तिरुप्पावै 29

कल की 28वीं गाथा में गोदाम्बा जी की गोष्ठी नप्पिनै के पुरुषकार से एवं, अकिंचन और अनन्य-गति होकर कृष्ण की शरणागति किये। यह द्वय मन्त्र के पूर्वार्द्ध का मन्त्रार्थ है।

आज की 29वीं गाथा में भगवान का सर्वदेश, सर्वकाल, सर्वविध एवं सर्वावस्था कैंकर्य माँगा जाता है। यह कैंकर्य भी एकमात्र भगवान की प्रसन्नता के उद्देश्य से हो। इसमें हमारी स्वार्थ-बुद्धि नहीं हो।

अथवा पूर्व में अनन्यार्ह शेषत्व का निवेदन कर चुकी हैं। 28वीं गाथा में अनन्य शरणत्व और आज की 29वीं गाथा में अनन्य भोग्यत्व का प्रकाशन करती हैं।

श्री उ वे भरतन् स्वामी द्वारा अनुगृहीत 29वें पद का संस्कृत छन्दानुवाद:

२९.प्रत्यूष उपगम्य त्वां सेवित्वा, स्वर्णभास्वती ।
पदाम्भोजे तव स्तुत्वा प्रार्थ्यमानं फलं शृणु ।।
धेनुसंचारणाजीवे वंशेऽस्मिन्नवतीर्ण! भोः ।
त्वमन्तरङ्गकैङ्कर्यम् अस्मत् स्वीकर्तुमर्हसि ।।
अद्य भेरीमिमां लब्धुम् वयं गोविन्द ! नागताः।
अवतारेऽप्यजस्रं त्वत्सम्बन्धिन्यो भवाम हि।।
शेषवृत्तीश्च कुर्याम त्वत्प्रीत्येकप्रयोजनाः ।
कृपयैतद्विरुद्धान्नः कामानन्यान् निवर्तय ।।

तमिल मूल गाथा:

सिऱ्ऱम् सिऱु काले वन्दु उन्नैच् चेवित्तु उन्
पोऱ्ऱामरै अडिये पोऱ्ऱुम् पोरुळ् केळाय्
पेऱ्ऱम् मेय्त्तु उण्णुम् कुलत्तिल् पिऱन्दु नी
कुऱ्ऱेवल् एन्गळैक् कोळ्ळामल् पोगादु
इऱ्ऱैप् पऱै कोळ्वान् अन्ऱु काण् गोविन्दा
एऱ्ऱैक्कुम् एळेळ् पिऱविक्कुम् उन्दन्नोडु
उऱ्ऱोमे आवोम् उनक्के नाम् आट् सेय्वोम्
मऱ्ऱै नम् कामन्गळ् माऱ्ऱु एलोर् एम्बावाय्।।

श्री उ वे रंगदेशिक स्वामी द्वारा विरचित गोदा-गीतावली से
श्री उ वे सीतारामाचार्य स्वामीजी द्वारा विरचित हिन्दी छन्दानुवाद

**सिऱ्ऱम् सिऱु काले वन्दु
“प्रातः काल आकर हमलोग”

(भगवद-अराधना हेतु प्रातःकाल सर्वश्रेष्ठ होता है। इस काल में सत्त्व-गुण परिपूर्ण होता है। ‘ब्राह्मे मुहूर्ते उत्तिष्ठेत् स्वस्थो रक्षार्थमायुषः’। )
इस शरद ऋतु में प्रातःकाल ठंढे यमुना जल में स्नान करके हम आयी हैं।)

कन्हैया तो भोर होते ही गैया चराने चल जाता है। दोपहर को ऋषि पत्नियों के हाथ का भोजन करता है। देर शाम को गैयों के पीछे पीछे घर आता है। फिर नन्दजी के साथ बैठकर भोजन करता और खेलने निकल जाता है। उससे मिलना है तो ब्रह्म-मुहूर्त काल की श्रेष्ठ है।

**उन्नैच् चेवित्तु

“आपके दर्शन/सेवा हेतु”

(अपने सखियों को जगाकर, द्वारपालक एवं क्षेत्रापालक की आज्ञा लेकर, नन्दगोप, यशोदा एवं बलराम को उठाकर, नप्पिनै के पुरुषकार से आपके पास आये हैं।)

**उन् पोऱ्ऱामरै अडिये पोऱ्ऱुम्

“स्वर्ण कमल के समान सुन्दर और सुगन्धित आपके चरण कमलों के गुणगान करने आई हैं।”

इस प्रबन्ध के प्रारम्भ में, मध्य में एवं अन्त में मंगलाशासन है। अर्थात इस ग्रन्थ का उद्देश्य मंगलाशासन करना ही है।

**पोरुळ्
“हमारे वाँछित फल”

क्या गैयों के पीछे चलते-चलते तुम्हारी बुद्धि भी पशु-समान हो गयी है? हम कोई लौकिक पदार्थ माँगने नहीं आयी हैं। पूर्व में हमने जो ढोल आदि पदार्थ माँगे थे वो तो दिखावा मात्र थे। वरना वृद्ध गोपियाँ हमें कभी तुम्हारे पास नहीं आने देतीं।

ये व्रत तो तुमसे मिलने का व्याज मात्र है।

केळाय् : सुनो

कृष्ण गोपियों के प्रेम में इतने मग्न हैं, उन्हें एकटक से निहार रहे हैं । गोदा को उन्हें बोलना पड़ है कि तन्द्रा से जागो और सुनो।

**पेऱ्ऱम् मेय्त्तु उण्णुम् कुलत्तिल् पिऱन्दु नी
कुऱ्ऱेवल् एन्गळैक् कोळ्ळामल् पोगादु

“तुम हमारे ग्वाल कुल में जन्म लिए जो गाय चराकर पेट भरते हैं। आपको हमारी सेवायें प्राप्त करनी चाहिये।”

(तुम्हारे अवतार का उद्देश्य ही जीवात्म-प्राप्ति है। तुम यदि बैकुंठनाथ होते तो हम निर्बंध नहीं करते। लेकिन तुम तो हमारे साथी ग्वाल हो। सौलभ्य-परिपूर्ण हो। तुम न नहीं कह सकते।)

**कुऱ्ऱेवल् एन्गळैक् कोळ्ळामल् पोगादु

“तुम्हें हमें अस्वीकार नहीं करना चाहिए अपितु अंतरंग कैंकर्य प्रदान करना चाहिए”

(गोदाम्बा अन्तरंग कैंकर्य चाहती हैं। लक्ष्मण जी की तरह। बहिरंग कैंकर्य से को संतुष्ट नहीं होतीं।)

(भगवान से कुछ माँगते समय स्पष्ट होना चाहिए। देवकी ने सिर्फ पुत्र रूप में प्राप्ति मांगा था और यशोदा ने बाल लीला। दोनों को सिर्फ उतना ही मिला।)

**इऱ्ऱैप् पऱै कोळ्वान् अन्ऱु काण् गोविन्दा

“हे गोविन्द! हम यहाँ ढोल माँगने नहीं आयी हैं।”

(अब तो गोदाम्बा कहती आईं कि हमें ढोल/भेरी चाहिए। अब बोल रही हैं कि ढोल कहना तो सिर्फ आपके पास आने का बहाना था। गाँव के वृद्ध उन्हें कृष्ण के पास जाने नहीं देते। व्रत के बहाने ही वो राजी हुए हैं। अथवा, ढोल माँगना कैंकर्य का उपलक्षण है।)

**एऱ्ऱैक्कुम् एळेळ् पिऱविक्कुम् उन्दन्नोडु उऱ्ऱोमे आवोम्

“हम जितने भी जन्म लें, आपके साथ ही रहें।”

(चाहे वैकुण्ठ हो या कहीं और, हमें तुम्हारे साथ ही रहना है, तुम्हारा अन्तरंग कैंकर्य करना है। अन्तरंग कैंकर्य का अर्थ है साथ में रहकर प्रत्यक्ष रूप से कैंकर्य करना। श्री वैष्णवों के लिए यही अभीष्ट है कि आचार्य के पास रहकर उनकी सेवा करें। दूर रहकर बहिरंग कैंकर्य यदि आचार्य आज्ञा दें तभी।

आप वैकुण्ठ में हो तो वहाँ अनेक शरीर धारणकर आपकी सेवा करें। आप अवतार धारण करें तो वहाँ भी हम आपके साथ हों। लक्ष्मण जी की भाँति। भगवान वेंकटेश हैं तो वो वेंकट पर्वत। भगवान रंगनाथ हैं तो वो रामानुज। आदि रूपों से।)

** उनक्के नाम् आट् सेय्वोम्

“तवैव दास्यं करवाम। हम केवल आपकी ही दासता करें।”

(आपकी ही करें कहने का अर्थ सिर्फ इतना नहीं कि आपके अतिरिक्त अन्यों की सेवा न करें। अपितु यह कि “आपकी प्रसन्नता हेतु ही आपका कैंकर्य करें।” यहाँ कैंकर्य में स्वार्थ-बुद्धि का निषेध किया जाता है। अपनी इच्छा से या अपनी प्रसन्नता हेतु हम भगवान की सेवा नहीं करते। एकमात्र उद्देश्य भगवान की प्रसन्नता, उनका मुखोल्लास है।

‘तुम्हारे सुख के लिए ही’ – ऐसा कहने इस बुद्धि का खण्डन हो गया तुम्हारी भी प्रसन्नता और मेरी भी प्रसन्नता हेतु कैंकर्य हो। एकमात्र भगवान की मुखोल्लास हेतु कैंकर्य करना है।

कैंकर्य करते समय हम प्रसन्न भी इसी कारण होंगे कि हमें प्रसन्न देखकर भगवान भी प्रसन्न होंगे। हम यदि उदास मुझ से सेवा करेंगे तो भगवान को आनन्द नहीं आएगा।)

**मऱ्ऱै नम् कामन्गळ् माऱ्ऱु

“हमारी अन्य सभी कामनाओं को परिवर्तित कर दो।”

(गोदाम्बा यहाँ कामनाओं को नष्ट करने की बात नहीं करती। कामनाओं को नष्ट करना विनाशकारी हो सकता है। कामनाओं को दबाएं नहीं अपितु उन्हें भगवान की तरफ मोड़ दें। उदाहरण के लिए यदि पुत्र से आसक्ति हो तो पुत्र को भगवान का उपहार और उसे भगवत-प्राप्ति के मार्ग में लगाने को अपना कर्तव्य समझें। यदि सुस्वादु भोजन में रुचि आये तो उसे भगवान को समर्पित करें और भगवान की प्रसन्नता हेतु सुस्वादु खाना पकाएं।)

(हम प्रातःकाल सत्त्वगुण से पूर्ण होने के कारण निःस्वार्थ कैंकर्य माँग रहे हैं। यदि बाद में तमोगुण के प्रभाव में कुछ स्वार्थ माँग भी लें तो उसे अपनी कृपा से परिवर्तित कर दें।)

स्वापदेश:

गोविन्द: नारायण

उनक्के नाम् आट् सेय्वोम् : आय (कैंकर्य प्रार्थना)

मऱ्ऱै नम् कामन्गळ् माऱ्ऱु : नमः (स्व-भोग्यत्व निवृत्ति)

किंकर वो होता है जो कैंकर्य प्रार्थना करता है: ‘किं करवाणि’ (मैं क्या सेवा कर सकता हूँ।) अपने मन-मर्जी से कुछ भी करना कैंकर्य नहीं है। हमारा स्वरूप सिर्फ कैंकर्य-प्रार्थना करना है। क्या कैंकर्य देना है, ये भगवान/आचार्य का अधिकार है।

शेष वही होता है, जो कैंकर्य प्रार्थना करे। इस कारण ‘कैंकर्य प्रार्थना’ करना हमारा स्वरूप ही है।

किन्तु प्रार्थना क्यों करें?

