Series: विलक्षण-मोक्षाधिकारी-निर्णय
ऐसे अधिकारी में, रहस्यत्रय के निरन्तर अनुसंधान से भी पहले, वे समस्त वैष्णव-अधिकार-लक्षण होने चाहिए जिनका वर्णन मुमुक्षुप्पडि में किया गया है। वे लक्षण इस प्रकार हैं—
“पितरं मातरं दारान् पुत्रान्…” – “पिता, माता, पत्नी, पुत्र…”
“क्षेत्राणि मित्राणि… – “भूमि, मित्र…”
अर्थात्
- पिता, माता, पत्नी, पुत्र, धन, गृह, भूमि, मित्र, पशु, सम्बन्धी तथा अन्य समस्त सांसारिक आसक्तियाँ अग्नि के समान प्रतीत हों और
- उनका केवल बाह्य त्याग ही नहीं, अपितु उनकी वासना का भी पूर्ण परित्याग हो जाए।
- भगवान् को ही अपना सर्वस्व मानकर उनका आश्रय ग्रहण किया जाए।
- इस त्याग और ग्रहण के पश्चात् फल अवश्य प्राप्त होगा—ऐसा दृढ़ निश्चय हो।
- भगवत्प्राप्ति के लिए तीव्र उत्कण्ठा बनी रहे।
- इस संसार में रहते हुए भी दिव्यदेशों के प्रति अनुराग हो।
- भगवान् के कल्याणगुणों के चिन्तन तथा उनकी कैङ्कर्य-सेवा में ही कालक्षेप (समय व्यतीत) हो।
- ऐसे विशिष्ट वैष्णवों को देखकर प्रसन्नता हो।
- मन्त्रत्रय में दृढ़ निष्ठा हो तथा
- आचार्य के साथ निवास और सत्संग बना रहे।
इन सभी को मुमुक्षुप्पडि में वैष्णव-अधिकार के लक्षणों के रूप में अनुग्रहपूर्वक बताया गया है।

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