधिक मात्रा में हो , तो वह खेत समीप होते हुए भी जल का लाभ नहीं ले पायेगा ।
परन्तु ” अच्छेप्यनच्छेपि शरीरि वर्गे श्रेयस्करी सद्गुरुपादसेवा , समिद्पशूच्छेथक शस्त्रयुग्मे रसेन हैमीकरणं समानम् “ ( समिधा काटने में उपयोगी छोटा शस्त्र , जंगली पशु आदि को काटने में उपयोगी बडे शस्त्र , दोनों को पारस , सोना कर देता है ; उसीप्रकार अच्छे और बुरे दोनों लोगों के लिये , गुरु पाद सेवा लाभदायक होता है ।) प्रमाणानुसार , पारस छोटे बडे दोनों लोहेके आयुधों को सोना कर देता है , उसीप्रकार पुण्य करनेवाले और पाप करनेवाले दोनों को सद्गुरु का संबंध उद्धार का हेतु होता है ; ऐसा प्रमाण का कथन होने पर भी , ये शस्त्र अचेतन होने से , काटना आदि एक चेतन का अधीन ही होने से सोने में परिवर्तित हो सकते हैं । उसीप्रकार यह शिष्य ,यदि आचार्य के सर्वथा अधीन रहकर , अचित जैसा अत्यन्त परतंत्र होकर रहता हो , तो ज्ञान और अनुष्ठान रहित होने पर भी , मुक्त हो सकता है । परन्तु यदि प्रतिकूल प्रवृत्तियों का संबंध हो , तो विनाश निश्चित ही है ।

कूरेषजी , आचार्यत्व के पराकाष्ठा थे । परन्तु वीरसुन्दर राजा , कूरेषजी के शिष्य होने पर भी , भागवत अपचार के कारण नष्ट हो गया था न ! अतः निषिद्ध अनुष्ठान युक्त व्यक्ति को सदाचार्य का संबंध होने पर भी , उसका उद्धार नहीं हो सकता ।

पोस्ट ३९/39

” अच्छेप्यनच्छेपि “ प्रमाणानुसार शुद्ध हो या अशुद्ध हो , सदाचार्य संबंध से मुक्त हो जायेगा , ऐसा कहा गया है न ? यह तो , शिष्य के आचार्य समाश्रयण के पूर्व का विषय है । ” पापिष्ठः क्षत्रबंधुश्च पुंडरीकश्च पुण्यकृत् – आचार्यवत्तया मुक्तौ तस्मादाचार्यवान् भवेत् ” ( ब्रह्माण्ड पुराण ९४-३८) ( पापी क्षत्रबंधु और पुण्यात्मा पुंडरीक , दोनों आचार्य संबंध से मुक्त हो गये ; अतः एक आचार्य के आश्रित होना चाहिए । ) , प्रमाणानुसार समाश्रयण के पहले यदि पाप,पुण्यादि किया हो तो भी , आचार्य के आश्रित होकर ,आचार्य के परतंत्र हो जाने के पश्चात , पूर्वकृत पाप और पुण्य , दोनों का नाश हो जाने से , पापी क्षत्रबंधु ,पुण्यवान पुंडरीक , जिसप्रकार मुक्त हो गये , उसीप्रकार यह शिष्य भी मुक्त हो जायेगा ।

पोस्ट ४०-४१

” दुराचारोपि सर्वाशी कृतघ्नो नास्तिकः पुरा । समाश्रयेदादि देवं श्रद्धया शरणं यदि ।। निर्दोषं विद्धी Z3 seतं जन्तुं प्रभावान् परमात्मनः ।। ” ( सात्वत संहिता १६-२३)( पूर्व काल में , एक व्यक्ति जो दुराचारी होकर, अभक्ष्य भक्षण करता हुआ , कृतघ्न और नास्तिक होने पर भी , यदि वह आदि देव भगवान नारायण को श्रद्धा से शरणागति करता है , तब उस व्यक्ति को , भगवद् प्रभाव के कारण , निर्दोष ही मान ।) प्रमाण में , संदेह बिना , समाश्रयण के पूर्वकाल के वृत्ति को ही बताया गया है ।
आचार्य समाश्रयण के पश्चात , यदि कोई बुद्धिपूर्वक निषिद्ध अनुष्ठान करता है , तो वह समाश्रयण झूठा ही सिद्ध होगा ।
अतः संसार में बद्ध होकर ;देहात्माभिमानी होकर ,
पत्नी , पुत्र , धन आदि में आसक्त होकर विषयासक्त होकर , रागद्वेश युक्त होने पर भी , यदि एक व्यक्ति अपने को आचार्य और भगवद् संबंध है ऐसा मानता है , तो वह दुराभिमानी है और यह उसका भ्रम मात्र ही है । इसीलिए , श्रीगोष्ठीपूर्णजी ने कहा था कि प्रपन्न का , संसार बीज का नष्ट होना , आवश्यक है ।

” अनात्मन्यात्मबुद्धिर्या अस्वे स्वमिति या मतिः ” ( विष्णु पुराण ६-७-११) ( अनात्मा शरीर में आत्मबुद्धि , जो अपना नहीं है , उसे अपना मानना ) प्रमाणानुसार , ऐसी बुद्धि ही तो , संसार रूपी वृक्ष का बीज है ।
” अविद्यातरुसंभूतिबीजं एतत्द्विधा स्थितम् ” ( विष्णु पुराण ६-७-११) ( अज्ञान रूपी वृक्ष का , अहंकार और ममकार ही तो , दो बीज है ।) प्रमाणानुसार , जब तक, अहंकार और ममकार का विचार है , तब तक , कितने भी बडे ज्ञानी होने पर भी , संसार से मुक्त होकर , भगवद् प्राप्ति होना , असंभव ही है ।

पोस्ट – ४२

इस अर्थ का अनुसन्धान मन में होने के कारण ही , शठकोप मुनि ने , (आप और आपका , इन विचारों को समूल नष्ट करके , भगवानके शरण जाइये ( सहस्त्रगीति १-२-३) ” ) भगवद् समाश्रयण करने पर भी , जब तक अहंकार और ममकार रूपी संसार बीज विद्यमान है , तब तक समाश्रयण सफल नही होगा , अतः इन्हें रुचि , वासना सहित नष्ट करने के पश्चात , भगवद् समाश्रयण करो , ऐसा निःसंदेह कह दिया है ।

इसप्रकार अहंकार और ममकार , इनके कारण होनेवाले अर्थ और काम वश्यता , इसके कारण होनेवाले भागवत अपचार आदि रहित होने पर भी , इन सबका मूल बीज जो शरीर संबंध है , उससे युक्त होने से , भयभीत होकर शठकोप मुनि भी कह उठे , ” मैं तो ममकार अहंकार युक्त था ” ( सहस्त्रगीति २-१०-९), ” अनेक शब्दादि विषयों को दिखाकर मुझे पतित क्यों बनाते हो ” ( सहस्त्रगीति ६-९-९) , “ मुझे कब तक भ्रष्ट रखोगे ” (सहस्त्रगीति ६-९-८), “ देवताओं को भी वश में करनेवाले ये पाँच इन्द्रियाँ , संसार में रहनेवाले मुझे क्या नहीं करेंगे ? ” ( सहस्त्रगीति ७-६-१) ।
परमाचार्य आलवन्दार ने भी स्तोत्ररत्न में कहा था कि ” अमर्यादः क्षुद्रः ” (स्तोत्ररत्न -६२)( वेद मर्यादाओं का उल्लंघन करवेवाला हूँ , नीच हूँ ) , नृपपशुरशुभस्यास्पदमपि “(स्तोत्ररत्न ७८) ( मनुष्यों में पशुवत् हूँ , महा पापों का निकेतन हूँ ) , ” अनिच्छन्नप्येवं कृपया , त्वमेव एवं भूतं धरणिधरः मे शिक्षय मनः ” ( स्तोत्ररत्न ५९) ( मैं , अच्छाई का डोंग करनेवाला होने पर भी , हे धरणीधर ! मेरे मन को आप ही सुधार दीजिये ) ।

” यतिराज विंशति ” में ” शब्दादि भोगरुचिरन्वहमेधतेहा “ ( श्लोक ६ – शब्दादि विषयों में जो रुचि बढ़ती जा रही है , उसे दूर करो ) , ” वृत्तया पशुः नरवपुः ” ( श्लोक ७- मेरे शरीर , मनुष्य का होने पर भी , व्यवहार पशु जैसा ही है ), ” दुःखावहो(अ)हं अनिशं तव ” ( श्लोक ८- हे रामानुज ! मेरे नीच हरकतों से आपके मन को दर्द ही देता रहता हूँ ) , ” शब्दादि भोग विषयारुचिस्मदीया नष्टाभवत्विह भवद्दयया यतीन्द्र ” ( श्लोक १६ – हे रामानुज ! शब्दादि विषयों में मेरे आसक्ति को , आप अपने दया से दूर कीजिये ) , हमारे आचार्य ( श्रीवरवरमुनि ) ने भी प्रतिकूलताओं के बारे में सोचकर , दुःखित होकर , उन सब से, निवृत्ति के लिये प्रार्थना किया था न !

इससे यह प्रतीत होता है कि , भगवद् संबंध और आचार्याभिमान , प्रतिकूलता का स्पर्श होने पर , फल नहीं दे पाते ।

पोस्ट – ४३

इसप्रकार आचार्य और शिष्य दोनों का संबंध एक दूसरे से होने से , एक दुसरे के हितैषी होना चाहिए । यदि शिष्य बुरे मार्ग पर जाता हो , तो आचार्य को उसे दंडित करके , उपदेशों से सुधारना चाहिए । उसीप्रकार आचार्य में भी , पाँच भौतिक शरीर के संबंध के कारण , कुछ दोष दिखायी दे , तोप्रमाणानुसार , शिष्य को , एकान्त में आचार्य के श्रीचरणों को पकड़कर , हित वचन निवेदन करना चाहिए और भगवान से गुरु पर कृपा करने के लिये प्रार्थना करके जागरूक रहना चाहिए ।
इसप्रकार के अच्छे शिष्य के लक्षणों से युक्त मुमुक्षु शिष्य को , भगवान अपने परमपद को देता है । ऐसे शिष्य में , आचार्य के मुखोल्लास के निमित्त , दृढ़ ज्ञान और भक्ति आदि होना आवश्यक है । परन्तु यह ज्ञान और अनुष्ठान में असमर्थ और अशक्त शिष्य को , मोक्ष प्राप्ति के प्रतिकूल विषयों में निवृत्ति आवश्यक है और यही निवृत्ति आचार्य अभिमान निष्ठ के लिये भी आवश्यक है ।
पशु ,पक्षी , वृक्ष आदि प्रतिकूलता का गन्ध रहित होने से , उनके मोक्ष के लिये , भगवद् या आचार्य अभिमान ( अपनापन ) मात्र पर्याप्त है ।

पूर्व काल में , नम्पिल्लै ( कलिवैरी दास) कांचिपुरम से निकलकर श्रीरंगम की ओर यात्रा कर रहे थे । बहुत दूर धूप में , चलते चलते थक गये थे । मार्ग में उन्होंने एक वट वृक्ष को देखा और अपने शिष्यों के साथ उसके छाये में विश्राम किया , भगवान को भोग लगाकर , सभी ने प्रसाद पाया और उस रात , वहीं सो गये । दूसरे दिन यात्रा आरम्भ करते समय , नम्पिल्लै ने शिष्यों से , ” इस वृक्ष ने हम सबका भूख और थकान को मिटाया है ; इसके प्रति हम ने कुछ नही किया ” ऐसा कहकर , ” गच्छ लोकान् अनुत्तमान् ” ( श्रीरामायण आरण्य कांड ८-३०)( हे जटायू ! तुम उत्तम लोक में जाओ ) प्रमाणानुसार उस वृक्ष पर विशेष कटाक्ष करके , आपने दोनों हाथों से उसे थपथपाया । इसे देखकर, समीप गाँव का एक ब्राह्मण , इसका मजाक उडाता हुआ चला गया और नम्पिल्लै अपने शिष्यों सहित श्रीरंगम पहुँच गये ।
उस रात में , वहाँ पर महाउत्सव जैसा वाद्यों का बडा घोष सुनाई दिया । मजाक उडाकर गया हुआ वह ब्राह्मण और उस गाँव के सभी लोग आ खडे हुए । आकाश में दिव्य प्रकाश प्रकट हुआ ; उसे देखकर सब आश्चर्यचकित हो रहे थे ; उस समय वह वृक्ष का दो भाग हो गया और उसके बीच से बडे ध्

पोस्ट ४४/44

पोस्ट ४४

इस विलक्षण मोक्ष का लाभ तो , एक सदनुष्ठान संपन्न पुरुष के प्रार्थना से ही , प्राप्त होता है ; परन्तु एक स्थावर वृक्ष को कैसे प्राप्त हो सकता है , ऐसा शंका न कीजिए । सर्वेश्वर , दिव्य शक्ति युक्त है ; निरंकुश स्वतन्त्र है ; अतः उसके अभिमान ( अपनापन) से इस आत्मा का उद्धार का संकल्प करने से , क्या कुछ नहीं हो सकता ? कर्म , ज्ञान , भक्ति , प्रपत्ति , आचार्याभिमान यह सब एक कारण मात्र है , जब वह किसी के उद्धार का संकल्प करता है । परकाल आल्वार् पूछते हैं भगवान से , ” तुम अपने मन में क्या सोचते हो ? “( पेरिय तिरुमोली २-७-१) ; इसप्रकार भगवान का संकल्प ही उद्धार का मुख्य कारण है ।

पोस्ट ४५ – ४७

” नासौ पुरुषकारेण नचाप्यन्येन हेतुना केवलं स्व इच्छैयैव अहं प्रेक्ष कश्चित् कदाचन ” ( पांचरात्रम् : लक्ष्मी तंत्रम् ) ( मैं किसीके पुरुषकार से या अन्य साधनों से , एक व्यक्ति पर कृपा नहीं करता ; मेरे स्वेच्छा से ही किसी व्यक्ति पर किसी समय में , महा कृपा करता हूँ ) इस प्रमाणानुसार , अपने निर्हेतुकी प्रथम कटाक्ष से , उस व्यक्ति में अद्वेष ( भगवान के प्रति द्वेष रहित होना ), आभिमुख्य ( भगवान के ओर मुडना ) सत्संग ,उस सत्संग से सदाचार्य प्राप्ति , सदाचार्य द्वारा प्राप्त सन्मंत्रार्थ ज्ञान का उपदेश , तदनुरूप अनुष्ठान आदि से परिशुद्ध करके , भगवान का संयोग ही सुख और वियोग ही दुःख ऐसा बना देता है ।
” भोगाःपुरन्दरादीनां ते सर्वे निरयोपमाः ” ( ब्रह्म्मांड पुराण )( भगवद् प्राप्ति के इच्छुक व्यक्ति को इन्द्र आदि के लोक भी नरक समान ही लगता है ) इस प्रमाणानुसार , भगवद् व्यतिरिक्त सभी वस्तुएं नरक समान बनाकर , क्षुद्र विषयासक्त मनुष्य को जिसप्रकार स्त्री का संग न मिलने पर अवस्था होती है , उसीप्रकार भगवद् विरह में , इस भक्त का भी अवस्था बनाकर , अखिल कल्याणगुणों से युक्त अपना अनुभव योग्य बनाकर , अनुभव पाने के लिये तड़प उत्पन्न करके , अपने से मिलाता है ।