जिस प्रकार माता का पुत्र बहुत काल से बीमार हो, कुछ खाता पिता न हो। किन्तु जब वह स्वस्थ होता है और माँ से बोलता है कि खाना दो, तब माँ को कितनी प्रसन्नता होती है! यदि बच्चा न माँगे, फिर भी माता खाना अवश्य देगी। डाँटकर भी खिलाएगी। किन्तु जब बच्चा स्वयं खाना माँगे तो माँ को अतिशय प्रसन्नता होती है।

हम भी अनेक काल से भगवान के द्रोही थे। जब हम कैंकर्य प्रार्थना करते हैं तो भगवान को प्रसन्नता होती है। भगवान के इसी प्रसन्नता हेतु हमें नित्य ही कैंकर्य प्रार्थना करना है।

तिरुप्पावै 27

गोविन्द नाम से सम्बोधन, घृतपूरित क्षीरान्न का भोग लगाती हैं एवं कृष्ण से सायुज्य माँगती हैं। गोपियाँ अपने लिए विभिन्न आभूषण माँगती हैं।

आज 27वीं गाथा में गोदाम्बा भगवान को अक्कार-अडिसल नामक क्षीरान्न का भोग लगती हैं। इसकी सामग्री एवं विधि स्वयं इस गाथा में बताती भी हैं। इसका गूढ़ार्थ ‘सायुज्य‘ है। पूर्व में वो सालोक्य तो प्राप्त कर ही चुकी हैं। ‘सारूप्य’ 26वीं गाथा में मिल गया। सारूप्य अर्थात भगवान के समान रूप का हो जाना। चतुर्भुज होकर शङ्ख-चक्र धारण किये होते हैं नित्य और मुक्त।

सायुज्य का अर्थ है भगवान से जुड़ जाना। किस प्रकार? जैसे अक्कार-अडिसल में दूध, घी, चावल और गुड़ मिल जाता है। उनके एक दूसरे से पृथक कर पाना सम्भव नहीं है। मुक्ति की अवस्था में जीवात्मा और परमात्मा की यही अवस्था होती है। जीवात्मा के भोग्य परमात्मा होते हैं एवं परमात्मा के भोग्य जीवात्मा। दोनों ऐसे घुल-मिल जाते हैं मानों दो नहीं एक हों। यही सायुज्य आज गोदाम्बा को प्राप्त होता है।

कूडारै वेल्लुम् सीर्क् गोविन्दा उन्दन्नैप्
पाडिप् पऱै कोण्डु याम् पेऱु सम्मानम्
नाडु पुगळुम् परिसिनाल् नन्ऱाग
सूडगमे तोळ् वळैये तोडे सेविप्पूवे
पाडगमे एन्ऱु अनैय पल् कलनुम् याम् अणिवोम्
आडै उडुप्पोम् अदन् पिन्ने पाल् सोऱु
मूड नेय् पेउदु मुळन्गै वळिवार
कूडि इरुन्दु कुळिर्न्दु एलोर् एम्बावाय्

श्री उ वे रंगदेशिक स्वामीजी द्वारा विरचित गोदा-गीतावली से:

श्री उ वे सीतारामाचार्य स्वामीजी द्वारा विरचित हिन्दी छन्द

श्री उ. वे. भरतन् स्वामी द्वारा अनुगृहीत 27वीं गाथा का संस्कृत छन्दानुवाद:

२७.शत्रुजिद्गुण! गोविन्द ! त्वां वै संकीर्त्य, भेरिकाम् ।
लब्ध्वाऽस्माभिः सभूश्लाघं प्राप्यः सम्मान उच्यते ।।

वलयाङ्गदताटङ्ककर्णपुष्पाङ्घ्रिभूषणम् ।
बहून्याभरणान्येवं वयं सम्यग्धरेमहि ।
क्षौमवस्त्रं वसित्वाऽथ क्षीरान्नं घृतपूरितम् ।
सङ्घीभूय मुदाऽद्याम कफोणिप्रवहद्घृतम् ।।

**कूडारै वेल्लुम् सीर्क् गोविन्दा: शत्रुओं को जीतने वाले गुण वाले गोविन्द!

किसी को अपने वीर्य, शौर्य पराक्रम से (जयन्त आदि) तो किसी को अपने प्रेम, सुशील्य, सौन्दर्य आदि से जीत लेने वाले भगवान गोविन्द।

गोपियाँ भी पूर्व में ‘कूडार’ थीं। किन्तु भगवान की भोग्यता ने उन्हें जीत लिया और वो प्रेम-परवश होकर उनके महल में आ चुकी हैं।

गोविन्द नाम से भगवान के सौलभ्य का बोध होता है। तुम कोई वैकुंठाधीप या मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं हो अपितु हमारे साथ अभीरों के कुल में उत्पन्न हुए हो।

भगवान की प्रथम कृपा है भगवान के प्रति द्वेष भाव का नष्ट होना| अद्वेष के बाद आभिमुख्य एवं सात्त्विक-सम्भाषण आदि प्राप्त होते हैं| आज जो हम स्वयं को भगवान का भक्त कहकर गर्व अनुभव करते हैं, पूर्व काल में हम सभी भगवान के प्रति शत्रुता रखते थे| भगवान ने हमें अपने रूप, गुण, कृपा आदि से जीतकर हमें भक्त बनाया है| इसमें हमें गर्व लेने जैसा कुछ नहीं है, यह भगवान की ही कृपा है|

**उन्दन्नैप् पाडिप् पऱै कोण्डु याम् पेऱु सम्मानम्

हम आपके गुण आयेंगी और आप हमें भेरी (कैंकर्य) दीजिये और सम्मानित कीजिये।

जब कोई जीवात्मा वैकुण्ठ में प्रवेश करता है तो भगवान नित्यो एवं मुक्तों की भी अवहेलना करते हुए उसे प्रेम करते हैं। जैसे कोई गैया अपने नए बछड़े की सुरक्षा हेतु अपने पुराने बच्चों को भी दूर भगाती है और झिड़क देती है।

**नाडु पुगळुम् परिसिनाल् नन्ऱाग

आप हमें ऐसा सम्मान दीजिये कि तीनों में लोग आश्चर्य करें।
(कि भगवान जीवों से कितना प्रेम करते हैं)

गोपियाँ को जो भी प्राप्त है वो भगवान की कृपा से ही प्राप्त है| इसलिए गोपियाँ अपने लिए सम्मान इसलिए माँग रही हैं ताकि भगवान का गौरव हो| गोविन्द जीयर को किसी ने विद्वान कहकर प्रशंसा किया तो उन्होंने स्वीकार किया कि हाँ मैं विद्वान हूँ| क्योंकि अपनी विद्वत्ता को रामानुज स्वामी की कृपा से प्रदत्त मानते हुए वो इसे रामानुज स्वामी की ही प्रशंसा मान रहे थे|

क्योंकि भगवान के अनुग्रह से ही प्रशंसापात्र बन गयी है । अतः ऐसी प्रशंसा के चाहने में और सुनने में कोई आपत्ति नहीं है ।दूसरी बात यह है कि यह प्रशंसा सुनकर कितने ही उदासीन एवं द्वेषी जन भी ऐसे सन्मान पाने के लिए भगवान में भक्ति करने लगेंगे ।

**पाडगमे एन्ऱु अनैय पल् कलनुम् याम् अणिवोम्

आपसे और नप्पिनै से हमें भांति भांति के आभूषण धारण को मिलते है, जैसे कंगन, बाजूबन्द, कुण्डल, कान में ऊपर की तरफ पहना जाने वाला आभूषण , पायल और भी अन्य।

(जीवात्मा के विरजा पर करने के बाद उसे सरोवर में स्नान करवाकर, अनेक प्रकार के सुगन्धित वस्त्र एवं आभूषण लक्ष्मी अम्मा भेजवाती हैं।)

**आडै उडुप्पोम् अदन् पिन्ने पाल् सोऱु
मूड नेय् पेउदु मुळन्गै वळिवार
कूडि इरुन्दु कुळिर्न्दु एलोर् एम्बावाय्

हम सब आप द्वारा प्रसादित वस्त्र धारण कर, हम सभी घी से तर अक्कारवड़ीसल (एक मीठा अन्न जो चांवल, दूध, गुड़ और घी के मिश्रण से बनता है) पायेंगे, जिसे पाते समय घी, हथेलियों से निकल कोहनियों से बहा रहा होता है ।

*एक मास तक घृत का सेवन गोपियों ने नहीं किया और श्रीकृष्ण भी अकेले इसका उपयोग न कर सके ।फलतः व्रज में घृत इतना इकट्टा हो गया की रखने के लिए जगह नहीं है इसलिए गोपियाँ कहती है की वह सब घृत क्षीरान्न में लगा दिया जाय ।*

*सभी दिव्य देशों में इतने दिन पोंगल का भोग लगता है और 27वे पाशुर के दिन उसमें वर्णन किये गये अनुसार घृत पूर्ण क्षीरान्न का भोग भगवान को लगाया जाता है ।*

चावल यदि जीव है तो दूध भगवान के कल्याण गुण। उसके ऊपर तैर रहा घी हमारा उमड़ रहा प्रेम है। दूध और चावल अर्थात ब्रह्म और जीव एक दूसरे का इस प्रकार आनन्द ले रहे हैं कि एक-दूसरे से सायुज हो चुके हैं।

सोഽश्नुते सर्वान कामां सह ब्रह्मणा विपश्चितेति ..|| 2.1.1 || तैतरीय उपनिषद

वो जीवात्मा ब्रह्म के साथ उसके सभी गुणों को भोग करता है।

यह भी स्मरण करना चाहिए:

अहमन्नमहमन्नमहमन्नम्। अहमन्नादो२ऽहमन्नादो२आहमन्नादः।
अहमन्नमन्नमदन्तमा३द्मि

जीवात्मा: मैं अन्न हूँ! मैं अन्न हूँ!

परमात्मा: मैं अन्न अन्नभोक्ता हूँ! मैं अन्नभोक्ता हूँ! मैं अन्नभोक्ता हूँ!

जीवात्मा: मैं मुझे खाने वाले को खा रहा हूँ।

इस प्रकार की दशा सायुज्य है जो आज गोदाम्बा को प्राप्त होता है।

श्री रामानुजाचार्य एवं आलवार आचार्य बताते हैं कि यह पाशुर कैंकर्य सिद्धांत को स्थापित करता है—मोक्ष का अर्थ भगवान की नित्य सेवा है। भगवान स्वयं भक्तों को अपने पास बुलाते हैं और सेवा का अधिकार देते हैं।

कोहनी से घृत गिरना इसका अर्थ है *आचार्य शिष्य परम्परा द्वारा भगवत भागवत आचार्य गुणानुवाद करना ।*

भूषणों का रहस्य –

👉चूड़ी – चूड़ी शब्द से हस्त का भूषण अंजलि मांगी जाती है । *आचार्य कृपा से सदैव अंजलिहस्त के साथ आपकी सेवा में रहे ।*

👉भुजभूषण ( बाजुबन्द ) – *शंख चक्राकंन ही दोनों बाहुओं के भूषण है* जो आचार्य कृपा से मिलते है ।

👉कान के कुण्डल – *कान का भूषण भगवत कथा और आचार्य वैभव श्रवण है ।*

👉पादभरण – भगवान और आचार्य सन्निधि में जाना ही पैरों का आभूषण है । *निरन्तर भगवत भागवत आचार्य सेवा करने का भाग्य माँगा जाता है ।*

तिरुप्पावै 26

गोदाम्बा ने भगवान का मंगलाशासन किया, अवतार रहस्य ज्ञान से उनकी प्रशंसा की तो प्रसन्न होकर उनके आने का प्रयोजन पूछते हैं। यद्यपि पूर्व में भी गोदाम्बा ने कहा है कि हम आपसे भेरी अर्थात कैंकर्य माँगने आये हैं किन्तु भगवान उनसे उनके व्रत के विषय में पूछते हैं। व्रत तो व्याज/बहाना है। बृद्ध गोपों ने इसी व्रत के कारण गोपियों को कृष्ण से मिलने की अनुमति दी है। इसलिए कृष्ण भी व्रत के एच्छित सामग्रियाँ पूछती हैं।

श्रृंखला : तिरुप्पावै (गोदा देवी जी का दिव्य व्रत)

माले मणिवण्णा मार्गळि नीर् आडुवान्
मेलैयार् सेय्वनगळ् वेण्डुवन केट्टियेल्
ग्यालत्तै एल्लाम् नडुन्ग मुरल्वन
पाल् अन्न वण्णत्तु उन् पान्चसन्नियमे
पोल्वन सन्गन्गळ् पोय्प्पाडु उडैयनवे
सालप् पेरुम् पऱैये पल्लाण्डु इसैप्पारे
कोल विळक्के कोडिये विदानमे
आलिन् इलैयाय् अरुळ् एलोर् एम्बावाय्

