10. सदाचार्य-लक्षण

नाथमुनि, यामुनाचार्य, यतिवर (रामानुज), कूरनाथ, केशव, भट्टारक, लोकगुरु, वरवरमुनि आदि आचार्यों के वचनों और उनके अनुष्ठानों का अनुसरण करने वाला;

‘मयर्वर मदि नलम्’ प्राप्त आलवारों के दिव्यप्रबन्धों का, तथा उनके अर्थ का विस्तार करने वाले श्रीवचनभूषण आदि समस्त रहस्यग्रन्थों का अध्ययन करने वाला;

संसारी जीवों के उद्धार के लिए विधि की गई मर्यादाओं का उल्लंघन न करने वाला;

वेद और शास्त्र के विरुद्ध दुराचारों का भली-भाँति परित्याग करने वाला;

दयाभाव से शिष्यों और पुत्रों के उद्धार के लिए तथा लोकसंग्रह के लिए, शास्त्रविहित कर्मों में, जिन्हें श्रेष्ठ पुरुषों ने ग्रहण किया है, उपायबुद्धि महापातक का वासना सहित त्याग  करके, केवल यथोचित रूप से उनका आचरण करने वाला;

अपने को आचार्यपरतन्त्र मानने वाला; शिष्य को सहब्रह्मचारी (अपने आचार्य का शिष्य) मानने वाला;

उपदेश का फल मङ्गलाशासन के योग्य बनना और मङ्गलाशासन का अधिकारी बनना—ऐसी बुद्धि रखने वाला;

जब उसके द्वारा सुधारा हुआ सच्छिष्य अपना सर्वस्व “यह सब आचार्य का है” ऐसा मानकर समर्पित करके निर्भर हो जाता है,

तब आचार्य उस सबका निरीक्षण करके, आवश्यकता के अनुसार उसे ही लौटा देता है। “तुम्हारी आत्मा और आत्मीय जो कुछ भी है, वह सब आचार्य के अधीन हो जाने के बाद, उसका यथोचित उपयोग भगवान्, भागवतों तथा अपनी देहयात्रा में करो”—ऐसा नियम करता है।

आचार्य की आज्ञा के अनुसार, भगवान् और भागवतों के विषय में तथा अपनी देहयात्रा में उसका यथोचित विनियोग करता हुआ,

अपने विषय में प्रार्थना करता है—

எனதாவி யார் யான் ஆர் தந்த நீ கொண்டாக்கினையே        (एनदु आवि यार्? यान् आर्? तन्त नी कोण्डाक्किनैय)

हिन्दी – “मेरी आत्मा क्या है? मैं कौन हूँ? आपने ही मुझे अपना बना लिया है।”

इस प्रकार निर्मम होकर, अपने लिए किसी भी वस्तु को स्वीकार नहीं करता। जब कोई वस्तु उसके लिए अर्पित की जाती है, तब उसे अपने लिए ग्रहण नहीं करता; अपितु उसे भगवान्, भागवतों और आचार्य के विषय में विनियोजित करता है।

ऋतामृताभ्यां जीवेत प्रपन्नो यावदायुषम्। (मनु स्मृति)

हिन्दी – “प्रपन्न पुरुष जीवनभर ऋत और अमृत—इन दोनों के द्वारा जीवन-निर्वाह करे।”

(ऋत (खेतों से गिरे अन्न चुनना) और अमृत (बिना मांगे जो मिल जाए) के द्वारा।)

ऋतमुच्छशीलं ज्ञेयम् अमृतं स्यादयाचितम्। (मनु स्मृति)

(ऋतमुञ्छशिलं ज्ञेयममृतं स्यादयाचितम्। मृतं तु याचितं भैक्षं प्रमृतं कर्षणं स्मृतम् ॥

सत्यानृतं तु वाणिज्यं तेन चैव हि जीव्यते। सेवा श्ववृत्तिराख्याता तस्मात्तां परिवर्जयेत् ॥)

हिन्दी – “उच्छवृत्ति और शीलवृत्ति को ‘ऋत’ जानना चाहिए; और बिना याचना के प्राप्त होने वाला ‘अमृत’ कहलाता है।”

उच्छवृत्ति, शीलवृत्ति तथा बिना माँगे सत्त्वनिष्ठ, परमशुद्ध पुरुषों द्वारा अर्पित द्रव्य से अपनी देहयात्रा चलाता है।

  • शिष्य के प्रति कृपा रखता है।
  • अपने आचार्य के प्रति परतन्त्रता रखता है।
  • अपनी देहयात्रा के प्रति विरक्ति रखता है।
  • अहंकार, अर्थ और काम से अभिभूत नहीं होता।
  • लोक के प्रति अनुग्रहभाव रखता है।
  • यदि प्रकृतिवासना के कारण शिष्य में कोई च्युतिः (स्खलन) भी आ जाए, तो उसके लिए दुःखी होकर, उसे उसके स्वरूप के अनुरूप सुधारता है और उसका त्याग नहीं करता; उसके स्वरूप को ही लक्ष्य करके चलता है।

ऐसा पुरुष ही आचार्य है।

9. असद्-आचार्य-लक्षण

इस प्रकार जो ज्ञान और अनुष्ठान से सम्पन्न है, वही सदाचार्य कहलाने योग्य है।

ज्ञानहीन व्यक्ति केवल ब्राह्मणत्व-उपाधि वाला है।

अनुष्ठानहीन व्यक्ति केवल पण्डितत्व-उपाधि वाला है।

जब दोनों ही हों, तभी वह स्वयं भी और उससे सम्बद्ध व्यक्ति भी पार पहुँचते हैं।

उभाभ्यामेव पक्षाभ्याम् यथा खे पक्षिणां गतिः।
तथैव ज्ञानकर्मभ्यां प्राप्यते भगवान् हरिः॥

हिन्दी – “जैसे पक्षी दोनों पंखों से ही आकाश में गति करता है, वैसे ही ज्ञान और कर्म—दोनों के द्वारा भगवान् हरि की प्राप्ति होती है।”

  • त्यज धर्ममधर्मं च ।
  • उपायापायनिर्मुक्तो मध्यमां स्थितिमास्थितः।
  • उपायापायसंयोगे निष्ठा हीयतेऽनया॥ (लक्ष्मी तन्त्र)

हिन्दी

“धर्म और अधर्म—दोनों का त्याग करो। उपाय और अपाय से रहित होकर मध्य स्थिति में स्थित रहो। उपाय और अपाय के संयोग से यह निष्ठा नष्ट हो जाती है।”

शरणागत मुमुक्षु के लिए विधि और निषेध—दोनों ही त्याज्य हैं।

रजस् और तमस् से विक्षिप्त होकर—

यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च।
अयथावत् प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी॥ (गीता 18.31)

हिन्दी -“जिस बुद्धि से धर्म और अधर्म, कर्तव्य और अकर्तव्य को यथार्थ रूप में नहीं जाना जाता, वह राजसी बुद्धि है।”

और—

अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता।
सर्वार्थान् विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी॥ (गीता 18.31)

हिन्दी -“जो तमोगुण से आवृत होकर अधर्म को ही धर्म समझती है और सब वस्तुओं को विपरीत रूप से ग्रहण करती है, वह तामसी बुद्धि है।”

जो व्यक्ति वस्तुओं को यथार्थ रूप में निरूपित नहीं करता, अपितु विपरीत आचरण में प्रवृत्त रहता है, और उसी का दूसरों को भी उपदेश देता है—

श्रुतिस्मृती ममैवाज्ञा यस्तामुल्लङ्घ्य वर्तते ।
आज्ञाच्छेदी मम द्रोही मद्भक्तोऽपि न वैष्णवः ॥ (विष्णुधर्मपुराण, 76.31)