पोस्ट -४८-४९

” अपिवृक्षाः परिम्लानाः उपतप्तोदकानद्यः अकाल फलिनो वृक्षाः ” ( श्रीरामायण अयोध्या कांडष ५९-४ )( रामजी के विरह से वृक्ष सूख गये ; नदीयाँ आदि भी सूख गयी । परन्तु जब श्रीराम वन से लौटे , तब वे ही वृक्ष असमय होने पर भी फल देने लगे ।) , ” रामो रामो राम इति प्रजानां (अ)भवन्कदाः , रामभूतं जगदभूद्रामे राज्यं प्रशासति ” (श्रीरामायण १३१-९६ ) ( श्रीराम राज्य करते समय , सभी प्रजा सदा सर्वदा राम राम का ही रट लगा रही थी ) , इन प्रमाणानुसार , चर अचर सभी को भगवान के संयोग में सुखी और वियोग में दुःखित बनाकर , राम वैकुंठ ले गये ।

इस लीला विभूति में , क्या यह संभव है ? ऐसा शंका करने की आवश्यकता नही है । अघटित घटना सामर्थ्य युक्त भगवान , जब लीला में समाविष्ट करने की इच्छा से , कर्मानुसार जगत निर्वाह करता है , हमारे यत्न से परम पुरुषार्थ प्राप्त करना असंभव है , परन्तु जब उसकी कृपा का प्रवाह , किनारों को तोडकर बहती है , तब बडे से बडे पापी में भी , भगवान के प्रति अनुकूल भाव उत्पन्न हो जाने से , उसका उद्धार हो जाता है ।

” चितः परमचिल्लाभे प्रपत्तिरपि नोपधिः , विपर्यये तु नैवास्य प्रतिषेधाय पातकम् “ ( जब जीव , भगवान को पाना चाहता है , तब प्रपत्ति भी उपाय नही है ; परन्तु जब भगवान , जीव को अपने लिये पाना चाहता है , तब जीव कृत पाप भी रुकावट नहीं हो सकता ।)प्रमाणानुसार , इसे श्रीवचनभूषण ग्रन्थ में भी , ११४ सूत्र में बताया गया है । ( ” जब वह इसे पाना चाहता है , तब पाप भी विरोधी नही हो सकता ” श्रीवचनभूषणम् ११४ )
इसप्रकार , जीव का अनादि काल से किया हुआ पाप कर्म , भगवान को पाने में विरोधी होने पर भी , जब भगवान इसे पाने की इच्छा करता है , तब यह विरोधियाँ बाधा नहीं हो सकती है ; और भगवान स्वयं इस जीव से सत्कर्मों को कराकर , अपनी प्राप्ति करा देता है ।

पोस्ट ५०

” एषः एव साधुकर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्यः उन्निनीषति ” ( कौषीतकी उपनिषद ) ( जिसका उद्धार , भगवान करना चाहता है , उससे सत्कर्मों को कराता है ) ऐसे वेदान्त में भी कहा गया है न ! सहस्त्रगीति में भी शठकोप मुनि कहते हैं कि , ” इस सहस्त्रगीति को भगवान स्वयं ने बिना कोई दोष के , मेरे मुख से गवाकर , सभी प्रकार से अयोग्य , मेरा भी उद्धार किया है , इस उपकार को मैं भला कैसे भूलुं ? ” ।

 

विलक्षण मोक्षाधिकार निर्णय (1-25)

विलक्षण मोक्षाधिकार निर्णय (1-25)

श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः

एरुम्बियप्पा (देवराज स्वामी) तनियन

सौम्यजामातृयोगीन्द्र चरणांबुज शट्पदम् ।
देवराज गुरुं वन्दे दिव्यज्ञान प्रदं शुभम् ।।

रम्यजामातृ मुनि के श्रीचरणकमलों पर भ्रमर of रसास्वादन करनेवाले , अपने आश्रितों को श्रेष्ठ ब्रह्म ज्ञान को प्रदान करनेवाले , ज्ञान और अनुष्ठान से सुशोभित , देवराज गुरु को वंदन करता हूँ । ( देवराजगुरु – एरुम्बियप्पा ( एरुम्बि नामक गाँव से थे ) – श्रीवरवरमुनि के अष्टदीग्गजों में से एक हैं ।)

पोरेट्रु नायनार् तनियन् ( समरपुंगव स्वामी तनियन् )

शमदमादि गुणैकनिकेतनं ,
चरमपर्वणि निश्चल चेतम् ।
यतिवरांघ्रि सरोरुह शट्पदं ,
समरपुंगव सद्गुरुमाश्रये ।।

मन और इन्द्रियों पर काबू आदि सद्गुणों के निकेतन , चरमपर्व श्रीवरवरमुनि आचार्य के प्रति दृढ़ भक्ति युक्त , यतिराज श्रीरामानुजाचार्य के श्रीचरणकमलों में भ्रमर जैसे अवगाहन करनेवाले , समर पुंगव नामक सद्गुरु को शरण जाता हूँ ।

समरपुंगव गुरु – श्रीवरवरमुनि के नवरत्न शिष्यों में से , एक थे । ( प्रमाण – पेरिय तिरुमुडी अडैवु )

इस कंदाडय समरपुंगवजी को श्रीभाष्य , प्रतिवादि भयंकर अण्णा स्वामी ने , प्रसादित किया था ।

सेनापतियाल्वान् के आचार्य थे समरपुंगव स्वामी । अतः उनका तनियन् , यहाँ अनुसंधेय है ।

श्री:
श्रीपरांकुशपरकालयतिवरवरमुनिभ्यो नमः
श्रीवादिभीकरमहागुरवे नमः

                 श्री देवराज स्वामीजी
(श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के अष्ट दिग्गजों में से एक)

https://guruparamparaihindi.wordpress.com/2015/10/02/erumbiappa/

https://guruparamparaihindi.wordpress.com/2015/10/02/erumbiappa/

सौम्यजामात्रु योगीन्द्र शरणाम्बुज शठपदम् ।
देवराज गुरुं वन्दे ज्ञान प्रदं शुभं ।।

तुला मास
रेवती नक्षत्र

अवतार स्थल – येरुम्बी

आचार्य – श्री वरवरमुनि स्वामीजी

रचनायें – पूर्व दिनचर्या, उत्तर दिनचर्या,वरवरमुनि शतकम, विलक्षण मोक्ष अधिकारी निर्णय, उपदेश रत्नमाला का अंतिम पाशुर ।

आप श्री अण्णन् स्वामीजी के सम्बन्धी थे । आपने श्री वरवरमुनि स्वामीजी का बहुत वैभव सुना था और उनके दर्शन करना चाहते थे ।

उनके दर्शन हेतु आप श्रीरंगम  पधारे और जब आप मठ पहुंचे तब श्री वरवरमुनि स्वामीजी सहस्रगीति के पहले पाशुर का अर्थ बतारहे थे।  कालक्षेप (प्रवचन) के बाद श्री वरवरमुनि स्वामीजी  ने आपका स्वागत किया और आशिर्वाद देते हुए वहीं प्रसाद पाकर जाने कहा ।

परन्तु सामान्य शास्त्र को मानकर आपने प्रसाद नहीं पाया और ऐसे ही वापस गांव लोट गये। सामान्य शास्त्र के अनुसार हमें एक सन्यासी से दिया गया प्रसाद नहीं पाना चाहिए लेकिन विषेश शास्त्र के अनुसार हमें एक श्रीवैष्णव ( भले वे सन्यासी भी हो ) द्वारा दिये गये प्रसाद को अति आदर और प्रेम से ग्रहण करना चाहिए।

जब वे अपने गांव पहुँच अपने श्री आराधना विग्रह श्रीसीतारामजी के दर्शन हेतु जब पूजा मंदिर का किवाट खोलने लगे तब किवाट खुला ही नहीं । आप दुखी होकर बिन प्रसाद पाये ही सोगये ।

सपने मे आपके श्रीसीतारामजी भगवान आकर आपसे बोले – आप श्री वरवरमुनि स्वामीजी कि शरण लो । वे श्री आदिशेषजी ही है जो त्रेता युग मे श्री लक्ष्मणजी बनकर आये और अभी फिर से संसारीयों का दुख दुर करने अवतरित हुए हैं ।

आप अगले सुबह श्रीरंगम् पधारकर श्री अण्णन् स्वामीजी के पुरुषकार से श्री वरवरमुनि स्वामीजी के शरण लिए और उनके प्रिय शिष्य बने ।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के सुबह उत्थापन से लेकर शयन के समय तक सभी कार्यों का वर्णन दो स्त्रोत्रों में किया गया है ।

http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2015/05/sri-varavaramuni-dhinacharya-hindi/

“पुर्वदिनचर्या “ में स्वामीजी के दिन के पहिले हिस्से की गतिविधियों का वर्णन है , और ( सुबह से लेकर दोपहर तक)

“उत्तर दिनचर्या” में दिन के दुसरे हिस्से की गतिविधियों का वर्णन है । ( दोपहर से लेकर रात तक)

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी दोपहर में यतिराज विंशति का अनुसंधान करते थे ।इसलिये श्रीवैष्णव जन पूर्वदिनचर्या, यतिराज विंशति, उत्तरदिनचर्या का अनुसंधान इस क्रम करते है ।

श्रीवैष्णवों को इन स्तोत्रों का अनुसंधान किये बिना प्रसाद भी नहीं लेना चाहिये, ऐसा अपने आचार्यजन कहते हैं ।

इन स्त्रोत्रों का अर्थ इतना विलक्षण है जिससे सुनने पर पत्थर भी पिघल जाता है ।

श्री देवराज स्वामीजी का मंगल हो

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                                    पोस्ट – १

श्रीमद् वरवरमुनि के शिष्य एरुम्बियप्पा से , समरपुंगवजी के सद् शिष्य सेनापतियाल्वान् आदि श्रीवैष्णवों ने दंडवत करके निवेदन किया कि , ” हम सभी दास , मोक्ष के इच्छुक हैं ; हमें विलक्षण मोक्षाधिकारीयों का स्वरूप को निर्णय करके , प्रसादित कीजिए “। (विलक्षण इसलिए क्योंकि ये वैष्णव ऐश्वर्य , कैवल्य मोक्ष आदि के इच्छुक नही हैं।)

तब एरुम्बियप्पा ने कहा, ” इस विषय में , हम अब नया क्या कह सकते हैं ? सभी सामान्य शास्त्र , सभी विशेष शास्त्र, वेदवेदांत प्रतिपाद्य गीताचार्य ( श्री कृष्ण ) , सभी ऋषी , सभी आल्वार् , सभी आचार्य ने , पर्वत के शिखर पर प्रज्वलित दीपक जैसे, प्रकाशित तो किया है न ! फिर भी , लोक हितार्थ निमित्त , आप लोगों ने जो प्रश्न किया है , उसके उत्तर के रूप में, हमारे आचार्य श्रीवरवरमुनि के, उक्तियों के अर्थ विशेषों को विज्ञापन करता हूँ ।

श्रियःपति , निखिल हेय गुणों के विरुद्ध , कल्याणगुणों का एकमेव निकेतन , सर्वेश्वर , निरंकुश स्वतंत्र , परन्तु परम कारुणिक भगवान , अनेक प्रकार के , मोहित करानेवाले कार्यों से , लीला विभूति के जीवों के साथ क्रीड़ा करते हुए , कोई विरले लोगों को संसार से उत्तीर्ण करने की इच्छा करता है ।

( सेनापतिआल्वान् के प्रश्न के उत्तर के रूप में , यह ग्रन्थ अवतरित हुआ है; अतः ग्रन्थ के अध्ययन के पूर्व , सेनापतिआल्वान् के आचार्य समरपुंगवजी का तनियन् अनुसंधेय है ।)

                                     

एवं संसृतिचक्रस्थे भ्रम्यमाणे स्वकर्मभि:,

जीवे दुक्खाकुले विष्णो: कृपा काप्युपजायते। ।। ( अहिर्बुद्न्य संहिता )

( इसप्रकार जन्म मरण रूपी संसार चक में फँसकर , अपने पुण्य पाप कर्मों के कारण घूमता हुआ , दुःखों में डूबा हुआ , जीव पर , विष्णु को अहेतुकी कृपा उत्पन्न हो जाती है ।)

इस प्रमाणानुसार , यह जीव , संसार चक्र में रहकर , अपने संपादित पुण्य पापों के कारण , जनम लेना , मरना , नरक में यातना सहन करना आदि दुःखों से कष्ट पाता है । इसे देखकर , उसके प्रति दया के कारण,


” नासौ पुरुषकारेण नचाप्यन्येन हेतुना ।
केवलं स्वेच्छयैवाहं प्रेक्षे कंचित् कदाचन ।।( लक्ष्मी तंत्र )

(मैं , श्रीदेवी की पुरुषकार से अथवा कर्मयोग, ज्ञानयोग आदि अन्य कारणों से नही , बल्कि मेरे स्वतन्त्र इच्छा मात्र से ही किसी एक पर , किसी एक समय में , कृपा कटाक्ष करता हूँ ।)

इस प्रमाणानुसार , राजा के हाथी और राजा के समान , निर्हेतुकी कृपा करता है ।

discussion:
मत्प्राप्ति प्रतिजंतूनां संसारे पतितामधः ।
लक्ष्मी: पुरुषकारत्वे निर्दिष्टा परमर्षिभि : । मामपि च मतं ह्येष नान्यथा लक्षणं भवेत् ।।”
यह श्लोक भी आगम में प्राप्त होता है जिसमें मुक्ति का हेतु श्रीअम्मा जी के पुरुषकार को प्रकाशित किया गया है । तब दोनों श्लोकों का सामन्जस्य कैसे होगा ?

answer:

माता का पुरुषकार भी भगवान के इच्छा के अधीन ही है । वह स्वतंत्र होने से , बिना पुरुषकार भी कृपा कर सकता है। तब ही तो उसे निरंकुश स्वतंत्र कहा गया है ।
आचार्यों ने अनेक बार कहा है कि भगवान का उपाय नैरपेक्षत्व, पुरुषकार का भी अपेक्षा नही करता है। परन्तु स्वेच्छा से माता के पुरुषकार को स्वीकारता है ।

पोस्ट – ३

जायमानं ही पुरुषं यं पश्येन् यं पश्येन् मधुसूदन:

सात्विकस् स् तु विज्ञेयस् स् वै मोक्षार्थ्थ चिन्तक:।।( महाभारत – मोक्षधर्म )

(जिस मनुष्य को , जन्म लेते समय , मधुसूदन कटाक्ष करता है , वही सत्वगुण से पूर्ण होता है , ऐसा जानने योग्य है । वही मोक्ष पुरुषार्थ का चिंतन करता है ।)

इस प्रमाणानुसार , जायमान कटाक्ष से , परम सत्वनिष्ठ होकर , मोक्ष का इच्छुक बनता है । परन्तु ” ज्ञानात् मोक्षः आज्ञानात् संसारः” , प्रमाणानुसार, वह मोक्ष का लाभ, अर्थपंचक ज्ञान के अनुष्ठान से ही प्राप्त होगा। उस ज्ञान के अनुरूप , अनुष्ठान के अभाव में , पुनः पुनः जन्म मरण रूपी संसार दुःख ही बढ़ने से , मोक्ष असंभव ही है ।
माता का पुरुषकार भी भगवान के इच्छा के अधीन ही है । वह स्वतंत्र होने से , बिना पुरुषकार भी कृपा कर सकता है। तब ही तो उसे निरंकुश स्वतंत्र कहा गया है ।

