आहार-नियति का स्वरूप यह है—
जो जाति-दूषित, आश्रय-दूषित तथा निमित्त-दूषित आहारों का परित्याग करके, पवित्र, विशिष्ट रूप से ग्राह्य (पूर्वाचार्यों ने जिसे ग्रहण किया है) तथा शुद्ध भगवत् एवं भागवत-शेष रूप आहार ( भाण्ड-शेष या उच्छिष्ट; भागवत-कर-स्पर्श से युक्त) को ही ग्रहण करता है—वही आहार-नियति का पालन करने वाला कहा जाता है।
जाति-दूषित पदार्थ वे हैं—
लशुनं मद्यं मांसानि मूलकं गृञ्जनं तथा । तिलपिष्टं तथा शिग्रुं बिल्वं कोशातकीं तथा ॥
अलाबुं श्वेतवार्ताकं विष्णीकं तथैव च । एवमादीनि ये भक्ष्याणि शास्त्रदुष्टानि ते नराः ॥
खादन्ति ते नरा यान्ति विट्कृमिकीटभोजनम् ॥
लहसुन, मद्य (मादक पेय), मांस, मूली, गृञ्जन (प्याज़), तिल का पिष्ट (तिल से बना विशेष खाद्य), शिग्रु (सहजन/मुनगा), बिल्व (बेल), कोशातकी (एक प्रकार की लता का फल), अलाबु (लौकी), श्वेत वार्ताक (सफेद बैंगन), विष्णीका तथा इसी प्रकार के अन्य पदार्थ—ये सब शास्त्रों द्वारा निषिद्ध (दूषित) भक्ष्य माने गए हैं।
जो लोग इन शास्त्र-वर्जित पदार्थों का सेवन करते हैं, वे शास्त्र-विहित आचार का उल्लंघन करते हैं और उसके अनुसार पाप के भागी बनते हैं। जो मनुष्य इन निषिद्ध पदार्थों का भक्षण करते हैं, वे मृत्यु के पश्चात् ऐसी अधम गति को प्राप्त होते हैं जहाँ वे विष्ठा में रहने वाले कृमियों (कीड़ों) का आहार बनते हैं।
इन को त्याज्य कहा गया है; अर्थात् ये निषिद्ध द्रव्य हैं।
किन्तु आचारप्रधान भगवान् के विषय में: “न मांसं राघवो भुङ्क्ते न चापि मधु सेवते।”
हिन्दी:
“राघव न मांस का भक्षण करते हैं और न ही मधु का सेवन करते हैं।”
इस प्रकार सीताजी के वियोग के समय मधु और मांस का वर्जन किया गया है, ऐसा कहा गया है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि उसके पूर्व, साथ रहने के समय, उन्होंने उनका सेवन किया था।
फिर—“मर्यादानाञ्च लोकस्य कर्ता कारयिता च सः।”
हिन्दी: “वे लोक-मर्यादा के कर्ता भी हैं और उसका पालन कराने वाले भी हैं।”
और—“धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।”
हिन्दी: “धर्म की स्थापना के लिए मैं युग-युग में अवतार लेता हूँ।”
धर्म-स्थापना के लिए अवतीर्ण हुए अवतारों में आचरित धर्म उपादेय (अनुकरणीय) क्यों न माना जाए—यदि ऐसा कहा जाए, तो (उत्तर यह है कि) भगवान् सामान्य-धर्मनिष्ठ थे। इसलिए क्षत्रिय-कुल के अनुकूल जो मांस था, और राजा लोग जो अनेक सुगन्धित पुष्पों के रस से उत्पन्न मधु ग्रहण करते हैं, उसका ग्रहण किया होगा; किन्तु अपने वर्ण के विरुद्ध मधु और मांस का ग्रहण नहीं किया।
वर्णधर्म का पालन करने वालों के लिए तारतम्य के अनुसार कुछ वस्तुएँ त्याज्य हैं और कुछ उपादेय हैं। किन्तु सत्त्व-प्रधान परमैकान्तियों के लिए—
“उभे विद्वान् पुण्यपापे विधूय…”
हिन्दी: “विद्वान् पुण्य और पाप—दोनों का परित्याग करके…”
—भगवदानुभव के अतिरिक्त अन्य सब त्याज्य हो जाते हैं; उन्हें उपादेय नहीं कहा जा सकता।
फिर—
