आलवार एवं श्रीवैष्णवाचार्यों की परम्परा

वेङ्कट गिरिपर भगवान जी, आये अधम उधारन।

भूत योगीश्वर महत भट्टवर, भक्तिसार अगवान जी। आये०

कुलशेखर श्रीयोगीवाहन, भक्त चरण रजमान जी। आये ०

जामातृ परकाल वीरवर, जिनसे लुटाये भगवान जी। आये ०

भाष्यकार यामुनमुनि योगी, राममिश्र परधान।आये ०

स्वामी पुण्डरीक-लोचनवर कृपा किये जन जान जी।आये ०

नाथ मुनिहुँ शठकोप मुनीश्वर विश्वक्सेन परधान जी।आये ०

माता श्री लक्ष्मी महारानी दया करो जन जान जी। आये ०

दीनहिं के हित भूतल आये, जानत परम सुजान जी। आये०

वेङ्कटेश भगवान का स्वरूप वर्णन

वेङ्कट गिरि पर स्वामी वैकुण्ठ से ही आये ।

श्री श्रीनिवास जन को यह भाव हैं बताये ।। १ ।।

है हस्त कमल सुन्दर दक्षिण अधो अपाने ।

करके उपाय सर्वोपरि चरण को दिखाये ।। २।।

हैं शङ्ख चक्र घर के प्रतिद्वन्द्व को हटाते ।

तैसे ही वाम कर से भव नाप को बताते ।। ३ ।।

जो दिव्य मुकुट माथे त्रैलोक्य नाथ नाते ।

है दास को यहाँ से वैकुण्ठ को ले जाते ।।४।।

यह गिरी समान गिरिवर ब्रह्माण्ड में न पाते ।

इनके समान जनहित तिहुँ लोक में न आते ।।५।।

वह दीन वचन सुनकर हरि दूर से हि धाते ।

भगवान कृपा करके हर रूप भी दिखाते ।। ६।।

श्रीवेङ्कटेश भगवान की स्तुति

श्रीनिवास प्रताप दिनकर, भ्राजता सब लोक में ।

सो दीनजन के तारने प्रभु, आबते भूलोक में ।।१

वह कृपा चित्तवन नाथ के, जन को सनाथ बनावता ।

वारीस करुण उमड़ उमड़ अघ, सकल दूर दहावता ।। २।।

ज्यों दिव्य दक्षिण हस्त में श्री अस्त्रराज विराजहीं।

त्यों तेजमय अति पाञ्चजन्यसु, वाम कर वरगाजहीं ।। ३ ।।

है कान्तिमत्सुन्दर पीताम्बर, अति विचित्र किनारियाँ ।

सो काछनी कटि में सुहावनि, सबन्हके मनहारियाँ ।।४।।

वनमाल औ मणिमाल अगणित, पुष्पमोतिन्ह लर रहे।

पुनि तैसहीं भगवान के भगवान माला बन रहे ।।५।

औ श्रवणकुण्डल मुकुटभूषण गणन में बहुमणि गणा ।

जनु श्याम घन में दामिनी बहु चन्द्र रवितारेगणा ।। ६ ।।

प्रभु दिव्य दक्षिण हस्त से निज चरण-शरण बताबहीं ।

नाभव तुम्हारे जानु लो सो, वाम से दिखलाबहीं ।।७।।

वह ज्योति जगमग जासु दशदिश विदिशिहूँ छायीमहाँ ।

सो देखते दरशक गणों के भागते अघतम महाँ ।।८।।

फणिराज पङ्कज रूप घर कर दिव्य आसन सोहहीं ।

सो दल अनेकों पाद तल सो लखत मुनि मन मोहहीं ।। ९ ।।

व्यूह पर वैभवन्ह व्यापी हूँ, कौन पाते यत्न से।

भगवान अर्चारूप धरकर, जनन से मिल सुगम से ।।१०।।

पर्ण फल जल पुष्प से सेवा, सुलभ अति प्रेम से ।

इसके लिए यह तन मिला लख, व्यास के उपदेश से ।। ११ ।।

भूधर समान न और भूधर, भूमि पर पाते कहीं।

सङ्घन्ध में जब देखते, इनके सुबश सर्वत्र ही ।।१२।।

है धन्य कुबर शिखर अहो, तिहुँ लोकनायक को बरे ।

ले साथ में आकाश गङ्गा धार झरझर झरारे ।।१३।।

औ अनन्त अलवार के पावन सरोवर है जहाँ।

है मुक्ति की इच्छा जिसे वैकुण्ठ में रहते तहाँ ।।१४।।

भाष्यकार स्वयं जिन्हें बन श्वसुर गुरु सेवा किये ।

सव दास को शिक्षा दिये अरु आप पावन यश लिए ।।१५।।

वह धन्य नर जो देखते पल स्वप्न में उस ठाम को ।

सो देव हैं नर, नर नहीं हैं, नरन में भगवान को ।।१६।।

भवभीति का ना डर कभी जो मन बसे हरिगीतिका ।

आशाबड़ी युग चरण की है, है कृपा परिपालिका ।।१७।।

हैं प्रणतपाल कृपालु हरि के चरण घर जीबन लहो ।

सो दीनबन्धु दयालुतावश, द्रवित होंगे ही अहो ।।१८।।

भगवान का सबसे सुलभ अवतार : अर्चा मूर्ति

1. श्रीनिवास आश्रित हित अपना, अर्चा रूप बनाते हैं।

द्रवित हृदय से आये गिरि पर, वेङ्कटनाथ कहाते हैं ।।

वेंकट पर्वत पर भगवान ने श्रीनिवास अवतार लिया। राम, कृष्ण आदि अवतार तो एक देश और एक काल में ही सुलभ हुए थे। अर्चा अवतार में भगवान सबके लिए सभी देश और सभी काल में सुलभ हो गए।

2. व्रात जनों के रक्षण हित, रक्षा-कङ्कण बन्धवाते हैं ।

शरणागत पर प्रेममयी, शीतल अँखिया दिखलाते हैं ।।

वेंकटेश भगवान के उत्सव मूर्ति ‘मलयप्पा स्वामी’ का पवित्रोत्सव। पीला पवित्र माला और पीताम्बर भगवान के शरणागत-परित्राण के व्रत को दर्शाता है। (जो व्रत लेते हैं, वो व्रत की समाप्ति तक पीला धागा बाँधे रहते हैं।)

3. दक्षिण कर से सब प्रकार, युग चरण उपाय बताते हैं ।

त्यों वामे करसे भव के लघु तरतर भाव बताते हैं ।।

दाहिने हस्त से अपने चरणों की शरण लेने की शिक्षा देते हैं (माम् एकं शरणं व्रज) और बाएं हस्त बताते हैं कि शरणागति के पश्चात जिसमें तुम डूब रहे हो, मैं उस संसार सागर को तुम्हारे घटने तक ला दूँगा। (सर्व पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि)।

4. अन्य हाथ में शङ्ख सुदर्शन, धर ऊँचे दिखलाते हैं।

‘डरो नहीं तुम डरो नहीं तुम, डरो नहीं हम आते हैं’ ।।

शंख भगवान के ज्ञान का और चक्र उनकी शक्ति का प्रतीक है। ‘डरो नहीं’, सर्वशक्तिमान भगवान तुम्हारे रक्षक हैं। (जैसे गजेन्द्र की रक्षा की है)

