आज 17 वीं गाथा में गोदाम्बा नन्दगोप के महल में प्रवेश कर क्रमशः नन्द जी, यशोदा जी एवं बलराम जी का उत्थापन करती हैं।
व्याख्याकार पेरियवाच्चान पिल्लै (कृष्णपाद सूरी) कहते हैं कि कृष्ण के पोते अनिरुद्ध को तो ऊषा ने अपहृत कर अपना लिया था। क्या कृष्ण के साथ भी गोदाम्बा ऐसा ही करेंगी?
प्रथम नन्द जी को क्यों उठाया गया? यशोदा को क्यों नहीं? क्योंकि यशोदा नन्द जी एवं कृष्ण-बलराम के मध्य में सोयी हैं। उनके दाहिनी ओर नन्द जी एवं बायीं ओर बलराम हैं। यहाँ माता का पुरुषकारत्व समझा जा सकता है। पुत्र के प्रति वात्सल्य एवं पति के प्रति वल्लभ्य होने के कारण माता का पुरुषकार अचूक है।
यहाँ नन्दगोप आचार्य हैं एवं यशोदा नारायण महामन्त्र। तो क्रम ऐसा है: आचार्य – रहस्यार्थ – भगवद-प्राप्ति
श्रृंखला : तिरुप्पावै (गोदा देवी जी का दिव्य व्रत)
अम्बरमे तण्णीरे सोऱे अऱन्जेय्युम्
एम्पेरुमान् नन्दगोपाला एळुन्दिराय्
कोम्बनार्क्केल्लाम् कोळुन्दे कुलविळक्के
एम्पेरुमाट्टि यसोदाय् अऱिवुऱाय्
अम्बरम् ऊडु अऱुत्तु ओन्गि उलगु अळन्द
उम्बर् कोमाने उऱन्गादु एळुन्दिराय्
सेम्बोन् कळल् अडिच् चेल्वा बलदेवा
उम्बियुम् नीयुम् उऱन्गु एलोर् एम्बावाय्`
ओह ! वस्त्र अन्न जल दान करने वाले, हे नाथ नन्दगोप उठो, हे ! छरहरे बदन वाली ग्वालकुल की नायिका, हे! ग्वालकुल की दीपस्तम्भ, ओ ! यशोदा पिराट्टी अवगत हो जाइये! हे !आकाशीय गृह तारों के राजा! जिन्होंने आकाश को चीरते हुए सारे संसार को मापते हुए ऊपर उठे ,आपको अब नींद से जागना चाहिए | हे लाली लिये स्वर्णिम पायल धारण करने वाले बलराम ! आप दोनों भाइयों को अब उठ जाना चाहिये।
श्री उ वे मीमांसा शिरोमणि भरतन् स्वामी द्वारा अनुगृहीत 17वीं गाथा का संस्कृत छन्दानुवाद:
१७.
अम्बरं नीरमन्नं च दातर्नो नाथ ! धार्मिक ! ।
नन्दगोप! त्वमुत्तिष्ठ, नायिके! ललनोत्तमे ! ।।
उद्बुद्ध्यस्व यशोदेऽम्ब ! गोपवंशप्रदीपिके ! ।
देवेशोत्तिष्ठ खं भित्वा वर्धित्वा क्रान्तवन् ! जगत् ।।
काञ्चनं नूपुरं धर्तः ! श्रीयुत ! त्वं सहानुजः ।
उत्तिष्ठ बलदेव ! त्वं मैव स्वपिहि सम्प्रति ।।
श्री उ वे रंगदेशिक स्वामी द्वारा विरचित ‘गोदा-गीतावली’ से संस्कृत गद्यानुवाद

श्री उ वे सीतारामाचार्य स्वामीजी द्वारा हिन्दी छन्द अनुवाद:

जब भी भगवान का आश्रयण ग्रहण करते हैं, तो उसे उचित मार्ग से ग्रहण करना चाहिए। श्री शठकोप आळ्वार कहते हैं, “वेदों के सारार्थ को जानने वालों भक्तों का आश्रयण लेकर भगवान के चरण कमलों का आश्रयण लेना चाहिए”।
जब भी हम किसी दिव्यदेश जाते हैं, हमें सर्वप्रथम उस दिव्यदेश में निवास करने वाले महापुरुषों के दर्शन करने चाहिए। उनके पुरुषकार से मन्दिर में प्रवेश कर आचार्यों, नित्य सूरियों, अम्माजी के पश्चात इस क्रम से भगवान के दर्शन करते हैं।

