11. आचार्यत्व-द्वैविध्यम्

आचार्यत्व दो प्रकार का कहा गया है—

  1. घटकत्व (मिलाने वाला)
  2. उपायत्व (उपायरूप होना)

घटकत्व

घटकत्व यह है— जो उपदेश ग्रहण करने के योग्य हो, उसका—

संवत्सरं तदर्धं वा मासत्रयमथापि वा।

हिन्दी – “एक वर्ष, अथवा आधा वर्ष, अथवा तीन महीने तक…”

उसके हृदय की परीक्षा करे।

जब यह देख ले कि उसकी प्रकृतिवासनाएँ और विषय-रुचियाँ क्षीण हो गई हैं, और वह परमार्थनिष्ठ हो गया है;

जब यह प्रतीत हो जाए कि वह अनन्य-प्रयोजन वाला तथा केवल मङ्गलाशासन में प्रवृत्त रहने वाला है; तब उसे भगवान् से सम्बद्ध करे। उससे शरणागति (वरण) कराए। और उसके स्वरूप के अनुरूप आचरण करता रहे—इस प्रकार उसकी परीक्षा करते हुए उसका पालन करे।

उपायत्वम्

उपायत्व यह है—

  • आचार्य स्वयं भगवान् के सम्मुख शिष्य का निवेदन करता है। 
  • शिष्य का भार भगवान् को समर्पित कर देता है। शिष्य को उसके स्वरूप के अनुरूप स्थिर करता है।
  • उसके स्वरूप की रक्षा करता है। 
  • उसे भगवत्, भागवत और आचार्य-सेवा में प्रवृत्त करता है।
  • उसके दोषों को दूर करता है।
  • उसके गुणों का विकास करता है।
  • उसका संशय दूर करता है।
  • उसका विपरीत ज्ञान दूर करता है।
  • उसकी प्रकृतिवासना का क्षय करता है।
  • उसे अपने स्वरूप में स्थित करता है।
  • भगवदनुभव के योग्य बनाता है।
  • भगवद्भक्तों के साथ उसका सम्बन्ध स्थापित करता है।
  • भगवान् के विषय में अनुराग उत्पन्न करता है।
  • भागवतों के विषय में अनुराग उत्पन्न करता है।
  • आचार्य के विषय में परतन्त्रता उत्पन्न करता है।
  • इस प्रकार उसे मोक्ष का अधिकारी बनाता है।

इसी कारण आचार्य को उपाय कहा जाता है।

जो शिष्य इस प्रकार आचार्य के प्रति परतन्त्र होकर रहता है, वह—

  • आचार्य की आज्ञा का उल्लंघन नहीं करता।
  • आचार्य के वचन को ही प्रमाण मानता है।
  • आचार्य की इच्छा के विपरीत आचरण नहीं करता।
  • आचार्य के अनुग्रह को ही अपना परम धन मानता है।
  • आचार्य से प्राप्त उपदेश का नित्य अनुसंधान करता है।
  • भगवत्, भागवत और आचार्य-सेवा में ही अपने जीवन को सफल मानता है।

ऐसा शिष्य ही सच्छिष्य कहलाने योग्य है।

उपायत्व यह है—

जो अपने स्वरूप के अनुरूप आचरण के विशेषों का उपदेश देने पर भी उन्हें समझ सकने योग्य ज्ञान तथा उनका अनुष्ठान कर सकने योग्य शक्ति नहीं रखते—ऐसे बालक, मूक, जड़, अन्ध, पंगु, बधिर आदि व्यक्तियों पर भगवान् की निरहेतुक कृपा की धारा प्रवाहित हो जाती है।

जब उनमें सांसारिक शुभ कर्मों में भी वैराग्य तथा जन्म, मृत्यु आदि दुःखों का भय उत्पन्न होकर वे आर्त हो जाते हैं,

तब आचार्य उन्हें स्वीकार करके, दयापरायण होने के कारण, यह देखकर कि वे ज्ञान और अनुष्ठान के उपदेश के योग्य नहीं हैं, उनके लिए स्वयं ही शरण-वरण (शरणागति) करते हैं।

जैसे कोई स्तनपान करने वाला शिशु औषधि सेवन करने योग्य नहीं होता और उसे रोग हो जाए, तो माता स्वयं औषधि ग्रहण करके अपने स्तन्यपान के द्वारा उसके रोग का निवारण करती है,

उसी प्रकार आचार्य इनका स्वयं अभिमान (उत्तरदायित्व) ग्रहण करके, अपने तीर्थ और प्रसाद-सेवन के माहात्म्य से इन्हें संसार से पार उतारते हैं।

एक बार एक मूक व्यक्ति को आर्त देखकर, श्रीरामानुजाचार्य दयापरायण होकर अपने श्रीचरण दिखाने लगे। हाथ के संकेत से यह बतलाया कि “इसे अपने हृदय में धारण करो।” फिर उन्होंने अपने चरण उसके सिर पर रख दिए।

इसे देखकर कूरत्ताऴ्वान् ने कहा—

“हाय! हम कूर-कुल में जन्म लेकर शास्त्रों का अध्ययन करते रहे। यदि हम भी एक मूक के रूप में जन्म लेते, तो यह परमगति का स्वीकार हमें भी प्राप्त हो जाता!”

ऐसा कहकर उन्होंने संताप किया।

यद्यपि ये ज्ञान और अनुष्ठान के अधिकारी नहीं हैं, तथापि प्रवृत्ति और निवृत्ति के आश्रयभूत चेतन होने के कारण, इनमें भी प्रतिकूलता का निवर्तन अवश्य होना चाहिए।

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Author: ramanujramprapnna

studying Ramanuj school of Vishishtadvait vedant

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