सहवास-नियति यह है—
जो देहात्माभिमान आदि से युक्त हों, देवतान्तर-परायण हों, अन्य प्रयोजनों के परायण हों, अन्य साधनों के परायण हों, अपने को स्वतन्त्र मानते हों—ऐसे प्रतिकूल व्यक्तियों को देखकर, जैसे सर्प और अग्नि को देखकर मनुष्य निकट जाने से भय करता है, वैसे ही भय करके उनसे दूर रहना; और जिन परमार्थनिष्ठ पुरुषों के साथ रहने से ज्ञान और अनुष्ठान दृढ़तापूर्वक स्थापित हो सके, उन्हीं के साथ सहवास करना।
अनुवर्तन-नियति यह है—
धनार्जन आदि के लिए राजद्वारों पर उपस्थित होकर संसारी लोगों का अनुवर्तन करते हुए न फिरना।
दृष्ट (फल) कर्म के अधीन होने के कारण उसकी ओर आकृष्ट न होकर, सदाचार्य के अनुवर्तन में स्थित रहना चाहिए।

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