हिन्दी – “श्रुति और स्मृति मेरी ही आज्ञा हैं। जो उनका उल्लंघन करके आचरण करता है, वह मेरी आज्ञा का भंग करने वाला, मेरा द्रोही है; वह मेरा भक्त होने पर भी वैष्णव नहीं है।”

प्रियाय मम विष्णोश्च देवदेवस्य शार्ङ्गिणः ।
मनीषी वैदिकाचारं मनसापि न लङ्घयेत् ॥ (लक्ष्मी तन्त्र 17.95)

हिन्दी – “जो मेरे तथा शार्ङ्गधन्वा भगवान् विष्णु का प्रिय होना चाहता है, वह बुद्धिमान् पुरुष मन से भी वैदिक आचार का उल्लंघन न करे।”

यथा हि वल्लभे भूः राज्ञो नदीं राज्ञा प्रवर्तिताम् ।
लोकोपयोगिनीं रम्यां बहुसस्यविवर्धिनीम् ॥
लङ्घयन् बालमारोहेदनपेक्षोऽपि तां प्रति ।
एवं विलङ्घयन्मर्त्यो मर्यादां वेदनिर्मिताम् ।
प्रियोऽपि न प्रियोऽसौ मे मदाज्ञाव्यतिवर्तनात् ॥ (लक्ष्मी तन्त्र 17.96-98)

हिन्दी -“जिस प्रकार राजा द्वारा प्रवाहित, लोकोपयोगी, रमणीय तथा अन्न-वृद्धिकारिणी नदी को जो कोई लाँघता है, वह दण्ड का भागी होता है; उसी प्रकार जो मनुष्य वेद-निर्मित मर्यादा का उल्लंघन करता है, वह मेरा प्रिय होने पर भी, मेरी आज्ञा का उल्लंघन करने के कारण मुझे प्रिय नहीं रहता।”

इसी प्रकार भगवान् की आज्ञारूप वैदिक मर्यादाओं का उल्लंघन करके, उनके विपरीत दुष्प्रवृत्तियों के कारण भगवान् को अप्रिय होकर, स्वयं भी नष्ट होता है।

और जो शिष्य उसके आश्रित हैं, उन्हें भी नष्ट करता है।

और जो लोग उसे देखकर उसका अनुकरण करते हैं, उनमें से कुछ उसका अनुसरण करके और कुछ उसकी उपेक्षा करके नष्ट हो जाते हैं।

इस प्रकार स्वयं अपथ में प्रवृत्त होकर, अपने को आचार्य मानकर, यश, लाभ और पूजा की इच्छा से, विपरीत आचरण वाले शिष्यों को एकत्र करके, उनके दुरभिमान-दूषित द्रव्य को ग्रहण करके, उसी से अपनी देहयात्रा चलाने वाला—

वह आचार्य नहीं है।

अपितु—

8. सहवास-नियति एवं अनुवर्तन-नियति

सहवास-नियति यह है—

जो देहात्माभिमान आदि से युक्त हों, देवतान्तर-परायण हों, अन्य प्रयोजनों के परायण हों, अन्य साधनों के परायण हों, अपने को स्वतन्त्र मानते हों—ऐसे प्रतिकूल व्यक्तियों को देखकर, जैसे सर्प और अग्नि को देखकर मनुष्य निकट जाने से भय करता है, वैसे ही भय करके उनसे दूर रहना; और जिन परमार्थनिष्ठ पुरुषों के साथ रहने से ज्ञान और अनुष्ठान दृढ़तापूर्वक स्थापित हो सके, उन्हीं के साथ सहवास करना।

अनुवर्तन-नियति यह है—

धनार्जन आदि के लिए राजद्वारों पर उपस्थित होकर संसारी लोगों का अनुवर्तन करते हुए न फिरना।

दृष्ट (फल) कर्म के अधीन होने के कारण उसकी ओर आकृष्ट न होकर, सदाचार्य के अनुवर्तन में स्थित रहना चाहिए।

7. आश्रयदुष्ट पदार्थ एवं निमित्तदुष्ट पदार्थ

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आश्रयदुष्ट वे हैं—

जो अभिशस्त (बहिष्कृत/गर्हित), पतित, चाण्डाल तथा अभिमान-दूषित व्यक्तियों के संसर्ग से प्राप्त हुए हों। (दोषयुक्त बर्तनों में पकाए गए हों)

निमित्तदुष्ट वे हैं—

जो केश, उच्छिष्ट तथा अपवित्र स्पर्श आदि (कुत्ते या बिल्ली की दृष्टि पड़ी हो, कटा नाखून, कीड़े, भूमि पर पतित) से दूषित हो गए हों। (बर्तन में निकाला हुआ नारियल जल, २ घंटे से अधिक काल से पश्चात फलों का रस आदि भी)

इन तीनों का परित्याग करना ही आहार-नियति है।

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6. आहार-नियति

विलक्षण-मोक्षाधिकारी-निर्णय

आहार-नियति का स्वरूप यह है—

जो जाति-दूषित, आश्रय-दूषित तथा निमित्त-दूषित आहारों का परित्याग करके, पवित्र, विशिष्ट रूप से ग्राह्य (पूर्वाचार्यों ने जिसे ग्रहण किया है) तथा शुद्ध भगवत् एवं भागवत-शेष रूप आहार ( भाण्ड-शेष या उच्छिष्ट; भागवत-कर-स्पर्श से युक्त) को ही ग्रहण करता है—वही आहार-नियति का पालन करने वाला कहा जाता है।

जाति-दूषित पदार्थ वे हैं—

लशुनं मद्यं मांसानि मूलकं गृञ्जनं तथा । तिलपिष्टं तथा शिग्रुं बिल्वं कोशातकीं तथा ॥

अलाबुं श्वेतवार्ताकं विष्णीकं तथैव च । एवमादीनि ये भक्ष्याणि शास्त्रदुष्टानि ते नराः ॥

खादन्ति ते नरा यान्ति विट्कृमिकीटभोजनम् ॥

लहसुन, मद्य (मादक पेय), मांस, मूली, गृञ्जन (प्याज़), तिल का पिष्ट (तिल से बना विशेष खाद्य), शिग्रु (सहजन/मुनगा), बिल्व (बेल), कोशातकी (एक प्रकार की लता का फल), अलाबु (लौकी), श्वेत वार्ताक (सफेद बैंगन), विष्णीका तथा इसी प्रकार के अन्य पदार्थ—ये सब शास्त्रों द्वारा निषिद्ध (दूषित) भक्ष्य माने गए हैं।

जो लोग इन शास्त्र-वर्जित पदार्थों का सेवन करते हैं, वे शास्त्र-विहित आचार का उल्लंघन करते हैं और उसके अनुसार पाप के भागी बनते हैं। जो मनुष्य इन निषिद्ध पदार्थों का भक्षण करते हैं, वे मृत्यु के पश्चात् ऐसी अधम गति को प्राप्त होते हैं जहाँ वे विष्ठा में रहने वाले कृमियों (कीड़ों) का आहार बनते हैं।

इन को त्याज्य कहा गया है; अर्थात् ये निषिद्ध द्रव्य हैं।

किन्तु आचारप्रधान भगवान् के विषय में: “न मांसं राघवो भुङ्क्ते न चापि मधु सेवते।”

हिन्दी:
“राघव न मांस का भक्षण करते हैं और न ही मधु का सेवन करते हैं।”

इस प्रकार सीताजी के वियोग के समय मधु और मांस का वर्जन किया गया है, ऐसा कहा गया है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि उसके पूर्व, साथ रहने के समय, उन्होंने उनका सेवन किया था।

फिर—“मर्यादानाञ्च लोकस्य कर्ता कारयिता च सः।”

हिन्दी: “वे लोक-मर्यादा के कर्ता भी हैं और उसका पालन कराने वाले भी हैं।”

और—“धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।”

हिन्दी: “धर्म की स्थापना के लिए मैं युग-युग में अवतार लेता हूँ।”

