तनियन. 3

भावार्थ

हे गोदा देवी! आप दामिनी के सदृश अंगकान्ति वाली हैं! आपने उस माला को, जो श्री रंगनाथ भगवान के लिए थी, पहले स्वयं पहना तथा उसके बाद उसे श्री भगवान को प्रदान किया | काव्य कला में निपुणता से आपने सुप्रसिद्ध एवं प्राचीन तिरुप्पवई की रचना करी | कई सुन्दर कंकणों से विभूषित हे श्री गोदा देवी! हमपर अपनी करुणा दृष्टि करिये जिससे हम उसी तीव्रता से श्री कृष्ण में प्रेम रखें, जिस तीव्रता से आपने कामदेव को कहा था, “हे कामदेव! कृपया प्रसन्न हों और मुझे वेंकटगिरि के प्रभु की दुल्हन व दीन दासी बना दें ! ”

तात्पर्य

शुडर्कोडिये – स्वर्णमयी लता | लता को बढ़ने के लिए किसी सहारे की आवश्यकता रहती है | वे हमारे सबके सहारे श्री भगवान ही हैं | वे ही ” उपाय” हैं |

 शूडिकोडुत्त – पहले स्वयं को (पुष्पमाल से) आभूषित किया, उसके बाद श्री भगवान को | इस कारण गोदाम्बा जी को शूडिकोडुत्त नाचियार भी कहा जाता है|

तोल्पावई – प्राचीन विधान

पाडि अरुळ वळ्ळ – आपकी गान और काव्य कला में निपुणता | गोपियों ने व्रत के विषय में कोई गायन नहीं किया लेकिन गोदा जी ने व्रत के विषय में गाया और शिक्षा दिया| इस तरह से गोदा द्वापर की गोपिकाओं से भी महान हैं|

पल्वळयाय – आपके करकमल कंकणों से विभूषित हैं | ये इंगित करते हैं की वे अपने सहारे, अपने वल्लभ श्री भगवान् के साथ विराज रही हैं | प्रभु ने आपको अपनी मौजूदगी से शोभायमान किया है | वो आपकी आज्ञाओं का पालन करते हैं | वो आपके सरस दयालु पति हैं | आप, हमारी माँ, उनतक अपनी पहुँच का बहुत अच्छे से इस्तेमाल करती हैं!

यहां एक और गहरा प्रयोग यह है की प्रियतम की मौजूदगी में नायिका के लिए कंकण भी अंगूठी बन जाते हैं, और वियोग में अंगूठी भी कंकण बन जाती है | तो कंकणों का सांकेतिक और आलंकारिक प्रयोग है |

कुछ ऐसे ऋषि हैं जिन्होंने श्री भगवान के लिए तप किया, पर फिर आते हैं हमारे आळ्वार संत, जिनके लिए श्री भगवान तप करते हैं!

ऐसी हमारी आळ्वार गोदा महारानी की जय हो!

नाचियार थिरुमोज़ी में गोदा जी तिरुमला के श्रीनिवास श्री वेंकटेश्वर भगवान से प्रार्थना करती हैं कि वो उन्हें श्री रंगनाथ को पति रूप में देकर अनुगृहित करें | रामानुज स्वामीजी ने जब तिरुपति में गोविन्दराज मंदिर का निर्माण करवाया तो वहाँ माता के रूप में श्री गोदाम्बा जी को ही प्रतिष्ठित करवाया|

तनियन. 1

पराशर भट्ट स्वामीजी महाराज का श्री गोदा देवी और उनकी तिरुप्पावई से अद्भुद प्रेम था | उनका मानना है की यदि किसी ने अपने जीवनकाल में तिरुप्पावई का एक बार भी अध्ययन नहीं किया, तो उसका जीवन व्यर्थ है |

नीळा तुंगस्तनगिरितटीसुप्तमुद्बोध्य कृष्णम्

पारार्थ्यम् स्वम् श्रुतिशतशिरस्सिद्धम् अध्यापयन्ती ।

स्वोछिष्टायाम् स्रजिनिगळितम् या बलात्कृत्य भुंक्ते

गोदा तस्यै नम इदमिदम् भूय एवास्तु भूयः ॥

भावार्थ

मै बारम्बार श्री गोदा देवी को प्रणाम समर्पित करता हूँ, जिन्होंने श्री नीला देवी के पर्वतों के सदृश स्तनों पर सोते हुए श्री कृष्ण को जगाया, तथा शतशः वैदिक ग्रंथों के अनुसार उनके आगे अपने पूर्ण पारतंत्र्य को उद्घोषित किया, और जिन्होंने उन रंगनाथ भगवान् का बलात् भोग किया, जो उनकी(गोदा देवी) उच्छिष्ट पुष्प माला द्वारा बंधे हुए हैं |

