तिरुपावै पहला पासुर

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मार्घळित्तिंगळ – वैष्णव मार्घळि (मार्गशीर्ष) मास
मदि निरइंद नन्नाळाल – पवित्र पूर्णमासी

कठोपनिषद (1. 3. 4) अपने इस उद्घोष से सबको जगा रहा है:
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ।
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ।। 

(उठो, जागो, और जानकार श्रेष्ठ पुरुषों के सान्निध्य में ज्ञान प्राप्त करो । )

इस पद में कुछ गोपियां श्री आयरपाडि (गोकुल) की बाकी की गोपियों को, जो कुल मिला कर पांच हजार मानी गई हैं, भोर में जल्दी जगा रहीं हैं, ताकि वे सब मिलकर श्री कृष्ण से जीवन के पुरुषार्थों के प्रतीक परई (ढोल) की प्राप्ति करें। यहां हम परम पथ पर अपने जैसे साधकों के साथ रहने, जिसे सत्संग कहा जाता है, के सिद्धांत से परिचित हो रहे हैं। पिछले दिन प्रभु सब गोपियों के साथ देर तक खेलते रहे, और फिर उनसे कहा, “कल सवेरे आना। और सबके साथ आना। ”
कुछ गोपियाँ ऐसी थी जो ज़रा भी नहीं सोईं। वे आपस में यह विमर्श करने लगीं कि कल कृष्ण से मिलने के बाद क्या करेंगे। कुछ गोपियाँ कृष्ण से होने वाले भावी मिलन के अनिर्वचनीय सुख की प्रत्याशा में ही बेहोश हो गिरीं। वे सवेरे उठ न पाईं। कुछ गोपियाँ दर्पण के आगे घंटो खड़ी रहीं, और अपने श्रृंगार में विविध बढ़ाव घटाव करने लगीं, जिसका एकमात्र लक्ष्य कृष्ण को सुखी करना था। गोदा महारानी इन सब को उठा रहीं है, ये सोचते हुए की कृष्ण उनको तबतक नहीं अपनाएंगे जबतक वे सब के सब साथ जाएं।

यहाँ श्रीवैष्णव मत के एक विलक्षण सिद्धांत पर प्रकाश डाला गया है : भगवान के पथ पर अकेले चलना उतना उत्तम फलदायक नहीं है जितना उन पथ पर अन्य साधकों को साथ लेकर चलना है। सांसारिक सुखों के विपरीत, जो कि बांटने पर घाट जाया करते हैं, आध्यात्मिक सुख बांटने से बढ़ जाता है
मदि – चन्द्रमा/ ह्रदय/ बुद्धि; निरइंद – पूर्ण; नन्नाळाल – पवित्र

पूर्णिमा तिथि शुभ तथा भक्ति सम्बंधित कार्यों को शुरू करने के लिये उत्तम तिथि मानी गयी है। साथ ही, पूर्णचन्द्र की चांदनी में सब गोपियाँ एक दूसरे को देख सकती हैं और समूह में जाकर श्री प्रभु के संग का लुत्फ़ उठा सकती हैं। क्योंकि इन सब गोपियों की मुखाकृति पूर्णचन्द्र के सदृश है ही, अतः समस्त प्रदेश में शतशः पूर्णचन्द्रों का ौदय हो गया है! “नन्नाळाल” शब्द से बोध हो रहा है की बीते दिन दुःखद रहे, क्योंकि वे श्री कृष्ण से विरह में बिताए गए|

जब श्री दशरथ श्री राम प्रभु का पट्टाभिषेक करने के लिए उद्यत हुए, तो वशिष्ठ मुनि ऐलान करते हैं की ऐसा कोई भी क्षण जिसमे श्री राम को राजा बनाया जाएगा, वही क्षण स्वतः अपने आप में ही परम पवित्र और कल्याणकारी बन जाएगा। वाल्मीकि मुनि इस चित्रा नक्षत्र को परम पवित्रतम घोषित करते हैं। और देखा जाए तो शुभ व्यक्तियों के लिए सब कुछ शुभ ही बन जाता है। मार्गशीर्ष महीना शुभ है, शुक्ल पक्ष भी उपस्थित है और चांदनी भी पूर्ण है जिसमे श्री कृष्ण का आनंद लिया जाए सके। आत्मा के लिए वही दिन परम पवित्र बन जाता है जिस दिन वह हरि शरणागत हो जाती है। जब अक्रूर जी को कंस ने वृन्दावन से श्री बलराम और श्री कृष्ण को लाने भेजा, तो प्रभु को देखने के ख़याल से ही वे नाचने लगे। आह! क्या अद्भुद भगवद प्रेम है!

