श्रीमते रामानुजाय नमः
सौम्यजामातृयोगीन्द्र चरणाम्बुज षट्पदम् ।
देवराजगुरुं वन्दे दिव्यज्ञानप्रदं शुभम् ॥
शमदमादिगुणैकनिकेतनं, चरमपर्वणि निश्चलचेतसम् ।
यतिवराङ्घ्रिसरोरुहषट्पदं, समरपुङ्गवसद्गुरुमाश्रये ॥
प्रस्तावना
जब श्रीमान् वरवरमुनि (मणवाळ मामुनि) के शिष्य एरुम्बियप्पा (देवराज स्वामी) के सच्चे शिष्य सेनापतियान् मुदलियाण्डान् ने उनके चरणों में प्रणाम करके निवेदन किया—
“हम जैसे मोक्ष की इच्छा रखने वाले दासों के लिए, कृपया उन विलक्षण पुरुषों (विशेष व्यक्तियों) के स्वरूप का निर्णय कर अनुग्रहपूर्वक बताइए जो मोक्ष के अधिकारी (मोक्षाधिकरी) हैं।”
तब अप्पा ने कहा—
“क्या इस विषय में अब भी हमारे द्वारा निश्चित किया जाना कुछ शेष रह गया है?
सामान्य और विशेष का विभाग तो समस्त शास्त्रों, वेद-वेदान्त, गीता के आचार्य भगवान्, ऋषियों, आल्वारों और आचार्यों द्वारा पर्वत-शिखर पर रखे दीपक के समान स्पष्ट रूप से प्रकाशित किया जा चुका है।
फिर भी, लोक-हित के लिए, आपने जो प्रश्न किया है उसके उत्तर में हमारे आचार्यों द्वारा बताए गए कुछ विशेष विषयों को निवेदन करता हूँ।
कृपया ध्यानपूर्वक सुनिए।”
1. भगवत्कटाक्ष
श्रीदेवी के पति, समस्त दोषों के प्रतिकूल, अनन्त कल्याण-गुणों से युक्त, समस्त जगत् के स्वामी, पूर्णतः स्वतन्त्र तथा परम करुणामय भगवान्—
ऐसे स्वभाव वाले होने के कारण, समस्त जीवों के नियन्ता बनकर, अनेक प्रकार की मायिक मोहकारिणी शक्तियों द्वारा संसारबद्ध जीवों के साथ लीला करते रहते हैं।
इस प्रकार लीला-विभूति के चेतन जीवों के साथ क्रीड़ा करते हुए, किसी समय उनके दिव्य मन में यह संकल्प उत्पन्न होता है— “इनमें से किसी को संसार से उद्धार करना चाहिए।”
जैसा कहा गया है—
“जायमानम् हि पुरुषं यं पश्येन मधुसूदन| सात्विकं स तु विज्ञेयः स वै मोक्ष्यार्थ चिन्तकः”
“संसार-चक्र में घूमते हुए तथा दुःख से अत्यन्त व्याकुल जीव को देखकर भगवान् विष्णु में किसी प्रकार की करुणा उत्पन्न होती है।”
वह जीव, अपने पूर्व पुण्य-पापों के कारण, जन्म, मृत्यु, नरक-पतन आदि विविध दुःखों का अनुभव करता हुआ, संसार-चक्र में घूम रहा होता है। उस पर भगवान् की कृपा उत्पन्न होती है। जैसा कहा गया है—
नासौ पुरुषकारेण न चाप्यन्येन हेतुना । केवलं स्वेच्छयाहं तु प्रेक्षे कञ्चित् कदाचन ॥
“न तो उसके किसी पुरुषार्थ के कारण, न ही किसी अन्य कारण से; केवल अपनी इच्छा से मैं कभी-कभी किसी पर दृष्टि डालता हूँ।”
जिस प्रकार कोई राजा केवल अपनी इच्छा से किसी एक प्रजा पर विशेष अनुग्रह कर देता है,
उसी प्रकार भगवान् अपनी निर्हेतुक कृपा से उस जीव पर विशेष कटाक्ष करते हैं।
जैसा कहा गया है—
जायमानं हि पुरुषं यं पश्येन्मधुसूदनः । सात्त्विकस्तु स विज्ञेयः स वै मोक्षार्थचिह्नकः ॥
“जिस मनुष्य पर जन्मकाल से ही मधुसूदन की दृष्टि पड़ती है, उसे सात्त्विक जानना चाहिए; वही मोक्ष का अधिकारी होने का चिह्न रखता है।”
उस जन्मकालीन भगवत्कटाक्ष के प्रभाव से वह जीव परम सात्त्विक बन जाता है, और उसमें मोक्ष की इच्छा उत्पन्न होती है।
वह सोचता है—”मोक्ष तो अर्थ-पञ्चक-ज्ञान द्वारा प्राप्त होता है, जो आचरण में परिणत होता है।”
और यह समझकर कि यदि यह ज्ञान प्राप्त न हुआ, तो पुनः-पुनः जन्म और मृत्यु रूप संसार-दुःख ही प्राप्त होगा, वह संसार से वैराग्य प्राप्त करता है और सोचता है—
“मैं इस प्रकार संसार में पड़े रहना नहीं चाहता।”
2. आचार्योपसत्ति (आचार्य की शरण ग्रहण करना):
3. शिष्यजीवनम् (शिष्य का जीवन) :
4. सच्छिष्य-लक्षणम् :
5. आचार्य-लक्षणम्
6. आहार-नियति