गोदा देवी ने तीन कार्य किये-

१) नीळा तुंगस्तनगिरितटीसुप्तमुद्बोध्य कृष्णम् –

वे उन श्री कृष्ण को नींद से जगाती हैं, जो सबको नींद से जगाते हैं; जो ऐसे कमल का सृजन करते हैं जिसमें ब्रह्मा जी उत्पन्न होते हैं | महाप्रलय में जब समस्त जीवात्माएं जड़वत् स्थित थीं, तब श्री भगवान ने उनको शरीर व इन्द्रियाँ प्रदान की | गोदा महारानी ऐसे श्री भगवान को नींद से जगाती हैं | यह गोदा जी की महानता है| नीला देवी प्रभु को सुला देती हैं, और गोदा देवी प्रभु को जगा देती हैं |यह गोदा जी का वात्सल्य है |

पराशर भट्ट स्वामीजी महाराज को "श्रृंगार चक्रवर्ती" कहा गया है | 

श्री भगवान क्यों सो रहे थे?

उन्होंने जीवात्माओं को समझा बुझाकर सही रास्ते पर लाने की कोशिश की, लेकिन कोई नहीं समझा | आखिरकार उन्हें कोई मिला जो शिष्य जैसा व्यवहार तो कर रहा था, लेकिन सच्चा शिष्य नहीं था (अर्जुन) | यह सब देखकर श्री भगवान सोने चले गए | नीला देवी श्याम वर्णा हैं, और श्री भगवान् भी श्याम वर्ण हैं | तो श्री भगवान ने सोने के लिए स्थान ढूंढा और नीला देवी के स्तनों में छुपकर सो गए |

२) पारार्थ्यम् स्वम् श्रुतिशतशिरस्सिद्धम् अध्यापयन्ती –

गोदा देवी ने श्री भगवान को अध्यययन कराया : ” आप अब तक सो रहे हैं, प्रभु! आपने किस हेतु ये अवतार लिया है?(आपको याद है?) ये जीवात्माएं हमारी संतान हैं | ये गलतियां तो करेंगे ही | क्या एक माँ अपनी संतान से नाराज़ हो सकती है? उठ जाइये, प्रभु! इनकी देखभाल कीजिये |”

जीवात्माओं की रक्षा करना श्री भगवान का स्वभाव है | ठीक उसी तरह जिस तरह सूर्य का स्वभाव प्रकाश देना है | यदि सूर्य प्रकाश देना बंद करदे, तो क्या वह सूर्य ही कहलायेगा? प्रभु का परार्थ्य हमारी रक्षा करना है | हमारा परार्थ्य  उनकी सेवा करना है |

श्री भगवान ने समस्त विश्व को शिक्षाएं दी परन्तु श्री गोदा महारानी ने उन ही  भगवान को शिक्षा दी! क्या? भगवान के जीवात्मा के प्रति और जीवात्मा के भगवान के प्रति पारार्थ्य की|

श्रुति शिरः – उपनिषद , जो की वेद के ४ अंगों में प्रधान हैं, इन्हें वेदों का शिर कहा जाता है |

यहाँ चर्चा परार्थ्य की हो रही है ( मै स्वयं का नहीं बल्कि श्री भगवान का हूँ और भगवान का सब कुछ भी भगवान का ही है ) | श्री भगवान का भी परार्थ है : पारतंत्रीयता | हम श्री भगवान के लिए  हैं और श्री भगवान हमारे लिए हैं |

नदियाँ बहती है, हवा चलती है, तरुवर फल देते हैं, सूर्य प्रकाश देता है  – सब दूसरों के लिए | ऐसा ही हमारे और श्री भगवान के साथ है |

मातृ तत्त्व का हमारे और पिता क सम्बन्ध में अहम योगदान होता है |

३) स्वोछिष्टायाम् स्रजिनिगळितम् या बलात्कृत्य भुंक्ते –

श्री गोदा देवी ने अपने प्रेम से प्लुत पुष्पमाला श्री भगवान को अर्पित की जिससे वे बंध गए, बिलकुल उस तरह जिस तरह एक मत्त हाथी एक रस्सी द्वारा बांधा जाता है | गोदा देवी ने अपना उच्छिष्ट अर्पित किया और श्री भगवान की कृपा को हठात् प्राप्त किया |

 क्या प्रभु को उच्छिष्ट अर्पित करना सही है? हमें तो श्री भगवान के लिए तैयार किये गए भोग व् पुष्पमाल इत्यादि को सूंघना भी नहीं चाहिए |