आतंरिक अर्थ:
मदि का अर्थ ह्रदय भी होता है| मदि निरइंद नन्नाळाल का अर्थ हुआ जब ह्रदय में कोई कलंक या संकोच विचार न हो, जब पूरा ह्रदय प्रभु के समागम को उत्सुक हो, मन में कोई अन्य कामना न हो| यह पासुर काल का पराश्रय और गोपिओं की विलक्षनता और विशेषता बता रहा है| गोपियाँ शुद्ध भक्ति, प्रेम और समर्पण की प्रमाण हैं| जब कोई सत्कार्य करने को इच्छुक हों तो भगवत कृपा से सारे मुहूर्त और नक्षत्र स्वतः पवित्र हो जाते हैं| इस मास में चन्द्र, मन और बुद्धि तीनों पूर्ण और पवित्र हैं| “चन्द्रमा मनसो जातः”| जब ह्रदय में भगवत-प्रेम हो तो मन और बुद्धि भी पवित्र हो जाते हैं|”मधि” शब्द का एक अर्थ “ज्ञान” भी होता है। जब हमें श्री कृष्ण मिलन प्राप्त हो जाता है, तब हमारा धर्मभूत ज्ञान (गुणात्मक ज्ञान, अर्थात वह ज्ञान जो आत्मा का गुण है) पूर्ण व दिव्य बन जाता है।
निराड पोदुवीर – जो हितार्थी हैं वे दिव्य अनुभव में स्नान करें

गोदा देवी वर्षा के लिए यह व्रत कर रही है। वर्षा ही क्यों? उन्हें स्नान करना है। श्री प्रभु के अनंत कल्याण गुणों में उन्हें स्नान करना है। प्रत्येक गुण उनकी जीव पर अहैतुकी दया का द्योतक है। पानी आकाश से आता है, किन्तु ये कल्याण गुण गण केवल श्री प्रभु से ही आते हैं। पर हम किस तरह उनको प्राप्त करें? केवल श्री प्रभु ही उनके दाता है। परकाल सूरी (तिरुमळीशी आळ्वार) भी भगवान के कल्याण गुणों में अपने अनवरत निमज्जन के बारे में बताते हैं। अतः श्री गोदा देवी सबको आमंत्रित क्र रही हैं, “व्रत के लिए सब तैयार हो जाओ! कल भोर सब मिलकर आना।”
श्री प्रभु को प्राप्त करने के क्या योग्यता चाहिए? बस तीव्र इच्छा, और कुछ भी नहीं। साँसारी लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए बहुत से श्रम और साधन की ज़रूरत पड़ती है, किन्तु परात्पर लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कोई श्रम या साधन नहीं चाहिए। अगर कोई श्री कृष्ण का आनंद चाहता है तो केवल इसकी तीव्र इच्छा हो। एक प्रश्न यह किया जा सकता है की इच्छा की भी ज़रूरत क्यों पड़ रही है? उत्तर यह है की हम चेतन जीव है, हममे निर्णय लेने के लिए ज्ञान है। तो आचार्य ने बाकी सब कमी पूरी कर ही दी है, हमें बस इच्छा करनी है।