“मधूकमैक्षवं तालं खर्जूरं पानसं तथा ।
द्राक्षं मधुजमारिष्टं मैरेयं नारिकेलजम् ।
इत्येकादश मद्यानि निषिद्धानि द्विजन्मनाम् ।
सुरां भूगृतकेरमूत्रपयसामन्यतममग्निस्पर्शात् ।
… पीत्वा मरणात् परां गतिं प्राप्नुयात् ॥” (विष्णुस्मृति (२२.८३-८४) )
हिन्दी:
“महुआ से उत्पन्न, गन्ने से उत्पन्न, ताड़ से उत्पन्न, खजूर से उत्पन्न, पनस (कटहल) से उत्पन्न, द्राक्षा से उत्पन्न, मधु से उत्पन्न, अरिष्ट, मैरेय और नारिकेल से उत्पन्न—ये ग्यारह प्रकार के मद्य द्विजों के लिए निषिद्ध हैं। यदि कोई द्विज अज्ञानवश या मोहवश सुरापान कर लेता है, तो उसकी शारीरिक और आत्मिक शुद्धि के लिए कठोर प्रायश्चित का नियम – इसके अंतर्गत अग्नि द्वारा गर्म किए गए घृत (घी), क्षीर (दूध), गोमूत्र, दधि का सेवन (पञ्चगव्य) करने का विधान है। … (यदि कोई इन्हें पीए तो) प्रायश्चित्त करके, मृत्यु के पश्चात् ही शुद्धि प्राप्त करता है।”
इस प्रकार सत्त्व-प्रधान ब्राह्मण्य के लिए भी ये द्रव्य मृत्यु-पर्यन्त निषिद्ध हैं। तब शुद्ध-सत्त्वनिष्ठ, ग्राम, कुल आदि के भेदों से रहित, समस्त वर्णाश्रमों से विलक्षण, केवल भगवान् के ही दासत्व से निर्दिष्ट परमैकान्तियों के लिए तो इनका स्मरण भी नहीं करना चाहिए।
इन निन्दित निषिद्ध द्रव्यों का ग्रहण केवल वर्ण के कारण निषिद्ध नहीं है; अपितु—
“द्रव्यं निन्द्यं सुरादि, दैवतमतिः क्षुद्रं च बाह्यागमः”
हिन्दी: “सुरा आदि द्रव्य निन्दित हैं; क्षुद्र देवताओं में बुद्धि रखना तथा बाह्यागम (वैदिक-विरोधी आगम मत) भी निन्दित है…”
अतः ये क्षुद्र-देवता-विषयक, बाह्यागम-प्रवर्तक तथा निषिद्ध कर्म होने के कारण सर्वथा गर्हित हैं।
फिर—
“यजन्ते सात्त्विका देवान्।”
हिन्दी: “सात्त्विक लोग देवताओं की उपासना करते हैं।”
यद्यपि भगवान् ने अपने अवतारों में रुद्र, इन्द्र आदि देवताओं की आराधना की, तथापि अनन्यार्ह-शेषत्व के कारण, षड्विध-शरणागति से युक्त और श्रीदेवी के समान परमशुद्ध आत्माओं के लिए देवतान्तर-भजन करना उचित नहीं है।
और भी, यदि अवतारों में की गई अतिमानुष चेष्टाएँ दृष्टान्त मानी जाएँ, तो यह भी मानना पड़ेगा कि भगवान् ने ब्रह्मकुल में उत्पन्न रावण का वध किया; तब ब्रह्महत्या आदि भी अनुकरणीय मानी जाएँगी। (अतः ऐसा नहीं मानना चाहिए।) यदि श्रीकृष्ण का अनुकरण किया जाए, तो परहिंसा, परदारगमन, परद्रव्यापहरण आदि भी उपादेय (अनुकरणीय) हो जाएँगे; इसमें कोई दोष नहीं रहेगा।
किन्तु तब महापातक भी प्रपन्नधर्म के रूप में आचरण किए जाने लगेंगे; अतः ऐसा नहीं कहा जा सकता।
यदि कहा जाए कि चरमश्लोक के प्रथम पद में “सर्व” शब्द में किसी प्रकार का संकोच न रहे, इसलिए उसे निवृत्तिरूप धर्मों के त्याग के लिए ग्रहण किया गया है,
तो जीव, ईश्वर और फल—इन तीनों का विचार करने पर उसके लिए कोई अवसर नहीं रहता; यह मुमुक्षुप्पडि में निराकृत किया जा चुका है।
यदि यह स्वीकार कर लिया जाए कि वह केवल दृष्टान्तरूप से कहा गया है, तो फिर संकोच किस बात का?
