तिरुप्पावै 24

आज 24वीं गाथा में गोदाम्बा भगवान का मंगलाशासन करती हैं| पिछली गाथा में यह अनुरोध किया गया कि आप सिंह सी चाल चलते हुए सिंहासन पर विराजमान हों! गोपियों ने देखा की भगवान के अत्यन्त मृदु चरण लाल पड़ गए हैं| वो सब मिलकर भगवान के मंगल की कामना करते हुए मंगलाशासन करती हैं|

भगवान का मंगलासन करना गोदाम्बा को अपने पिता विष्णुचित्त भट्टनाथ आलवार से विरासत में मिला है| तिरुपल्लाण्डु दिव्यप्रबन्ध में विष्णुचित्त आलवार कितना मंगलासन करते हैं| न केवल मुमुक्षुओं अपितु ऐश्वर्यार्थियों एवं कैवल्यार्थियों को भी भगवान का मंगलाशासन गाने हेतु आमन्त्रित करते हैं| बाकि आल्वार जहाँ स्त्री भावना में नायिका बन जाते हैं, वहीँ विष्णुचित्त आल्वार यशोदा भाव का अनुभव करते हुए भगवान के मंगल की कामना करते हैं| इसकारण उन्हें “बड़े आल्वार” कहा जाता है|

ज्ञान की अवस्था में हम रक्ष्य होते हैं एवं भगवान रक्षक| किन्तु ज्ञान जब परिपक्व होकर भक्ति बन जाता है तब उस अवस्था में हम रक्षक होते हैं एवं भगवान के मार्दव का चिन्तन करते हुए उनके रक्षण का प्रयत्न करते हैं| यदि ये अज्ञान है, तो भी यह गुण ही है, दोष नहीं क्योंकि यह भगवान को अत्यन्त प्रीतिकर होता है|

श्रृंखला : तिरुप्पावै (गोदा देवी जी का दिव्य व्रत)

श्री उ वे रंगदेशिक स्वामीजी द्वारा गोदा-गीतावली से

श्री उ वे भरतन स्वामी द्वारा 24वीं गाथा का संस्कृत छन्दानुवाद:

२४.पूर्वमेतज्जगत्क्रान्त! पादाभ्यां तव मङ्गलम् ।
गत्वा रुचिरलङ्कां तां हन्तः ! शौर्याय मङ्गलम् ।।
शकटं पत्प्रहारेण भङ्क्तः ! कीर्त्यै सुमङ्गलम् ।
वत्सं दण्डवदादाय क्षेप्तः ! पद्भ्यां सुमङ्गलम् ।।
छत्रवद्गिरिमुद्धर्तः ! सद्गुणेभ्यः सुमङ्गलम् ।
शत्रून् विजित्य हन्त्र्यै ते हस्ते शक्त्यै सुमङ्गलम् ।।
इत्थं ते वीरकर्माणि स्तुत्वा लब्धुं च भेरिकाम् ।
वयमद्य समायाता अस्मासु त्वं दयस्व भोः! । ।

श्री उ वे सीतारामाचार्य स्वामीजी द्वारा हिन्दी छन्द अनुवाद

  1. वामन अवतार में महाबली चक्रवर्ती से भिक्षा में 3 पग भूमि मिलते हीं तीनों संसार को नाप लेने वाले भगवान के चरणों का मंगल हो!

जब भगवान तीनों लोकों को नापने हेतु अपने पैर बढाए, तब उनके चरण पर्वत, वन आदि से चोट खाते हुए आगे बढे होंगे| उनके चरणों की मृदुलता का स्मरण कर गोपियाँ चिन्तित होती हैं एवं उनका मंगल गाती हैं|

त्रिविक्रम ने तो समस्त जगत के जीवों के शर पर अपने चरण रखते हुए आगे बढे थे| जाम्बवान ढोल बजाते हुए, उनकी जय गाते हुए उनकी परिक्रमा करने लगे| देवताओं को उनका अभीष्ट मिल गया| लेकिन ओह! उनके चरणों के स्वास्थ्य की चिन्ता तो तब किसी को न हुयी थी| ऐसा स्मरण कर अब गोदाम्बा सहित गोपियाँ उनका मंगल गाती हैं|

(त्रिविक्रम अवतार के काल में तो हम नहीं थे| तब किसी ने आपका शरण नहीं लिया, फिर भी आपने सबके शिर पर अपना चरण रख दिया| हम तो शरणागत है, हमें भी अपने चरणों की सेवा प्रदान करो|)

२. सुन्दर लंका में प्रवेश कर दुष्ट राक्षसों को नष्ट करने वाले उनके शौर्य का मंगल हो!

दण्डकारण्य के ऋषियों की शरणागति में भगवान लज्जित होते हैं एवं कहते हैं कि मुझे पूर्व ही में ही आकर आप लोगों की रक्षा करनी चाहिए थी किन्तु आपको ही आना पड़ा, इस कारण मैं लज्जित हूँ| विभीषण 100 योजन का सागर पार कर आये और उन्हें क्षण भर विलम्ब हुआ तो भगवान ने क्षमा मांगी| किन्तु सोचो तनिक की भगवान किंतने युगों से हमारी प्रतीक्षा कर रहे हैं| वह हमें प्राप्त करने हेतु ही कितनी दूर आये हैं| श्रीवैकुण्ठ से क्षीराब्धि, फिर अयोध्या और अयोध्या से लंका| नंगे पैर घने जंगल एवं पर्वतों को पार करते हुए इनके अति सुकुमार चरणों को कितना कष्ट हुआ होगा| ओह! यह तो त्रिविक्रम अवतार से भी अधिक पीड़ा दे रहा है गोपियों को|

गोपियाँ कैकेयी की तरफ नाराजगी से देखती हैं| पराशर भट्ट जी कहते हैं, “हे राम! आपके ये चरण आपकी नहीं अपितु आपके भक्तों की संपत्ति हैं| और आप अपने चरणों को एवं अम्माजी के चरणों को इस प्रकार कष्ट दे रहे हैं? आपको ऐसा अधिकार नहीं है| वापस आ जाईये|”

(जिस प्रकार आपने रावण का नाश किया, हमारे दुखों को भी नष्ट कर दो न! जैसे विभीषण को स्वीकार किया, हमें भी स्वीकार करो कृष्ण!)

Credits: Suganya mami
  1. अपने पाद प्रहार से दुष्ट शकटासुर को नष्ट करने वाले आपकी कीर्ति का मंगल हो!

यह तो महाबली और रावण की तुलना में भी अधिक चिन्तादायक है| ये असुर तो रक्षक बनकर छुपकर वार करने वाला था| राम के आसपास तो महारथी थे किन्तु कृष्ण के आसपास तो भोले-भाले गोप-गोपियाँ हैं| उनकी रक्षा कौन करेगा? किन्तु कृष्ण के चरण केवल भक्तों के ही रक्षक नहीं हैं अपितु स्वयं कृष्ण के भी रक्षक हैं’| जैसे राम के कन्धों पर धनुष के चिन्ह हैं, वैसे हीं कृष्ण के चरणों में शकटासुर को प्रहार से मारने का चिन्ह है| इससे आपकी जो कीर्ति हुयी, उसका मंगल हो!

  1. बछड़े के रूप में आये वत्सासुर एवं कपित्थ वृक्ष के रूप में कपित्थासुर को मारने वाले आपके चरणों का मंगल हो!

कृष्ण ने वत्सासुर को उठाया और उस कपित्थ वृक्ष पर दे मारा| दोनों की मृत्यु हुयी|
कृष्ण से अत्यंत प्रेम करने वाली गोपियाँ उनकी सुरक्षा के प्रति चिन्तित हो जाती हैं और मंगल गाती हैं|

  1. छत्र की तरह गोवर्धन को धारण कर अभीरों की रक्षा करने वाले आपके कारुण्य गुण का मंगल हो!

बाकि लोग तो कम से कम दैत्य थे, भगवान से द्वेष रखने के कारण भगवान को क्षति पहुँचाना चाहते थे| किन्तु ये इन्द्र तो भगवान का भक्त था| वो भी भगवान को क्षति पहुचाने की चेष्टा किया| अब तो भक्तों से भी कृष्ण की सुरक्षा करनी होगी|
किन्तु कृष्ण ने समस्त गोप समाज की रक्षा की| इन्द्र का भी अपराध भयंकर था किन्तु उसे मृत्यदंड नहीं दिया कृष्ण ने अपितु आशीष ही दिया| ऐसे आपके कारुण्य गुण का मंगल हो!

  1. आपके हस्त में विराजमान आपके भल्लायुध (शक्ति अस्त्र) का मंगल हो!

गायों को जंगली जानवरों से रक्षा हेतु कृष्ण अपने हस्त में भाला रखते हैं| यदि लोग यह जान गए कि कृष्ण ने गोवेर्धन पर्वत उठाया है तो उसे बुरी दृष्टि डालेंगे| इसलिए बोल रहे हैं कि ये सब तो कृष्ण की भाला ने किया है|

“हम यहाँ आपके वीरत्व सौम्यत्व करुणा का गुणानुवाद और मंगलाशासन करने आयी हैं , हम पर कृपा करते हुये, आपके कैंकर्य में रत रहने की शक्ति हमें प्रदान करिये “

तिरुप्पावै 23

आज की गाथा में गोदाम्बा सहित गोपियाँ यादवसिंह कृष्ण को सम्बोधित करती हैं। नीलादेवी के पुरुष्कार को प्राप्त करके, अपने आकिंचन्य, अनन्य-गतित्व, महाविश्वास का ज्ञापन करने के बाद अंततः भगवान गोपियों का प्रणय निवेदन स्वीकार करते हैं।

कृष्ण को गोदाम्बा ‘स्त्रियों का दुख न जानने वाले भगवान‘ कहती हैं। ‘राम अपनी पत्नी के लिए दुष्ट रावण को अनायास ही सेना सहित नष्ट कर दिए थे। किन्तु ये कृष्ण तो मिलने का एक समय देता है, और स्वयं नहीं आता। गोपियों को पत्नी के रूप में स्वीकार किया है किन्तु मिलने भी नहीं आता।’

यह सुन कृष्ण बहुत लज्जित हुए। “मुझे तो स्वयं इनके पास जाकर इनसे मिलना था, किन्तु ये मेरे द्वार तक आ गईं और मैं सो रहा हूँ। इतनी ठण्ड में प्रातः काल यमुना स्नान करके ओष की बूँदों को सहन करती हुई मेरे द्वार पर खड़ी हैं”

“हे गोपियों! मैं अभी बाहर आता हूँ।”

(त्रेतायुग में जब श्रीराम दण्डकारण्य में ऋषियों की दशा देखते हैं तो अपने देर से आने पर लज्जित होते हैं। मुझे स्वयं ही आकर इनकी रक्षा करनी चाहिए थी किन्तु ये ही आकर अपने रक्षण हेतु मेरी शरणागति किये हैं। माता कैकेयी ने मुझे कुछ मास पूर्व ही वनवास क्यों नहीं दे दिया!”)

