तिरुप्पावै 22

श्रृंखला : तिरुप्पावै (गोदा देवी जी का दिव्य व्रत)

आज की 22वीं गाथा में गोदाम्बा अपने अनन्य-गतित्व एवं अनन्यार्ह शेषत्व का प्रकाशन करती हैं। (एकमात्र भगवान के ही शेष होने की योग्यता होना अनन्यार्ह शेषत्व है। ) जिस प्रकार विभीषण अपने कुल-परिवार को छोड़कर भगवान के पास आया था, काकासुर जयन्त माता-पिता एवं अन्य देवों का परित्यक्त होकर आया था, वो वापस अपने घर नहीं जा सकते थे। आपके सिवा उनकी और कोई अन्य गति नहीं थी।
हम गोपियाँ भी सब छोड़कर आयी हैं और आपसे प्रणय निवेदन कर रही हैं। आप हमें ठुकरा भी दें तो हम लौटकर नहीं जा सकते। आपके अतिरिक्त हमारी और कोई गति नहीं है।

आलवन्दार स्तोत्र रत्न में कहते हैं:

निरासकस्यापि न तावदुत्सहे महेश हातुं तव पादपङ्कजम् ।
रुषा निरस्तो ऽपि शिशुस्स्तनन्धयो न जातु मातुश्चरणौ जिहासति ॥२६॥

यदि एक माता अपने शिशु को चरणों से ठोकर मारकर भगा दे, फिर भी शिशु अपने माता के चरणों को नहीं छोड़ता| (स्वरुप-प्रयुक्त-दास्य)

तवामृतस्यन्दिनि पादपङ्कजे निवेशितात्मा कथमन्यदिच्छति ।
स्थितेऽरविन्दे मकरन्दनिभरे मधुव्रतो नेक्षुरकं हि वीक्षते ॥२७॥

आपके चरणों की भोग्यता ऐसी है कि इसे छोड़ हम कहीं और नहीं जा सकते| क्या कोई भ्रमर मकरन्द को छोड़ रसहीन इक्षुरक को चाहेगा? (गुण-कृत-दास्य)

हम भी ऐसे ही प्रेम-अतिशय से परवश होकर आपके पास प्रणय निवेदन करने आई हैं|

अन्गण् मा ग्यालत्तु अरसर् अभिमान
भंगमाय् वन्दु निन् पळ्ळिक् कट्टिल् कीळे
सन्गम् इरुप्पार् पोल् वन्दु तलैप्पेय्दोम्
किण्किणि वाय्च् चेय्द तामरैप् पूप् पोले
सेम् कण् सिऱुच् चिऱिदे एम् मेल् विळियावो
तिन्गळुम् आदित्तियनुम् एळुन्दाऱ् पोल्
अम् कण् इरण्डुम् कोण्डु एन्गळ् मेल् नोक्कुदियेल्
एन्गळ् मेल् साबम् इळिन्दु एलोर् एम्बावाय्

श्री उ वे रंगदेशिक स्वामी द्वारा विरचित ‘गोदा-गीतावली’ से संस्कृत गद्यानुवाद

श्री उ वे भरतन् स्वामी द्वारा अनुगृहीत 22वीं गाथा का संस्कृत छन्दानुवाद:

२२.रम्याणां भूमिभागानां विशालानामधीश्वराः ।
भग्नमानाः समागत्य पर्यङ्काधः स्थले हि ते ।।
सङ्घीभवन्ति हा तद्वद् वयं प्राप्तास्तवान्तिकम्।
किङ्किणीमुखवत्फुल्ले राजीव इव लोहिते ।।
लोचने तावके किं नो मन्दं मन्दं न पश्यतः ।
उत्थितौ योगपद्येन हिमोष्णकिरणाविव ।।
सौम्ये ते ये दृशौ ताभ्यामस्मान् यदि कटाक्षयेः ।
अवश्यं नोऽनुभोक्तव्यम् अपि पापं विनश्यति ।।

श्री उ वे सीतारामाचार्य स्वामी द्वारा विरचित हिन्दी

**अन्गण् मा ग्यालत्तु अरसर् : सुन्दर और बड़े संसार के राजाओं

ऐसा ही एक राजा था पौन्ड्रक| उसने नकली शंख-चक्र भी धारण कर रखे थे| ‘इश्वरो अहं,अहं भोगी’ यही स्वातंत्र्य-अभिमान है|