5. मैं हूँ अखिल लोक के नायक मुकुट पहन बतलाते हैं।

देखो वेद पुराण सूत्र गण, मेरे ही गुण गाते हैं ।।

भगवान का मुकुट उनके ‘स्वामित्व’ गुण का प्रकाश करते हुए कहता है कि यही अखिलाण्ड-कोटि-ब्रह्माण्ड-नायक नायक

भगवान की उदारता (श्रीनिवास भगवान हमहि अपने अपनाये जी ।)

स्वामिश्री परांकुशाचार्य जी ने रहस्यार्थों को सरल शब्दों में प्रकाशित करने हेतु अर्चा गुणगान की रचना की

भगवान द्वारा जीवात्मा को प्राप्त करने हेतु किये गए प्रयत्न

श्रीनिवास भगवान हमहि अपने अपनाये जी ।

1. ग्रन्थन में यह मिलत सबन में,

नर तन सुर दुर्लभ भारत में,

दे कर के भगवान हमहि,

वैष्णव जी बनवाये ।। श्री ०।।

पञ्च-संस्कार की प्रक्रिया से भगवान हमें वैष्णव बनाते हैं

2. पञ्चरात्र से शास्त्र मनोहर,

गीता के ज्ञानों अति सुन्दर,

ऐसे वचन सुनाय सुगम,

मारग बतलाये जी ।। श्री ०।।

गीताचार्य भगवान श्री पार्थसारथी (तिरुवल्लिकेनि, चेन्नई)

3. भाष्यकार के चरण लगाकर,

भागवत जन के सुहृद् बनाकर,

इन कर सेवा दे कर सुलभ –

उपाय बताये जी ।।श्री।।

भाष्यकार रामानुजाचार्य स्वामीजी ही उद्धारक आचार्य हैं। उनके सम्बन्ध से ही हमारा मोक्ष है।

4. दीन-हीन लख कृपा किये प्रभु,

आरत हरण गुण प्रकट किये हरि,

युगल चरण अति सुन्दर,

सिद्ध उपाय बताये जी ।। श्री०।।

आरत हरण गजेन्द्र वरद भगवान
भगवान के युगल (दोनों) चरण ही सिद्ध उपाय हैं, यह शिक्षा द्वय मन्त्र के पूर्व भाग से प्राप्त होता है।

तिरुप्पावै 30

तिरुप्पावै प्रबन्ध की अन्तिम गाथा फलश्रुति है। वस्तुतः प्रबन्ध 29वीं गाथा तक ही है। 29वीं गाथा तक गोदाम्बा एक गोपी की भाव समाधि में थीं। 30वीं गाथा में वो विष्णुचित्त की पुत्री गोदाम्बा ही हैं।

या, 28वीं और 29वीं गाथा में द्वय मन्त्र के पूर्व खण्ड एवं उत्तर खण्ड की व्याख्या थी। आज चरम पर्व निष्ठा, अर्थात आचार्य-अभिमान को ही उद्धारक मानने की शिक्षा है। स्तोत्र रत्न के अन्तिम श्लोक में भी आलवन्दार अपने पितामह एवं परमाचार्य नाथ मुनि स्वामी के संबंध से भगवान से प्रार्थना करते हैं (पितमहं नाथमुनिं विलोक्य)।

तमिल मूल गाथा:
वन्गक् कडल् कडैन्द मादवनै केसवनै
तिन्गळ् तिरु मुगत्तुच् चेळियार् सेन्ऱिऱैन्जि
अन्गप् पऱै कोण्ड आऱ्ऱै अणि पुदुवैप्
पैन्गमलत् तण् तेरियल् भट्टर्पिरान् कोदै सोन्न
सन्गत् तमिळ्मालै मुप्पदुम् तप्पामे
इन्गु इप्परिसु उरैप्पार् ईरिरण्डु माल् वरैत् तोळ्
सेन्गण् तिरुमुगत्तुच् चेल्वत् तिरुमालाल्
एन्गुम् तिरुवरुळ् पेऱ्ऱु इन्बुऱुवर् एम्बावाय्।।

श्री उ वे रंगदेशिक स्वामीजी द्वारा विरचित गोदा गीतावली से

श्री उ वे भरतन् स्वामी द्वारा अनुगृहीत 30वीं गाथा का संस्कृत अनुवाद:

३०.मन्थकं भङ्गवद्वार्धेर्माधवं केशिनाशनम्।
दीव्यच्चन्द्रानना गोप्यो रम्याभरणभूषिताः ।।
उपेत्यानम्य भेरीं ताम् अलभन्तेति वस्तुनि ।
धराऽलङ्कारभूतश्रीनव्याख्यनगरीशितुः ।।
धृतपद्माक्षमालस्य भट्टनाथस्य कन्यया।
गोदया कीर्तितास्त्रिंशद्गाथा द्राविडभाषया ।।
सुभोग्या माल्यवत्सर्वा येऽनुसंदधते भुवि ।
महापर्वतसंकाशबाहुद्वियुगशालिनः ।।
रक्ताक्षसौम्यवक्त्रस्य श्रीपतेः परमां कृपाम् ।
इहामुत्र च लब्ध्वा ते भजेरन् निर्वृतिं पराम् ।।

श्री उ वे सीतारामाचार्य स्वामीजी द्वारा विरचित हिन्दी छन्द

**वन्गक् कडल् कडैन्द मादवनै केसवनै

नावों से भरे क्षीराब्धि को मथने वाले माधव (लक्ष्मीपति) एवं केशव (सुन्दर केश वाले)

समुद्र मन्थन का मुख्य प्रयोजन श्री देवी की प्राप्ति था। देवताओं को सिर्फ क्षुद्र पदार्थ एवं अमृत मिला। भगवान माधव अर्थात लक्ष्मीपति बन गए।

समुद्र मन्थन के समय कच्छप भगवान के केश पूरे समुद्र में लहरा रहे थे। इसलिए गोदाम्बा भगवान के केशों का स्मरण करते हुए भगवान को केशव कहती हैं।

**तिन्गळ् तिरु मुगत्तुच्

चन्द्र के समान मुख वाली एवं रम्य आभूषणों को (कृष्ण द्वारा प्रदत्त) को धारण करने वाली गोपियाँ।

भगवान की प्राप्ति से गोपियों का श्रीमुख खिल गया और वो चन्द्रमुखी हो गईं। गोपियों का श्रृंगार को कन्हैया स्वयं अपने हाथों से करते थे। इसलिए वो दिव्य आभूषण धारण करने वाली कही गयी हैं।

**चेळियार् सेन्ऱिऱैन्जि

ने आकर भगवान की शरणागति की

(द्वय मन्त्र का पूर्व भाग)।

**अन्गप् पऱै कोण्ड आऱ्ऱै

और भेरी/कैंकर्य प्राप्त किया।

(द्वय मन्त्र का उत्तर भाग)।

**अणि पुदुवैप् पैन्गमलत् तण् तेरियल् भट्टर्पिरान् कोदै सोन्न

अलंकारों से विभूषित श्रीविल्लीपुत्तूर में कमलाक्ष माला धारण करने वाले विष्णुचित्त सूरी की पुत्री गोदा ने

(आचार्य सम्बन्ध से भगवान को ज्ञापन करना ही अन्तिमोपाय निष्ठा है।)

