अंश कौन, अंशी कौन?

नमो नारायण 

कल शाम एक पूजनीय आचार्य जी ने कहा कि मैं श्री करुणा-काकुस्थ के दिव्य गुणों का वर्णन करने के योग्य नहीं क्योकि मैं भगवान के सभी रूपों में अभेद की भावना रखता हूँ| योग्य तो तब होता जब ये भेद-बुद्धि होती कि राम रूप ही एकमात्र मूल रूप है ब्रह्म का (और उनके अनुसार ऐसा कहने से ब्रह्म सीमित भी नहीं होता| अनंत ब्रह्म का क्या सिर्फ एक ही रूप संभव है या वो अनंत रूपों में विद्यमान है? ) हमारे लिए उनके सभी रूप पर-स्वरुप हैं| वामन, नरसिंह, कुर्म, राम, कृष्ण, अनिरुद्ध, रंगनाथ, बद्रीनाथ, अनिरुद्ध, संकर्षण, अन्तर्यामी…. इन सभी रूपों में भगवान पूर्ण ही हैं, पर-तत्त्व ही हैं|
कोई व्यक्ति स्वयं से बड़ा या छोटा नहीं हो सकता|

हयग्रीव परमोपासक वादिराज तीर्थ स्वामी हयग्रीव और विष्णु में अभेद ही मानते रहे, तो आपके मतानुसार तो वो हयग्रीव की उपासना के अधिकारी नहीं रहे? अधिकारी तो तब होते जब हयग्रीव और विष्णु में भेद बुद्धि रखते और हयग्रीव को पर-स्वरुप मान अन्य सभी रूपों को उनका अंश मानते?

रामचरितमानस की मैं वैसी ही व्याख्या करूँगा जैसा आचार्यों से श्रवण किया है और जैसा पूर्वाचार्यों के ग्रंथों में पढ़ा है|

प्रश्न है कि यदि और राम और विष्णु में भेद नहीं करते तो स्कन्द पुराण के रामायण माहात्म्य के इस श्लोक का क्या जो ब्रह्मा-विष्णु-महेश को श्री राम का अंश बताता है?

विष्णु पुराण में भी ऐसा ही श्लोक मिलता है:

शक्तयो: यस्य देवस्य ब्रह्मविष्णुशिवात्मिका..

समाधान:

प्रथम तो अंश-अंशी भाव को समझना होगा| भगवान के अंश का क्या अर्थ हो सकता है?

  1. भगवान की आत्मा का एक टुकड़ा? या,
  2. भगवान की शक्ति या प्राकार का अंश? या,
  3. स्वयं भगवान

तीनों की विवेचना करते हैं:-

1. ये तो संभव ही नहीं क्योंकि ज्ञानस्वरूप आत्मा ‘अविकार’ है| उसका कोई टुकड़ा संभव ही नहीं|

2. शक्ति और शक्तिमान एवं प्राकार और प्राकारी के मध्य भेद तो सिद्ध है|

यदि विष्णु को राम की शक्ति प्राकार मानते हैं तो विष्णु को जीवात्मा मानना होगा| तत्त्व-त्रय के सिद्धांत में तीन तत्त्व हैं: ईश्वर, जीव, प्रकृति| ईश्वर की शक्ति या प्राकार ईश्वर से भिन्न है, इस प्रकार यह तो जीव तत्त्व या प्रकृति तत्त्व ही होगा| भयंकर भेदवादी भी ऐसा नहीं ही मानेंगे| यदि और कोई युक्ति हो तो उन विचारों का स्वागत है|

गोस्वामीजी कहते हैं:-

जीव अनेक एक श्रीकंता

एकमात्र श्रीदेवी के पति ही ईश्वर हैं, बाकि सब जीव|

वेदों में और पुराणों में श्रीदेवी तो लक्ष्मी ही हैं, और श्रीकांत भगवान विष्णु| यदि यह आग्रह हो कि श्री लक्ष्मी नहीं हैं, तो श्री सूक्त और विष्णु-पुराण का क्या अर्थ रह जायेगा?