**अभिमान भंगमाय् वन्दु : कृष्ण के पास आते ही उनका अभिमान भंग हो जाता है

स्वातन्त्र्य अभिमान से युक्त व्यक्ति भगवान को प्राप्त नहीं कर सकता| (निर्मल मन जन सो मोहि भावा, मोहि कपट छल छिद्र न भावा.)| भगवान के कटाक्ष पड़ते ही अभिमान नष्ट हो जाते हैं|

एक बार उन राजाओं को यदि राज्य वापस भी दे दिया जाये, तो भी वो उस राज्य में पुनः उत्सुक नहीं होते एवं आपके चरणों में ही रहते हैं| (कई श्री वैष्णव जो सांसारिक कार्यों को त्याग आचार्य कैंकर्य में लग जाते हैं, उन्हें वापस कितना भी प्रलोभन दिया जाये, वो वापस नहीं जाते|)

**निन् पळ्ळिक् कट्टिल् कीळे : हारने के बाद ऐसे असंख्य राजा कृष्ण के सिंहासन के नीचे ही रहते हैं

एक बार एक व्यक्ति ने श्री पराशर भट्टर से प्रश्न किया, ‘जब हम शास्त्रों में देखते हैं कि भगवान ब्रह्मा और अन्य केवल कई जन्मों के तप करने के बाद मोक्ष प्राप्त करते हैं, तो यह कैसे संभव है कि कुछ लोग (श्रीवैष्णव) बड़ी आत्मविश्वास के साथ मानते हैं कि वे बस इस जन्म के अंत में मोक्ष प्राप्त कर लेंगे और इसकी उत्सुकता से प्रतीक्षा करते हैं?’ श्री भट्टर ने उल्लेखनीय रूप से उत्तर दिया, ‘कोई विरोधाभास नहीं है; ब्रह्मा और अन्य अपने पद के अनुसार अहंकार और गर्व रखते हैं और इससे छुटकारा पाने के लिए उन्हें कई जन्मों की आवश्यकता होती है, लेकिन यहाँ के लोग स्वभावतः अपने आप को निम्न मानते हैं और इसलिए उनका अहंकार और गर्व कम होता है। इसके अलावा श्री वैष्णव मोक्ष के लिए भगवान पर निर्भर रहते हैं और इसलिए केवल यह जन्म ही पर्याप्त है।’
इसीलिए हमारे आचार्यों का कहना है, ‘यहाँ तक कि ब्रह्मा हार जाता है लेकिन गोपियाँ विजयी होती हैं; ऐसी है कृष्ण की महिमा।’

**सन्गम् इरुप्पार् पोल् वन्दु तलैप्पेय्दोम् : हम भी इसी प्रकार तुम्हारी शरण आये हैं कृष्ण!।

गोपियों का अभिमान क्या था: स्त्रीत्व-अभिमान।

कोई भी स्त्री पुरुष से प्रेम करती है फिर भी आशा करती है कि वो पुरुष ही उसके पास आयेगा। गोपियाँ भी अपने सौन्दर्य अभिमान से सोचती थीं कि कृष्ण ही मुझे ढूँढते आएगा। किन्तु आपकी भोग्यता के परवश होकर हम आपके द्वार पर खड़ी हैं। अपने दर्शन से कृतार्थ करो हे कृष्ण!।

राजा अपने राज्य छोड़कर आये तो गोदाम्बा विषयान्तर अनुभव को छोड़कर। वो आयुधों से हारकर आये तो गोदाम्बा भगवान गुणों से हारकर।

(क्या हम भगवान के पास जाकर कैंकर्य का हठ कर सकते हैं? क्या यह पारतंत्र्य के विपरीत नहीं है?

प्रपन्न-निष्ठा में तो स्वल्पांश भी उपायानुष्ठान उचित नहीं। किन्तु आळ्वार जैसे परम भक्त भगवान को छोड़कर जी नहीं सकते। भक्ति-बलात्कार से यदि भगवान की प्राप्ति हेतु कुछ किये भी तो भगवान के लिए आनंददायक होता है। नाच्चियार-तिरुमोली में तो गोदाम्बा कामदेव से प्रार्थना करती हैं कि मुझे कृष्ण का संग दिलवा दो। हम जानबूझकर ऐसा करेंगे तो गलत होगा। प्रेम-परवश होकर ऐसा हो जाये तो भगवान उसका आनन्द लेते हैं।)

