आज 18वीं गाथा में गोदाम्बा नप्पिनै (नीला देवी) को उठाती हैं। 17वीं गाथा में बलदेव के बाद कृष्ण को उठाया किन्तु कृष्ण उठे नहीं। गोपियों को अपनी भूल समझ आयी। उन्होंने कृष्ण से पूर्व उनकी महिषी/प्रिया नप्पिनै को नहीं उठाया था। वो उनकी सखी भी थीं और कृष्ण की परम प्रेयसी भी।
(जिस प्रकार उत्तर भारत में राधा जी गोकुल में कृष्ण की प्रेयसी एवं पत्नी के पत्नी के रूप में प्रसिद्ध हैं, उसी प्रकार दक्षिण में नप्पिनै अम्माजी। ऐसा भी कहते हैं कि नप्पिनै और राधा एक ही हैं। नप्पिनै कुम्भज की पुत्री थीं एवं कृष्ण ने 7 बेकाबू बैलों को बाँधकर नप्पिनै से विवाह किया था।)
गोपियाँ कहती हैं, “नन्दगोप की बहु, नप्पिनै (नीला), उठो!”
सीता भी स्वयं का परिचय ‘दशरथ महाराज की बहू’ के रूप में देती हैं, ‘मिथिलेश की पुत्री’ के रूप में नहीं। ऐसी ही भारतीय संस्कृति है। स्त्रियाँ श्वसुर के सम्बन्ध से अपना परिचय देती हैं।

श्री उ वे मीमांसा शिरोमणि भरतन् स्वामी द्वारा अनुगृहीत अष्टादश गाथा का संस्कृत छन्दानुवाद:
१८.स्रवन्मदेभतुल्यो यः सङ्ग्रामे नो पलायते ।
महाभुजबलो नन्दो गोपस्तस्य स्नुषे! वरे! ।।
सुगन्धिचिकुरे ! नीले ! द्वारमुद्घाटयाधुना ।।
सर्वतः कुक्कुटा रुत्वोद्बोधयन्त्ययि ! मानुषान् ।।
सङ्घशो माधवीकुञ्जे कूजन्ति बहुशः पिका : ।
कन्दुकाञ्चितहस्ते ! भो नामानि कमितुस्तव ।।
वयं गातुं समायाता वलयानां क्वणेन हि।
आगत्य पाणिपद्माभ्यां हृषितोद्घाटनं कुरु ।।
श्री उ वे रंगदेशिक स्वामीजी के गोदा-गीतावली से

श्री उ वे सीतारामाचार्य स्वामीजी द्वारा हिन्दी छन्दानुवाद


उन्दु मद कळिऱ्ऱन् : मदमस्त हाथियों को जीतने वाले
ओडाद तोळ् वलियन् : शक्तिशाली योद्धाओं का सामना करने वाले एवं युद्ध में कभी पीछे नहीं हटने वाले
नन्द गोपालन् : नन्दगोप की
मरुमगळे : बहु
नप्पिन्नाय् : नीला देवी
“ओ ! हाथी से बलवान, विशाल कांधो वाले, जो युद्ध में कभी पीछे नहीं हटते, ऐसे नन्दगोप की पुत्रवधु!”
कृष्ण ने कुवलयापीड हाथी को परास्त किया था। ये गुण उनमें पिता से ही तो आये हैं। इसलिए नन्दगोप को ‘हाथी से भी बलवान’ कहा है। किन्तु नंदगोप के पास गायें थीं, हाथी तो नहीं थे। यहाँ ऐसा समाधान है कि नन्द जी एवं वसुदेव जी परम मित्र थे। एक की संपत्ति दूसरे की भी थी। वसुदेव जी के पास तो अनेक हाथी थे।
पूर्व में भी कहा गया है कि गोप गण अत्यन्त बलवान थे एवं शत्रुओं के घर जाकर उनके गर्व को नष्ट कर देते थे। तभी तो कंस स्वयं कभी भी गोकुल नहीं आया, अपने दैत्यों को ही भेजता रहा और फिर कृष्ण को मथुरा बुला लिया।
गन्दम् कमळुम् कुळली :सुगन्धित केशों वाली!
कडै : दरवाजा;
तिऱवाय् : खोलो
“सुगन्धित केशों वाली! किवाड़ खोलो!”
“आप सोच रही होंगी गोपियाँ यह सोच चली जायेंगी की अन्दर कोई भी नहीं है। किन्तु आपके केशों के सुगन्ध यह सूचित कर रहे हैं कि आप भीतर ही हैं”
(हमारे केशों में तो स्वाभाविक गन्ध नहीं होता। सुगन्धित बनाने के लिए पुष्प आदि लगाते हैं। किन्तु लक्ष्मी जी के केशपाश तो पुष्प को भी गन्ध देने वाले हैं।)
नप्पिनै बोलती हैं, “आधी रात्रि को क्यों आयी हो तुमलोग? सुबह हो गयी क्या?”
अबतक तो गोदाम्बा अनेक सखियों को उठायीं एवं प्रभात के लक्षण बतायीं। किन्तु अब तो नीला देवी भी ऐसा ही कह रही हैं।
गोदाम्बा, “कुक्कुट (मुर्गा) शब्द कर रहे हैं।”
“कुछ मुर्गे तो प्रति याम शब्द करते हैं। अर्ध रात्रि को वो शब्द कर रहे होंगे। या तुमलोगों ने उसे डरा दिया होगा और वो शोर कर रहे हैं।”
“माधवी लता पर कोकिल शब्द कर रहे हैं।”
“माधवी लता तो अत्यन्त मृदु होते हैं। उनपे शयन करने वालों के लिए क्या दिन, क्या रात।”
पन्दार विरलि
“हे हाथों में गेंद रख भगवान के संग खेलने वाली”
(शयन से पूर्व जब कृष्ण एवं नप्पिनै गेंद से खेल रहे थे तब नप्पिनै जीत गयीं एवं पारितोष के रूप में उस गेंद को अपने पास रख लिया।)
ये गेंद “लोकवत्तु लीला कैवल्यम्” का स्मरण दिलाते हैं। नीला देवी के हस्त में यह गेंद उनके पुरुषकारत्व का सूचक है।
(गेंद नार (नरों के समूह) हैं। नप्पिनै पुरुषकारिणी हैं।
गेंद (नार) — नप्पिनै —- कृष्ण)
गेंद की तरह हमें भी पकड़िए एवं अपने पति के प्रति हमारा पुरुषकार कीजिये।

