जब गोपियों ने नीला देवी (नप्पिनै) के व्यवहार की आलोचना की जो उनके स्वरुप और स्वभाव से मेल नहीं खाता| नीला देवी शांत रहीं और प्रभु से बात करने के समुचित क्षण की प्रतीक्षा करती रहीं| शायद नप्पिनै क्रोधित हो गयी हैं, ऐसा सोचते हुए गोपियों ने प्रभु की स्तुति की| प्रभु भी चुप रहे| शायद कन्हैया भी क्रोधित हों क्योंकि हमने नप्पिनै की आलोचना की| भगवान के क्रोध को शान्त करने के लिए चलो नप्पिनै की प्रशंसा करते हैं|
मुप्पत्तु मूवर् अमरर्क्कु मुन् सेन्ऱु
कप्पम् तविर्क्कुम् कलिये तुयिल् एळाय्
सेप्पम् उडैयाय् तिऱल् उडैयाय् सेऱ्ऱार्क्कु
वेप्पम् कोडुक्कुम् विमला तुयिल् एळाय्
सेप्पन्न मेन् मुलै सेव्वाय्च् चिऱु मरुन्गुल्
नप्पिन्नै नन्गाय् तिरुवे तुयिल् एळाय्
उक्कमुम् तट्टु ओळियुम् तन्दु उन् मणाळनै
इप्पोदे एम्मै नीराट्टु एलोर् एम्बावाय्
श्री उ वे रंगदेशिक स्वामी द्वारा विरचित गोदा-गीतावली से

श्री उ वे सीतारामाचार्य स्वामीजी द्वारा हिंदी छन्दानुवाद

श्री उ वे मीमांसा शिरोमणि भरतन् स्वामी द्वारा अनुगृहीत विंशति गाथा का संस्कृत छन्दानुवाद:
२०.त्रयस्त्रिंशदमर्त्यानां पुरो गत्वाऽथ कम्पनम् ।
तेषां नाशितवन् ! वीर ! जागृयाः ऋजुताश्रय ! ।।
सामर्थ्ययुक्त! हे द्वेष्टुर्भयदायक ! निर्मल ! ।
कुम्भवन्मृदुवक्षोजे ! बिम्बोष्ठे ! तनुमध्यमे ! ।।
नीले ! श्रीर्वाम ! उत्तिष्ठ दर्पणं व्यजनं च नः ।
वितीर्य तव पत्या त्वम् अस्मान् स्नापय सम्प्रति ।।