श्री उ वे रंगदेशिक स्वामीजी द्वारा विरचित ‘गोदा-गीतावली’ से

श्री उ वे मीमांसा शिरोमणि भरतन् स्वामी द्वारा अनुगृहीत 26वीं गाथा का संस्कृत छन्दानुवाद:

श्रितेषु वत्सल! स्वामिन् ! इन्द्रनीलाभकान्तिमन्!।
पूवैराचरितायास्मै मार्गशीर्षाप्लवाय नः ।।
अपेक्षितानि वस्तूनि कथ्यन्ते शृणुतादयि ! ।
बृहत्तमाश्च सर्वस्या जगत्याः कम्पदस्वनाः।।
पय:समानवर्णात्वत्पाञ्चजन्याभकम्बवः ।
सुमहद् भेरिवाद्यं च मङ्गलस्तुतिगायकाः ।।
रम्यदीपो ध्वजोल्लोचौ सर्वमेतदपेक्षितम् ।
कृपया परया देहि वटपत्रपुटेशय ! ।।२६।।

श्री उ वे सीतारामाचार्य स्वामीजी द्वारा विरचित हिन्दी छन्द

**माले: इसके तीन अर्थ हो सकते हैं। व्यामोह/प्रेम, बहुत बड़ा और श्यामल

प्रसंग से व्यामोह अर्थ लेना ही उचित है। किन्तु भगवान को ‘व्यामुग्ध’ बोलना चाहिए। जिसे व्यामोह होता है उसे व्यामुग्ध कहते हैं। किन्तु गोदाम्बा कृष्ण को ‘व्यामोह’ या ‘प्रेम’ कहती हैं।

आचार्यजन इसे समझाते हैं। जैसे पाक में नमक अधिक हो तो कहते हैं कि ये पाक नहीं, नमक ही है। कोई व्यक्ति अत्यन्त क्रोधी हो तो उसका नाम ही क्रोध रख देते हैं। उसी भगवान में भक्तों के प्रति व्यामोह इतना विशेष है कि उनका नाम ही हो गया है: “व्यामोह”।

सहस्रागीति में शठकोप आळ्वार भगवान के प्रति अपने प्रेम का वर्णन करते हुए कहते हैं कि ये तीनों सागर से भी अधिक बड़ा है। आगे जाकर कहते हैं कि ये जीवात्मा से भी बड़ा है। फिर अन्त में कहते हैं कि ये तो भगवान के सर्व-व्यापक स्वरूप से भी बड़ा है। अर्थात उत्तरोत्तर उनका प्रेम बढ़ता जाता है और वो पर-भक्ति, पर-ज्ञान की अवस्था से आगे जाकर परम भक्ति की अवस्था में आ जाते हैं।

फिर वो भगवान को उनकी सौगन्ध देते हुए कहते हैं कि तुम मुझे अपना लो, मैं तुमसे इतना प्रेम करता हूँ कि तुम्हें खा जाऊंगा। किन्तु जब उन्हें भगवान के दर्शन होते हैं और वो भगवान का उनके लिए प्रेम देखते हैं तो द्रवित होकर पिघल जाते हैं। कहते हैं कि मैं तो सोचा था कि भगवान को खा जाऊँगा लेकिन वो तो मुझे पी गए। खाने के अपेक्षा पीना अधिक सरल होता है। अर्थात भगवान का जीवात्मा के प्रति प्रेम, जीवात्मा का भगवान के प्रति प्रेम से कहीं अधिक है।

भगवान के इसी व्यामोह का दर्शन करते हुए गोदाम्बा उन्हें ‘व्यामोह कृष्ण’ कहती हैं।

यहाँ भगवान के शरणागत-वत्सल होने का अनुसंधान करना चाहिए। पूर्व गाथा में अवतार रहस्यज्ञान के विषय में बोला गया। भगवान के अवतार लेने के पीछे उद्देश्य तो एक ही है: जीवात्म-प्राप्ति।

**मणिवण्णा: मणि के समान वर्ण वाले। अर्थात नीला।

आकाश और सागर को नीला रंग का क्यों कहते हैं? क्योंकि वो अत्यन्त विशाल हैं। किन्तु भगवान से अधिक विशाल क्या होगा?

अथवा मणि के समान बहुमूल्य, तेजस, भयहरण आदि गुणों वाले।

माले से कहा गया कि शरणागत-वत्सल भगवान जीवात्म से इतना प्रेम करते हैं कि उन्हें प्राप्त करने हेतु संसार में आते हैं।
अब कहती हैं कि तुम हमें प्रेम न करो फिर भी तुम्हारे सौन्दर्य से वशीभूत हम तुम्हें नहीं छोड़ सकतीं।

**मार्गळि नीर् आडुवान्

हम मार्गशीर्ष अवगाहन स्नान का व्रत करेंगी।
ये व्रत क्या है?

मेलैयार् सेय्वनगळ्
ये व्रत तो अत्यन्त प्रसिद्ध है। हमारे पूर्वजों ने किया है (द्वापर की गोपियाँ)। स्नान का व्यंगार्थ भगवान का गुणानुभव है।

कृष्ण कहते हैं कि ठीक है, व्रत के हेतु तुमलोग सामग्री माँगने आये हो न। क्या चाहिए?

यहाँ व्यंगार्थ अत्यन्त महत्वपूर्ण है। पूर्व में कहा था कि जो पूर्वजों ने नहीं किया है वो हम नहीं करेंगी (सैय्यादन सैयोम) और अब कह रही हैं कि जो पूर्वजों ने किया, वैसा ही करेंगी। अर्थात जैसा शिष्टाचार है वही करेंगी, उसके विपरीत कुछ भी नहीं करेंगी।

**ग्यालत्तै एल्लाम् नडुन्ग मुरल्वन
पाल् अन्न वण्णत्तु उन् पान्चसन्नियमे

पाञ्चजन्य के समान श्वेत शङ्ख, जिसकी नाद पूरा संसार सुने।

(पाञ्चजन्य के समान दूसरा क्या हो सकता है? अर्थात पाञ्चजन्य ही चाहिए। और भगवान पाञ्चजन्य से दूर कैसे रह सकते हैं? अर्थात भगवान, तुम स्वयं को हमें दे दो।)

** सालप् पेरुम् पऱैये

जोर से आवाज करने वाला ढोल चाहिए।
(अर्थात कैंकर्य)

**पल्लाण्डु इसैप्पारे
आपका मंगलाशासन करने वाले लोग चाहिए

(अर्थात गरुड़ आदि नित्य सूरी वर्ग)

**कोल विळक्के कोडिये विदानमे

मङ्गल दीप, ध्वजा और वितान चाहिए

(आचार्य इसका व्यंगार्थ ज्ञान, वैराग्य और भक्ति कहते हैं।)

अथवा, मङ्गल दीप अर्थात नप्पिनै देवी, ध्वजा अर्थात गरुड़ जी और वितान अर्थात अनन्त शेष जी।

इन सबके के साथ, अनवधिक परिजन परिचारकों के साथ, दिव्य आयुधों को धारण किये आप ही चाहिए।

**आलिन् इलैयाय् अरुळ्

हे वटपत्रशायी! कृपा करके ये सब प्रदान कीजिये

वटपत्रशायी लीला अचिन्त्य है। जब तीनों लोकों को आपने अपने उदर में खा लिया था तो आप किस प्रलय जल पर लेटे थे। तीनों लोक आपके भीतर और प्रलय जल के ऊपर।

फिर आपके लिए हमारे एच्छित वस्तुएँ देना कोई बड़ी बात तो नहीं है कृष्ण!

तिरुप्पावै 25

25 वीं गाथा में गोदाम्बा अब अवतार रहस्य ज्ञान के विषय में बताती हैं। भगवान को व्यामोहशील/प्रेम-मूर्ति श्रीपति कहकर सम्बोधित करती हैं एवं श्री देवी के समान ही कैंकर्य की प्रार्थना करती हैं।

ऋषि भगवान के लिए ‘आविर्भाव’ शब्द प्रयोग करते हैं। वो समझते हैं कि भगवान के लिए ‘जन्म’ शब्द का प्रयोग करना भगवान के परत्व के अनुरूप नहीं होगा।

किन्तु आळ्वार एवं गोदाम्बा यह सोचते हैं कि ‘आविर्भाव’ शब्द के प्रयोग से भगवान का ‘सौलभ्य’ ही नष्ट हो जाएगा। वैकुण्ठनाथ का विशेष गुण है परत्व। किन्तु अवतारों का विशेष गुण है ‘सौलभ्य’ एवं ‘सौशील्य’। अक्रूर, मालाकार जैसे परम भक्तों के लिए सुलभ होने हेतु ही भगवान अवतार लेते हैं (परित्राणाय साधूनां)। दुष्टों का विनाश प्रमुख प्रयोजन नहीं है (विनाशाय च दुष्कृताम्)। बाकि शिशु तो 9 महीने माता के गर्भ में रहते हैं किन्तु कन्हैया 12 महीने देवकी के गर्भ में रहे। दुग्ध पान उन्होंने यशोदा के स्तन का किया, इसलिए वो भी माता हुईं।

भगवान को पुत्र रूप प्राप्त करने हेतु 4 लोगों ने तपस्या की। इस प्रकार भगवान के 2 माता एवं 2 पिता हुए।

श्रृंखला : तिरुप्पावै (गोदा देवी जी का दिव्य व्रत)

श्री उ वे रंगदेशिक स्वामी द्वारा विरचित ‘गोदा गीतावली’ से:

श्री उ वे भरतन् स्वामी द्वारा अनुगृहीत 25वीं गाथा का संस्कृत छन्दानुवाद:

२५.एकस्या मातुरुद्भूय निशीथिन्यां तदैव हा।
अन्यस्या आत्मजो भूत्वा वर्धमाने रहस्त्वयि ।।।
असहिष्णुस्ततः कंसो मतिं चक्रे तवाहिते।
विफलां तां मतिं कृत्वा कुक्षौ तस्याग्निवत्स्थित !

अतिव्यामोहशालिन् ! त्वां प्रार्थयन्त्यो निजाशिषम्।
समायाता वयं बाला यदि भेरीं ददासि नः ।।
श्रियाऽभिलष्यमाणां ते सम्पदं वीरकर्म च ।
गीत्वा शोकाद्विनिर्मुच्य भविष्याम: प्रहर्षिताः ।।

श्री सीतारामाचार्य स्वामीजी द्वारा विरचित हिन्दी छन्द

**ओरुत्ति मगनाय्प् पिऱन्दु ओर् इरविल्:-
“एक रात्री को एक माता का पुत्र बन जन्म लेकर”

एक कहने का अर्थ है ‘अद्वितीय’। जैसे ‘दया के एक सिंधु’ कहने का अर्थ है ‘दया के अद्वितीय सिन्धु’।

हमारा जन्म कर्म-कृत होता है जबकि भगवान स्वयं अपने संकल्प से जन्म लेते हैं। हम पंच-भूत से बने प्राकृत शरीर धारण करते हैं जबकि भगवान का शरीर स्वयं-प्रकाश अप्राकृत तत्त्व से निर्मित होता है। हमारा जन्म हमारे भगवान से विलग होने का कारण बनता है जबकि भगवान का जन्म का उद्देश्य हमें प्राप्त करना होता है।

इसलिये भगवान के जन्म के लिए ‘अद्वितीय’ शब्द का प्रयोग उचित है।

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।

त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन।।4.9।।

किन्तु आसुरी स्वभाव के लोग भगवान के जन्म को साधारण ही समझते हैं।


सामान्य तौर पर विद्वान जन भगवान के परत्व का ध्यान कर भगवान के लिए ‘जन्म लेना’ न कहकर ‘आविर्भाव होना’ कहते हैं। किन्तु गोदाम्बा भगवान के सौलभ्य का अनुभव करते हुए ‘जन्म लेना’ ही कहती हैं। पूर्व में वो भी “गोप कुल में आविर्भूत होने वाले” ऐसा कह चुकी हैं। किन्तु अब जब उन्हें भगवान के सौलभ्य के दर्शन हुए तो ‘जन्म लिए’ ऐसा ही कहती हैं।

अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्।

परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्।।9.11।।

देवकी अद्वितीय कैसे हैं? जिस माता के गर्भ में भगवान 12 मास रहे, वो अद्वितीय ही हैं। ऐसे भी पुत्र होते हैं जो माता पिता की बात नहीं सुनते किन्तु कृष्ण तो जन्म लेते ही माता की आज्ञा का परिपालन करने लगते हैं। जब देवकी ने कहा, “अपने इस चतुर्भुज रूप का उपसंघार करो वरना कंस जान जाएगा।” तब कंस वध के पश्चात कृष्ण चतुर्भुज ही रहे।

रात्रि किस प्रकार अद्वितीय है? जिस प्रकार जन्म लेते ही लीलाएँ करते हैं, वो रात्रि ही अद्वितीय हो गयी।

**ओरुत्ति मगनाय् ओळित्तु वळरत्

उसी रात्री को अन्य अद्वितीय माता (यशोदा) के पुत्र बनकर।

यशोदा भी अद्वितीय हैं क्योंकि जिस प्रकार बाल-लीलाओं का यशोदा ने अनुभव लिया, वैसा किसी अन्य माता ने नहीं। नरसिंह अवतार में उनकी माता तो एक खम्भा थी। हरि अवतार में गज की रक्षा हेतु सीधे वैकुण्ठ से गरुड़ छोड़कर आ गए। राम भी मर्यादा पुरुषोत्तम थे। किन्तु कृष्ण तो लीला पुरुषोत्तम हैं।

गोदाम्बा ‘देवकी एवं यशोदा’ का नाम न लेकर केवल ‘एक माता’ कहती हैं क्योंकि उन्हें कृष्ण की सुरक्षा के लिए कंस का भय है।

**तरिक्किलानागित् तान् तीन्गु निनैन्द
करुत्तैप् पिळैप्पित्तुक् कन्जन् वयिऱ्ऱिल्

तुम गोकुल में सुखपूर्वक पल रहे थे, यह कंस को बर्दाश्त नहीं हुआ और उसने आपको मारने के अनेक यत्न किये।

यहाँ पूतना, केशि, चाणूर आदि का स्मरण होता है। कृष्ण ने अनायास ही कंस के सारे योजनाओं एक-एक करके नष्ट कर दिया।

**नेरुप्पेन्न निन्ऱ

उसके ही पेट की अग्नि बन उसे नष्ट कर दिया।

अर्थात कंस को भयङ्कर भय हुआ। जो भय वो दूसरों को देता था, उससे कहीं अधिक भय में वो जीता रहा और अंततः मारा गया। अथवा, उसके ही क्षेत्र में आकर उसे नष्ट कर दिया कृष्ण ने।

**नेडुमाले : हे व्यामोहनशील! प्रेम-मूर्ति

आपने ये सभी कष्ट (पूतना, कंस आदि) सहे, हमारे प्रति आपके प्रेम के कारण।

**उन्नै अरुत्तित्तु वन्दोम्

हम यहाँ आपसे माँगने आयी हैं, अथवा, आपको ही मांगने आयी हैं।
कल्पवृक्ष से जो मांगो वो मिल जाता है किन्तु यदि कल्पवृक्ष को ही मांग लो तो वो नहीं दे सकता। किन्तु भगवान से तो जो भी वस्तु माँग लो वो भी देते हैं, एवं स्वयं भगवान को ही मांग लो तो अपने आप को भी प्रदान कर देते हैं।

**पऱै तरुदि आगिल्

तुम हमें भेरी अर्थात कैंकर्य दोगे।

**तिरुत्तक्क सेल्वमुम्

श्री देवी का के आप धन जिस प्रकार हैं। अर्थात जिस प्रकार श्री देवी के श्री (श्रिय: श्री) आप हैं, हमें भी वही कैंकर्य चाहिए।

**सेवगमुम्

और उस कैंकर्य को करने की शक्ति।

याम् पाडि वरुत्तमुम् तीर्न्दु

हम आपके गुणों का कीर्तन करेंगी।

मगिळ्न्दु एलोर् एम्बावाय्

तो हम आपके विश्लेष के दुख से जो पीड़ित रही हैं, वो दूर हो जाएगा।

स्वापदेश

श्री वैष्णवों के भी दो जन्म होते हैं। एक भगवान की अहैतुकी कृपा से माता के गर्भ से जन्म। दूसरा आचार्य मुख से अष्टाक्षर महामंत्र श्रवण करने के बाद। श्री मन्त्र से हमारा पुनर्जन्म होता है एवं द्वय मन्त्र के अनुसन्धान से हम बड़े होते हैं।

परकाल सूरी कहते हैं कि मेरा तब जन्म नहीं हुआ था। किन्तु जब से जन्म हुआ, तबसे मैं उसे भूल नहीं पाया। अतः आचार्य समाश्रयन के पश्चात दूसरा जन्म ही वास्तविक जन्म है। कंस की भाँति संसार भी हमारे शेषत्व स्वरूप का वध करना चाहता है। किन्तु भगवान उसे नष्ट कर हमें अर्चिरादि मार्ग से प्रयाण कराते हैं।

इस गाथा में रामानुज स्वामी के चरित्र का अभी अनुसन्धान करते हैं।

तिरुप्पावै 24

आज 24वीं गाथा में गोदाम्बा भगवान का मंगलाशासन करती हैं| पिछली गाथा में यह अनुरोध किया गया कि आप सिंह सी चाल चलते हुए सिंहासन पर विराजमान हों! गोपियों ने देखा की भगवान के अत्यन्त मृदु चरण लाल पड़ गए हैं| वो सब मिलकर भगवान के मंगल की कामना करते हुए मंगलाशासन करती हैं|

भगवान का मंगलासन करना गोदाम्बा को अपने पिता विष्णुचित्त भट्टनाथ आलवार से विरासत में मिला है| तिरुपल्लाण्डु दिव्यप्रबन्ध में विष्णुचित्त आलवार कितना मंगलासन करते हैं| न केवल मुमुक्षुओं अपितु ऐश्वर्यार्थियों एवं कैवल्यार्थियों को भी भगवान का मंगलाशासन गाने हेतु आमन्त्रित करते हैं| बाकि आल्वार जहाँ स्त्री भावना में नायिका बन जाते हैं, वहीँ विष्णुचित्त आल्वार यशोदा भाव का अनुभव करते हुए भगवान के मंगल की कामना करते हैं| इसकारण उन्हें “बड़े आल्वार” कहा जाता है|

ज्ञान की अवस्था में हम रक्ष्य होते हैं एवं भगवान रक्षक| किन्तु ज्ञान जब परिपक्व होकर भक्ति बन जाता है तब उस अवस्था में हम रक्षक होते हैं एवं भगवान के मार्दव का चिन्तन करते हुए उनके रक्षण का प्रयत्न करते हैं| यदि ये अज्ञान है, तो भी यह गुण ही है, दोष नहीं क्योंकि यह भगवान को अत्यन्त प्रीतिकर होता है|

श्रृंखला : तिरुप्पावै (गोदा देवी जी का दिव्य व्रत)

श्री उ वे रंगदेशिक स्वामीजी द्वारा गोदा-गीतावली से

श्री उ वे भरतन स्वामी द्वारा 24वीं गाथा का संस्कृत छन्दानुवाद:

२४.पूर्वमेतज्जगत्क्रान्त! पादाभ्यां तव मङ्गलम् ।
गत्वा रुचिरलङ्कां तां हन्तः ! शौर्याय मङ्गलम् ।।
शकटं पत्प्रहारेण भङ्क्तः ! कीर्त्यै सुमङ्गलम् ।
वत्सं दण्डवदादाय क्षेप्तः ! पद्भ्यां सुमङ्गलम् ।।
छत्रवद्गिरिमुद्धर्तः ! सद्गुणेभ्यः सुमङ्गलम् ।
शत्रून् विजित्य हन्त्र्यै ते हस्ते शक्त्यै सुमङ्गलम् ।।
इत्थं ते वीरकर्माणि स्तुत्वा लब्धुं च भेरिकाम् ।
वयमद्य समायाता अस्मासु त्वं दयस्व भोः! । ।

श्री उ वे सीतारामाचार्य स्वामीजी द्वारा हिन्दी छन्द अनुवाद

  1. वामन अवतार में महाबली चक्रवर्ती से भिक्षा में 3 पग भूमि मिलते हीं तीनों संसार को नाप लेने वाले भगवान के चरणों का मंगल हो!

जब भगवान तीनों लोकों को नापने हेतु अपने पैर बढाए, तब उनके चरण पर्वत, वन आदि से चोट खाते हुए आगे बढे होंगे| उनके चरणों की मृदुलता का स्मरण कर गोपियाँ चिन्तित होती हैं एवं उनका मंगल गाती हैं|

त्रिविक्रम ने तो समस्त जगत के जीवों के शर पर अपने चरण रखते हुए आगे बढे थे| जाम्बवान ढोल बजाते हुए, उनकी जय गाते हुए उनकी परिक्रमा करने लगे| देवताओं को उनका अभीष्ट मिल गया| लेकिन ओह! उनके चरणों के स्वास्थ्य की चिन्ता तो तब किसी को न हुयी थी| ऐसा स्मरण कर अब गोदाम्बा सहित गोपियाँ उनका मंगल गाती हैं|

(त्रिविक्रम अवतार के काल में तो हम नहीं थे| तब किसी ने आपका शरण नहीं लिया, फिर भी आपने सबके शिर पर अपना चरण रख दिया| हम तो शरणागत है, हमें भी अपने चरणों की सेवा प्रदान करो|)

२. सुन्दर लंका में प्रवेश कर दुष्ट राक्षसों को नष्ट करने वाले उनके शौर्य का मंगल हो!

दण्डकारण्य के ऋषियों की शरणागति में भगवान लज्जित होते हैं एवं कहते हैं कि मुझे पूर्व ही में ही आकर आप लोगों की रक्षा करनी चाहिए थी किन्तु आपको ही आना पड़ा, इस कारण मैं लज्जित हूँ| विभीषण 100 योजन का सागर पार कर आये और उन्हें क्षण भर विलम्ब हुआ तो भगवान ने क्षमा मांगी| किन्तु सोचो तनिक की भगवान किंतने युगों से हमारी प्रतीक्षा कर रहे हैं| वह हमें प्राप्त करने हेतु ही कितनी दूर आये हैं| श्रीवैकुण्ठ से क्षीराब्धि, फिर अयोध्या और अयोध्या से लंका| नंगे पैर घने जंगल एवं पर्वतों को पार करते हुए इनके अति सुकुमार चरणों को कितना कष्ट हुआ होगा| ओह! यह तो त्रिविक्रम अवतार से भी अधिक पीड़ा दे रहा है गोपियों को|

गोपियाँ कैकेयी की तरफ नाराजगी से देखती हैं| पराशर भट्ट जी कहते हैं, “हे राम! आपके ये चरण आपकी नहीं अपितु आपके भक्तों की संपत्ति हैं| और आप अपने चरणों को एवं अम्माजी के चरणों को इस प्रकार कष्ट दे रहे हैं? आपको ऐसा अधिकार नहीं है| वापस आ जाईये|”

(जिस प्रकार आपने रावण का नाश किया, हमारे दुखों को भी नष्ट कर दो न! जैसे विभीषण को स्वीकार किया, हमें भी स्वीकार करो कृष्ण!)

Credits: Suganya mami
  1. अपने पाद प्रहार से दुष्ट शकटासुर को नष्ट करने वाले आपकी कीर्ति का मंगल हो!

यह तो महाबली और रावण की तुलना में भी अधिक चिन्तादायक है| ये असुर तो रक्षक बनकर छुपकर वार करने वाला था| राम के आसपास तो महारथी थे किन्तु कृष्ण के आसपास तो भोले-भाले गोप-गोपियाँ हैं| उनकी रक्षा कौन करेगा? किन्तु कृष्ण के चरण केवल भक्तों के ही रक्षक नहीं हैं अपितु स्वयं कृष्ण के भी रक्षक हैं’| जैसे राम के कन्धों पर धनुष के चिन्ह हैं, वैसे हीं कृष्ण के चरणों में शकटासुर को प्रहार से मारने का चिन्ह है| इससे आपकी जो कीर्ति हुयी, उसका मंगल हो!

  1. बछड़े के रूप में आये वत्सासुर एवं कपित्थ वृक्ष के रूप में कपित्थासुर को मारने वाले आपके चरणों का मंगल हो!