**सन्गत् तमिळ्मालै मुप्पदुम् तप्पामे

तमिल भाषा में 30 प्रबंधों को रचा। जो भी इन्हें पूरा का पूरा पढ़ते हैं

**इन्गु इप्परिसु उरैप्पार्

और इस प्रकार से गायन करते हैं वो

**ईरिरण्डु माल् वरैत् तोळ्

चार विशाल भुजाओं वाले

**सेन्गण् तिरुमुगत्तुच् चेल्वत्

लाल आंखों वाले (भक्तों के प्रति प्रेम के कारण) एवं सुन्दर मुख वाले

**तिरुमालाल् : श्री देवी के पति

** एन्गुम् तिरुवरुळ् पेऱ्ऱु

इस लोक में एवं परलोक में भगवान की कृपा प्राप्त करते हैं

इन्बुऱुवर्

एवं आनन्दित होते हैं।

पराशर भट्टर (कुरेश स्वामीजी (भगवद रामानुज स्वामीजी के प्रमुख शिष्य) के पुत्र) ने कहा जैसे गाय भूसा भरे अपने मृत बछड़े को देख कर भी दूध दे देती है, वैसे ही यह तीस पाशुर भगवान् को अति प्रिय है इस कारण इन्हे गाने वाले को वही फल प्राप्त होगा जो फल भगवान के प्रिय जनों को मिलता है।

गाय बछड़े को देखकर दूध देती है किन्तु ग्वाले को दुग्ध-लाभ हो जाता है।

भट्टर कहते हैं कि यदि कोई पूरी गाथा न पढ़ सके तो कम से 29वीं और 30वीं। यदि इतना भी न कर सके तो गोदा अम्माजी से अतिशय प्रेम करने वाले पराशर भट्टर स्वामी एवं उनकी गोष्ठी का स्मरण कर ले।

तिरुप्पावै 29

कल की 28वीं गाथा में गोदाम्बा जी की गोष्ठी नप्पिनै के पुरुषकार से एवं, अकिंचन और अनन्य-गति होकर कृष्ण की शरणागति किये। यह द्वय मन्त्र के पूर्वार्द्ध का मन्त्रार्थ है।

आज की 29वीं गाथा में भगवान का सर्वदेश, सर्वकाल, सर्वविध एवं सर्वावस्था कैंकर्य माँगा जाता है। यह कैंकर्य भी एकमात्र भगवान की प्रसन्नता के उद्देश्य से हो। इसमें हमारी स्वार्थ-बुद्धि नहीं हो।

अथवा पूर्व में अनन्यार्ह शेषत्व का निवेदन कर चुकी हैं। 28वीं गाथा में अनन्य शरणत्व और आज की 29वीं गाथा में अनन्य भोग्यत्व का प्रकाशन करती हैं।

श्री उ वे भरतन् स्वामी द्वारा अनुगृहीत 29वें पद का संस्कृत छन्दानुवाद:

२९.प्रत्यूष उपगम्य त्वां सेवित्वा, स्वर्णभास्वती ।
पदाम्भोजे तव स्तुत्वा प्रार्थ्यमानं फलं शृणु ।।
धेनुसंचारणाजीवे वंशेऽस्मिन्नवतीर्ण! भोः ।
त्वमन्तरङ्गकैङ्कर्यम् अस्मत् स्वीकर्तुमर्हसि ।।
अद्य भेरीमिमां लब्धुम् वयं गोविन्द ! नागताः।
अवतारेऽप्यजस्रं त्वत्सम्बन्धिन्यो भवाम हि।।
शेषवृत्तीश्च कुर्याम त्वत्प्रीत्येकप्रयोजनाः ।
कृपयैतद्विरुद्धान्नः कामानन्यान् निवर्तय ।।

तमिल मूल गाथा:

सिऱ्ऱम् सिऱु काले वन्दु उन्नैच् चेवित्तु उन्
पोऱ्ऱामरै अडिये पोऱ्ऱुम् पोरुळ् केळाय्
पेऱ्ऱम् मेय्त्तु उण्णुम् कुलत्तिल् पिऱन्दु नी
कुऱ्ऱेवल् एन्गळैक् कोळ्ळामल् पोगादु
इऱ्ऱैप् पऱै कोळ्वान् अन्ऱु काण् गोविन्दा
एऱ्ऱैक्कुम् एळेळ् पिऱविक्कुम् उन्दन्नोडु
उऱ्ऱोमे आवोम् उनक्के नाम् आट् सेय्वोम्
मऱ्ऱै नम् कामन्गळ् माऱ्ऱु एलोर् एम्बावाय्।।

श्री उ वे रंगदेशिक स्वामी द्वारा विरचित गोदा-गीतावली से
श्री उ वे सीतारामाचार्य स्वामीजी द्वारा विरचित हिन्दी छन्दानुवाद

**सिऱ्ऱम् सिऱु काले वन्दु
“प्रातः काल आकर हमलोग”

(भगवद-अराधना हेतु प्रातःकाल सर्वश्रेष्ठ होता है। इस काल में सत्त्व-गुण परिपूर्ण होता है। ‘ब्राह्मे मुहूर्ते उत्तिष्ठेत् स्वस्थो रक्षार्थमायुषः’। )
इस शरद ऋतु में प्रातःकाल ठंढे यमुना जल में स्नान करके हम आयी हैं।)

कन्हैया तो भोर होते ही गैया चराने चल जाता है। दोपहर को ऋषि पत्नियों के हाथ का भोजन करता है। देर शाम को गैयों के पीछे पीछे घर आता है। फिर नन्दजी के साथ बैठकर भोजन करता और खेलने निकल जाता है। उससे मिलना है तो ब्रह्म-मुहूर्त काल की श्रेष्ठ है।

**उन्नैच् चेवित्तु

“आपके दर्शन/सेवा हेतु”

(अपने सखियों को जगाकर, द्वारपालक एवं क्षेत्रापालक की आज्ञा लेकर, नन्दगोप, यशोदा एवं बलराम को उठाकर, नप्पिनै के पुरुषकार से आपके पास आये हैं।)

**उन् पोऱ्ऱामरै अडिये पोऱ्ऱुम्

“स्वर्ण कमल के समान सुन्दर और सुगन्धित आपके चरण कमलों के गुणगान करने आई हैं।”

इस प्रबन्ध के प्रारम्भ में, मध्य में एवं अन्त में मंगलाशासन है। अर्थात इस ग्रन्थ का उद्देश्य मंगलाशासन करना ही है।

**पोरुळ्
“हमारे वाँछित फल”

क्या गैयों के पीछे चलते-चलते तुम्हारी बुद्धि भी पशु-समान हो गयी है? हम कोई लौकिक पदार्थ माँगने नहीं आयी हैं। पूर्व में हमने जो ढोल आदि पदार्थ माँगे थे वो तो दिखावा मात्र थे। वरना वृद्ध गोपियाँ हमें कभी तुम्हारे पास नहीं आने देतीं।

ये व्रत तो तुमसे मिलने का व्याज मात्र है।

केळाय् : सुनो

कृष्ण गोपियों के प्रेम में इतने मग्न हैं, उन्हें एकटक से निहार रहे हैं । गोदा को उन्हें बोलना पड़ है कि तन्द्रा से जागो और सुनो।