मुप्पत्तु मूवर् अमरर्क्कु मुन् सेन्ऱु
कप्पम् तविर्क्कुम्
33 करोड़ देवता या 33 देवता वर्ग (12 आदित्य, 11 रुद्र, 8 वसु एवं 2 अश्विनी कुमार) में प्रथम (देवताओं के मध्य उपेन्द्र विष्णु)
अथवा जब 33 करोड़ देवता डर से कम्पन करते हैं, उनके आपके सम्मुख आने से पूर्व ही आप उनकी रक्षा करते हैं। उनके भय का निवारण करते हैं। ‘कप्पम’ शब्द संस्कृत के ‘कम्पन’ से आया है।
कलिये तुयिल् एळाय्
हे बलवान! उठिए
(परकाल आळ्वार का एक नाम कलियन भी है। अर्थात बलशाली। पूर्व में उनका नाम नील था)
(ऐसा लगता है कि आप केवल स्वार्थी लोगों को बचाते हैं, उन लोगों को नहीं जो आपके दर्शन के अलावा कुछ नहीं चाहते। इंद्र के लिए नरकासुर के खिलाफ कृष्ण द्वारा युद्ध जीतने के बाद, वह जल्द ही भूल गया और कृष्ण के खिलाफ ‘पारिजात पुष्प’ के लिए युद्ध छेड़ दिया। ऐसा लगता है कि आप ऐसे स्वार्थी देवताओं की ही मदद करते हैं।)
सेप्पम् उडैयाय् : ऋजु स्वभाव वाले
मन, वाक और काय से एकरूप रहना ही ऋजुत्व अथवा आर्जव कहलाता है। भगवान जब मनुष्य रूप में अवतार लेते हैं तो पूरी तरह से मनुष्य की भांति ही व्यवहार करते हैं। सत्यभामा के पिता की मृत्यु पर विलख कर रोना हो अथवा मैया यशोदा के डर से थर-थर काँपना। यही भगवान का आर्जव है। ऐसे व्यक्ति को बोलचाल में ‘सीधा’ व्यक्ति कहते हैं। सीधे व्यक्ति का सभी फायदा उठाते हैं। देवतावर्ग भी उठा रहे हैं। हम भी उठा रहे हैं।
तिऱल् उडैयाय् : पराक्रमशाली
क्या आपका पराक्रम हमारे लिए नहीं है? हमें भी तो वो पराक्रम दिखाईये जो आपने 7 बैलों को काबू कर नप्पिनै को प्राप्त किया था। हमें भी उसी प्रकार प्राप्त कर लीजिए!
सेऱ्ऱार्क्कु वेप्पम् कोडुक्कुम् : शत्रुओं को ज्वर देने वाले!
भगवान का सीधापन आश्रितों के लिए ही है। शत्रु तो डर से थर-थर काँपते हैं।
विमला: दोषरहित
यहाँ यह संदेह हो सकता है कि भगवान किसी के प्रति वात्सल्य रखते हैं तो किसी के प्रति क्रोध। तो फिर वो पक्षपाति नहीं हुए क्या?
हाँ, भगवान आश्रित-पक्षपाती हैं।
किन्तु गीता में तो ‘समो’हम सर्व भूतेषु’ कहा है?
इसका अर्थ है ‘आश्रयणकाले सम:’। जो भगवान की शरण में आता है, उनमें भगवान उनके जन्म, पुण्य-पाप, कुल, ज्ञान आदि के आधार पर भेद नहीं करते अपितु सभी को समान भाव से स्वीकार करते हैं। इसलिए सुग्रीव से कहते हैं, “चाहे विभीषण हो, या स्वयं रावण; मैं सभी की शरणागति स्वीकार करूँगा”।
तुयिल् एळाय् : ऐसे भगवान उठिए।
इसके पश्चात नप्पिनै को उठाती हैं

अब तक हमने देखा कि कृष्ण से उठने की विनती की गयी थी| कृष्ण नहीं उठे| 19 वें पासुर में नप्पिनै की भर्त्सना की थी| नप्पिन्नै उठ कर आना चाहती थीं किन्तु ने उन्हें आलिंगन करके रोक लिया| अब गोपियों ने कृष्ण की प्रशंसा कर उनसे उठने की विनती की किन्तु वो नहीं उठे| गोपियाँ समझीं कि शायद नप्पिन्नै की भर्त्सना से कृष्ण नाराज हैं| उन्हें प्रसन्न करने हेतु अब पुनः नप्पिन्नै की प्रशंसा करती हैं:
सेप्पन्न मेन् मुलै : कोमल एवं पर्वत के समान स्तनों वाली
भगवान से तनिक भी विरह न सहन कर पाने के स्वभाव के कारण उनकी भक्ति को कोमल एवं पर्वत के समान उन्नत कहा गया है| उनकी इस भक्ति ने भगवान को भी वश में कर लिया है एवं भगवान भी उनसे तनिक भी अपाय सहन नहीं कर पाते| अब इस सिंह का निवास स्थान इन्हीं कोमल एवं विशाल स्तनों में है|
सेव्वाय्च्: लालिमा लिए होंठ
पूर्व में उनकी भक्ति की प्रशंसा की गयी, अब उनकी भोग्यता बताई जा रही है| नप्पिन्नै के स्तन जहाँ उनके निवास स्थान हैं, उनके होंठ कृष्ण के भोग्य वस्तु हैं, उनका आहार है|
चिऱु मरुन्गुल्: सुमध्यमा (तीखे मध्य वाली)
अब पतली कमर से उनके वैराग्य की प्रशंसा की जा रही है| काजल किये आँखों के उपमान से पूर्व गाथा में उनके ज्ञान की प्रशंसा की जा चुकी है|
पर्वत के नीचे खाई देख जैसे कोई डर जाए, वैसे ही पर्वत समान वक्षस्थल के नीचे उनका मध्य देश ऐसा है मानों दिखे ही नहीं|
नप्पिन्नै नन्गाय् : हे सभी प्रकार से पूर्ण! नीला देवी
पूर्व में एक-एक अवयव या एक-एक गुणों की प्रशंसा की गयी; अब उन्हें सभी प्रकार के स्त्री-सौन्दर्य से पूर्ण एवं सभी शरणागत गुणों से परिपूर्ण कहती हैं|
तिरुवे तुयिल् एळाय्: हे श्री देवी! उठिए!
अर्थात्, हे लक्ष्मी देवी के समान गुणों वाली| हे पुरुषकारिणी!
“आप पुरुषकारिणी हैं, आपको तो कृष्ण से पहले उठना चाहिए| आप सो क्यों रही हैं?”
नप्पिन्नै पूछती हैं, “मैं सो नहीं रही, तुम्हारे विषय में ही सोच रही हूँ| तुम्हारे अभीष्ट वस्तुयें क्या हैं?”
उक्कमुम् : हस्त-पंखा
तट्टु ओळियुम् : दर्पण
तन्दु उन् मणाळनै : और आपके प्यारे कान्त (श्रीकांत कृष्ण)
इप्पोदे : जल्द से जल्द
एम्मै : हमलोग
नीराट्टु : स्नान करेंगे (कृष्णानुभव में)
एलोर् एम्बावाय् : व्रत पूरा करेंगे

