तिरुप्पावै 21

तिरुपावै 21वीं गाथा

अबतक गोदाम्बा ने नीला देवी/नप्पिनै का पुरुषाकार प्राप्त किया। अब नीला देवी भी  किवाड़ खोलकर गोपियों की गोष्ठी में शामिल हो जाती हैं। गोपियाँ अपने अकिंचनत्व, अनन्य-गतित्व एवं महाविश्वास का प्रकाशन करती हैं। ये तीनों ही गुण अधिकारी पूर्ति हैं। शरणागत में ये गुण होना आवश्यक हैं। गोदाम्बा कहती हैं कि आपको प्राप्त करने हेतु हम कोई उपाय अनुष्ठान नहीं कर रही हैं। आपके अतिरिक्त हमारी कोई अन्य गति भी नहीं है (चाहे आप हमें स्वीकार करें या न करें।)। किन्तु हमें यह महाविश्वास है कि आप हमें अवश्य हमारा इच्छित पुरुषार्थ प्रदान करेंगे।

श्रृंखला : तिरुप्पावै (गोदा देवी जी का दिव्य व्रत)

संस्कृत छन्दानुवाद (श्री उ वे मीमांसा शिरोमणि भरतन् स्वामी):

२१.दोहनार्थं गृहीतेभ्यः पात्रेभ्यः पयसो यथा ।
उत्पीडः स्यात्तथाऽजस्रं सवित्रीणां पयःस्रुतेः ।।
उदारोत्तुङ्गधेनूनां बहूनां स्वामिनः सुत ! ।
प्रबुध्यस्व महात्मन् ! भोः श्रितरक्षणदीक्षित ! ।।
जगत्यस्मिन् समुद्भूततेजोराशे ! प्रजागृहि ।
शत्रवो नष्टवीर्यास्ते संप्राप्य भवनाङ्गणम् ।।
अगत्या तव पादाब्जे आश्रयन्ते यथा तथा ।
मङ्गलं कीर्तयन्त्यस्त्वां स्तुवत्यो वयमागताः ।।

श्री उ वे रंगदेशिक स्वामी कृत गोदा-गीतावली से

श्री उ वे सीतारामाचार्य जी द्वारा हिन्दी छन्दानुवाद

इस गाथा में नप्पिनै गोदाम्बा की गोष्ठी में जुड़ जाती हैं एवं सभी मिलकर कृष्ण को जगाते हैं। यहाँ नन्दगोप के गौ-समृद्धि एवं ऐश्वर्य का वर्णन करते हुए, उनके पुत्र के रूप में कृष्ण की प्रशंसा करते हैं। पुत्र होने का अनुभव के लिए भवावान अकार होते हैं, इसलिए ‘नन्दगोप के पुत्र’, ऐसा सम्बोधन से भगवान प्रसन्न होंगे।

** एट्र कलङ्गल :- अनुरूप पात्र (बर्तन)

एदिर पोङ्गि :- दूध तेजी से भर जा रहे हैं।

पात्र थन के नीचे रखते हीं दूध से पूर्ण हो जाते हैं। दूध दूहने में तो कोई श्रम नहीं है, किन्तु पात्र उठाने और बदलने में ग्वाले थक जाते हैं।

माट्रादे पाल शोरियुम: दूध निरन्त बहते रहते हैं।

दूध बहकर मानो घर के बाहर तालाब बना देते हों। चाहूँ ओर निरन्तर दूध का ही गन्ध है।

वल्लल : महा उदार
पेरुम : अनेक संख्या में
पशुक्कल : गायें

आऱ्ऱप् पडैत्तान् मगने : ऐसे नन्दगोप के पुत्र
अऱिवुऱाय् : उठो

असंख्य महा उदार गायों वाले नन्द जी के पुत्र, उठो! आप तो सर्वज्ञ हैं। भगवान का ज्ञान उनका आश्रित-कार्यापादक गुण है। आप जानते हैं कि हम आपके द्वार आये हैं।

(जिस प्रकार ब्राह्मणों का धन वेद है, उसी प्रकार वैश्यों का धन गौ है)

