श्रीवेङ्कटेश भगवान की स्तुति

श्रीनिवास प्रताप दिनकर, भ्राजता सब लोक में ।

सो दीनजन के तारने प्रभु, आबते भूलोक में ।।१

वह कृपा चित्तवन नाथ के, जन को सनाथ बनावता ।

वारीस करुण उमड़ उमड़ अघ, सकल दूर दहावता ।। २।।

ज्यों दिव्य दक्षिण हस्त में श्री अस्त्रराज विराजहीं।

त्यों तेजमय अति पाञ्चजन्यसु, वाम कर वरगाजहीं ।। ३ ।।

है कान्तिमत्सुन्दर पीताम्बर, अति विचित्र किनारियाँ ।

सो काछनी कटि में सुहावनि, सबन्हके मनहारियाँ ।।४।।

वनमाल औ मणिमाल अगणित, पुष्पमोतिन्ह लर रहे।

पुनि तैसहीं भगवान के भगवान माला बन रहे ।।५।

औ श्रवणकुण्डल मुकुटभूषण गणन में बहुमणि गणा ।

जनु श्याम घन में दामिनी बहु चन्द्र रवितारेगणा ।। ६ ।।

प्रभु दिव्य दक्षिण हस्त से निज चरण-शरण बताबहीं ।

नाभव तुम्हारे जानु लो सो, वाम से दिखलाबहीं ।।७।।

वह ज्योति जगमग जासु दशदिश विदिशिहूँ छायीमहाँ ।

सो देखते दरशक गणों के भागते अघतम महाँ ।।८।।

फणिराज पङ्कज रूप घर कर दिव्य आसन सोहहीं ।

सो दल अनेकों पाद तल सो लखत मुनि मन मोहहीं ।। ९ ।।

व्यूह पर वैभवन्ह व्यापी हूँ, कौन पाते यत्न से।

भगवान अर्चारूप धरकर, जनन से मिल सुगम से ।।१०।।

पर्ण फल जल पुष्प से सेवा, सुलभ अति प्रेम से ।

इसके लिए यह तन मिला लख, व्यास के उपदेश से ।। ११ ।।

भूधर समान न और भूधर, भूमि पर पाते कहीं।

सङ्घन्ध में जब देखते, इनके सुबश सर्वत्र ही ।।१२।।

है धन्य कुबर शिखर अहो, तिहुँ लोकनायक को बरे ।

ले साथ में आकाश गङ्गा धार झरझर झरारे ।।१३।।

औ अनन्त अलवार के पावन सरोवर है जहाँ।

है मुक्ति की इच्छा जिसे वैकुण्ठ में रहते तहाँ ।।१४।।

भाष्यकार स्वयं जिन्हें बन श्वसुर गुरु सेवा किये ।

सव दास को शिक्षा दिये अरु आप पावन यश लिए ।।१५।।

वह धन्य नर जो देखते पल स्वप्न में उस ठाम को ।

सो देव हैं नर, नर नहीं हैं, नरन में भगवान को ।।१६।।

भवभीति का ना डर कभी जो मन बसे हरिगीतिका ।

आशाबड़ी युग चरण की है, है कृपा परिपालिका ।।१७।।

हैं प्रणतपाल कृपालु हरि के चरण घर जीबन लहो ।

सो दीनबन्धु दयालुतावश, द्रवित होंगे ही अहो ।।१८।।

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Author: ramanujramprapnna

studying Ramanuj school of Vishishtadvait vedant

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