इस प्रकार भगवान् जीव को इन अवस्थाओं तक पहुँचाते हैं और समस्त हेय-वस्तुओं से रहित तथा समस्त कल्याण-गुणों के आश्रयस्वरूप अपने अनुभव के योग्य बनाकर उसे परमार्थस्वरूप करते हैं और अन्ततः अपने साथ मिला लेते हैं।
अयोध्या में भगवान् श्रीराम ने चर और अचर सभी को अपने साथ ले जाने का संकल्प किया। उनमें कोई विशेष योग्यता या कारण न होते हुए भी उनकी इच्छा से सम्पूर्ण सृष्टि उनके साथ चलने के लिए उद्यत हो गई। इस प्रसंग में कहा गया है—
“अपि वृक्षाः परिम्लानाः उपतप्तोदका नद्यः। अकालफलिनो वृक्षाः॥” : वाल्मीकि रामायण
(हिन्दी अर्थ): “वृक्ष मुरझा गए, नदियों का जल तप्त हो गया और वृक्ष असमय में ही फल देने लगे।”
तथा—
“रामो रामो राम इति प्रजानामभवन् कथाः। रामभूतमिदं जगद् भूद् रामे राज्यं प्रशासति॥”: वाल्मीकि रामायण
(हिन्दी अर्थ): “‘राम’ ही प्रजा की वार्ता थी; श्रीराम के राज्य करते समय सम्पूर्ण जगत् राममय हो गया था।”
अर्थात् भगवान् ने चर और अचर का कोई भेद न रखते हुए अपने संयोग और वियोग को ही उनके सुख और दुःख का कारण बना दिया और उन सबको अपने साथ ले गए।
इसी विषय को आळ्वार ने इस प्रकार अनुग्रहपूर्वक कहा है—
“புற்பா முதலாப் புல்லெறும்பாதி ஒன்றின்றியே
நற்பாலயோத்தியில் வாழும் சராசரம் முற்றவும்
நற்பாலுக்குய்த்தனன் நான்முகனார் பெற்ற நாட்டுளே.” thiruvAimozhi – 7.5.1 – kaRpAr irAmapirAnai – KOYIL
स्रोत:
(हिन्दी अर्थ): “ब्रह्मा जी द्वारा रचित इस पूरी सृष्टि (पृथ्वी) के भीतर, पवित्र अयोध्या नगरी में रहने वाले सभी चर-अचर जीवों को—चाहे वे साधारण घास-फूस हों या छोटी-सी चींटी—बिना किसी एक को भी छोड़े, भगवान श्री राम अपने अवतार के अंत में उन सभी को परमधाम (मोक्ष/वैकुंठ) ले गए।।”
अतः यह सन्देह नहीं करना चाहिए कि इस संसार में ऐसा नहीं हो सकता। अघटित-घटन-समर्थ, सर्वशक्तिमान भगवान् जब अपनी लीला में किसी जीव पर कृपा करना चाहते हैं, तब वे कर्मानुसार व्यवस्था करते हुए भी जहाँ स्वप्रयत्न से सिद्धि सम्भव नहीं होती, वहाँ उस असम्भवता को भी दूर कर देते हैं।
आळ्वार कहते हैं—
“விதிவாய்க்கின்று காப்பாரார்.” thiruvAimozhi – 5.1.1 – kaiyAr chakkaraththu – KOYIL
(हिन्दी अर्थ): “जब उसकी कृपा का समय आता है, तब कौन उसे रोक सकता है?”
