तिरुप्पावै 25

25 वीं गाथा में गोदाम्बा अब अवतार रहस्य ज्ञान के विषय में बताती हैं। भगवान को व्यामोहशील/प्रेम-मूर्ति श्रीपति कहकर सम्बोधित करती हैं एवं श्री देवी के समान ही कैंकर्य की प्रार्थना करती हैं।

ऋषि भगवान के लिए ‘आविर्भाव’ शब्द प्रयोग करते हैं। वो समझते हैं कि भगवान के लिए ‘जन्म’ शब्द का प्रयोग करना भगवान के परत्व के अनुरूप नहीं होगा।

किन्तु आळ्वार एवं गोदाम्बा यह सोचते हैं कि ‘आविर्भाव’ शब्द के प्रयोग से भगवान का ‘सौलभ्य’ ही नष्ट हो जाएगा। वैकुण्ठनाथ का विशेष गुण है परत्व। किन्तु अवतारों का विशेष गुण है ‘सौलभ्य’ एवं ‘सौशील्य’। अक्रूर, मालाकार जैसे परम भक्तों के लिए सुलभ होने हेतु ही भगवान अवतार लेते हैं (परित्राणाय साधूनां)। दुष्टों का विनाश प्रमुख प्रयोजन नहीं है (विनाशाय च दुष्कृताम्)। बाकि शिशु तो 9 महीने माता के गर्भ में रहते हैं किन्तु कन्हैया 12 महीने देवकी के गर्भ में रहे। दुग्ध पान उन्होंने यशोदा के स्तन का किया, इसलिए वो भी माता हुईं।

भगवान को पुत्र रूप प्राप्त करने हेतु 4 लोगों ने तपस्या की। इस प्रकार भगवान के 2 माता एवं 2 पिता हुए।

श्रृंखला : तिरुप्पावै (गोदा देवी जी का दिव्य व्रत)

श्री उ वे रंगदेशिक स्वामी द्वारा विरचित ‘गोदा गीतावली’ से:

श्री उ वे भरतन् स्वामी द्वारा अनुगृहीत 25वीं गाथा का संस्कृत छन्दानुवाद:

२५.एकस्या मातुरुद्भूय निशीथिन्यां तदैव हा।
अन्यस्या आत्मजो भूत्वा वर्धमाने रहस्त्वयि ।।।
असहिष्णुस्ततः कंसो मतिं चक्रे तवाहिते।
विफलां तां मतिं कृत्वा कुक्षौ तस्याग्निवत्स्थित !

अतिव्यामोहशालिन् ! त्वां प्रार्थयन्त्यो निजाशिषम्।
समायाता वयं बाला यदि भेरीं ददासि नः ।।
श्रियाऽभिलष्यमाणां ते सम्पदं वीरकर्म च ।
गीत्वा शोकाद्विनिर्मुच्य भविष्याम: प्रहर्षिताः ।।

श्री सीतारामाचार्य स्वामीजी द्वारा विरचित हिन्दी छन्द

**ओरुत्ति मगनाय्प् पिऱन्दु ओर् इरविल्:-
“एक रात्री को एक माता का पुत्र बन जन्म लेकर”

एक कहने का अर्थ है ‘अद्वितीय’। जैसे ‘दया के एक सिंधु’ कहने का अर्थ है ‘दया के अद्वितीय सिन्धु’।

हमारा जन्म कर्म-कृत होता है जबकि भगवान स्वयं अपने संकल्प से जन्म लेते हैं। हम पंच-भूत से बने प्राकृत शरीर धारण करते हैं जबकि भगवान का शरीर स्वयं-प्रकाश अप्राकृत तत्त्व से निर्मित होता है। हमारा जन्म हमारे भगवान से विलग होने का कारण बनता है जबकि भगवान का जन्म का उद्देश्य हमें प्राप्त करना होता है।

इसलिये भगवान के जन्म के लिए ‘अद्वितीय’ शब्द का प्रयोग उचित है।

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।

त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन।।4.9।।

किन्तु आसुरी स्वभाव के लोग भगवान के जन्म को साधारण ही समझते हैं।


सामान्य तौर पर विद्वान जन भगवान के परत्व का ध्यान कर भगवान के लिए ‘जन्म लेना’ न कहकर ‘आविर्भाव होना’ कहते हैं। किन्तु गोदाम्बा भगवान के सौलभ्य का अनुभव करते हुए ‘जन्म लेना’ ही कहती हैं। पूर्व में वो भी “गोप कुल में आविर्भूत होने वाले” ऐसा कह चुकी हैं। किन्तु अब जब उन्हें भगवान के सौलभ्य के दर्शन हुए तो ‘जन्म लिए’ ऐसा ही कहती हैं।

अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्।

परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्।।9.11।।

देवकी अद्वितीय कैसे हैं? जिस माता के गर्भ में भगवान 12 मास रहे, वो अद्वितीय ही हैं। ऐसे भी पुत्र होते हैं जो माता पिता की बात नहीं सुनते किन्तु कृष्ण तो जन्म लेते ही माता की आज्ञा का परिपालन करने लगते हैं। जब देवकी ने कहा, “अपने इस चतुर्भुज रूप का उपसंघार करो वरना कंस जान जाएगा।” तब कंस वध के पश्चात कृष्ण चतुर्भुज ही रहे।

