वेङ्कट गिरि पर स्वामी वैकुण्ठ से ही आये ।
श्री श्रीनिवास जन को यह भाव हैं बताये ।। १ ।।
है हस्त कमल सुन्दर दक्षिण अधो अपाने ।
करके उपाय सर्वोपरि चरण को दिखाये ।। २।।
हैं शङ्ख चक्र घर के प्रतिद्वन्द्व को हटाते ।
तैसे ही वाम कर से भव नाप को बताते ।। ३ ।।
जो दिव्य मुकुट माथे त्रैलोक्य नाथ नाते ।
है दास को यहाँ से वैकुण्ठ को ले जाते ।।४।।
यह गिरी समान गिरिवर ब्रह्माण्ड में न पाते ।
इनके समान जनहित तिहुँ लोक में न आते ।।५।।
वह दीन वचन सुनकर हरि दूर से हि धाते ।
भगवान कृपा करके हर रूप भी दिखाते ।। ६।।