(हे शंख-चक्रधारी कृष्ण! मैंने तो आपका नाम केवल दिखावे के लिए या झूठे मन से लिया था। लेकिन मेरी उस झूठी भक्ति पर भी रीझकर आपने मुझे अपना ‘सच्चा मोक्ष’ दान कर दिया! जब आपकी कृपा का यह सैलाब खुद आगे बढ़कर आता है, तो ब्रह्मांड की कोई भी शक्ति इसे रोक नहीं सकती।”)
और आगे—
“எம்மாபாவியர்க்கும் விதிவாய்க்கின்று வாய்க்கும் கண்டீர்; மெய்ம்மாலாயொழிந்தேன்.” thiruvAimozhi – 5.1.7 – ammAn AzhippirAn – KOYIL
(हिन्दी अर्थ): “देखो! हम जैसे महापापियों के लिए भी जब उसका समय आता है, तब उसकी प्राप्ति हो जाती है; मैं तो वास्तव में भगवान् में ही लीन हो गया हूँ।”
(“देख लो! चाहे कोई कितना भी बड़ा पापी क्यों न हो, जब भगवान की असीम कृपा (कृपा रूपी विधि) बहती है, तो वह निश्चित रूप से उस जीव को मिल ही जाती है। ‘हे गजेंद्र के दुख को दूर करने वाले!’ ऐसा पुकारते हुए, अपने दोनों हाथ सिर के ऊपर जोड़कर मैं सचमुच उनके प्रेम में पूरी तरह लीन (पागल) हो गया हूँ।”)
अतः मनुष्य कितना भी बड़ा पापी क्यों न हो, जब भगवान् की कृपा फलवती होती है, तब ये सभी अवस्थाएँ उसे प्राप्त होती हैं और उसका उद्धार हो जाता है।
फिर कहा गया है—
“चितः परमचिल्लाभे प्रपत्तिरपि नोपधिः । विपर्यये तु नैवास्य प्रतिषेधाय पातकम् ॥ ४३ ॥” (रहस्यत्रयकारिकावली)
स्रोत:
(हिन्दी अर्थ): जब जीवात्मा (चित्) उस सर्वशक्तिमान परमात्मा (परमचित्) को प्राप्त करना चाहता है, तब जीव द्वारा की गई ‘प्रपत्ति’ (शरणागति) भी मोक्ष का मुख्य कारण या वास्तविक साधन (उपधि) नहीं होती। इसके विपरीत (विपर्यय), जब भगवान स्वयं उस जीव का उद्धार करने का संकल्प कर लेते हैं, तब जीव द्वारा किए गए पाप (पातकम्) भी भगवान की उस कृपा को रोकने में (प्रतिषेधाय) समर्थ नहीं हो पाते।
अन्त में श्रुति भी यही कहती है—
“एष एव साधु कर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्यो उन्निनीषति।”: कौषीतकि उपनिषद्
(हिन्दी अर्थ): “जिसे वह परमात्मा उच्च लोकों की ओर ले जाना चाहता है, उसी से वह सत्कर्म कराता है।”
इस विषय में आळ्वार ने अनुग्रहपूर्वक कहा है—
“என் சொல்லால் யான்சொன்ன இன்கவியென்பித்துத்
தன் சொல்லால் தான் தன்னைக் கீர்த்தித்த மாயன்
தப்புதலின்றி தனைக்கவிதான்சொல்லி
ஒப்பிலாதீவினையேனை உய்யக் கொண்டு
போகிய அப்பனையென்று மறப்பன்.”
(हिन्दी अर्थ): “जिस मायावी भगवान् ने मेरी वाणी से यह मधुर काव्य कहलवाया, अपनी ही वाणी से अपनी ही कीर्ति का गान कराया, बिना किसी त्रुटि के स्वयं अपने विषय में कहा, और मेरे समान अतुलनीय पापी का उद्धार करके मुझे अपना बना लिया—उस पिता को मैं कभी नहीं भूलूँगा।”
अर्थात् यद्यपि ऐसा प्रतीत होता है कि इस काव्य को आळ्वार ने अपनी वाणी से कहा है, वस्तुतः वह आश्चर्यस्वरूप भगवान् ही हैं जिन्होंने स्वयं अपनी ही स्तुति कराई। बिना किसी त्रुटि के अपनी महिमा का स्वयं वर्णन करके, मेरे जैसे असदृश (अतुलनीय) पापिष्ठ जीव का उद्धार करने वाले उपकारी वही हैं—ऐसा आळ्वार ने अनुग्रहपूर्वक कहा है।
इससे यह प्रतिपादित होता है कि जिनका उद्धार करना भगवान् चाहते हैं, उनके अन्तर में प्रविष्ट होकर उन्हें हेय और उपादेय का विवेकपूर्वक आचरण करने के लिए नियोजित करते हैं और उन्हें मुक्त बना देते हैं। इसलिए सदाचार्य के उपदेश के बिना इन विषयों का ज्ञान सम्भव न होने से, वे जीव को आचार्याभिमान के अधीन लाकर, उसके अनुरूप ज्ञान और अनुष्ठान उत्पन्न कराकर उसका उद्धार करते हैं।

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