**पेऱ्ऱम् मेय्त्तु उण्णुम् कुलत्तिल् पिऱन्दु नी
कुऱ्ऱेवल् एन्गळैक् कोळ्ळामल् पोगादु

“तुम हमारे ग्वाल कुल में जन्म लिए जो गाय चराकर पेट भरते हैं। आपको हमारी सेवायें प्राप्त करनी चाहिये।”

(तुम्हारे अवतार का उद्देश्य ही जीवात्म-प्राप्ति है। तुम यदि बैकुंठनाथ होते तो हम निर्बंध नहीं करते। लेकिन तुम तो हमारे साथी ग्वाल हो। सौलभ्य-परिपूर्ण हो। तुम न नहीं कह सकते।)

**कुऱ्ऱेवल् एन्गळैक् कोळ्ळामल् पोगादु

“तुम्हें हमें अस्वीकार नहीं करना चाहिए अपितु अंतरंग कैंकर्य प्रदान करना चाहिए”

(गोदाम्बा अन्तरंग कैंकर्य चाहती हैं। लक्ष्मण जी की तरह। बहिरंग कैंकर्य से को संतुष्ट नहीं होतीं।)

(भगवान से कुछ माँगते समय स्पष्ट होना चाहिए। देवकी ने सिर्फ पुत्र रूप में प्राप्ति मांगा था और यशोदा ने बाल लीला। दोनों को सिर्फ उतना ही मिला।)

**इऱ्ऱैप् पऱै कोळ्वान् अन्ऱु काण् गोविन्दा

“हे गोविन्द! हम यहाँ ढोल माँगने नहीं आयी हैं।”

(अब तो गोदाम्बा कहती आईं कि हमें ढोल/भेरी चाहिए। अब बोल रही हैं कि ढोल कहना तो सिर्फ आपके पास आने का बहाना था। गाँव के वृद्ध उन्हें कृष्ण के पास जाने नहीं देते। व्रत के बहाने ही वो राजी हुए हैं। अथवा, ढोल माँगना कैंकर्य का उपलक्षण है।)

**एऱ्ऱैक्कुम् एळेळ् पिऱविक्कुम् उन्दन्नोडु उऱ्ऱोमे आवोम्

“हम जितने भी जन्म लें, आपके साथ ही रहें।”

(चाहे वैकुण्ठ हो या कहीं और, हमें तुम्हारे साथ ही रहना है, तुम्हारा अन्तरंग कैंकर्य करना है। अन्तरंग कैंकर्य का अर्थ है साथ में रहकर प्रत्यक्ष रूप से कैंकर्य करना। श्री वैष्णवों के लिए यही अभीष्ट है कि आचार्य के पास रहकर उनकी सेवा करें। दूर रहकर बहिरंग कैंकर्य यदि आचार्य आज्ञा दें तभी।

आप वैकुण्ठ में हो तो वहाँ अनेक शरीर धारणकर आपकी सेवा करें। आप अवतार धारण करें तो वहाँ भी हम आपके साथ हों। लक्ष्मण जी की भाँति। भगवान वेंकटेश हैं तो वो वेंकट पर्वत। भगवान रंगनाथ हैं तो वो रामानुज। आदि रूपों से।)

** उनक्के नाम् आट् सेय्वोम्

“तवैव दास्यं करवाम। हम केवल आपकी ही दासता करें।”

(आपकी ही करें कहने का अर्थ सिर्फ इतना नहीं कि आपके अतिरिक्त अन्यों की सेवा न करें। अपितु यह कि “आपकी प्रसन्नता हेतु ही आपका कैंकर्य करें।” यहाँ कैंकर्य में स्वार्थ-बुद्धि का निषेध किया जाता है। अपनी इच्छा से या अपनी प्रसन्नता हेतु हम भगवान की सेवा नहीं करते। एकमात्र उद्देश्य भगवान की प्रसन्नता, उनका मुखोल्लास है।

‘तुम्हारे सुख के लिए ही’ – ऐसा कहने इस बुद्धि का खण्डन हो गया तुम्हारी भी प्रसन्नता और मेरी भी प्रसन्नता हेतु कैंकर्य हो। एकमात्र भगवान की मुखोल्लास हेतु कैंकर्य करना है।

कैंकर्य करते समय हम प्रसन्न भी इसी कारण होंगे कि हमें प्रसन्न देखकर भगवान भी प्रसन्न होंगे। हम यदि उदास मुझ से सेवा करेंगे तो भगवान को आनन्द नहीं आएगा।)

**मऱ्ऱै नम् कामन्गळ् माऱ्ऱु

“हमारी अन्य सभी कामनाओं को परिवर्तित कर दो।”

(गोदाम्बा यहाँ कामनाओं को नष्ट करने की बात नहीं करती। कामनाओं को नष्ट करना विनाशकारी हो सकता है। कामनाओं को दबाएं नहीं अपितु उन्हें भगवान की तरफ मोड़ दें। उदाहरण के लिए यदि पुत्र से आसक्ति हो तो पुत्र को भगवान का उपहार और उसे भगवत-प्राप्ति के मार्ग में लगाने को अपना कर्तव्य समझें। यदि सुस्वादु भोजन में रुचि आये तो उसे भगवान को समर्पित करें और भगवान की प्रसन्नता हेतु सुस्वादु खाना पकाएं।)

(हम प्रातःकाल सत्त्वगुण से पूर्ण होने के कारण निःस्वार्थ कैंकर्य माँग रहे हैं। यदि बाद में तमोगुण के प्रभाव में कुछ स्वार्थ माँग भी लें तो उसे अपनी कृपा से परिवर्तित कर दें।)

स्वापदेश:

गोविन्द: नारायण

उनक्के नाम् आट् सेय्वोम् : आय (कैंकर्य प्रार्थना)

मऱ्ऱै नम् कामन्गळ् माऱ्ऱु : नमः (स्व-भोग्यत्व निवृत्ति)

किंकर वो होता है जो कैंकर्य प्रार्थना करता है: ‘किं करवाणि’ (मैं क्या सेवा कर सकता हूँ।) अपने मन-मर्जी से कुछ भी करना कैंकर्य नहीं है। हमारा स्वरूप सिर्फ कैंकर्य-प्रार्थना करना है। क्या कैंकर्य देना है, ये भगवान/आचार्य का अधिकार है।

शेष वही होता है, जो कैंकर्य प्रार्थना करे। इस कारण ‘कैंकर्य प्रार्थना’ करना हमारा स्वरूप ही है।

किन्तु प्रार्थना क्यों करें?