अम्बरमे : वस्त्र ही
तण्णीरे : जल ही
सोऱे : अन्न ही
अऱन्जेय्युम् : देने वाले
एम्पेरुमान् : स्वामी
नन्दगोपाला : नन्द गोप
एळुन्दिराय् : उठिए
“वस्त्र ही, जल ही, अन्न ही दान करने वाले, हे हमारे स्वामी नन्दगोपाल, उठिए!”
‘वस्त्र ही, जल ही, अन्न ही’ ऐसा क्यों कहा गया? नन्द जी जब वस्त्र दान करते हैं, तो इतनी दक्षता से करते हैं मानों उन्होंने बालपन से सिर्फ वस्त्र ही दान करने का कार्य किया है। किसको किस प्रकार के वस्त्र चाहिए, उनके नाप से, उनके योग्य वस्त्र सरलता से दान करते हैं नन्द जी। इसी प्रकार जल एवं अन्न भी।
हे नन्द जी! जब आप सभी को धारक, पोषक एवं भोग्य वस्तुएँ प्रदान करते हैं, तो हमारे धारक, पोषक एवं भोग्य, तीनों ही कृष्ण ही हैं। हमें भी हमारा अभीष्ट प्रदान कीजिये।
(भगवान भी आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी; सभी को उनके अभीष्ट प्रदान करते हैं। उसके बाद भी मांगने वालों को ही ‘उदार’ भी कहते हैं।
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ।।7.16।।
उदाराः सर्व एवैते (गीता 7.18)
आचार्यों का भी ज्ञान ऐसा है मानों ये संस्कृत वेद ही पढ़ाते हैं, द्राविड़ वेद ही पढ़ाते हैं, न्याय ही पढ़ाते हैं आदि।)
कोम्बनार्क्केल्लाम् कोळुन्दे :गोप कुल की लता में पल्लव समान
कुलविळक्के : मङ्गल दीप
एम्पेरुमाट्टि यसोदाय् : स्वामिनी यशोदा
अऱिवुऱाय् : उठिए
“गोप कुल की लता में पल्लव समान एवं कुलदीपक यशोदा, हमारी स्वामिनी, उठिए!”
स्त्रियों का स्वरूप पारतंत्र्य होने के कारण उन्हें लता का उपमान दिया जाता है। लता जिस प्रकार किसी पर आश्रित होकर ऊपर बढ़ती है, वैसी ही आदर्श शरणागत हैं यशोदा स्वामिनी जी।
जिस प्रकार लता में कोई भी रोग हो तो लक्षण सर्वप्रथम पल्लव में दिखते हैं, उसी प्रकार गोपकुल में कुछ भी अशुभ हो तो सर्वप्रथम यशोदा का मुख ही उदास होता है।
यशोदा जी, आप कुलदीपक हैं। कृष्ण प्रकाशमान दीपक हैं। आप हमें कृष्ण विरह के अन्धकार में मत रखिए।
(यहाँ गोपियाँ नन्द एवं यशोदा स्वामी एवं स्वामिनी कहकर पुकारती हैं। क्योंकि वो ही कृष्ण को प्रदान करेंगे। कृष्ण को प्रेम से ‘नन्द के कुमार’ और ‘यशोदा के बाल सिंह’ कहती हैं।)
अम्बरम् : आकाश
ऊडु अऱुत्तु : छेदते हुए
ओन्गि : बड़े हुए
उलगु अळन्द : तीनों लोकों को माप लिया
उम्बर् कोमाने : देवाधिदेव
उऱन्गादु : नींद को त्यागिये
एळुन्दिराय् : उठिए
“हे कृष्ण! आप वामन अवतार में भिक्षा के रूप में तीन पग भूमि पाकर आप बढ़ते गए और तीन पग से समस्त संसार को नापकर देवों एवं मनुष्यों को वासस्थान प्रदान किया। हे संसार के रक्षक! हमारी भी रक्षा कीजिये।”
“देवों, मनुष्यों, सभी के ऊपर अपने पादारविन्द रखने वाले हे सौलभ्यमूर्ति! हमें भी स्वीकार कीजिये।”
“संभवतः तीनों लोकों को नापने के क्रम में आपके चरणों को कष्ट हुआ एवं थकान से आप सो रहे हैं। इसलिए हम आपका मंगलाशासन कर रही हैं।”
(जब कृष्ण नहीं उठे तो गोपियाँ समझीं कि क्रम में कुछ गड़बड़ हुयी है। हमने बलराम को नहीं उठाया।)
सेम्बोन् कळल् अडिच् चेल्वा बलदेवा
उम्बियुम् नीयुम् उऱन्गु एलोर् एम्बावाय्`
“हे लाली लिये स्वर्णिम पायल धारण करने वाले बलराम ! आप दोनों भाइयों को अब उठ जाना चाहिये।”
बलराम जी के अवतरण से पूर्व देवकी के कोई भी पुत्र जीवित नहीं रहे। उनके अवतरण के पश्चात कोई भी मृत नहीं हुआ। इस कारण उन्हें मातृ-गर्भ-प्रकाशक’ कहते हैं। उनके चरणों के स्पर्श के कारण ही देवकी के गर्भ में आने वाले कृष्ण जीवित रहे। इस महिमा को जानते हुए, उनके चरणों में लालिमा लिए स्वर्ण कुण्डल धारण कराए गए हैं।
लक्ष्मण के अवतार में तो आप सोये ही नहीं थे। निरन्तर कैंकर्य किया। जागिये और हमें भी कैंकर्य प्रदान कीजिये।
आप भगवान के शैया हैं। आपके जागे बिना तो भगवान भी उठेंगे नहीं।
ये भगवान के लिए जीवात्म-प्राप्ति का उत्तम अवसर है कि हम उनके द्वार पर आए हैं। वरना हमें ढूँढते हुए उन्हें हमारे द्वार आना होगा।
इसलिए आप दोनों भाई अब जल्दी से उठिए।
