गोदाम्बा ने भगवान का मंगलाशासन किया, अवतार रहस्य ज्ञान से उनकी प्रशंसा की तो प्रसन्न होकर उनके आने का प्रयोजन पूछते हैं। यद्यपि पूर्व में भी गोदाम्बा ने कहा है कि हम आपसे भेरी अर्थात कैंकर्य माँगने आये हैं किन्तु भगवान उनसे उनके व्रत के विषय में पूछते हैं। व्रत तो व्याज/बहाना है। बृद्ध गोपों ने इसी व्रत के कारण गोपियों को कृष्ण से मिलने की अनुमति दी है। इसलिए कृष्ण भी व्रत के एच्छित सामग्रियाँ पूछती हैं।
श्रृंखला : तिरुप्पावै (गोदा देवी जी का दिव्य व्रत)
माले मणिवण्णा मार्गळि नीर् आडुवान्
मेलैयार् सेय्वनगळ् वेण्डुवन केट्टियेल्
ग्यालत्तै एल्लाम् नडुन्ग मुरल्वन
पाल् अन्न वण्णत्तु उन् पान्चसन्नियमे
पोल्वन सन्गन्गळ् पोय्प्पाडु उडैयनवे
सालप् पेरुम् पऱैये पल्लाण्डु इसैप्पारे
कोल विळक्के कोडिये विदानमे
आलिन् इलैयाय् अरुळ् एलोर् एम्बावाय्
श्री उ वे रंगदेशिक स्वामीजी द्वारा विरचित ‘गोदा-गीतावली’ से

श्री उ वे मीमांसा शिरोमणि भरतन् स्वामी द्वारा अनुगृहीत 26वीं गाथा का संस्कृत छन्दानुवाद:
श्रितेषु वत्सल! स्वामिन् ! इन्द्रनीलाभकान्तिमन्!।
पूवैराचरितायास्मै मार्गशीर्षाप्लवाय नः ।।
अपेक्षितानि वस्तूनि कथ्यन्ते शृणुतादयि ! ।
बृहत्तमाश्च सर्वस्या जगत्याः कम्पदस्वनाः।।
पय:समानवर्णात्वत्पाञ्चजन्याभकम्बवः ।
सुमहद् भेरिवाद्यं च मङ्गलस्तुतिगायकाः ।।
रम्यदीपो ध्वजोल्लोचौ सर्वमेतदपेक्षितम् ।
कृपया परया देहि वटपत्रपुटेशय ! ।।२६।।
श्री उ वे सीतारामाचार्य स्वामीजी द्वारा विरचित हिन्दी छन्द


**माले: इसके तीन अर्थ हो सकते हैं। व्यामोह/प्रेम, बहुत बड़ा और श्यामल
प्रसंग से व्यामोह अर्थ लेना ही उचित है। किन्तु भगवान को ‘व्यामुग्ध’ बोलना चाहिए। जिसे व्यामोह होता है उसे व्यामुग्ध कहते हैं। किन्तु गोदाम्बा कृष्ण को ‘व्यामोह’ या ‘प्रेम’ कहती हैं।
आचार्यजन इसे समझाते हैं। जैसे पाक में नमक अधिक हो तो कहते हैं कि ये पाक नहीं, नमक ही है। कोई व्यक्ति अत्यन्त क्रोधी हो तो उसका नाम ही क्रोध रख देते हैं। उसी भगवान में भक्तों के प्रति व्यामोह इतना विशेष है कि उनका नाम ही हो गया है: “व्यामोह”।
सहस्रागीति में शठकोप आळ्वार भगवान के प्रति अपने प्रेम का वर्णन करते हुए कहते हैं कि ये तीनों सागर से भी अधिक बड़ा है। आगे जाकर कहते हैं कि ये जीवात्मा से भी बड़ा है। फिर अन्त में कहते हैं कि ये तो भगवान के सर्व-व्यापक स्वरूप से भी बड़ा है। अर्थात उत्तरोत्तर उनका प्रेम बढ़ता जाता है और वो पर-भक्ति, पर-ज्ञान की अवस्था से आगे जाकर परम भक्ति की अवस्था में आ जाते हैं।
फिर वो भगवान को उनकी सौगन्ध देते हुए कहते हैं कि तुम मुझे अपना लो, मैं तुमसे इतना प्रेम करता हूँ कि तुम्हें खा जाऊंगा। किन्तु जब उन्हें भगवान के दर्शन होते हैं और वो भगवान का उनके लिए प्रेम देखते हैं तो द्रवित होकर पिघल जाते हैं। कहते हैं कि मैं तो सोचा था कि भगवान को खा जाऊँगा लेकिन वो तो मुझे पी गए। खाने के अपेक्षा पीना अधिक सरल होता है। अर्थात भगवान का जीवात्मा के प्रति प्रेम, जीवात्मा का भगवान के प्रति प्रेम से कहीं अधिक है।
भगवान के इसी व्यामोह का दर्शन करते हुए गोदाम्बा उन्हें ‘व्यामोह कृष्ण’ कहती हैं।
यहाँ भगवान के शरणागत-वत्सल होने का अनुसंधान करना चाहिए। पूर्व गाथा में अवतार रहस्यज्ञान के विषय में बोला गया। भगवान के अवतार लेने के पीछे उद्देश्य तो एक ही है: जीवात्म-प्राप्ति।
**मणिवण्णा: मणि के समान वर्ण वाले। अर्थात नीला।
आकाश और सागर को नीला रंग का क्यों कहते हैं? क्योंकि वो अत्यन्त विशाल हैं। किन्तु भगवान से अधिक विशाल क्या होगा?