पोदुमिन – कृपया आएं
नेरिळयीर – आभूषणों से अलंकृत कन्याएं

जब गोपियाँ जल्दी जल्दी स्नान करने जा रहीं थीं, तब क्या उन्होंने समय निकालकर खुद को आभूषणों से सजाया होगा? क्योंकि वे हमेशा श्री कृष्ण के बारी में ही सोचती रहती हैं, और क्योंकि उन्हें ये भी नहीं अंदाज़ा रहता की श्री कृष्ण कब अचानक से उनके पास पहुँच जाएंगे, इसीलिए वे हमेशा खुद को अलंकृत रखने की आदत बना चुकी हैं।
गोदा देवी उनका अदब से स्वागत करती है। हर भागवत का भरपूर सम्मान किया जाना चाहिए, बगैर ये देखे कि उनकी आयु या जाती क्या है। गोपियों का सौभाग्य था की वे श्री कृष्ण के ही क्षेत्र में, उन साथ समय में, उन्ही की आयु के साथ वहां मौजूद थी। इससे बढ़कर सौभाग्य कुछ नहीं हो सत्ता की मनुष्य का जन्म मिले और उसी जन्म में आचार्य संग भी प्राप्त हो जाए। पंचसंस्कार एक जीवात्मा का नया जन्म है, इससे श्री रामानुज स्वामीजी की तिरुवडी(श्रीचरण) से सीधा सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। यहाँ प्राकृत देह छूट जाता है, उसी दिन जीवात्मा का परमात्मा से विवाह अर्थात चिरकाल व्यापी मिलन हो जाता है।
शिर् मल्गुम्: संपन्न
आय्यपाडि: गोकुल
च्चेल्व च्चिरूमिर्घाळ्: यौवन और धन से

गोकुल का धन क्या है? कृष्ण और गायें ही गोकुल के धन है। भगवान का सौशील्य और सौलभ्य गुण गोकुल का धन है| सर्व्यापी परमात्मा ने ग्वाल का रूप धारण किया है और गोकुल में खेल रहे हैं। दूध प्रचूर मक्खन से भरा है। उन्हें दूध दुहने लिए किसी भी प्रयास की आवश्यकता नहीं थी, लेकिन उन्हें मथने के लिए बड़ी मात्रा में ताकत लगानी पड़ती है। कृष्ण ने खुद गायों की देखभाल की। घास कभी भी घास नहीं खाते या पानी नहीं पीते बल्कि गायों ने कृष्ण की बांसुरी के संगीत को खाया और पिया। वे कृष्ण के मनमोहक रूप को देखते थे और खुश हो जाते हैं। भगवान का वात्सल्यमय स्पर्श ही उनका उज्जीवन है| इस प्रकार उन्होंने दूध दिया। दूध को मक्खन में मथ लिया गया। मक्खन किसका है? लेकिन गोपियाँ कहती थीं, “मेरा मक्खन”। इसलिए, कृष्ण को उन्हें पाप से बचाने के लिए अपनी ही संपत्ति (माखन) की चोरी करनी पड़ी।

जब लक्ष्मण खाली हाथ राम के पीछे गए, तो उन्हें वाल्मीकि ने “लक्ष्मणो लक्ष्मी (धन) संपन्न: ” कह संबोधित किया, क्योंकि लक्ष्मण जी को असली धन मिला जो कि राम-कैंकर्य है। इसी तरह जब विभीषण ने लंका छोड़ दिया और श्रीराम की शरणागती करने के लिए खाली हाथ पहुंचे, तो उसे श्रीमान ’(धनी) के रूप में संबोधित किया गया, क्योंकि अब केवल विभीषण को वास्तविक धन मिला – जो राम के साथ संबद्ध है। इसी प्रकार, गजेन्द्र को श्रीमद् भागवत में श्रीमन के रूप में संबोधित किया गया है।

जीवात्मा का वास्तविक धन भगवत-शेषत्वं और पारतन्त्रियं विशिष्ट ज्ञान है| लक्ष्मण स्वातन्त्रीयं तथा अन्य-शेषत्वं से रहित थे। विभीषण के पास पारतन्त्रियं था, लेकिन अनन्य- शेषत्वं का अभाव था। जब उन्होंने रावण के प्रति अपने शेषत्व का त्याग कर दिया, तो वे श्रीमान बन गए। गजेंद्र और द्रौपदी में अनन्य- शेषत्वं था, लेकिन उनमें पारतन्त्रियं का अभाव था। जब उन्होंने अपने स्वातन्त्रीयं को त्याग दिया तो वे श्रीमान बन गए।
परवश जीव स्ववश भगवंता, जीव अनेक एक श्रीकंता|