(अर्चिरादि मार्ग में जब जीवात्मा भगवान के श्री मणि मण्डप में पहुँचता है, तब भगवान कहते हैं कि मुझे पूर्व में ही आकर तुम्हें प्राप्त कर लेना चाहिए था।)

गोदाम्बा कहती हैं, “बाल सिंह की भाँति धीरे-धीरे शयन से उठो और सिंह गति में चलते हुए अपने सिंहासन पर विराजमान हो। हम तुम्हारे प्रत्येक चेष्टितों को देख आनन्द लेना चाहती हैं एवं उनका मङ्गल गाएंगीं।

“शयन गृह से बाहर आकर, सभागृह पहुंचकर, सिंहासन पर बैठकर, हमारे कैंकर्य-प्रार्थना पर विमर्श करो”।


श्रृंखला : तिरुप्पावै (गोदा देवी जी का दिव्य व्रत)

मारि मलै मुळैन्जिल् मन्निक् किडन्दु उऱन्गुम्
सीरिय सिन्गम् अऱिवुऱ्ऱुत् ती विळित्तु
वेरि मयिर् पोन्ग एप्पाडुम् पेर्न्दु उदऱि
मूरि निमिर्न्दु मुळन्गिप् पुऱप्पट्टु
पोदरुमा पोले नी पूवैप् पूवण्णा
उन् कोयिल् निन्ऱु इन्गने पोन्दु अरुळिक् कोप्पु उडैय
सीरिय सिन्गासनत्तु इरुन्दु याम् वन्द
कारियम् आराय्न्दु अरुळ् एलोर् एम्बावाय्

श्री उ वे सीतारामाचार्य स्वामीजी द्वारा हिन्दी छन्दानुवाद:

श्री उ. वे. मीमांसा शिरोमणि भरतन् स्वामी द्वारा अनुगृहीत 23वीं गाथा का संस्कृत छन्दानुवाद:

२३.सम्यक्सुप्तो महासिंहो वर्षासु गिरिकन्दरे ।
प्रबुध्योन्मील्य नेत्रे स्वे कणानग्नेः किरन्निव ।।
सुरभीणां सटानां च स्याद्विकासो यथा तथा ।
चलित्वा सर्वपार्श्वेषु विधूयावयवान् समान् ।।
विसृज्य महतीं तन्द्रां गर्जन्निःसृत्य गह्वरात् ।
यथाऽऽगच्छति तद्वत्त्वम् अतसीपुष्पवर्ण! भोः ।।
त्वन्मन्दिरादिहागत्य दिव्यसिंहासने स्थितः ।
अथागमनकार्यं नः कारुण्येन विचारय ।। 23 ।।

प्रथम चार पंक्तियों में सिंह का वर्णन है।

**मारि : वर्षा

**मलै : पर्वत

**मुळैन्जिल् : गुफा

**मन्निक् किडन्दु उऱन्गुम् : लेट कर निश्चिंत गाढ़ निद्रा लेने वाले

**सीरिय सिन्गम् : श्रेष्ठ सिंह

**अऱिवुऱ्ऱुत् : उठता है

**ती विळित्तु : गौरव से देखता है, मानो दूसरों की चिंगड़ी निकल जाए इस प्रकार से

**वेरि मयिर् पोन्ग : अपने सुगन्धित केशों को फैलाते हुए

**एप्पाडुम् पेर्न्दु उदऱि : चारों को शरीर घुमाकर, शरीर को संकुचित करते हुए, अपने पैरों को हिलाता है

**मूरि निमिर्न्दु : आलस त्यागकर

**मुळन्गिप् पुऱप्पट्टु : शब्द करते हुए निकलता है

**पोदरुमा पोले : जैसे वो आता है, वैसे ही आपको आना है।

“वर्षा काल में पर्वत में अपने गुफा में शयन किया सिंह जिस प्रकार उठता है, जिस दृष्टि से अपने दोनों तरफ देखता है, अपने सुगन्धित केशों को फैलाकर, शरीर को सिकोड़कर, चारों को घुमाकर अपने पैरों को हिलाता है और शब्द करते हुए बाहर आता है, वैसे ही आपको बाहर आना है।”

(यहाँ गुफा नन्दगोप का भवन है। सिंह और सिंहनी कृष्ण एवं नीला हैं जो गाढ़ निद्रा में शयन कर रहे थे। श्रेष्ठ सिंह कहने का अर्थ है ये पुरुषोत्तम हैं। सिंह दृष्टि से देखने का अर्थ है कि अपनी कृपा दृष्टि से देखना ताकि हमारे सारे विरोधि-स्वरूप नष्ट हो जायें। जिस प्रकार नरसिंह हिरण्यकशिपु के प्रति क्रोध एवं प्रह्लाद की रक्षा दोनों करते हैं।
जब विभीषण राम के पास आते हैं तो भगवान उसे किस प्रकार देखते हैं! “लोचनाभ्यां पिबन्निव”। मानों अपने नेत्रों से उसे पी जाएंगे। आप उसी प्रकार से हमें देखिए।

यहाँ राघव-सिंह का भी स्मरण करते हैं आचार्यगण जो वर्षाकाल में किष्किन्धा के पर्वतों की गुफा में रुके थे। वर्षाकाल के पश्चात सिंह गति से लक्ष्मण नगर में प्रवेश कर दहाड़ते हैं तो सुग्रीव की सेना थरथरा जाती है।)

**उन् कोयिल् निन्ऱु इन्गने पोन्दु अरुळिक् : तुम अपने महल से बाहर निकलो। हमें अपने सिंह गति के दर्शन दो।

(मन्दिर से बाहर निकलते हुए नम्पेरुमाल (रंगनाथ भगवान के उत्सव मूर्ति) के सिंह-गति का स्मरण करना चाहिए।)

शयन अवस्था की सुंदरता का आनंद लेने की इच्छा रखते हुए, उनकी जाग्रत अवस्था की सुंदरता, उनके चलने की शैली की सुंदरता और उन्हें भव्यता से बैठे देखने की सुंदरता। अंडाल इस छंद में कहती हैं, कृपया वहां से उठें और अपने दर्शक कक्ष की ओर गरिमामय रूप से जाएं और भव्य सिंहासन को सजाएं, और फिर हमारी यात्रा के उद्देश्य के बारे में पूछताछ करें।

मंदिर की शोभायात्राओं में, भगवान अतिशय भव्यता के साथ, शंख और अन्य वाद्ययंत्रों की जोरदार ध्वनि के बीच निकलते हैं और विभिन्न मुद्राओं और शैलियों में चलते हैं। कभी वह हाथी की तरह, कभी सिंह की तरह, कभी अश्व आदि की तरह चलते हैं।

(पूर्व में कहा कि नन्दगोप का महल। अब कह रही हैं कि तुम्हारा महल। अर्थात नन्द एवं कृष्ण एक ही महल में रहते हैं। जैसे जीवात्मा एवं परमात्मा एक ही शरीर में रहते हैं। जैसे प्रणव में अकार भगवान हैं और मकार जीवात्मा।)

**कोप्पु उडैय सीरिय सिन्गासनत्तु इरुन्दु : बाहर आकर अपने धर्म-पीठ उभय-विभूति-नायक सिंहासन पर बैठिए।

(सिंहासन पर बैठकर राजा जो निर्णय लेता है, उसकी अनुज्ञा वह स्वयं भी नहीं कर सकता। ये कृष्ण तो अपनी बात से पलट जाता है। इसलिए सिंहासन पर बैठकर निर्णय लो।)

**याम् वन्द कारियम् आराय्न्दु अरुळ् एलोर् एम्बावाय्:

“जो कार्य के लिए हम आयी हैं, उस विषय में कृपा से विचार करो।”

(आना तो तुम्हें स्वयं चाहिए था किन्तु तुम सोये रहे और हम तुम्हारे पास आ गईं। अब हमारे व्रत को पूर्ण करो।)

अब नप्पिनै और कृष्ण सिंहासन पर विराजमान होते हैं। लज्जित होते हैं कि हेमन्त ऋतु की ठंड में ये गोपियाँ इतनी सुबह स्वयं आयी हैं।

तिरुप्पावै 22

श्रृंखला : तिरुप्पावै (गोदा देवी जी का दिव्य व्रत)

आज की 22वीं गाथा में गोदाम्बा अपने अनन्य-गतित्व एवं अनन्यार्ह शेषत्व का प्रकाशन करती हैं। (एकमात्र भगवान के ही शेष होने की योग्यता होना अनन्यार्ह शेषत्व है। ) जिस प्रकार विभीषण अपने कुल-परिवार को छोड़कर भगवान के पास आया था, काकासुर जयन्त माता-पिता एवं अन्य देवों का परित्यक्त होकर आया था, वो वापस अपने घर नहीं जा सकते थे। आपके सिवा उनकी और कोई अन्य गति नहीं थी।
हम गोपियाँ भी सब छोड़कर आयी हैं और आपसे प्रणय निवेदन कर रही हैं। आप हमें ठुकरा भी दें तो हम लौटकर नहीं जा सकते। आपके अतिरिक्त हमारी और कोई गति नहीं है।

आलवन्दार स्तोत्र रत्न में कहते हैं:

निरासकस्यापि न तावदुत्सहे महेश हातुं तव पादपङ्कजम् ।
रुषा निरस्तो ऽपि शिशुस्स्तनन्धयो न जातु मातुश्चरणौ जिहासति ॥२६॥

यदि एक माता अपने शिशु को चरणों से ठोकर मारकर भगा दे, फिर भी शिशु अपने माता के चरणों को नहीं छोड़ता| (स्वरुप-प्रयुक्त-दास्य)

तवामृतस्यन्दिनि पादपङ्कजे निवेशितात्मा कथमन्यदिच्छति ।
स्थितेऽरविन्दे मकरन्दनिभरे मधुव्रतो नेक्षुरकं हि वीक्षते ॥२७॥

आपके चरणों की भोग्यता ऐसी है कि इसे छोड़ हम कहीं और नहीं जा सकते| क्या कोई भ्रमर मकरन्द को छोड़ रसहीन इक्षुरक को चाहेगा? (गुण-कृत-दास्य)

हम भी ऐसे ही प्रेम-अतिशय से परवश होकर आपके पास प्रणय निवेदन करने आई हैं|

अन्गण् मा ग्यालत्तु अरसर् अभिमान
भंगमाय् वन्दु निन् पळ्ळिक् कट्टिल् कीळे
सन्गम् इरुप्पार् पोल् वन्दु तलैप्पेय्दोम्
किण्किणि वाय्च् चेय्द तामरैप् पूप् पोले
सेम् कण् सिऱुच् चिऱिदे एम् मेल् विळियावो
तिन्गळुम् आदित्तियनुम् एळुन्दाऱ् पोल्
अम् कण् इरण्डुम् कोण्डु एन्गळ् मेल् नोक्कुदियेल्
एन्गळ् मेल् साबम् इळिन्दु एलोर् एम्बावाय्

श्री उ वे रंगदेशिक स्वामी द्वारा विरचित ‘गोदा-गीतावली’ से संस्कृत गद्यानुवाद

श्री उ वे भरतन् स्वामी द्वारा अनुगृहीत 22वीं गाथा का संस्कृत छन्दानुवाद:

२२.रम्याणां भूमिभागानां विशालानामधीश्वराः ।
भग्नमानाः समागत्य पर्यङ्काधः स्थले हि ते ।।
सङ्घीभवन्ति हा तद्वद् वयं प्राप्तास्तवान्तिकम्।
किङ्किणीमुखवत्फुल्ले राजीव इव लोहिते ।।
लोचने तावके किं नो मन्दं मन्दं न पश्यतः ।
उत्थितौ योगपद्येन हिमोष्णकिरणाविव ।।
सौम्ये ते ये दृशौ ताभ्यामस्मान् यदि कटाक्षयेः ।
अवश्यं नोऽनुभोक्तव्यम् अपि पापं विनश्यति ।।

श्री उ वे सीतारामाचार्य स्वामी द्वारा विरचित हिन्दी

**अन्गण् मा ग्यालत्तु अरसर् : सुन्दर और बड़े संसार के राजाओं

ऐसा ही एक राजा था पौन्ड्रक| उसने नकली शंख-चक्र भी धारण कर रखे थे| ‘इश्वरो अहं,अहं भोगी’ यही स्वातंत्र्य-अभिमान है|

**अभिमान भंगमाय् वन्दु : कृष्ण के पास आते ही उनका अभिमान भंग हो जाता है

स्वातन्त्र्य अभिमान से युक्त व्यक्ति भगवान को प्राप्त नहीं कर सकता| (निर्मल मन जन सो मोहि भावा, मोहि कपट छल छिद्र न भावा.)| भगवान के कटाक्ष पड़ते ही अभिमान नष्ट हो जाते हैं|

