तिरुप्पावै 29

कल की 28वीं गाथा में गोदाम्बा जी की गोष्ठी नप्पिनै के पुरुषकार से एवं, अकिंचन और अनन्य-गति होकर कृष्ण की शरणागति किये। यह द्वय मन्त्र के पूर्वार्द्ध का मन्त्रार्थ है।

आज की 29वीं गाथा में भगवान का सर्वदेश, सर्वकाल, सर्वविध एवं सर्वावस्था कैंकर्य माँगा जाता है। यह कैंकर्य भी एकमात्र भगवान की प्रसन्नता के उद्देश्य से हो। इसमें हमारी स्वार्थ-बुद्धि नहीं हो।

अथवा पूर्व में अनन्यार्ह शेषत्व का निवेदन कर चुकी हैं। 28वीं गाथा में अनन्य शरणत्व और आज की 29वीं गाथा में अनन्य भोग्यत्व का प्रकाशन करती हैं।

श्री उ वे भरतन् स्वामी द्वारा अनुगृहीत 29वें पद का संस्कृत छन्दानुवाद:

२९.प्रत्यूष उपगम्य त्वां सेवित्वा, स्वर्णभास्वती ।
पदाम्भोजे तव स्तुत्वा प्रार्थ्यमानं फलं शृणु ।।
धेनुसंचारणाजीवे वंशेऽस्मिन्नवतीर्ण! भोः ।
त्वमन्तरङ्गकैङ्कर्यम् अस्मत् स्वीकर्तुमर्हसि ।।
अद्य भेरीमिमां लब्धुम् वयं गोविन्द ! नागताः।
अवतारेऽप्यजस्रं त्वत्सम्बन्धिन्यो भवाम हि।।
शेषवृत्तीश्च कुर्याम त्वत्प्रीत्येकप्रयोजनाः ।
कृपयैतद्विरुद्धान्नः कामानन्यान् निवर्तय ।।

तमिल मूल गाथा:

सिऱ्ऱम् सिऱु काले वन्दु उन्नैच् चेवित्तु उन्
पोऱ्ऱामरै अडिये पोऱ्ऱुम् पोरुळ् केळाय्
पेऱ्ऱम् मेय्त्तु उण्णुम् कुलत्तिल् पिऱन्दु नी
कुऱ्ऱेवल् एन्गळैक् कोळ्ळामल् पोगादु
इऱ्ऱैप् पऱै कोळ्वान् अन्ऱु काण् गोविन्दा
एऱ्ऱैक्कुम् एळेळ् पिऱविक्कुम् उन्दन्नोडु
उऱ्ऱोमे आवोम् उनक्के नाम् आट् सेय्वोम्
मऱ्ऱै नम् कामन्गळ् माऱ्ऱु एलोर् एम्बावाय्।।

श्री उ वे रंगदेशिक स्वामी द्वारा विरचित गोदा-गीतावली से
श्री उ वे सीतारामाचार्य स्वामीजी द्वारा विरचित हिन्दी छन्दानुवाद

**सिऱ्ऱम् सिऱु काले वन्दु
“प्रातः काल आकर हमलोग”

(भगवद-अराधना हेतु प्रातःकाल सर्वश्रेष्ठ होता है। इस काल में सत्त्व-गुण परिपूर्ण होता है। ‘ब्राह्मे मुहूर्ते उत्तिष्ठेत् स्वस्थो रक्षार्थमायुषः’। )
इस शरद ऋतु में प्रातःकाल ठंढे यमुना जल में स्नान करके हम आयी हैं।)

कन्हैया तो भोर होते ही गैया चराने चल जाता है। दोपहर को ऋषि पत्नियों के हाथ का भोजन करता है। देर शाम को गैयों के पीछे पीछे घर आता है। फिर नन्दजी के साथ बैठकर भोजन करता और खेलने निकल जाता है। उससे मिलना है तो ब्रह्म-मुहूर्त काल की श्रेष्ठ है।

**उन्नैच् चेवित्तु

“आपके दर्शन/सेवा हेतु”

(अपने सखियों को जगाकर, द्वारपालक एवं क्षेत्रापालक की आज्ञा लेकर, नन्दगोप, यशोदा एवं बलराम को उठाकर, नप्पिनै के पुरुषकार से आपके पास आये हैं।)