जिस प्रकार माता का पुत्र बहुत काल से बीमार हो, कुछ खाता पिता न हो। किन्तु जब वह स्वस्थ होता है और माँ से बोलता है कि खाना दो, तब माँ को कितनी प्रसन्नता होती है! यदि बच्चा न माँगे, फिर भी माता खाना अवश्य देगी। डाँटकर भी खिलाएगी। किन्तु जब बच्चा स्वयं खाना माँगे तो माँ को अतिशय प्रसन्नता होती है।

हम भी अनेक काल से भगवान के द्रोही थे। जब हम कैंकर्य प्रार्थना करते हैं तो भगवान को प्रसन्नता होती है। भगवान के इसी प्रसन्नता हेतु हमें नित्य ही कैंकर्य प्रार्थना करना है।

तिरुप्पावै 27

गोविन्द नाम से सम्बोधन, घृतपूरित क्षीरान्न का भोग लगाती हैं एवं कृष्ण से सायुज्य माँगती हैं। गोपियाँ अपने लिए विभिन्न आभूषण माँगती हैं।

आज 27वीं गाथा में गोदाम्बा भगवान को अक्कार-अडिसल नामक क्षीरान्न का भोग लगती हैं। इसकी सामग्री एवं विधि स्वयं इस गाथा में बताती भी हैं। इसका गूढ़ार्थ ‘सायुज्य‘ है। पूर्व में वो सालोक्य तो प्राप्त कर ही चुकी हैं। ‘सारूप्य’ 26वीं गाथा में मिल गया। सारूप्य अर्थात भगवान के समान रूप का हो जाना। चतुर्भुज होकर शङ्ख-चक्र धारण किये होते हैं नित्य और मुक्त।

सायुज्य का अर्थ है भगवान से जुड़ जाना। किस प्रकार? जैसे अक्कार-अडिसल में दूध, घी, चावल और गुड़ मिल जाता है। उनके एक दूसरे से पृथक कर पाना सम्भव नहीं है। मुक्ति की अवस्था में जीवात्मा और परमात्मा की यही अवस्था होती है। जीवात्मा के भोग्य परमात्मा होते हैं एवं परमात्मा के भोग्य जीवात्मा। दोनों ऐसे घुल-मिल जाते हैं मानों दो नहीं एक हों। यही सायुज्य आज गोदाम्बा को प्राप्त होता है।

कूडारै वेल्लुम् सीर्क् गोविन्दा उन्दन्नैप्
पाडिप् पऱै कोण्डु याम् पेऱु सम्मानम्
नाडु पुगळुम् परिसिनाल् नन्ऱाग
सूडगमे तोळ् वळैये तोडे सेविप्पूवे
पाडगमे एन्ऱु अनैय पल् कलनुम् याम् अणिवोम्
आडै उडुप्पोम् अदन् पिन्ने पाल् सोऱु
मूड नेय् पेउदु मुळन्गै वळिवार
कूडि इरुन्दु कुळिर्न्दु एलोर् एम्बावाय्

श्री उ वे रंगदेशिक स्वामीजी द्वारा विरचित गोदा-गीतावली से:

श्री उ वे सीतारामाचार्य स्वामीजी द्वारा विरचित हिन्दी छन्द

श्री उ. वे. भरतन् स्वामी द्वारा अनुगृहीत 27वीं गाथा का संस्कृत छन्दानुवाद:

२७.शत्रुजिद्गुण! गोविन्द ! त्वां वै संकीर्त्य, भेरिकाम् ।
लब्ध्वाऽस्माभिः सभूश्लाघं प्राप्यः सम्मान उच्यते ।।

वलयाङ्गदताटङ्ककर्णपुष्पाङ्घ्रिभूषणम् ।
बहून्याभरणान्येवं वयं सम्यग्धरेमहि ।
क्षौमवस्त्रं वसित्वाऽथ क्षीरान्नं घृतपूरितम् ।
सङ्घीभूय मुदाऽद्याम कफोणिप्रवहद्घृतम् ।।

**कूडारै वेल्लुम् सीर्क् गोविन्दा: शत्रुओं को जीतने वाले गुण वाले गोविन्द!

किसी को अपने वीर्य, शौर्य पराक्रम से (जयन्त आदि) तो किसी को अपने प्रेम, सुशील्य, सौन्दर्य आदि से जीत लेने वाले भगवान गोविन्द।

गोपियाँ भी पूर्व में ‘कूडार’ थीं। किन्तु भगवान की भोग्यता ने उन्हें जीत लिया और वो प्रेम-परवश होकर उनके महल में आ चुकी हैं।

गोविन्द नाम से भगवान के सौलभ्य का बोध होता है। तुम कोई वैकुंठाधीप या मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं हो अपितु हमारे साथ अभीरों के कुल में उत्पन्न हुए हो।

भगवान की प्रथम कृपा है भगवान के प्रति द्वेष भाव का नष्ट होना| अद्वेष के बाद आभिमुख्य एवं सात्त्विक-सम्भाषण आदि प्राप्त होते हैं| आज जो हम स्वयं को भगवान का भक्त कहकर गर्व अनुभव करते हैं, पूर्व काल में हम सभी भगवान के प्रति शत्रुता रखते थे| भगवान ने हमें अपने रूप, गुण, कृपा आदि से जीतकर हमें भक्त बनाया है| इसमें हमें गर्व लेने जैसा कुछ नहीं है, यह भगवान की ही कृपा है|

**उन्दन्नैप् पाडिप् पऱै कोण्डु याम् पेऱु सम्मानम्

हम आपके गुण आयेंगी और आप हमें भेरी (कैंकर्य) दीजिये और सम्मानित कीजिये।

जब कोई जीवात्मा वैकुण्ठ में प्रवेश करता है तो भगवान नित्यो एवं मुक्तों की भी अवहेलना करते हुए उसे प्रेम करते हैं। जैसे कोई गैया अपने नए बछड़े की सुरक्षा हेतु अपने पुराने बच्चों को भी दूर भगाती है और झिड़क देती है।

**नाडु पुगळुम् परिसिनाल् नन्ऱाग

आप हमें ऐसा सम्मान दीजिये कि तीनों में लोग आश्चर्य करें।
(कि भगवान जीवों से कितना प्रेम करते हैं)

गोपियाँ को जो भी प्राप्त है वो भगवान की कृपा से ही प्राप्त है| इसलिए गोपियाँ अपने लिए सम्मान इसलिए माँग रही हैं ताकि भगवान का गौरव हो| गोविन्द जीयर को किसी ने विद्वान कहकर प्रशंसा किया तो उन्होंने स्वीकार किया कि हाँ मैं विद्वान हूँ| क्योंकि अपनी विद्वत्ता को रामानुज स्वामी की कृपा से प्रदत्त मानते हुए वो इसे रामानुज स्वामी की ही प्रशंसा मान रहे थे|

क्योंकि भगवान के अनुग्रह से ही प्रशंसापात्र बन गयी है । अतः ऐसी प्रशंसा के चाहने में और सुनने में कोई आपत्ति नहीं है ।दूसरी बात यह है कि यह प्रशंसा सुनकर कितने ही उदासीन एवं द्वेषी जन भी ऐसे सन्मान पाने के लिए भगवान में भक्ति करने लगेंगे ।

**पाडगमे एन्ऱु अनैय पल् कलनुम् याम् अणिवोम्

आपसे और नप्पिनै से हमें भांति भांति के आभूषण धारण को मिलते है, जैसे कंगन, बाजूबन्द, कुण्डल, कान में ऊपर की तरफ पहना जाने वाला आभूषण , पायल और भी अन्य।

(जीवात्मा के विरजा पर करने के बाद उसे सरोवर में स्नान करवाकर, अनेक प्रकार के सुगन्धित वस्त्र एवं आभूषण लक्ष्मी अम्मा भेजवाती हैं।)

**आडै उडुप्पोम् अदन् पिन्ने पाल् सोऱु
मूड नेय् पेउदु मुळन्गै वळिवार
कूडि इरुन्दु कुळिर्न्दु एलोर् एम्बावाय्

हम सब आप द्वारा प्रसादित वस्त्र धारण कर, हम सभी घी से तर अक्कारवड़ीसल (एक मीठा अन्न जो चांवल, दूध, गुड़ और घी के मिश्रण से बनता है) पायेंगे, जिसे पाते समय घी, हथेलियों से निकल कोहनियों से बहा रहा होता है ।

