13. शिष्याचार्य परिमात्रम्

इसके पश्चात्, शिष्य और आचार्य दोनों एक-दूसरे से सम्बद्ध होने के कारण, एक-दूसरे की ओर देखते हुए— यदि शिष्य के पक्ष में अनुचित प्रवृत्ति उत्पन्न हो, तो आचार्य उसे निग्रह करके परीक्षा करे। और यदि प्रकृति-विशिष्ट होने के कारण प्रमादवश आचार्य के प्रति (दोष) आ जाए— “गुरुं रहसि प्रार्थयेत्।” ऐसा कहा गया है। अतः एकान्त में उनके श्रीचरणों को पकड़कर हितवचन का निवेदन करना चाहिए।

“इनकी यह दुष्टबुद्धि दूर होकर ये निर्मल हों” , 

அவன் கண்களாலே அமலங்களாக விழிக்கும் (TM 1.9.9) “वे अपनी कृपा दृष्टि से निर्मल बना दिए।” thiruvAimozhi – 1.9.9 – kamalak kaNNan – KOYIL 

 उसके अनुसार कृपा-दृष्टि करनी चाहिए। 

“हित को छोड़े बिना आचरण करना चाहिए।”

ऐसा कहा गया है। उसके अनुसार एम्पेरुमान् से प्रार्थना करते हुए जागरूक होकर आचरण करना चाहिए।

इस प्रकार के अधिकारी, सत्-आचार्य-सम्बन्ध से युक्त, सत्-शिष्य-लक्षण से चिह्नित,

मुमुक्षु को,

“தானே வைகுந்தந்தரும்”

(हिन्दी अर्थ): “वही स्वयं वैकुण्ठ प्रदान करेगा।”

ऐसा कहा गया है। अतः वह स्वयं अपनी प्राप्ति प्रदान करता है।

चेतन जीवों के विषय में, आचार्य के उल्लास के लिए, ज्ञान, व्यवसाय (अनुष्ठान), प्रेम (भक्ति), और समाचरण (सम्यक आचार, शिष्टाचार) भी अपेक्षित हैं।

उनमें, अज्ञ व्यक्तियों के लिए, और आसक्त व्यक्तियों के लिए, प्रतिकूलताओं की निवृत्ति भी (अपेक्षित है)।

आचार्य-अभिमान-निष्ठ व्यक्तियों के लिए भी (यह) अपेक्षित है।  

यदि तिर्यक् (पशु) और स्थावर (वनस्पति आदि) जन्मों की बात हो, तो प्रतिकूलता का गन्ध भी न होने के कारण, केवल दास्य-अभिमान ही उद्धारक है। 

पूर्वकाल में, नम्पिल्लै, पेरुमाळ-कोयिल् से, कोयिल् की ओर पधार रहे थे। एक दिन, बहुत दूर चलकर, अत्यन्त क्लान्त और तप्त होकर आते समय, एक वटवृक्ष, फैलकर, हराभरा होकर, आचार्यों के लिए और हमारे लिए श्रम-हरण करने वाली छाया किए हुए था। उसके नीचे सब लोग बैठकर विश्राम किए। वहीं पेरुमाळ को अमुदु (भोग) अर्पित कराया, और स्वयं भी भोजन किया। उस रात्रि वहीं विश्राम किया। 

दूसरे दिन यात्रा पर जाते समय—नम्पिल्लै ने मुदलियों (शिष्यों) की ओर देखकर कहा—

“यह हम सबके लिए क्षुधा, पिपासा आदि समस्त तापों का निवारण करने वाला है; इसे देखो। इसके लिए हमने किया हि क्या  है?”

“गच्छ लोकाननुत्तमान्” 

ऐसा कहकर कृपा-कटाक्ष किया। दोनों श्रीहस्तों से आलिंगन करते हुए आगे बढ़े। निकटवर्ती ग्राम का एक ब्राह्मण यह देखकर उपहास करता हुआ चला गया। पिल्लै भी कोयिल् पधार गए। उसी रात्रि, चारों ओर के आकाश में मेघों के समान, महान् महोत्सव का घोष उत्पन्न हुआ। उपहास करने वाला वह ब्राह्मण भी और उस ग्राम के सभी लोग देखने के लिए आकर खड़े रहे। उस (वृक्ष के) आकार में दिव्य तेज प्रकट हुआ। उसे सब लोग देखकर आश्चर्यचकित होकर खड़े थे। तभी वह वृक्ष फटकर दो भाग हो गया, और बड़े कोलाहल के साथ दिव्य तेज बाहर निकला। आकाश की ओर जाकर आदित्य-तेज में मिल गया— ऐसा देखकर, देखने आए हुए लोग विस्मित-चित्त होकर, “यह क्या है?” ऐसा पूछने लगे। तब उस ब्राह्मण ने पिल्लै से जिस प्रकार कटाक्ष किया था, उसे बताया। सब सुनकर अत्यन्त विस्मित हो गए।

दूसरे दिन इस समाचार को पिल्लै ने सुनकर, तैल-रक्षा, श्रीचूर्ण-परिपालन करके, तिरुवध्ययनम् सम्पन्न कराया, और प्रस्थान किया— ऐसा जीयर अरुलिच्चेय्वर् (अनुग्रहपूर्वक कहते हैं)। यह निरतिशय पुरुषार्थ यद्यपि सत्-अनुष्ठान-सम्पन्न पुरुष द्वारा प्रार्थना करके प्राप्त की जाने वाली वस्तु है, तथापि “क्या यह प्राप्ति एक वृक्ष को भी हो सकती है?”—ऐसा सन्देह नहीं करना चाहिए। सर्वेश्वर दिव्य-शक्ति से युक्त, निरङ्कुश-परस्वतन्त्र तथा परम-दयालु एकमात्र वही हैं। इसलिए यदि वे उसी अवस्था में इस आत्मा को उज्जीवित करना चाहें, तो कुछ भी सम्भव है ।

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Author: ramanujramprapnna

studying Ramanuj school of Vishishtadvait vedant

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