एक आत्मा का एक ही इन्द्रिय प्रलय काल तक रहता है (इन्द्रिय अत्यन्त सूक्ष्म होते हैं। शरीर के अंग आँखों को ही चक्षु इन्द्रिय नहीं समझना चाहिए। अपितु उस अंग में सूक्ष्म इन्द्रिय निवास करती है।)। व्यक्ति के मृत होने के बाद भी वो इन्द्रिय उसके साथ ही होती हैं एवं नया शरीर प्राप्त होने पर नए शरीर के आँख आदि अंगों में वो इन्द्रियाँ प्रवेश कर जाती हैं। उन इन्द्रिय के साथ उनके द्वारा अनुभूत वासना और रुचि भी साथ जाती हैं। प्रलय काल में इन्द्रिय नष्ट हो जाते हैं। नई सृष्टि के उपरान्त भगवान नए इन्द्रिय आदि प्रदान करते हैं। इस कारण वासना और रुचि शून्य होती है। (इस कारण प्रलय करना भी भगवान की एक कृपा ही है।)
परकाय प्रवेश अर्थात आत्मा का अपने शरीर को छोड़ दूसरे शरीर में प्रवेश करना, उसमें भी आत्मा के साथ ही उसकी इन्द्रियाँ दूसरे शरीर में चली जाती हैं।
मुक्त व्यक्ति तो विरजा के इस पार अपने भौतिक इन्द्रियों का त्याग कर देता है। वो इन्द्रियाँ भी प्रलय काल तक वहीं रहती हैं।
प्रलय काल में सभी कार्य अपने कारण में लीन हो जाते हैं।
सभी इन्द्रिय अणु परिमाण के होते हैं, अर्थात अत्यन्त सूक्ष्म होते हैं। बुद्धि, अध्यवसाय आदि अंतःकरण मत के ही हेतुक धर्म हैं अर्थात धर्मभूत ज्ञान का ही एक प्रकार है।
आत्मा का संयोग मन से होता है, मन का जिस इन्द्रिय से संयोग होता है, उस इन्द्रिय से धर्मभूत ज्ञान बाहर जाता है और वस्तुओं से संयोग कर वापस इन्द्रिय और फिर मन और फिर आत्मा के पास आता है।
प्राण भी श्रेष्ठ वायु विकार है और प्राण, अपान आदि पाँच प्रकार का है।
आगे तामस अहंकार से पांच तन्मात्र और पांच भूत की उत्पत्ति पढ़ते हैं। पांच भूत हैं: आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी। भूत की उत्पत्ति तन्मात्र से होती है। दूध और दही के मध्य की जो अवस्था होती है, वैसा ही तामस अहंकार और भूत के मध्य की अवस्था है तन्मात्र।

Prayala means end of brahmas one day?
During pralaya if all desires,interests,sense organs become zero, what about karma, will it become zero too?
Next time, when souls get new bodies, will they have old karma or they start afresh?
If they start afresh, is it not injustice to poeple who did good karma?
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There are many pralayas. One of them is at the end of Brahma’s day. Brahma’s age is 100 years. After that Mahapralaya of entire Brahmanda happens.
Karma is turned to zero only when a jeevatma achieves moksha. The stay in the praakrit world is only to suffer the fruits of karma. If all the karmas are extinguished, he will achieve moksha.
It’s only the vaasana and ruchi of Indriyas that are removed. As new Indriyas will be given to them. When the shrishti happens, Bhagwan gives them birth as deva, manushya, tiryak, sthaavara etc, based on their previous karma.
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