वस्तुतः हम सब एक प्रकार से भगवान को उच्छिष्ट ही प्रदान करते है : नाम संकीर्तन में | हम नाम संकीर्तन में श्री भगवान को उनके नाम अर्पित करते हैं, लेकिन उससे पहले उन नामों का रसास्वादन हम स्वयं करते हैं | उसके बाद ही हम पूर्ण भावना युक्त श्री भगवान को नाम अर्पित करते हैं | हम स्वयं भी उच्छिष्ट ग्रहण करते हैं, उदाहरणार्थ मधु, रेशम इत्यादि | हम  ये कहते हैं की शहद शत प्रतिशत शुद्ध है, परन्तु वह भी मधुमक्खियों का उच्छिष्ट ही होता है |

गोदा देवी ने दो प्रकार के उच्छिष्ट अर्पित किये:

१  पामालई : गीतों की माला

२ पूमालई : पुष्पों की माला

उन्होंने तीन मालाएं अर्पित करी :

१ पुष्पमाला

२ गीतमाला

३ वे स्वयं

४. गोदा तस्यै नमैदमिदम् भूय एवास्तु भूयः :

ऐसी श्री गोदा महारानी को मै बारम्बार प्रणाम करता हूँ तथा बारम्बार स्वयं को उन्हें समर्पित करता हूँ |

TANIYAN 3:

cuḍi koḍutta cuḍarkkoḍiyē! tolpāvai,

pāḍi aruḷavalla palvaḷaiyāi! nāḍi nī

veṅkaḍavaṛ kennai vidi yenṛa imāttam

nāṅgaḍavā vaṇṇame nalhu

O Āṇḍāḷ radiant like a flash of lightning! You bedecked yourself first with the garland intended for Lord Raṅganātha and then offered it to Him; by your great talent in poetry you composed the renowned and ancient hymn of Tiruppāvai. O Āṇḍāḷ adorned with many beautiful bangles, please shower your grace on us so that we may become greatly devoted to Lord Krishna; With the same sincerity of devotion that you asked of Kāmadeva — “O Kāmadeva, be pleased to make me a humble servant and bride of the Lord Veṅkaṭēśa!”

Interpreatation:

cuḍarkkoḍiyē!:

Golden creeper. Creeper requires something as support to climb. Lord is our support. He is ‘upayam’.

cuḍi koḍutta:

First decorated herself with garland and then offered the uchchhishtam to lord Vatpatrashayi. Thus, she is also called ‘cudi kodutta nachiyar’.

tolpāvai,:

Old ritual

pāḍi aruḷavalla:

The capability you have in singing. Gopis didn’t sing anything about the vratam, didn’t give any teachings. But, Goda is even greater. She sung and gave her teachings to us.

palvaḷaiyāi:

She is having bangles in her hand. Bangles Indicates that she is with her support, her spouse. Lord blessed you with his presence. He obeys you. He is your humble husband. His accessibility is well used by our divine mother.

When Husband is not present, even ring becomes bangles (bride becomes so thin due to pain of separation) and when husband is present, even bangles become rings (bride becomes healthy out of joy of union).  So, mention of bangle is deep and symbolic.

Goda prayed to Lord Srinivas Venkateshwar to make Ranganatha as her husband in ‘Nachiyar Thirumozhi’. Her wish was fulfilled too.  When Ramanuja constructed Govindaraja temple in Tirupati, he had this in his mind. The thayar (mother) in Govindraj temple is Goda devi.

There are some rishis who did tapas for God. There are some rishis for whom God did tapas (Alvars). While Vedas goes in search of Brahman, Brahman himself came running to the prabandham of Alvars. That’s the greatness of Divya Prabandham of Alwars.

Tanian 2

TANIYAN 2:

 anna vayaṛ puduvaiy āṇḍāḷ araṅgarku

pannu tiruppāvai palpadiyam, inniśayāl

pāḍi koḍuttāḷ naṛpāmālai, pūmālai

cuḍi koḍuttāḷai collu.

The saint-poetess Āṇḍāḷ was born in Srivilliputtur (puduvai) which was surrounded by paddy-fields and water reservoirs full of beautiful swans. She dedicated her beautiful garland of songs to Krishna, singing them sweetly. She also offered to Him (Krishna) the flower-garland, after wearing it herself. May all of us revere her and sing her poems.

Interpretation:

Vayar: crops.

Annam: swans (hanshas)

Sri villiputtur’s fields are surrounded by Swans (hansaas).When we see crop fields, we usually find only ducks and cranes, roaming around and eating fishes. But Sri villiputtur’s fields are not the same. They are filled with Swans. The beauty of Swans is that they separate milk from water and they walk elegantly as well.

We are the field (idam shareeram kauntey kshetrah, Geeta 13.2 ). These are not just hansaas but ‘Param-hansaas’ e.g Ramanuj, Parashar bhattar, Vedant-Desika.  Also, a Hansa walks beautifully, elegantly.