धर्म-स्थापना के लिए अवतीर्ण हुए अवतारों में आचरित धर्म उपादेय (अनुकरणीय) क्यों न माना जाए—यदि ऐसा कहा जाए, तो (उत्तर यह है कि) भगवान् सामान्य-धर्मनिष्ठ थे। इसलिए क्षत्रिय-कुल के अनुकूल जो मांस था, और राजा लोग जो अनेक सुगन्धित पुष्पों के रस से उत्पन्न मधु ग्रहण करते हैं, उसका ग्रहण किया होगा; किन्तु अपने वर्ण के विरुद्ध मधु और मांस का ग्रहण नहीं किया।

वर्णधर्म का पालन करने वालों के लिए तारतम्य के अनुसार कुछ वस्तुएँ त्याज्य हैं और कुछ उपादेय हैं। किन्तु सत्त्व-प्रधान परमैकान्तियों के लिए—

“उभे विद्वान् पुण्यपापे विधूय…”

हिन्दी:  “विद्वान् पुण्य और पाप—दोनों का परित्याग करके…”

—भगवदानुभव के अतिरिक्त अन्य सब त्याज्य हो जाते हैं; उन्हें उपादेय नहीं कहा जा सकता।

फिर—

“मधूकमैक्षवं तालं खर्जूरं पानसं तथा ।
द्राक्षं मधुजमारिष्टं मैरेयं नारिकेलजम् ।
इत्येकादश मद्यानि निषिद्धानि द्विजन्मनाम् ।
सुरां भूगृतकेरमूत्रपयसामन्यतममग्निस्पर्शात् ।
… पीत्वा मरणात् परां गतिं प्राप्नुयात् ॥” (विष्णुस्मृति (२२.८३-८४) )

हिन्दी:
“महुआ से उत्पन्न, गन्ने से उत्पन्न, ताड़ से उत्पन्न, खजूर से उत्पन्न, पनस (कटहल) से उत्पन्न, द्राक्षा से उत्पन्न, मधु से उत्पन्न, अरिष्ट, मैरेय और नारिकेल से उत्पन्न—ये ग्यारह प्रकार के मद्य द्विजों के लिए निषिद्ध हैं।  यदि कोई द्विज अज्ञानवश या मोहवश सुरापान कर लेता है, तो उसकी शारीरिक और आत्मिक शुद्धि के लिए कठोर प्रायश्चित का नियम – इसके अंतर्गत अग्नि द्वारा गर्म किए गए घृत (घी), क्षीर (दूध), गोमूत्र, दधि का सेवन (पञ्चगव्य) करने का विधान है। … (यदि कोई इन्हें पीए तो) प्रायश्चित्त करके, मृत्यु के पश्चात् ही शुद्धि प्राप्त करता है।”

इस प्रकार सत्त्व-प्रधान ब्राह्मण्य के लिए भी ये द्रव्य मृत्यु-पर्यन्त निषिद्ध हैं। तब शुद्ध-सत्त्वनिष्ठ, ग्राम, कुल आदि के भेदों से रहित, समस्त वर्णाश्रमों से विलक्षण, केवल भगवान् के ही दासत्व से निर्दिष्ट परमैकान्तियों के लिए तो इनका स्मरण भी नहीं करना चाहिए।

इन निन्दित निषिद्ध द्रव्यों का ग्रहण केवल वर्ण के कारण निषिद्ध नहीं है; अपितु—

“द्रव्यं निन्द्यं सुरादि, दैवतमतिः क्षुद्रं च बाह्यागमः”

हिन्दी:  “सुरा आदि द्रव्य निन्दित हैं; क्षुद्र देवताओं में बुद्धि रखना तथा बाह्यागम (वैदिक-विरोधी आगम मत) भी निन्दित है…”

अतः ये क्षुद्र-देवता-विषयक, बाह्यागम-प्रवर्तक तथा निषिद्ध कर्म होने के कारण सर्वथा गर्हित हैं।

फिर—

“यजन्ते सात्त्विका देवान्।”

हिन्दी:  “सात्त्विक लोग देवताओं की उपासना करते हैं।”

यद्यपि भगवान् ने अपने अवतारों में रुद्र, इन्द्र आदि देवताओं की आराधना की, तथापि अनन्यार्ह-शेषत्व के कारण, षड्विध-शरणागति से युक्त और श्रीदेवी के समान परमशुद्ध आत्माओं के लिए देवतान्तर-भजन करना उचित नहीं है।

और भी, यदि अवतारों में की गई अतिमानुष चेष्टाएँ दृष्टान्त मानी जाएँ, तो यह भी मानना पड़ेगा कि भगवान् ने ब्रह्मकुल में उत्पन्न रावण का वध किया; तब ब्रह्महत्या आदि भी अनुकरणीय मानी जाएँगी। (अतः ऐसा नहीं मानना चाहिए।) यदि श्रीकृष्ण का अनुकरण किया जाए, तो परहिंसा, परदारगमन, परद्रव्यापहरण आदि भी उपादेय (अनुकरणीय) हो जाएँगे; इसमें कोई दोष नहीं रहेगा।

किन्तु तब महापातक भी प्रपन्नधर्म के रूप में आचरण किए जाने लगेंगे; अतः ऐसा नहीं कहा जा सकता।

यदि कहा जाए कि चरमश्लोक के प्रथम पद में “सर्व” शब्द में किसी प्रकार का संकोच न रहे, इसलिए उसे निवृत्तिरूप धर्मों के त्याग के लिए ग्रहण किया गया है,

तो जीव, ईश्वर और फल—इन तीनों का विचार करने पर उसके लिए कोई अवसर नहीं रहता; यह मुमुक्षुप्पडि में निराकृत किया जा चुका है।

यदि यह स्वीकार कर लिया जाए कि वह केवल दृष्टान्तरूप से कहा गया है, तो फिर संकोच किस बात का?

क्योंकि—பிணக்கற அறுவகைச் சமயமும் நெறியுள்ளியுரைத்த கணக்கறு நலத்தனன் (पिणक्कर अरुवगैच् समयमुम् नेरियुळ्ळियुरैत कणक्करु नलत्तनन्।) (thiruvAimozhi – 1.3.5 – piNakkaRa aRuvagai – KOYIL )

हिन्दी: “जिसने परस्पर-विरोधरहित छहों मतों का विचार करके यथार्थ मार्ग का उपदेश किया, वह अपरिमेय कल्याणगुणों से युक्त है।”

स्वतः सर्वज्ञ सर्वेश्वर ने षट्समयवाद का निराकरण हो जाए, इस प्रकार सद्मार्ग का विचार करके चरमश्लोक का उपदेश किया। यदि उसके भीतर निषिद्ध आचरण का भी अभिप्राय मान लिया जाए, तो गुरु, मन्त्र और देवता का अपमान होगा; विपरीत अर्थ की प्रतीति होगी; और समस्त उपनिषदों के सार तथा समस्त गीता-शास्त्र के सारभूत (प्रपत्ति)—

उपायापायनिर्मुक्तो मध्यमां स्थितिमास्थितः। (लक्ष्मी तन्त्र 17.82)

हिन्दी – “जो उपाय और अपाय—दोनों से रहित होकर मध्य स्थिति में स्थित है।”

(“शास्त्रों में हिंसा, चोरी आदि बुरे कर्मों को ‘अपाय’ (कल्याण मार्ग में बाधक/पाप) बताया गया है। वहीं शास्त्रों में कर्मयोग, ज्ञानयोग और सांख्य आदि को मोक्ष का ‘उपाय’ (साधन) कहा गया है। जो साधक अपाय (पापों) और उपाय (अपने व्यक्तिगत पुरुषार्थ के अहंकार), दोनों से सर्वथा मुक्त होकर मध्य की स्थिति (पूर्ण समर्पण) में स्थित हो जाता है, वह इस दृढ़ विश्वास के साथ कि ‘भगवान मेरी रक्षा अवश्य करेंगे’, अपना सर्वस्व (अपने आत्मा और कर्मों का भार) भगवान के चरणों में सौंप देता है।”)

