3. शिष्यजीवनम् (शिष्य का जीवन)

शिष्यजीवनम्

जब ऐसा व्यक्ति,

शम, दम आदि आत्मगुणों से सम्पन्न होकर, आचार्य के पास पहुँचता है,

तब आचार्य उसकी भली-भाँति परीक्षा करते हैं। फिर उसे ब्रह्मप्राप्ति का साधनभूत ज्ञान उपदेश करते हैं,

और यह भी देखते हैं कि वह उस उपदेश के अनुसार आचरण कर रहा है या नहीं।

शिष्य भी, उस ज्ञान को प्राप्त करके, कृतकृत्य हो जाता है, मोक्ष का अधिकारी बन जाता है,

और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करता है। ऊपर उद्धृत श्रुति में—

“सम्यक् प्रशान्तचित्ताय”

इस पद से शम और दम इन दो गुणों का निर्देश किया गया है।

क्योंकि आत्मगुणों में ये दोनों प्रधान हैं,

अतः इनका उल्लेख समस्त सत्शिष्य-लक्षणों का उपलक्षण (संकेत) है।

इसी प्रकार,

“श्रोत्रियम्” तथा “ब्रह्मनिष्ठम्” इन दोनों पदों का उल्लेख समस्त सदाचार-लक्षणों का उपलक्षण है।

अर्थात् एक सच्चे आचार्य में जो-जो सद्गुण और सदाचार अपेक्षित हैं, वे सब इन दोनों शब्दों में संकेत रूप से समाहित हैं

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Author: ramanujramprapnna

studying Ramanuj school of Vishishtadvait vedant

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