*एक मास तक घृत का सेवन गोपियों ने नहीं किया और श्रीकृष्ण भी अकेले इसका उपयोग न कर सके ।फलतः व्रज में घृत इतना इकट्टा हो गया की रखने के लिए जगह नहीं है इसलिए गोपियाँ कहती है की वह सब घृत क्षीरान्न में लगा दिया जाय ।*

*सभी दिव्य देशों में इतने दिन पोंगल का भोग लगता है और 27वे पाशुर के दिन उसमें वर्णन किये गये अनुसार घृत पूर्ण क्षीरान्न का भोग भगवान को लगाया जाता है ।*

चावल यदि जीव है तो दूध भगवान के कल्याण गुण। उसके ऊपर तैर रहा घी हमारा उमड़ रहा प्रेम है। दूध और चावल अर्थात ब्रह्म और जीव एक दूसरे का इस प्रकार आनन्द ले रहे हैं कि एक-दूसरे से सायुज हो चुके हैं।

सोഽश्नुते सर्वान कामां सह ब्रह्मणा विपश्चितेति ..|| 2.1.1 || तैतरीय उपनिषद

वो जीवात्मा ब्रह्म के साथ उसके सभी गुणों को भोग करता है।

यह भी स्मरण करना चाहिए:

अहमन्नमहमन्नमहमन्नम्। अहमन्नादो२ऽहमन्नादो२आहमन्नादः।
अहमन्नमन्नमदन्तमा३द्मि

जीवात्मा: मैं अन्न हूँ! मैं अन्न हूँ!

परमात्मा: मैं अन्न अन्नभोक्ता हूँ! मैं अन्नभोक्ता हूँ! मैं अन्नभोक्ता हूँ!

जीवात्मा: मैं मुझे खाने वाले को खा रहा हूँ।

इस प्रकार की दशा सायुज्य है जो आज गोदाम्बा को प्राप्त होता है।

श्री रामानुजाचार्य एवं आलवार आचार्य बताते हैं कि यह पाशुर कैंकर्य सिद्धांत को स्थापित करता है—मोक्ष का अर्थ भगवान की नित्य सेवा है। भगवान स्वयं भक्तों को अपने पास बुलाते हैं और सेवा का अधिकार देते हैं।

कोहनी से घृत गिरना इसका अर्थ है *आचार्य शिष्य परम्परा द्वारा भगवत भागवत आचार्य गुणानुवाद करना ।*

भूषणों का रहस्य –

👉चूड़ी – चूड़ी शब्द से हस्त का भूषण अंजलि मांगी जाती है । *आचार्य कृपा से सदैव अंजलिहस्त के साथ आपकी सेवा में रहे ।*

👉भुजभूषण ( बाजुबन्द ) – *शंख चक्राकंन ही दोनों बाहुओं के भूषण है* जो आचार्य कृपा से मिलते है ।

👉कान के कुण्डल – *कान का भूषण भगवत कथा और आचार्य वैभव श्रवण है ।*

👉पादभरण – भगवान और आचार्य सन्निधि में जाना ही पैरों का आभूषण है । *निरन्तर भगवत भागवत आचार्य सेवा करने का भाग्य माँगा जाता है ।*

तिरुप्पावै 26

गोदाम्बा ने भगवान का मंगलाशासन किया, अवतार रहस्य ज्ञान से उनकी प्रशंसा की तो प्रसन्न होकर उनके आने का प्रयोजन पूछते हैं। यद्यपि पूर्व में भी गोदाम्बा ने कहा है कि हम आपसे भेरी अर्थात कैंकर्य माँगने आये हैं किन्तु भगवान उनसे उनके व्रत के विषय में पूछते हैं। व्रत तो व्याज/बहाना है। बृद्ध गोपों ने इसी व्रत के कारण गोपियों को कृष्ण से मिलने की अनुमति दी है। इसलिए कृष्ण भी व्रत के एच्छित सामग्रियाँ पूछती हैं।

श्रृंखला : तिरुप्पावै (गोदा देवी जी का दिव्य व्रत)

माले मणिवण्णा मार्गळि नीर् आडुवान्
मेलैयार् सेय्वनगळ् वेण्डुवन केट्टियेल्
ग्यालत्तै एल्लाम् नडुन्ग मुरल्वन
पाल् अन्न वण्णत्तु उन् पान्चसन्नियमे
पोल्वन सन्गन्गळ् पोय्प्पाडु उडैयनवे
सालप् पेरुम् पऱैये पल्लाण्डु इसैप्पारे
कोल विळक्के कोडिये विदानमे
आलिन् इलैयाय् अरुळ् एलोर् एम्बावाय्

श्री उ वे रंगदेशिक स्वामीजी द्वारा विरचित ‘गोदा-गीतावली’ से

श्री उ वे मीमांसा शिरोमणि भरतन् स्वामी द्वारा अनुगृहीत 26वीं गाथा का संस्कृत छन्दानुवाद:

श्रितेषु वत्सल! स्वामिन् ! इन्द्रनीलाभकान्तिमन्!।
पूवैराचरितायास्मै मार्गशीर्षाप्लवाय नः ।।
अपेक्षितानि वस्तूनि कथ्यन्ते शृणुतादयि ! ।
बृहत्तमाश्च सर्वस्या जगत्याः कम्पदस्वनाः।।
पय:समानवर्णात्वत्पाञ्चजन्याभकम्बवः ।
सुमहद् भेरिवाद्यं च मङ्गलस्तुतिगायकाः ।।
रम्यदीपो ध्वजोल्लोचौ सर्वमेतदपेक्षितम् ।
कृपया परया देहि वटपत्रपुटेशय ! ।।२६।।

श्री उ वे सीतारामाचार्य स्वामीजी द्वारा विरचित हिन्दी छन्द

**माले: इसके तीन अर्थ हो सकते हैं। व्यामोह/प्रेम, बहुत बड़ा और श्यामल

प्रसंग से व्यामोह अर्थ लेना ही उचित है। किन्तु भगवान को ‘व्यामुग्ध’ बोलना चाहिए। जिसे व्यामोह होता है उसे व्यामुग्ध कहते हैं। किन्तु गोदाम्बा कृष्ण को ‘व्यामोह’ या ‘प्रेम’ कहती हैं।

आचार्यजन इसे समझाते हैं। जैसे पाक में नमक अधिक हो तो कहते हैं कि ये पाक नहीं, नमक ही है। कोई व्यक्ति अत्यन्त क्रोधी हो तो उसका नाम ही क्रोध रख देते हैं। उसी भगवान में भक्तों के प्रति व्यामोह इतना विशेष है कि उनका नाम ही हो गया है: “व्यामोह”।

सहस्रागीति में शठकोप आळ्वार भगवान के प्रति अपने प्रेम का वर्णन करते हुए कहते हैं कि ये तीनों सागर से भी अधिक बड़ा है। आगे जाकर कहते हैं कि ये जीवात्मा से भी बड़ा है। फिर अन्त में कहते हैं कि ये तो भगवान के सर्व-व्यापक स्वरूप से भी बड़ा है। अर्थात उत्तरोत्तर उनका प्रेम बढ़ता जाता है और वो पर-भक्ति, पर-ज्ञान की अवस्था से आगे जाकर परम भक्ति की अवस्था में आ जाते हैं।