एक बार उन राजाओं को यदि राज्य वापस भी दे दिया जाये, तो भी वो उस राज्य में पुनः उत्सुक नहीं होते एवं आपके चरणों में ही रहते हैं| (कई श्री वैष्णव जो सांसारिक कार्यों को त्याग आचार्य कैंकर्य में लग जाते हैं, उन्हें वापस कितना भी प्रलोभन दिया जाये, वो वापस नहीं जाते|)

**निन् पळ्ळिक् कट्टिल् कीळे : हारने के बाद ऐसे असंख्य राजा कृष्ण के सिंहासन के नीचे ही रहते हैं

एक बार एक व्यक्ति ने श्री पराशर भट्टर से प्रश्न किया, ‘जब हम शास्त्रों में देखते हैं कि भगवान ब्रह्मा और अन्य केवल कई जन्मों के तप करने के बाद मोक्ष प्राप्त करते हैं, तो यह कैसे संभव है कि कुछ लोग (श्रीवैष्णव) बड़ी आत्मविश्वास के साथ मानते हैं कि वे बस इस जन्म के अंत में मोक्ष प्राप्त कर लेंगे और इसकी उत्सुकता से प्रतीक्षा करते हैं?’ श्री भट्टर ने उल्लेखनीय रूप से उत्तर दिया, ‘कोई विरोधाभास नहीं है; ब्रह्मा और अन्य अपने पद के अनुसार अहंकार और गर्व रखते हैं और इससे छुटकारा पाने के लिए उन्हें कई जन्मों की आवश्यकता होती है, लेकिन यहाँ के लोग स्वभावतः अपने आप को निम्न मानते हैं और इसलिए उनका अहंकार और गर्व कम होता है। इसके अलावा श्री वैष्णव मोक्ष के लिए भगवान पर निर्भर रहते हैं और इसलिए केवल यह जन्म ही पर्याप्त है।’
इसीलिए हमारे आचार्यों का कहना है, ‘यहाँ तक कि ब्रह्मा हार जाता है लेकिन गोपियाँ विजयी होती हैं; ऐसी है कृष्ण की महिमा।’

**सन्गम् इरुप्पार् पोल् वन्दु तलैप्पेय्दोम् : हम भी इसी प्रकार तुम्हारी शरण आये हैं कृष्ण!।

गोपियों का अभिमान क्या था: स्त्रीत्व-अभिमान।

कोई भी स्त्री पुरुष से प्रेम करती है फिर भी आशा करती है कि वो पुरुष ही उसके पास आयेगा। गोपियाँ भी अपने सौन्दर्य अभिमान से सोचती थीं कि कृष्ण ही मुझे ढूँढते आएगा। किन्तु आपकी भोग्यता के परवश होकर हम आपके द्वार पर खड़ी हैं। अपने दर्शन से कृतार्थ करो हे कृष्ण!।

राजा अपने राज्य छोड़कर आये तो गोदाम्बा विषयान्तर अनुभव को छोड़कर। वो आयुधों से हारकर आये तो गोदाम्बा भगवान गुणों से हारकर।

(क्या हम भगवान के पास जाकर कैंकर्य का हठ कर सकते हैं? क्या यह पारतंत्र्य के विपरीत नहीं है?

प्रपन्न-निष्ठा में तो स्वल्पांश भी उपायानुष्ठान उचित नहीं। किन्तु आळ्वार जैसे परम भक्त भगवान को छोड़कर जी नहीं सकते। भक्ति-बलात्कार से यदि भगवान की प्राप्ति हेतु कुछ किये भी तो भगवान के लिए आनंददायक होता है। नाच्चियार-तिरुमोली में तो गोदाम्बा कामदेव से प्रार्थना करती हैं कि मुझे कृष्ण का संग दिलवा दो। हम जानबूझकर ऐसा करेंगे तो गलत होगा। प्रेम-परवश होकर ऐसा हो जाये तो भगवान उसका आनन्द लेते हैं।)

**किण्किणि वाय्च् चेय्द तामरैप् पूप् पोले : किण्किणि (एक प्रकार का आधा खुला और आधा बन्द एक आभूषण) और अर्धविकसित कमल पुष्प की तरह अपनी आँखें खोलो।

अर्थात, धीरे-धीरे अपना कटाक्ष दीजिये। अचानक हम सम्भाल नहीं पाएंगे।

(भगवान का स्वातन्त्र्य उन्हें आंखें खोलने नहीं देता, लक्ष्मी देवी का पुरुषकार उन्हें आँखें बन्द नहीं करने देता।
हमारे पाप उन्हें आँखे खोलने नहीं देते, उनकी कृपा उन्हें आँखें बन्द नहीं करने देते।

कर्म के अनुसार फल देने की उनकी प्रवृत्ति उन्हें अपनी आँखें बंद करने पर मजबूर करती है, जबकि भक्तों का समर्थन करने की उनकी प्रवृत्ति उन्हें खोलने पर मजबूर करती है;

शत्रु उनके पास जाने से डरते हैं क्योंकि उनकी आँखें सूर्य की तरह जलती हैं, जबकि भक्तों के लिए यह चंद्रमा की तरह ठंडी और सुखद होती हैं; सूर्य आलस्य और अज्ञानता का अंधकार दूर करता है और चंद्रमा ठंडा, ताजगी देने वाला, जीवनदायिनी और स्फूर्तिदायक है।
अथवा, भक्तों के प्रति मातृसुलभ स्नेह के कारण उनकी आँखें लाल (लाल कमल) हो गईं।
)

अर्जुन भगवान के शयन के बाद के कटाक्ष की महिमा को जानता था। उसके दर्शन हेतु ही उनके चरणों में बैठा था। दुर्योधन इन रहस्य से अनजान था।

महाविश्वास

**तिन्गळुम् आदित्तियनुम् एळुन्दाऱ् पोल् : सूर्य और चन्द्र के सदृश आपकी आँखें
**अम् कण् इरण्डुम् कोण्डु : तुम्हारे प्रियदर्शन दोनों आँखें से
**एन्गळ् मेल् नोक्कुदियेल् : यदि हमें देख लोगे
**एन्गळ् मेल् साबम् इळिन्दु : हमारे सभी शाप नष्ट हो जायेंगे।

सूर्य और चन्द्र के सदृश आँखें: वेद-द्रोहियों के लिए भगवान की सूर्य रूप आँख एवं भक्तों के लिए चन्द्र रूप शीतल आँखें।

हमारे शाप: हमारे पूर्व कर्म (पाप एवं पूण्य) जो भगवत-प्राप्ति में विरोधी हैं।

अथवा, तुमसे विरह की अग्नि ही शाप है। तुम अपने कटाक्ष से देख लेंगे तो हमारे ये शाप नष्ट हो जाएंगे।

सबरी कहती हैं, “चक्षुषा तव सौम्येन पूतास्मि रघुनन्दन।”
जब विभीषण राम के पास आते हैं: “लोचनाभ्यां पिबन्नीव”

विरह अग्नि की तपिश से सूख चुके हम पर कृपालु वर्षा बरसाओ। हम उस चातक पक्षी की तरह आपकी कृपा की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जो बारिश का इंतजार करता है। अपने नेत्र धीरे-धीरे खोलो। यदि आपकी कृपा एकसाथ बरसे, तो हम सहन न कर पाएं। कमल सुबह खिलता है और शाम को संकुचित हो जाता है। यदि सूर्य और चंद्रमा एक ही समय में उदित हों, तो कमल आधा ही खिलेगा। इसी तरह, आपको अपने नेत्र धीरे-धीरे खोलने चाहिए। जिन फसलों के खेतों ने पर्याप्त सूखा देखा है, उन्हें एक बार में मापी गई मात्रा में ही पानी देने की आवश्यकता होती है, यह ध्यान रखते हुए कि वे बाढ़ में न डूबें। इसी तरह, हमें, जो आपकी विरह की पीड़ा से पूरी तरह टूट चुके हैं, आपकी कृपालु दृष्टियाँ, जो आपकी कृपा के जल से भरी हैं, हमें धीरे-धीरे प्रदान की जानी चाहिए।

एलोर् एम्बावाय् : ऐसा हमारा व्रत है।

तिरुप्पावै 21

तिरुपावै 21वीं गाथा

अबतक गोदाम्बा ने नीला देवी/नप्पिनै का पुरुषाकार प्राप्त किया। अब नीला देवी भी  किवाड़ खोलकर गोपियों की गोष्ठी में शामिल हो जाती हैं। गोपियाँ अपने अकिंचनत्व, अनन्य-गतित्व एवं महाविश्वास का प्रकाशन करती हैं। ये तीनों ही गुण अधिकारी पूर्ति हैं। शरणागत में ये गुण होना आवश्यक हैं। गोदाम्बा कहती हैं कि आपको प्राप्त करने हेतु हम कोई उपाय अनुष्ठान नहीं कर रही हैं। आपके अतिरिक्त हमारी कोई अन्य गति भी नहीं है (चाहे आप हमें स्वीकार करें या न करें।)। किन्तु हमें यह महाविश्वास है कि आप हमें अवश्य हमारा इच्छित पुरुषार्थ प्रदान करेंगे।

श्रृंखला : तिरुप्पावै (गोदा देवी जी का दिव्य व्रत)

संस्कृत छन्दानुवाद (श्री उ वे मीमांसा शिरोमणि भरतन् स्वामी):

२१.दोहनार्थं गृहीतेभ्यः पात्रेभ्यः पयसो यथा ।
उत्पीडः स्यात्तथाऽजस्रं सवित्रीणां पयःस्रुतेः ।।
उदारोत्तुङ्गधेनूनां बहूनां स्वामिनः सुत ! ।
प्रबुध्यस्व महात्मन् ! भोः श्रितरक्षणदीक्षित ! ।।
जगत्यस्मिन् समुद्भूततेजोराशे ! प्रजागृहि ।
शत्रवो नष्टवीर्यास्ते संप्राप्य भवनाङ्गणम् ।।
अगत्या तव पादाब्जे आश्रयन्ते यथा तथा ।
मङ्गलं कीर्तयन्त्यस्त्वां स्तुवत्यो वयमागताः ।।

श्री उ वे रंगदेशिक स्वामी कृत गोदा-गीतावली से

श्री उ वे सीतारामाचार्य जी द्वारा हिन्दी छन्दानुवाद

इस गाथा में नप्पिनै गोदाम्बा की गोष्ठी में जुड़ जाती हैं एवं सभी मिलकर कृष्ण को जगाते हैं। यहाँ नन्दगोप के गौ-समृद्धि एवं ऐश्वर्य का वर्णन करते हुए, उनके पुत्र के रूप में कृष्ण की प्रशंसा करते हैं। पुत्र होने का अनुभव के लिए भवावान अकार होते हैं, इसलिए ‘नन्दगोप के पुत्र’, ऐसा सम्बोधन से भगवान प्रसन्न होंगे।

** एट्र कलङ्गल :- अनुरूप पात्र (बर्तन)

एदिर पोङ्गि :- दूध तेजी से भर जा रहे हैं।

पात्र थन के नीचे रखते हीं दूध से पूर्ण हो जाते हैं। दूध दूहने में तो कोई श्रम नहीं है, किन्तु पात्र उठाने और बदलने में ग्वाले थक जाते हैं।

माट्रादे पाल शोरियुम: दूध निरन्त बहते रहते हैं।

दूध बहकर मानो घर के बाहर तालाब बना देते हों। चाहूँ ओर निरन्तर दूध का ही गन्ध है।

वल्लल : महा उदार
पेरुम : अनेक संख्या में
पशुक्कल : गायें

आऱ्ऱप् पडैत्तान् मगने : ऐसे नन्दगोप के पुत्र
अऱिवुऱाय् : उठो

असंख्य महा उदार गायों वाले नन्द जी के पुत्र, उठो! आप तो सर्वज्ञ हैं। भगवान का ज्ञान उनका आश्रित-कार्यापादक गुण है। आप जानते हैं कि हम आपके द्वार आये हैं।