कृष्ण ने वत्सासुर को उठाया और उस कपित्थ वृक्ष पर दे मारा| दोनों की मृत्यु हुयी|
कृष्ण से अत्यंत प्रेम करने वाली गोपियाँ उनकी सुरक्षा के प्रति चिन्तित हो जाती हैं और मंगल गाती हैं|

  1. छत्र की तरह गोवर्धन को धारण कर अभीरों की रक्षा करने वाले आपके कारुण्य गुण का मंगल हो!

बाकि लोग तो कम से कम दैत्य थे, भगवान से द्वेष रखने के कारण भगवान को क्षति पहुँचाना चाहते थे| किन्तु ये इन्द्र तो भगवान का भक्त था| वो भी भगवान को क्षति पहुचाने की चेष्टा किया| अब तो भक्तों से भी कृष्ण की सुरक्षा करनी होगी|
किन्तु कृष्ण ने समस्त गोप समाज की रक्षा की| इन्द्र का भी अपराध भयंकर था किन्तु उसे मृत्यदंड नहीं दिया कृष्ण ने अपितु आशीष ही दिया| ऐसे आपके कारुण्य गुण का मंगल हो!

  1. आपके हस्त में विराजमान आपके भल्लायुध (शक्ति अस्त्र) का मंगल हो!

गायों को जंगली जानवरों से रक्षा हेतु कृष्ण अपने हस्त में भाला रखते हैं| यदि लोग यह जान गए कि कृष्ण ने गोवेर्धन पर्वत उठाया है तो उसे बुरी दृष्टि डालेंगे| इसलिए बोल रहे हैं कि ये सब तो कृष्ण की भाला ने किया है|

“हम यहाँ आपके वीरत्व सौम्यत्व करुणा का गुणानुवाद और मंगलाशासन करने आयी हैं , हम पर कृपा करते हुये, आपके कैंकर्य में रत रहने की शक्ति हमें प्रदान करिये “

तिरुप्पावै 23

आज की गाथा में गोदाम्बा सहित गोपियाँ यादवसिंह कृष्ण को सम्बोधित करती हैं। नीलादेवी के पुरुष्कार को प्राप्त करके, अपने आकिंचन्य, अनन्य-गतित्व, महाविश्वास का ज्ञापन करने के बाद अंततः भगवान गोपियों का प्रणय निवेदन स्वीकार करते हैं।

कृष्ण को गोदाम्बा ‘स्त्रियों का दुख न जानने वाले भगवान‘ कहती हैं। ‘राम अपनी पत्नी के लिए दुष्ट रावण को अनायास ही सेना सहित नष्ट कर दिए थे। किन्तु ये कृष्ण तो मिलने का एक समय देता है, और स्वयं नहीं आता। गोपियों को पत्नी के रूप में स्वीकार किया है किन्तु मिलने भी नहीं आता।’

यह सुन कृष्ण बहुत लज्जित हुए। “मुझे तो स्वयं इनके पास जाकर इनसे मिलना था, किन्तु ये मेरे द्वार तक आ गईं और मैं सो रहा हूँ। इतनी ठण्ड में प्रातः काल यमुना स्नान करके ओष की बूँदों को सहन करती हुई मेरे द्वार पर खड़ी हैं”

“हे गोपियों! मैं अभी बाहर आता हूँ।”

(त्रेतायुग में जब श्रीराम दण्डकारण्य में ऋषियों की दशा देखते हैं तो अपने देर से आने पर लज्जित होते हैं। मुझे स्वयं ही आकर इनकी रक्षा करनी चाहिए थी किन्तु ये ही आकर अपने रक्षण हेतु मेरी शरणागति किये हैं। माता कैकेयी ने मुझे कुछ मास पूर्व ही वनवास क्यों नहीं दे दिया!”)

(अर्चिरादि मार्ग में जब जीवात्मा भगवान के श्री मणि मण्डप में पहुँचता है, तब भगवान कहते हैं कि मुझे पूर्व में ही आकर तुम्हें प्राप्त कर लेना चाहिए था।)

गोदाम्बा कहती हैं, “बाल सिंह की भाँति धीरे-धीरे शयन से उठो और सिंह गति में चलते हुए अपने सिंहासन पर विराजमान हो। हम तुम्हारे प्रत्येक चेष्टितों को देख आनन्द लेना चाहती हैं एवं उनका मङ्गल गाएंगीं।

“शयन गृह से बाहर आकर, सभागृह पहुंचकर, सिंहासन पर बैठकर, हमारे कैंकर्य-प्रार्थना पर विमर्श करो”।


श्रृंखला : तिरुप्पावै (गोदा देवी जी का दिव्य व्रत)

मारि मलै मुळैन्जिल् मन्निक् किडन्दु उऱन्गुम्
सीरिय सिन्गम् अऱिवुऱ्ऱुत् ती विळित्तु
वेरि मयिर् पोन्ग एप्पाडुम् पेर्न्दु उदऱि
मूरि निमिर्न्दु मुळन्गिप् पुऱप्पट्टु
पोदरुमा पोले नी पूवैप् पूवण्णा
उन् कोयिल् निन्ऱु इन्गने पोन्दु अरुळिक् कोप्पु उडैय
सीरिय सिन्गासनत्तु इरुन्दु याम् वन्द
कारियम् आराय्न्दु अरुळ् एलोर् एम्बावाय्

श्री उ वे सीतारामाचार्य स्वामीजी द्वारा हिन्दी छन्दानुवाद:

श्री उ. वे. मीमांसा शिरोमणि भरतन् स्वामी द्वारा अनुगृहीत 23वीं गाथा का संस्कृत छन्दानुवाद:

२३.सम्यक्सुप्तो महासिंहो वर्षासु गिरिकन्दरे ।
प्रबुध्योन्मील्य नेत्रे स्वे कणानग्नेः किरन्निव ।।
सुरभीणां सटानां च स्याद्विकासो यथा तथा ।
चलित्वा सर्वपार्श्वेषु विधूयावयवान् समान् ।।
विसृज्य महतीं तन्द्रां गर्जन्निःसृत्य गह्वरात् ।
यथाऽऽगच्छति तद्वत्त्वम् अतसीपुष्पवर्ण! भोः ।।
त्वन्मन्दिरादिहागत्य दिव्यसिंहासने स्थितः ।
अथागमनकार्यं नः कारुण्येन विचारय ।। 23 ।।

प्रथम चार पंक्तियों में सिंह का वर्णन है।

**मारि : वर्षा

**मलै : पर्वत

**मुळैन्जिल् : गुफा

**मन्निक् किडन्दु उऱन्गुम् : लेट कर निश्चिंत गाढ़ निद्रा लेने वाले

**सीरिय सिन्गम् : श्रेष्ठ सिंह

**अऱिवुऱ्ऱुत् : उठता है

**ती विळित्तु : गौरव से देखता है, मानो दूसरों की चिंगड़ी निकल जाए इस प्रकार से

**वेरि मयिर् पोन्ग : अपने सुगन्धित केशों को फैलाते हुए

**एप्पाडुम् पेर्न्दु उदऱि : चारों को शरीर घुमाकर, शरीर को संकुचित करते हुए, अपने पैरों को हिलाता है

**मूरि निमिर्न्दु : आलस त्यागकर

**मुळन्गिप् पुऱप्पट्टु : शब्द करते हुए निकलता है

**पोदरुमा पोले : जैसे वो आता है, वैसे ही आपको आना है।

“वर्षा काल में पर्वत में अपने गुफा में शयन किया सिंह जिस प्रकार उठता है, जिस दृष्टि से अपने दोनों तरफ देखता है, अपने सुगन्धित केशों को फैलाकर, शरीर को सिकोड़कर, चारों को घुमाकर अपने पैरों को हिलाता है और शब्द करते हुए बाहर आता है, वैसे ही आपको बाहर आना है।”

(यहाँ गुफा नन्दगोप का भवन है। सिंह और सिंहनी कृष्ण एवं नीला हैं जो गाढ़ निद्रा में शयन कर रहे थे। श्रेष्ठ सिंह कहने का अर्थ है ये पुरुषोत्तम हैं। सिंह दृष्टि से देखने का अर्थ है कि अपनी कृपा दृष्टि से देखना ताकि हमारे सारे विरोधि-स्वरूप नष्ट हो जायें। जिस प्रकार नरसिंह हिरण्यकशिपु के प्रति क्रोध एवं प्रह्लाद की रक्षा दोनों करते हैं।
जब विभीषण राम के पास आते हैं तो भगवान उसे किस प्रकार देखते हैं! “लोचनाभ्यां पिबन्निव”। मानों अपने नेत्रों से उसे पी जाएंगे। आप उसी प्रकार से हमें देखिए।

यहाँ राघव-सिंह का भी स्मरण करते हैं आचार्यगण जो वर्षाकाल में किष्किन्धा के पर्वतों की गुफा में रुके थे। वर्षाकाल के पश्चात सिंह गति से लक्ष्मण नगर में प्रवेश कर दहाड़ते हैं तो सुग्रीव की सेना थरथरा जाती है।)

**उन् कोयिल् निन्ऱु इन्गने पोन्दु अरुळिक् : तुम अपने महल से बाहर निकलो। हमें अपने सिंह गति के दर्शन दो।

(मन्दिर से बाहर निकलते हुए नम्पेरुमाल (रंगनाथ भगवान के उत्सव मूर्ति) के सिंह-गति का स्मरण करना चाहिए।)

शयन अवस्था की सुंदरता का आनंद लेने की इच्छा रखते हुए, उनकी जाग्रत अवस्था की सुंदरता, उनके चलने की शैली की सुंदरता और उन्हें भव्यता से बैठे देखने की सुंदरता। अंडाल इस छंद में कहती हैं, कृपया वहां से उठें और अपने दर्शक कक्ष की ओर गरिमामय रूप से जाएं और भव्य सिंहासन को सजाएं, और फिर हमारी यात्रा के उद्देश्य के बारे में पूछताछ करें।

मंदिर की शोभायात्राओं में, भगवान अतिशय भव्यता के साथ, शंख और अन्य वाद्ययंत्रों की जोरदार ध्वनि के बीच निकलते हैं और विभिन्न मुद्राओं और शैलियों में चलते हैं। कभी वह हाथी की तरह, कभी सिंह की तरह, कभी अश्व आदि की तरह चलते हैं।

(पूर्व में कहा कि नन्दगोप का महल। अब कह रही हैं कि तुम्हारा महल। अर्थात नन्द एवं कृष्ण एक ही महल में रहते हैं। जैसे जीवात्मा एवं परमात्मा एक ही शरीर में रहते हैं। जैसे प्रणव में अकार भगवान हैं और मकार जीवात्मा।)

**कोप्पु उडैय सीरिय सिन्गासनत्तु इरुन्दु : बाहर आकर अपने धर्म-पीठ उभय-विभूति-नायक सिंहासन पर बैठिए।

(सिंहासन पर बैठकर राजा जो निर्णय लेता है, उसकी अनुज्ञा वह स्वयं भी नहीं कर सकता। ये कृष्ण तो अपनी बात से पलट जाता है। इसलिए सिंहासन पर बैठकर निर्णय लो।)

**याम् वन्द कारियम् आराय्न्दु अरुळ् एलोर् एम्बावाय्:

“जो कार्य के लिए हम आयी हैं, उस विषय में कृपा से विचार करो।”

(आना तो तुम्हें स्वयं चाहिए था किन्तु तुम सोये रहे और हम तुम्हारे पास आ गईं। अब हमारे व्रत को पूर्ण करो।)

अब नप्पिनै और कृष्ण सिंहासन पर विराजमान होते हैं। लज्जित होते हैं कि हेमन्त ऋतु की ठंड में ये गोपियाँ इतनी सुबह स्वयं आयी हैं।

तिरुप्पावै 22

श्रृंखला : तिरुप्पावै (गोदा देवी जी का दिव्य व्रत)