पोस्ट – ४

” तत् विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् ,
समित् पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्म निष्ठम् ।
तस्मै स विद्वान् उपसन्याय सम्यक् ,
प्रशांत चित्ताय शमान्विताय ,
येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यं प्रोवाच तां ,
तत्त्वतो ब्रह्म विद्याम् ।।(मुंडक – १-२-१२,१३)

( परमात्मा को प्राप्त करने की उपाय को अच्छी तरह जानने हेतु , उस मनुष्य को , वेदों को जाननेवाले , ब्रह्म साक्षात्कार प्राप्त , आचार्य के पास ही , समिधा हाथों में लेकर जाना चाहिए ।। वह मोक्षोपाय के ज्ञाता आचार्य को , अपने पास ब्रह्मोपदेश पाने हेतु आये शिष्य को , जिसका मन और इन्द्रियाँ वश (शम दम ) में है , अक्षर परम पुरुष का ज्ञान को , यथार्थ रूप से उपदेश करना चाहिए ” )

इस प्रमाणानुसार , वह मुमुक्षु को , ब्रह्म ज्ञानार्थ , आचार्य के प्रति कैंकर्यों को करने की इच्छा से , वेद वेदान्त सारार्थ के पूर्ण जानकार , परमात्मा के सिवाय ,अन्य विषयोंमें वैराग्य पूर्वक परमात्मा में निष्ठ , एक आचार्य का शरण लेना चाहिए।
वह आचार्य भी , शिष्य जो शम दमादि गुण संपन्न है , उसके ब्रह्म ज्ञान के प्रति , तीव्र इच्छा का परीक्षा लेकर , पश्चात ही ब्रह्म ज्ञान को उपदेश करके और उस ज्ञान के अनुरूप अनुष्ठानों को भी , अच्छी तरह सिखाता है ।

पोस्ट – ५

वह शिष्य भी ,अपने आप को कृतकृत्य मानकर , मोक्षाधिकारी बनकर , पश्चात मोक्ष को प्राप्त करता है ।

इस श्रुति प्रमाण में , ” सम्यक् प्रशांत चित्ताय ” इन शब्दों में कहे गये शम और दम दोनों , आत्मगुणों में प्रधान होने से , इन गुणों को कहने से , उपलक्षण रूप में , सद् शिष्य के अन्य लक्षणों को भी कहा गया है ।

पोस्ट – ६

” श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ” वेद शास्त्रों में पारंगत और ब्रह्म निष्ठ , यह दो गुण , सदाचार्य के अन्य लक्षणों का उपलक्षण है । ( मतलब – सदाचार्य में अन्य अनेक सद्गुण होते हैं ।)

सद् शिष्य के लक्षण इसप्रकार है :

” शरीरंवसू विज्ञानं वासः कर्म गुणानसून् ।
गुर्वर्थं धारयेद् यस्तु स शिष्यो नेतरः “
( जयाख्य संहिता ) ( जो व्यक्ति अपने शरीर , संपत्ति , बुद्धि , घर , कर्म , सद्गुण , प्राण आदि , अपने आचार्य के निमित्त धारण करता है , वही शिष्य कहलाता है , अन्य नही )
इस प्रमाणानुसार , एक सद् शिष्य , अपने शरीर , धन, प्राण , घर , खेतीबाड़ी , पुत्र , पत्नी आदि को आचार्य को समर्पण करके , सभी स्वप्रयत्नों को छोड़कर , आचार्य के अभिमान रूपी छाया में वास करता हुआ , आचार्य कहे तो बिक जाने के लिये भी , तत्पर रहता है ।

पोस्ट ७

” सद्बुद्धिः साधु सेवी समुचित चरितः , तत्व बोधाभिलाषी – सुश्रूस् त्यक्तमानः प्रणिपतनपरः प्रश्न काल प्रतीक्षः शांतो दांतोन ( अ) सूयुः शरणमुपगतः शास्त्र विश्वास शाली शिष्यः प्राप्तः परीक्षां कृतविदभिमतः तत्वतः शिक्षणीयः ” ( न्यास विंशति – ३ )
इस प्रमाणानुसार , आचार्य से सत्विषयों को समझने में इच्छुक , साधु सेवा में तत्पर , सदनुष्ठान संपन्न , तत्व ज्ञान समझने के लिये उत्सुक , गुरू सेवा में तत्पर , अभिमान रहित , दंडवत प्रणाम करने में पर तत्पर , पश्न पूछने के लिये ठीक समय की प्रतीक्षा करनेवाले , मन और इन्द्रियों को वश में किया हुआ , मात्सर्य रहित , शरणागत , शास्त्रों में विश्वास रखनेवाले , कृतज्ञ , आचार्य ने ली हुई परीक्षा में उत्तीर्ण ( शिष्य , ऊपर बताये हुए गुणों को सचमुच पाया है क्या , इसकी परीक्षा ) शिष्य को ही यथार्थ पूर्ण रूप से सत्विषयों को ही , आचार्य पढाता है ।

पोस्ट – ८

जो शिष्य ऐसा सद्गुण संपन्न नही है , उसे उपदेश नही करना चाहिए । ख्याति , धन , पूजा , सेवा निमित्त , देवतांतर भजन करनेवाले , कर्मयोग – ज्ञानयोग- भक्तियोग आदि अन्य उपायों को करनेवाले, शब्दादि विषयों में रमन करनेवाले दस बद्ध संसारीयों को बुलाकर , पूर्वाचार्यों के वचनों को त्यागकर , अपने दुर्वासनाओं के कारण अपने मनमें जो कुछ शास्त्र विपरीत अर्थ सूझता है, उन्हें उन लोगों को सुनाकर , उनसे धन लाभ प्राप्त करके , अपना देहयात्रा को ही ध्येय मानकर विचरनेवाला आचार्य , ” यजमान कृतं पापं द्रव्यमाश्रित्य तिष्ठति ” प्रमाणानुसार (यजमान का पाप उसके धन में होता है ) , ” शिष्यपापं गुरोरपि ” प्रमाणानुसार ( शिष्य के पाप भी गुरू को ही भोगना पडता है), अनधिकारी शिष्य के द्रव्य द्वारा उसके पाप को भी अपने पाप के साथ भोगकर, अपने स्वरूप का नाश कर लेता है ।

पोस्ट ९

शिष्य हो या आचार्य हो , विलक्षण संबंध की ही आवश्यकता है । जिसप्रकार शिष्य को सदाचार्य की आवश्यकता है , उसीप्रकार आचार्य को भी सत्शिष्य के संबंध की अपेक्षा होनी चाहिए और इसलिए विलक्षण व्यक्तियों को ही शिष्य के रूप में स्वीकारना चाहिए ।

श्री रामानुजाचार्य ने गुरु श्रीगोष्ठीपूर्णजी के आज्ञा का उल्लंघन करके , इच्छुक श्रीवैष्णवों को अष्ठाक्षर मंत्र के अर्थ को उपदेश किया था । अतः उन्होंने यह माना कि इस अपचार के फलरूप अपना दुर्गति निश्चित है । परन्तु जब कूरेष को नम्पेरुमाल के कहे वचनों को सुना , तब इतने खुश हुए कि वे अपने काशाय वस्त्र को आकाश में उडाकर नृत्य करने लगे ।( कूरेष को भगवान ने कहा था कि “तुमसे जिन जिन का संबंध है, वे भी परमपद पायेंगे।” )

“सोयं रामानुजमुनिरपि स्वीयमुक्तिं करस्थां यत्संबंधादमनुतकथं वर्ण्यते कूरनाथः”

( जिस रामानुज के संबंध से उनके पूर्वाचार्यों और शिष्यों की मुक्ति निश्चित थी , वे रामानुज स्वयं के मुक्ति को , कूरेषजी के संबंध से, निश्चित मानते हैं ; ऐसे कूरेषजी के प्रभाव का वर्णन कौन कर सकता है ? )

 

” गुरोर्वचोतिक्रमणे निश्चित्य स्वस्यदुर्गतिम् ।
परानर्थासहिष्णुत्वात् मंत्रं प्रोवाच भाष्यकृत् ।। ( इस श्लोक का अर्थ पोस्ट ९ में हैं ।)

इसप्रकार जैसे विलक्षण शिष्य का संबंध से उद्धार होता है , उसीप्रकार अविलक्षण शिष्य का संबंध भी अनर्थ का हेतु बनता है । सत्पुत्र का संबंध , पिता को नरक से उद्धार करता है परन्तु कुपुत्र के बुरे कर्मों से , पिता को नरक यातना देता है , यमराज । ( …..पितृन् प्राचयते यमः )

पोस्ट – ११

” स ही विद्यातस्तं जनयति तत्श्रेष्ठं जन्म गरीयान् ब्रह्मदः पिता गुरुः पिता मुमुक्षोस्तु ” ( आपस्तंप धर्मसूत्रम् १.१.१६ )

( मुमुक्षु के लिये , ब्रह्म विद्या प्रदान करनेवाले आचार्य , जन्मदाता पिता से भी श्रेष्ठ है । )

प्रमाणानुसार आचार्य और शिष्य के बीच पिता पुत्र संबंध होता है । अतः बुरे वर्तनवाले शिष्य से हुआ संबंध , उसके दिये हुए धन के स्वीकृति द्वारा , आचार्य को हानिकारक होकर , उसे नष्ट कर देता है । जब इसप्रकार का शिष्य संबंध ही हानिकारक है, तो ज्ञान और अनुष्ठान हीन आचार्य का संबंध , शिष्य के लिये , कितना हानिकारक है , क्या इसे कहने की आवश्यकता है ?

 

” ज्ञानहीनं गुरुं प्राप्य कुतो मोक्षमवाप्नुयात् – भिन्न नावाश्रय स्तब्धो यथा पारन्न गच्छति ” प्रमाणानुसार , ज्ञान हीन आचार्य के आश्रित हुआ शिष्य कैसे मोक्ष को प्राप्त होगा ? टूटा हुआ नाव में चढा हुआ व्यक्ति , क्या उस पार , पहुँच सकेगा ?
अतः ज्ञान हीन आचार्य का संबंध शिष्य के लिये हानिकारक है ।
अतः ” सिद्धं सत्संप्रदाये ” यह ” न्यास विंशति ” के प्रथम श्लोक में वर्णित सदाचार्य लक्षणों से युक्त अति श्रेष्ठ आचार्य के संबंध ही मोक्ष का कारण है । उसीसे शिष्य का उद्धार होगा ।

” सिद्धं सत्संप्रदाये स्थिरधीः यमनघं श्रोत्रियं ब्रह्म निष्ठं सत्वस्थं सत्य वाचं समयनियतया साधुवृत्या समेतम् ।
डंभासूयाविमुक्तं जितविषयगणं दीर्घ बन्धुं दयालुं स्खालित्ये शासितारं स्वपरहितपरं देशिकं भूश्णुरीप्सेत् ( न्यास विंशति )
( ( जन्म को सफल बनाने के इच्छुक ) शिष्य को – नाथमुनि , आलवन्दार , श्री रामानुज आदि आचार्यों के सत्संप्रदाय में आया हुआ , स्थिर बुद्धि युक्त , पाप हीन , वेदांत के ज्ञाता , भगवान में निष्ठ , सत्व गुण में स्थित , सत्य वचन बोलनेवाले , शिष्टाचार युक्त सत्कर्म में निरत , आडम्बर , मात्सर्य आदि दुर्गुण रहित , इन्द्रियों को वश में रखनेवाले , शिष्य को बीच में न छोडनेवाले , परम दयालु , शिष्य के दोषों को सुधारनेवाले , स्वयं के और, दूसरों के हित चिंतक आचार्य के , आश्रय लेना चाहिए ।

 

उपदेश रत्नमाला ग्रन्थ में श्री वरवरमुनि कहते हैं कि शिष्य को आचार्य के देह पोषण में तत्पर रहना चाहिए और आचार्य को शिष्य के आत्मोद्धार का ही लक्ष्य होना चाहिए ।

पोस्ट – १३

इस श्लोक के अनुसार , सत्संप्रदाय में स्थित , सुस्थिर बुद्धि युक्त , शिष्य को उपदेश करने से , अपने लाभ का विचार न करनेवाले , दोष रहित , वेदांत के सही तात्पर्य के ज्ञाता , भगवान में ही निष्ठ हृदय के कारण श्रेष्ठ , प्रकृति के तीन गुणों में वश हुए लोगों के जैसे सुख दुःख में हर्षित और दुःखित न होकर , ” समदुःखसुखस्वस्थः समलोष्टाष्म कांचनः । तुल्यप्रियाप्रियोतीतः तुल्यनिंदात्मसंस्तुतिः । मानावमानयोस्तुल्यः तुल्यो मित्रारीपक्षयोः । सर्वारंभ परित्यागी गुणातीतस्स उच्यते ।।( गीता ) प्रमाणानुसार , सुख दुःख को सम मानकर अपने स्वाभाविक समता में स्थित , मिट्टी और स्वर्ण को एक समान माननेवाले , प्रिय और अप्रिय दोनों को एक समान माननेवाले , निन्दा स्तुति को एक समान माननेवाले , मान और अपमान को एक समान माननेवाले , मित्र और शत्रु को एक समान माननेवाले , अपने हित के लिये स्वयत्न को छोड़कर ( भगवान को ही उपाय मानकर ) जो व्यक्ति है , वही गुणातीत कहलाता है ।
श्री अरैयर स्वामीजी के पुत्र दुसंगति के कारण अनुष्ठान आदि सब छोड़ वहीं चले गए ,तब श्री रामानुज स्वामीजी खुद चलकर वहाँ से उन्हें वापस ले आया ।

पोस्ट-१४

प्रकृति के तीन गुणों के स्पर्श रहित , शुद्ध सत्व गुण में स्थित , शास्त्रों के ज्ञान को बताने में समर्थ , पूर्वाचार्यों के अनुष्ठान के अनुसार , आहार नियति , सहवास नियति आदि सदाचार से युक्त , आडंबर , मात्सर्य आदि दुर्गुण रहित , शब्दादि विषयों में अनासक्त , शिष्य अपने को त्यागने पर भी शिष्य को कदापि न त्यागनेवाले , दूसरों के अनर्थ को न सहनेवाले परम दयालु , शिष्य सद् मार्ग से च्युत होने पर उसे बलात्कार से सुधारनेवाले , अपने में किसी प्रकार का निषिद्ध आचरण न होने देते हुए , अपने को और दूसरों के हित का ही चिंतन करनेवाले ऐसे आचार्य के आश्रित होकर , जो शिष्य आचार्य के उपदेशों का पालन करनेवाला होता है , वही भगवान का प्रियतम हो जाने से , मुक्त होगा ।

पोस्ट – १५

” ज्ञानं अनुष्ठानं इवै नन्रायुडयनान गुरुवै अडैंदक्काल् मानिलत्तीर् तेनार् कमलत् तिरुमामगल् कोलुनन् ताने वैकुंदम् तरुम् ” , ऐसे हमारे आचार्य ( श्रीवरवरमुनि ) ने कहा है ।
( ज्ञान और अनुष्ठान से भलीभांति युक्त आचार्य को पा लेने से , श्रियःपति अपने आप , वैकुंठ प्रदान करेगा – उपदेश रत्नमाला )

सदाचार्य का सत्संप्रदाय सिद्ध होने का मतलब – प्रपन्न जन कूटस्थ शठकोप मुनी से लेकर स्वाचार्य पर्यन्त जो ज्ञानवंश परंपरा है , उसके बीच में अयोग्य संबध न होने के कारण , दोष रहित होना ।

 

आचार्य के दोष रहित होने का मतलब बताते हैं यहाँ । उपदेश करने का फल – इस जगत में धन आदि का अनुभव , शिष्य का मोक्ष प्राप्ति , शिष्य का सहवास आदि को फल न मानकर, शिष्य को भगवान के मंगलाशासन के लिये योग्य बनाना ही है और स्वयं को आचार्य न मानकर , शिष्य को आपना शिष्य न मानकर , शिष्य को अपने सहपाठी मानना ही है ।

आहार नियति – नीच माने जानेवाले भक्ष्य पदार्थों और पापी के संबंधित भक्ष्य पदार्थों को त्यागकर , ऊँचे माने जानेवाले पदार्थों और सद्पुरुषों के संबंधित पदार्थों को , याने भगवद् भागवतों का अन्न शेष पदार्थों को स्वीकार करना चाहिए ।

शास्त्रों में नीच बताये गये पदार्थ –
( लशूनं मद्यमांसानि मूलंघृंजनं तथा । तिलपिष्टं तथासीगृं बिल्वं कोशातकीं तथा । अलाबुं श्वेतवार्त्ताकं विठ्वनीकं तथैवच । एवमादीन्य भक्ष्याणि शास्त्र दुष्टानि ये नराः खादंति ते नरा यांति विण्मूत्र, क्रिमिभोजनम्”)
लहसून , मांस , मूली , प्याज , ढोल की छडी , बिल्व , लौकी, सफेद बैंगन आदि को शास्त्र ने निषिद्ध बताया है । इन अभक्ष्य पदार्थों को जो लोग खाते हैं , वे नरक में मल , मूत्र , कीडे आदि को भक्षण करेंगे ।

 

Discussion:

 

Prohibited are onion,.garlic,.लौकी , raddish,, drumstick , white bringjal , bilva. Gobi, cabbage, carrots too banned. Strictly speaking the vegetables which are used in shraadh are only supposed to be taken. 

