9. असद्-आचार्य-लक्षण

इस प्रकार जो ज्ञान और अनुष्ठान से सम्पन्न है, वही सदाचार्य कहलाने योग्य है।

ज्ञानहीन व्यक्ति केवल ब्राह्मणत्व-उपाधि वाला है।

अनुष्ठानहीन व्यक्ति केवल पण्डितत्व-उपाधि वाला है।

जब दोनों ही हों, तभी वह स्वयं भी और उससे सम्बद्ध व्यक्ति भी पार पहुँचते हैं।

उभाभ्यामेव पक्षाभ्याम् यथा खे पक्षिणां गतिः।
तथैव ज्ञानकर्मभ्यां प्राप्यते भगवान् हरिः॥

हिन्दी – “जैसे पक्षी दोनों पंखों से ही आकाश में गति करता है, वैसे ही ज्ञान और कर्म—दोनों के द्वारा भगवान् हरि की प्राप्ति होती है।”

  • त्यज धर्ममधर्मं च ।
  • उपायापायनिर्मुक्तो मध्यमां स्थितिमास्थितः।
  • उपायापायसंयोगे निष्ठा हीयतेऽनया॥ (लक्ष्मी तन्त्र)

हिन्दी

“धर्म और अधर्म—दोनों का त्याग करो। उपाय और अपाय से रहित होकर मध्य स्थिति में स्थित रहो। उपाय और अपाय के संयोग से यह निष्ठा नष्ट हो जाती है।”

शरणागत मुमुक्षु के लिए विधि और निषेध—दोनों ही त्याज्य हैं।

रजस् और तमस् से विक्षिप्त होकर—

यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च।
अयथावत् प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी॥ (गीता 18.31)

हिन्दी -“जिस बुद्धि से धर्म और अधर्म, कर्तव्य और अकर्तव्य को यथार्थ रूप में नहीं जाना जाता, वह राजसी बुद्धि है।”

और—

अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता।
सर्वार्थान् विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी॥ (गीता 18.31)

हिन्दी -“जो तमोगुण से आवृत होकर अधर्म को ही धर्म समझती है और सब वस्तुओं को विपरीत रूप से ग्रहण करती है, वह तामसी बुद्धि है।”

जो व्यक्ति वस्तुओं को यथार्थ रूप में निरूपित नहीं करता, अपितु विपरीत आचरण में प्रवृत्त रहता है, और उसी का दूसरों को भी उपदेश देता है—

श्रुतिस्मृती ममैवाज्ञा यस्तामुल्लङ्घ्य वर्तते ।
आज्ञाच्छेदी मम द्रोही मद्भक्तोऽपि न वैष्णवः ॥ (विष्णुधर्मपुराण, 76.31)

हिन्दी – “श्रुति और स्मृति मेरी ही आज्ञा हैं। जो उनका उल्लंघन करके आचरण करता है, वह मेरी आज्ञा का भंग करने वाला, मेरा द्रोही है; वह मेरा भक्त होने पर भी वैष्णव नहीं है।”

प्रियाय मम विष्णोश्च देवदेवस्य शार्ङ्गिणः ।
मनीषी वैदिकाचारं मनसापि न लङ्घयेत् ॥ (लक्ष्मी तन्त्र 17.95)

हिन्दी – “जो मेरे तथा शार्ङ्गधन्वा भगवान् विष्णु का प्रिय होना चाहता है, वह बुद्धिमान् पुरुष मन से भी वैदिक आचार का उल्लंघन न करे।”

यथा हि वल्लभे भूः राज्ञो नदीं राज्ञा प्रवर्तिताम् ।
लोकोपयोगिनीं रम्यां बहुसस्यविवर्धिनीम् ॥
लङ्घयन् बालमारोहेदनपेक्षोऽपि तां प्रति ।
एवं विलङ्घयन्मर्त्यो मर्यादां वेदनिर्मिताम् ।
प्रियोऽपि न प्रियोऽसौ मे मदाज्ञाव्यतिवर्तनात् ॥ (लक्ष्मी तन्त्र 17.96-98)

हिन्दी -“जिस प्रकार राजा द्वारा प्रवाहित, लोकोपयोगी, रमणीय तथा अन्न-वृद्धिकारिणी नदी को जो कोई लाँघता है, वह दण्ड का भागी होता है; उसी प्रकार जो मनुष्य वेद-निर्मित मर्यादा का उल्लंघन करता है, वह मेरा प्रिय होने पर भी, मेरी आज्ञा का उल्लंघन करने के कारण मुझे प्रिय नहीं रहता।”

इसी प्रकार भगवान् की आज्ञारूप वैदिक मर्यादाओं का उल्लंघन करके, उनके विपरीत दुष्प्रवृत्तियों के कारण भगवान् को अप्रिय होकर, स्वयं भी नष्ट होता है।

और जो शिष्य उसके आश्रित हैं, उन्हें भी नष्ट करता है।

और जो लोग उसे देखकर उसका अनुकरण करते हैं, उनमें से कुछ उसका अनुसरण करके और कुछ उसकी उपेक्षा करके नष्ट हो जाते हैं।

इस प्रकार स्वयं अपथ में प्रवृत्त होकर, अपने को आचार्य मानकर, यश, लाभ और पूजा की इच्छा से, विपरीत आचरण वाले शिष्यों को एकत्र करके, उनके दुरभिमान-दूषित द्रव्य को ग्रहण करके, उसी से अपनी देहयात्रा चलाने वाला—

वह आचार्य नहीं है।

अपितु—

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Author: ramanujramprapnna

studying Ramanuj school of Vishishtadvait vedant

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