3. अंश और अंशी एक ही हैं| यह निष्कर्ष ही उचित प्रतीत होता है| भगवान के भगवान के अंश होने का अर्थ स्वयं भगवान ही हैं| अनंत भगवान अनंत रूपों से युक्त होकर भक्तों को दर्शन देते हैं| भगवान और भगवान में कोई भेद नहीं, और बड़ा भगवान और छोटा भगवान जैसा विभाजन नहीं|

अंश का क्या अर्थ कहा जाए? भगवान विष्णु के श्वेत-श्याम केशों से बलराम-कृष्ण के अवतार की बात भी पराशर महर्षि कहते हैं|

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यहाँ भी अगर प्राकार-प्राकारी या शरीर-आत्मा भाव लगायें तो कृष्ण को जीवात्मा मानना होगा| विष्णु के अंश का कृष्ण बनकर आने का अर्थ है कि स्वयं विष्णु ही कृष्ण बनकर आये, न कि कोई जीवात्मा|

समाधान बस एक ही है|भगवान के अंश होने का अर्थ है भगवान का स्वयं अपने धर्मी ज्ञान के साथ अन्य रूप में प्रकट होना| इस प्रकार ही विष्णुचित्त स्वामी ने विष्णु-पुराण उपरोक्त्त श्लोक का अर्थ किया है| भगवान स्वयं विष्णु के रूप में प्रकट होते हैं और ब्रह्मा और शिव में उनके शक्ति के अंश का आवेश होता है|

शक्तयो: यस्य देवस्य ब्रह्मविष्णुशिवात्मिका| यहाँ आत्मिका का अर्थ है: भगवान स्वयं विष्णु हैं, भगवान की आत्मा या धर्मी ज्ञान स्वयं प्रकट है विष्णु के रूप में तथा शिव और ब्रह्मा के वह अन्तर्यामी हैं|

Mahabharata, Harivamsha Chapter 55,

Esha Narayanah Sriman Ksheerarnava niketanah|

Naagparyankam Utsrijya hi aagato mathuram purim||

ऐष नारायणः श्रीमान क्षीरार्णवनिकेतन।नागपर्यंकं उत्सृज्य आगतो मथुरांं पुरीम्।।

*Meaning:*The Narayana along with Sri, who was residing Ksheera ocean, left his serpent bed and descended to Mathura.

क्षीरसागर में शेष नाग पर शयन करने वाले नारायण अपने नाग पर्यंक को छोड़कर मथुरा नगरी में आ गए

ऐसा ही अर्थ श्री बलदेव विद्याभूषण (गौडीय सम्प्रदाय के भाष्यकार) भी करते हैं| ब्रह्म-सूत्र के अनुसार ब्रह्म में सजातीय भेद नहीं हो सकता| स्वांश का अर्थ है स्वयं भगवान और विभिन्नांश हैं जीवात्मा| जीवात्मा भगवान की शक्ति का अंश है| मत्स्य कुर्म आदि स्वयं भगवान हैं जबकि सनकादि, नारद आदि जीवात्मा, विभिन्नांश, भगवान की शक्ति के अंश|

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गौडीय सम्प्रदाय के गोविंद भाष्य में ‘अंश-अंशी में अणुमात्र भेद’ भी स्वीकार्य नहीं है|’कृष्णस्तु भगवान स्वयं’ का अर्थ भी इतना ही कि मत्सय, वाराह आदि स्वांश स्वयं भगवान कृष्ण हैं और वर्णित मनु आदि विभिन्नांश उनकी शक्ति मात्र हैं|शक्ति और शक्तिमान में भेद सिद्ध है फिर भी शक्ति को शक्तिमान का अंश कहा जा सकता है|अक्सर लोग इस विषय पर हमसे लड़ने आ धमकते हैं, ऐसे भेद-बुद्धि वाले आँख खोलकर देख लें|

भागवत पुराण के अनुसार भगवान नारायण स्वयं विष्णु हैं एवं ब्रह्मा और शिव के अन्तर्यामी

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स्कन्द पुराण के श्लोक का यही अर्थ है| नारायण स्वयं विष्णु हैं और शिव, ब्रह्मा के अन्तर्यामी| नारायण स्वयं ही कृष्ण, राम आदि रूप लेकर आते हैं| जीवात्मा के भगवान के अंश होने का अर्थ है भगवान के शरीर का अंश होना, उनकी अचिन्त्य शक्ति का अंश होना|

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श्रीमते रामानुजाय नमः

आलवार एम्पेरुमानार जीयर तिरुवाडिगले शरणम्

Author: ramanujramprapnna

studying Ramanuj school of Vishishtadvait vedant

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