See , vegetables like carrot, potato, tomato , chillies etc did not exist in smritikara’s times, These have come from abroad . Hence not mentioned in the shloka.

मेरे हिसाब से onion, garlic, raddish , drumstick को छोड़कर आप जो खाते हैं वह सब ठीक ही है समयानुसार ।

As a final conclusion……the text clarifies the rules….to accept or not is left to the people, their understanding and their desacharas and how much they are unmukha or vimukha to both sampradaya. As well as their local customs…so lets conclude this as its beginning to carry no value

भतपुरी उत्तरादी मठ के वर्तमान स्वामीजी के दादाजी नेपाल में रहते थे, 50 पहले की बात है । एक दिन स्वामीजी नदी स्नान करके आते समय रास्ते में गलती से उन्होंने टमाटर के ऊपर पैर रख दिया, उस अशुद्धि को दूर करने के लिए वे पुनः नदी में स्नान करने के लिए गए ।

कितना श्रेष्ठ आचरण उनका था ।

 

पोस्ट – १७

परन्तु , सदाचार को ही प्राधान्यता देनेवाले श्रीराम , ” नमांसं राघवो भुंक्ते न चापि मधु सेवते ” ( श्रीरामायण सुंदर काण्ड ३६-४१) इस प्रमाणानुसार , सीता वियोग में, मधु मांस नहीं खाये थे; ऐसा कहने से , सीताजी के साथ रहते समय , खाते थे , ऐसा प्रतीत होता है । “मर्यादानांच लोकस्य कर्ता कारयिता च सः ” ( श्रीरामायण सुंदर ३५-११)(शास्त्र के मर्यादाओं का , उस रामने स्वयं अनुष्ठान करके , औरों से भी अनुष्ठान कराया ) , “धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ” ( गीता ४-८) ( धर्म के स्थापन के लिये ही हर एक युग में प्रकट होता हूँ ) आदि प्रमाणानुसार धर्म संस्थापनार्थ लिये गये अवतारों का आचरण का अनुकरण क्या करना नहीं चाहिए ?

पोस्ट – १८ अ

इसका उत्तर इसप्रकार है – श्रीराम का सामान्य धर्म में निष्ठा होने के कारण, क्षत्रिय धर्म के अनुरूप जो योग्य मांस हैं , जो सुगंध यूक्त पुष्पों से बनाया हुआ मधु है, उन्हीं को ही स्वीकार किया था । अपने क्षत्रिय धर्म के लिये जो अयोग्य मधु और मांस था , उन्हें स्वीकार नहीं किया था ।
वर्ण धर्मों का आचरण करनेवाले , वर्ण के तारतम्य के अनुरूप , कुछ वस्तुओं को अपनाते हैं और कुछ वस्तुओं का त्याग करते हैं । परन्तु सत्वगुण निष्ठ परमैकान्ति के लिये ” उभे विद्वान् पुण्य पापे विधूय “( ज्ञानी , पुण्य और पाप दोनों को छोड़कर ) प्रमाणानुसार , भगवद् अनुभव के व्यतिरिक्त , अन्य सभी विषय त्याज्य ही है , स्वीकारने योग्य नही है ।

पोस्ट – १८ब

” ब्राह्मणस्य मधूकमैक्षवंतालं कार्जूरं पानसं तथा , द्राक्षं मधुजमारिष्टं मैरेयं नालीकेरजं । इत्येकादशमद्यानि निषाद्धानि द्विजन्मनां । सुरांबुकृतगोमूत्र पयसामन्यतममग्निस्पर्शाद्दाहकशक्तिं कृत्वा पीत्वा मरणात् शुद्धिं प्राप्नुयात् “

( ब्राह्मण के लिये महुआ , गन्ना , ताड, खजूर , कटहल , द्राक्ष , मधु , छास , गूड ,नारियल आदि से बनाया हुआ दस प्रकार के सुरापान त्याज्य है ; परन्तु दारू , घी , गोमूत्र , दूध आदि इनमें से किसी एक को , दाह शक्ति को बढाने के लिये , गरम करके पीने से , पहले वर्णित दस सुरापानों के सेवन करने से जो पाप होता है , वह दूर होकर , वह शुद्ध हो जाता है । ” )

इसप्रकार सत्वगुण निष्ठ ब्राह्मण जाती के लिये , जिस पदार्थ को , घोर पाप का कारण बताया गया है , वह पदार्थ , रजोगुण और तमोगुण तनिक भी न मिश्रित , शुद्ध सत्वगुण निष्ठ , अपना परिचय के लिये भी गाँव , कुल आदि को छोड़कर , सभी वर्णाश्रमों से विलक्षण( श्रेष्ठ ) होकर , श्रीरामदास , श्रीकृष्णदास आदि भगवद संबंध नाम से से ही अपनेको परिचय करानेवाले , परमैकान्ति के लिये सोचना भी पाप है न !

परन्तु इन नीच पदार्थों का सेवन का निषेध का कारण जाती मात्र नही है ।( नीच जाती – तामसिक पदार्थ )

” द्रव्यं निन्द्यसुरादि दैवत मतिक्षुद्रंच बाह्यागमोदृष्टिर्देवलकाश्च देशिकजना दिग्दिग्दि गेशां क्रमः “ ( क्षुद्र देवताओं के लिये चढाये जानेवाले भोग, धर्म ग्रन्थों द्वारा निषिद्ध माने गये, सुरा पानादि है । इसके लिये प्रमाण है वेद के विरुद् कहे जानेवाले शैवागमादि है। 

इसप्रकार क्षुद्र देवताओं के विषय में कहनेवाले , वेद विरुद्ध शैवागम में , कहे हुए नीच कार्य होने से , इन पदार्थों का सेवन का  शिष्ट लोग  निंदा करते हैं ।

“यजन्ते सात्विका देवान्” ( गीता १७-४) इस प्रमाणानुसार सभी देवता, सात्विक लोगों के लिये पूज्य है, ऐसा मानकर, जैसे भगवान ने अपने अवतारों में रुद्र, इन्द्र, सूर्य आदि देवताओं की पूजा की थी, ऐसा मानकर , महालक्ष्मीजी के समान, परिशुद्ध जीवात्मायें देवतांतर भजन तो नही कर सकते हैं न !


( परिशुद्ध जीवात्माओं का महालक्ष्मीजी से साम्य इसप्रकार है :
१) अनन्यार्हशेषत्व २) अनन्योपायत्व ३) अनन्यभोग्यत्व ४) वियोग में दुःखित होना ५) मिलन में सुखी होना  ६) भगवद् आज्ञानुवर्तनम् )

ऐसा नही माने तो , भगवान के अवतारों में किये गये , अतिमानुष कार्य सब , हमें अनुकरणीय हो जायेंगे । तो ब्राह्मण रावण को मारना आदि ब्रह्महत्या , कृष्ण का जार चोरी आदि कार्य भी , हमारे लिये अनुकरणीय मानना होगा । अतः महा पातक कर्मों को भी प्रपन्न धर्म मानकर , आचरण करना होगा । इसलिये शास्त्र विरुद्ध होने से , इन्हें कदापि नहीं मान सकते हैं ।

पोस्ट १९

गीता चरमश्लोक ” सर्व धर्मान् परित्यज्य ” ( गीता १८-६६) में ” सर्व ” शब्द के अर्थ का संकोच न करते हुए , यदि ऐसा माना जाय कि अधर्म से निवृत्ति का जो धर्म है उसे भी त्यागकर , मधु मांस को खाना उचित मानना होगा ; परन्तु यह तो तीन कारणों से अनुचित है ऐसा मुमुक्षुपडि (२१० सूत्र) में बताया गया है । ( अपने को , ईश्वर को , फल को देखने से , यह अधर्म प्रवेश नहीं हो सकता १) भगवद् मुखोल्लास के लिये ही कर्म करनेवाले अपने शेषत्व स्वरूप , २) धर्मों को भी त्यागने के लिये कहनेवाले भगवान ३) भगवान का मुखोल्लास का फल – इन तीनों के देखने से , अधर्म का प्रवेश असंभव है )

मुमुक्षुपडि के सूत्र ( २०९) में सर्व शब्द , अधर्म निवृत्ति को भी कहा गया है ; फिर भी उस अर्थ का संकोच क्यों ? धर्म को अधर्म से निवृत्ति क्यों न माना जाय ? इसका उत्तर – सर्वज्ञ भगवान लोकायत,जैन , बौद्ध, नैयायिक, वैशेषिक , शैव ऐसे बाह्य मतों के दुर्वादों के नाश हेतु , सन्मार्ग के प्रतिष्ठापनार्थ कहे गये गीता चरमश्लोक का अर्थ अधर्म का अनुष्ठान ही है , यदि ऐसा मानेंगे तो , गुरु- मंत्र -देवता इन सबका अपमान होगा । यही नहीं बल्कि , शास्त्र विरुद्ध धर्म का आचरण ही , सर्व उपनिषदों का सार – गीता शास्त्र का तात्पर्य है ऐसा कहना पडेगा ।

 

पोस्ट – २०

यही नहीं बल्कि , ” उपायापाय निर्मुक्तो मध्यमां स्थितिमास्थितः ” प्रमाणानुसार प्रपत्ति, जो उपाय और अपाय दोनों से अछूत है , उस प्रपत्ति का भी अपमान हो जाने से , स्वरूप का नाश ही होगा । अतः ” उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ” ( गीता १७/१०) प्रमाणानुसार उच्छिष्ट ( श्रेष्ठ व्यतिरिक्त अन्यों का उच्छिष्ट ) और अमेध्य (मधु मांसादि ) पदार्थ तामसिक व्यक्तियों के लिये है , सत्व निष्ठ व्यक्तियों के लिये तो त्याज्य ही है ।

प्रकृति के तीन गुणों के अधीन कर्म करनेवाले व्यक्तियों के लिये ही , अपने अपने गुणानुसार कुछ पदार्थ स्वीकार योग्य और कुछ पदार्थ अस्वीकार योग्य है । ” सर्वं खल्विदं ब्रह्म ” ( छांदोग्य ३-१४-१) ( यह सब ब्रह्म ही तो है ।) , प्रमाणानुसार सभी पदार्थों को ब्रह्मात्क ( ब्रह्म के शरीर ) माननेवाले उत्तम अधिकारीयों के लिये , क्या कुछ त्याज्य भी है ? – यदि ऐसा माना जाय – तो यह जीवात्मा , त्रिगुणात्मक प्रकृति ( संसार )को त्यागकर , जब मुक्त होता है , उस वक्त ही , यह ब्रह्मात्मक सब लीला विभूति, तदीयत्व आकार के कारण ( भगवान का है इस कारण से ) अनुभव योग्य है ।
प्रकृति विशिष्ट होने पर भी , भगवान के प्रसाद से ज्ञान , भक्ति पाये हुए शठकोप मुनि , प्रह्लाद जैसे अपरोक्ष ज्ञानी , सभी पदार्थों में , भगवान का साक्षात्कार करके , विष , शस्त्र , अग्नि आदि में प्रतिकूल बुद्धि रहित होकर ,

” नाग्निर्दहति नैवायं शस्त्रैश्छिन्नो न चोरगेः । क्षयं नीतो न वातेन न विषेण न कत्यया ।।

सत्त्वासक्तमतिः कृष्णे दश्यमानो महोरगैः । न विवेदात्मनो गात्रं तत्स्मृत्याह्लाद सम्स्थितः

( श्रीविष्णु पुराण १-१९-५९,६०)

( इस प्रह्लाद को अग्नि ने जलाया नही ; शस्त्र इसे काट नहीं सके ; सर्प, आंधी, विष , आभिचार पिशाच आदि इसका नाश न कर सके; वह प्रह्लाद तो भगवान के ध्यान में मग्न होकर आनंद में स्थित था, अतः महासर्पों के काटने पर , अपने शरीर का बोध रहित था ।)

रहने से , अग्नि आदि सभी प्रतिकूल पदार्थ , प्रह्लाद के लिये अनुकूल हो गये थे ।


” सर्वभूतात्मके तात जगन्नाथे जगन्मये । परमात्मनि गोविंदे मित्रामित्रगता कुतः ” ( श्री विष्णु पुराण १- १९-३७)

( पिताजी ! सभी जीवों का और जड पदार्थो का आत्मा भगवान विष्णु का कौन मित्र हो सकता है और कौन शत्रु हो सकता है ? )

इस प्रमाणानुसार , सब में समता भाव करते थे प्रह्लाद ।

येइसीप्रकार शठकोप मुनि भी , सहस्त्रगीति ( ३-४-१,३-४-१०,६-९-१) के अनुसार , भूमि आदि महाभूत , उनसे उत्पन्न भौतिक पदार्थ और इनके व्यतिरिक्त , चेतन वर्ग आदि सभी में व्याप्त भगवान , वे सभी उसके शरीर होने से , सभी भगवान ही है ऐसा मानकर , सब में समता बुद्धि का अनुसंधान करते थे ।
इसप्रकार अनुसन्धान करनेवाले प्रह्लाद और शठकोप मुनि ने , भगवान सभी का आत्मा होने से , सभी में भगवान को देखा था ; परन्तु लहसून और प्याज में भी भगवान को देखकर उनका सेवन नही किया था ।

 

