आचार्योपसत्ति
श्रुति में कहा गया है—
परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन।
तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्॥
“उस तत्त्व को जानने के लिए मनुष्य को समिधा हाथ में लेकर ऐसे गुरु के पास जाना चाहिए जो श्रोत्रिय तथा ब्रह्मनिष्ठ हो। ऐसे सम्यक् शान्तचित्त और शमयुक्त शिष्य को वह विद्वान् गुरु अक्षर पुरुष के यथार्थ स्वरूप का ब्रह्मविद्या-उपदेश करता है।”
अतः वह मुमुक्षु जीव,
तत्त्वज्ञान की प्राप्ति के लिए,
श्रवण और सेवा में तत्पर होकर,
ऐसे आचार्य का आश्रय ग्रहण करता है—
- जो वेद-वेदान्त के सार का ज्ञाता हो,
- जो परमात्मा के अतिरिक्त अन्य सभी विषयों से अत्यन्त विरक्त हो,
- जो केवल परब्रह्मानुभव में स्थित हो,
- तथा जो सदाचार से सम्पन्न हो।
ऐसे आचार्य का आश्रय लेना चाहिए।