**किण्किणि वाय्च् चेय्द तामरैप् पूप् पोले : किण्किणि (एक प्रकार का आधा खुला और आधा बन्द एक आभूषण) और अर्धविकसित कमल पुष्प की तरह अपनी आँखें खोलो।

अर्थात, धीरे-धीरे अपना कटाक्ष दीजिये। अचानक हम सम्भाल नहीं पाएंगे।

(भगवान का स्वातन्त्र्य उन्हें आंखें खोलने नहीं देता, लक्ष्मी देवी का पुरुषकार उन्हें आँखें बन्द नहीं करने देता।
हमारे पाप उन्हें आँखे खोलने नहीं देते, उनकी कृपा उन्हें आँखें बन्द नहीं करने देते।

कर्म के अनुसार फल देने की उनकी प्रवृत्ति उन्हें अपनी आँखें बंद करने पर मजबूर करती है, जबकि भक्तों का समर्थन करने की उनकी प्रवृत्ति उन्हें खोलने पर मजबूर करती है;

शत्रु उनके पास जाने से डरते हैं क्योंकि उनकी आँखें सूर्य की तरह जलती हैं, जबकि भक्तों के लिए यह चंद्रमा की तरह ठंडी और सुखद होती हैं; सूर्य आलस्य और अज्ञानता का अंधकार दूर करता है और चंद्रमा ठंडा, ताजगी देने वाला, जीवनदायिनी और स्फूर्तिदायक है।
अथवा, भक्तों के प्रति मातृसुलभ स्नेह के कारण उनकी आँखें लाल (लाल कमल) हो गईं।
)

अर्जुन भगवान के शयन के बाद के कटाक्ष की महिमा को जानता था। उसके दर्शन हेतु ही उनके चरणों में बैठा था। दुर्योधन इन रहस्य से अनजान था।

महाविश्वास

**तिन्गळुम् आदित्तियनुम् एळुन्दाऱ् पोल् : सूर्य और चन्द्र के सदृश आपकी आँखें
**अम् कण् इरण्डुम् कोण्डु : तुम्हारे प्रियदर्शन दोनों आँखें से
**एन्गळ् मेल् नोक्कुदियेल् : यदि हमें देख लोगे
**एन्गळ् मेल् साबम् इळिन्दु : हमारे सभी शाप नष्ट हो जायेंगे।

सूर्य और चन्द्र के सदृश आँखें: वेद-द्रोहियों के लिए भगवान की सूर्य रूप आँख एवं भक्तों के लिए चन्द्र रूप शीतल आँखें।

हमारे शाप: हमारे पूर्व कर्म (पाप एवं पूण्य) जो भगवत-प्राप्ति में विरोधी हैं।

अथवा, तुमसे विरह की अग्नि ही शाप है। तुम अपने कटाक्ष से देख लेंगे तो हमारे ये शाप नष्ट हो जाएंगे।

सबरी कहती हैं, “चक्षुषा तव सौम्येन पूतास्मि रघुनन्दन।”
जब विभीषण राम के पास आते हैं: “लोचनाभ्यां पिबन्नीव”

विरह अग्नि की तपिश से सूख चुके हम पर कृपालु वर्षा बरसाओ। हम उस चातक पक्षी की तरह आपकी कृपा की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जो बारिश का इंतजार करता है। अपने नेत्र धीरे-धीरे खोलो। यदि आपकी कृपा एकसाथ बरसे, तो हम सहन न कर पाएं। कमल सुबह खिलता है और शाम को संकुचित हो जाता है। यदि सूर्य और चंद्रमा एक ही समय में उदित हों, तो कमल आधा ही खिलेगा। इसी तरह, आपको अपने नेत्र धीरे-धीरे खोलने चाहिए। जिन फसलों के खेतों ने पर्याप्त सूखा देखा है, उन्हें एक बार में मापी गई मात्रा में ही पानी देने की आवश्यकता होती है, यह ध्यान रखते हुए कि वे बाढ़ में न डूबें। इसी तरह, हमें, जो आपकी विरह की पीड़ा से पूरी तरह टूट चुके हैं, आपकी कृपालु दृष्टियाँ, जो आपकी कृपा के जल से भरी हैं, हमें धीरे-धीरे प्रदान की जानी चाहिए।

एलोर् एम्बावाय् : ऐसा हमारा व्रत है।

Unknown's avatar

Author: ramanujramprapnna

studying Ramanuj school of Vishishtadvait vedant

Leave a comment