आज की 22वीं गाथा में गोदाम्बा अपने अनन्य-गतित्व एवं अनन्यार्ह शेषत्व का प्रकाशन करती हैं। (एकमात्र भगवान के ही शेष होने की योग्यता होना अनन्यार्ह शेषत्व है। ) जिस प्रकार विभीषण अपने कुल-परिवार को छोड़कर भगवान के पास आया था, काकासुर जयन्त माता-पिता एवं अन्य देवों का परित्यक्त होकर आया था, वो वापस अपने घर नहीं जा सकते थे। आपके सिवा उनकी और कोई अन्य गति नहीं थी।
हम गोपियाँ भी सब छोड़कर आयी हैं और आपसे प्रणय निवेदन कर रही हैं। आप हमें ठुकरा भी दें तो हम लौटकर नहीं जा सकते। आपके अतिरिक्त हमारी और कोई गति नहीं है।

आलवन्दार स्तोत्र रत्न में कहते हैं:

निरासकस्यापि न तावदुत्सहे महेश हातुं तव पादपङ्कजम् ।
रुषा निरस्तो ऽपि शिशुस्स्तनन्धयो न जातु मातुश्चरणौ जिहासति ॥२६॥

यदि एक माता अपने शिशु को चरणों से ठोकर मारकर भगा दे, फिर भी शिशु अपने माता के चरणों को नहीं छोड़ता| (स्वरुप-प्रयुक्त-दास्य)

तवामृतस्यन्दिनि पादपङ्कजे निवेशितात्मा कथमन्यदिच्छति ।
स्थितेऽरविन्दे मकरन्दनिभरे मधुव्रतो नेक्षुरकं हि वीक्षते ॥२७॥

आपके चरणों की भोग्यता ऐसी है कि इसे छोड़ हम कहीं और नहीं जा सकते| क्या कोई भ्रमर मकरन्द को छोड़ रसहीन इक्षुरक को चाहेगा? (गुण-कृत-दास्य)

हम भी ऐसे ही प्रेम-अतिशय से परवश होकर आपके पास प्रणय निवेदन करने आई हैं|

अन्गण् मा ग्यालत्तु अरसर् अभिमान
भंगमाय् वन्दु निन् पळ्ळिक् कट्टिल् कीळे
सन्गम् इरुप्पार् पोल् वन्दु तलैप्पेय्दोम्
किण्किणि वाय्च् चेय्द तामरैप् पूप् पोले
सेम् कण् सिऱुच् चिऱिदे एम् मेल् विळियावो
तिन्गळुम् आदित्तियनुम् एळुन्दाऱ् पोल्
अम् कण् इरण्डुम् कोण्डु एन्गळ् मेल् नोक्कुदियेल्
एन्गळ् मेल् साबम् इळिन्दु एलोर् एम्बावाय्

श्री उ वे रंगदेशिक स्वामी द्वारा विरचित ‘गोदा-गीतावली’ से संस्कृत गद्यानुवाद

श्री उ वे भरतन् स्वामी द्वारा अनुगृहीत 22वीं गाथा का संस्कृत छन्दानुवाद:

२२.रम्याणां भूमिभागानां विशालानामधीश्वराः ।
भग्नमानाः समागत्य पर्यङ्काधः स्थले हि ते ।।
सङ्घीभवन्ति हा तद्वद् वयं प्राप्तास्तवान्तिकम्।
किङ्किणीमुखवत्फुल्ले राजीव इव लोहिते ।।
लोचने तावके किं नो मन्दं मन्दं न पश्यतः ।
उत्थितौ योगपद्येन हिमोष्णकिरणाविव ।।
सौम्ये ते ये दृशौ ताभ्यामस्मान् यदि कटाक्षयेः ।
अवश्यं नोऽनुभोक्तव्यम् अपि पापं विनश्यति ।।

श्री उ वे सीतारामाचार्य स्वामी द्वारा विरचित हिन्दी

**अन्गण् मा ग्यालत्तु अरसर् : सुन्दर और बड़े संसार के राजाओं

ऐसा ही एक राजा था पौन्ड्रक| उसने नकली शंख-चक्र भी धारण कर रखे थे| ‘इश्वरो अहं,अहं भोगी’ यही स्वातंत्र्य-अभिमान है|

**अभिमान भंगमाय् वन्दु : कृष्ण के पास आते ही उनका अभिमान भंग हो जाता है

स्वातन्त्र्य अभिमान से युक्त व्यक्ति भगवान को प्राप्त नहीं कर सकता| (निर्मल मन जन सो मोहि भावा, मोहि कपट छल छिद्र न भावा.)| भगवान के कटाक्ष पड़ते ही अभिमान नष्ट हो जाते हैं|

एक बार उन राजाओं को यदि राज्य वापस भी दे दिया जाये, तो भी वो उस राज्य में पुनः उत्सुक नहीं होते एवं आपके चरणों में ही रहते हैं| (कई श्री वैष्णव जो सांसारिक कार्यों को त्याग आचार्य कैंकर्य में लग जाते हैं, उन्हें वापस कितना भी प्रलोभन दिया जाये, वो वापस नहीं जाते|)

**निन् पळ्ळिक् कट्टिल् कीळे : हारने के बाद ऐसे असंख्य राजा कृष्ण के सिंहासन के नीचे ही रहते हैं

एक बार एक व्यक्ति ने श्री पराशर भट्टर से प्रश्न किया, ‘जब हम शास्त्रों में देखते हैं कि भगवान ब्रह्मा और अन्य केवल कई जन्मों के तप करने के बाद मोक्ष प्राप्त करते हैं, तो यह कैसे संभव है कि कुछ लोग (श्रीवैष्णव) बड़ी आत्मविश्वास के साथ मानते हैं कि वे बस इस जन्म के अंत में मोक्ष प्राप्त कर लेंगे और इसकी उत्सुकता से प्रतीक्षा करते हैं?’ श्री भट्टर ने उल्लेखनीय रूप से उत्तर दिया, ‘कोई विरोधाभास नहीं है; ब्रह्मा और अन्य अपने पद के अनुसार अहंकार और गर्व रखते हैं और इससे छुटकारा पाने के लिए उन्हें कई जन्मों की आवश्यकता होती है, लेकिन यहाँ के लोग स्वभावतः अपने आप को निम्न मानते हैं और इसलिए उनका अहंकार और गर्व कम होता है। इसके अलावा श्री वैष्णव मोक्ष के लिए भगवान पर निर्भर रहते हैं और इसलिए केवल यह जन्म ही पर्याप्त है।’
इसीलिए हमारे आचार्यों का कहना है, ‘यहाँ तक कि ब्रह्मा हार जाता है लेकिन गोपियाँ विजयी होती हैं; ऐसी है कृष्ण की महिमा।’

**सन्गम् इरुप्पार् पोल् वन्दु तलैप्पेय्दोम् : हम भी इसी प्रकार तुम्हारी शरण आये हैं कृष्ण!।

गोपियों का अभिमान क्या था: स्त्रीत्व-अभिमान।

कोई भी स्त्री पुरुष से प्रेम करती है फिर भी आशा करती है कि वो पुरुष ही उसके पास आयेगा। गोपियाँ भी अपने सौन्दर्य अभिमान से सोचती थीं कि कृष्ण ही मुझे ढूँढते आएगा। किन्तु आपकी भोग्यता के परवश होकर हम आपके द्वार पर खड़ी हैं। अपने दर्शन से कृतार्थ करो हे कृष्ण!।

राजा अपने राज्य छोड़कर आये तो गोदाम्बा विषयान्तर अनुभव को छोड़कर। वो आयुधों से हारकर आये तो गोदाम्बा भगवान गुणों से हारकर।

(क्या हम भगवान के पास जाकर कैंकर्य का हठ कर सकते हैं? क्या यह पारतंत्र्य के विपरीत नहीं है?

प्रपन्न-निष्ठा में तो स्वल्पांश भी उपायानुष्ठान उचित नहीं। किन्तु आळ्वार जैसे परम भक्त भगवान को छोड़कर जी नहीं सकते। भक्ति-बलात्कार से यदि भगवान की प्राप्ति हेतु कुछ किये भी तो भगवान के लिए आनंददायक होता है। नाच्चियार-तिरुमोली में तो गोदाम्बा कामदेव से प्रार्थना करती हैं कि मुझे कृष्ण का संग दिलवा दो। हम जानबूझकर ऐसा करेंगे तो गलत होगा। प्रेम-परवश होकर ऐसा हो जाये तो भगवान उसका आनन्द लेते हैं।)

**किण्किणि वाय्च् चेय्द तामरैप् पूप् पोले : किण्किणि (एक प्रकार का आधा खुला और आधा बन्द एक आभूषण) और अर्धविकसित कमल पुष्प की तरह अपनी आँखें खोलो।

अर्थात, धीरे-धीरे अपना कटाक्ष दीजिये। अचानक हम सम्भाल नहीं पाएंगे।

(भगवान का स्वातन्त्र्य उन्हें आंखें खोलने नहीं देता, लक्ष्मी देवी का पुरुषकार उन्हें आँखें बन्द नहीं करने देता।
हमारे पाप उन्हें आँखे खोलने नहीं देते, उनकी कृपा उन्हें आँखें बन्द नहीं करने देते।

कर्म के अनुसार फल देने की उनकी प्रवृत्ति उन्हें अपनी आँखें बंद करने पर मजबूर करती है, जबकि भक्तों का समर्थन करने की उनकी प्रवृत्ति उन्हें खोलने पर मजबूर करती है;

शत्रु उनके पास जाने से डरते हैं क्योंकि उनकी आँखें सूर्य की तरह जलती हैं, जबकि भक्तों के लिए यह चंद्रमा की तरह ठंडी और सुखद होती हैं; सूर्य आलस्य और अज्ञानता का अंधकार दूर करता है और चंद्रमा ठंडा, ताजगी देने वाला, जीवनदायिनी और स्फूर्तिदायक है।
अथवा, भक्तों के प्रति मातृसुलभ स्नेह के कारण उनकी आँखें लाल (लाल कमल) हो गईं।
)

अर्जुन भगवान के शयन के बाद के कटाक्ष की महिमा को जानता था। उसके दर्शन हेतु ही उनके चरणों में बैठा था। दुर्योधन इन रहस्य से अनजान था।

महाविश्वास

**तिन्गळुम् आदित्तियनुम् एळुन्दाऱ् पोल् : सूर्य और चन्द्र के सदृश आपकी आँखें
**अम् कण् इरण्डुम् कोण्डु : तुम्हारे प्रियदर्शन दोनों आँखें से
**एन्गळ् मेल् नोक्कुदियेल् : यदि हमें देख लोगे
**एन्गळ् मेल् साबम् इळिन्दु : हमारे सभी शाप नष्ट हो जायेंगे।

सूर्य और चन्द्र के सदृश आँखें: वेद-द्रोहियों के लिए भगवान की सूर्य रूप आँख एवं भक्तों के लिए चन्द्र रूप शीतल आँखें।

हमारे शाप: हमारे पूर्व कर्म (पाप एवं पूण्य) जो भगवत-प्राप्ति में विरोधी हैं।

अथवा, तुमसे विरह की अग्नि ही शाप है। तुम अपने कटाक्ष से देख लेंगे तो हमारे ये शाप नष्ट हो जाएंगे।

सबरी कहती हैं, “चक्षुषा तव सौम्येन पूतास्मि रघुनन्दन।”
जब विभीषण राम के पास आते हैं: “लोचनाभ्यां पिबन्नीव”

विरह अग्नि की तपिश से सूख चुके हम पर कृपालु वर्षा बरसाओ। हम उस चातक पक्षी की तरह आपकी कृपा की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जो बारिश का इंतजार करता है। अपने नेत्र धीरे-धीरे खोलो। यदि आपकी कृपा एकसाथ बरसे, तो हम सहन न कर पाएं। कमल सुबह खिलता है और शाम को संकुचित हो जाता है। यदि सूर्य और चंद्रमा एक ही समय में उदित हों, तो कमल आधा ही खिलेगा। इसी तरह, आपको अपने नेत्र धीरे-धीरे खोलने चाहिए। जिन फसलों के खेतों ने पर्याप्त सूखा देखा है, उन्हें एक बार में मापी गई मात्रा में ही पानी देने की आवश्यकता होती है, यह ध्यान रखते हुए कि वे बाढ़ में न डूबें। इसी तरह, हमें, जो आपकी विरह की पीड़ा से पूरी तरह टूट चुके हैं, आपकी कृपालु दृष्टियाँ, जो आपकी कृपा के जल से भरी हैं, हमें धीरे-धीरे प्रदान की जानी चाहिए।

