तिरुपावै 5

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इस पाशुर में दामोदर भगवान का मंगलाशासन किया जाता है।

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मायनै मन्नु वडमदुरै मैन्दनै, तूय पेरुनीर यमुनै त्तुरैवनै।

आयर कुलत्तिनिल तोंड्रुम अणि विळक्कै, त्तायै क्कुडल् विळक्कम् शैय्द दामोदरनै।

त्तुयोमाय् वन्दु नाम् तुमलर् तूवी त्तोळुदु, वायिनाल् पाडि मनत्तिनाल् शिन्दिक्क।

प्पोय पिऴैयुम् पुगुदरुवान् निनरन्वुम्, तियिनिल् तुशागुम् शेप्पेलोर् एम्पावाय्।।

 

मायनै: जिसका कृत्य अलक्ष्य और रहस्यमय है

भगवान मायन या मायावी हैं अर्थात माया के स्वामी| माया का अर्थ मिथ्या नहीं, जैसा अद्वैत में कहते हैं| माया का अर्थ है मूल प्रकृति या ब्रह्म की संकल्प शक्ति| संकल्प मात्र से ब्रह्म विविधता और आश्चर्योंसे भरी इस संसार की श्रृष्टि और प्रलय करता है|

यक्षाचार्य के निरुक्त के अनुसार माया का अर्थ है ज्ञान|

माया वयुनं ज्ञानम् (वे0 नि0 ध0 व0 22).

इस प्रकार अद्वैत का यह सिद्धांत की माया का अर्थ अविद्या या उपाधि है, श्रुति विरुद्ध प्रतीत होता है|

सर्वे निमेषा जज्ञिरे विद्युतः पुरुषादधि। (यजुर्वे0 32।2);

अजायमानो बहुधा विजायते (यजुर्वेद 31।19); 

संभवामि आत्म मायया (BG 4.6);

निज माया निर्मित तनु माया गुण गोपार, चिदानंदमयी देह तुम्हारे (मानस).

भगवान अपनी संकल्प शक्ति से पद्मनाभ के रूप में, देवताओं के हित हेतु, क्षीरसागर में अवतार लेते हैं, खम्भा फाड़कर नरसिंह के रूप में आते है, त्रिविक्रम के रूप में तीन पग में समस्त संसार को माप लेते हैं, कृष्ण के रूप शंख-चक्र धारण किये हुए चतुर्भुज रूप में अवतार लेते हैं, आदि| अपहतपाप्मा (समस्त दोषों से रहित) भगवान का अवतार जीवात्मा के जन्म से भिन्न होता है| जीवात्मा अपने कर्मों के कारण और कर्मों का फल भोगने हेतु विभिन्न शरीरों में जन्म लेते हैं और कर्मों के कारण सुख-दुःख का अनुभव करते हैं जबकि परमात्मा का अवतरण कर्मों के कारण नहीं अपितु अपनी संकल्प शक्ति और करुणा आदि कल्याण-गुणों के कारण होता है| {जन्म कर्म च मे दिव्यम्}.

स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति। स इमाँल्लोकानसृजत।। (ऐतरेय उपनिषद 1.1.1.)

माया का अर्थ भगवान की कृपा शक्ति भी है, जो श्री महालक्ष्मी और आचार्य के पुरुषकार से आत्मा का उद्धार करता है| भगवान अपने प्रयत्नों से जीवात्मा को शरणागत बनाते हैं फिर ये घोषणा कर देते हैं कि जीवात्मा ने शरणागति किया है, और इस प्रकार उसे अर्चिरादी-मार्ग प्रदान करते हैं|

स्वामी स्वशेषं स्ववशं स्वभरत्वेन निर्भरम्| स्वदत्त स्वधिया स्वार्थं स्वस्मिन् न्यस्यति मां स्वयम्|| (न्यास दशकम्).

