आज 24वीं गाथा में गोदाम्बा भगवान का मंगलाशासन करती हैं| पिछली गाथा में यह अनुरोध किया गया कि आप सिंह सी चाल चलते हुए सिंहासन पर विराजमान हों! गोपियों ने देखा की भगवान के अत्यन्त मृदु चरण लाल पड़ गए हैं| वो सब मिलकर भगवान के मंगल की कामना करते हुए मंगलाशासन करती हैं|
भगवान का मंगलासन करना गोदाम्बा को अपने पिता विष्णुचित्त भट्टनाथ आलवार से विरासत में मिला है| तिरुपल्लाण्डु दिव्यप्रबन्ध में विष्णुचित्त आलवार कितना मंगलासन करते हैं| न केवल मुमुक्षुओं अपितु ऐश्वर्यार्थियों एवं कैवल्यार्थियों को भी भगवान का मंगलाशासन गाने हेतु आमन्त्रित करते हैं| बाकि आल्वार जहाँ स्त्री भावना में नायिका बन जाते हैं, वहीँ विष्णुचित्त आल्वार यशोदा भाव का अनुभव करते हुए भगवान के मंगल की कामना करते हैं| इसकारण उन्हें “बड़े आल्वार” कहा जाता है|
ज्ञान की अवस्था में हम रक्ष्य होते हैं एवं भगवान रक्षक| किन्तु ज्ञान जब परिपक्व होकर भक्ति बन जाता है तब उस अवस्था में हम रक्षक होते हैं एवं भगवान के मार्दव का चिन्तन करते हुए उनके रक्षण का प्रयत्न करते हैं| यदि ये अज्ञान है, तो भी यह गुण ही है, दोष नहीं क्योंकि यह भगवान को अत्यन्त प्रीतिकर होता है|
श्रृंखला : तिरुप्पावै (गोदा देवी जी का दिव्य व्रत)

श्री उ वे रंगदेशिक स्वामीजी द्वारा गोदा-गीतावली से

श्री उ वे भरतन स्वामी द्वारा 24वीं गाथा का संस्कृत छन्दानुवाद:
२४.पूर्वमेतज्जगत्क्रान्त! पादाभ्यां तव मङ्गलम् ।
गत्वा रुचिरलङ्कां तां हन्तः ! शौर्याय मङ्गलम् ।।
शकटं पत्प्रहारेण भङ्क्तः ! कीर्त्यै सुमङ्गलम् ।
वत्सं दण्डवदादाय क्षेप्तः ! पद्भ्यां सुमङ्गलम् ।।
छत्रवद्गिरिमुद्धर्तः ! सद्गुणेभ्यः सुमङ्गलम् ।
शत्रून् विजित्य हन्त्र्यै ते हस्ते शक्त्यै सुमङ्गलम् ।।
इत्थं ते वीरकर्माणि स्तुत्वा लब्धुं च भेरिकाम् ।
वयमद्य समायाता अस्मासु त्वं दयस्व भोः! । ।
श्री उ वे सीतारामाचार्य स्वामीजी द्वारा हिन्दी छन्द अनुवाद


- वामन अवतार में महाबली चक्रवर्ती से भिक्षा में 3 पग भूमि मिलते हीं तीनों संसार को नाप लेने वाले भगवान के चरणों का मंगल हो!
जब भगवान तीनों लोकों को नापने हेतु अपने पैर बढाए, तब उनके चरण पर्वत, वन आदि से चोट खाते हुए आगे बढे होंगे| उनके चरणों की मृदुलता का स्मरण कर गोपियाँ चिन्तित होती हैं एवं उनका मंगल गाती हैं|
त्रिविक्रम ने तो समस्त जगत के जीवों के शर पर अपने चरण रखते हुए आगे बढे थे| जाम्बवान ढोल बजाते हुए, उनकी जय गाते हुए उनकी परिक्रमा करने लगे| देवताओं को उनका अभीष्ट मिल गया| लेकिन ओह! उनके चरणों के स्वास्थ्य की चिन्ता तो तब किसी को न हुयी थी| ऐसा स्मरण कर अब गोदाम्बा सहित गोपियाँ उनका मंगल गाती हैं|
(त्रिविक्रम अवतार के काल में तो हम नहीं थे| तब किसी ने आपका शरण नहीं लिया, फिर भी आपने सबके शिर पर अपना चरण रख दिया| हम तो शरणागत है, हमें भी अपने चरणों की सेवा प्रदान करो|)

