आज की गाथा में गोदाम्बा सहित गोपियाँ यादवसिंह कृष्ण को सम्बोधित करती हैं। नीलादेवी के पुरुष्कार को प्राप्त करके, अपने आकिंचन्य, अनन्य-गतित्व, महाविश्वास का ज्ञापन करने के बाद अंततः भगवान गोपियों का प्रणय निवेदन स्वीकार करते हैं।
कृष्ण को गोदाम्बा ‘स्त्रियों का दुख न जानने वाले भगवान‘ कहती हैं। ‘राम अपनी पत्नी के लिए दुष्ट रावण को अनायास ही सेना सहित नष्ट कर दिए थे। किन्तु ये कृष्ण तो मिलने का एक समय देता है, और स्वयं नहीं आता। गोपियों को पत्नी के रूप में स्वीकार किया है किन्तु मिलने भी नहीं आता।’
यह सुन कृष्ण बहुत लज्जित हुए। “मुझे तो स्वयं इनके पास जाकर इनसे मिलना था, किन्तु ये मेरे द्वार तक आ गईं और मैं सो रहा हूँ। इतनी ठण्ड में प्रातः काल यमुना स्नान करके ओष की बूँदों को सहन करती हुई मेरे द्वार पर खड़ी हैं”
“हे गोपियों! मैं अभी बाहर आता हूँ।”
(त्रेतायुग में जब श्रीराम दण्डकारण्य में ऋषियों की दशा देखते हैं तो अपने देर से आने पर लज्जित होते हैं। मुझे स्वयं ही आकर इनकी रक्षा करनी चाहिए थी किन्तु ये ही आकर अपने रक्षण हेतु मेरी शरणागति किये हैं। माता कैकेयी ने मुझे कुछ मास पूर्व ही वनवास क्यों नहीं दे दिया!”)
(अर्चिरादि मार्ग में जब जीवात्मा भगवान के श्री मणि मण्डप में पहुँचता है, तब भगवान कहते हैं कि मुझे पूर्व में ही आकर तुम्हें प्राप्त कर लेना चाहिए था।)
गोदाम्बा कहती हैं, “बाल सिंह की भाँति धीरे-धीरे शयन से उठो और सिंह गति में चलते हुए अपने सिंहासन पर विराजमान हो। हम तुम्हारे प्रत्येक चेष्टितों को देख आनन्द लेना चाहती हैं एवं उनका मङ्गल गाएंगीं।“
“शयन गृह से बाहर आकर, सभागृह पहुंचकर, सिंहासन पर बैठकर, हमारे कैंकर्य-प्रार्थना पर विमर्श करो”।
श्रृंखला : तिरुप्पावै (गोदा देवी जी का दिव्य व्रत)
मारि मलै मुळैन्जिल् मन्निक् किडन्दु उऱन्गुम्
सीरिय सिन्गम् अऱिवुऱ्ऱुत् ती विळित्तु
वेरि मयिर् पोन्ग एप्पाडुम् पेर्न्दु उदऱि
मूरि निमिर्न्दु मुळन्गिप् पुऱप्पट्टु
पोदरुमा पोले नी पूवैप् पूवण्णा
उन् कोयिल् निन्ऱु इन्गने पोन्दु अरुळिक् कोप्पु उडैय
सीरिय सिन्गासनत्तु इरुन्दु याम् वन्द
कारियम् आराय्न्दु अरुळ् एलोर् एम्बावाय्
श्री उ वे सीतारामाचार्य स्वामीजी द्वारा हिन्दी छन्दानुवाद:

श्री उ. वे. मीमांसा शिरोमणि भरतन् स्वामी द्वारा अनुगृहीत 23वीं गाथा का संस्कृत छन्दानुवाद:
२३.सम्यक्सुप्तो महासिंहो वर्षासु गिरिकन्दरे ।
प्रबुध्योन्मील्य नेत्रे स्वे कणानग्नेः किरन्निव ।।
सुरभीणां सटानां च स्याद्विकासो यथा तथा ।
चलित्वा सर्वपार्श्वेषु विधूयावयवान् समान् ।।
विसृज्य महतीं तन्द्रां गर्जन्निःसृत्य गह्वरात् ।
यथाऽऽगच्छति तद्वत्त्वम् अतसीपुष्पवर्ण! भोः ।।
त्वन्मन्दिरादिहागत्य दिव्यसिंहासने स्थितः ।
अथागमनकार्यं नः कारुण्येन विचारय ।। 23 ।।



प्रथम चार पंक्तियों में सिंह का वर्णन है।