सौशील्य और सौलभ्य अवतारों के महत्वपूर्ण कल्याण-गुण हैं। कृष्ण ग्वालों के साथ खेलते एवं खाते हैं, यह देख ब्रह्मा भी भ्रमित हो गए। कल्याण गुण अवतारों में अधिक प्रकाशित होते है। परमपदम में हर कोई परिपूर्ण है, इस कारण वहाँ उन्हें अपनी अहैतुकी कृपा से निम्न जीवों का उद्धार करने का अवसर नहीं मिलता। कुलशेखर आलवार बताते हैं, “शरारती बच्चे ने अपनी बाहों के माध्यम से गोता लगाया, दही के एक बर्तन के गहराई में, इसे खाया और उनका पूरा चेहरा सफेद रंग का हो गया। उसके चेहरे पर डर था। वह न तो रो सकता था, न ही रोने के लिए अपने आग्रह को नियंत्रित कर सकता था। काँपते हुए हाथ जोड़कर उसने यशोदा के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। यह देखकर, यशोदा को परम अप्रतिम आनंद मिला”। भगवान के पास एक खतरनाक विशेषता भी है: निरंकुश स्वातंत्र्य। इस प्रकार, हमें हमेशा दयालु माँ महालक्ष्मी और आचार्य के माध्यम से आत्मसमर्पण करना चाहिए।

कूर् वेल्: एक धारदार हथियार (कुछ टीकाकारों का मत है कि कृष्ण ही धारदार हथियार हैं क्योंकि वे गोपियों के ह्रदय में प्रेम उत्तेजित करते हैं और फिर छुप जाते हैं)
कोडुन् तोऴिलन्: क्रूर व्यवहार
नन्दगोपन् कुमरन्: नंदगोप के पुत्र
एरार्न्द कण्णि यशोदै: यशोदा के प्रेमपूर्ण आँखों में
इळम शिङ्गम: युवा सिंह की तरह
नंद-गोप की सुरक्षा में वह अत्यंत विनम्र और आज्ञाकारी है लेकिन यशोदा के प्रेम में वह एक युवा शेर है। गोकुल में कोई भी प्राणी असुर को बदल सकता है और कृष्ण पर हमला कर सकता है; इस कारण वो सर्वदा कन्हैया की रक्षा हेतु धारदार हथियार लिए रहते हैं। सर्व-व्यापी भगवान यशोदा मैया की आँखों में हैं। क्या हम उनकी आँखों के आकार की कल्पना कर सकते हैं?

नंदगोप आचार्य हैं। कृष्ण हमेशा आचार्य के नियंत्रण में हैं। आचार्य देहात्माभिमान (मैं-मेरापन, शरीर को आत्मा समझना) को दूर करते हैं। केवल आचार्य के माध्यम से हम भगवान को प्राप्त कर सकते हैं। नंदगोपा के हाथ में हमेशा कृष्ण की रक्षा के लिए एक तेज भाला होता है। यह आचार्य की पहचान है। उनके कन्धों पे और हाथों में शंख और चक्र है।

नंद: जो हमेशा भगवत-साक्षात्कार के आनंद में लीन रहते हैं;
गोप: शिष्यों के स्वरुप की रक्षा करने वाले।

यशोदा नारायण महामंत्र हैं| यशः ददाति सा यशोदा | यह मन्त्र ही हमारा अभिमान है| दैवाधिनम् जगत् सर्वं, मंत्राधिनम् तु दैवतम्, तत मंत्रं ब्राह्मणाधिनम, | भगवान मन्त्र के अधीन हैं और मन्त्र आचार्य के अधीन| सीधे उनके पास मत जाओ। यह सही तरीका नहीं है| पहले उनके पास जाओ जिन्हें कृष्ण का ज्ञान है| कृष्ण की कृपा हमें नंदगोप और यशोदा के माध्यम से मिलती है।
गुरु बिना भवनिधि तरहिं न कोई, जो विरंची शंकर सम होई|
मन्त्र प्राप्त होते ही भगवान हमारे पास हो जाते हैं| गोपियाँ यशोदा के पास कितनी भी शिकायतें लेकर जाएँ लेकिन यशोदा ने कभी नहीं माना| इसी प्रकार मन्त्र हमारी रक्षा करता है|
कार: श्याम बादलों के जैसा रंग
मेनि: शरीर
च्चेङ्गण: लाल आँखें
कदिरमदियम् पोल् मुगत्तान्: चेहरा सूर्य और चन्द्र के समान