(जिस प्रकार ब्राह्मणों का धन वेद है, उसी प्रकार वैश्यों का धन गौ है)

(आचार्य भी इन गायों की तरह परम उदार है। पराशर महर्षि मैत्रेयी के एक प्रश्न के उत्तर में प्रसंगात अनेक संबंधित विषय बताते हैं, जो हमारे उज्जीवन के लिए आवश्यक हैं। परकाल आळ्वार को अरुल मारी कहते हैं, जिसका अर्थ हुआ ‘कृपा वर्षी’। आल्वारों ने अपने भगवद-अनुभव को अपने तक सीमित नहीं रखा, अपितु हम सभी को प्रदान किया। रामानुज स्वामी कृपामात्र-प्रसन्नाचार्य हैं।)

ऊऱ्ऱम् उडैयाय् : स्थिर/दृढ़, जो एकमात्र शास्त्र-गम्य हैं, प्रत्यक्ष एवं अनुमान गम्य नहीं।

पेरियाय् : बहुत बड़े

अविज्ञातं विजानतां विज्ञातम् अविज्ञातम्
(जो ये समझता है कि वो भगवान को नहीं जाना, वो वास्तव में उन्हें जान गया। जो समझता है कि वो भगवान को जान गया, वो वास्तव में उन्हें नहीं जाना।)

अथवा:

ऊऱ्ऱम् उडैयाय् : अच्युत

पेरियाय् : रक्षा करने के बाद भी उन्हें ही उदार मानने वाले

**उलगिनिल् तोऱ्ऱमाय् निन्ऱ सुडरे तुयिल् एळाय् :

“ऐसे वैभवशाली होते हुए भी आप इस संसार में प्रकट होते हैं।

उलगिनिल् : संसार में प्रकट होते हैं।
तोऱ्ऱमाय् : इन्द्रियों के विषय बनते हैं।
निन्ऱ सुडरे : तेजस/ चमकने वाले
तुयिल् एळाय् : उठो!

स उ श्रेयान भवति जायमान:
‘वो जायमान (जन्म लेकर) ही श्रेयान होता है’। भगवान अपने विभव रूप में ही श्रेष्ठ बनते हैं। ‘सकलमनुजनयनविषयतां गत:’ (गीता भाष्य)।

**माऱ्ऱार् उनक्कु वलि तोलैन्दु

जैसे आपके शत्रु परास्त होने के बाद, और कोई सहारा न देख , आपके दिव्य चरणों की शरण में आ जाते है ।

उन् वासल् कण्
आऱ्ऱादु वन्दु उन् अडि पणियुमा पोले

उसी प्रकार हम भी अपने दुख को सहन न कर पाते हुए आपके चरणों की शरण लेते हैं। (आपके सौन्दर्य एवं गुणों से परास्त होकर प्रेम-बलात्कार से आपके पास आई हैं।)

(दुर्योधन ने आदेश दे रखा था कि कोई भी कृष्ण का स्वागत नहीं करेगा। किन्तु जब कृष्ण आये तो उनके सौन्दर्य के परवश होकर सबसे पहले दुर्योधन ही उठा और प्रणाम किया।)

(जैसे काकासुर जयन्त कोई और गति न पाकर आपके चरणों में आ गिरा था। जैसे दूधमुंहा बच्चे को माँ लात से मार भी दे, तो भी वो माँ के चरणों को छोड़कर नहीं जाता। जैसे कमल का रस पीने वाले भँवरे को इक्षुरक (एक रसहीन फूल) नहीं भाता।)

भगवान ये सोच सकते हैं कि अनन्य-गति भक्त तो भगवान के कृपा की प्रतीक्षा करते हैं, स्वयं से कोई प्रयत्न नहीं करते। किन्तु ये गोपियाँ तो चल कर मेरे पास आई हैं। क्या ये साधन-निष्ठ हैं?

गोपियाँ कहती हैं कि हम प्रेम-परवश होकर, आपकी भोग्यता के परवश होकर आपके पास आपका मंगलाशासन करने आई हैं। (हमारा आना कोई उपायांतर या उपेयान्तर की इच्छा से नहीं है।)

पोऱ्ऱि याम् वन्दोम् पुगळ्न्दु एलोर् एम्बावाय्

आपका मंगलाशासन करती हुयी आपके पास आई हैं।
(जैसे पिता विष्णुचित्त आळ्वार ने भगवान का मंगलाशासन किया है।)

तिरुप्पावै 20

जब गोपियों ने नीला देवी (नप्पिनै) के व्यवहार की आलोचना की जो उनके स्वरुप और स्वभाव से मेल नहीं खाता| नीला देवी शांत रहीं और प्रभु से बात करने के समुचित क्षण की प्रतीक्षा करती रहीं| शायद नप्पिनै क्रोधित हो गयी हैं, ऐसा सोचते हुए गोपियों ने प्रभु की स्तुति की| प्रभु भी चुप रहे| शायद कन्हैया भी क्रोधित हों क्योंकि हमने नप्पिनै की आलोचना की| भगवान के क्रोध को शान्त करने के लिए चलो नप्पिनै की प्रशंसा करते हैं|

मुप्पत्तु मूवर् अमरर्क्कु मुन् सेन्ऱु
कप्पम् तविर्क्कुम् कलिये तुयिल् एळाय्
सेप्पम् उडैयाय् तिऱल् उडैयाय् सेऱ्ऱार्क्कु
वेप्पम् कोडुक्कुम् विमला तुयिल् एळाय्
सेप्पन्न मेन् मुलै सेव्वाय्च् चिऱु मरुन्गुल्
नप्पिन्नै नन्गाय् तिरुवे तुयिल् एळाय्
उक्कमुम् तट्टु ओळियुम् तन्दु उन् मणाळनै
इप्पोदे एम्मै नीराट्टु एलोर् एम्बावाय्

श्री उ वे रंगदेशिक स्वामी द्वारा विरचित गोदा-गीतावली से

गोदा-गीतावली.20

श्री उ वे सीतारामाचार्य स्वामीजी द्वारा हिंदी छन्दानुवाद

श्री उ वे मीमांसा शिरोमणि भरतन् स्वामी द्वारा अनुगृहीत विंशति गाथा का संस्कृत छन्दानुवाद:

२०.त्रयस्त्रिंशदमर्त्यानां पुरो गत्वाऽथ कम्पनम् ।
तेषां नाशितवन् ! वीर ! जागृयाः ऋजुताश्रय ! ।।
सामर्थ्ययुक्त! हे द्वेष्टुर्भयदायक ! निर्मल ! ।
कुम्भवन्मृदुवक्षोजे ! बिम्बोष्ठे ! तनुमध्यमे ! ।।
नीले ! श्रीर्वाम ! उत्तिष्ठ दर्पणं व्यजनं च नः ।
वितीर्य तव पत्या त्वम् अस्मान् स्नापय सम्प्रति ।।

मुप्पत्तु मूवर् अमरर्क्कु मुन् सेन्ऱु
कप्पम् तविर्क्कुम्

33 करोड़ देवता या 33 देवता वर्ग (12 आदित्य, 11 रुद्र, 8 वसु एवं 2 अश्विनी कुमार) में प्रथम (देवताओं के मध्य उपेन्द्र विष्णु)

अथवा जब 33 करोड़ देवता डर से कम्पन करते हैं, उनके आपके सम्मुख आने से पूर्व ही आप उनकी रक्षा करते हैं। उनके भय का निवारण करते हैं। ‘कप्पम’ शब्द संस्कृत के ‘कम्पन’ से आया है।

कलिये तुयिल् एळाय्

हे बलवान! उठिए

(परकाल आळ्वार का एक नाम कलियन भी है। अर्थात बलशाली। पूर्व में उनका नाम नील था)

(ऐसा लगता है कि आप केवल स्वार्थी लोगों को बचाते हैं, उन लोगों को नहीं जो आपके दर्शन के अलावा कुछ नहीं चाहते। इंद्र के लिए नरकासुर के खिलाफ कृष्ण द्वारा युद्ध जीतने के बाद, वह जल्द ही भूल गया और कृष्ण के खिलाफ ‘पारिजात पुष्प’ के लिए युद्ध छेड़ दिया। ऐसा लगता है कि आप ऐसे स्वार्थी देवताओं की ही मदद करते हैं।)

सेप्पम् उडैयाय् : ऋजु स्वभाव वाले

मन, वाक और काय से एकरूप रहना ही ऋजुत्व अथवा आर्जव कहलाता है। भगवान जब मनुष्य रूप में अवतार लेते हैं तो पूरी तरह से मनुष्य की भांति ही व्यवहार करते हैं। सत्यभामा के पिता की मृत्यु पर विलख कर रोना हो अथवा मैया यशोदा के डर से थर-थर काँपना। यही भगवान का आर्जव है। ऐसे व्यक्ति को बोलचाल में ‘सीधा’ व्यक्ति कहते हैं। सीधे व्यक्ति का सभी फायदा उठाते हैं। देवतावर्ग भी उठा रहे हैं। हम भी उठा रहे हैं।

तिऱल् उडैयाय् : पराक्रमशाली

क्या आपका पराक्रम हमारे लिए नहीं है? हमें भी तो वो पराक्रम दिखाईये जो आपने 7 बैलों को काबू कर नप्पिनै को प्राप्त किया था। हमें भी उसी प्रकार प्राप्त कर लीजिए!

सेऱ्ऱार्क्कु वेप्पम् कोडुक्कुम् : शत्रुओं को ज्वर देने वाले!

भगवान का सीधापन आश्रितों के लिए ही है। शत्रु तो डर से थर-थर काँपते हैं।

विमला: दोषरहित

यहाँ यह संदेह हो सकता है कि भगवान किसी के प्रति वात्सल्य रखते हैं तो किसी के प्रति क्रोध। तो फिर वो पक्षपाति नहीं हुए क्या?
हाँ, भगवान आश्रित-पक्षपाती हैं।
किन्तु गीता में तो ‘समो’हम सर्व भूतेषु’ कहा है?

इसका अर्थ है ‘आश्रयणकाले सम:’। जो भगवान की शरण में आता है, उनमें भगवान उनके जन्म, पुण्य-पाप, कुल, ज्ञान आदि के आधार पर भेद नहीं करते अपितु सभी को समान भाव से स्वीकार करते हैं। इसलिए सुग्रीव से कहते हैं, “चाहे विभीषण हो, या स्वयं रावण; मैं सभी की शरणागति स्वीकार करूँगा”।

तुयिल् एळाय् : ऐसे भगवान उठिए।

इसके पश्चात नप्पिनै को उठाती हैं

अब तक हमने देखा कि कृष्ण से उठने की विनती की गयी थी| कृष्ण नहीं उठे| 19 वें पासुर में नप्पिनै की भर्त्सना की थी| नप्पिन्नै उठ कर आना चाहती थीं किन्तु ने उन्हें आलिंगन करके रोक लिया| अब गोपियों ने कृष्ण की प्रशंसा कर उनसे उठने की विनती की किन्तु वो नहीं उठे| गोपियाँ समझीं कि शायद नप्पिन्नै की भर्त्सना से कृष्ण नाराज हैं| उन्हें प्रसन्न करने हेतु अब पुनः नप्पिन्नै की प्रशंसा करती हैं:

सेप्पन्न मेन् मुलै : कोमल एवं पर्वत के समान स्तनों वाली

भगवान से तनिक भी विरह न सहन कर पाने के स्वभाव के कारण उनकी भक्ति को कोमल एवं पर्वत के समान उन्नत कहा गया है| उनकी इस भक्ति ने भगवान को भी वश में कर लिया है एवं भगवान भी उनसे तनिक भी अपाय सहन नहीं कर पाते| अब इस सिंह का निवास स्थान इन्हीं कोमल एवं विशाल स्तनों में है|

सेव्वाय्च्: लालिमा लिए होंठ

पूर्व में उनकी भक्ति की प्रशंसा की गयी, अब उनकी भोग्यता बताई जा रही है| नप्पिन्नै के स्तन जहाँ उनके निवास स्थान हैं, उनके होंठ कृष्ण के भोग्य वस्तु हैं, उनका आहार है|

चिऱु मरुन्गुल्: सुमध्यमा (तीखे मध्य वाली)

अब पतली कमर से उनके वैराग्य की प्रशंसा की जा रही है| काजल किये आँखों के उपमान से पूर्व गाथा में उनके ज्ञान की प्रशंसा की जा चुकी है|

पर्वत के नीचे खाई देख जैसे कोई डर जाए, वैसे ही पर्वत समान वक्षस्थल के नीचे उनका मध्य देश ऐसा है मानों दिखे ही नहीं|

नप्पिन्नै नन्गाय् : हे सभी प्रकार से पूर्ण! नीला देवी

पूर्व में एक-एक अवयव या एक-एक गुणों की प्रशंसा की गयी; अब उन्हें सभी प्रकार के स्त्री-सौन्दर्य से पूर्ण एवं सभी शरणागत गुणों से परिपूर्ण कहती हैं|

तिरुवे तुयिल् एळाय्: हे श्री देवी! उठिए!

