17. अधिकारी निष्कर्षम्

series: विलक्षण-मोक्षाधिकारी-निर्णय

यदि कहा जाए कि ऐसे अधिकारी वर्तमान काल में अत्यन्त दुर्लभ हैं, तो भगवान् ने स्वयं कहा है—

“वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥” श्रीमद्भगवद्गीता ७।१९

(हिन्दी अर्थ): “‘वासुदेव ही सब कुछ हैं’—ऐसा जानने वाला महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है।”

(सरस अर्थ: भगवान के अनेक जन्मों के पश्चात, उन्हें ज्ञानी जीव की प्राप्ति होती है)

तथा— “कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः॥”  श्रीमद्भगवद्गीता ७।३

(हिन्दी अर्थ): “कोई विरला ही मुझे तत्त्वतः जानता है।”

और आळ्वार ने भी कहा है—

“ஒரொருவருண்டாகில் அத்தனை.” (उपदेश रत्नमाला)

(आर वचनबूढणत्तिन् आऴ् पोरुळेल्लाम् अऱिवार्? आरदु सोल् नेरिल् अनुट्टिप्पार्? – ओरोरुवर् उण्डागिल् अत्तने काण् उळ्ळमे! एल्लार्क्कुम् अण्डाद दन्ऱो वदु?)

(हिन्दी अर्थ): “यदि एक भी ऐसा मिल जाए, तो वही बहुत है।”

इन वचनों से भी ऐसे महापुरुषों का अत्यन्त दुर्लभ होना ही प्रतिपादित होता है।

अतः यदि कोई आचार्य का आश्रय ग्रहण करके पञ्चसंस्कार प्राप्त कर ले तथा केवल वैष्णव नाम और स्वरूप धारण किए हुए रहे, किन्तु मन्त्र-विरुद्ध देहात्माभिमान, अन्य-पोष्यत्व-बुद्धि, स्वातन्त्र्याभिमान, अहंकार, ममकार, द्वेष, काम, क्रोध, मद तथा मात्सर्य से युक्त हो; संसार-बद्ध बना रहे; पुत्र, धन तथा अन्य विषयों में आसक्त रहे; परस्पर अर्थ और काम के निमित्त अथवा अहंकारवश स्पर्धा करता रहे; तथा जिनकी सेवा नहीं करनी चाहिए उन्हीं की सेवा में निरत रहे—तो ऐसे लोग अभी कुछ समय तक भगवान् की लीला के विषय मात्र बने रहेंगे।

किन्तु यदि देहावसान के समय भी—

“पितरं मातरं दारान् पुत्रान् बन्धून् सखीन् गुरून्। रत्नानि धनधान्यानि क्षेत्राणि च गृहाणि च ॥ सर्वधर्मांश्च सन्त्यज्य सर्वकामांश्च साक्षरान्। लोकविक्रान्तचरणौ शरणं तेऽव्रजं विभो ! ॥”

—इस प्रकार प्रतिकूल विषयों में वैराग्य उत्पन्न होकर वे परमार्थस्वरूप हो जाएँ, तो जैसे बाढ़ आने से पूर्व उसके लक्षण प्रकट होने लगते हैं, वैसे ही मुक्तपुरुष के लक्षण भी प्रकट होने लगते हैं।

इस विषय में कहा गया है—

“आह्लादशीतनेत्राम्बुः पुलकीकृतगात्रवान् । सदा परगुणाविष्टो द्रष्टव्यः सर्वदेहिभिः॥ (श्रीविष्णुतत्त्व )”

(हिन्दी अर्थ): “आनंद से जिनके नेत्र शीतल और प्रेमाश्रुओं से युक्त हैं, जिनका शरीर भक्ति के आनंद से रोमांचित (पुलकित) है, जो सदा भगवान (पर) के गुणों के अनुभव में मग्न या परवश हैं, ऐसे भागवत उत्तम (श्रेष्ठ भक्त) ज्ञानियों और अज्ञानियों—सभी देहधारियों द्वारा दर्शन करने योग्य होते हैं।।”