—इस वचन के अनुसार उपाय और अपाय से रहित प्रपत्ति का भी अपमान होगा; इसलिए वह अनर्थ का कारण है।

अतः—

यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्। उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्॥  १७.१०॥

हिन्दी – “उच्छिष्ट और अपवित्र भोजन तामसिक लोगों को प्रिय होता है।”

अमेध्य वस्तुएँ तामसिकों के लिए हैं; सत्त्वनिष्ठों के लिए वे त्याज्य हैं।

त्याज्य और उपादेय का भेद त्रिगुणों के अधीन, प्रकृतिबद्ध कर्म करने वाले जीवों के लिए ही है।

यदि कहा जाए— सर्वं खल्विदं ब्रह्म। (“यह सम्पूर्ण जगत् ब्रह्म है।”)

—इस प्रकार समस्त वस्तुओं को ब्रह्मात्मक मानने वाले अधिकारियों के लिए भी क्या कोई त्याज्य वस्तु रहती है?

उत्तर: जब यह जीव त्रिगुणात्मक प्रकृति का परित्याग करके मुक्त हो जाता है, तभी भगवान् का होने के स्वरूप से सम्पूर्ण लीलाविभूति उसके लिए अनुभव योग्य हो जाती है।

यद्यपि वे अभी प्रकृतिशरीरयुक्त हों, तथापि ‘मयर्वर मदि नलम्’ प्राप्त आलवारों के समान तथा प्रह्लाद आल्वान् के समान अपरोक्षज्ञानी होकर समस्त वस्तुओं में सर्वेश्वर का साक्षात्कार करते हैं। तब विष, शस्त्र, अग्नि आदि भी उनके लिए प्रतिकूल नहीं रहते।

तमिल – அரியுஞ் செந்தீயைத்தழுவி அச்சுதன் என்னும் மெய்வேவாள்

देवनागरी लिप्यंतरण – अरियुञ् सेन्तीयैत्तऴुवि अच्चुतन् एन्नुम् मेय्वेवाळ्। thiruvAimozhi – 4.4.3 – aRiyum sendhIyai – KOYIL 

हिन्दी – “प्रचण्ड अग्नि का आलिंगन करते हुए भी वह ‘अच्युत’ नाम का ही उच्चारण करती रही।”

और—

नाग्निर्दहति नैवायं शस्त्रैश्छिन्नो न चोरकैः।
क्षयं नीतो न वातेन न विषेण न कृत्यया।
सत्त्वासक्तमतिः कृष्णे दह्यमानो महोरगैः।
न विवेदात्मनो गात्रं तत्स्मृत्याह्लादसंस्थितः॥

हिन्दी – “उसे न अग्नि जलाती है, न शस्त्र काटते हैं, न चोर हानि पहुँचाते हैं; न वायु, न विष और न अभिचार उसका नाश कर पाते हैं। जिसका चित्त कृष्ण में आसक्त है, वह महान् सर्पों द्वारा दंशित होने पर भी भगवान् के स्मरणजन्य आनन्द में स्थित रहने के कारण अपने शरीर का भी अनुभव नहीं करता।”

ये सब उसके लिए अनुकूल हो जाते हैं।

फिर—

सर्वभूतात्मके तात जगन्नाथे जगन्मये।  परमात्मनि गोविन्दे मित्रामित्रकथा कुतः॥

हिन्दी – “हे तात! जब गोविन्द ही समस्त भूतों के आत्मरूप, जगन्नाथ और जगन्मय परमात्मा हैं, तब मित्र और शत्रु की चर्चा कहाँ है?”

इस प्रकार सबको समान देखकर आलवार कहते हैं—

புகழுநல்லொருவனென்கோ பொருவில்சீர்ப் பூமியென்கோ (पुगऴु नल्लोरुवनेन्को, पोरुविल्-सीर्प् भूमियेन्को।)

हिन्दी – “उसे क्या ‘अतुलनीय यशस्वी’ कहूँ, या ‘अतुलनीय महिमा से युक्त पृथ्वी’ कहूँ?”

और—யாவையும் யவருந்தானாய் (यावैयुम् यवरुन्दानाय्।)

हिन्दी – “जो सब कुछ और सब प्राणियों के रूप में स्वयं स्थित है।”

और— நல்குரவும் செல்வும் நரகும் சுவர்க்கமுமாய் (नल्कुरवुम् सेल्वुम् नरगुम् सुवर्क्कमुमाय्।)

हिन्दी – “जो दरिद्रता, सम्पत्ति, नरक और स्वर्ग रूप है।”

और— நீராய் நிலனாய்த் தீயாய்க் காலாய் (नीराय् निलनाय्त् तीयाय्क् कालाय्।) thiruvAimozhi – 6.9.1 – nIrAy nilanAy – KOYIL 

हिन्दी –  “जो जल, पृथ्वी, अग्नि और वायु रूप है।” 

इस प्रकार पृथ्वी आदि पंचमहाभूतों, समस्त भौतिक पदार्थों तथा समस्त चेतन-अचेतन वस्तुओं में व्याप्त होकर वे सब उसके प्रकार (शरीर) हैं—इसका अनुसंधान उन्होंने किया।

किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि उन्होंने उन्हें ब्रह्मात्मक मानकर लहसुन, गृञ्जन आदि का सेवन किया।

आलवार ने प्रार्थना की— காணவாராய் काणवाराय्।

हिन्दी – “आइए, मुझे दर्शन दीजिए।”

यदि कहा जाए—”हमने तो आपको जगत्-स्वरूप ही दिखा दिया; उसे देखकर सन्तोष क्यों नहीं होता?”

तो उसका उत्तर यह है— जिस प्रकार राजा के कारागार आदि सहित सम्पूर्ण ऐश्वर्य राजपुत्र के लिए अपने पिता का ऐश्वर्य होने से आदरणीय होता है, उसी प्रकार ब्रह्माण्ड के भीतर स्थित देवता आदि पदार्थ, स्वर्ग, नरक आदि भोगभूमियाँ तथा उनकी प्राप्ति के हेतु रूप पुण्य और पाप—इन सबका भगवान् से पृथक् कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। वे उसके प्रकार (शरीर) होने से उसी के हैं—हम केवल इतना ही स्वीकार करते हैं।

किन्तु—அழுக்குப் பதித்த உடம்பாய், अऴुक्कुप् पदित्त उडम्बाय्। thiruvAimozhi – 6.3.7 – paranjudar udambAy – KOYIL 

हिन्दी – “यह शरीर अशुद्धि से लिप्त है।”

इस प्रकार जो हेय-वस्तुओं का समुदाय है, जो स्वरूप का आवरण करने वाला और विपरीत ज्ञान उत्पन्न करने वाला जगत्-स्वरूप है—क्या वह मेरे लिए परमप्रकाशमय दिव्य शरीर के समान अनुभवयोग्य हो सकता है?

