14. भगवदुपकरणम्

कर्म, ज्ञान और भक्ति; प्रपत्ति; तथा आचार्याभिमान—इन सबके विषय में किसी प्रकार का अतिप्रसंग उत्पन्न न हो, इस प्रकार एक व्याज का संकल्प करके, जिस क्षण भगवान् जीव को स्वीकार करने का निश्चय करते हैं, उसी क्षण वे उसे स्वीकार कर लेते हैं। इसलिए आळ्वार कहते हैं—

“உன் மனத்தால் என் நினைந்திருந்தாய்.” (Periya Tirumozhi 2.7.1)

(हिन्दी अर्थ): “तुमने अपने मन से मेरा स्मरण किया।”

अर्थात् भगवान् का स्मरण ही जीव के उद्धार का साधन बन जाता है।

इसके पश्चात् कहा गया है—

“अहमेव हि जानामि शक्तिपातक्षणं च तम्।

 नासौ पुरुषकारेण न चाप्यन्येन हेतुना॥

केवलं स्वेच्छयैवाहं प्रेक्षे कंचित् कदाप्यहम्।।” (लक्ष्मी तन्त्र)

(हिन्दी अर्थ): “केवल मैं ही (भगवान) उस क्षण को जानता हूँ जब किसी जीव पर मेरी कृपा (शक्तिपात) होती है। मैं न पुरुषकार से और न किसी अन्य कारण से, मैं केवल अपनी पूर्ण स्वतंत्रता और स्वेच्छा से ही किसी पर कृपा की दृष्टि डालता हूँ ।”

भगवान् जब प्रथम कृपा-कटाक्ष बिना किसी कारण (निर्‍हेतुक रूप से) करते हैं, तब मुख्य सत्संग, सदाचार्य का उपदेश, सन्मन्त्र के अर्थ का ज्ञान तथा उसके अनुरूप अनुष्ठानों के द्वारा जीव को पूर्णतः शुद्ध कर देते हैं। फिर वे अपने संयोग और वियोग को ही उसके सुख और दुःख का कारण बना देते हैं। अपने से भिन्न समस्त विषयों को वे इस प्रकार तुच्छ बना देते हैं कि वे नरक के समान प्रतीत होने लगते हैं। इसी कारण कहा गया है—

“भोगाः पुरन्दरादीनां ते सर्वे निरयोपमाः।”

(हिन्दी अर्थ): “इन्द्र आदि देवताओं के भोग भी नरक के समान हैं।”

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Author: ramanujramprapnna

studying Ramanuj school of Vishishtadvait vedant

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