अर्थात्, हे लक्ष्मी देवी के समान गुणों वाली| हे पुरुषकारिणी!

“आप पुरुषकारिणी हैं, आपको तो कृष्ण से पहले उठना चाहिए| आप सो क्यों रही हैं?”

नप्पिन्नै पूछती हैं, “मैं सो नहीं रही, तुम्हारे विषय में ही सोच रही हूँ| तुम्हारे अभीष्ट वस्तुयें क्या हैं?”

उक्कमुम् : हस्त-पंखा

तट्टु ओळियुम् : दर्पण

तन्दु उन् मणाळनै : और आपके प्यारे कान्त (श्रीकांत कृष्ण)
इप्पोदे : जल्द से जल्द

एम्मै : हमलोग

नीराट्टु : स्नान करेंगे (कृष्णानुभव में)

एलोर् एम्बावाय् : व्रत पूरा करेंगे

स्वापदेश


युगल को जगाने का यह आखिरी पासूर है|
17 वें पासूर का आरम्भ “अ” अक्षर से होता है : अम्बरमे तन्निरे सोरे अरम सैयुम

18वें पासूर का आरम्भ “उ” अक्षर से होता है : उन्दमद कलित्तन ओडाद तोल वलियन

20 वाँ पासूर “म” अक्षर से आरम्भ होता है: मुपत्तु मूवर

एक साथ ये अक्षर ओम् बनते हैं| 19 वाँ पासूर लुप्त-चतुर्थी है जिसका विस्तृत विवरण लोकाचार्य स्वामी मुमुक्षुपड़ी रहस्य ग्रंथ में करते हैं|

  1. गोपियों द्वारा मांगे गए वस्तुओं का आतंरिक अर्थ नारायण महामंत्र है (ॐ नमो नारायणाय)
  2. दर्पण : (अ, ओम ) :- दर्पण स्व-स्वरुप का दर्शन कराता है| शरीर के अन्दर विद्यमान आत्मा सिर्फ भगवान की संपत्ति है
  3. हस्त-पंखा : ( नमः) :- यद्यपि हम ज्ञान-स्वरुप हैं और हमारे पास ज्ञान है, अभिमानवश हमारे अन्दर स्वतंत्र बुद्धि आता है| हमारे अन्दर कर्तृत्व अभिमान आता है और हम सोचते हैं कि ये कार्य मेरे द्वारा किया जा रहा है| पसीना हमारे कर्तृत्व का प्रतीक है और नमः का प्रतीक हस्त-पंखा है|
  4. कन्हैया : नारायण
  5. नोम्बू : आय :- कैंकर्य

श्रृंगार रस

माता के अवयव पिता के लिए भोग्य वस्तु हैं किन्तु पुत्र के लिए तो उज्जीवन हैं| उनपे पिता का अनुरक्त होना पुत्र के लिए उत्तम ही है| माता के स्तन तो पुत्र के लिए जीवन हैं, उसका सर्वस्व हैं| इसलिए उत्तम है कि श्रृंगार रस का आनन्द हम स्वयं को पुत्र के स्थान पर रख कर लें| यदि स्वयं को पिता के स्थान पर रखकर श्रृंगार रस का आनन्द लेंगे तो अनुचित होगा|

तिरुप्पावै 19

पिछली गाथा में गोदाम्बा सखियों सहित नप्पिनै (नीला देवी) को जगाती हैं। नप्पिनै किवाड़ खोलने जा ही रही होती हैं कि कृष्ण उन्हें पकड़ कर रोक लेते हैं। दिव्य दम्पति में भक्तों की रक्षा करने की होड़ है। कृष्ण सोचते हैं कि ये सब मुझे ढूँढने आये हैं तो दरवाजा मैं ही खोलूँगा। अन्यथा सारा श्रेय नप्पिनै को ही मिल जाएगा।
किन्तु कृष्ण स्वयं नप्पिनै के स्पर्श से परवश होकर, उनके वक्षस्थल पर ही मूर्च्छित होकर सो जाते हैं। गोदाम्बा कहती हैं कि अरे कन्हैया! तुम नीला को भी रोक लिए और स्वयं भी सो गए।

इसी प्रसंग के सन्दर्भ से पराशर भट्टारक जी ने तिरुपावै प्रबन्ध का मुक्तक श्लोक (तनिया) लिखा है।

नीळातुङ्गस्तनगिरितटीसुप्तम् उद्बोध्य कृष्णम्।
पारार्थ्यं स्वं श्रुतिशतशिरस् सिद्धं अध्यापयन्ती।।

गोदाम्बा कन्हैया को भी अध्यापन कराती हैं, “तुम्हारा स्वरूप भक्त-पारतंत्र्य है। जब भक्तजन द्वार पर खड़े हैं, तब तुम्हारा सो जाना स्वरूप के विरुद्ध है।”

श्री उ वे मीमांसा शिरोमणि भरतन् स्वामी द्वारा अनुगृहीत नवदश गाथा का संस्कृत छन्दानुवाद:

१९.दीपे ज्वलति चोत्तुङ्गे दन्तिदन्तेन निर्मितैः ।
पादैः संयुतखट्वास्थम् आरुह्य मृदुतल्पकम् ।।
विकसत्पुष्पकेशिन्या नीलायाः स्तनयोरयि ! ।
विनिवेश्य विशालोरः शयानोद्घाटयेर्मुखम् ।।
अञ्जनाञ्चितपृथ्वक्षि! नीले ! वल्लभस्य ते।
अप्यल्पकालमुत्थानं शयनान्नानुमन्यसे ।।
क्षणमात्रं न विश्लेषं सोढुं शकनवत्यहो ।
एतत्पुरुषकारस्य ते स्वभावस्य नोचितम् ।। 19 ।।

श्री उ वे रंगदेशिक स्वामी द्वारा विरचित ‘गोदा-गीतावली’ से संस्कृत गद्यानुवाद

श्री उ वे सीतारामाचार्य स्वामीजी द्वारा हिन्दी छन्दानुवाद

कुत्तु विळक्कु एरियक् कोट्टुक्काल् कट्टिल् मेल्
मेत्तेन्ऱ पन्जसयनत्तिन् मेल् एऱि

“कमरा दीपों से जगमग है और हाथी के दन्त से निर्मित सुसज्जित पंच-शयन और कोमल पलँग पर नप्पिनै के साथ सो रहे हे कृष्ण!”

हमारा जीवन कृष्ण विरह के अन्धेरे में है और तुम दीपों से जगमग घर में सो रही हो? हम अंधेरे याम में (सूर्योदय से पूर्व), अन्धेरे जंगलों एवं गौशालाओं में काले कृष्ण को ढूंढ रही हैं और तुम, हमारी सखी, कृष्ण के संग सो रही हो?

(यहाँ गोपियों की सत्त्विक इर्ष्या देखी जा सकती है)

हस्ति-दन्त कुवलयापीड नामक हाथी के हो सकते हैं, जिन्हें कृष्ण ने परास्त किया था। या उन 7 बैलों के, जिन्हें कृष्ण ने काबू में करके नप्पिनै से विवाह किया था।

पंच-शयन का अर्थ है शैया के पांच गुण: मार्दव, शैत्य, सौगंध्य, सौन्दर्य एवं औज्जवल्य।

क्या अपने भक्तों के बिना माता-पिता को पंच-शयन के शैया पर सुखपूर्ण नींद आ रही है?

कोत्तु अलर् पून्गुळल् नप्पिन्नै कोन्गैमेल्
वैत्तुक् किडन्द मलर् मार्बा


“सुजज्जित एवं खिले हुए पुष्पों से सुसज्जित केशपाश वाली नप्पिनै के स्तन पर सो रहे कृष्ण!”

वाय् तिऱवाय्

“उठकर किवाड़ नहीं खोल सकते किन्तु मुँह तो खोलो”

सामान्यतः जब हम अपने केशों में फूल लगाते हैं तो वो कुछ काल के बाद मुरझा जाते हैं। किन्तु नप्पिनै के केशों के स्पर्श को पाकर तो पुष्प और भी खिल जाते हैं।

कृष्ण ने नप्पिनै को हाथ से पकड़कर शैया पर खींचा तो वो स्वयं उनके कोमल एवं पर्वत समान स्तनों पर गिर गए एवं उनके वाल्लभ्य से परवश हो वहीं सो गए।

(जब प्रबन्ध काव्य में नायिका के आँख, मध्यप्रदेश (कमर) एवं स्तन की चर्चा हो तो उनके अर्थ इस प्रकार समझने चाहिए:

सुन्दर काजल किये आँख: ज्ञान
पतली कमर : वैराग्य
कोमल स्तन : भक्ति)

अब कृष्ण कुछ बोलना चाहते थे तो नप्पिनै ने अपने आँखों के इशारे से कृष्ण को मना कर दिया। वो चाहती थीं कि पहले मैं ही जाकर किवाड़ खोलूँ। ये मेरी सखियाँ हैं।

बेचारी गोपियाँ अब नप्पिनै की आँखों की सुन्दरता की चर्चा करते हुए प्रश्न करती हैं कि क्या ये आपके पुरुषकारत्व के स्वरूप के अनुकूल है?

मैत्तडम् कण्णिनाय् नी उन् मणाळनै
एत्तनै पोदुम् तुयिल् एळ ओट्टाय् काण्
एत्तनैयेलुम् पिरिवु आऱ्ऱगिल्लायाल्
तत्तुवम् अन्ऱु तगवु एलोर् एम्बावाय्

“ओह ! अपनी आँखों को काजल से सजाने वाली, क्या तुम अपने पति को एक पल के लिये भी उठने नहीं दे रही ? क्या तुम उनसे एक पल भी दूर नहीं रह सकती, हमारे नज़दीक आने से उन्हें रोकना आपके स्वभाव और स्वरुप के अनुकूल नहीं लगता है ।”

व्याख्याकार कहते हैं कि लक्ष्मी देवी के आँखों में वस्तुतः कोई काजल नहीं है, अपितु काले भगवान को निरन्तर देखते रखने से उनके देह का रंग उनकी आँखों में बस गया है। लक्ष्मी देवी को निरन्तर देखने से भगवान की आँखें सूर्य के समान हो गयी हैं।

रामायण में वाल्मीकि कहते हैं कि राम और सीता के सभी गुण तो एक दूसरे के पूरक हैं, किन्तु सीता की आँखों का राम की आंखों से तुलना ही नहीं हो सकती। सीता की आँखों में जो वात्सल्य है, वो स्वतन्त्र भगवान की आँखों में कहाँ?