भगवान के दिव्य-मंगल-विग्रह का रंग काले बादल की तरह है जो अभी-अभी बरसने को तैयार हो| भगवान भी सदैव अपने कल्याण-गुणों की वर्षा के लिए तैयार रहते हैं| भगवान का मुख सूर्य और चन्द्र के समान है अर्थात सूर्य की तरह दीदिपत्यमान और चन्द्र की तरह शीतलता प्रदान करने वाले| लाल आँखें भगवान की हमारे प्रति करुणा करुणा को दर्शाता है| जैसे सूर्य समस्त विश्व का पोषण भी करता है और विनाश वैसे ही भगवान भी| भक्तों का पोषण और दुष्टों का विनाश|

नारायणने: सर्व-अन्तर्यामी और सर्वाधार नारायण

व्रत के लिए जपने वाला मन्त्र: नारायण महामंत्र| नराणां नित्यानाम् अयनम् इति नारायण | जो समस्त प्राणियों के आधार हैं, जो सबके अन्तर्यामी हैं और सारे प्राणी जिनके अन्दर हैं वही नारायण हैं| नारायण का अर्थ कोई एक निश्चित  रूप नहीं अपितु वह जो अनंत रूपों में विद्यमान हैं, सर्वत्र और सर्व-काल में व्याप्त हैं|

परै कमर में बांधकर बजाया जाने वाला ढोल है| तो क्या गोपिकाएँ इतना ही चाहती हैं? 29वें पासुर में गोदा बताती हैं कि परै का अर्थ है भगवान का नित्य-कैंकर्य| गोदा कहती हैं कि भगवान अवश्य हमें अपना नित्य-कैंकर्य प्रदान करेंगे, चिंता मत करो| महाविश्वास शरणागति का एक प्रमुख अंग है| हमें भगवान और भगवत-कृपा पर यह महाविश्वास होना चाहिये कि भगवान अवश्य हमें अपना नित्य-कैंकर्य प्रदान करेंगे|

पारोर्: जो भी इस विश्व में हैं
पुगऴ: उत्सव मनायें/ प्रशंसा करें
प्पड़िन्द: व्रत को पूर्ण करने हेतु
एलोर एम्पावाय: सुनो और मन में धारण करो, ओ लड़कियों|

सबलोग भगवत-शरणागति के योग्य हैं| केवल श्रीविल्लिपुत्तुर ही नहीं अपितु समस्त विश्व| शरणागति के लिए योग्यता क्या है? इच्छा मात्र ही भगवत-प्राप्ति के लिए पर्याप्त है| शरणागति/प्रपत्ती तो परगत-स्वीकार है| भगवान स्वयं अहैतुकी कृपा से जीवात्मा को चुनते हैं और अपनी शरण में लेते हैं| अपने प्रयासों से कोई भगवान को प्राप्त नहीं कर सकता|

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो, न मेधया न बहुना श्रुतेन।

यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः, तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूँ स्वाम्॥

{मुण्डक उपनिषद (3.2.3) और कठोपनिषद (1.2.23)}

लघु सिद्धांत में रामानुज स्वामीजी, इस श्लोक की व्याख्या करते हुए लिखते हैं:

यथा अयं प्रियतमः आत्मानम् प्राप्नोति, तथा भगवान स्वमेव प्रयतत इति भगवतैव उक्तं।

अर्थ: जैसे हम अपने प्रियतम को स्वयं प्रयत्न कर प्राप्त करते हैं, वैसे ही भगवान स्वयं, अपनी निर्हैतुक कृपा से, शरणागत जीवात्मा को अपना लेते हैं।  एक शरणागत को भगवत-प्राप्ति हेतु अपनी ओर से कोई प्रयत्न नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करना भगवान की निर्हैतुक कृपा में बाधा होगा।

हमारा प्रत्येक कर्म, ज्ञान, भक्ति भगवत-मुखोल्लास हेतु है

Author: ramanujramprapnna

studying Ramanuj school of Vishishtadvait vedant

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