पेरिया तिरुमोज़ी (7.3.3) में कहते हैं, “भगवान ने आकर मेरे ह्रदय में अपना धाम बसा लिया है| वो दूसरे हृदयों के बारे में अज्ञात प्रतीत होते हैं, मेरे ह्रदय को छोड़ कहीं नहीं जाते| वो मुझे यम के लोक में नहीं जाने देंगे| मैं ऐसे भगवान को बदले में क्या दे सकता हूँ? क्या मैं उन्हें भूल सकता हूँ? नहीं! नहीं! कभी नहीं”|

इस प्रकार भगवान स्वयं जीवात्मा को चुनते हैं (यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः), उसे शरणागत बनाते हैं और नित्य-कैंकर्य प्रदान करते हैं| हमारे स्वयं के प्रयास तो भगवत-कृपा में बाधक है| भगवान ‘परगत-स्वीकार’ हैं न की ‘स्वगत-स्वीकार’|

 

मन्नु वडमदुरै मैन्दनै: उत्तर मथुरा के सम्राट (जो भगवत-संबंध से नित्य उज्जवल है)

मथुरा का हर युग में भगवत-संबंध से युक्त रहा है| बालक ध्रुव और वामन भगवानकी तपस्थली, त्रेता में शत्रुघ्न जी ने लवणासुर का वध कर यहाँ शासन किया, द्वापर में कृष्ण रूप में माखन, घी, दूध और गोपिकाओं का आनंद ले रहे हैं| मन्नु का अर्थ पवित्र स्थान और मैन्दनै का अर्थ है पुत्र (मथुरा का)|

 

तूय पेरुनीर: पवित्र और गहरी नदी

यमुनै त्तुरैवनै: जो यमुना में उसके तट पर क्रीडा करते हैं

ऐसा कहा जाता है कि यमुना के जल की पवित्रता इस कारण है क्योंकि लीला-पुरुषोत्तम भगवान कृष्ण ने इसमें गोपिकाओं संग जल क्रीडा किया है और इस प्रकार यमुना का श्रीकृष्ण से देह-संबंध हुआ| यमुना ने वसुदेव महाराज को रास्ता प्रदान किया (भागवत-कैंकर्य) और भगवान के चरण स्पर्श किये (भगवत-कैंकर्य)| यमुना (कालिंदी) द्वारिका में भगवान की अष्ट-महिषी हैं| इस प्रकार भगवान के एक नाम हुआ ‘यमुनै त्तुरैवनै’ अर्थात यमुना के सहचारी|

श्री वेदांत देशिक जी (गोदा स्तुति.12) में कहते हैं “गोदावरी ने तब बुरा नाम कमाया था जब उसने राम-लक्ष्मण को सीता के अपहरण का खुलासा नहीं किया था, हालांकि सीता ने आंसू भरी आँखों से ऐसा करने की विनती की। इसने ‘गोदा’ के अवतार और यह नाम लेने के बाद पवित्र हुई। गोदावरी के विपरीत, यमुना ने हमेशा भगवत-भागवत-कैंकर्य में भाग लिया।

भगवत कार्य में विघ्न न करते हुए निर्भय होकर भगवद् प्रेम करना अत्यंत आवश्यक है । कंस से निर्भय होकर यमुनाजी ने कृष्ण को मथुरा से वृन्दावन पहुंचाने के लिए पानी को सुखा दिया । इसके विपरीत गोदावरी नदी ने रावण द्वारा सीताजी के अपहरण का समाचार श्रीरामजी तक नहीं पहुंचाया । रावण से डरते हुए भगवत कार्य से वंचित रह गयी ।

आयर कुलत्तिनिल तोंड्रुम: ग्वालों के वंश में अवतार लिया|  

अणि विळक्कै: गोकुल के शुभ प्रकाशमान और रत्नयुक्त मंगल दीप हैं|

गोकुल के ग्वाल-वंश (आयर कुल) के कृष्ण ही उपाय और उपेय हैं| गोदा यहाँ अभिप्राय से ‘तोंड्रुम’ का प्रयोग करती हैं, ‘पिरंतुम’ का नहीं क्योंकि भगवान प्रकट होते हैं, जन्म नहीं लेते|