“ऐसे वात्सल्य पूर्ण आँखों से भगवान को अपने वश में कर, हमारा कल्याण कराने वाली, तुम भगवान को हमारे पास आने से रोक रही हो?
ये तुम्हारे स्वरूप एवं स्वभाव के अनुकूल नहीं है।”

स्वापदेश

19वीं गाथा का स्वापदेश:

16वें से 22 वें गाथा तक द्वय मन्त्रार्थ रहस्य का विवरण है। आचार्य, परमाचार्य, रामानुज स्वामी के सम्बन्ध से, श्री देवी का पुरुषकार प्राप्त कर हम भगवान की शरणागति करते हैं। अर्थात, श्री देवी के नित्ययोग में रहने वाले भगवान को हम उपाय के रूप में मानते हैं/मानसिक रूप से स्वीकार करते हैं।

16वें एवं 17वें गाथा में आचार्य का पुरुषकार दर्शाया गया। 18वें गाथा में लक्ष्मी देवी का पुरुषकारत्व एवं भगवान नित्य संश्लेष दर्शाया गया है। 21वें गाथा में ‘आकिंचन्य, अनन्य-गतित्व एवं महाविश्वास’ बताया गया है तो 22वें गाथा में ‘अनन्यार्ह शेषत्व एवं अनन्य भोग्यत्व’ की शिक्षा दी गयी है।

विशेष कर 19वें गाथा में जगत का सृष्टि क्रम बताया गया है।

ईषत्त्वत्करुणानिरीक्षणसुधासन्धुक्षणाद्रक्ष्यते
नष्टं प्राक्तदलाभतस्त्रिभुवनं संप्रत्यनन्तोदयम् ।

जब भगवान का स्वातन्त्र्य ऊपर आता है तो जगत का प्रलय हो जाता है। जब माता का वात्सल्य ऊपर आता है तो जगत की सृष्टि होती है। ऊपर के श्लोक में आलवन्दार कहते हैं कि जब पूर्व में आपकी करुणादृष्टि नहीं थी तो तीनों लोकों का नाश हो गया था। अब जब आपकी करुणा दृष्टि पड़ी है, तो यह अनन्त प्रकार से उदित हुआ है। नाम रूप से विहीन प्रलय काल में पड़े जीवात्मा वर्ग अब नाम-रूप-करण-कलेवर से विशिष्ट हो जाते हैं।

भगवान का नप्पिनै के कजरारी आँखों से घायल हो जाना एवं उनके कोमल स्तन के स्पर्श से परवश हो जाने के अनेक विशेषार्थ हैं, जो श्री वचन भूषण में वर्णित हैं। उस अवस्था में भगवान लक्ष्मी देवी की कोई भी बात नहीं टाल सकते। तब मैया हमें भूलती नहीं। भगवान से अपने आश्रितों की रक्षा करवाती हैं।

नप्पिनै द्वारा कृष्ण को किवाड़ खोलने से मना करने के भी विशेषार्थ हैं। इसे स्थूणा-निखनन-न्याय से समझना चाहिए। जब हम एक स्तम्भ भूमि में ठोकते हैं, तब उसे हिला-दुला कर देखते हैं कि मजबूती से गड़ा है या नहीं।
उसी प्रकार जब लक्ष्मी देवी कहती हैं ये इस जीव को त्याग दीजिये, ये पापी है; तब भगवान कहते हैं, “एन अडियार इन सैदार, सैयारे नन सैयार”। “मेरे भक्त ऐसा नहीं कर सकते। किया भी है तो ठीक ही किया”। भगवान के इस प्रत्युत्तर से लक्ष्मी देवी प्रसन्न हो जाती हैं कि मेरी शिक्षा से भगवान अपना पारतंत्र्य समझ चुके हैं।

19वें पासूर में आन्तरिक अर्थ:

कुवलयापीड अहंकार है।
भगवान के पलँग के चार आधार हमारे चार अभिमान हैं:

  1. ज्ञातृत्व अहंकार (मैं सब जानता हूँ)
  2. कर्तृत्व अहँकार (मैं कर्ता हूँ, मैं सब कुछ कर सकता हूँ)
    3.भोक्तृत्व अहँकार (मैं भोक्ता हूँ)
  3. शेषत्व-अहँकार (मैं स्वतन्त्र हूँ)

पंच-शयन के शैया का अर्थ अर्थ-पंचक ज्ञान है:

  1. स्व-स्वरूप (मैं कौन हूँ)
  2. पर-स्वरूप (भगवान कौन हैं)
    3.उपाय स्वरूप (प्राप्त करने का साधन क्या है)
  3. पुरुषार्थ स्वरूप (प्राप्ति का फल क्या है)
  4. विरोधी स्वरूप (प्राप्ति के विरोधी क्या हैं)

श्वेत चादर हमारा मन है। उज्ज्वल दीपक हमारा धर्मभूत ज्ञान है। इस दीपक के तेल हमारे वेद हैं। इसके ऊपर हमारे हृदय के डहर आकाश में शयन कर रहे लक्ष्मी-नारायण हैं।

तिरुप्पावै 18

आज 18वीं गाथा में गोदाम्बा नप्पिनै (नीला देवी) को उठाती हैं। 17वीं गाथा में बलदेव के बाद कृष्ण को उठाया किन्तु कृष्ण उठे नहीं। गोपियों को अपनी भूल समझ आयी। उन्होंने कृष्ण से पूर्व उनकी महिषी/प्रिया नप्पिनै को नहीं उठाया था। वो उनकी सखी भी थीं और कृष्ण की परम प्रेयसी भी।

(जिस प्रकार उत्तर भारत में राधा जी गोकुल में कृष्ण की प्रेयसी एवं पत्नी के पत्नी के रूप में प्रसिद्ध हैं, उसी प्रकार दक्षिण में नप्पिनै अम्माजी। ऐसा भी कहते हैं कि नप्पिनै और राधा एक ही हैं। नप्पिनै कुम्भज की पुत्री थीं एवं कृष्ण ने 7 बेकाबू बैलों को बाँधकर नप्पिनै से विवाह किया था।)

गोपियाँ कहती हैं, “नन्दगोप की बहु, नप्पिनै (नीला), उठो!”

सीता भी स्वयं का परिचय ‘दशरथ महाराज की बहू’ के रूप में देती हैं, ‘मिथिलेश की पुत्री’ के रूप में नहीं। ऐसी ही भारतीय संस्कृति है। स्त्रियाँ श्वसुर के सम्बन्ध से अपना परिचय देती हैं।

श्री उ वे मीमांसा शिरोमणि भरतन् स्वामी द्वारा अनुगृहीत अष्टादश गाथा का संस्कृत छन्दानुवाद:

१८.स्रवन्मदेभतुल्यो यः सङ्ग्रामे नो पलायते ।
महाभुजबलो नन्दो गोपस्तस्य स्नुषे! वरे! ।।
सुगन्धिचिकुरे ! नीले ! द्वारमुद्घाटयाधुना ।।
सर्वतः कुक्कुटा रुत्वोद्बोधयन्त्ययि ! मानुषान् ।।
सङ्घशो माधवीकुञ्जे कूजन्ति बहुशः पिका : ।
कन्दुकाञ्चितहस्ते ! भो नामानि कमितुस्तव ।।
वयं गातुं समायाता वलयानां क्वणेन हि।
आगत्य पाणिपद्माभ्यां हृषितोद्घाटनं कुरु ।।

श्री उ वे रंगदेशिक स्वामीजी के गोदा-गीतावली से

श्री उ वे सीतारामाचार्य स्वामीजी द्वारा हिन्दी छन्दानुवाद

उन्दु मद कळिऱ्ऱन् : मदमस्त हाथियों को जीतने वाले

ओडाद तोळ् वलियन् : शक्तिशाली योद्धाओं का सामना करने वाले एवं युद्ध में कभी पीछे नहीं हटने वाले
नन्द गोपालन् : नन्दगोप की

मरुमगळे : बहु

नप्पिन्नाय् : नीला देवी

“ओ ! हाथी से बलवान, विशाल कांधो वाले, जो युद्ध में कभी पीछे नहीं हटते, ऐसे नन्दगोप की पुत्रवधु!”

कृष्ण ने कुवलयापीड हाथी को परास्त किया था। ये गुण उनमें पिता से ही तो आये हैं। इसलिए नन्दगोप को ‘हाथी से भी बलवान’ कहा है। किन्तु नंदगोप के पास गायें थीं, हाथी तो नहीं थे। यहाँ ऐसा समाधान है कि नन्द जी एवं वसुदेव जी परम मित्र थे। एक की संपत्ति दूसरे की भी थी। वसुदेव जी के पास तो अनेक हाथी थे।
पूर्व में भी कहा गया है कि गोप गण अत्यन्त बलवान थे एवं शत्रुओं के घर जाकर उनके गर्व को नष्ट कर देते थे। तभी तो कंस स्वयं कभी भी गोकुल नहीं आया, अपने दैत्यों को ही भेजता रहा और फिर कृष्ण को मथुरा बुला लिया।

गन्दम् कमळुम् कुळली :सुगन्धित केशों वाली!

कडै : दरवाजा;   

तिऱवाय् : खोलो

“सुगन्धित केशों वाली! किवाड़ खोलो!”

“आप सोच रही होंगी गोपियाँ यह सोच चली जायेंगी की अन्दर कोई भी नहीं है। किन्तु आपके केशों के सुगन्ध यह सूचित कर रहे हैं कि आप भीतर ही हैं”

(हमारे केशों में तो स्वाभाविक गन्ध नहीं होता। सुगन्धित बनाने के लिए पुष्प आदि लगाते हैं। किन्तु लक्ष्मी जी के केशपाश तो पुष्प को भी गन्ध देने वाले हैं।)

नप्पिनै बोलती हैं, “आधी रात्रि को क्यों आयी हो तुमलोग? सुबह हो गयी क्या?”

अबतक तो गोदाम्बा अनेक सखियों को उठायीं एवं प्रभात के लक्षण बतायीं। किन्तु अब तो नीला देवी भी ऐसा ही कह रही हैं।

गोदाम्बा, “कुक्कुट (मुर्गा) शब्द कर रहे हैं।”

“कुछ मुर्गे तो प्रति याम शब्द करते हैं। अर्ध रात्रि को वो शब्द कर रहे होंगे। या तुमलोगों ने उसे डरा दिया होगा और वो शोर कर रहे हैं।”

“माधवी लता पर कोकिल शब्द कर रहे हैं।”

“माधवी लता तो अत्यन्त मृदु होते हैं। उनपे शयन करने वालों के लिए क्या दिन, क्या रात।”

पन्दार विरलि

हे हाथों में गेंद रख भगवान के संग खेलने वाली”

(शयन से पूर्व जब कृष्ण एवं नप्पिनै गेंद से खेल रहे थे तब नप्पिनै जीत गयीं एवं पारितोष के रूप में उस गेंद को अपने पास रख लिया।)

ये गेंद “लोकवत्तु लीला कैवल्यम्” का स्मरण दिलाते हैं। नीला देवी के हस्त में यह गेंद उनके पुरुषकारत्व का सूचक है।

(गेंद नार (नरों के समूह) हैं। नप्पिनै पुरुषकारिणी हैं।

गेंद (नार) — नप्पिनै —- कृष्ण)

गेंद की तरह हमें भी पकड़िए एवं अपने पति के प्रति हमारा पुरुषकार कीजिये।

क्रीडतो बालकस्येव चेष्टां तस्य निशामय ।
अप्रमेयोऽनियोज्यश्च यत्र कामगमो वशी ।।
मोदते भगवान् भूतैर्बालः क्रीडनकैरिव ।
त्वं न्यञ्चद्भिरुदञ्चद्भिः कर्मसूत्रोपपादितैः ।
हरे विहरसि क्रीडां कन्दुकैरिव जन्तुभिः ।।

(विष्णु पुराण 12.18-19)

The ball in the hand of Nappinai represents the sansaara, krida of divine dampati

नप्पिनै, “तुमलोगों के आने का कारण क्या है?”

उन् मैत्तुनन् पेर् पाड

“हम आपके पति के नामों को गाएंगीं।”

कैसे नाम? कृष्ण का निन्दन करने वाले नाम। वो गेंद में हार गए हैं। तुम तो हमारी सखी हो। हम तुम्हारी तरफ से पक्ष लेकर कृष्ण की निन्दा करेंगीं। (राम भी जब वन में सीता से हारते हैं तो लक्ष्मण भी सीता का पक्ष लेकर राम की हँसी उड़ाते हैं।)

नप्पिनै, “ठीक है, आकर दरवाजा खोल लो!”