**उन् पोऱ्ऱामरै अडिये पोऱ्ऱुम्

“स्वर्ण कमल के समान सुन्दर और सुगन्धित आपके चरण कमलों के गुणगान करने आई हैं।”

इस प्रबन्ध के प्रारम्भ में, मध्य में एवं अन्त में मंगलाशासन है। अर्थात इस ग्रन्थ का उद्देश्य मंगलाशासन करना ही है।

**पोरुळ्
“हमारे वाँछित फल”

क्या गैयों के पीछे चलते-चलते तुम्हारी बुद्धि भी पशु-समान हो गयी है? हम कोई लौकिक पदार्थ माँगने नहीं आयी हैं। पूर्व में हमने जो ढोल आदि पदार्थ माँगे थे वो तो दिखावा मात्र थे। वरना वृद्ध गोपियाँ हमें कभी तुम्हारे पास नहीं आने देतीं।

ये व्रत तो तुमसे मिलने का व्याज मात्र है।

केळाय् : सुनो

कृष्ण गोपियों के प्रेम में इतने मग्न हैं, उन्हें एकटक से निहार रहे हैं । गोदा को उन्हें बोलना पड़ है कि तन्द्रा से जागो और सुनो।

**पेऱ्ऱम् मेय्त्तु उण्णुम् कुलत्तिल् पिऱन्दु नी
कुऱ्ऱेवल् एन्गळैक् कोळ्ळामल् पोगादु

“तुम हमारे ग्वाल कुल में जन्म लिए जो गाय चराकर पेट भरते हैं। आपको हमारी सेवायें प्राप्त करनी चाहिये।”

(तुम्हारे अवतार का उद्देश्य ही जीवात्म-प्राप्ति है। तुम यदि बैकुंठनाथ होते तो हम निर्बंध नहीं करते। लेकिन तुम तो हमारे साथी ग्वाल हो। सौलभ्य-परिपूर्ण हो। तुम न नहीं कह सकते।)

**कुऱ्ऱेवल् एन्गळैक् कोळ्ळामल् पोगादु

“तुम्हें हमें अस्वीकार नहीं करना चाहिए अपितु अंतरंग कैंकर्य प्रदान करना चाहिए”

(गोदाम्बा अन्तरंग कैंकर्य चाहती हैं। लक्ष्मण जी की तरह। बहिरंग कैंकर्य से को संतुष्ट नहीं होतीं।)

(भगवान से कुछ माँगते समय स्पष्ट होना चाहिए। देवकी ने सिर्फ पुत्र रूप में प्राप्ति मांगा था और यशोदा ने बाल लीला। दोनों को सिर्फ उतना ही मिला।)

**इऱ्ऱैप् पऱै कोळ्वान् अन्ऱु काण् गोविन्दा

“हे गोविन्द! हम यहाँ ढोल माँगने नहीं आयी हैं।”

(अब तो गोदाम्बा कहती आईं कि हमें ढोल/भेरी चाहिए। अब बोल रही हैं कि ढोल कहना तो सिर्फ आपके पास आने का बहाना था। गाँव के वृद्ध उन्हें कृष्ण के पास जाने नहीं देते। व्रत के बहाने ही वो राजी हुए हैं। अथवा, ढोल माँगना कैंकर्य का उपलक्षण है।)

**एऱ्ऱैक्कुम् एळेळ् पिऱविक्कुम् उन्दन्नोडु उऱ्ऱोमे आवोम्

“हम जितने भी जन्म लें, आपके साथ ही रहें।”

(चाहे वैकुण्ठ हो या कहीं और, हमें तुम्हारे साथ ही रहना है, तुम्हारा अन्तरंग कैंकर्य करना है। अन्तरंग कैंकर्य का अर्थ है साथ में रहकर प्रत्यक्ष रूप से कैंकर्य करना। श्री वैष्णवों के लिए यही अभीष्ट है कि आचार्य के पास रहकर उनकी सेवा करें। दूर रहकर बहिरंग कैंकर्य यदि आचार्य आज्ञा दें तभी।

आप वैकुण्ठ में हो तो वहाँ अनेक शरीर धारणकर आपकी सेवा करें। आप अवतार धारण करें तो वहाँ भी हम आपके साथ हों। लक्ष्मण जी की भाँति। भगवान वेंकटेश हैं तो वो वेंकट पर्वत। भगवान रंगनाथ हैं तो वो रामानुज। आदि रूपों से।)