 

त्तायै क्कुडल् विळक्कम् शैय्द: जिसने माता के (यशोदा के) गर्भ को प्रकाशित किया

दामोदरनै: भगवान, जिन्हें यशोदा ने रस्सी से ओखल में बाँध दिया और उनके कमर में उसका चिन्ह है

लोग ऐसे अद्भुत बच्चे को अपने गर्भ से जन्म देने के लिए उसकी माँ यशोदा की सराहना करते हैं। दामोदर लीला भगवान के ‘भक्त-पारतन्त्रियम’ गुण को दर्शाता है| नन्जीयर (वेदांती स्वामीजी) कहते हैं कि इस चिन्ह को छुपाने के लिए भगवान अपने कमर के ऊपर वस्त्र लपेटे रहते हैं| यह चिन्ह भगवान रंगनाथ में दिख सकता है, इसलिए नए वस्त्र को वह डालने के बाद ही भीगे वस्त्र हटाया जाता है| लेकिन सबको उनके माखन-चोरी और मैया द्वारा दिए गए सजा की पता चल गया और यह बात जंगल में आग की तरह फैली| सब उन्हें ‘दामोदर! दामोदर!’ कहने लगे| भगवान के इस कल्याण-गुण का अनुसंधान करने से हमारे सांसारिक बंधन दूर हो जाते हैं| श्री पराशर भट्टर स्वामीजी कहते हैं कि भगवान अपना चिन्ह दिखाते हैं और जीवात्मा को अपना चिन्ह दिखाने को कहते हैं (तप्त-शंख-चक्र).

 

 

त्तुयोमाय् वन्दु: आपके पास पवित्रता-पूर्वक आये हैं (मन, वचन और कर्म की पवित्रता से)

नाम्: हमलोग

निर्मल मन जन सो मोहि भावा,

पवित्रता का अर्थ है स्वयं को भगवान का शेषी स्वीकार करना और भगवान को उपाय और उपेय स्वीकार करना|

तुमलर् तूवी: ताजे पुष्पों को समर्पित करना

विशेष तौर पे भगवान हमारे ह्रदय कमल के प्रेमी हैं| भगवान हमारे कैंकर्य का आकार नहीं अपितु भाव और प्रेम देखते हैं| यदि किसी अतिथि तो कॉफी पिलाना हो तो सीधे उनके मुंख में नहीं डाल सकते| हम उन्हें एक सुंदर कप में देते हैं| अतिथि से अधिक प्रेम हो तो विशेष आकर्षक कप निकालते हैं| उसी प्रकार भगवान को प्रेम अर्पित करने हेतु हम पुष्प आदि भगवान को समर्पित करते हैं| प्रेमियों द्वारा फेंका हुआ पुष्प भी भगवान को प्रिय होता है और अप्रेमपुर्वक वैदिक विधि से अर्पित पुष्प भी भगवान स्वीकार नहीं करते| भगवान पुष्प नहीं, हमारा प्रेम ग्रहण करते हैं|

 

त्तोळुदु: भगवान को अभिवादन अर्पित करना

नमः शब्द का अर्थ है कि मैं (मकारार्थो जीवः) स्वयं के लिए नहीं हूँ, भगवान का हूँ (न + म)| दण्डवत प्रणाम अर्थात दंड की तरह गिर जाना नमः शब्द अर्थात अहंकार-शुन्यता को दर्शाता है| हमें अपने सारे कर्मों को भगवान की सेवा की तरह करना चाहिए (इसका ये अर्थ नहीं कि सारे कर्म भगवान की सेवा हैं)|

वायिनाल् पाडि: जीभ से उनकी महिमा गाओ

कुलशेखर आलवार कहते हैं कि हे मेरे जीभ, नारायण महामंत्र का आस्वादन करो| एक बार अगर आस्वादन कर लिया तो इसके बिना रह नहीं पाओगे|

 