२. सुन्दर लंका में प्रवेश कर दुष्ट राक्षसों को नष्ट करने वाले उनके शौर्य का मंगल हो!
दण्डकारण्य के ऋषियों की शरणागति में भगवान लज्जित होते हैं एवं कहते हैं कि मुझे पूर्व ही में ही आकर आप लोगों की रक्षा करनी चाहिए थी किन्तु आपको ही आना पड़ा, इस कारण मैं लज्जित हूँ| विभीषण 100 योजन का सागर पार कर आये और उन्हें क्षण भर विलम्ब हुआ तो भगवान ने क्षमा मांगी| किन्तु सोचो तनिक की भगवान किंतने युगों से हमारी प्रतीक्षा कर रहे हैं| वह हमें प्राप्त करने हेतु ही कितनी दूर आये हैं| श्रीवैकुण्ठ से क्षीराब्धि, फिर अयोध्या और अयोध्या से लंका| नंगे पैर घने जंगल एवं पर्वतों को पार करते हुए इनके अति सुकुमार चरणों को कितना कष्ट हुआ होगा| ओह! यह तो त्रिविक्रम अवतार से भी अधिक पीड़ा दे रहा है गोपियों को|
गोपियाँ कैकेयी की तरफ नाराजगी से देखती हैं| पराशर भट्ट जी कहते हैं, “हे राम! आपके ये चरण आपकी नहीं अपितु आपके भक्तों की संपत्ति हैं| और आप अपने चरणों को एवं अम्माजी के चरणों को इस प्रकार कष्ट दे रहे हैं? आपको ऐसा अधिकार नहीं है| वापस आ जाईये|”
(जिस प्रकार आपने रावण का नाश किया, हमारे दुखों को भी नष्ट कर दो न! जैसे विभीषण को स्वीकार किया, हमें भी स्वीकार करो कृष्ण!)

- अपने पाद प्रहार से दुष्ट शकटासुर को नष्ट करने वाले आपकी कीर्ति का मंगल हो!
यह तो महाबली और रावण की तुलना में भी अधिक चिन्तादायक है| ये असुर तो रक्षक बनकर छुपकर वार करने वाला था| राम के आसपास तो महारथी थे किन्तु कृष्ण के आसपास तो भोले-भाले गोप-गोपियाँ हैं| उनकी रक्षा कौन करेगा? किन्तु कृष्ण के चरण केवल भक्तों के ही रक्षक नहीं हैं अपितु स्वयं कृष्ण के भी रक्षक हैं’| जैसे राम के कन्धों पर धनुष के चिन्ह हैं, वैसे हीं कृष्ण के चरणों में शकटासुर को प्रहार से मारने का चिन्ह है| इससे आपकी जो कीर्ति हुयी, उसका मंगल हो!

- बछड़े के रूप में आये वत्सासुर एवं कपित्थ वृक्ष के रूप में कपित्थासुर को मारने वाले आपके चरणों का मंगल हो!
कृष्ण ने वत्सासुर को उठाया और उस कपित्थ वृक्ष पर दे मारा| दोनों की मृत्यु हुयी|
कृष्ण से अत्यंत प्रेम करने वाली गोपियाँ उनकी सुरक्षा के प्रति चिन्तित हो जाती हैं और मंगल गाती हैं|

- छत्र की तरह गोवर्धन को धारण कर अभीरों की रक्षा करने वाले आपके कारुण्य गुण का मंगल हो!
बाकि लोग तो कम से कम दैत्य थे, भगवान से द्वेष रखने के कारण भगवान को क्षति पहुँचाना चाहते थे| किन्तु ये इन्द्र तो भगवान का भक्त था| वो भी भगवान को क्षति पहुचाने की चेष्टा किया| अब तो भक्तों से भी कृष्ण की सुरक्षा करनी होगी|
किन्तु कृष्ण ने समस्त गोप समाज की रक्षा की| इन्द्र का भी अपराध भयंकर था किन्तु उसे मृत्यदंड नहीं दिया कृष्ण ने अपितु आशीष ही दिया| ऐसे आपके कारुण्य गुण का मंगल हो!
- आपके हस्त में विराजमान आपके भल्लायुध (शक्ति अस्त्र) का मंगल हो!
गायों को जंगली जानवरों से रक्षा हेतु कृष्ण अपने हस्त में भाला रखते हैं| यदि लोग यह जान गए कि कृष्ण ने गोवेर्धन पर्वत उठाया है तो उसे बुरी दृष्टि डालेंगे| इसलिए बोल रहे हैं कि ये सब तो कृष्ण की भाला ने किया है|
“हम यहाँ आपके वीरत्व सौम्यत्व करुणा का गुणानुवाद और मंगलाशासन करने आयी हैं , हम पर कृपा करते हुये, आपके कैंकर्य में रत रहने की शक्ति हमें प्रदान करिये “