अथवा मणि के समान बहुमूल्य, तेजस, भयहरण आदि गुणों वाले।
माले से कहा गया कि शरणागत-वत्सल भगवान जीवात्म से इतना प्रेम करते हैं कि उन्हें प्राप्त करने हेतु संसार में आते हैं।
अब कहती हैं कि तुम हमें प्रेम न करो फिर भी तुम्हारे सौन्दर्य से वशीभूत हम तुम्हें नहीं छोड़ सकतीं।
**मार्गळि नीर् आडुवान्
हम मार्गशीर्ष अवगाहन स्नान का व्रत करेंगी।
ये व्रत क्या है?
मेलैयार् सेय्वनगळ्
ये व्रत तो अत्यन्त प्रसिद्ध है। हमारे पूर्वजों ने किया है (द्वापर की गोपियाँ)। स्नान का व्यंगार्थ भगवान का गुणानुभव है।
कृष्ण कहते हैं कि ठीक है, व्रत के हेतु तुमलोग सामग्री माँगने आये हो न। क्या चाहिए?
यहाँ व्यंगार्थ अत्यन्त महत्वपूर्ण है। पूर्व में कहा था कि जो पूर्वजों ने नहीं किया है वो हम नहीं करेंगी (सैय्यादन सैयोम) और अब कह रही हैं कि जो पूर्वजों ने किया, वैसा ही करेंगी। अर्थात जैसा शिष्टाचार है वही करेंगी, उसके विपरीत कुछ भी नहीं करेंगी।
**ग्यालत्तै एल्लाम् नडुन्ग मुरल्वन
पाल् अन्न वण्णत्तु उन् पान्चसन्नियमे
पाञ्चजन्य के समान श्वेत शङ्ख, जिसकी नाद पूरा संसार सुने।
(पाञ्चजन्य के समान दूसरा क्या हो सकता है? अर्थात पाञ्चजन्य ही चाहिए। और भगवान पाञ्चजन्य से दूर कैसे रह सकते हैं? अर्थात भगवान, तुम स्वयं को हमें दे दो।)
** सालप् पेरुम् पऱैये
जोर से आवाज करने वाला ढोल चाहिए।
(अर्थात कैंकर्य)
**पल्लाण्डु इसैप्पारे
आपका मंगलाशासन करने वाले लोग चाहिए
(अर्थात गरुड़ आदि नित्य सूरी वर्ग)
**कोल विळक्के कोडिये विदानमे
मङ्गल दीप, ध्वजा और वितान चाहिए
(आचार्य इसका व्यंगार्थ ज्ञान, वैराग्य और भक्ति कहते हैं।)
अथवा, मङ्गल दीप अर्थात नप्पिनै देवी, ध्वजा अर्थात गरुड़ जी और वितान अर्थात अनन्त शेष जी।
इन सबके के साथ, अनवधिक परिजन परिचारकों के साथ, दिव्य आयुधों को धारण किये आप ही चाहिए।
**आलिन् इलैयाय् अरुळ्
हे वटपत्रशायी! कृपा करके ये सब प्रदान कीजिये
वटपत्रशायी लीला अचिन्त्य है। जब तीनों लोकों को आपने अपने उदर में खा लिया था तो आप किस प्रलय जल पर लेटे थे। तीनों लोक आपके भीतर और प्रलय जल के ऊपर।
फिर आपके लिए हमारे एच्छित वस्तुएँ देना कोई बड़ी बात तो नहीं है कृष्ण!