क्रीडतो बालकस्येव चेष्टां तस्य निशामय ।
अप्रमेयोऽनियोज्यश्च यत्र कामगमो वशी ।।
मोदते भगवान् भूतैर्बालः क्रीडनकैरिव ।
त्वं न्यञ्चद्भिरुदञ्चद्भिः कर्मसूत्रोपपादितैः ।
हरे विहरसि क्रीडां कन्दुकैरिव जन्तुभिः ।।(विष्णु पुराण 12.18-19)
The ball in the hand of Nappinai represents the sansaara, krida of divine dampati
नप्पिनै, “तुमलोगों के आने का कारण क्या है?”
उन् मैत्तुनन् पेर् पाड
“हम आपके पति के नामों को गाएंगीं।”
कैसे नाम? कृष्ण का निन्दन करने वाले नाम। वो गेंद में हार गए हैं। तुम तो हमारी सखी हो। हम तुम्हारी तरफ से पक्ष लेकर कृष्ण की निन्दा करेंगीं। (राम भी जब वन में सीता से हारते हैं तो लक्ष्मण भी सीता का पक्ष लेकर राम की हँसी उड़ाते हैं।)
नप्पिनै, “ठीक है, आकर दरवाजा खोल लो!”
“अपने लालिमा लिए हाथों से, चूड़ियों को खनकाते हुए, आप ही दरवाजा खोलिये”
(भगवान के अभय हस्त “मा शुच:” की शिक्षा देते हैं। किन्तु हमारे लिए तो आपके लालिमा लिए हाथ ही रक्षक हैं। ये हमें भगवान के स्वातन्त्र्य से रक्षा करते हैं।)
(चूड़ियाँ सुहाग की प्रतीक हैं। जब पति दूर हों तो दुबली हाथों से चूड़ियाँ स्वयं बाहर आ जाती हैं। लक्ष्मी जी का तो कभी भगवान से विश्लेष होता ही नहीं। इसलिए सदा सर्वदा रहने वाले अपने चूड़ियों की खनखनाहट सुनाओ)
वन्दु तिऱवाय् मगिळ्न्दु एलोर् एम्बावाय् !
“हमारे लिए, सन्तुष्ट होकर, प्रसन्न होकर आईये एवं किवाड़ खोलिये।”
स्वापदेश
इस गाथा में एक महत्वपूर्ण शिक्षा मिलती है कि बिना अम्माजी के पुरुषकार के भगवान की प्राप्ति नहीं होती। रामावतार में श्री देवी (सीताम्बा) पुरुषकारिणी हैं। वराह अवतार में भू देवी पुरुषकारिणी हैं। कृष्णावतार में नीला देवी गोकुल में पुरुषकारिणी हैं।
विशेष परिस्थितियों में भगवान चाहे तो बिना पुरुषकार के भी अपना लें। तब भगवान स्वयं ही पुरुषकार करते हैं एवं स्वयं ही उपाय भी।
क्या भगवान में कारुण्य नहीं है, जो बिना अम्माजी के पुरुषकार के नहीं अपनायेंगे?
यह भगवान के कारुण्य की पराकाष्ठा है कि उन्होंने अम्माजी को पुरुषकारिणी बनाया एवं उनके पुरुषकार से आने वाले जीवों को उनके पूर्व कर्मों पर विचार किये बिना उनकी शरणागति को स्वीकार करने का संकल्प लिया।