रात्रि किस प्रकार अद्वितीय है? जिस प्रकार जन्म लेते ही लीलाएँ करते हैं, वो रात्रि ही अद्वितीय हो गयी।

**ओरुत्ति मगनाय् ओळित्तु वळरत्

उसी रात्री को अन्य अद्वितीय माता (यशोदा) के पुत्र बनकर।

यशोदा भी अद्वितीय हैं क्योंकि जिस प्रकार बाल-लीलाओं का यशोदा ने अनुभव लिया, वैसा किसी अन्य माता ने नहीं। नरसिंह अवतार में उनकी माता तो एक खम्भा थी। हरि अवतार में गज की रक्षा हेतु सीधे वैकुण्ठ से गरुड़ छोड़कर आ गए। राम भी मर्यादा पुरुषोत्तम थे। किन्तु कृष्ण तो लीला पुरुषोत्तम हैं।

गोदाम्बा ‘देवकी एवं यशोदा’ का नाम न लेकर केवल ‘एक माता’ कहती हैं क्योंकि उन्हें कृष्ण की सुरक्षा के लिए कंस का भय है।

**तरिक्किलानागित् तान् तीन्गु निनैन्द
करुत्तैप् पिळैप्पित्तुक् कन्जन् वयिऱ्ऱिल्

तुम गोकुल में सुखपूर्वक पल रहे थे, यह कंस को बर्दाश्त नहीं हुआ और उसने आपको मारने के अनेक यत्न किये।

यहाँ पूतना, केशि, चाणूर आदि का स्मरण होता है। कृष्ण ने अनायास ही कंस के सारे योजनाओं एक-एक करके नष्ट कर दिया।

**नेरुप्पेन्न निन्ऱ

उसके ही पेट की अग्नि बन उसे नष्ट कर दिया।

अर्थात कंस को भयङ्कर भय हुआ। जो भय वो दूसरों को देता था, उससे कहीं अधिक भय में वो जीता रहा और अंततः मारा गया। अथवा, उसके ही क्षेत्र में आकर उसे नष्ट कर दिया कृष्ण ने।

**नेडुमाले : हे व्यामोहनशील! प्रेम-मूर्ति

आपने ये सभी कष्ट (पूतना, कंस आदि) सहे, हमारे प्रति आपके प्रेम के कारण।

**उन्नै अरुत्तित्तु वन्दोम्

हम यहाँ आपसे माँगने आयी हैं, अथवा, आपको ही मांगने आयी हैं।
कल्पवृक्ष से जो मांगो वो मिल जाता है किन्तु यदि कल्पवृक्ष को ही मांग लो तो वो नहीं दे सकता। किन्तु भगवान से तो जो भी वस्तु माँग लो वो भी देते हैं, एवं स्वयं भगवान को ही मांग लो तो अपने आप को भी प्रदान कर देते हैं।

**पऱै तरुदि आगिल्

तुम हमें भेरी अर्थात कैंकर्य दोगे।

**तिरुत्तक्क सेल्वमुम्

श्री देवी का के आप धन जिस प्रकार हैं। अर्थात जिस प्रकार श्री देवी के श्री (श्रिय: श्री) आप हैं, हमें भी वही कैंकर्य चाहिए।

**सेवगमुम्

और उस कैंकर्य को करने की शक्ति।

याम् पाडि वरुत्तमुम् तीर्न्दु

हम आपके गुणों का कीर्तन करेंगी।

मगिळ्न्दु एलोर् एम्बावाय्

तो हम आपके विश्लेष के दुख से जो पीड़ित रही हैं, वो दूर हो जाएगा।

स्वापदेश

श्री वैष्णवों के भी दो जन्म होते हैं। एक भगवान की अहैतुकी कृपा से माता के गर्भ से जन्म। दूसरा आचार्य मुख से अष्टाक्षर महामंत्र श्रवण करने के बाद। श्री मन्त्र से हमारा पुनर्जन्म होता है एवं द्वय मन्त्र के अनुसन्धान से हम बड़े होते हैं।

परकाल सूरी कहते हैं कि मेरा तब जन्म नहीं हुआ था। किन्तु जब से जन्म हुआ, तबसे मैं उसे भूल नहीं पाया। अतः आचार्य समाश्रयन के पश्चात दूसरा जन्म ही वास्तविक जन्म है। कंस की भाँति संसार भी हमारे शेषत्व स्वरूप का वध करना चाहता है। किन्तु भगवान उसे नष्ट कर हमें अर्चिरादि मार्ग से प्रयाण कराते हैं।

इस गाथा में रामानुज स्वामी के चरित्र का अभी अनुसन्धान करते हैं।

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Author: ramanujramprapnna

studying Ramanuj school of Vishishtadvait vedant

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