पोस्ट – २१-२५

नम्माल्वार् भगवान से ” मुझे दर्शन देने आओ ” ( सहस्त्रगीति ६-९-४) ऐसे प्रार्थना करते हैं । उत्तर में भगवान कहते हैं , ” हम ने आपको , विश्व रूपी विग्रह को दिखाया , क्या आपके प्राण धारण के लिये यह पर्याप्त नहीं है ? ” ; तब आल्वार् ने कहा , ” राज्य का कारागृह आदि सभी ऐश्वर्य , राजपुत्र के लिये , पिताजी का है यह मानकर , आदरणीय है । उसीप्रकार सभी अंड , उसके भीतर के देव , मनुष्य आदि पदार्थ , स्वर्ग – नरक आदि सुख दुःख के अनुभव स्थान , उन स्थानों को प्राप्ति के लिये किये जानेवाले पुण्य पाप आदि , इन सभी का स्वतन्त्र आस्तित्व नही है ; वे सभी तुम्हारे शरीर होने से , तुम्हारे अधीन ही है ऐसा मानकर आदर करता हूँ । परन्तु ” मैला शरीर( सहस्त्रगीति ६-३-७) रक्त, मांस आदि से बाना हुआ इस शरीर का समूह , जो आपके स्वरूप को छुपाकर विपरीत ज्ञान को उत्पन्न करता है , ऐसे आपके जगत आकार शरीर , क्या आपके ” परंज्योति विग्रह ” (सहस्त्रगीति ६-३-७) के समान , मेरे लिये अनुभाव्य हो सकता है ?
आल्वार् ने ” चक्र, शंख धारण करके इस दुष्ट के सामने आओ ” (सहस्त्रगीति ६-९-१) ऐसे भगवान को , असाधारण दिव्य मंगल विग्रह के साथ आने के लिये प्रार्थना किया था न ?
आल्वार् , महालक्ष्मी -नित्यसूरि – मुमुक्षु आदि के अवस्था को प्राप्त होकर , मुक्त दशानुभव के समय में , समस्त पदार्थ भगवान के शरीर ही है ऐसा अनुसंधान करते हैं ; उसी आल्वार् ने , माता के दूध आदि सभी वस्तुओं को हेय मानकर त्यागकर , ” भक्ष्य अन्न, पीनेका जल , चबाने का बीडा , सब कुछ कृष्ण ही है ” ( सहस्त्रगीति ६-७-१) धारक ( अन्न) , पोषक ( जल), भोग्य ( बीडा – पान ) यह तीनों उनके लिये कृष्ण ही है, ऐसा अनुसन्धान करते हुए , प्राकृत वस्तुओं को ही अपना जीवन माननेवाले संसारी जीवों से मुँह फेरते हुए , भगवान से स्वयं को प्राकृत शरीर से मुक्त कराने के लिये प्रार्थना किया था ।
अतः सब कुछ ब्रह्म शरीर ही है , ऐसा मानकर , सभी हेय प्राकृत पदार्थ ( मधु मांसादि ) स्वीकार करने उचित नही हैं।

” आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः ” ( छांदोग्य – ७-२६-२) , ( शुद्ध आहार से मन की शुद्धि ) , ” सत्त्वात् संजायते ज्ञानम् ” ( गीता १४-१७) ( सत्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है ) , ” ज्ञानान् मोक्षः ” ज्ञान से ही मोक्ष की प्राप्ति होने से , ज्ञान – विरोधी वस्तुओं का त्याग करना चाहिए ।
आल्वारों को , स्वयं भगवान ने निर्मल ज्ञान और भक्ति प्रदान किया था ; अतः उनके लिये धारक, पोषक, भोग्य वस्तु सब स्वयं भगवान ही थे । परन्तु मुमुक्षुओं के लिये , सत्वगुण- प्रधान भक्ष्य पदार्थ ही सेवन के लिये उचित है और नीच (राजसिक , तामसिक) पदार्थ सभी , सर्वथा त्याज्य ही है ।

 

Next part:

विलक्षण मोक्षाधिकार निर्णय (26-50)

The Butter bandit: Inner meanings

Earlier part: Makhan-chori Leela

The gopis of Sri Gokulam are united in their complaint to Sri Yasodha that ever since Sri Krishna was born, their milk and butter were not their own, and kept disappearing mysteriously. To add insult to the injury, he broke the pots even.

Vishnuchitta Azhwar says (2.9.6):

thiruvudaip piLLaithaan theeyavaaRu thEkkamonRumilan thEsudaiyan
uruga vaiththa kudaththOdu veNNai uRinji udaiththittup pOnthu ninRaan

Means: The pot containing the ghee, clarified butter, kept in the uRi,
krishna drank that by sucking and making that `ur ur’ sound, whirring sound while eating and also broke the pot.

1.9.7

poththavuralaik kavizhththu adhan mElEri thiththiththa paalum
thadaavinil
veNNaiyum meththa thiru vayiru aara vizhungiya aththan –

Meaning: The mortar, which has a hole in the centre, is turned upside
down, and used as a stool to reach the rope hanger. Then milk, butter
are swallowed nicely contained in these pots. Being quite aware of the contents of a pot, They pick holes in it. While the elderly gopis go about their
household affairs, Krsna and Balarama sometimes go into a dark room,
brightening the place with the valuable jewels and ornaments on Their
bodies and taking advantage of this light by stealing.

[ramanuja] command begging

 

krishna butter stealingKrishna ate butter and broke the pot. Butter signifies us (jevatmas) and pot represents our body. Krishna takes us by his own efforts and leave our body here. Krishna is fond of butter and he is fond of jeevatmas, which are indeed his own property.

 The act highlights the saulabhya guna of Narayana. Just like while irrigating water from a lower level to a higher plain – one would put in lot of efforts to bring the water up. Thus Narayana minimizes his glories and presents himself in an acceptable nature to the jeevatmas and mixes with them.

His theft of butter, etc., and His getting punished for the same, highlight the glorious attribute of Souseelyam, while His stealing our bodies and souls is indicative of His insatiable hunger for Chetana lAbham (profit of getting jeevatmas).

What does the theft means? Jeevatma, the property of bhagwan is entangled in samsara and longing of temporary inferior sukham. He established Vedas, preached Bhagwat Gita, sent many nitya aatmas as acharyas but the Jeevatmas are least desirous of getting knowledge. How to deal with this? He had to steal his own property. For the purpose of stealing, he is staying inside the aatma as it’s antaryaami aatma. Taking an unintentional good work as good karma, he gives them sattvika bodies in sattvika family in next birth. Thus, out of his nirhetuka kripa, the jeevatma becomes desirous for moksha (mumukshu).

Example given is of a king, whom the mantris won’t respect. He made an effigy of of a pandit, made it bow toward him and placed it in his court. He immediately declared that the pandit is prostrating me. In the similar fashion, Bhagwan makes us sharanagatas, declare that the Jeevatma has surrendered and delievers moksha. It’s not to our credit that one becomes a bhakta or sharanagata, it’s his efforts through countless years that wore fruits.

Like butter don’t take any efforts to reach Krishna, similarly jeevatma should not perform any karma-yoga or bhakti-yoga to reach him. Krishna himself steals the butters and consumes it. Even sharanagati is not an act to be performed. It is a state of knowledge, state of acknowledging that only Bhagwaan is the means (upaaya) to reach him. Jeevatma shouldn’t make any efforts on his own to reach God or Jeevatma shouldn’t make any efforts on his own to earn the grace of God. All we need to do is performing kainkarya (service) to him, for his pleasure (mukhollasa), and remaining away from virodhi-swarupa which hinders the grace of God to reach us.

Nammazhwar (Sathakopa Suri) is the Chief among Azhwars and is described as the very personification of ‘thirst for Krishna’ “krishNa thrishNaa tattvam iva uditam”. He calls Krishna ‘Kalva’ or thief. Tirumangai Azhwar too calls him ‘Kalla Kuzhavi, KaLvA” etc. Sanskrit poets too called him ‘Navaneeta chora’.

Theft of milk and butter is hardly a matter for serious concern. Sri Satakopa Muni accuses Him of a much graver offence-that of stealing his soul- and
warns others to beware of this Divine Thief.

thiruvAimozhi – 10.7

senjoRkavigAL! uyirkAtthAtcheymmin thirumAlirunjOlai
vanjak kaLvan mAmAyan mAyak kaviyAy vandhu en
nenjum uyirum uL kalandhu ninRAr aRiyA vaNNam en
nenjum uyirum avai uNdu thAnEyAgi niRaindhAnE

emperumAn, being in thirumalai, who steals without the knowledge of those from whom he steals, who has very amazing form, qualities etc, who remains with mischievous acts to make me sing poems, is arriving in my heart and mixing in my heart and self even without the knowledge of lakshmi et al who remain with him; he consumed my heart and self, became the exclusive enjoyer and became avAptha samastha kAma. Oh all of you who can sing poems with honest words! Protect yourselves and your belongings from being stolen and try to serve him with your speech. Implies that for those who immerse in bhagavAn as ananyaprayOjana (without any expectation other than kainkaryam), it is unavoidable to have the self and belongings to be stolen by him.

thiruvAimozhi – 10.7.1 – senjoRkavigAL

Again,

nIrmaiyAl nenjam vanjiththup pugundhu ennai
Irmai seydhu en uyir Ay en uyir uNdAn
sIr malgu sOlaith then kAtkarai en appan
kAr mugil vaNNan than kaLvam aRigilEn

emperumAn owned me and entered my heart by revealing the quality of svasvAmi sambandham; he melts me, he is the one who sustains me and consumes me; he is my benefactor due to being present in thirukkAtkarai which is having beautiful garden with abundance of honey and flowers; I don’t understand the monsoon-cloud like greatly generous emperumAn’s mischievous act where the means and end are different, to be in a particular manner.

thiruvAimozhi – 9.6.3 – nIrmaiyAl nenjam

Sathakopa Suri azhwar goes into the reasons behind Krishna stealing butter. Earlier, he consumed the whole world, entire jeevatmas including Indra, Brahma, Shiva etc. Now that he had sprung them out again, he descended to taste them. Thus azhwar calls him Maayaavi.

uNdAy ulagu Ezh munnamE umizhndhu mAyaiyAl pukku
uNdAy veNNey siRu manisar uvalai Akkai nilai eydhi
maN thAn sOrndhu athu uNdElum manisarkku Agum bIr siRidhum
aNdA vaNNam maN karaiya ney UN marundhO mAyOnE!

Oh amazing person (who does not get impacted negatively even while mixing with everyone in all aspects)! Once upon a time, you consumed all the worlds and spat them out. Subsequently, you descended as an insignificant human being bound in a body (that is generally considered to be avoided). You ate butter to keep away the indigestion that occurs to humans. Is eating ghee a medicine to dissolve the residual soil? (No).

thiruvAimozhi – 1.5.8 – uNdAy ulagu

AzhwAr replies “Because you sustain yourself with the things which are touched by your devotees [butter churned by the cowherd girls], you consumed the butter”. emperumAn (Narayana) says “Just like that butter, you too are very dear to me. In that case, if you don’t present yourself to me, you will reach the same hell as those who hid the butter away from me”.

  • maNdhAn … – Here consuming ghee is explained in two ways.

    • bIr is explained as vaivarNyam (becoming pale) – If there is any residual soil remaining in the stomach, for common men, it leads to becoming pale (due to indigestion etc). So, to avoid that, he is eating butter to dissolve the soil.
    • bIr is explained as “a little” here – emperumAn is consuming butter without leaving behind even a little portion for others.
  • marundhO? – Is that a medicine? No. You are not consuming it as medicine, but you are consuming it since it was touched by cowherd girls who are very dear to you – and you are so mad for your devotees that you cannot sustain yourself without things which are touched by them.

Azhwar had doubt if perumal (emperumAn/ NArAyana) would accept him. Afterall, perumal is fond of something as pure as butter and he is nothing but a poision, embodiment of paap karmas. Perumal reminds Azhwar that he had drunk the poision of Putana too. The poision was too tasty to him as it was offered by Putana exclusively to him alone. He drunk his poison, finished his karmas and when her body was burnt, it smelled like sandalwood.

mAyOm thIya alavalai perumA vanjap pEy vIyath
thUya kuzhaviyAy vidappAl amudhA amudhu seydhitta
mAyan vAnOr thanith thalaivan malarAL maindhan evvuyirkkum
thAyOn thammAn ennammAn ammA mUrththiyaich chArndhE

emperumAn has an amazing nature where he being a pure hearted child, accepted  the poisonous milk of the devil pUthanA (who was having ill-intentions, who was constantly chattering, who was having immeasurable deceitfulness) as nectar to kill her. He is the singular controller of nithyasUris (eternally liberated), who has the enjoyable youth for SrI mahAlakshmi’s pleasure, who has motherly affection towards all beings and who is my master (for not failing me). I approached such emperumAn who has distinct and great form, so both he and I can sustain ourselves.

thiruvAimozhi – 1.5.9 – mAyOm thIya

Just like a cow is fond of the dirt of the calf and cleans her with her tongue, emperuman too cleans our karma. He cleaned Jatayu with his own hairs. Krishna came out with his mouth, hands and in fact his whole body fully smeared with butter. “In the same breath he truthfully mingled with me with my impure, contemptible physical body.”

vaigalum veNNey kai kalandhu uNdAn
poy kalavAdhu en mey kalandhAnE

One who stretched his hands fully (to fetch the butter) and ate the butter, without any deceit, immersed in my body (that is to be rejected). kai kalandhu – also explained as eating butter with both hands.

veNNey kai kalandhu uNdAn – 3 explanations given:

  • Out of great desire for the butter, he accepted the butter in both his hands and consumed that.
  • As explained in siRiya thirumadal “thArAr thadanthOLgaL uLLaLavum kai nItti” (put his hand fully up to his shoulder in the pot to dig out as much butter as possible), emperumAn due to being a small child, considered that his stomach will be filled by fetching as much butter in his hands as possible and ate the same.
  • When he was blamed for stealing butter, he mingled with those who were searching for the thief and at the same time consumed the butter smartly.
  • poy kalavAdhu en mey kalandhAnE – Just like he had true desire for that butter, his bonding with my body is also most truthful – says AzhwAr.
  • en mey – my body – this shows that emperumAn is showing great interest in AzhwAr but AzhwAr is shying away from him. AzhwAr is saying – that which I reject as “azhukkudambu” (dirty body – thiruviruththam 1) is desired greatly by him.

Though he is the sarvesvara, he cannot sustain himself without the items that have connection with his devotee. EmperumAn who is having the supremacy to protect innumerable jeevatmas of all [material] worlds to become subdued in his sankalpa, is having saulabhyam (simplicity) of consuming curd and butter.

thiruvAimozhi – 4.8.11 – uyirinAl kuRaivillA

The all-pervading, omnipotent, the husband of lakshmi is stealing butter, his entire black body has turned white because of being smeared in butter; is caught by Gopikas red-handed (in fact white-handed). Can there be more saulabhyam? Yes. They hand him over to Yashoda. She binds him with rope to the mortar and threatens him “if capable you can release yourself”.

Becoming bewildered after experiencing Bhagwan‘s saulabhyam, AzhwAr faints and stays unconscious for 6 months. Subsequently, he becomes conscious again and starts instructing about his saulabhyam in detail.

paththudai adiyavarkku eLiyavan piRargaLukku ariya viththagan
malar magaL virumbum nam arum peRal adigaL
maththuRu kadai veNNey kaLavinil uravidai AppuNdu
eththiRam uralinOdu iNaindhu irundhu Engiya eLivE

This swAmy (master) of ours is the most difficult to get – yet he was caught while stealing butter which was churned with great effort using the churning staff and he was bound in the chest and was crying out of fear. How is this simplicity possible for him (who is supreme)? His leaps were quivering out of fear.

http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2015/06/thiruvaimozhi-1-3-1-paththudai-adiyavar/

Even, aacharya-nistha Madhur Kavi Azhwar, who sings the glory of his acharya Sadakopa Suri only, sung only once glorifying Krishna for his Damodara leela. Reason was the deep attachment of Sadakopa Suri for this leela.

