
श्रीमते रामानुजाय नमः|
ब्रह्म के जगद-कारणत्व के विषय में वेदान्त में अनेक वाक्य प्राप्त होते हैं|
सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् । (छान्दोग्य 6.2.1)|
आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्। नान्यत् किंचन मिषत्। स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति। (ऐतरेय 1.1.1) ;
ब्रह्म वा इदम् अग्र आसीत्। (बृहदारण्यक 1.4.10) ;
एको ह वै नारायण आसीत् । न ब्रह्मा न ईशानो नापो नाग्निः न वायुः नेमे द्यावापृथिवी न नक्षत्राणि न सूर्यः । (नारायण उपनिषद्)|
गति सामान्य न्याय से आत्मा, ब्रह्म, सत आदि सामान्य शब्दों का अर्थ नारायण है| पाणिनि सूत्र: पूर्वपदात संज्ञायामगः (8.4.3) के अनुसार नारायण शब्द संज्ञा होने से विशेष शब्द है|
आत्मा : आप्नोति इति आत्मा;
ब्रह्म: (बृहत्वात् बृह्मणत्वाच्च ब्रह्म)|
इस प्रकार आत्मा, ब्रह्म आदि सामान्य शब्द हैं, नारायण विशेष शब्द| अतः नारायण ही वेदों में जगत कारण हैं|
अभिन्न-निमित्तोपादान-कारण
ब्रह्म का विशेष लक्षण है अभिन्न-निमित्तोपादान-कारण होना| घड़े की सृष्टि में कुम्भकार निमित्त कारण है और मिट्टी उपादान कारण|
ब्रह्म के अतिरिक्त कोई अन्य जगत का निमित्त कारण नहीं हो सकता| छोटी-मोटी सृष्टि के निमित्त कारण तो हम प्रतिदिन बनते हैं किन्तु जगत के निमित्त कारण होने का ज्ञान और शक्ति किसी अन्य के पास नहीं अपितु केवल षड्गुण-परिपूर्ण भगवान के पास है| (जगद्व्यापारवर्जं प्रकरणादसन्निहितत्वाच्च। ॥4.4.17॥)| उपादान कारण वो वस्तु है वो स्वयं विकार को प्राप्त होकर कार्य में बदलती है| ब्रह्म के अतिरिक्त कोई अन्य उपादान कारण नहीं हो सकता क्योंकि समस्त जगत में अनुप्रवेश एकमात्र ब्रह्म का ही है| एकमात्र ब्रह्म ही समस्त चित-अचित का अन्तर्यामी है|
किन्तु निर्विकार ब्रह्म उपादान कारण कैसे हो सकता है? उपादान कारण में तो विकार उत्पन्न होता है| वस्तुतः भगवान के आत्म-स्वरुप में कोई परिवर्तन नहीं होता, अपितु उनके शरीर रूप चित-अचित में ही सूक्ष्म से स्थूल में परिवर्तन होता है| किन्तु कोई भी वस्तु का भगवान से पृथक नहीं है| समस्त चित-अचित सदैव भगवान से अपृथक होने के कारण ऐसा नहीं कह सकते की केवल प्रकृति ही उपादान कारण है| भगवान से पृथक होकर प्रकृति का अस्तित्व ही नहीं है|
यहाँ तीन शब्द समझने चाहिए: विशेषण, विशेष्य और विशिष्ट| विशेषण वो वस्तु है जिससे विशेष्य की पहचान होती है| जैसे चार-मंजिल मकान वाला व्यक्ति, यहाँ चार मंजिल मकान विशेषण है और व्यक्ति विशेष्य| जब विशेष्य अपने विशेषण से अपृथक हो तो उसे विशिष्ट कहते हैं| पृथक अर्थात अलग रहना, अपृथक अर्थात कभी अलग होकर न रहना, जैसे सूर्य और उसकी प्रभा| जैसे दंडी पुरुष, कुण्डली पुरुष जैसे संबोधनों में| किसी व्यक्ति को सदैव दण्ड का कुण्डल के साथ ही देखा है, सदैव अपृथक देखा है तो वो वस्तु ही उसकी पहचान हो जाति है क्योंकि वो व्यक्ति दण्ड या कुण्डल से विशिष्ट है| इसप्रकार विशिष्ट अर्थात अपृथक सिद्ध विशेषण| हम व्यवहार में देखते हैं कि जीवात्मा सदैव शरीर से विशिष्ट है| जीवात्मा कभी भी शरीर से पृथक नहीं होता| शरीर के नाम, लक्षण से हम जीवात्मा को पुकारते हैं| जैसे किसी व्यक्ति को “गणेश” कहकर पुकारा| नाम तो शरीर का ही होता है, आत्मा का नहीं| शरीर के नाम से पुकारने पर भी आत्मा समझती है कि मुझे ही बुलाया जा रहा है क्योंकि शरीर और आत्मा में अपृथक सिद्ध विशेषण है|

ब्रह्म सूत्र में ब्रह्म का उपादान कारणत्व
ब्रह्म सूत्र में ब्रह्म के उपादान कारण के विषय में चर्चा होती है:
प्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात्|
1.4.23
ब्रह्म प्रकृति (उपादान) है क्योंकि वेदान्त में ऐसी प्रतिज्ञा, दृष्टान्त एवं अनुपरोध (अविरोध) है|
छान्दोग्य में श्वेतकेतु-उद्दालक के सन्दर्भ में:
येनाश्रुतꣳ श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातमिति|
उस एक ब्रह्म के जान लेने से सबकुछ ज्ञात हो जाता है, क्योंकि समस्त सृष्टि ब्रह्म ही है|
दृष्टान्त देते हैं:
यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातꣳ स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् ॥"
जैसे मिट्टी का ज्ञान हो जाने के बाद घड़ा, बर्तन आदि सबका ज्ञान हो जाता क्योंकि वो मिट्टी के ही भिन्न नाम, रूप विकार हैं| जैसे सोने का ज्ञान हो जाने के बाद कर्ण आभूषण, स्वर्ण बर्तन आदि सभी स्वर्ण पदार्थ का ज्ञान हो जाता है| चाहे नाम, रूप जो भी हो, इतना तो ज्ञान हो ही जाता है कि ये स्वर्ण है| उसी प्रकार ब्रह्म का ज्ञान होने पर समस्त जगत का ज्ञान हो जाते है|
समस्त जगत भगवान का शरीर है और समस्त जगत के नाम और रूप भगवान के ही हैं| हम जो भी देखें, इतना तो समझ ही सकते हैं कि ये ब्रह्म का ही रूप है, इसमें ब्रह्म का अनुप्रवेश है|
इस विषय में अविरोध भी है| पूर्वपक्ष में यह शंका आती है कि भगवान तो निर्विकार हैं इसलिए वो उपादान कारण नहीं हो सकते| किन्तु, हमारा शरीर बालक, युवक, वृद्ध में बदलता है तो आत्मा में तो कोई विकार नहीं आता| विकार शरीर का ही है| उस शरीर से आत्मा का अपृथक सिद्ध विशिष्ट सम्बन्ध होने के कारण उस शरीर से आत्मा को भिन्न नहीं समझते, अपितु जीवात्मा को ही बच्चा, बाल, युवक, वृद्ध ऐसा कहते हैं|


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