क्योंकि—பிணக்கற அறுவகைச் சமயமும் நெறியுள்ளியுரைத்த கணக்கறு நலத்தனன் (पिणक्कर अरुवगैच् समयमुम् नेरियुळ्ळियुरैत कणक्करु नलत्तनन्।) (thiruvAimozhi – 1.3.5 – piNakkaRa aRuvagai – KOYIL )
हिन्दी: “जिसने परस्पर-विरोधरहित छहों मतों का विचार करके यथार्थ मार्ग का उपदेश किया, वह अपरिमेय कल्याणगुणों से युक्त है।”
स्वतः सर्वज्ञ सर्वेश्वर ने षट्समयवाद का निराकरण हो जाए, इस प्रकार सद्मार्ग का विचार करके चरमश्लोक का उपदेश किया। यदि उसके भीतर निषिद्ध आचरण का भी अभिप्राय मान लिया जाए, तो गुरु, मन्त्र और देवता का अपमान होगा; विपरीत अर्थ की प्रतीति होगी; और समस्त उपनिषदों के सार तथा समस्त गीता-शास्त्र के सारभूत (प्रपत्ति)—
उपायापायनिर्मुक्तो मध्यमां स्थितिमास्थितः। (लक्ष्मी तन्त्र 17.82)
हिन्दी – “जो उपाय और अपाय—दोनों से रहित होकर मध्य स्थिति में स्थित है।”
(“शास्त्रों में हिंसा, चोरी आदि बुरे कर्मों को ‘अपाय’ (कल्याण मार्ग में बाधक/पाप) बताया गया है। वहीं शास्त्रों में कर्मयोग, ज्ञानयोग और सांख्य आदि को मोक्ष का ‘उपाय’ (साधन) कहा गया है। जो साधक अपाय (पापों) और उपाय (अपने व्यक्तिगत पुरुषार्थ के अहंकार), दोनों से सर्वथा मुक्त होकर मध्य की स्थिति (पूर्ण समर्पण) में स्थित हो जाता है, वह इस दृढ़ विश्वास के साथ कि ‘भगवान मेरी रक्षा अवश्य करेंगे’, अपना सर्वस्व (अपने आत्मा और कर्मों का भार) भगवान के चरणों में सौंप देता है।”)
—इस वचन के अनुसार उपाय और अपाय से रहित प्रपत्ति का भी अपमान होगा; इसलिए वह अनर्थ का कारण है।
अतः—
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्। उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्॥ १७.१०॥
हिन्दी – “उच्छिष्ट और अपवित्र भोजन तामसिक लोगों को प्रिय होता है।”
अमेध्य वस्तुएँ तामसिकों के लिए हैं; सत्त्वनिष्ठों के लिए वे त्याज्य हैं।
त्याज्य और उपादेय का भेद त्रिगुणों के अधीन, प्रकृतिबद्ध कर्म करने वाले जीवों के लिए ही है।
यदि कहा जाए— सर्वं खल्विदं ब्रह्म। (“यह सम्पूर्ण जगत् ब्रह्म है।”)
—इस प्रकार समस्त वस्तुओं को ब्रह्मात्मक मानने वाले अधिकारियों के लिए भी क्या कोई त्याज्य वस्तु रहती है?