** उनक्के नाम् आट् सेय्वोम्

“तवैव दास्यं करवाम। हम केवल आपकी ही दासता करें।”

(आपकी ही करें कहने का अर्थ सिर्फ इतना नहीं कि आपके अतिरिक्त अन्यों की सेवा न करें। अपितु यह कि “आपकी प्रसन्नता हेतु ही आपका कैंकर्य करें।” यहाँ कैंकर्य में स्वार्थ-बुद्धि का निषेध किया जाता है। अपनी इच्छा से या अपनी प्रसन्नता हेतु हम भगवान की सेवा नहीं करते। एकमात्र उद्देश्य भगवान की प्रसन्नता, उनका मुखोल्लास है।

‘तुम्हारे सुख के लिए ही’ – ऐसा कहने इस बुद्धि का खण्डन हो गया तुम्हारी भी प्रसन्नता और मेरी भी प्रसन्नता हेतु कैंकर्य हो। एकमात्र भगवान की मुखोल्लास हेतु कैंकर्य करना है।

कैंकर्य करते समय हम प्रसन्न भी इसी कारण होंगे कि हमें प्रसन्न देखकर भगवान भी प्रसन्न होंगे। हम यदि उदास मुझ से सेवा करेंगे तो भगवान को आनन्द नहीं आएगा।)

**मऱ्ऱै नम् कामन्गळ् माऱ्ऱु

“हमारी अन्य सभी कामनाओं को परिवर्तित कर दो।”

(गोदाम्बा यहाँ कामनाओं को नष्ट करने की बात नहीं करती। कामनाओं को नष्ट करना विनाशकारी हो सकता है। कामनाओं को दबाएं नहीं अपितु उन्हें भगवान की तरफ मोड़ दें। उदाहरण के लिए यदि पुत्र से आसक्ति हो तो पुत्र को भगवान का उपहार और उसे भगवत-प्राप्ति के मार्ग में लगाने को अपना कर्तव्य समझें। यदि सुस्वादु भोजन में रुचि आये तो उसे भगवान को समर्पित करें और भगवान की प्रसन्नता हेतु सुस्वादु खाना पकाएं।)

(हम प्रातःकाल सत्त्वगुण से पूर्ण होने के कारण निःस्वार्थ कैंकर्य माँग रहे हैं। यदि बाद में तमोगुण के प्रभाव में कुछ स्वार्थ माँग भी लें तो उसे अपनी कृपा से परिवर्तित कर दें।)

स्वापदेश:

गोविन्द: नारायण

उनक्के नाम् आट् सेय्वोम् : आय (कैंकर्य प्रार्थना)

मऱ्ऱै नम् कामन्गळ् माऱ्ऱु : नमः (स्व-भोग्यत्व निवृत्ति)

किंकर वो होता है जो कैंकर्य प्रार्थना करता है: ‘किं करवाणि’ (मैं क्या सेवा कर सकता हूँ।) अपने मन-मर्जी से कुछ भी करना कैंकर्य नहीं है। हमारा स्वरूप सिर्फ कैंकर्य-प्रार्थना करना है। क्या कैंकर्य देना है, ये भगवान/आचार्य का अधिकार है।

शेष वही होता है, जो कैंकर्य प्रार्थना करे। इस कारण ‘कैंकर्य प्रार्थना’ करना हमारा स्वरूप ही है।

किन्तु प्रार्थना क्यों करें?

जिस प्रकार माता का पुत्र बहुत काल से बीमार हो, कुछ खाता पिता न हो। किन्तु जब वह स्वस्थ होता है और माँ से बोलता है कि खाना दो, तब माँ को कितनी प्रसन्नता होती है! यदि बच्चा न माँगे, फिर भी माता खाना अवश्य देगी। डाँटकर भी खिलाएगी। किन्तु जब बच्चा स्वयं खाना माँगे तो माँ को अतिशय प्रसन्नता होती है।

हम भी अनेक काल से भगवान के द्रोही थे। जब हम कैंकर्य प्रार्थना करते हैं तो भगवान को प्रसन्नता होती है। भगवान के इसी प्रसन्नता हेतु हमें नित्य ही कैंकर्य प्रार्थना करना है।

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Author: ramanujramprapnna

studying Ramanuj school of Vishishtadvait vedant

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