इसलिए उन्होंने प्रार्थना की— கூராராழி வெண்சங்கேந்திக் கொடியேன்பால் வாராய், कूराराऴि वेण्शङ्गेन्दिक् कोडियेन्पाल् वाराय्। thiruvAimozhi – 6.9.1 – nIrAy nilanAy – KOYIL 

हिन्दी – “हे तीक्ष्ण चक्र और श्वेत शंख धारण करने वाले! इस दीन के पास पधारिए।”

अर्थात् “நீராய் நிலனாய்…” कहने वाले तिरुवाय्मोऴि में भी उन्होंने भगवान् से उनके असाधारण (दिव्य) विग्रह सहित आने की ही प्रार्थना की है।

श्रीमहालक्ष्मी, नित्यमुक्त और मुमुक्षु—इन सबकी अवस्थाओं से युक्त होने के कारण, मुक्तावस्था के अनुभव के समय समस्त वस्तुओं को भगवान्-स्वरूप मानकर अनुसंधान करने वाले आलवार ही, माता के स्तन्य आदि समस्त प्राकृत वस्तुओं को हेय मानकर उनका परित्याग करते हैं।

உண்ணுஞ்சோறு பருகு நீர் தின்னும் வெற்றிலையுமெல்லாம் கண்ணன் (उण्णुञ् चोरु परुगु नीर् तिन्नुम् वेत्रिलैयुमेल्लाम् कण्णन्।) thiruvAimozhi – 6.7.1 – uNNum sORu – KOYIL 

हिन्दी – जो अन्न खाया जाता है, जो जल पिया जाता है, और जो पान (वेत्रिलै) चबाया जाता है—सब कन्नन (भगवान्) ही हैं।”

इस प्रकार धारण करने वाले, पोषण करने वाले और भोग्य—इन तीनों को वही भगवान् है—ऐसा अनुसंधान करते हुए भी, प्राकृत-वस्तुओं में आसक्त संसारी जीवों को देखना भी नहीं चाहते।

उन्होंने प्रार्थना की— கொடுவுலகங்காட்டே (कोडुवुलगम् काट्टे।)

हिन्दी – “इस क्रूर संसार को मत दिखाइए।”

और— இவையென்னவுலகியற்கை, (इवैयेन्न उलगियर्क्कै।)

हिन्दी – “यह कैसी संसार-प्रकृति है!”

और— நாட்டாரோடியல்வொழிந்து (नाट्टारोडु इयल्वोऴिन्दु।)

हिन्दी – “संसार के लोगों के व्यवहार का परित्याग करके।”

और— பணிகண்டாய் சாமாறே (पणि कण्डाय् सामारे।)

हिन्दी – “हे स्वामी! मेरी प्रार्थना स्वीकार कीजिए।”

इस प्रकार उन्होंने शरीर से विमुक्त होने की अवस्था की प्रार्थना की।

अतः केवल “सब ब्रह्मस्वरूप है” ऐसा कहकर मुमुक्षु के लिए प्राकृत हेय वस्तुओं को उपादेय नहीं कहा जा सकता।

  • आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः।
  • सत्त्वात् संजायते ज्ञानम्। 
  • ज्ञानान्मोक्षः।

हिन्दी – “आहार की शुद्धि से सत्त्व की शुद्धि होती है। सत्त्व की शुद्धि से ज्ञान उत्पन्न होता है। ज्ञान से मोक्ष प्राप्त होता है।”

अतः जो ज्ञान के विरोधी हैं, वे त्याज्य हैं।

आलवारों को भगवान् ने ‘मयर्वर मदि नलम्’ (अविचल और निर्मल ज्ञान) प्रदान किया था; इसलिए उनके लिए धारण करने वाले आदि सब वही भगवान् हो गए।

किन्तु जिन मुमुक्षुओं को वह अवस्था प्राप्त नहीं हुई है, उनके लिए केवल सत्त्वप्रधान वस्तुएँ ही ग्रहण करने योग्य हैं।

अतः जातिदुष्ट पदार्थ त्याज्य हैं।

आगे: 7. आश्रयदुष्ट पदार्थ एवं निमित्तदुष्ट पदार्थ

5. आचार्य-लक्षणम्

“ज्ञानहीनं गुरुं प्राप्य कुतो मोक्षमवाप्नुयात् |
भिन्ननावाश्रयस्तब्धो यथा पारं न गच्छति ||”

अर्थ:
ज्ञान से रहित गुरु को प्राप्त करके मोक्ष कैसे प्राप्त किया जा सकता है? जैसे टूटी हुई नाव या दोषयुक्त आश्रय वाली नाव नदी के पार नहीं ले जा सकती, वैसे ही ऐसा गुरु मोक्ष तक नहीं पहुँचा सकता।

यह (अर्थात् अयोग्य गुरु) कारण के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता; इसलिए यह असिद्ध है।

इसलिए यह सिद्ध होता है कि “सत्-सम्प्रदाय” से प्रारम्भ होने वाला अत्यन्त विशिष्ट सम्बन्ध ही मोक्ष का कारण है।

जैसा कहा गया है:

“सिद्धं सत्सम्प्रदाये स्थिरधियमनघं श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठं

सत्वस्थं सत्यवाचं समयनियतया साधुवृत्त्या समेतम्।

दम्भासूयादिमुक्तं जितवषयगणं दीर्घबन्धुं दयालुं

स्खालित्ये शासितारं स्वपरहितपरं देशिकं भूष्णुरिप्सेत् ॥|”

अर्थ:
मनुष्य को ऐसे आचार्य का आश्रय लेना चाहिए जो:

  • सत्-सम्प्रदाय में प्रतिष्ठित हो,
  • स्थिर बुद्धि और निर्दोष हो,
  • श्रुति-शास्त्र का ज्ञाता और ब्रह्मनिष्ठ हो,
  • सत्त्व में स्थित हो और सत्य बोलता हो,
  • नियमपूर्वक सदाचार का पालन करता हो,
  • ईर्ष्या से रहित हो,
  • इन्द्रियों को जीत चुका हो,
  • धैर्यवान, बंधु-समान हितैषी और दयालु हो,
  • शांति के लिए अनुशासन करने वाला हो,
  • अपने और दूसरों के कल्याण में तत्पर हो,
  • और एक श्रेष्ठ देशिक (मार्गदर्शक) हो।

ऐसा गुरु स्वीकार करने योग्य है।

वह सत्-सम्प्रदाय में स्थित, स्थिर बुद्धि वाला, दोषरहित, शुद्ध आचरण वाला, सत्यभाषी और सत्त्व में स्थित होता है।

वह ईर्ष्या से रहित, इन्द्रिय-विजयी, दयालु और अनुशासन द्वारा कल्याण करने वाला होता है।

वह अपने तथा दूसरों के हित में तत्पर रहता है और सच्चा मार्गदर्शक होता है।

वह तीनों गुणों से परे (त्रिगुणातीत) कहा गया है:

“समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकंचनः। तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुति:।
मानापमानयोस्तुल्यः तुल्यो मित्रारिपक्षयोः । सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥”

अर्थ:
जो सुख-दुःख में समान है, शीत-उष्ण में समभाव रखता है, मिट्टी-पत्थर-सोने को समान देखता है, प्रिय-अप्रिय में समभाव रखता है, निन्दा और स्तुति में समान रहता है, मान-अपमान में समान रहता है, मित्र और शत्रु में समान दृष्टि रखता है, और सभी आरम्भों का त्यागी है—वही गुणातीत कहा जाता है।

यदि शिष्य उन विषयों को छोड़ दे, तो भी उन्हें स्वयं न छोड़ने देने वाला, परानर (दूसरों के दोष) को सहन न कर सकने वाला अत्यन्त दयालु होता है।

यदि कोई कुमार्ग में प्रवृत्त हो जाए तो उसे सीधे कठोरता से रोककर शिक्षा देने में समर्थ होता है; निषिद्ध प्रवृत्तियों में पड़ने पर भी उसे उपेक्षा न करके नियंत्रित करता है और उचित मार्ग में स्थापित करता है।

जो इस प्रकार किसी के भी कुमार्ग पर चलने पर उसे सीधे कठोरता से रोककर, उसे अनुशासन में लाकर शिक्षा देने में सक्षम हो; जो निषिद्ध प्रवृत्ति में पड़ने पर भी उसे लापरवाही से न छोड़कर, उसे बाँधकर/नियंत्रित करके सुधारने वाला हो;

जो स्वयं भी उचित आचरण के अनुसार ही रहता हो और दूसरों को भी उसी प्रकार सुधारता हो;