वे लक्षण सब लोगों के लिए प्रत्यक्ष हो जाते हैं और वह स्वयं भी निश्चित कर लेता है कि यही उसका चरम (अन्तिम) शरीर है। यदि उस समय भी यह अवस्था पूर्ण रूप से प्राप्त न हो, तो वह अगले जन्म में इसकी प्राप्ति करेगा। इसी कारण कहा गया है—

“न हि भागवता यमविषयं स्पृशन्ति।”

(हिन्दी अर्थ): “भागवतजन यम के अधिकार-क्षेत्र में नहीं आते।”

अतः प्रमेयरत्न में अनुग्रहपूर्वक कहा गया है कि यदि कोई अभी पूर्णतः विनीत न भी हुआ हो, तब भी उसे यमलोक की प्राप्ति नहीं होती।

एक श्रीवैष्णव ने आकर पेरियवाच्चान् पिल्लै से पूछा—”स्वामिन्! हम भगवान् की लीला के विषय हैं या उनकी कृपा के विषय?”

इस पर उन्होंने अनुग्रहपूर्वक उत्तर दिया—”यदि हम शरीर को अपना स्वरूप मानकर रहते हैं, तो हम भगवान् की लीला के विषय हैं; और यदि आत्मा को अपना स्वरूप मानकर रहते हैं, तो हम भगवान् की कृपा के विषय हैं।”

इसी भाव को निम्नलिखित श्लोक में कहा गया है—

“त्वङ्मांसरुधिरस्नायुमेदोमज्जास्थिसंहतौ ।
देहे चेत् प्रीतिमान् मूढः पतितो नरकेऽपि सः ॥” विष्णु पुराण (१.१७.६३) 

(हिन्दी अर्थ): “जो मूर्ख त्वचा, मांस, रक्त, स्नायु, मेद, मज्जा और अस्थियों के समूह रूप इस शरीर में ही आसक्ति रखता है, वह नरक में गिरने योग्य है।”

अर्थात् यदि कोई देहात्माभिमान रखकर, तेल आदि द्वारा शरीर का पोषण करता हुआ, विषयों में प्रवृत्त रहता है; तथा शरीर से सम्बन्ध रखने वाली पत्नी, पुत्र आदि में अनुरक्तचित्त होकर, शास्त्र के अधीन न रहकर अपनी इच्छा के अनुसार विचरण करता है, तो वह भगवान् की लीला का विषय बन जाता है।

परन्तु यदि कोई आत्मस्वरूप के अनुरूप आचार-त्रय से सम्पन्न हो, अर्थ-पञ्चक-तत्त्व का ज्ञाता हो, हेय और उपादेय का विवेक जानता हो, स्वरूप-विरोधी समस्त प्रतिकूलताओं का त्याग कर दे; और जिस शरीर का पूर्ण त्याग अभी सम्भव नहीं है, उसे भी तिल के भीतर तेल की भाँति केवल अनिवार्य रूप से धारण करे; उस शरीर को देखकर ऐसे भयभीत हो जैसे किसी सर्प को देखकर होता है; उसके पोषण में प्रवृत्त न होकर, केवल सत्त्व-रक्षा के लिए नियत आहार ही ग्रहण करे; दूसरों के अधीन रहकर निरहंकार भाव से आचरण करे—तो वह भगवान् की कृपा का विषय बन जाता है। यही उनका अभिप्राय है।

(शीर्यते इति शरीरम् — That which constantly undergoes decay and destruction at every moment. ,  दियते (उपचीयते) इति देहः” — That which is built up, nourished, or accumulated by consuming food and external elements.)

अतः सदाचार्य का आश्रय ग्रहण करके, उनके उपदेशानुसार ज्ञान और अनुष्ठान से सम्पन्न होने पर ही मनुष्य मोक्ष का अधिकारी बनता है।

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Author: ramanujramprapnna

studying Ramanuj school of Vishishtadvait vedant

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