गोविन्द नाम से सम्बोधन, घृतपूरित क्षीरान्न का भोग लगाती हैं एवं कृष्ण से सायुज्य माँगती हैं। गोपियाँ अपने लिए विभिन्न आभूषण माँगती हैं।
आज 27वीं गाथा में गोदाम्बा भगवान को अक्कार-अडिसल नामक क्षीरान्न का भोग लगती हैं। इसकी सामग्री एवं विधि स्वयं इस गाथा में बताती भी हैं। इसका गूढ़ार्थ ‘सायुज्य‘ है। पूर्व में वो सालोक्य तो प्राप्त कर ही चुकी हैं। ‘सारूप्य’ 26वीं गाथा में मिल गया। सारूप्य अर्थात भगवान के समान रूप का हो जाना। चतुर्भुज होकर शङ्ख-चक्र धारण किये होते हैं नित्य और मुक्त।
सायुज्य का अर्थ है भगवान से जुड़ जाना। किस प्रकार? जैसे अक्कार-अडिसल में दूध, घी, चावल और गुड़ मिल जाता है। उनके एक दूसरे से पृथक कर पाना सम्भव नहीं है। मुक्ति की अवस्था में जीवात्मा और परमात्मा की यही अवस्था होती है। जीवात्मा के भोग्य परमात्मा होते हैं एवं परमात्मा के भोग्य जीवात्मा। दोनों ऐसे घुल-मिल जाते हैं मानों दो नहीं एक हों। यही सायुज्य आज गोदाम्बा को प्राप्त होता है।
कूडारै वेल्लुम् सीर्क् गोविन्दा उन्दन्नैप्
पाडिप् पऱै कोण्डु याम् पेऱु सम्मानम्
नाडु पुगळुम् परिसिनाल् नन्ऱाग
सूडगमे तोळ् वळैये तोडे सेविप्पूवे
पाडगमे एन्ऱु अनैय पल् कलनुम् याम् अणिवोम्
आडै उडुप्पोम् अदन् पिन्ने पाल् सोऱु
मूड नेय् पेउदु मुळन्गै वळिवार
कूडि इरुन्दु कुळिर्न्दु एलोर् एम्बावाय्
श्री उ वे रंगदेशिक स्वामीजी द्वारा विरचित गोदा-गीतावली से:

श्री उ वे सीतारामाचार्य स्वामीजी द्वारा विरचित हिन्दी छन्द

श्री उ. वे. भरतन् स्वामी द्वारा अनुगृहीत 27वीं गाथा का संस्कृत छन्दानुवाद:
२७.शत्रुजिद्गुण! गोविन्द ! त्वां वै संकीर्त्य, भेरिकाम् ।
लब्ध्वाऽस्माभिः सभूश्लाघं प्राप्यः सम्मान उच्यते ।।
वलयाङ्गदताटङ्ककर्णपुष्पाङ्घ्रिभूषणम् ।
बहून्याभरणान्येवं वयं सम्यग्धरेमहि ।
क्षौमवस्त्रं वसित्वाऽथ क्षीरान्नं घृतपूरितम् ।
सङ्घीभूय मुदाऽद्याम कफोणिप्रवहद्घृतम् ।।