(आचार्य भी इन गायों की तरह परम उदार है। पराशर महर्षि मैत्रेयी के एक प्रश्न के उत्तर में प्रसंगात अनेक संबंधित विषय बताते हैं, जो हमारे उज्जीवन के लिए आवश्यक हैं। परकाल आळ्वार को अरुल मारी कहते हैं, जिसका अर्थ हुआ ‘कृपा वर्षी’। आल्वारों ने अपने भगवद-अनुभव को अपने तक सीमित नहीं रखा, अपितु हम सभी को प्रदान किया। रामानुज स्वामी कृपामात्र-प्रसन्नाचार्य हैं।)

ऊऱ्ऱम् उडैयाय् : स्थिर/दृढ़, जो एकमात्र शास्त्र-गम्य हैं, प्रत्यक्ष एवं अनुमान गम्य नहीं।

पेरियाय् : बहुत बड़े

अविज्ञातं विजानतां विज्ञातम् अविज्ञातम्
(जो ये समझता है कि वो भगवान को नहीं जाना, वो वास्तव में उन्हें जान गया। जो समझता है कि वो भगवान को जान गया, वो वास्तव में उन्हें नहीं जाना।)

अथवा:

ऊऱ्ऱम् उडैयाय् : अच्युत

पेरियाय् : रक्षा करने के बाद भी उन्हें ही उदार मानने वाले

**उलगिनिल् तोऱ्ऱमाय् निन्ऱ सुडरे तुयिल् एळाय् :

“ऐसे वैभवशाली होते हुए भी आप इस संसार में प्रकट होते हैं।

उलगिनिल् : संसार में प्रकट होते हैं।
तोऱ्ऱमाय् : इन्द्रियों के विषय बनते हैं।
निन्ऱ सुडरे : तेजस/ चमकने वाले
तुयिल् एळाय् : उठो!

स उ श्रेयान भवति जायमान:
‘वो जायमान (जन्म लेकर) ही श्रेयान होता है’। भगवान अपने विभव रूप में ही श्रेष्ठ बनते हैं। ‘सकलमनुजनयनविषयतां गत:’ (गीता भाष्य)।

**माऱ्ऱार् उनक्कु वलि तोलैन्दु

जैसे आपके शत्रु परास्त होने के बाद, और कोई सहारा न देख , आपके दिव्य चरणों की शरण में आ जाते है ।

उन् वासल् कण्
आऱ्ऱादु वन्दु उन् अडि पणियुमा पोले

उसी प्रकार हम भी अपने दुख को सहन न कर पाते हुए आपके चरणों की शरण लेते हैं। (आपके सौन्दर्य एवं गुणों से परास्त होकर प्रेम-बलात्कार से आपके पास आई हैं।)

(दुर्योधन ने आदेश दे रखा था कि कोई भी कृष्ण का स्वागत नहीं करेगा। किन्तु जब कृष्ण आये तो उनके सौन्दर्य के परवश होकर सबसे पहले दुर्योधन ही उठा और प्रणाम किया।)

(जैसे काकासुर जयन्त कोई और गति न पाकर आपके चरणों में आ गिरा था। जैसे दूधमुंहा बच्चे को माँ लात से मार भी दे, तो भी वो माँ के चरणों को छोड़कर नहीं जाता। जैसे कमल का रस पीने वाले भँवरे को इक्षुरक (एक रसहीन फूल) नहीं भाता।)

भगवान ये सोच सकते हैं कि अनन्य-गति भक्त तो भगवान के कृपा की प्रतीक्षा करते हैं, स्वयं से कोई प्रयत्न नहीं करते। किन्तु ये गोपियाँ तो चल कर मेरे पास आई हैं। क्या ये साधन-निष्ठ हैं?

गोपियाँ कहती हैं कि हम प्रेम-परवश होकर, आपकी भोग्यता के परवश होकर आपके पास आपका मंगलाशासन करने आई हैं। (हमारा आना कोई उपायांतर या उपेयान्तर की इच्छा से नहीं है।)

पोऱ्ऱि याम् वन्दोम् पुगळ्न्दु एलोर् एम्बावाय्

आपका मंगलाशासन करती हुयी आपके पास आई हैं।
(जैसे पिता विष्णुचित्त आळ्वार ने भगवान का मंगलाशासन किया है।)

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Author: ramanujramprapnna

studying Ramanuj school of Vishishtadvait vedant

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