Kanni  nuN   chiru   thambinaal   kattunna, Panniya  permaayan, yen  appanil ,

Nanni   then kurugur  Nambi   yendrakkal, Annikkum   anuthu oorum    yen Nabukke

My  Lord  who is  the great maayaavi,  allowed   his mother  to   tie him  with  a small knotted  thread and I take   refuge  in the Nammazhvar  of THirukungur which will generate , nectar  like   sweetness  in my toungue.

Kulashekhar Azhwar laments for the durbhagyam of Devaki and feels her pain of not having enjoyed the divine childhood of kutti-kannan (little Krishna) which gopikas enjoyed.

kuzhakanE yenthan kOmaLa piLLaai GOvindhaa yen kudangaiyil manni
ozhugu pErezhil iLanchiRu thaLirpOl orukaiyaaloru mulai mugam nerudaa
mazhalai mennagai yidaiyidai aruLaa vaayilE mulai irukka yen mugatthE
yezhilkoL ninthirukkaNNiNai nOkka thannaiyum izhandhEn izhandhEnE 
Meaning: Oh kind hearted one! Oh my beautiful child! Oh Govinda! when I hold you in my right hand, you skid like a flood of beauty (to my lap), with your tender hand
rubbing the tip of my breast while your mouth is in my other breast and in
between you smile looking at my face. I lost the opportunity of the benefit of
your sacred grace by sending you away immediately after birth.

muzhudhum veNNai aLaindhu thottuNNum
mukizh iLanchiRu thaamaraik kaiyum
yezhilkoL thaambukoNdu adippathaRku yeLkum
nilaiyum veNthayir thOyndha sevvaayum
azhukaiyum anji nOkkum annOkkum
aNikoL senchiRu vaai neLippadhuvum
thozhukaiyum ivai kaNda asOdhai
thollai inbaththin iRudhi kaNdaaLE

The freshly made butter is in the pot; you entered into the room and took the butter out with your small hands; You were caught red handed (white handed); You were found licking your hands after dipping it in that pot of butter; when you were beaten with a rope on your small and soft hand, you were standing with a guilty look; your beautiful red lips were quivering; you were apologizing with folded hands; Yashoda who saw all these expressions from you with her own you took the butter out with Your small hands
eyes realized the Paratvam and enjoyed eternal bliss. Oh She is so most fortunate.

https://www.sadagopan.org/pdfuploads/Perumal%20Thirumozhi.pdf

 

Bhagwad Ramanujacharya in Jagannatha Puri divya dham

Shree Jagannath Temple | Website of Puri District Administration ...

 

prasada

Srimate Ramanujaay Namah

Azhwar Emperumanar Jeeyar Thiruvadigale Sharanam.

Coming across various propaganda stories about Ramanuja being kicked out of Puri divya dhaam by Jaganntha, he having darshan of Chaitanya or going to Mayapur to serve the lotus feet of Chaitanya Mahaprabhu and  perfecting his bhakti from dasya rasa to madhurya rasa.

All these stories are nonsense and really hurts us.

look at this post and they way Ramanuja is presented: Disappearance Anniversary of Srila Ramanujacarya; or this You tube lecture which says Ramanuja was kicked out of Puri – Lecture by H.G. Amarnath Prabhu – Pastimes of Srila Ramanujacarya – 2/17/2016. The ‘Prabhu’ is too loud and apologetically spreading venom. Just notice his devious smile after saying so. (Infact,  It was Pundarika Vidyanidhi who was beaten right ,left and centre by both the brothers Balabhadra and Jagannath.)

Ramanuja mutts have service rights in the Sri Temple till date contrary to the society whose founder’s effigy was burnt by the pujaris of the temple to protest against Ratha yatra being taken out across the world at any arbitrary date.

https://www.indiadivine.org/content/topic/1315608-puri-priests-up-in-arms-against-iskcon-the-whole-thing-stinks-of-hypocrisy/

Ramanuja in Purushottama kshetra Puri

As per the instructions of Ranganatha Swami, Ramanujacharya swami was introducing temple reforms and Pancharatra aagama based worship rituals. He came to Jagannatha Puri. He stayed at Ramanuja Kota at Puri . With his influence , the then King Chodaganga Deva offered him land in front the temple to built his matha. He stayed their for some days. One of his disciple was named as Emabara .
Ramanujacharya established the Embara Matha in front the Jagannatha Temple . He established the Mahalaxmi Temple inside the Jagannatha Temple. He brought many Disciplinary systems in the Temple during that period. He established the process of carrying out various utsavams like dolotsava, chandana, rasa etc with utsava idols who are associated with ubhaya naayikas (Sri devi and Bhu devi). This is one of the particular features of panchartra-aagama based worship.

He furthur wanted to established the worship of Jagannatha, Baladeva, Subhadra moola-vigraha as per vaishnava aagamas. Shakta aagamas were used in those days (administered by Puri peetha Shankaracharya) and is continued till date. The priests in the service of moola vigraha declined to accept this change as it would have meant arrival of vaishnava priests and they loosing their exclusive rights to carry out worship of Jagannatha. Ramanuja invited them for debate next morning.

The King too was favoring Ramanuja. The priests gathered in front of jagannatha and did unconditional sharanagati. Jagannatha mahaprabhu called  Garuda and Ramanuja was transferred to Sri Kurmam (in Andhra Pradesha) while he was in dreams. He accepted it as the will of God and established Vaishnava puja paddhati in Sri Kurmam.

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Pic: Present descendant of the King.

Garuda stambha

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Garuda Stambha is a unique feature of aagama based temples. We don’t see such features in temples of north India. That’s the influence of Ramanuja.

 

Utsava vigraha of Jagannatha swami along with ubhaya naayikas.

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He is Dolo-Govinda. He is one of the two utsava idols of jagannatha swami. Another one is Madana-Mohana (below).

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Utsava murtis are used in various utsavas like vasantotsava, dolotsava, kalyaanotsava etc. Both the utsava vigrahas are with Ubhaya naayikas: Sri devi and Bhu devi. Both enjoys various utsavas in the temple.

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Pic: Madana-mohana with Sri devi (right) and Bhu devi (left).

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Pic: Dolo-Govinda with Sri devi and Bhu devi.

The presence of Utsava murtis, ubhaya naayikas (Sri devi and Bhu devi) and they having Sri Vaishnava urdhva Pundra and various utsavas signifies the influence of Ramanuja in the temple.

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Pic: Ramachandra utsava murti of Jagannatha Mahaprabhu

There are Amavasya Narayana and Madhava too, who are utsavars or Bijaya Pratima.

Paintings of Azhwars in Mahalakshmi sannidhi

Ramanuja established the sannidhi of Mahalakshmi in the Sri Mandir. Due to the restrictions on taking photographs, pics are not available. However, one can himself visit and observe it.

Sri Vaishnava Urdhwa Pundra at the entrace gate of the temple

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Pic: Sri Vaishnava tilak at the top of the temple, below the flag.

Embar mutt and other mutts have service rights in the temple worship rituals.

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Pic: Bhagwat Ramanuja in Embar mutt.

Adiyen Ramanuja dasa

Thirupavai 7

7

The sleep of the gopikas are different from ours. We are sleeping out of ignorance of God. Sleep means being ignorance of the surroundings. We are ignorant of our swarupam of being ‘shesha’ to God. Gopis are sleeping out of knowledge of their swarupa. They are sleeping out of ignorance of the material pleasures and knowledge of their relationship with Krishna.

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।

यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः।।2.69।।

That which is night to all beings, in that the self-controlled man is awake; when all beings are awake, that is night for the Muni (sage) who sees.

People who are following karma, gyAna, or bhakti yOgas to reach srI vaikuntam have to be very careful (so, they are worried) to make sure that they are following all the procedures for the yOgas properly. If they are not followed properly, then they would have to take another birth till they complete properly before they could reach mOksham. But in the case of saraNagatAs (those who have done samAsrayaNam) they have left all the efforts to Narayana himself (through their AchAryan) to take care of getting them to mOksham, so they don’t have any worries whatsoever because they are assured of mOksham – so they sleep with their hands on their chest (no worries).

Out of countless Gopis, 10 Gopis are asleep and didn’t join the goshthi. It’s symbolic and has lot of hidden meanings behind the beautiful story. Had it been a simple story, people would have forgotten it long ago. But, the Acharyas have understood it as quint essence of entire Vedic literature. Ramanuja swami used to chant only Thirupavai while taking alms from 10 doors every day. He used to be so much engrossed in the inner meanings of the prabandham that he came to be known as “Thirupavai Jeeyar”. Out of causeless mercy, our mother Goda gave us the essence of Vedas in form of enjoyable stories.

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kīsu kīsenṛu engum ānaiccāttan | kalandu

pēcina pēccaravam kēṭṭilaiyo? pēy peṇṇe! |

kācum piṛappum kalakalapak kaipērttu |

vāca naṛung kuzhal āycciyar | mattināl

ōsai paḍutta tayir aravam kēṭṭilaiyo?

nāyaka peṇpiḷḷāy! nārāyaṇan mūrtti |

kēśavanai pāḍuvum nī kēṭṭē kiḍattiyō?

tēcam uḍaiyāy! tiravēlōr empāvāy ||

 

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Meanings:

Andal doesn’t get satisfied with waking up just one gopi but wants each and every gopi in thiruayppadi to join their divine experience and hence knocks at each one’s door.  A perfect devotee wants everyone to enjoy the supreme Lord equally as He is the Father of all.  Vedas declare, “Ekaswaadu na bhunjeeta”. A delicious object shouldn’t be enjoyed alone.

Like grandfather loves his grandchild more than his own child; Bhagwaan also loves the devotee of his devotees, more than his own devotee. Thus, we should serve the devotees of devotee of devotee of god. The more we get down, the more loved we are by Bhagwan.

In this pAsurm, pEi pEnnE refers to ‘pEyAzhwAr‘. Pey Azhwar was found in the lily flower in the well of the Adi Kesava Perumal Temple in Mylapore. Here he sung famous “Tirukanden pasuram” (I found the glorious, golden form of the Lord). This pasuram refers to “Kulashekhar azhwar” too. He has sung a lot about glory of Narayan namam.

 

Gopika: Bhranta Balika, Deluded girl, pey penne

Divya Desam: Mylapore

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 kīsu kīsenṛu engum ānaiccāttan:

kīsu kīsenru – screeching of the birds in chorus;

engum– in all directions;

 ānaiccāttan – king-crows (otherwise called valiyan or bharatwaja pakshi);

 

Screeching of the birds/ bharadwaja pakshi in chorus (which sounds like a baby’s sweet talk) in the morning hours.

Ānaiccāttan also refers to Krishna who killed one Yaanai (elephant KuvAlayapeetam) and protected another (GajEndhra).

Goda: Oh!! are you still sleeping?

Deluded girl: is it dawn already? Any proof?

Goda: don’t you hear the bharatwaj pakshi’s sound.

Deluded girl: what if just one bird has waken up and that too probably because of the noise you make?

Goda: not only one but we are able to hear the sound of birds talking amongst themselves everywhere (engum).

 

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Inner Meanings:

It is like enquiring when even the birds are worried to leave their spouses and stay separated how could you sleep while separated from Kṛṣṇa?

Birds talking among themselves represents satsangam. All the bhagwatas are having satsangam, how can you enjoy bhagwada-anubhavam alone and not join us?

मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्।

कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च।।10.9।।

With minds fixed on Me, with lives dedicated to Me, enlightening each other, and always speaking of Me, they derive satisfaction and rejoice.

Bhagwatas spend their time talking about kalyaan gunas and leela of Bhagwaan.

भाग्योदयेन बहुजन्म समर्जितेन। सत्संगमम् च लभते पुरुषो यदा वै।

अज्ञान हेतुकृत मोह मदान्धकारनाशं विधाय हि तदो दयते विवेक । (भागवत-माहात्म्यम् 2.76).

अर्थ: एक जन्म का नही अनन्त जन्मों के भाग्य जब उदय होते है तो हो सत्संग कथा और संतो के प्रवचन सुनने इच्छा हो पाती हो । ये कृपा गुरु और गोविन्द की होती है। जो हमें ऐसे बचन सुनाने और सुनने का मोका मिलता है

जब द्रवहिं दीन दयाल राघव साधू-संगत पाईये| (मानस)

 

 

Pesina pecharavam kettilaiyo ? Pey pennne !

pēcina – talk among themselves;

 pēccaravam – sound of the talk;

 kēṭṭilaiyo?   didn’t (you) hear it?

pēy peṇṇe – deluded girl (well aware of devotion but has forgotten the same); (hey bhrant baalike)

 

Birds go out collecting food whole day and return in evening. In morning, they are talking in pain of forthcoming separation.  Are you not able to hear it? Just like birds are talking in pain of separation, don’t feel separation from kanna? When even the birds are worried to leave their spouses and stay separated how could you sleep while separated from Kṛṣṇa? Get up O Gopi! Lets go to meet kanna.

 

Inner Meaning:

Divya Dampati talking to each other about samsaar bandhan of their kids and planning to get them out of it. ‘pēy peṇṇe’ is Bhagwat bhakta who is deeply lost in Bhagavad-anubhavam and as a result look like a deluded one! Such is the ‘Nirhaituki-kripa’ of Narayana.

If a bhAghavata were to go somewhere from the group of devotees, then these people would talk to each other to reduce their angst about that separation, until that bhAghavata joins back; have you not heard them talking to each other?

 

Kasum pirappum kalakalappa kai perthu, Vasa narunguzhal

kācum – a type of ornament worn specially by cowherd people (achchuthAli);

 piṛappum – another ornament mulaithAli;

kalakalappa: gOpikAs are making noise together when they are churning curd using the churning rods.

 kaipērttu– move their hands back and forth;

vāca naṛung kuzhal – with extremely fragrant hairlocks;

Everyone in Gokula wake up early. They all are churningtogether. Because of exhaustion, their hair locks get undone and that sends sweet fragrance to fill everywhere. The curd in thiruayppadi is so thick that it has to be churned with difficulty and great effort and hence even the hairlocks open up spreading the fragrance everywhere. Their bangles are making sound.

The hands of Gopis of Gokula are bedecked with bangles and other jewellery. They are singing loudly while churning.  They are singing divine names of kanna while churning. Can’t u hear them? Kulasekhar azhwar prostates before the tongue and requests it to drink the names of narayana. The Gopis of Gokula were always singing and immersed in the names of Narayana.

 

Inner meaning:

Ashtakshari, dvayam and charama shloka (which we get from our AchArya during samAshrayaNam) are heard together, and people are realizing their nature of being the properties of Mukunda. The fragrance of rahsya-mantras is making the environment divine. 

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aaychiyar matthinal, Osi paduttha th thayir-aravam kettilaiyo?

āycciyar – the cowherd matrons;

mattināl – with the butter churner;

 ōsai paḍutta – making sound;

tayir aravam – the sound of the curd;

 kēṭṭilaiyo?  – Are (you) not able to hear?

 

The gopis wore bangles, mangalsutra and other ornaments. Milking is easy task as udders of cows are overflowing with milk but churning them is the job of great muscle power. So much butter is contained in the milk that they had to use power to churn the milk. When gopis are churning the milk, their body used to move and their ornaments make sound.

Other than bangles, the curd churning is also making sound.

 

INNER MEANINGS:

Vyas and Acharyas have churned the fragrant Vedas with smrities and Up-Brahmanas and declare Partantriyam and Sheshatvam of Jeevatma. Knowing all this, the chetanas are singing glory of Narayana. Can’t you hear this?

 

Nayaga pennppillaiy ! Narayanan Murthy

nāyaka peṇpiḷḷāy! –  oh! The Leader of all the young girls; (he kanya mani)

 nārāyaṇan mūrtti– Kṛṣṇa, the incarnation of Narayana;

(The gopi inside realized her mistake thinking – while I am a servant of bhagavatas, Andal is now calling me as a leader.  Immediately Andal sings further so that the gopi hurries to join the others.)