उत्तर: जब यह जीव त्रिगुणात्मक प्रकृति का परित्याग करके मुक्त हो जाता है, तभी भगवान् का होने के स्वरूप से सम्पूर्ण लीलाविभूति उसके लिए अनुभव योग्य हो जाती है।
यद्यपि वे अभी प्रकृतिशरीरयुक्त हों, तथापि ‘मयर्वर मदि नलम्’ प्राप्त आलवारों के समान तथा प्रह्लाद आल्वान् के समान अपरोक्षज्ञानी होकर समस्त वस्तुओं में सर्वेश्वर का साक्षात्कार करते हैं। तब विष, शस्त्र, अग्नि आदि भी उनके लिए प्रतिकूल नहीं रहते।
तमिल – அரியுஞ் செந்தீயைத்தழுவி அச்சுதன் என்னும் மெய்வேவாள்
देवनागरी लिप्यंतरण – अरियुञ् सेन्तीयैत्तऴुवि अच्चुतन् एन्नुम् मेय्वेवाळ्। thiruvAimozhi – 4.4.3 – aRiyum sendhIyai – KOYIL
हिन्दी – “प्रचण्ड अग्नि का आलिंगन करते हुए भी वह ‘अच्युत’ नाम का ही उच्चारण करती रही।”
और—
नाग्निर्दहति नैवायं शस्त्रैश्छिन्नो न चोरकैः।
क्षयं नीतो न वातेन न विषेण न कृत्यया।
सत्त्वासक्तमतिः कृष्णे दह्यमानो महोरगैः।
न विवेदात्मनो गात्रं तत्स्मृत्याह्लादसंस्थितः॥
हिन्दी – “उसे न अग्नि जलाती है, न शस्त्र काटते हैं, न चोर हानि पहुँचाते हैं; न वायु, न विष और न अभिचार उसका नाश कर पाते हैं। जिसका चित्त कृष्ण में आसक्त है, वह महान् सर्पों द्वारा दंशित होने पर भी भगवान् के स्मरणजन्य आनन्द में स्थित रहने के कारण अपने शरीर का भी अनुभव नहीं करता।”
ये सब उसके लिए अनुकूल हो जाते हैं।
फिर—
सर्वभूतात्मके तात जगन्नाथे जगन्मये। परमात्मनि गोविन्दे मित्रामित्रकथा कुतः॥
हिन्दी – “हे तात! जब गोविन्द ही समस्त भूतों के आत्मरूप, जगन्नाथ और जगन्मय परमात्मा हैं, तब मित्र और शत्रु की चर्चा कहाँ है?”
इस प्रकार सबको समान देखकर आलवार कहते हैं—
புகழுநல்லொருவனென்கோ பொருவில்சீர்ப் பூமியென்கோ (पुगऴु नल्लोरुवनेन्को, पोरुविल्-सीर्प् भूमियेन्को।)
हिन्दी – “उसे क्या ‘अतुलनीय यशस्वी’ कहूँ, या ‘अतुलनीय महिमा से युक्त पृथ्वी’ कहूँ?”
और—யாவையும் யவருந்தானாய் (यावैयुम् यवरुन्दानाय्।)
हिन्दी – “जो सब कुछ और सब प्राणियों के रूप में स्वयं स्थित है।”
और— நல்குரவும் செல்வும் நரகும் சுவர்க்கமுமாய் (नल्कुरवुम् सेल्वुम् नरगुम् सुवर्क्कमुमाय्।)
हिन्दी – “जो दरिद्रता, सम्पत्ति, नरक और स्वर्ग रूप है।”
और— நீராய் நிலனாய்த் தீயாய்க் காலாய் (नीराय् निलनाय्त् तीयाय्क् कालाय्।) thiruvAimozhi – 6.9.1 – nIrAy nilanAy – KOYIL
हिन्दी – “जो जल, पृथ्वी, अग्नि और वायु रूप है।”
इस प्रकार पृथ्वी आदि पंचमहाभूतों, समस्त भौतिक पदार्थों तथा समस्त चेतन-अचेतन वस्तुओं में व्याप्त होकर वे सब उसके प्रकार (शरीर) हैं—इसका अनुसंधान उन्होंने किया।
किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि उन्होंने उन्हें ब्रह्मात्मक मानकर लहसुन, गृञ्जन आदि का सेवन किया।
आलवार ने प्रार्थना की— காணவாராய் काणवाराय्।
हिन्दी – “आइए, मुझे दर्शन दीजिए।”
यदि कहा जाए—”हमने तो आपको जगत्-स्वरूप ही दिखा दिया; उसे देखकर सन्तोष क्यों नहीं होता?”
तो उसका उत्तर यह है— जिस प्रकार राजा के कारागार आदि सहित सम्पूर्ण ऐश्वर्य राजपुत्र के लिए अपने पिता का ऐश्वर्य होने से आदरणीय होता है, उसी प्रकार ब्रह्माण्ड के भीतर स्थित देवता आदि पदार्थ, स्वर्ग, नरक आदि भोगभूमियाँ तथा उनकी प्राप्ति के हेतु रूप पुण्य और पाप—इन सबका भगवान् से पृथक् कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। वे उसके प्रकार (शरीर) होने से उसी के हैं—हम केवल इतना ही स्वीकार करते हैं।
किन्तु—அழுக்குப் பதித்த உடம்பாய், अऴुक्कुप् पदित्त उडम्बाय्। thiruvAimozhi – 6.3.7 – paranjudar udambAy – KOYIL
हिन्दी – “यह शरीर अशुद्धि से लिप्त है।”
इस प्रकार जो हेय-वस्तुओं का समुदाय है, जो स्वरूप का आवरण करने वाला और विपरीत ज्ञान उत्पन्न करने वाला जगत्-स्वरूप है—क्या वह मेरे लिए परमप्रकाशमय दिव्य शरीर के समान अनुभवयोग्य हो सकता है?