Goda devi teaches these hansas to walk beautifully in the field (Preaching). Thus Goda got her name “anna vayaṛ puduvaiy āṇḍāḷ”.

She Offered many beautiful songs (thirupavai) to  Aranga  (Lord Ranganath). Other than that, she herself wore a Garland of flowers and gave her uchchhistam to Ranganath Swami.

She taught us jeevatmas- “You be a garland and offer yourself to him. Chant his names using your mouth. Give out of joy, not forcefully.” Chant the names of Aandal.

Tanian 1

Parashar bhattar had unfathomable love for Goda Devi and the Thirupavai. He says that if someone doesn’t study the Thirupavai at least once, then their life is wasted. He wrote following taninan in glorification of Anadal.

nīḷātuṅga-stana giritaṭī suptam udbodhya kṛṣṇam

pārārthyaṃ svaṃ śruti śataśira˙ siddham adhyāpayantī |

svocchiṣṭāyāṃ sraji nigalitaṃ yā balātkṛtya bhuṅkte

godā tasyai nama idam-idam bhūya evāstu bhūyaḥ ||

LITERAL MEANING:

I offer my obeisance again and again to Goddess Āṇḍāḷ, to her and her alone, to the one who has awakened Lord Krishna sleeping on the mountain-like lofty breasts of Goddess Nīla, to Āṇḍāḷ who has informed him of her total dependence on him in accordance with the hundreds of Vedāntic texts, to Āṇḍāḷ who robustly enjoys Him, after binding him with the garlands that she had first worn.

Goda did 3 activities:

1) nilatungstan giritati supuddhodya Krishna:

She wakes up Krishna, who woke up everything and everyone. She wakes up the lord who created a lotus which gave birth to Brahma. When aatmas were lying like insentient beings during the great dissolution, he gave them bodies and senses. Goda wakes up such lord. This is her greatness. Nila devi puts him in sleep but Goda devi awakens him.

Parashar bhattar is called ‘Sringaar chakravarti’.

Why had Krishna slept?

He tried to preach and put jeevatmas in line but no one was ready to listen. Finally he got someone who pretended to be shishya but was not really a shishya (Arjun). Seeing all this, he went to sleep. Nila is ‘shyaam varna’ and Krishna too is likewise. He found some place and slept, hiding himself in the bosoms of Nila.

2) pararthyam swam shrutishat shirsasiddhmadhyyapayanti:

She gave lessons to Krishna. “You are sleeping my Lord. For what purpose have you taken avatar? These (jeevatmas) are our children, they make mistakes. Does a mother get upset with child? Wake up my Lord. Take care of them.”

 Protecting Jeevatmas is Bhagwaan’s essential nature. If Sun stops giving light, can it be called Sun? Lord’s pararthyam is to protect his devotees.

Our Pararathyam is to serve him.

Bhagwaan taught lessons to the world but Goda devi taught lessons to Krishna. What?!. About the pararthyam of both jeevatmas and parmatma.

Shrutisar shirah:

Upanishads, the main ones among the four parts of Vedas; called head of the Vedas.

They are talking about: Pararthyam (I don’t belong to myself but I am Bhagwan’s property, and whatever I have belongs to bhagwaan.) Bhagwaan too has pararthyam and Partantriyam. We are for his sake and he is for our sake.

Rivers flow, wind blows around, tree gives fruits, sun glows- all for others. Similar is with us and Bhagwaan.

The Mother plays a pivotal role between father and us.

3) swochchhistayam sraji niglitam ya balaatkritya bhunkte:

The one who offered garland dipped with her love and which bound Bhagwaan, not unlike like how a mad elephant is bound by a rope. She offered her uchchhistam (Swa-uchchhistam) of garlands and got his mercy forcefully.

Is it ok to offer uchchhistam to Lord? We should not even smell the food or flowers before offering it to perumal.

We all offer uchchhistam in one form. We do naam-sankirtan, and offer the names to Perumal to him. Before offering the names, we enjoy and relish it inside our mind and then offer names (Keshvaay namah) full of bhavana.  We offer uchchhistam to eat as well e.g Honey. But yet we say 100% pure honey although it is uchchhistam of Honey-bees. Same goes with Silk and Silk-worms.

Goda-devi taught us that let this be dedicated to him like she did. Take names of Narayana, relish it and offer the uchchhistam.

She offered 2 uchchhistams

1. Pamalai: Garland of Songs

2. pumaalai: Garland of Flowers

She offered 3 garlands

1) Flower garland

2) Songs garland

3) Her own self

godā tasyai nama idam-idam bhūya evāstu bhūyaḥ ||  

I bow down again and again to such Goda. I dedicate myself to her again and again.