We are singing praise of Narayana, who incarnated between us. Such is his Karunyam and you are sleeping?

Narayana means one who is holding us from outside and from inside and invisible to us. Still, he comes down and becomes visible to us. Narayana is within us and we are within Narayana. Another meaning of Narayana is one sleeping in the ocean. One ocean is inside us. Our heart is having dahar-aakasha. The aatma is the serpent-bed and Narayana is sleeping on it. Another ocean is outside us. Narayana is residing in that ocean as all-pervading antaryaami. One ocean is Ksheera-ocean where Narayana is sleeping on Adi-shesha as Sri Vaikunthanatha.

Such Narayana, who is out of our reach, is present in sulabha form as Archa-avtara i.e. Narayana murti (Vatapatrashaayi perumal). If Bhagwaan has made himself so much sulabha, how can you still sleep?

 

Kesavanai p padavvum  nee kette kidathiyo

Kēśavanai: One having beautiful curly hairs, one who killed Keshi.

pādavum – even While (we) sing;

 nī– you

 kēṭṭē kiḍattiyō – even after listening to our song can you lie down like this?

Keshava is a beautiful name of God having lot of meanings. Keshava means one having long beautiful locks of hairs. Let’s go four divine Vrata and enjoy his beauty.

Keshava means slayer of demon Keshi (Keshi-hanta Keshava). The gopi inside is sleeping enjoying the songs of Gopis outside. She knew that if she came out, they would stop singing so she was pretending as if she is still asleep. To give her a jolt, Gopis mention the name ‘Keshava’. Gopi inside stood up in jolt that Krishna is in danger, he is fighting with Keshi. Rama after killing 14,000 army of khar-dushan, returned with wounds over his body. On seeing him, Sita quickly went and hugged Him with love and affection. How can you sleep even after hearing about the fight between Kṛṣṇa and Kesi?

Keshava means father of Brahma and Shiva. Keshava is the only protector of the universe. Such a God has invited us to play with us and you are sleeping?

Kesava is the abhimAna dEvatha for the month of Marghazhi. He is one of the Upa-vyUha Moorthy of Sriman NaarAyaNan. Hence in this month Kesavan has to be worshipped

 

Inner meaning:

Kesi is anything inside us that stops us from doing kainkaryam of God. Krishna kills them and enables us to perform kainkaryam. The Gopi inside would remember Keshi demon and fear any misfortune that may fell on Krishna and get up. A sharanagata would fear of anything that separates him from God and remains alert.

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Desamudaiyai thiravelor empavai.

Dēcam uḍaiyāy – Oh glittering damsel! (Hey Tejaswi!)

 Tira– please open the door;

Amazed by the silence from inside Andal peeps through the window and visualizes the glitter added to the gopi inside on hearing them sing about Kṛṣṇa.  So Andal now requests her to open the door so that they can enjoy her glow fully. o pretty and beautiful girl, o the girl who looks so bright due to thinking about krishNan, please open the door for us to see that beauty and get the same gyAnam about

krishNan, and quickly join us. Open the door and let the flood of your happiness (of thnking about krishNan) hit us.

You are glittering as you are having gyanam of tattva-hita-Purusharth.

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INNER MEANING:

The Gopi inside realized the ‘paratantriyam’ of sharnagata toward fellow Bhagwatas and comes out to perform their kainkarya.

 

Swaapadesham:

The main purpose of Thirupavai is being with the devotees. Being in good company, being in God’s thinking and doing our duty and responsibility.

Andal talks about the full moon, fully grown paddy fields and beautifully blossomed flowers, the sound of chirping birds, the sweet singing of birds etc.  We say thiruppavai is the essence of Vedas then why should Andal sing all these in her divine song?  Nature and poetry always go hand in hand.  Moreover when azhvars sing about nature they see it as bhagavat svaroopam (divine form) or admire the amazing creation of the Lord.  Thirumangai azhvar has extensively sung the beauty of each and every divyadesam he visited as he was not only interested in the Lord who resides there but was greatly attracted by the ambiance of the whole divine place.

 

 Today most of us complain about stress.  From a school kid to an elderly person say “Life is so hectic and filled with stress” Such was not the case with our ancestors why? That’s because they lived with the nature.  They nourished, cherished and enjoyed the nature.  Nowadays we seldom take time to enjoy the cool morning breeze, sounds of birds, the rising sun, beautiful beaches, clear river water, sparkling full moon, the tall green trees etc.  From today let us get determined to stay away from computers, mobiles and social media at least for few hours in a week to preserve, protect, and celebrate nature’s beauty to live a peaceful contended life.

Thirupavai 6

ENGLISH TEXT

puḷḷum cilampina kān  puḷ araiyan kōyil |

veḷḷai viḷi śangin pēr-aravam kēṭṭiḷaiyō ? |

piḷḷāy ezhundirāy | pēymulai nañju uṇḍu |

kaḷḷa cakaṭam kalakku kazhiya  kāl ōcci |

veḷḷattu aravil tuyil amarnda vittinai |

uḷḷatu koṇḍu munivargaḷum yogihaḷum |

meḷḷa ezhundu ari enna pēr aravam  |

uḷḷam puhundu kuḷirndu ēlōr empāvāy ||

 

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TRANSLATION

The birds are also chirping; can’t you hear in the Bird King’s temple the thunderous sounds of the great white conch?

Awake, O Young maiden, ever contemplating in your mind the One who drank the milk of Putana, the One who with a kick destroyed Sakatasura, the One who is the Primal Cause of the whole cosmos, and the One who reclines on the Serpent in the Milky Ocean; the sages and the yogis have just arisen slowly from their yoga, loudly chanting the names of Hari, resounding, let that Name enter our hearts and refresh us.

 

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INTERPRETATIONS:

Vedas don’t teach us to enjoy alone. केवालाघो भवति केवालादि| (Rig-Veda). One who eats alone, eats paapam. Goda being a teacher, taught us to take every bhagwatas along us to enjoy.

Goda goes to the homes of the gopis who were still sleeping and awakes them. Why is  that some Gopis were still sleeping? Were they not sincere or not having love for kanna? It’s not like that.  The mercy of Lord is like intoxication. Like in intoxication different people behave differently, some rolling on ground, some sleeping on streets, some giving deep philosophy; similarly the devotees intoxicated by mercy of Kanna. Goda shows us the devotion of that level to us so that we can assimilate them. Some gopis were so passionate that they reached before, some couldn’t sleep all whole night and some were so overwhelmed that they were not able to move. Sathakop Suri Alwar was in trance for 6 months after remembering the damodar leela. Bhagwan is called ‘Ananta’ as his ‘kalyaan-gunas’ are infinite. Nammalvar says that Devotees while enjoying the glories of lord becomes mad, some start dancing, some crying, some gets into trance. They lose themselves and get immersed in joy.

Another reason why we should always be in company of devotees is that they catch hold of us when we slip. Just like in ganga flow in haridwar, we hold a chain, similary we should always take hold of devotees hands.

Goda invites the Gopikas to join the group. She describes the stages of various levels of devotion so that we can assimilate them. Such is her her karunyam. Gopikas of Dwapar performed the vratam but they didn’t themselves sung about the vratam. Thus, the gopis of sri villiputtur are even greater than gopis of Dwapar-Yuga.

 

puḷḷum – also the birds;

cilampina kān  – are chirping;

 

Andal comes in front of a gopi’s house and tries to wake her up.  The gopi inside is not convinced that it has dawned even though others are awake.  So Andal gives further reasons to prove that it is time to wake up.  Don’t you hear the chirping birds, the thunderous sound of the white conch resounding from the temple of the master of garuda (Vishnu)? Are you going to lose the bhAgyam of hearing that sound that is calling you to go to krishNa?

 

Inner meanings:

The birds are the acharya and bhaktas who have woken up early in the morning, wanting to get dharshan of blackness of krishNa. The sound birds are making signify  his upadesham which wakes us up from ignorance. The sound of conch is ashtakshar maha-mantra. The thunderous sound of conch proclaim that Kanna is Sarv-sheshi (Swami of all) and we his shesha (eternal servent).

 

The inner meaning of the 10 gopikAs woken up in this and the next total 10 pAsurams refers to the gOpikAs waking up 10 AzhwArs. In this pAsruam, the ‘piLLAi’ refers to ‘poigai AzhwAr‘.

 

 

piḷḷāy – (new to bhagavat vishaya) oh young maiden!

ezhundirāy– (quickly) get up;

Since you are new to devotion you think that you can enjoy the Lord alone.  But oh my friend! please get up. It is joy only when we all enjoy together.  Please give us the joy of joining with you and cherishing both – the pranks of Kṛṣṇa and your association.

The gopi inside wondered, “How did you all wake up”? The Hari Nama chanting of devotees resounding everywhere woke us up and gave us a refreshing feeling – says Andal.

 

Inner meanings:

Please discard your childish attitude that the Supreme Lord and You are one and the same and gain true knowledge about Your Master-servant relationship with Him and awaken!

 

pēymulai nañju uṇḍu– drank (along with her soul) the poisoned milk of demoness Putana (Disguised like a mother);

kaḷḷa cakaṭam – the wicked sakatasura; (Asura/Demon who came in the form of a cart)

kalakku kazhiya– lose his form;

kāl ōcci – Raised his divine feet;

Two leela is described here:

  1. Drank the poisoned milk of Putana sucking out her soul. Bhagwaan saved the Braja as the gopa and gopis are alive only to see Krishna. Such kripa is his “aashrit-vatsalya-jaladha’. ‘Putana’ gave ‘visha’ i.e. poision whereas Samsara gives us ‘Vishaya’ (objects of sense-gratification). After Kanna touched Putana, she turned pure and when she was burned, the fragnance was more than even sandalwood. Thus, when we use Vishay with Krishna, we too gets pure and gets Param-padam.
  2. Who destroyed Shakatasura with a kick of his divine feet. Shakatsur was in a ‘sakata’ i.e. cart. The cart represents body. Two wheels are karma I.e. paapam and punyam. Krishna himself kicks the body, eliminates paapam and punyam and gives his foot to the aatman.

Here, Krishna’s feet saved Krishna too. Thus, Krishna’s feet are greater than Krishna himself.

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Inner Meanings:

The girls are talking about Putana and the Shakatasur so that the girl who is sleeping will get jolt thinking about the dangers that came to her krishNa, and so she would wake up.

Kaam and Krodh results from Ahankaar amd Mamkaar which results from Swatantriyam i.e. wrong feeling that we are independent from Krishna is the poison. Acharyas destroy the poison and give right direction to our body (cart) driven by Indriyas.

 

veḷḷattu aravil tuyil amarnda vittinai uḷḷatu koṇḍu munivargaḷum yogigaḷum:

veḷḷattu– In the milky ocean;

aravil – On top of the divine serpent;

tuyil – reclining/resting;

amarnda: deeply thinking about ways of helping and saving us;

vittinai – The supreme Lord who is the creator of the universe;

Our heart filled with the love is ‘milky-ocean’ and the soul is ‘aadi-sheshan’. Bhagwaan comes to reside in this milky ocean and on this serpent bed living his eternal abode.

 

munivargaḷum – one who meditate (on the almighty);

yogigaḷum – Those who do service (kainkarya) as effect of their yoga;

 

The munis and yogis the two types of devotees-

  1. Munis: one who is always immersed in devotion and
  2. Yogis: those who take part in services due to their deep devotion.

Devotees place in their hearts the Lord – the universal Creator who reclines on the divine serpent bed in the milky ocean, who descended as Kṛṣṇa.

 

meḷḷa ezhundu ari enna pēr aravam:

uḷḷatu koṇḍu- place the Lord in their hearts;

meḷḷa ezhundu- get up slowly (without disturbing the supreme Lord inside)

ari enna- The divine name Hari: hari:

pēr aravam – Loud chanting resounding;

Get up slowly (not disturbing the Lord inside) and chant the Hari Nama loudly. It is practice to chant

  1. Keshava during journey.
  2. Govinda during eating.
  3. Madhava while sleeping.
  4. Hari after waking up.

 

uḷḷam puhundu kuḷirndu

uḷḷam puhundu- entered our hearts;

kuḷirndu-  and refreshed;

That sound entered our hearts and refreshed us; So you also wake up and join our divine group. The Munis and Yogis were chanting, “Hari-Hari”. Those divine sounds enters our heart and refreshes us.

“Harih Harati papaani, dusht chittaiva vismritah|

anichchhaya hi sprishya, dahati eva paavakah||”.

As we are feeling so much viraha tApam (missing krishNa), the sound of hari nAama went into our minds and hearts and helped us cool it down

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LESSON FOR THE DAY

A good meal when enjoyed with friends and relatives gives greater joy than eating the same alone.  That is why Andal not wanting to enjoy the divine qualities of the almighty alone knocks at the door of each gopi and wakes her up to join in the divine experience from the 6th to 15th paasuram.

Andal in these verses reveals a divine secret.  Service to devotees is considered superior than service to God.  We are all the supreme Lord’s children.  A mother would want all the children to enjoy equally.  So when all of them join hands and entertain the mother she will be most delighted.

So experiencing and enjoying the divine qualities of the Lord in groups with like-minded devotees gives happiness to both the devotees and the Lord Himself.

In the verse Goda prays to the 5 forms of Narayana:

  1. “Vitthinai”: Para VasudEva at Sri Vaikuntam
  2. veḷḷattu aravil tuyil: VyUham at Milky Ocean
  3. kalakku kazhiya kal ochchi: Vibhav form (Krishna).
  4. araiyan kōyil: Archa form
  5. uḷḷatu koṇḍu: Antaryaami form.

 

तिरुपावै 6

श्री गोदाम्बाजी ने पिछले ५ पाशुरों में व्रत की अवतारिका को बताया है और आगे १० गाथाओँ में सखियों को जगाती है

पुल्लम् सिलम्बिनकान् पुल्लरैयन् कोयिलिल्| वेल्लै विलिसन्गिन् पेररवम् केत्तिलैयो||

पिल्लाय एऴुन्दिराय पेय्मुलै नन्ञुण्डु| कल्ल च्चगडम् कलक्कऴिय क्कालोच्चि ||

वेल्लत्तरविल् तुयिल् अमरन्द वित्तिनै| उल्लत्तु कोन्दु मुनिवर्गलुम् योगिगलुम्||

मेल्ल एऴुन्दरि एन्ऱ पेर् अरवम् | उल्लम् पुगुन्दु कुलिन्देलोर एम्पाय्||

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पक्षी भी चहक रहे हैं; क्या तुम मंदिर में महान शंख की प्रचण्ड ध्वनि नहीं सुन सकते?

