19. अधिकारी सम्पत्त

Series: विलक्षण-मोक्षाधिकारी-निर्णय

ऐसे अधिकारी में, रहस्यत्रय के निरन्तर अनुसंधान से भी पहले, वे समस्त वैष्णव-अधिकार-लक्षण होने चाहिए जिनका वर्णन मुमुक्षुप्पडि में किया गया है। वे लक्षण इस प्रकार हैं—

“पितरं मातरं दारान् पुत्रान्…” –  “पिता, माता, पत्नी, पुत्र…”

“क्षेत्राणि मित्राणि… – “भूमि, मित्र…”

अर्थात् 

  1. पिता, माता, पत्नी, पुत्र, धन, गृह, भूमि, मित्र, पशु, सम्बन्धी तथा अन्य समस्त सांसारिक आसक्तियाँ अग्नि के समान प्रतीत हों और 
  2. उनका केवल बाह्य त्याग ही नहीं, अपितु उनकी वासना का भी पूर्ण परित्याग हो जाए। 
  3. भगवान् को ही अपना सर्वस्व मानकर उनका आश्रय ग्रहण किया जाए। 
  4. इस त्याग और ग्रहण के पश्चात् फल अवश्य प्राप्त होगा—ऐसा दृढ़ निश्चय हो। 
  5. भगवत्प्राप्ति के लिए तीव्र उत्कण्ठा बनी रहे। 
  6. इस संसार में रहते हुए भी दिव्यदेशों के प्रति अनुराग हो। 
  7. भगवान् के कल्याणगुणों के चिन्तन तथा उनकी कैङ्कर्य-सेवा में ही कालक्षेप (समय व्यतीत) हो। 
  8. ऐसे विशिष्ट वैष्णवों को देखकर प्रसन्नता हो। 
  9. मन्त्रत्रय में दृढ़ निष्ठा हो तथा 
  10. आचार्य के साथ निवास और सत्संग बना रहे।

इन सभी को मुमुक्षुप्पडि में वैष्णव-अधिकार के लक्षणों के रूप में अनुग्रहपूर्वक बताया गया है।

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Author: ramanujramprapnna

studying Ramanuj school of Vishishtadvait vedant

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