“अपने लालिमा लिए हाथों से, चूड़ियों को खनकाते हुए, आप ही दरवाजा खोलिये”

(भगवान के अभय हस्त “मा शुच:” की शिक्षा देते हैं। किन्तु हमारे लिए तो आपके लालिमा लिए हाथ ही रक्षक हैं। ये हमें भगवान के स्वातन्त्र्य से रक्षा करते हैं।)

(चूड़ियाँ सुहाग की प्रतीक हैं। जब पति दूर हों तो दुबली हाथों से चूड़ियाँ स्वयं बाहर आ जाती हैं। लक्ष्मी जी का तो कभी भगवान से विश्लेष होता ही नहीं। इसलिए सदा सर्वदा रहने वाले अपने चूड़ियों की खनखनाहट सुनाओ)

वन्दु तिऱवाय् मगिळ्न्दु एलोर् एम्बावाय् !

“हमारे लिए, सन्तुष्ट होकर, प्रसन्न होकर आईये एवं किवाड़ खोलिये।”

स्वापदेश

इस गाथा में एक महत्वपूर्ण शिक्षा मिलती है कि बिना अम्माजी के पुरुषकार के भगवान की प्राप्ति नहीं होती। रामावतार में श्री देवी (सीताम्बा) पुरुषकारिणी हैं। वराह अवतार में भू देवी पुरुषकारिणी हैं। कृष्णावतार में नीला देवी गोकुल में पुरुषकारिणी हैं।

विशेष परिस्थितियों में भगवान चाहे तो बिना पुरुषकार के भी अपना लें। तब भगवान स्वयं ही पुरुषकार करते हैं एवं स्वयं ही उपाय भी।

क्या भगवान में कारुण्य नहीं है, जो बिना अम्माजी के पुरुषकार के नहीं अपनायेंगे?
यह भगवान के कारुण्य की पराकाष्ठा है कि उन्होंने अम्माजी को पुरुषकारिणी बनाया एवं उनके पुरुषकार से आने वाले जीवों को उनके पूर्व कर्मों पर विचार किये बिना उनकी शरणागति को स्वीकार करने का संकल्प लिया।

तिरुप्पावै 17

आज 17 वीं गाथा में गोदाम्बा नन्दगोप के महल में प्रवेश कर क्रमशः नन्द जी, यशोदा जी एवं बलराम जी का उत्थापन करती हैं।

व्याख्याकार पेरियवाच्चान पिल्लै (कृष्णपाद सूरी) कहते हैं कि कृष्ण के पोते अनिरुद्ध को तो ऊषा ने अपहृत कर अपना लिया था। क्या कृष्ण के साथ भी गोदाम्बा ऐसा ही करेंगी?

प्रथम नन्द जी को क्यों उठाया गया? यशोदा को क्यों नहीं? क्योंकि यशोदा नन्द जी एवं कृष्ण-बलराम के मध्य में सोयी हैं। उनके दाहिनी ओर नन्द जी एवं बायीं ओर बलराम हैं। यहाँ माता का पुरुषकारत्व समझा जा सकता है। पुत्र के प्रति वात्सल्य एवं पति के प्रति वल्लभ्य होने के कारण माता का पुरुषकार अचूक है।

यहाँ नन्दगोप आचार्य हैं एवं यशोदा नारायण महामन्त्र। तो क्रम ऐसा है: आचार्य – रहस्यार्थ – भगवद-प्राप्ति


श्रृंखला : तिरुप्पावै (गोदा देवी जी का दिव्य व्रत)

अम्बरमे तण्णीरे सोऱे अऱन्जेय्युम्
  एम्पेरुमान् नन्दगोपाला एळुन्दिराय्
कोम्बनार्क्केल्लाम् कोळुन्दे कुलविळक्के
  एम्पेरुमाट्टि यसोदाय् अऱिवुऱाय्
अम्बरम् ऊडु अऱुत्तु ओन्गि उलगु अळन्द
  उम्बर् कोमाने उऱन्गादु एळुन्दिराय्
सेम्बोन् कळल् अडिच् चेल्वा बलदेवा
  उम्बियुम् नीयुम् उऱन्गु एलोर् एम्बावाय्`

ओह ! वस्त्र अन्न जल दान करने वाले, हे नाथ नन्दगोप उठो, हे ! छरहरे बदन वाली ग्वालकुल की नायिका, हे! ग्वालकुल की दीपस्तम्भ, ओ ! यशोदा पिराट्टी अवगत हो जाइये! हे !आकाशीय गृह तारों के राजा! जिन्होंने  आकाश को चीरते  हुए सारे संसार को मापते हुए  ऊपर उठे ,आपको अब नींद से  जागना चाहिए | हे लाली लिये स्वर्णिम पायल धारण करने वाले बलराम ! आप दोनों भाइयों को अब उठ जाना चाहिये।

श्री उ वे मीमांसा शिरोमणि भरतन् स्वामी द्वारा अनुगृहीत 17वीं गाथा का संस्कृत छन्दानुवाद:

१७.
अम्बरं नीरमन्नं च दातर्नो नाथ ! धार्मिक ! ।
नन्दगोप! त्वमुत्तिष्ठ, नायिके! ललनोत्तमे ! ।।
उद्बुद्ध्यस्व यशोदेऽम्ब ! गोपवंशप्रदीपिके ! ।
देवेशोत्तिष्ठ खं भित्वा वर्धित्वा क्रान्तवन् ! जगत् ।।
काञ्चनं नूपुरं धर्तः ! श्रीयुत ! त्वं सहानुजः ।
उत्तिष्ठ बलदेव ! त्वं मैव स्वपिहि सम्प्रति ।।

श्री उ वे रंगदेशिक स्वामी द्वारा विरचित ‘गोदा-गीतावली’ से संस्कृत गद्यानुवाद

श्री उ वे सीतारामाचार्य स्वामीजी द्वारा हिन्दी छन्द अनुवाद:

जब भी भगवान का आश्रयण ग्रहण करते हैं, तो उसे उचित मार्ग से ग्रहण करना चाहिए। श्री शठकोप आळ्वार कहते हैं, “वेदों के सारार्थ को जानने वालों भक्तों का आश्रयण लेकर भगवान के चरण कमलों का आश्रयण लेना चाहिए”।
जब भी हम किसी दिव्यदेश जाते हैं, हमें सर्वप्रथम उस दिव्यदेश में निवास करने वाले महापुरुषों के दर्शन करने चाहिए। उनके पुरुषकार से मन्दिर में प्रवेश कर आचार्यों, नित्य सूरियों, अम्माजी के पश्चात इस क्रम से भगवान के दर्शन करते हैं।

अम्बरमे : वस्त्र ही

तण्णीरे : जल ही

सोऱे  : अन्न ही

अऱन्जेय्युम् : देने वाले
एम्पेरुमान् : स्वामी

नन्दगोपाला : नन्द गोप

एळुन्दिराय् : उठिए

“वस्त्र ही, जल ही, अन्न ही दान करने वाले, हे हमारे स्वामी नन्दगोपाल, उठिए!”

‘वस्त्र ही, जल ही, अन्न ही’ ऐसा क्यों कहा गया? नन्द जी जब वस्त्र दान करते हैं, तो इतनी दक्षता से करते हैं मानों उन्होंने बालपन से सिर्फ वस्त्र ही दान करने का कार्य किया है। किसको किस प्रकार के वस्त्र चाहिए, उनके नाप से, उनके योग्य वस्त्र सरलता से दान करते हैं नन्द जी। इसी प्रकार जल एवं अन्न भी।

हे नन्द जी! जब आप सभी को धारक, पोषक एवं भोग्य वस्तुएँ प्रदान करते हैं, तो हमारे धारक, पोषक एवं भोग्य, तीनों ही कृष्ण ही हैं। हमें भी हमारा अभीष्ट प्रदान कीजिये।

(भगवान भी आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी; सभी को उनके अभीष्ट प्रदान करते हैं। उसके बाद भी मांगने वालों को ही ‘उदार’ भी कहते हैं।

चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन।

आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ।।7.16।।

उदाराः सर्व एवैते (गीता 7.18)

आचार्यों का भी ज्ञान ऐसा है मानों ये संस्कृत वेद ही पढ़ाते हैं, द्राविड़ वेद ही पढ़ाते हैं, न्याय ही पढ़ाते हैं आदि।)

कोम्बनार्क्केल्लाम् कोळुन्दे :गोप कुल की लता में पल्लव समान

कुलविळक्के : मङ्गल दीप
एम्पेरुमाट्टि यसोदाय् : स्वामिनी यशोदा

अऱिवुऱाय् : उठिए

“गोप कुल की लता में पल्लव समान एवं कुलदीपक यशोदा, हमारी स्वामिनी, उठिए!”

स्त्रियों का स्वरूप पारतंत्र्य होने के कारण उन्हें लता का उपमान दिया जाता है। लता जिस प्रकार किसी पर आश्रित होकर ऊपर बढ़ती है, वैसी ही आदर्श शरणागत हैं यशोदा स्वामिनी जी।


जिस प्रकार लता में कोई भी रोग हो तो लक्षण सर्वप्रथम पल्लव में दिखते हैं, उसी प्रकार गोपकुल में कुछ भी अशुभ हो तो सर्वप्रथम यशोदा का मुख ही उदास होता है।

यशोदा जी, आप कुलदीपक हैं। कृष्ण प्रकाशमान दीपक हैं। आप हमें कृष्ण विरह के अन्धकार में मत रखिए।

(यहाँ गोपियाँ नन्द एवं यशोदा स्वामी एवं स्वामिनी कहकर पुकारती हैं। क्योंकि वो ही कृष्ण को प्रदान करेंगे। कृष्ण को प्रेम से ‘नन्द के कुमार’ और ‘यशोदा के बाल सिंह’ कहती हैं।)

अम्बरम् : आकाश

ऊडु अऱुत्तु : छेदते हुए

ओन्गि : बड़े हुए

उलगु अळन्द : तीनों लोकों को माप लिया
उम्बर् कोमाने : देवाधिदेव

उऱन्गादु : नींद को त्यागिये

एळुन्दिराय् : उठिए

“हे कृष्ण! आप वामन अवतार में भिक्षा के रूप में तीन पग भूमि पाकर आप बढ़ते गए और तीन पग से समस्त संसार को नापकर देवों एवं मनुष्यों को वासस्थान प्रदान किया। हे संसार के रक्षक! हमारी भी रक्षा कीजिये।”
“देवों, मनुष्यों, सभी के ऊपर अपने पादारविन्द रखने वाले हे सौलभ्यमूर्ति! हमें भी स्वीकार कीजिये।”

“संभवतः तीनों लोकों को नापने के क्रम में आपके चरणों को कष्ट हुआ एवं थकान से आप सो रहे हैं। इसलिए हम आपका मंगलाशासन कर रही हैं।”

(जब कृष्ण नहीं उठे तो गोपियाँ समझीं कि क्रम में कुछ गड़बड़ हुयी है। हमने बलराम को नहीं उठाया।)

सेम्बोन् कळल् अडिच् चेल्वा बलदेवा
उम्बियुम् नीयुम् उऱन्गु एलोर् एम्बावाय्`

“हे लाली लिये स्वर्णिम पायल धारण करने वाले बलराम ! आप दोनों भाइयों को अब उठ जाना चाहिये।”

बलराम जी के अवतरण से पूर्व देवकी के कोई भी पुत्र जीवित नहीं रहे। उनके अवतरण के पश्चात कोई भी मृत नहीं हुआ। इस कारण उन्हें मातृ-गर्भ-प्रकाशक’ कहते हैं। उनके चरणों के स्पर्श के कारण ही देवकी के गर्भ में आने वाले कृष्ण जीवित रहे। इस महिमा को जानते हुए, उनके चरणों में लालिमा लिए स्वर्ण कुण्डल धारण कराए गए हैं।