जागो, हे युवा गोपी, अपने मन में यह विचार करना कि जिसने पुतना का दूध पिया है, जिसने पैरों के ठोकर से शकटासुर का संहार किया, वह जो पूरे ब्रह्मांड का निमित्त और उपादान कारण है, और वह जो क्षीरसागर में आदि-शेष पर शयन करते हैं; ऋषि और योगी अपने योग से धीरे-धीरे बाहर आ चुके हैं, जोर-जोर से हरि नाम का जाप करते हुए, उन नामों को हमारे दिलों में प्रवेश प्रवेश कर हमें तरोताज़ा करने दो।

वेद हमें अकेले आनंद लेना नहीं सिखाते हैं। केवालाघो भवति केवालादि (रिग-वेद)। जो अकेला खाता है, वह पाप खाता है। गोदा एक शिक्षिका होने के नाते, हमें भागवतों के संग आनंद लेने के लिए सिखाती हैं।

गोदा उन गोपियों के घर जाती है जो अभी तक सो रही थीं और उन्हें जगाती हैं। ऐसा क्यों है कि कुछ गोपियाँ अभी भी सो रही थीं? क्या वे निष्ठावान नहीं थे या कृष्ण के प्रति प्रेम नहीं रखते थे? ऐसा नहीं है। प्रभु की कृपा नशे की तरह है। जैसे नशा में अलग-अलग लोग अलग-अलग व्यवहार करते हैं, कुछ जमीन पर लुढ़कते हैं, कुछ सड़कों पर सोते हैं, कुछ गहरे दर्शन देते हैं; इसी तरह भक्त भी जिनपे भगवत-कृपा से भगवद-अनुभव में मंत्रमुग्ध होते हैं। गोदा हमें उस स्तर की भक्ति दिखाती हैं, ताकि हम उन्हें आत्मसात कर सकें। कुछ गोपियां इतनी भावुक थीं कि वे समय से पहले पहुंच गईं, कुछ पूरी रात सो नहीं पाईं और कुछ ऐसी भाव-समाधि में थीं कि वे हिल भी नहीं पा रही थीं। ठीक वैसे हीं जैसे दामोदर लीला को याद करने के उपरान्त, 6 महीने तक सठकोप सूरी आलवार मूर्छित रहे थे। भगवान को ‘अनंत’ कहा जाता है क्योंकि उनके ‘कल्याण-गुण’ अनंत हैं। सठकोप सूरी आलवार (नम्मालवार) का कहना है कि भगवान की महिमा का आनंद लेते हुए भक्त पागल हो जाते हैं, कुछ नाचने लगते हैं, कुछ रोने लगते हैं, कुछ भाव-समाधि में पहुंच जाते हैं। वे खुद को खो देते हैं और आनंद में डूब जाते हैं।

एक और कारण कि हमें हमेशा भक्तों की संगति में रहना चाहिए| जब हम फिसलते हैं तो वे हमें पकड़ लेते हैं। जैसे हरिद्वार में गंगा का प्रवाह तीव्र और अति-शीतल होता है, इसकारण हम एक जंजीर पकड़ कर स्नान करते हैं| वैसे ही ठगिनी माया दे बचने के लिए हमें हमेशा भक्तों का हाथ पकड़े रहना चाहिए। भगवान बढ़े तालाब की तरह है, जैसे बढ़े तालाब में एक दो व्यक्ति सधैर्य उत्तर नहीं सकते, उसी तरह भगदनुभव करने के लिए बहुत लोग मिलकर एकत्रित होते है ।

गोदा समूह में शामिल होने के लिए गोपीयों को आमंत्रित करती हैं। वह भक्ति के विभिन्न स्तरों के अवस्थाओं का वर्णन करती है ताकि हम उन्हें आत्मसात कर सकें। ऐसी करुणा है उनकी। द्वापर के गोपीओं ने व्रत किया लेकिन उन्होंने व्रत के बारे में स्वयं नहीं गाया। इस प्रकार द्वापर-युग की गोपियों की तुलना में श्री श्रीविल्लिपुत्तुर की गोपियाँ और भी श्रेष्ठ हैं।

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पुल्लम् सिलम्बिनकान् पुल्लरैयन् कोयिलिल् वेल्लै विलिसन्गिन् पेररवम् केत्तिलैयो

पुल्लम् – पक्षी भी;

सिलम्बिनकान् – चहक रहे हैं;

पुल्लरैयन् कोयिलिल्- पक्षियों के राजा (गरुड़) के गुरु के मंदिर में;

वेल्लै विलिसन्गिन् – सफेद शंख हर किसी का ध्यान आकर्षित करने में सक्षम;

पेररवम् – वज्र ध्वनि;

केत्तिलैयो? – क्या तुम नहीं सुन पा रहे हो?

 

 

गोदा एक गोपी के घर के सामने आती हैं और उसे जगाने की कोशिश करती हैं। अंदर शयन कर रही गोपी को यकीन नहीं है कि प्रातःकाल हो चूका है,  भले ही अन्य लोग जाग रहे हों। इसलिए गोदा यह साबित करने के लिए तर्क देती हैं कि यह जागने का समय है। क्या तुम पक्षियों की चहक नहीं सुन रही हो, गरुड़ के स्वामी (विष्णु) के मंदिर से सफ़ेद शंख की गूंजती ध्वनि नहीं सुन रही हो? क्या तुम उस आवाज़ को सुनने का भाग्य को खोने जा रही हो जो तुम्हें कृष्ण के पास जाने के लिए बुला रही है?

 

आतंरिक अर्थ:

पक्षी आचार्य और भक्त हैं, जो सुबह जल्दी उठे हैं, कृष्ण के कालेपन के दर्शन प्राप्त करने की इच्छा से। पक्षी की ध्वनि उनके उपदेश का संकेत दे रहे हैं जो हमें अज्ञानता रूपी निद्रा से जगाता है। शंख की ध्वनि अष्टाक्षर महामंत्र है। शंख की प्रचंड ध्वनि यह घोषणा करती है कि कृष्ण सर्व-शेषी (सभी का स्वामी) है और हम उसका शेष (अनन्त सर्व) हैं।

 

अगले 10 पासुरों में 10 गोपीयों का आंतरिक अर्थ 10 आलवारों को जगाने का है। इस श्लोक में पोइगई आलवार को जगाने का भाव है।

 

पिल्लाय एऴुन्दिराय

पिल्लाय :(भगवत-विषय में नयी) हे युवा गोपी!

एऴुन्दिराय – (जल्दी से) उठो;

चूंकि तुम भक्ति में नयी हो इसलिए सोचती हो कि तुम अकेले भगवान का आनंद ले सकती हो। लेकिन ओह मेरी सखी! कृपया उठो! यह आनंद तभी है जब हम सभी एक साथ आनंद लेते हैं। कृपया हमें आप के साथ जुड़ने और दोनों के लुत्फ़ उठाने का आनंद दें – कृष्ण का नटखटपन और आपकी संगति।

अंदर गोपी को आश्चर्य हुआ, “तुम सब कैसे जाग गए”? हर जगह गूंजते भक्तों के हरि नाम जप ने हमें जगा दिया और हमें एक ताजगी भरा अहसास दिलाया – बाहर की गोपियाँ कहती हैं।

 

भीतरी अर्थ:

कृपया अपने बचकाने रवैये को त्याग दें कि परमपिता परमात्मा और आप एक ही हैं और अपने सेवक-स्वामी संबंध के बारे में सच्चा ज्ञान प्राप्त करें और उसके प्रति जागृत हों!

 

पेय्मुलै नन्ञुण्डु कल्ल च्चगडम् कलक्कऴिय क्कालोच्चि

पेय्मुलै नन्ञुण्डु: पिया (उसकी आत्मा के साथ) दानव पुताना का जहरीला दूध (मां की तरह प्रच्छन्न);

कल्ल च्चगडम् : दुष्ट शकटासुर; (असुर/दानव जो गाड़ी के रूप में आया था)

कलक्कऴिय: अपना रूप खोना;

क्कालोच्चि:  अपने दिव्य पैरों को उठाया;

दो लीला यहाँ वर्णित है:

  1. पुतना के जहरीले दूध को पीकर उसकी आत्मा को खिंच लिया। भगवान कृष्ण के पैरों ने स्वयं कृष्ण को भी बचा लिया। इस प्रकार, भगवान के पैर स्वयं उनसे भी बड़े हैं। भगवन ने अपनी रक्षा कर समस्त ब्रज को बचाया क्योंकि गोप और गोपियाँ केवल कृष्ण को देखने के लिए ही जीवित हैं। भगवान की ऐसी कृपा “आश्रित-वात्सल्य-जलध” है। जब कन्हैया ने पूतना को छुआ, तब वह शुद्ध हो गयी और जब उसे जलाया गया तो चंदन की लकड़ी से भी अधिक सुगंध फैला।

पूतना ने ‘विष’ दिया, जबकि संसार हमें ‘विषय’ (इन्द्रिय-भोग की वस्तु) देता है। इस प्रकार, जब हम कृष्ण से संबंध जोड़कर विषय का उपयोग करते हैं, तो हम भी शुद्ध हो जाते हैं और परम-पदम प्राप्त करते हैं।

  1. जिसने अपने दिव्य पैरों की एक लात से शकटासुर को नष्ट कर दिया। शकटासुर एक ‘शकट’ यानी गाड़ी में था। गाड़ी शरीर का प्रतिनिधित्व करती है। दो पहिये कर्म हैं : पाप और पुण्य। कृष्ण स्वयं शरीर-बंधन को तोड़ देते हैं (अहैतुकी कृपा), पाप और पुण्य को नष्ट करते हैं और अपने अपने दिव्य चरण आत्मा को प्रदान करते हैं।

 

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आंतरिक अर्थ:

लड़कियां पुतना और शकटासुर की चर्चा कर रही हैं ताकि निद्रा त्यागने में असमर्थ गोपी को अपने कृष्ण के लिए आने वाले खतरों के बारे में सोचकर झटका लगे और वह जाग जाए।

काम और क्रोध का परिणाम अहंकार और ममकार से होता है, जिसका परिणाम होता है : ‘स्वातंत्रियम्’ अर्थात् गलत भावना कि हम कृष्ण से स्वतंत्र हैं| आत्मा के लिए यही विष है। आचार्य जहर को नष्ट करते हैं और इंद्रियों द्वारा संचालित हमारे शरीर (शकट) को सही दिशा देते हैं।

 

वेल्लत्तरविल् तुयिल् अमरन्द वित्तिनै

वेल्लत्त्क्षीरसागर में;

अरविल्दिव्य नाग के ऊपर;

तुयिल्शयन करते हुए;

अमरन्द: मदद करने और हमारी रक्षा करने के तरीकों के बारे में गहराई से चिंतन करते हुए;

वित्तिनै: सर्वोच्च भगवान जो ब्रह्मांड का निर्माता है;

प्रेम से आप्लावित हमारा दिल क्षीरसागर है और शरणागत आत्मा ‘आदि-शेष’ है। भागवान इस क्षीरसागर में निवास करने के लिए आते हैं और इस आत्मा रूपी विस्तर को अपना सनातन निवास बनाते हैं।

 

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उल्लत्तु कोन्दु मुनिवर्गलुम् योगिगलुम्

उल्लत्तु कोन्दु: ह्रदय में भगवान को धारण किये हुए

मुनिवर्गलुम्ध्यान करने वाला (सर्वशक्तिमान पर);

योगिगलुम्जो सेवा (कैंकर्य) करते हैं;

 

मुनि और योगी दो प्रकार के भक्त हैं-

  1. मुनि: वह जो हमेशा भक्ति में डूबा रहता है और
  2. योगी: जो अपनी गहरी भक्ति के कारण सेवाओं में भाग लेते हैं।

 

मेल्ल एऴुन्दरि एन्ऱ पेर् अरवम्

मेल्ल एऴुन्द: धीरे-धीरे उठें (बिना परम प्रभु को परेशान किए)

अरि एन्ऱ: दिव्य नाम (हरि: हरि: )

पेर् अरवम्: जोर से नाम-संकीर्तन;

 

नाम-संकीर्तन की निम्न परंपरा है:

  1. यात्रा के दौरान केशव।
  2. खाने के दौरान गोविंदा।
  3. सोते समय माधव।
  4. जागने के बाद हरि।

 

उल्लम् पुगुन्दु: हमारे दिल में प्रवेश किया;

कुलिन्दे:- और ताज़ा;

एलोर एम्पाय्

हरिनाम संकीर्तन हमारे दिल में उतर कर कृष्ण से विरह के हमारे ताप को ठंढा कर रही है| इसलिए तुम भी जागो और हमारे दिव्य-समूह में शामिल हो|

हरिः हरति पापानिदुष्टचित्तैरपिस्मृतः

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स्वापदेश

एक अच्छा भोजन जब मित्रों और रिश्तेदारों के साथ आनंद लिया जाता है तो अकेले खाने की तुलना में अधिक खुशी मिलती है। यही कारण है कि गोदा अकेले सर्वशक्तिमान के दिव्य गुणों का आनंद नहीं लेना चाहती हैं, प्रत्येक गोपी के द्वार पर दस्तक देती हैं और उन्हें (6 से 15 वें श्लोक तक) के दिव्य अनुभव में शामिल होने के लिए जगाती है।

इन श्लोकों में गोदा एक दिव्य रहस्य को प्रकट करती हैं। भक्तों की सेवा भगवान की सेवा से बेहतर मानी जाती है। हम सभी सर्वोच्च प्रभु के संतान हैं। एक माँ चाहती है कि सभी बच्चे समान रूप से आनंद लें। इसलिए जब वे सभी हाथ मिलाएंगे और मां का मनोरंजन करेंगे तो वह सबसे ज्यादा खुश होंगी।

समान विचार वाले भक्तों के साथ समूहों में, प्रभु के दिव्य गुणों के अनुभव का आनंद लेना, भक्तों और भगवान दोनों को खुशी देता है।

प्रभात होने के तीन लक्षण बताये जाते है-
१.पक्षियों का कलकल निनाद
२.पक्षीराज मंदिर की शंख ध्वनि
३.योगियों का हरिनामोच्चारण
यहां पर सखी को बताया गया की सुबह हो गयी है पक्षी कोलाहल कर रहे है ।श्रीवैष्णव सुबह सभी मिलकर भगवान का नाम स्मरण कर रहे है । पक्षी के दो पंख होते है वैसे ही श्रीवैष्णव के लिए ज्ञान और अनुष्ठान रूपी दो पंख है । इन दोनों के रहने से मात्र सद्गति पा सकेगा ।
आचार्य भी इसी तरह रजस्तमगुणों से पूर्ण संसारी जीवात्त्माओं पर कृपा करके उन्हें इस विषयभोग रूपी नीन्द से उठाकर भगवान के सन्मुख करते है ।
आचार्य के श्री चरणों से संबंधित होनेवाला जीव गर्भगति, याम्यगति, धूमादीगति जैसे दूखी मार्गों को छोड़कर अर्चिरादीगति मार्ग द्वारा परमपद में सेवा का अधिकारी बना दिया जाता है ।
👉गर्भगति – शरीर छुड़ते ही दूसरे गर्भ में प्रवेश करना ।
👉याम्यगति – शरीर छुड़ते ही नरक में प्रवेश करना ।
👉धुमादिगति – शरीर छुड़ते ही स्वर्ग में प्रवेश करना ।
👉 अर्चिरादीगति – शरीर छुड़ते ही भगवान के धाम वैकुण्ठ में प्रवेश करना ।
शास्त्र बताता है की मीठी चीज का अनुभव अकेले नहीं करना किन्तु दूसरों से मिलकर उसका सेवन करना चाहिये । इस व्रत में भगवान का अनुभव मीठी चीज है, इसका अनुभव करने गोदम्बाजी सभी सखियों को जगाते हुए साथ मे बुलाती हुयी आगे बढती है ।
हमें जब कभी भी भगवान के दर्शन करने जाना है तो भागवतों के पुरुषकार से उनके साथ जाना चाहिये । अकेले नहीं जाना चाहिये । जैसे श्रीविभीषणजी ने भगवान के सन्निधि में जाने से पहिले सुग्रीव आदि पार्षदों का पुरुषकार माँगा । भगवान और भक्तों के मिलाप में दोनों तरफ सिफारिश करनेवाले भागवतों की आवश्यकता होती है ।

श्री गोदा रंगनाथ भगवान का मंगल हो

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