जो परहितकारी हो, आचार्य के आदेशों का पालन करने वाला हो;

जो भगवान का अत्यन्त प्रिय भक्त और मुक्त होने के योग्य हो—

ऐसा आचार्य कहा गया है।

जैसा “आचार्य-उक्ति” में कहा गया है:

“ज्ञान और आचरण—ये दोनों जिसके भीतर हैं, ऐसे गुरु को प्राप्त करने पर मनुष्य लोक में कमललक्ष्मी के साथ विराजमान वैकुंठनाथ स्वयं प्रसन्न होते हैं।”

इस प्रकार जो आचार्य पवित्र परम्परा (प्रपन्न-जन-सम्प्रदाय) में स्थित रहते हुए भी शुद्ध वंश-प्रवाह में किसी प्रकार के दोष से रहित होकर स्थित रहता है।

ऐसा गुरु जो पूर्वाचार्यों के आचरण के अनुसार सदाचार का पालन करता है।

जो यह अपेक्षा न रखे कि उपदेश का फल तत्काल शिष्य के आचरण, सहवास अथवा व्यवहार में दृष्टिगोचर हो; अपितु जो समस्त कार्य का परम प्रयोजन भगवान की प्रसन्नता तथा मंगलाशासन ही माने; तथा जो स्वयं को आचार्य और शिष्य को “मेरा शिष्य” इस प्रकार के अहंभाव से रहित होकर सभी को सह-ब्रह्मचारी के रूप में देखे (अपने आचार्य का शिष्य)—ऐसा व्यक्ति उपदेश-फल सम्बन्धी दोषों से रहित होता है। 

वह आहार-नियम, सहवास-नियम तथा अनुयोजन (अनुवर्तन) के नियमों से युक्त रहता है; दम्भ और ईर्ष्या से रहित होता है; गान-श्रवण, स्त्री-संग तथा क्षुद्र शब्दादि विषयों में आसक्ति से रहित होता है।

4. सच्छिष्य-लक्षणम्

यदि पूछा जाए कि “सच्चे शिष्य के लक्षण कौन-कौन से हैं?”

तो (शास्त्र में) कहा गया है —

“शरीरं वसु विज्ञानं वासः कर्म गुणाणसन्। गुवर्थं धारयेद्यस्तु स शिष्यो नेतरस्मृतः।।” 

“शरीर, धन, ज्ञान, निवास, पत्नी, सद्गुण, पुत्र, कुल आदि को जो अपने लिए नहीं, बल्कि आचार्य के लिए शेष (समर्पित) मानता है; उनके विषय में कोई पृथक् प्रयत्न या स्वतंत्र अभिमान नहीं रखता; अपने मन में भी उन्हें स्वतंत्र वस्तु के रूप में स्थान नहीं देता; और जो आचार्य की इच्छा के अनुसार क्रय-विक्रय के योग्य वस्तु के समान स्वयं को मानता है — वही शिष्य है, दूसरा नहीं।”

तथा,

“सद्बुद्धिः साधुसेवी समुचितचरितस्तत्वबोधाभिलाषी 

सुश्रूषुस्त्यक्तमान: प्रणिपतनपर:  प्रश्नकालप्रतीक्ष: ।

शान्तो दान्तोऽनसूयु: शरणमुपगतः शास्त्र विश्वासशाली

शिष्यः प्राप्त: परीक्षां कृतविदभिमतं तत्त्वतः शिक्षणीयः ।।”

“जिसकी बुद्धि सत्-विषयों में लगी हुई हो, जो साधुओं की सेवा करने वाला हो (भगवद्भक्तों की सेवा) , जिसका आचरण उचित हो (सदाचार, शिष्टाचार), जिसे तत्त्वज्ञान की अभिलाषा हो, जो गुरु-सेवा में आसक्त हो, जो अभिमान-रहित हो, जो प्रणिपात (दण्डवत् नमस्कार) में तत्पर हो, जो प्रश्न करने के उचित समय की प्रतीक्षा करता हो, जो शान्त हो, दान्त (इन्द्रियनिग्रहयुक्त) हो, जिसमें असूया न हो, जो शरणागत हो, और जिसे शास्त्रों में दृढ़ विश्वास हो — ऐसा शिष्य, जब परीक्षा करके योग्य पाया जाए, तब उसे तत्त्व का उपदेश करना चाहिए।”

(अर्थात् सच्चा शिष्य वह है जो —

  • सत्-विषयों में प्रवृत्त बुद्धि वाला हो,
  • साधु-सेवा में लगा हुआ हो,
  • सदाचार और सदनुष्ठान से सम्पन्न हो,
  • तत्त्वज्ञान की इच्छा रखता हो,
  • गुरु-शुश्रूषा में निरत हो,
  • निरभिमानी हो,
  • प्रणिपात और नमस्कार में तत्पर हो,
  • प्रश्न करने के उचित समय की प्रतीक्षा करता हो,
  • बाह्य और आन्तरिक इन्द्रियों का निग्रह रखता हो,
  • दूसरों की श्रेष्ठता सहन न कर पाने वाली असूया से रहित हो,
  • शरणागत हो,
  • तथा शास्त्रों में दृढ़ विश्वास रखता हो।)

ऐसा शिष्य यदि प्राप्त हो, तो वह “तत्त्वतः शिक्षणीय” — अर्थात् तत्त्वज्ञान का उपदेश पाने योग्य माना जाता है।

जिनमें ये (पूर्वोक्त) गुण हों और जो सच्चे शिष्य के लक्षणों से युक्त हों, ऐसे व्यक्ति को ही हितोपदेश देना चाहिए।

ऐसा न होने वाले व्यक्ति को स्वीकार नहीं करना चाहिए।

जो व्यक्ति अन्य देवताओं, अन्य साधनों और अन्य विषयों में आसक्त होकर संसार के बंधन में पड़े हुए जीवों के समूह में से दस-बीस लोगों को इकट्ठा करके, केवल अपनी कीर्ति, लाभ, पूजा और प्रतिष्ठा के लिए यह कहे कि “मेरे मन में जैसा आए वैसे ही वे चलें,” और पूर्वजों के वचनों तथा आचरणों को छोड़कर, अपनी दुष्ट वासनाओं के कारण अपने ही मन में उत्पन्न विपरीत मतों को उन्हें सिखाकर, उनसे वही करवाकर, शरीर-आश्रित होकर भटकता रहे—ऐसा व्यक्ति आचार्य नहीं है।

क्योंकि शास्त्र में कहा गया है:

“यजमानकृतं पापं द्रव्याश्रितं तिष्ठति।” 

“यजमान के द्वारा किया गया पाप द्रव्य (धन) में स्थित रहता है।”

और क्योंकि चेतन के दोष का फल प्राप्त धन में लग जाता है,

तथा यह भी कहा गया है:

“शिष्यपापं गुरोरपि भवति।” 

“शिष्य का पाप गुरु का भी हो जाता है।”

इसलिए, अशुद्ध और अयोग्य शिष्य के साथ सम्बन्ध और उससे प्राप्त द्रव्य के कारण उस शिष्य का पाप भी गुरु पर आ पड़ता है; उसका अपना पाप और शिष्य का पाप दोनों मिलकर उस पर बढ़ते रहते हैं।

इसलिए, जैसे विशेष (उत्कृष्ट) आचार्य के साथ विशिष्ट सम्बन्ध की इच्छा की जाती है, वैसे ही केवल योग्य और विशिष्ट शिष्यों को ही स्वीकार करना चाहिए।

इसलिए यह प्रसिद्ध है कि हमारे आचार्यों में श्रेष्ठ, मुक्ति प्रदान करने वाले श्री रामानुज स्वामी ने भी कहा—