इसलिए उन्होंने प्रार्थना की— கூராராழி வெண்சங்கேந்திக் கொடியேன்பால் வாராய், कूराराऴि वेण्शङ्गेन्दिक् कोडियेन्पाल् वाराय्। thiruvAimozhi – 6.9.1 – nIrAy nilanAy – KOYIL
हिन्दी – “हे तीक्ष्ण चक्र और श्वेत शंख धारण करने वाले! इस दीन के पास पधारिए।”
अर्थात् “நீராய் நிலனாய்…” कहने वाले तिरुवाय्मोऴि में भी उन्होंने भगवान् से उनके असाधारण (दिव्य) विग्रह सहित आने की ही प्रार्थना की है।
श्रीमहालक्ष्मी, नित्यमुक्त और मुमुक्षु—इन सबकी अवस्थाओं से युक्त होने के कारण, मुक्तावस्था के अनुभव के समय समस्त वस्तुओं को भगवान्-स्वरूप मानकर अनुसंधान करने वाले आलवार ही, माता के स्तन्य आदि समस्त प्राकृत वस्तुओं को हेय मानकर उनका परित्याग करते हैं।
உண்ணுஞ்சோறு பருகு நீர் தின்னும் வெற்றிலையுமெல்லாம் கண்ணன் (उण्णुञ् चोरु परुगु नीर् तिन्नुम् वेत्रिलैयुमेल्लाम् कण्णन्।) thiruvAimozhi – 6.7.1 – uNNum sORu – KOYIL
हिन्दी – जो अन्न खाया जाता है, जो जल पिया जाता है, और जो पान (वेत्रिलै) चबाया जाता है—सब कन्नन (भगवान्) ही हैं।”
इस प्रकार धारण करने वाले, पोषण करने वाले और भोग्य—इन तीनों को वही भगवान् है—ऐसा अनुसंधान करते हुए भी, प्राकृत-वस्तुओं में आसक्त संसारी जीवों को देखना भी नहीं चाहते।
उन्होंने प्रार्थना की— கொடுவுலகங்காட்டே (कोडुवुलगम् काट्टे।)
हिन्दी – “इस क्रूर संसार को मत दिखाइए।”
और— இவையென்னவுலகியற்கை, (इवैयेन्न उलगियर्क्कै।)
हिन्दी – “यह कैसी संसार-प्रकृति है!”
और— நாட்டாரோடியல்வொழிந்து (नाट्टारोडु इयल्वोऴिन्दु।)
हिन्दी – “संसार के लोगों के व्यवहार का परित्याग करके।”
और— பணிகண்டாய் சாமாறே (पणि कण्डाय् सामारे।)
हिन्दी – “हे स्वामी! मेरी प्रार्थना स्वीकार कीजिए।”
इस प्रकार उन्होंने शरीर से विमुक्त होने की अवस्था की प्रार्थना की।
अतः केवल “सब ब्रह्मस्वरूप है” ऐसा कहकर मुमुक्षु के लिए प्राकृत हेय वस्तुओं को उपादेय नहीं कहा जा सकता।
- आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः।
- सत्त्वात् संजायते ज्ञानम्।
- ज्ञानान्मोक्षः।
हिन्दी – “आहार की शुद्धि से सत्त्व की शुद्धि होती है। सत्त्व की शुद्धि से ज्ञान उत्पन्न होता है। ज्ञान से मोक्ष प्राप्त होता है।”
अतः जो ज्ञान के विरोधी हैं, वे त्याज्य हैं।
आलवारों को भगवान् ने ‘मयर्वर मदि नलम्’ (अविचल और निर्मल ज्ञान) प्रदान किया था; इसलिए उनके लिए धारण करने वाले आदि सब वही भगवान् हो गए।
किन्तु जिन मुमुक्षुओं को वह अवस्था प्राप्त नहीं हुई है, उनके लिए केवल सत्त्वप्रधान वस्तुएँ ही ग्रहण करने योग्य हैं।
अतः जातिदुष्ट पदार्थ त्याज्य हैं।
