श्री रङ्गनायकी अम्माजी

श्रीमते रामानुजाय नमः

तनियन : श्री वैष्णव गुरु परम्परा

किन्तु भगवान इन असंख्य अण्डों का निर्माण क्यों करते हैं? मोर अपने पंख फैलाकर नृत्य क्यों करता है? मोरनी को मोहने हेतु|

उसी प्रकार भगवान भी किसी अन्य प्रकार से जीवों की रक्षा कर सकते थे| किन्तु सृष्टि और प्रलय के चक्र के द्वारा ही जीवों की रक्षा क्यों करते हैं? महालक्ष्मी अम्माजी को प्रसन्न करते हेतु|सृष्टि का प्रधान हेतु है लीला या क्रीडा| इसका प्रधान उद्देश्य है लक्ष्मी देवी (श्री देवी) की प्रसन्नता|

(मोर का उदहारण सर्वाधिक उचित है| जिस प्रकार मोरनी को प्रसन्न करने हेतु मोर अपने पंख फैलाकर नृत्य करता है, वैसे ही भगवान इस सूक्ष्म प्रकृति को नाम-रूप प्रदान करते हुए फैलाते हैं (स्थूल प्रकृति)| मोर के पास ही पंख होता है, मोरनी के पास नहीं| उसी प्रकार जगत के कारण एकमात्र भगवान ही हैं| श्री देवी जगत की सृष्टि में पुरुषकार हैं|)

महालक्ष्मी भगवान के लिए इतने महत्वपूर्ण हैं कि उनकी प्रसन्नता हेतु भगवान सृष्टि प्रलय आदि व्यापार करते हैं? प्रहलाद आदि भक्तों के लिए तो इतना बड़ा कार्य नहीं करते?

क्योंकि श्री देवी भगवान की स्वरुप-निरूपक धर्म हैं| भगवान की पहचान है – श्रियः पतित्वम्|

भक्तिसार आलवार कहते हैं: तिरुविला देवै तेरेमिल देवै| अर्थात जिनके वक्षस्थल में श्री देवी का निवास नहीं है, मैं उसे नहीं मानूंगा|

शठकोप आलवार कहते हैं: अगल्गिल्लेन इरैयुम एन्ड्र अलर मेल मंगई उरई मार्वा|

अर्थात् आपसे अनपायनी रहने वालीं सुकोमल पद्मजा, जो नित्य आपके वक्षस्थल में रहती हैं|

भगवान के वक्षस्थल में एक त्रिभुजाकार चिन्ह है, जिसे श्रीवत्स चिन्ह कहते हैं| यह भगवान के दिव्य मंगल विग्रह में लक्ष्मी देवी का निवास स्थान है|अतः श्री देवी के बिना भगवान तो भगवान ही नहीं हैं|

श्री देवी का हमारे गुरु परम्परा में क्या स्थान है?

श्री वैष्णव सम्प्रदाय में तीन मन्त्र हैं| मूल मन्त्र (नारायण अष्टाक्षरी महामन्त्र) बद्रिकाश्रम में नारायण ऋषि ने नर ऋषि को प्रदान किया| द्वय मन्त्र क्षीराब्धि में भगवान विष्णु ने लक्ष्मी देवी को दिया| चरम श्लोक भगवान कृष्ण ने कुरुक्षेत्र में अर्जुन को दिया| किन्तु किसी भी मन्त्र की गुरु-शिष्य परम्परा नहीं चली|

श्रीरंगम में रंगनाथ भगवान ने ये तीनों मन्त्र रंगनायकी अम्माजी को दिए| रंगनायकी अम्माजी ने मन्त्र प्राप्त कर इसे आगे बढ़ाया और इस प्रकार श्री वैष्णव सम्प्रदाय बना|

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Author: ramanujramprapnna

studying Ramanuj school of Vishishtadvait vedant

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