मनत्तिनाल् शिन्दिक्क: मन से उनका चिंतन करो

सोचकर गाना उचित नहीं, प्रेम और भावपूर्वक गाओ और फिर उसके अर्थों का चिंतन करो| अपने प्रेम के अभिव्यक्ति के लिए गाओ|

इस प्रकार गोदा ने त्रिकरण शुद्धि का मार्ग बताकर ये समझाया कि शरीर, मन और जीभ हमें क्यों मिले हैं|

 

प्पोय पिऴैयुम्: पूर्व के पाप कर्म (भगवान से अपना नित्य संबंध के ज्ञान से पूर्व)

पुगुदरुवान् निनरन्वुम्: बाद में किये गए पाप कर्म (हमारे ज्ञान के बिना)

तियिनिल् तुशागुम्: आग लगे रुई की तरह नष्ट हो जायेंगे

शेप्प: ऐसे भगवान की महिमा गाओ

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क्या गायें:

  1. मायनै: ( हे मायापति! )मूल प्रकृति/ लीला विभूति के स्वामी, संकल्प शक्ति से संसार का निर्माण करने वाले, कृपा शक्ति से जीवों को शरणागत बनाने वाले और आश्चर्यजनक लीलाएं करने वाले|

  2. मन्नु वडमदुरै: (हे मथुरा-नंदन! ) उत्तरी मथुरा के सम्राट (जो उनके नित्य संबंध से प्रकाशमान है)

  3. मैन्दनै: (हे बलशाली) शक्तिशाली पुरुष

  4. तूय पेरुनीर: पवित्र और गहरे नदी के समान

  5. यमुनै त्तुरैवनै: ( हे यमुना-तट-विहारी रसिक! ) यमुना तट पर विहार करने वाले

  6. आयर कुलत्तिनिल तोंड्रुम: ( हे नंदजन-व्रज-आनंदरंजन! ) गोकुल के ग्वाल वंश में जन्म लेने वाले

  7. अणि विळक्कै: मोतियुक्य मंगल दीप

  8. त्तायै क्कुडल् विळक्कम् शैय्द: (हे मातृ-गर्भ-प्रकाशिका!) मैया यशोदा के गर्भ को प्रकाशित करने वाले| (यशोदा-नंदन, यशोदा-मैया का लाडला)

  9. दामोदरनै: ( हे दामोदर! ) भगवान, जिन्हें यशोदा ने रस्सी (दाम) से उखल में बाँध दिया था| उस चिन्ह को देख यशोदा मैया कि ख्याति हुई कि ऐसे नटखट बालक को उन्होंने संभाल रखा है|

 

स्वापदेश:

यदि हमारे इरादे अच्छे और भक्ति-भाव से परिपूर्ण हैं, यदि हम उस पुरुषोत्तम कि महिमा अपने मुख से गाते हैं, मन में उनके दिव्य कल्याण-गुणों और लीलाओं चिंतन करते हैं, इन्द्रियों और शरीर से उनकी और उनके भक्तों की सेवा करते हैं, तो भगवान अपनी कृपा से हमारे सारे विघ्न खत्म कर देते हैं| शरणागति के पश्चात पूर्व के संचित कर्म और आगामी कर्मों को खत्म कर देते हैं| 

भगवान दामोदर के दो मातायें है एक जन्म देनेवाली (देवकी) और दूसरी पोषण करनेवाली ( यशोदा)। इसी तरह श्रीवैष्णवों के लिऐ जन्म देनेवाले दो मन्त्र है अष्टाक्षरी मन्त्र ( श्रीवैष्णव बनाता है ) और गायत्री मन्त्र ( द्विजत्व बनाता है)।

ऐसे मंत्रों का उपदेश देनेवाले आचार्य के श्रीचरणों का आश्रयण लेने मात्र से सभी पाप ताप नष्ट होकर परमपद के अधिकारी बनाये जाते है ।
श्री गोदा रंगनाथ भगवान का मंगल हो

 

 

 

 

Author: ramanujramprapnna

studying Ramanuj school of Vishishtadvait vedant

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