फिर वो भगवान को उनकी सौगन्ध देते हुए कहते हैं कि तुम मुझे अपना लो, मैं तुमसे इतना प्रेम करता हूँ कि तुम्हें खा जाऊंगा। किन्तु जब उन्हें भगवान के दर्शन होते हैं और वो भगवान का उनके लिए प्रेम देखते हैं तो द्रवित होकर पिघल जाते हैं। कहते हैं कि मैं तो सोचा था कि भगवान को खा जाऊँगा लेकिन वो तो मुझे पी गए। खाने के अपेक्षा पीना अधिक सरल होता है। अर्थात भगवान का जीवात्मा के प्रति प्रेम, जीवात्मा का भगवान के प्रति प्रेम से कहीं अधिक है।

भगवान के इसी व्यामोह का दर्शन करते हुए गोदाम्बा उन्हें ‘व्यामोह कृष्ण’ कहती हैं।

यहाँ भगवान के शरणागत-वत्सल होने का अनुसंधान करना चाहिए। पूर्व गाथा में अवतार रहस्यज्ञान के विषय में बोला गया। भगवान के अवतार लेने के पीछे उद्देश्य तो एक ही है: जीवात्म-प्राप्ति।

**मणिवण्णा: मणि के समान वर्ण वाले। अर्थात नीला।

आकाश और सागर को नीला रंग का क्यों कहते हैं? क्योंकि वो अत्यन्त विशाल हैं। किन्तु भगवान से अधिक विशाल क्या होगा?

अथवा मणि के समान बहुमूल्य, तेजस, भयहरण आदि गुणों वाले।

माले से कहा गया कि शरणागत-वत्सल भगवान जीवात्म से इतना प्रेम करते हैं कि उन्हें प्राप्त करने हेतु संसार में आते हैं।
अब कहती हैं कि तुम हमें प्रेम न करो फिर भी तुम्हारे सौन्दर्य से वशीभूत हम तुम्हें नहीं छोड़ सकतीं।

**मार्गळि नीर् आडुवान्

हम मार्गशीर्ष अवगाहन स्नान का व्रत करेंगी।
ये व्रत क्या है?

मेलैयार् सेय्वनगळ्
ये व्रत तो अत्यन्त प्रसिद्ध है। हमारे पूर्वजों ने किया है (द्वापर की गोपियाँ)। स्नान का व्यंगार्थ भगवान का गुणानुभव है।

कृष्ण कहते हैं कि ठीक है, व्रत के हेतु तुमलोग सामग्री माँगने आये हो न। क्या चाहिए?

यहाँ व्यंगार्थ अत्यन्त महत्वपूर्ण है। पूर्व में कहा था कि जो पूर्वजों ने नहीं किया है वो हम नहीं करेंगी (सैय्यादन सैयोम) और अब कह रही हैं कि जो पूर्वजों ने किया, वैसा ही करेंगी। अर्थात जैसा शिष्टाचार है वही करेंगी, उसके विपरीत कुछ भी नहीं करेंगी।

**ग्यालत्तै एल्लाम् नडुन्ग मुरल्वन
पाल् अन्न वण्णत्तु उन् पान्चसन्नियमे

पाञ्चजन्य के समान श्वेत शङ्ख, जिसकी नाद पूरा संसार सुने।

(पाञ्चजन्य के समान दूसरा क्या हो सकता है? अर्थात पाञ्चजन्य ही चाहिए। और भगवान पाञ्चजन्य से दूर कैसे रह सकते हैं? अर्थात भगवान, तुम स्वयं को हमें दे दो।)

** सालप् पेरुम् पऱैये

जोर से आवाज करने वाला ढोल चाहिए।
(अर्थात कैंकर्य)

**पल्लाण्डु इसैप्पारे
आपका मंगलाशासन करने वाले लोग चाहिए

(अर्थात गरुड़ आदि नित्य सूरी वर्ग)

**कोल विळक्के कोडिये विदानमे

मङ्गल दीप, ध्वजा और वितान चाहिए

(आचार्य इसका व्यंगार्थ ज्ञान, वैराग्य और भक्ति कहते हैं।)

अथवा, मङ्गल दीप अर्थात नप्पिनै देवी, ध्वजा अर्थात गरुड़ जी और वितान अर्थात अनन्त शेष जी।

इन सबके के साथ, अनवधिक परिजन परिचारकों के साथ, दिव्य आयुधों को धारण किये आप ही चाहिए।

**आलिन् इलैयाय् अरुळ्

हे वटपत्रशायी! कृपा करके ये सब प्रदान कीजिये

वटपत्रशायी लीला अचिन्त्य है। जब तीनों लोकों को आपने अपने उदर में खा लिया था तो आप किस प्रलय जल पर लेटे थे। तीनों लोक आपके भीतर और प्रलय जल के ऊपर।

फिर आपके लिए हमारे एच्छित वस्तुएँ देना कोई बड़ी बात तो नहीं है कृष्ण!

तिरुप्पावै 25

25 वीं गाथा में गोदाम्बा अब अवतार रहस्य ज्ञान के विषय में बताती हैं। भगवान को व्यामोहशील/प्रेम-मूर्ति श्रीपति कहकर सम्बोधित करती हैं एवं श्री देवी के समान ही कैंकर्य की प्रार्थना करती हैं।

ऋषि भगवान के लिए ‘आविर्भाव’ शब्द प्रयोग करते हैं। वो समझते हैं कि भगवान के लिए ‘जन्म’ शब्द का प्रयोग करना भगवान के परत्व के अनुरूप नहीं होगा।

किन्तु आळ्वार एवं गोदाम्बा यह सोचते हैं कि ‘आविर्भाव’ शब्द के प्रयोग से भगवान का ‘सौलभ्य’ ही नष्ट हो जाएगा। वैकुण्ठनाथ का विशेष गुण है परत्व। किन्तु अवतारों का विशेष गुण है ‘सौलभ्य’ एवं ‘सौशील्य’। अक्रूर, मालाकार जैसे परम भक्तों के लिए सुलभ होने हेतु ही भगवान अवतार लेते हैं (परित्राणाय साधूनां)। दुष्टों का विनाश प्रमुख प्रयोजन नहीं है (विनाशाय च दुष्कृताम्)। बाकि शिशु तो 9 महीने माता के गर्भ में रहते हैं किन्तु कन्हैया 12 महीने देवकी के गर्भ में रहे। दुग्ध पान उन्होंने यशोदा के स्तन का किया, इसलिए वो भी माता हुईं।

भगवान को पुत्र रूप प्राप्त करने हेतु 4 लोगों ने तपस्या की। इस प्रकार भगवान के 2 माता एवं 2 पिता हुए।

श्रृंखला : तिरुप्पावै (गोदा देवी जी का दिव्य व्रत)

श्री उ वे रंगदेशिक स्वामी द्वारा विरचित ‘गोदा गीतावली’ से:

श्री उ वे भरतन् स्वामी द्वारा अनुगृहीत 25वीं गाथा का संस्कृत छन्दानुवाद:

२५.एकस्या मातुरुद्भूय निशीथिन्यां तदैव हा।
अन्यस्या आत्मजो भूत्वा वर्धमाने रहस्त्वयि ।।।
असहिष्णुस्ततः कंसो मतिं चक्रे तवाहिते।
विफलां तां मतिं कृत्वा कुक्षौ तस्याग्निवत्स्थित !