स्वापदेश
युगल को जगाने का यह आखिरी पासूर है|
17 वें पासूर का आरम्भ “अ” अक्षर से होता है : अम्बरमे तन्निरे सोरे अरम सैयुम
18वें पासूर का आरम्भ “उ” अक्षर से होता है : उन्दमद कलित्तन ओडाद तोल वलियन
20 वाँ पासूर “म” अक्षर से आरम्भ होता है: मुपत्तु मूवर
एक साथ ये अक्षर ओम् बनते हैं| 19 वाँ पासूर लुप्त-चतुर्थी है जिसका विस्तृत विवरण लोकाचार्य स्वामी मुमुक्षुपड़ी रहस्य ग्रंथ में करते हैं|
- गोपियों द्वारा मांगे गए वस्तुओं का आतंरिक अर्थ नारायण महामंत्र है (ॐ नमो नारायणाय)
- दर्पण : (अ, ओम ) :- दर्पण स्व-स्वरुप का दर्शन कराता है| शरीर के अन्दर विद्यमान आत्मा सिर्फ भगवान की संपत्ति है
- हस्त-पंखा : ( नमः) :- यद्यपि हम ज्ञान-स्वरुप हैं और हमारे पास ज्ञान है, अभिमानवश हमारे अन्दर स्वतंत्र बुद्धि आता है| हमारे अन्दर कर्तृत्व अभिमान आता है और हम सोचते हैं कि ये कार्य मेरे द्वारा किया जा रहा है| पसीना हमारे कर्तृत्व का प्रतीक है और नमः का प्रतीक हस्त-पंखा है|
- कन्हैया : नारायण
- नोम्बू : आय :- कैंकर्य
श्रृंगार रस
माता के अवयव पिता के लिए भोग्य वस्तु हैं किन्तु पुत्र के लिए तो उज्जीवन हैं| उनपे पिता का अनुरक्त होना पुत्र के लिए उत्तम ही है| माता के स्तन तो पुत्र के लिए जीवन हैं, उसका सर्वस्व हैं| इसलिए उत्तम है कि श्रृंगार रस का आनन्द हम स्वयं को पुत्र के स्थान पर रख कर लें| यदि स्वयं को पिता के स्थान पर रखकर श्रृंगार रस का आनन्द लेंगे तो अनुचित होगा|