एलोर् एम्बावाय् : ऐसा हमारा व्रत है।

तिरुप्पावै 21

तिरुपावै 21वीं गाथा

अबतक गोदाम्बा ने नीला देवी/नप्पिनै का पुरुषाकार प्राप्त किया। अब नीला देवी भी  किवाड़ खोलकर गोपियों की गोष्ठी में शामिल हो जाती हैं। गोपियाँ अपने अकिंचनत्व, अनन्य-गतित्व एवं महाविश्वास का प्रकाशन करती हैं। ये तीनों ही गुण अधिकारी पूर्ति हैं। शरणागत में ये गुण होना आवश्यक हैं। गोदाम्बा कहती हैं कि आपको प्राप्त करने हेतु हम कोई उपाय अनुष्ठान नहीं कर रही हैं। आपके अतिरिक्त हमारी कोई अन्य गति भी नहीं है (चाहे आप हमें स्वीकार करें या न करें।)। किन्तु हमें यह महाविश्वास है कि आप हमें अवश्य हमारा इच्छित पुरुषार्थ प्रदान करेंगे।

श्रृंखला : तिरुप्पावै (गोदा देवी जी का दिव्य व्रत)

संस्कृत छन्दानुवाद (श्री उ वे मीमांसा शिरोमणि भरतन् स्वामी):

२१.दोहनार्थं गृहीतेभ्यः पात्रेभ्यः पयसो यथा ।
उत्पीडः स्यात्तथाऽजस्रं सवित्रीणां पयःस्रुतेः ।।
उदारोत्तुङ्गधेनूनां बहूनां स्वामिनः सुत ! ।
प्रबुध्यस्व महात्मन् ! भोः श्रितरक्षणदीक्षित ! ।।
जगत्यस्मिन् समुद्भूततेजोराशे ! प्रजागृहि ।
शत्रवो नष्टवीर्यास्ते संप्राप्य भवनाङ्गणम् ।।
अगत्या तव पादाब्जे आश्रयन्ते यथा तथा ।
मङ्गलं कीर्तयन्त्यस्त्वां स्तुवत्यो वयमागताः ।।

श्री उ वे रंगदेशिक स्वामी कृत गोदा-गीतावली से

श्री उ वे सीतारामाचार्य जी द्वारा हिन्दी छन्दानुवाद

इस गाथा में नप्पिनै गोदाम्बा की गोष्ठी में जुड़ जाती हैं एवं सभी मिलकर कृष्ण को जगाते हैं। यहाँ नन्दगोप के गौ-समृद्धि एवं ऐश्वर्य का वर्णन करते हुए, उनके पुत्र के रूप में कृष्ण की प्रशंसा करते हैं। पुत्र होने का अनुभव के लिए भवावान अकार होते हैं, इसलिए ‘नन्दगोप के पुत्र’, ऐसा सम्बोधन से भगवान प्रसन्न होंगे।

** एट्र कलङ्गल :- अनुरूप पात्र (बर्तन)

एदिर पोङ्गि :- दूध तेजी से भर जा रहे हैं।

पात्र थन के नीचे रखते हीं दूध से पूर्ण हो जाते हैं। दूध दूहने में तो कोई श्रम नहीं है, किन्तु पात्र उठाने और बदलने में ग्वाले थक जाते हैं।

माट्रादे पाल शोरियुम: दूध निरन्त बहते रहते हैं।

दूध बहकर मानो घर के बाहर तालाब बना देते हों। चाहूँ ओर निरन्तर दूध का ही गन्ध है।

वल्लल : महा उदार
पेरुम : अनेक संख्या में
पशुक्कल : गायें

आऱ्ऱप् पडैत्तान् मगने : ऐसे नन्दगोप के पुत्र
अऱिवुऱाय् : उठो

असंख्य महा उदार गायों वाले नन्द जी के पुत्र, उठो! आप तो सर्वज्ञ हैं। भगवान का ज्ञान उनका आश्रित-कार्यापादक गुण है। आप जानते हैं कि हम आपके द्वार आये हैं।

(जिस प्रकार ब्राह्मणों का धन वेद है, उसी प्रकार वैश्यों का धन गौ है)

(आचार्य भी इन गायों की तरह परम उदार है। पराशर महर्षि मैत्रेयी के एक प्रश्न के उत्तर में प्रसंगात अनेक संबंधित विषय बताते हैं, जो हमारे उज्जीवन के लिए आवश्यक हैं। परकाल आळ्वार को अरुल मारी कहते हैं, जिसका अर्थ हुआ ‘कृपा वर्षी’। आल्वारों ने अपने भगवद-अनुभव को अपने तक सीमित नहीं रखा, अपितु हम सभी को प्रदान किया। रामानुज स्वामी कृपामात्र-प्रसन्नाचार्य हैं।)

ऊऱ्ऱम् उडैयाय् : स्थिर/दृढ़, जो एकमात्र शास्त्र-गम्य हैं, प्रत्यक्ष एवं अनुमान गम्य नहीं।

पेरियाय् : बहुत बड़े

अविज्ञातं विजानतां विज्ञातम् अविज्ञातम्
(जो ये समझता है कि वो भगवान को नहीं जाना, वो वास्तव में उन्हें जान गया। जो समझता है कि वो भगवान को जान गया, वो वास्तव में उन्हें नहीं जाना।)

अथवा:

ऊऱ्ऱम् उडैयाय् : अच्युत

पेरियाय् : रक्षा करने के बाद भी उन्हें ही उदार मानने वाले

**उलगिनिल् तोऱ्ऱमाय् निन्ऱ सुडरे तुयिल् एळाय् :

“ऐसे वैभवशाली होते हुए भी आप इस संसार में प्रकट होते हैं।

उलगिनिल् : संसार में प्रकट होते हैं।
तोऱ्ऱमाय् : इन्द्रियों के विषय बनते हैं।
निन्ऱ सुडरे : तेजस/ चमकने वाले
तुयिल् एळाय् : उठो!

स उ श्रेयान भवति जायमान:
‘वो जायमान (जन्म लेकर) ही श्रेयान होता है’। भगवान अपने विभव रूप में ही श्रेष्ठ बनते हैं। ‘सकलमनुजनयनविषयतां गत:’ (गीता भाष्य)।

**माऱ्ऱार् उनक्कु वलि तोलैन्दु

जैसे आपके शत्रु परास्त होने के बाद, और कोई सहारा न देख , आपके दिव्य चरणों की शरण में आ जाते है ।

उन् वासल् कण्
आऱ्ऱादु वन्दु उन् अडि पणियुमा पोले

उसी प्रकार हम भी अपने दुख को सहन न कर पाते हुए आपके चरणों की शरण लेते हैं। (आपके सौन्दर्य एवं गुणों से परास्त होकर प्रेम-बलात्कार से आपके पास आई हैं।)

(दुर्योधन ने आदेश दे रखा था कि कोई भी कृष्ण का स्वागत नहीं करेगा। किन्तु जब कृष्ण आये तो उनके सौन्दर्य के परवश होकर सबसे पहले दुर्योधन ही उठा और प्रणाम किया।)

(जैसे काकासुर जयन्त कोई और गति न पाकर आपके चरणों में आ गिरा था। जैसे दूधमुंहा बच्चे को माँ लात से मार भी दे, तो भी वो माँ के चरणों को छोड़कर नहीं जाता। जैसे कमल का रस पीने वाले भँवरे को इक्षुरक (एक रसहीन फूल) नहीं भाता।)

भगवान ये सोच सकते हैं कि अनन्य-गति भक्त तो भगवान के कृपा की प्रतीक्षा करते हैं, स्वयं से कोई प्रयत्न नहीं करते। किन्तु ये गोपियाँ तो चल कर मेरे पास आई हैं। क्या ये साधन-निष्ठ हैं?

गोपियाँ कहती हैं कि हम प्रेम-परवश होकर, आपकी भोग्यता के परवश होकर आपके पास आपका मंगलाशासन करने आई हैं। (हमारा आना कोई उपायांतर या उपेयान्तर की इच्छा से नहीं है।)

पोऱ्ऱि याम् वन्दोम् पुगळ्न्दु एलोर् एम्बावाय्

आपका मंगलाशासन करती हुयी आपके पास आई हैं।
(जैसे पिता विष्णुचित्त आळ्वार ने भगवान का मंगलाशासन किया है।)

तिरुप्पावै 20

जब गोपियों ने नीला देवी (नप्पिनै) के व्यवहार की आलोचना की जो उनके स्वरुप और स्वभाव से मेल नहीं खाता| नीला देवी शांत रहीं और प्रभु से बात करने के समुचित क्षण की प्रतीक्षा करती रहीं| शायद नप्पिनै क्रोधित हो गयी हैं, ऐसा सोचते हुए गोपियों ने प्रभु की स्तुति की| प्रभु भी चुप रहे| शायद कन्हैया भी क्रोधित हों क्योंकि हमने नप्पिनै की आलोचना की| भगवान के क्रोध को शान्त करने के लिए चलो नप्पिनै की प्रशंसा करते हैं|

मुप्पत्तु मूवर् अमरर्क्कु मुन् सेन्ऱु
कप्पम् तविर्क्कुम् कलिये तुयिल् एळाय्
सेप्पम् उडैयाय् तिऱल् उडैयाय् सेऱ्ऱार्क्कु
वेप्पम् कोडुक्कुम् विमला तुयिल् एळाय्
सेप्पन्न मेन् मुलै सेव्वाय्च् चिऱु मरुन्गुल्
नप्पिन्नै नन्गाय् तिरुवे तुयिल् एळाय्
उक्कमुम् तट्टु ओळियुम् तन्दु उन् मणाळनै
इप्पोदे एम्मै नीराट्टु एलोर् एम्बावाय्

श्री उ वे रंगदेशिक स्वामी द्वारा विरचित गोदा-गीतावली से

गोदा-गीतावली.20

श्री उ वे सीतारामाचार्य स्वामीजी द्वारा हिंदी छन्दानुवाद

श्री उ वे मीमांसा शिरोमणि भरतन् स्वामी द्वारा अनुगृहीत विंशति गाथा का संस्कृत छन्दानुवाद:

२०.त्रयस्त्रिंशदमर्त्यानां पुरो गत्वाऽथ कम्पनम् ।
तेषां नाशितवन् ! वीर ! जागृयाः ऋजुताश्रय ! ।।
सामर्थ्ययुक्त! हे द्वेष्टुर्भयदायक ! निर्मल ! ।
कुम्भवन्मृदुवक्षोजे ! बिम्बोष्ठे ! तनुमध्यमे ! ।।
नीले ! श्रीर्वाम ! उत्तिष्ठ दर्पणं व्यजनं च नः ।
वितीर्य तव पत्या त्वम् अस्मान् स्नापय सम्प्रति ।।

मुप्पत्तु मूवर् अमरर्क्कु मुन् सेन्ऱु
कप्पम् तविर्क्कुम्

33 करोड़ देवता या 33 देवता वर्ग (12 आदित्य, 11 रुद्र, 8 वसु एवं 2 अश्विनी कुमार) में प्रथम (देवताओं के मध्य उपेन्द्र विष्णु)

अथवा जब 33 करोड़ देवता डर से कम्पन करते हैं, उनके आपके सम्मुख आने से पूर्व ही आप उनकी रक्षा करते हैं। उनके भय का निवारण करते हैं। ‘कप्पम’ शब्द संस्कृत के ‘कम्पन’ से आया है।

कलिये तुयिल् एळाय्

हे बलवान! उठिए

(परकाल आळ्वार का एक नाम कलियन भी है। अर्थात बलशाली। पूर्व में उनका नाम नील था)

(ऐसा लगता है कि आप केवल स्वार्थी लोगों को बचाते हैं, उन लोगों को नहीं जो आपके दर्शन के अलावा कुछ नहीं चाहते। इंद्र के लिए नरकासुर के खिलाफ कृष्ण द्वारा युद्ध जीतने के बाद, वह जल्द ही भूल गया और कृष्ण के खिलाफ ‘पारिजात पुष्प’ के लिए युद्ध छेड़ दिया। ऐसा लगता है कि आप ऐसे स्वार्थी देवताओं की ही मदद करते हैं।)

सेप्पम् उडैयाय् : ऋजु स्वभाव वाले

मन, वाक और काय से एकरूप रहना ही ऋजुत्व अथवा आर्जव कहलाता है। भगवान जब मनुष्य रूप में अवतार लेते हैं तो पूरी तरह से मनुष्य की भांति ही व्यवहार करते हैं। सत्यभामा के पिता की मृत्यु पर विलख कर रोना हो अथवा मैया यशोदा के डर से थर-थर काँपना। यही भगवान का आर्जव है। ऐसे व्यक्ति को बोलचाल में ‘सीधा’ व्यक्ति कहते हैं। सीधे व्यक्ति का सभी फायदा उठाते हैं। देवतावर्ग भी उठा रहे हैं। हम भी उठा रहे हैं।

तिऱल् उडैयाय् : पराक्रमशाली

क्या आपका पराक्रम हमारे लिए नहीं है? हमें भी तो वो पराक्रम दिखाईये जो आपने 7 बैलों को काबू कर नप्पिनै को प्राप्त किया था। हमें भी उसी प्रकार प्राप्त कर लीजिए!