अतिव्यामोहशालिन् ! त्वां प्रार्थयन्त्यो निजाशिषम्।
समायाता वयं बाला यदि भेरीं ददासि नः ।।
श्रियाऽभिलष्यमाणां ते सम्पदं वीरकर्म च ।
गीत्वा शोकाद्विनिर्मुच्य भविष्याम: प्रहर्षिताः ।।

श्री सीतारामाचार्य स्वामीजी द्वारा विरचित हिन्दी छन्द

**ओरुत्ति मगनाय्प् पिऱन्दु ओर् इरविल्:-
“एक रात्री को एक माता का पुत्र बन जन्म लेकर”

एक कहने का अर्थ है ‘अद्वितीय’। जैसे ‘दया के एक सिंधु’ कहने का अर्थ है ‘दया के अद्वितीय सिन्धु’।

हमारा जन्म कर्म-कृत होता है जबकि भगवान स्वयं अपने संकल्प से जन्म लेते हैं। हम पंच-भूत से बने प्राकृत शरीर धारण करते हैं जबकि भगवान का शरीर स्वयं-प्रकाश अप्राकृत तत्त्व से निर्मित होता है। हमारा जन्म हमारे भगवान से विलग होने का कारण बनता है जबकि भगवान का जन्म का उद्देश्य हमें प्राप्त करना होता है।

इसलिये भगवान के जन्म के लिए ‘अद्वितीय’ शब्द का प्रयोग उचित है।

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।

त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन।।4.9।।

किन्तु आसुरी स्वभाव के लोग भगवान के जन्म को साधारण ही समझते हैं।


सामान्य तौर पर विद्वान जन भगवान के परत्व का ध्यान कर भगवान के लिए ‘जन्म लेना’ न कहकर ‘आविर्भाव होना’ कहते हैं। किन्तु गोदाम्बा भगवान के सौलभ्य का अनुभव करते हुए ‘जन्म लेना’ ही कहती हैं। पूर्व में वो भी “गोप कुल में आविर्भूत होने वाले” ऐसा कह चुकी हैं। किन्तु अब जब उन्हें भगवान के सौलभ्य के दर्शन हुए तो ‘जन्म लिए’ ऐसा ही कहती हैं।

अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्।

परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्।।9.11।।

देवकी अद्वितीय कैसे हैं? जिस माता के गर्भ में भगवान 12 मास रहे, वो अद्वितीय ही हैं। ऐसे भी पुत्र होते हैं जो माता पिता की बात नहीं सुनते किन्तु कृष्ण तो जन्म लेते ही माता की आज्ञा का परिपालन करने लगते हैं। जब देवकी ने कहा, “अपने इस चतुर्भुज रूप का उपसंघार करो वरना कंस जान जाएगा।” तब कंस वध के पश्चात कृष्ण चतुर्भुज ही रहे।

रात्रि किस प्रकार अद्वितीय है? जिस प्रकार जन्म लेते ही लीलाएँ करते हैं, वो रात्रि ही अद्वितीय हो गयी।

**ओरुत्ति मगनाय् ओळित्तु वळरत्

उसी रात्री को अन्य अद्वितीय माता (यशोदा) के पुत्र बनकर।

यशोदा भी अद्वितीय हैं क्योंकि जिस प्रकार बाल-लीलाओं का यशोदा ने अनुभव लिया, वैसा किसी अन्य माता ने नहीं। नरसिंह अवतार में उनकी माता तो एक खम्भा थी। हरि अवतार में गज की रक्षा हेतु सीधे वैकुण्ठ से गरुड़ छोड़कर आ गए। राम भी मर्यादा पुरुषोत्तम थे। किन्तु कृष्ण तो लीला पुरुषोत्तम हैं।

गोदाम्बा ‘देवकी एवं यशोदा’ का नाम न लेकर केवल ‘एक माता’ कहती हैं क्योंकि उन्हें कृष्ण की सुरक्षा के लिए कंस का भय है।

**तरिक्किलानागित् तान् तीन्गु निनैन्द
करुत्तैप् पिळैप्पित्तुक् कन्जन् वयिऱ्ऱिल्

तुम गोकुल में सुखपूर्वक पल रहे थे, यह कंस को बर्दाश्त नहीं हुआ और उसने आपको मारने के अनेक यत्न किये।

यहाँ पूतना, केशि, चाणूर आदि का स्मरण होता है। कृष्ण ने अनायास ही कंस के सारे योजनाओं एक-एक करके नष्ट कर दिया।

**नेरुप्पेन्न निन्ऱ

उसके ही पेट की अग्नि बन उसे नष्ट कर दिया।

अर्थात कंस को भयङ्कर भय हुआ। जो भय वो दूसरों को देता था, उससे कहीं अधिक भय में वो जीता रहा और अंततः मारा गया। अथवा, उसके ही क्षेत्र में आकर उसे नष्ट कर दिया कृष्ण ने।

**नेडुमाले : हे व्यामोहनशील! प्रेम-मूर्ति

आपने ये सभी कष्ट (पूतना, कंस आदि) सहे, हमारे प्रति आपके प्रेम के कारण।

**उन्नै अरुत्तित्तु वन्दोम्

हम यहाँ आपसे माँगने आयी हैं, अथवा, आपको ही मांगने आयी हैं।
कल्पवृक्ष से जो मांगो वो मिल जाता है किन्तु यदि कल्पवृक्ष को ही मांग लो तो वो नहीं दे सकता। किन्तु भगवान से तो जो भी वस्तु माँग लो वो भी देते हैं, एवं स्वयं भगवान को ही मांग लो तो अपने आप को भी प्रदान कर देते हैं।

**पऱै तरुदि आगिल्

तुम हमें भेरी अर्थात कैंकर्य दोगे।

**तिरुत्तक्क सेल्वमुम्

श्री देवी का के आप धन जिस प्रकार हैं। अर्थात जिस प्रकार श्री देवी के श्री (श्रिय: श्री) आप हैं, हमें भी वही कैंकर्य चाहिए।

**सेवगमुम्

और उस कैंकर्य को करने की शक्ति।

याम् पाडि वरुत्तमुम् तीर्न्दु

हम आपके गुणों का कीर्तन करेंगी।

मगिळ्न्दु एलोर् एम्बावाय्

तो हम आपके विश्लेष के दुख से जो पीड़ित रही हैं, वो दूर हो जाएगा।

स्वापदेश

श्री वैष्णवों के भी दो जन्म होते हैं। एक भगवान की अहैतुकी कृपा से माता के गर्भ से जन्म। दूसरा आचार्य मुख से अष्टाक्षर महामंत्र श्रवण करने के बाद। श्री मन्त्र से हमारा पुनर्जन्म होता है एवं द्वय मन्त्र के अनुसन्धान से हम बड़े होते हैं।

परकाल सूरी कहते हैं कि मेरा तब जन्म नहीं हुआ था। किन्तु जब से जन्म हुआ, तबसे मैं उसे भूल नहीं पाया। अतः आचार्य समाश्रयन के पश्चात दूसरा जन्म ही वास्तविक जन्म है। कंस की भाँति संसार भी हमारे शेषत्व स्वरूप का वध करना चाहता है। किन्तु भगवान उसे नष्ट कर हमें अर्चिरादि मार्ग से प्रयाण कराते हैं।

इस गाथा में रामानुज स्वामी के चरित्र का अभी अनुसन्धान करते हैं।