**मारि : वर्षा
**मलै : पर्वत
**मुळैन्जिल् : गुफा
**मन्निक् किडन्दु उऱन्गुम् : लेट कर निश्चिंत गाढ़ निद्रा लेने वाले
**सीरिय सिन्गम् : श्रेष्ठ सिंह
**अऱिवुऱ्ऱुत् : उठता है
**ती विळित्तु : गौरव से देखता है, मानो दूसरों की चिंगड़ी निकल जाए इस प्रकार से
**वेरि मयिर् पोन्ग : अपने सुगन्धित केशों को फैलाते हुए
**एप्पाडुम् पेर्न्दु उदऱि : चारों को शरीर घुमाकर, शरीर को संकुचित करते हुए, अपने पैरों को हिलाता है
**मूरि निमिर्न्दु : आलस त्यागकर
**मुळन्गिप् पुऱप्पट्टु : शब्द करते हुए निकलता है
**पोदरुमा पोले : जैसे वो आता है, वैसे ही आपको आना है।
“वर्षा काल में पर्वत में अपने गुफा में शयन किया सिंह जिस प्रकार उठता है, जिस दृष्टि से अपने दोनों तरफ देखता है, अपने सुगन्धित केशों को फैलाकर, शरीर को सिकोड़कर, चारों को घुमाकर अपने पैरों को हिलाता है और शब्द करते हुए बाहर आता है, वैसे ही आपको बाहर आना है।”
(यहाँ गुफा नन्दगोप का भवन है। सिंह और सिंहनी कृष्ण एवं नीला हैं जो गाढ़ निद्रा में शयन कर रहे थे। श्रेष्ठ सिंह कहने का अर्थ है ये पुरुषोत्तम हैं। सिंह दृष्टि से देखने का अर्थ है कि अपनी कृपा दृष्टि से देखना ताकि हमारे सारे विरोधि-स्वरूप नष्ट हो जायें। जिस प्रकार नरसिंह हिरण्यकशिपु के प्रति क्रोध एवं प्रह्लाद की रक्षा दोनों करते हैं।
जब विभीषण राम के पास आते हैं तो भगवान उसे किस प्रकार देखते हैं! “लोचनाभ्यां पिबन्निव”। मानों अपने नेत्रों से उसे पी जाएंगे। आप उसी प्रकार से हमें देखिए।
यहाँ राघव-सिंह का भी स्मरण करते हैं आचार्यगण जो वर्षाकाल में किष्किन्धा के पर्वतों की गुफा में रुके थे। वर्षाकाल के पश्चात सिंह गति से लक्ष्मण नगर में प्रवेश कर दहाड़ते हैं तो सुग्रीव की सेना थरथरा जाती है।)
**उन् कोयिल् निन्ऱु इन्गने पोन्दु अरुळिक् : तुम अपने महल से बाहर निकलो। हमें अपने सिंह गति के दर्शन दो।
(मन्दिर से बाहर निकलते हुए नम्पेरुमाल (रंगनाथ भगवान के उत्सव मूर्ति) के सिंह-गति का स्मरण करना चाहिए।)
शयन अवस्था की सुंदरता का आनंद लेने की इच्छा रखते हुए, उनकी जाग्रत अवस्था की सुंदरता, उनके चलने की शैली की सुंदरता और उन्हें भव्यता से बैठे देखने की सुंदरता। अंडाल इस छंद में कहती हैं, कृपया वहां से उठें और अपने दर्शक कक्ष की ओर गरिमामय रूप से जाएं और भव्य सिंहासन को सजाएं, और फिर हमारी यात्रा के उद्देश्य के बारे में पूछताछ करें।
मंदिर की शोभायात्राओं में, भगवान अतिशय भव्यता के साथ, शंख और अन्य वाद्ययंत्रों की जोरदार ध्वनि के बीच निकलते हैं और विभिन्न मुद्राओं और शैलियों में चलते हैं। कभी वह हाथी की तरह, कभी सिंह की तरह, कभी अश्व आदि की तरह चलते हैं।
(पूर्व में कहा कि नन्दगोप का महल। अब कह रही हैं कि तुम्हारा महल। अर्थात नन्द एवं कृष्ण एक ही महल में रहते हैं। जैसे जीवात्मा एवं परमात्मा एक ही शरीर में रहते हैं। जैसे प्रणव में अकार भगवान हैं और मकार जीवात्मा।)
**कोप्पु उडैय सीरिय सिन्गासनत्तु इरुन्दु : बाहर आकर अपने धर्म-पीठ उभय-विभूति-नायक सिंहासन पर बैठिए।
(सिंहासन पर बैठकर राजा जो निर्णय लेता है, उसकी अनुज्ञा वह स्वयं भी नहीं कर सकता। ये कृष्ण तो अपनी बात से पलट जाता है। इसलिए सिंहासन पर बैठकर निर्णय लो।)
**याम् वन्द कारियम् आराय्न्दु अरुळ् एलोर् एम्बावाय्:
“जो कार्य के लिए हम आयी हैं, उस विषय में कृपा से विचार करो।”
(आना तो तुम्हें स्वयं चाहिए था किन्तु तुम सोये रहे और हम तुम्हारे पास आ गईं। अब हमारे व्रत को पूर्ण करो।)
अब नप्पिनै और कृष्ण सिंहासन पर विराजमान होते हैं। लज्जित होते हैं कि हेमन्त ऋतु की ठंड में ये गोपियाँ इतनी सुबह स्वयं आयी हैं।