अर्वाञ्चो यत्पदसरसिजद्वन्द्वमाश्रित्य पूर्वै

मूर्ध्ना यस्यान्वयमुपर ता देशिका मुक्तिमापुः ।

सोऽयं रामानुजमुनिरपि स्वीयमुक्तिं करस्थां

यत्सम्बन्धादमनुत कथं वर्ण्यते कूरनाथः ॥ ५॥

(“जिन (आचार्य रामानुज) के दोनों चरण-कमलों का आश्रय लेकर आधुनिक काल के जीव मुक्ति पाते हैं, और जिन (कूरनाथ) के सम्बन्ध को सिर झुकाकर स्वीकार करने के कारण पूर्ववर्ती आचार्यों ने भी मोक्ष प्राप्त किया; यहाँ तक कि स्वयं वे महान रामानुज मुनि भी जिनके साथ अपना सम्बन्ध होने के कारण ही अपनी मुक्ति को अपनी हथेली में स्थित (पूर्णतः सुनिश्चित) मानते हैं, उन परम प्रतापी कूरनाथ (कूरेश) की महिमा का वर्णन भला वचनों से कैसे किया जा सकता है! (अर्थात् उनकी महिमा अकथनीय और अनंत है)।”

“यद्यपि मुक्ति उनके अपने वश में थी, तो वह किस सम्बन्ध से प्राप्त हुई? यदि कहा जाए तो वह केवल कूरनाथ के सम्बन्ध से ही।”

उन्होंने जब गुरु-आज्ञा का उल्लंघन कर श्रीरंगम के मंदिर में खड़े होकर पवित्र मंत्र को सब श्रीवैष्णवों के सामने प्रकट कर दिया, तब उन्हें यह निश्चित हो गया कि उनसे अपराध हुआ है। और अपने सच्चे शिष्य कूरत्ताल्वान के संबंध से उन्हें मुक्ति प्राप्त हुई; और यह प्रसिद्ध है कि उन्होंने काषाय वस्त्र उछाल कर आनंदपूर्वक नृत्य किया।

जैसा कहा गया है:

“गुरोराज्ञातिक्रमेनिश्चित्य स्वास्थदुरतिम् । परानरसहिष्णुत्वात् मन्मन् प्रोक्तः भाष्यकृत् ॥” 

“गुरु की आज्ञा का उल्लंघन करके स्वयं को दोषी मानकर और दूसरों के कष्ट को सहन न कर पाने के कारण भाष्यकार ने ऐसा कहा।”

इस प्रकार, जैसे विशिष्ट शिष्य का संबंध उन्नति का कारण होता है, वैसे ही अविशिष्ट शिष्य का संबंध बंधन और अधोगति का कारण होता है।

जैसे योग्य पुत्र का संबंध पिता के लिए नरक से पार कराने का कारण होता है, वैसे ही कुमार्गगामी पुत्र का संबंध—

उसके द्वारा किए गए निषिद्ध आचरण के कारण कहा गया है:

“कुम्भे कर्कटके वापि कन्यायां कार्मुके रवौ ।

रोम – खण्डं गृहस्थस्य पितॄन् प्राशयते यमः ‘ ॥ 

(जब सूर्य कुम्भ, कर्क, कन्या अथवा धनु राशि में स्थित हो, तब गृहस्थ के कटे हुए बालों को यम पितरों को खिलाता है। )

“यम पितरों को दंड/दुःख का भोग कराते हैं।”

इस प्रकार शास्त्र यह बताता है कि यह समस्त पितृवंश के विनाश का कारण बनता है।

और आचार्य एवं शिष्य के संबंध में भी पिता–पुत्र का संबंध बताया गया है:

“स हि विद्यया तं जनयति तच्छ्रेष्ठं न गरीयान् । ब्रह्मदः पिता गुरुः पिता मुमुक्षोस्तु ॥” 

“वह (आचार्य) ही उसे ज्ञान द्वारा उत्पन्न करता है; इसलिए जो ब्रह्मज्ञान देता है वह शरीर देने वाले पिता से भी महान है। मोक्ष चाहने वाले के लिए गुरु ही पिता है।”

इसलिए, जैसे कुमार्गगामी पुत्र का संबंध पतन का कारण है, वैसे ही कुमार्गगामी शिष्य का संबंध भी विनाश का कारण है।

और जब शिष्य-संबंध ही इतना अपायकारी है, तब ज्ञान और आचरण से रहित गुरु-संबंध का विनाशकारी होना तो और भी स्पष्ट ही है।

Notes from kaalakshepam

(ग्रन्थ इस प्रवृत्ति को विशेष रूप से हतोत्साहित करता है।

कभी-कभी लोग सोचते हैं—

“इस आचार्य में यह कमी है।”

“उस आचार्य में वह दोष है।”

“मुझे किसी और को ढूँढना चाहिए।”

इस प्रकार का दृष्टिकोण सम्प्रदाय की भावना के विपरीत है।

आचार्य-लक्षण का अध्ययन श्रद्धा बढ़ाने के लिए है, आलोचना बढ़ाने के लिए नहीं।

यह विश्वास को दृढ़ करने के लिए है, दोष-दर्शन के लिए नहीं। अन्य सम्प्रदायों के आचार्यों की तुलना में रामानुज स्वामी में आचार्यत्व-पूर्ति का ज्ञान कर, उनके चरणों में दृढ विश्वास उत्पन्न करने हेतु है।

सम्प्रदाय बार-बार एक ही सत्य पर बल देता है—

वास्तविक शक्ति किसी व्यक्ति-विशेष में नहीं, बल्कि सम्बन्ध में है।

जब कोई शिष्य प्रामाणिक परम्परा से पञ्च-संस्कार प्राप्त करता है, तब वह भगवद् रामानुज से जुड़ जाता है।

इसी सम्बन्ध को रामानुज-सम्बन्धम् कहा जाता है।

यही सम्बन्ध आध्यात्मिक जीवन का वास्तविक आधार है।

जो आचार्य भगवद् रामानुज की परम्परा में स्थित हैं और शिष्यों को पञ्च-संस्कार प्रदान करते हैं, वे आचार्य-पुरुष कहलाते हैं।

वे रामानुज के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करते हैं।)

3. शिष्यजीवनम् (शिष्य का जीवन)

शिष्यजीवनम्

जब ऐसा व्यक्ति,

शम, दम आदि आत्मगुणों से सम्पन्न होकर, आचार्य के पास पहुँचता है,

तब आचार्य उसकी भली-भाँति परीक्षा करते हैं। फिर उसे ब्रह्मप्राप्ति का साधनभूत ज्ञान उपदेश करते हैं,

और यह भी देखते हैं कि वह उस उपदेश के अनुसार आचरण कर रहा है या नहीं।

शिष्य भी, उस ज्ञान को प्राप्त करके, कृतकृत्य हो जाता है, मोक्ष का अधिकारी बन जाता है,

और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करता है। ऊपर उद्धृत श्रुति में—

“सम्यक् प्रशान्तचित्ताय”

इस पद से शम और दम इन दो गुणों का निर्देश किया गया है।

क्योंकि आत्मगुणों में ये दोनों प्रधान हैं,

अतः इनका उल्लेख समस्त सत्शिष्य-लक्षणों का उपलक्षण (संकेत) है।

इसी प्रकार,

“श्रोत्रियम्” तथा “ब्रह्मनिष्ठम्” इन दोनों पदों का उल्लेख समस्त सदाचार-लक्षणों का उपलक्षण है।

अर्थात् एक सच्चे आचार्य में जो-जो सद्गुण और सदाचार अपेक्षित हैं, वे सब इन दोनों शब्दों में संकेत रूप से समाहित हैं

2. आचार्योपसत्ति (आचार्य की शरण ग्रहण करना)