**कूडारै वेल्लुम् सीर्क् गोविन्दा: शत्रुओं को जीतने वाले गुण वाले गोविन्द!
किसी को अपने वीर्य, शौर्य पराक्रम से (जयन्त आदि) तो किसी को अपने प्रेम, सुशील्य, सौन्दर्य आदि से जीत लेने वाले भगवान गोविन्द।
गोपियाँ भी पूर्व में ‘कूडार’ थीं। किन्तु भगवान की भोग्यता ने उन्हें जीत लिया और वो प्रेम-परवश होकर उनके महल में आ चुकी हैं।
गोविन्द नाम से भगवान के सौलभ्य का बोध होता है। तुम कोई वैकुंठाधीप या मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं हो अपितु हमारे साथ अभीरों के कुल में उत्पन्न हुए हो।
भगवान की प्रथम कृपा है भगवान के प्रति द्वेष भाव का नष्ट होना| अद्वेष के बाद आभिमुख्य एवं सात्त्विक-सम्भाषण आदि प्राप्त होते हैं| आज जो हम स्वयं को भगवान का भक्त कहकर गर्व अनुभव करते हैं, पूर्व काल में हम सभी भगवान के प्रति शत्रुता रखते थे| भगवान ने हमें अपने रूप, गुण, कृपा आदि से जीतकर हमें भक्त बनाया है| इसमें हमें गर्व लेने जैसा कुछ नहीं है, यह भगवान की ही कृपा है|
**उन्दन्नैप् पाडिप् पऱै कोण्डु याम् पेऱु सम्मानम्
हम आपके गुण आयेंगी और आप हमें भेरी (कैंकर्य) दीजिये और सम्मानित कीजिये।
जब कोई जीवात्मा वैकुण्ठ में प्रवेश करता है तो भगवान नित्यो एवं मुक्तों की भी अवहेलना करते हुए उसे प्रेम करते हैं। जैसे कोई गैया अपने नए बछड़े की सुरक्षा हेतु अपने पुराने बच्चों को भी दूर भगाती है और झिड़क देती है।
**नाडु पुगळुम् परिसिनाल् नन्ऱाग
आप हमें ऐसा सम्मान दीजिये कि तीनों में लोग आश्चर्य करें।
(कि भगवान जीवों से कितना प्रेम करते हैं)
गोपियाँ को जो भी प्राप्त है वो भगवान की कृपा से ही प्राप्त है| इसलिए गोपियाँ अपने लिए सम्मान इसलिए माँग रही हैं ताकि भगवान का गौरव हो| गोविन्द जीयर को किसी ने विद्वान कहकर प्रशंसा किया तो उन्होंने स्वीकार किया कि हाँ मैं विद्वान हूँ| क्योंकि अपनी विद्वत्ता को रामानुज स्वामी की कृपा से प्रदत्त मानते हुए वो इसे रामानुज स्वामी की ही प्रशंसा मान रहे थे|
क्योंकि भगवान के अनुग्रह से ही प्रशंसापात्र बन गयी है । अतः ऐसी प्रशंसा के चाहने में और सुनने में कोई आपत्ति नहीं है ।दूसरी बात यह है कि यह प्रशंसा सुनकर कितने ही उदासीन एवं द्वेषी जन भी ऐसे सन्मान पाने के लिए भगवान में भक्ति करने लगेंगे ।
**पाडगमे एन्ऱु अनैय पल् कलनुम् याम् अणिवोम्
आपसे और नप्पिनै से हमें भांति भांति के आभूषण धारण को मिलते है, जैसे कंगन, बाजूबन्द, कुण्डल, कान में ऊपर की तरफ पहना जाने वाला आभूषण , पायल और भी अन्य।
(जीवात्मा के विरजा पर करने के बाद उसे सरोवर में स्नान करवाकर, अनेक प्रकार के सुगन्धित वस्त्र एवं आभूषण लक्ष्मी अम्मा भेजवाती हैं।)
**आडै उडुप्पोम् अदन् पिन्ने पाल् सोऱु
मूड नेय् पेउदु मुळन्गै वळिवार
कूडि इरुन्दु कुळिर्न्दु एलोर् एम्बावाय्
हम सब आप द्वारा प्रसादित वस्त्र धारण कर, हम सभी घी से तर अक्कारवड़ीसल (एक मीठा अन्न जो चांवल, दूध, गुड़ और घी के मिश्रण से बनता है) पायेंगे, जिसे पाते समय घी, हथेलियों से निकल कोहनियों से बहा रहा होता है ।
*एक मास तक घृत का सेवन गोपियों ने नहीं किया और श्रीकृष्ण भी अकेले इसका उपयोग न कर सके ।फलतः व्रज में घृत इतना इकट्टा हो गया की रखने के लिए जगह नहीं है इसलिए गोपियाँ कहती है की वह सब घृत क्षीरान्न में लगा दिया जाय ।*
*सभी दिव्य देशों में इतने दिन पोंगल का भोग लगता है और 27वे पाशुर के दिन उसमें वर्णन किये गये अनुसार घृत पूर्ण क्षीरान्न का भोग भगवान को लगाया जाता है ।*

चावल यदि जीव है तो दूध भगवान के कल्याण गुण। उसके ऊपर तैर रहा घी हमारा उमड़ रहा प्रेम है। दूध और चावल अर्थात ब्रह्म और जीव एक दूसरे का इस प्रकार आनन्द ले रहे हैं कि एक-दूसरे से सायुज हो चुके हैं।
सोഽश्नुते सर्वान कामां सह ब्रह्मणा विपश्चितेति ..|| 2.1.1 || तैतरीय उपनिषद
वो जीवात्मा ब्रह्म के साथ उसके सभी गुणों को भोग करता है।
यह भी स्मरण करना चाहिए:
अहमन्नमहमन्नमहमन्नम्। अहमन्नादो२ऽहमन्नादो२आहमन्नादः।
अहमन्नमन्नमदन्तमा३द्मि
जीवात्मा: मैं अन्न हूँ! मैं अन्न हूँ!
परमात्मा: मैं अन्न अन्नभोक्ता हूँ! मैं अन्नभोक्ता हूँ! मैं अन्नभोक्ता हूँ!
जीवात्मा: मैं मुझे खाने वाले को खा रहा हूँ।
इस प्रकार की दशा सायुज्य है जो आज गोदाम्बा को प्राप्त होता है।

श्री रामानुजाचार्य एवं आलवार आचार्य बताते हैं कि यह पाशुर कैंकर्य सिद्धांत को स्थापित करता है—मोक्ष का अर्थ भगवान की नित्य सेवा है। भगवान स्वयं भक्तों को अपने पास बुलाते हैं और सेवा का अधिकार देते हैं।
कोहनी से घृत गिरना इसका अर्थ है *आचार्य शिष्य परम्परा द्वारा भगवत भागवत आचार्य गुणानुवाद करना ।*
भूषणों का रहस्य –
चूड़ी – चूड़ी शब्द से हस्त का भूषण अंजलि मांगी जाती है । *आचार्य कृपा से सदैव अंजलिहस्त के साथ आपकी सेवा में रहे ।*
भुजभूषण ( बाजुबन्द ) – *शंख चक्राकंन ही दोनों बाहुओं के भूषण है* जो आचार्य कृपा से मिलते है ।
कान के कुण्डल – *कान का भूषण भगवत कथा और आचार्य वैभव श्रवण है ।*
पादभरण – भगवान और आचार्य सन्निधि में जाना ही पैरों का आभूषण है । *निरन्तर भगवत भागवत आचार्य सेवा करने का भाग्य माँगा जाता है ।*