लक्ष्मण के अवतार में तो आप सोये ही नहीं थे। निरन्तर कैंकर्य किया। जागिये और हमें भी कैंकर्य प्रदान कीजिये।

आप भगवान के शैया हैं। आपके जागे बिना तो भगवान भी उठेंगे नहीं।

ये भगवान के लिए जीवात्म-प्राप्ति का उत्तम अवसर है कि हम उनके द्वार पर आए हैं। वरना हमें ढूँढते हुए उन्हें हमारे द्वार आना होगा।

इसलिए आप दोनों भाई अब जल्दी से उठिए।

तिरुप्पावै 15

आज की 15वी गाथा तिरुपावै ग्रन्थ के मध्य में है एवं तिरुपावै का सार है। इसे ‘तिरुपावै में तिरुपावै’ कहते हैं। जिस प्रकार सहस्रगीति (तिरुवाईमोलि) में “एम्माविडु” दशक पारतंत्र्य की शिक्षा देते हुए सम्पूर्ण ग्रन्थ का सार है, उसमें भी ‘तनक्के आघ’ पासूर। तिरुपावै की 15वीं गाथा भी, पारतंत्र्य की पराकाष्ठा भागवत-शेषत्व की शिक्षा देता है।

गोदाम्बा अन्दर सो रही सखी को “बालशुक” कहकर सम्बोधित करती है। ये गोपी अत्यन्त मधुर स्वर के कारण प्रसिद्ध है। अन्दर सोते हुए कुछ कृष्ण-संबंधित राग गुनगुना रही है एवं उसी में भाव-विभोर है।

वेद कहते हैं, “आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यः मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः।” प्रथम दो गोपियाँ ‘श्रोतव्यः’ की शिक्षा देती हैं। मध्य की गोपियाँ ‘मन्तव्य:’ की शिक्षा देती हैं। 15वें पासूर की गोपी ‘निदिध्यासितव्यः’ की शिक्षा देती हैं।

श्रृंखला : तिरुप्पावै (गोदा देवी जी का दिव्य व्रत)

एल्ले इळम् किळिये इन्नम् उऱन्गुदियो
  चिल्लेन्ऱु अळियेन्मिन् नन्गैमीर् पोदर्गिन्ऱेन्
वल्लै उन् कट्टुरैगळ् पण्डे उन् वाय् अऱिदुम्
  वल्लीर्गळ् नीन्गळे नानेदान् आयिडुग
ओल्लै नी पोदाय् उनक्कु एन्न वेऱु उडैयै
  एल्लारुम् पोन्दारो पोन्दार् पोन्दु एण्णिक्कोळ्
वल् आनै कोन्ऱानै माऱ्ऱारै माऱ्ऱु अळिक्क
  वल्लानै मायनैप् पाडु एलोर् एम्बावाय्

श्री उ वे भरतन् स्वामीजी द्वारा संस्कृत अनुवाद

१५.शुकशाबोपमेये! भोः किन्निद्रास्यधुनाऽप्यहो ।
मा स्माह्वयत दुःश्राव्यम् आयाम्याभीरबालिकाः !।।
चिरादेवोक्तिकाठिन्यं समर्थे! विद्म भोस्तव ।
समर्थास्तत्र यूयं हि भवान्येषैव वा तथा ।।
सत्वरं त्वं समायाहि पृथक्कृत्येन किं तव ।
किमु सर्वाः समायाता ? आमेत्य गणय स्वयम् ।।
मत्तं कुवलयापीडं हन्तारमतिदक्षिणम्।
शत्रूणां बलविध्वंसे मायिनं कीर्तयेमहि ।।

श्री उ वे रंगदेशिक स्वामी द्वारा विरचित ‘गोदा-गीतावली’ से संस्कृत गद्यानुवाद

श्री उ वे सीतारामाचार्य स्वामी द्वारा विरचित हिन्दी छन्द अनुवाद

(इस पाशुर का अर्थ, देवी अपनी सखियों के संग जगाने आयी एक सखी के द्वार पर खड़ी,  बाहर खड़ी सखियों और भीतर की सखी के मध्य वार्तालाप के अनुरूप दिया है।)

एल्ले इळम् किळिये इन्नम् उऱन्गुदियो

गोदाम्बा : हे ! युवा तोते जैसी नवयौवना, मधुर वार्तालाप वाली, हम सब तेरे द्वार पर खड़ी हैं, और तुम निद्रा ले रही हो ?

गोदाम्बा पुकारती हैं, “तुम बालशुक के समान मधुर वार्तालाप करती हो। तुम्हें लिए बिना हम कैसे जा सकती हैं। कृष्ण को रिझाने हेतु तुम हमारे साथ अवश्य आओ।”

(सामान्यतः हम समझते हैं कि भगवान का कैंकर्य ही प्राप्य है किन्तु सम्प्रदाय में भागवतों से चर्चा करना, उनके सुख-दुःख बाँटना भी परम प्राप्य है। यदि हम भोजन कर रहे हों या भगवद-अर्चन कर रहे हों और कोई भक्त गृह पधारें; तब हम उसे बीच में रोककर, उठकर उनका सत्कार करते हैं। यही विशेष धर्म है।)

चिल्लेन्ऱु अळियेन्मिन् नन्गैमीर् पोदर्गिन्ऱेन्

अन्दर की सखी : हे! भगवद प्रेम में परिपूर्ण सखियों, इतने क्रोध में न बोलो, मैं  अभी आ रही हूँ ।

वल्लै उन् कट्टुरैगळ् पण्डे उन् वाय् अऱिदुम्

गोदाम्बा : तुम वार्ता में बहुत चतुर हो, हम सब हम आपके अशिष्ट शब्दों के साथ-साथ आपके मुंह को भी  बहुत पहले से जानते हैं।

वल्लीर्गळ् नीन्गळे

अन्दर की सखी : तुमलोग ही कठोर वचन बोल रही थी।

नानेदान् आयिडुग

“अच्छा, मैं ही गलत हूँ। अब बोलो मुझे क्या करना है?”

(यहाँ बालशुक गोपी एक उत्तम शिक्षा देती है। यदि भागवत हमारे कुछ दोष गिनायें, हमारी निन्दा करें तो उसे मान लेना चाहिए। जैसे राम के वनवास में भरत जी अपना ही दोष मानते हैं; मंथरा, कैकेयी, दशरथ या राम का दोष नहीं।

यदि वो क्रोध में कुछ वचन बोलें तो हमें प्रत्युत्तर नहीं देना चाहिए। यदि दोनों तरफ से लोग क्रोध में निन्दा वचन बोलें तो विषय गम्भीर हो जाएगा।

पराशर भट्ट की एक वैष्णव निन्दा कर रहा था। तब पराशर भट्ट ने उन्हें पारितोषिक हार प्रदान किया।

ओल्लै नी पोदाय् उनक्कु एन्न वेऱु उडैयै

गोदाम्बा : जल्दी से उठो। क्या तुम्हारे जागने में कोई बाधा है?

एल्लारुम् पोन्दारो

अन्दर की सखी : क्या सब लोग जाने के लिए आ गए?

पोन्दार् पोन्दु एण्णिक्कोळ्

गोदाम्बा : आ गए हैं। (एक तुम ही आखिरी बची हो)। आकर गिनती कर लो


वल् आनै कोन्ऱानै माऱ्ऱारै माऱ्ऱु अळिक्क
  वल्लानै मायनैप् पाडु एलोर् एम्बावाय्

कुवलयापीड़ हाथी को मारनेवाले, अपने शत्रुओं का बल हरने वाले, अद्भुत गतिविधियां करने वाले भगवान् कृष्ण के गुणानुवाद करेंगे।

भगवान को क्षति पहुँचाने की चेष्टा करने वाले कुवलयापीड हैं। यहाँ भगवान के जीवन-रक्षण के प्रयत्न में हानि पहुँचाने वाले अहँकार एवं ममकार को समझना चाहिए।

गोपियाँ अपना स्त्री-अभिमान छोड़कर भगवान के पास स्वयं जा रही हैं। स्त्री-अभिमान यह है कि प्रेमी ही प्रेमिका के पास आकर प्रेम-निवेदन करेगा।

श्री रङ्गनायकी अम्माजी

श्रीमते रामानुजाय नमः

तनियन : श्री वैष्णव गुरु परम्परा

किन्तु भगवान इन असंख्य अण्डों का निर्माण क्यों करते हैं? मोर अपने पंख फैलाकर नृत्य क्यों करता है? मोरनी को मोहने हेतु|

उसी प्रकार भगवान भी किसी अन्य प्रकार से जीवों की रक्षा कर सकते थे| किन्तु सृष्टि और प्रलय के चक्र के द्वारा ही जीवों की रक्षा क्यों करते हैं? महालक्ष्मी अम्माजी को प्रसन्न करते हेतु|सृष्टि का प्रधान हेतु है लीला या क्रीडा| इसका प्रधान उद्देश्य है लक्ष्मी देवी (श्री देवी) की प्रसन्नता|

(मोर का उदहारण सर्वाधिक उचित है| जिस प्रकार मोरनी को प्रसन्न करने हेतु मोर अपने पंख फैलाकर नृत्य करता है, वैसे ही भगवान इस सूक्ष्म प्रकृति को नाम-रूप प्रदान करते हुए फैलाते हैं (स्थूल प्रकृति)| मोर के पास ही पंख होता है, मोरनी के पास नहीं| उसी प्रकार जगत के कारण एकमात्र भगवान ही हैं| श्री देवी जगत की सृष्टि में पुरुषकार हैं|)

महालक्ष्मी भगवान के लिए इतने महत्वपूर्ण हैं कि उनकी प्रसन्नता हेतु भगवान सृष्टि प्रलय आदि व्यापार करते हैं? प्रहलाद आदि भक्तों के लिए तो इतना बड़ा कार्य नहीं करते?

क्योंकि श्री देवी भगवान की स्वरुप-निरूपक धर्म हैं| भगवान की पहचान है – श्रियः पतित्वम्|

भक्तिसार आलवार कहते हैं: तिरुविला देवै तेरेमिल देवै| अर्थात जिनके वक्षस्थल में श्री देवी का निवास नहीं है, मैं उसे नहीं मानूंगा|

शठकोप आलवार कहते हैं: अगल्गिल्लेन इरैयुम एन्ड्र अलर मेल मंगई उरई मार्वा|

अर्थात् आपसे अनपायनी रहने वालीं सुकोमल पद्मजा, जो नित्य आपके वक्षस्थल में रहती हैं|

भगवान के वक्षस्थल में एक त्रिभुजाकार चिन्ह है, जिसे श्रीवत्स चिन्ह कहते हैं| यह भगवान के दिव्य मंगल विग्रह में लक्ष्मी देवी का निवास स्थान है|अतः श्री देवी के बिना भगवान तो भगवान ही नहीं हैं|

श्री देवी का हमारे गुरु परम्परा में क्या स्थान है?

श्री वैष्णव सम्प्रदाय में तीन मन्त्र हैं| मूल मन्त्र (नारायण अष्टाक्षरी महामन्त्र) बद्रिकाश्रम में नारायण ऋषि ने नर ऋषि को प्रदान किया| द्वय मन्त्र क्षीराब्धि में भगवान विष्णु ने लक्ष्मी देवी को दिया| चरम श्लोक भगवान कृष्ण ने कुरुक्षेत्र में अर्जुन को दिया| किन्तु किसी भी मन्त्र की गुरु-शिष्य परम्परा नहीं चली|

श्रीरंगम में रंगनाथ भगवान ने ये तीनों मन्त्र रंगनायकी अम्माजी को दिए| रंगनायकी अम्माजी ने मन्त्र प्राप्त कर इसे आगे बढ़ाया और इस प्रकार श्री वैष्णव सम्प्रदाय बना|