आचार्योपसत्ति

श्रुति में कहा गया है—

परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन।

तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्॥

“उस तत्त्व को जानने के लिए मनुष्य को समिधा हाथ में लेकर ऐसे गुरु के पास जाना चाहिए जो श्रोत्रिय तथा ब्रह्मनिष्ठ हो। ऐसे सम्यक् शान्तचित्त और शमयुक्त शिष्य को वह विद्वान् गुरु अक्षर पुरुष के यथार्थ स्वरूप का ब्रह्मविद्या-उपदेश करता है।”

अतः वह मुमुक्षु जीव,

तत्त्वज्ञान की प्राप्ति के लिए,

श्रवण और सेवा में तत्पर होकर,

ऐसे आचार्य का आश्रय ग्रहण करता है—

  • जो वेद-वेदान्त के सार का ज्ञाता हो,
  • जो परमात्मा के अतिरिक्त अन्य सभी विषयों से अत्यन्त विरक्त हो,
  • जो केवल परब्रह्मानुभव में स्थित हो,
  • तथा जो सदाचार से सम्पन्न हो।

ऐसे आचार्य का आश्रय लेना चाहिए।

विलक्षण-मोक्षाधिकारी-निर्णय

श्रीमते रामानुजाय नमः

सौम्यजामातृयोगीन्द्र चरणाम्बुज षट्पदम् ।
देवराजगुरुं वन्दे दिव्यज्ञानप्रदं शुभम् ॥

शमदमादिगुणैकनिकेतनं, चरमपर्वणि निश्चलचेतसम् ।
यतिवराङ्घ्रिसरोरुहषट्पदं, समरपुङ्गवसद्गुरुमाश्रये ॥

प्रस्तावना

जब श्रीमान् वरवरमुनि (मणवाळ मामुनि) के शिष्य एरुम्बियप्पा (देवराज स्वामी) के सच्चे शिष्य सेनापतियान् मुदलियाण्डान् ने उनके चरणों में प्रणाम करके निवेदन किया—

“हम जैसे मोक्ष की इच्छा रखने वाले दासों के लिए, कृपया उन विलक्षण पुरुषों (विशेष व्यक्तियों) के स्वरूप का निर्णय कर अनुग्रहपूर्वक बताइए जो मोक्ष के अधिकारी (मोक्षाधिकरी) हैं।”

तब अप्पा ने कहा—

“क्या इस विषय में अब भी हमारे द्वारा निश्चित किया जाना कुछ शेष रह गया है?

सामान्य और विशेष का विभाग तो समस्त शास्त्रों, वेद-वेदान्त, गीता के आचार्य भगवान्, ऋषियों, आल्वारों और आचार्यों द्वारा पर्वत-शिखर पर रखे दीपक के समान स्पष्ट रूप से प्रकाशित किया जा चुका है।

फिर भी, लोक-हित के लिए, आपने जो प्रश्न किया है उसके उत्तर में हमारे आचार्यों द्वारा बताए गए कुछ विशेष विषयों को निवेदन करता हूँ।

कृपया ध्यानपूर्वक सुनिए।”

1. भगवत्कटाक्ष

आगे के भाग

2. आचार्योपसत्ति (आचार्य की शरण ग्रहण करना):

3. शिष्यजीवनम् (शिष्य का जीवन) :

4. सच्छिष्य-लक्षणम् :

5. आचार्य-लक्षणम्

6. आहार-नियति

7. 7. आश्रयदुष्ट पदार्थ एवं निमित्तदुष्ट पदार्थ

8. सहवास-नियति एवं अनुवर्तन-नियति

9. असद्-आचार्य-लक्षण

10. सदाचार्य-लक्षण

11. आचार्यत्व-द्वैविध्यम्

12. प्रातिकुल्य-निवृत्ति

13. शिष्याचार्य परिमात्रम्

श्रीदेवी के पति, समस्त दोषों के प्रतिकूल, अनन्त कल्याण-गुणों से युक्त, समस्त जगत् के स्वामी, पूर्णतः स्वतन्त्र तथा परम करुणामय भगवान्—

ऐसे स्वभाव वाले होने के कारण, समस्त जीवों के नियन्ता बनकर, अनेक प्रकार की मायिक मोहकारिणी शक्तियों द्वारा संसारबद्ध जीवों के साथ लीला करते रहते हैं।

इस प्रकार लीला-विभूति के चेतन जीवों के साथ क्रीड़ा करते हुए, किसी समय उनके दिव्य मन में यह संकल्प उत्पन्न होता है— “इनमें से किसी को संसार से उद्धार करना चाहिए।”

जैसा कहा गया है—

“जायमानम् हि पुरुषं यं पश्येन मधुसूदन| सात्विकं स तु विज्ञेयः स वै मोक्ष्यार्थ चिन्तकः” 

“संसार-चक्र में घूमते हुए तथा दुःख से अत्यन्त व्याकुल जीव को देखकर भगवान् विष्णु में किसी प्रकार की करुणा उत्पन्न होती है।”

वह जीव, अपने पूर्व पुण्य-पापों के कारण, जन्म, मृत्यु, नरक-पतन आदि विविध दुःखों का अनुभव करता हुआ, संसार-चक्र में घूम रहा होता है। उस पर भगवान् की कृपा उत्पन्न होती है। जैसा कहा गया है—

नासौ पुरुषकारेण न चाप्यन्येन हेतुना । केवलं स्वेच्छयाहं तु प्रेक्षे कञ्चित् कदाचन ॥ 

“न तो उसके किसी पुरुषार्थ के कारण, न ही किसी अन्य कारण से; केवल अपनी इच्छा से मैं कभी-कभी किसी पर दृष्टि डालता हूँ।”

जिस प्रकार कोई राजा केवल अपनी इच्छा से किसी एक प्रजा पर विशेष अनुग्रह कर देता है,

उसी प्रकार भगवान् अपनी निर्हेतुक कृपा से उस जीव पर विशेष कटाक्ष करते हैं।

जैसा कहा गया है—

जायमानं हि पुरुषं यं पश्येन्मधुसूदनः । सात्त्विकस्तु स विज्ञेयः स वै मोक्षार्थचिह्नकः ॥ 

“जिस मनुष्य पर जन्मकाल से ही मधुसूदन की दृष्टि पड़ती है, उसे सात्त्विक जानना चाहिए; वही मोक्ष का अधिकारी होने का चिह्न रखता है।”

उस जन्मकालीन भगवत्कटाक्ष के प्रभाव से वह जीव परम सात्त्विक बन जाता है, और उसमें मोक्ष की इच्छा उत्पन्न होती है।

वह सोचता है—”मोक्ष तो अर्थ-पञ्चक-ज्ञान द्वारा प्राप्त होता है, जो आचरण में परिणत होता है।

और यह समझकर कि यदि यह ज्ञान प्राप्त न हुआ, तो पुनः-पुनः जन्म और मृत्यु रूप संसार-दुःख ही प्राप्त होगा, वह संसार से वैराग्य प्राप्त करता है और सोचता है—

“मैं इस प्रकार संसार में पड़े रहना नहीं चाहता।”

आगे के भाग:

2. आचार्योपसत्ति (आचार्य की शरण ग्रहण करना):

3. शिष्यजीवनम् (शिष्य का जीवन) :

4. सच्छिष्य-लक्षणम् :

5. आचार्य-लक्षणम्

6. आहार-नियति

7. 7. आश्रयदुष्ट पदार्थ एवं निमित्तदुष्ट पदार्थ

8. सहवास-नियति एवं अनुवर्तन-नियति

9. असद्-आचार्य-लक्षण

10. सदाचार्य-लक्षण

11. आचार्यत्व-द्वैविध्यम्

12. प्रातिकुल्य-निवृत्ति

13. शिष्याचार्य परिमात्रम्

14. भगवदुपकरणम्

15. अनंग दशा

16. भगवदुपकारम्

17. अधिकारी निष्कर्षम्

18. अधिकारी द्वैविध्यम्

19. अधिकारी सम्पत्त

20. जीवन्मुक्त लक्षणम्

21. अर्थबोधन क्रम

22.