सेऱ्ऱार्क्कु वेप्पम् कोडुक्कुम् : शत्रुओं को ज्वर देने वाले!

भगवान का सीधापन आश्रितों के लिए ही है। शत्रु तो डर से थर-थर काँपते हैं।

विमला: दोषरहित

यहाँ यह संदेह हो सकता है कि भगवान किसी के प्रति वात्सल्य रखते हैं तो किसी के प्रति क्रोध। तो फिर वो पक्षपाति नहीं हुए क्या?
हाँ, भगवान आश्रित-पक्षपाती हैं।
किन्तु गीता में तो ‘समो’हम सर्व भूतेषु’ कहा है?

इसका अर्थ है ‘आश्रयणकाले सम:’। जो भगवान की शरण में आता है, उनमें भगवान उनके जन्म, पुण्य-पाप, कुल, ज्ञान आदि के आधार पर भेद नहीं करते अपितु सभी को समान भाव से स्वीकार करते हैं। इसलिए सुग्रीव से कहते हैं, “चाहे विभीषण हो, या स्वयं रावण; मैं सभी की शरणागति स्वीकार करूँगा”।

तुयिल् एळाय् : ऐसे भगवान उठिए।

इसके पश्चात नप्पिनै को उठाती हैं

अब तक हमने देखा कि कृष्ण से उठने की विनती की गयी थी| कृष्ण नहीं उठे| 19 वें पासुर में नप्पिनै की भर्त्सना की थी| नप्पिन्नै उठ कर आना चाहती थीं किन्तु ने उन्हें आलिंगन करके रोक लिया| अब गोपियों ने कृष्ण की प्रशंसा कर उनसे उठने की विनती की किन्तु वो नहीं उठे| गोपियाँ समझीं कि शायद नप्पिन्नै की भर्त्सना से कृष्ण नाराज हैं| उन्हें प्रसन्न करने हेतु अब पुनः नप्पिन्नै की प्रशंसा करती हैं:

सेप्पन्न मेन् मुलै : कोमल एवं पर्वत के समान स्तनों वाली

भगवान से तनिक भी विरह न सहन कर पाने के स्वभाव के कारण उनकी भक्ति को कोमल एवं पर्वत के समान उन्नत कहा गया है| उनकी इस भक्ति ने भगवान को भी वश में कर लिया है एवं भगवान भी उनसे तनिक भी अपाय सहन नहीं कर पाते| अब इस सिंह का निवास स्थान इन्हीं कोमल एवं विशाल स्तनों में है|

सेव्वाय्च्: लालिमा लिए होंठ

पूर्व में उनकी भक्ति की प्रशंसा की गयी, अब उनकी भोग्यता बताई जा रही है| नप्पिन्नै के स्तन जहाँ उनके निवास स्थान हैं, उनके होंठ कृष्ण के भोग्य वस्तु हैं, उनका आहार है|

चिऱु मरुन्गुल्: सुमध्यमा (तीखे मध्य वाली)

अब पतली कमर से उनके वैराग्य की प्रशंसा की जा रही है| काजल किये आँखों के उपमान से पूर्व गाथा में उनके ज्ञान की प्रशंसा की जा चुकी है|

पर्वत के नीचे खाई देख जैसे कोई डर जाए, वैसे ही पर्वत समान वक्षस्थल के नीचे उनका मध्य देश ऐसा है मानों दिखे ही नहीं|

नप्पिन्नै नन्गाय् : हे सभी प्रकार से पूर्ण! नीला देवी

पूर्व में एक-एक अवयव या एक-एक गुणों की प्रशंसा की गयी; अब उन्हें सभी प्रकार के स्त्री-सौन्दर्य से पूर्ण एवं सभी शरणागत गुणों से परिपूर्ण कहती हैं|

तिरुवे तुयिल् एळाय्: हे श्री देवी! उठिए!

अर्थात्, हे लक्ष्मी देवी के समान गुणों वाली| हे पुरुषकारिणी!

“आप पुरुषकारिणी हैं, आपको तो कृष्ण से पहले उठना चाहिए| आप सो क्यों रही हैं?”

नप्पिन्नै पूछती हैं, “मैं सो नहीं रही, तुम्हारे विषय में ही सोच रही हूँ| तुम्हारे अभीष्ट वस्तुयें क्या हैं?”

उक्कमुम् : हस्त-पंखा

तट्टु ओळियुम् : दर्पण

तन्दु उन् मणाळनै : और आपके प्यारे कान्त (श्रीकांत कृष्ण)
इप्पोदे : जल्द से जल्द

एम्मै : हमलोग

नीराट्टु : स्नान करेंगे (कृष्णानुभव में)

एलोर् एम्बावाय् : व्रत पूरा करेंगे

स्वापदेश


युगल को जगाने का यह आखिरी पासूर है|
17 वें पासूर का आरम्भ “अ” अक्षर से होता है : अम्बरमे तन्निरे सोरे अरम सैयुम

18वें पासूर का आरम्भ “उ” अक्षर से होता है : उन्दमद कलित्तन ओडाद तोल वलियन

20 वाँ पासूर “म” अक्षर से आरम्भ होता है: मुपत्तु मूवर

एक साथ ये अक्षर ओम् बनते हैं| 19 वाँ पासूर लुप्त-चतुर्थी है जिसका विस्तृत विवरण लोकाचार्य स्वामी मुमुक्षुपड़ी रहस्य ग्रंथ में करते हैं|

  1. गोपियों द्वारा मांगे गए वस्तुओं का आतंरिक अर्थ नारायण महामंत्र है (ॐ नमो नारायणाय)
  2. दर्पण : (अ, ओम ) :- दर्पण स्व-स्वरुप का दर्शन कराता है| शरीर के अन्दर विद्यमान आत्मा सिर्फ भगवान की संपत्ति है
  3. हस्त-पंखा : ( नमः) :- यद्यपि हम ज्ञान-स्वरुप हैं और हमारे पास ज्ञान है, अभिमानवश हमारे अन्दर स्वतंत्र बुद्धि आता है| हमारे अन्दर कर्तृत्व अभिमान आता है और हम सोचते हैं कि ये कार्य मेरे द्वारा किया जा रहा है| पसीना हमारे कर्तृत्व का प्रतीक है और नमः का प्रतीक हस्त-पंखा है|
  4. कन्हैया : नारायण
  5. नोम्बू : आय :- कैंकर्य

श्रृंगार रस

माता के अवयव पिता के लिए भोग्य वस्तु हैं किन्तु पुत्र के लिए तो उज्जीवन हैं| उनपे पिता का अनुरक्त होना पुत्र के लिए उत्तम ही है| माता के स्तन तो पुत्र के लिए जीवन हैं, उसका सर्वस्व हैं| इसलिए उत्तम है कि श्रृंगार रस का आनन्द हम स्वयं को पुत्र के स्थान पर रख कर लें| यदि स्वयं को पिता के स्थान पर रखकर श्रृंगार रस का आनन्द लेंगे तो अनुचित होगा|

तिरुप्पावै 19

पिछली गाथा में गोदाम्बा सखियों सहित नप्पिनै (नीला देवी) को जगाती हैं। नप्पिनै किवाड़ खोलने जा ही रही होती हैं कि कृष्ण उन्हें पकड़ कर रोक लेते हैं। दिव्य दम्पति में भक्तों की रक्षा करने की होड़ है। कृष्ण सोचते हैं कि ये सब मुझे ढूँढने आये हैं तो दरवाजा मैं ही खोलूँगा। अन्यथा सारा श्रेय नप्पिनै को ही मिल जाएगा।
किन्तु कृष्ण स्वयं नप्पिनै के स्पर्श से परवश होकर, उनके वक्षस्थल पर ही मूर्च्छित होकर सो जाते हैं। गोदाम्बा कहती हैं कि अरे कन्हैया! तुम नीला को भी रोक लिए और स्वयं भी सो गए।

इसी प्रसंग के सन्दर्भ से पराशर भट्टारक जी ने तिरुपावै प्रबन्ध का मुक्तक श्लोक (तनिया) लिखा है।

नीळातुङ्गस्तनगिरितटीसुप्तम् उद्बोध्य कृष्णम्।
पारार्थ्यं स्वं श्रुतिशतशिरस् सिद्धं अध्यापयन्ती।।

गोदाम्बा कन्हैया को भी अध्यापन कराती हैं, “तुम्हारा स्वरूप भक्त-पारतंत्र्य है। जब भक्तजन द्वार पर खड़े हैं, तब तुम्हारा सो जाना स्वरूप के विरुद्ध है।”

श्री उ वे मीमांसा शिरोमणि भरतन् स्वामी द्वारा अनुगृहीत नवदश गाथा का संस्कृत छन्दानुवाद:

१९.दीपे ज्वलति चोत्तुङ्गे दन्तिदन्तेन निर्मितैः ।
पादैः संयुतखट्वास्थम् आरुह्य मृदुतल्पकम् ।।
विकसत्पुष्पकेशिन्या नीलायाः स्तनयोरयि ! ।
विनिवेश्य विशालोरः शयानोद्घाटयेर्मुखम् ।।
अञ्जनाञ्चितपृथ्वक्षि! नीले ! वल्लभस्य ते।
अप्यल्पकालमुत्थानं शयनान्नानुमन्यसे ।।
क्षणमात्रं न विश्लेषं सोढुं शकनवत्यहो ।
एतत्पुरुषकारस्य ते स्वभावस्य नोचितम् ।। 19 ।।

श्री उ वे रंगदेशिक स्वामी द्वारा विरचित ‘गोदा-गीतावली’ से संस्कृत गद्यानुवाद

श्री उ वे सीतारामाचार्य स्वामीजी द्वारा हिन्दी छन्दानुवाद

कुत्तु विळक्कु एरियक् कोट्टुक्काल् कट्टिल् मेल्
मेत्तेन्ऱ पन्जसयनत्तिन् मेल् एऱि

“कमरा दीपों से जगमग है और हाथी के दन्त से निर्मित सुसज्जित पंच-शयन और कोमल पलँग पर नप्पिनै के साथ सो रहे हे कृष्ण!”

हमारा जीवन कृष्ण विरह के अन्धेरे में है और तुम दीपों से जगमग घर में सो रही हो? हम अंधेरे याम में (सूर्योदय से पूर्व), अन्धेरे जंगलों एवं गौशालाओं में काले कृष्ण को ढूंढ रही हैं और तुम, हमारी सखी, कृष्ण के संग सो रही हो?

(यहाँ गोपियों की सत्त्विक इर्ष्या देखी जा सकती है)

हस्ति-दन्त कुवलयापीड नामक हाथी के हो सकते हैं, जिन्हें कृष्ण ने परास्त किया था। या उन 7 बैलों के, जिन्हें कृष्ण ने काबू में करके नप्पिनै से विवाह किया था।

पंच-शयन का अर्थ है शैया के पांच गुण: मार्दव, शैत्य, सौगंध्य, सौन्दर्य एवं औज्जवल्य।

क्या अपने भक्तों के बिना माता-पिता को पंच-शयन के शैया पर सुखपूर्ण नींद आ रही है?

कोत्तु अलर् पून्गुळल् नप्पिन्नै कोन्गैमेल्
वैत्तुक् किडन्द मलर् मार्बा


“सुजज्जित एवं खिले हुए पुष्पों से सुसज्जित केशपाश वाली नप्पिनै के स्तन पर सो रहे कृष्ण!”

वाय् तिऱवाय्

“उठकर किवाड़ नहीं खोल सकते किन्तु मुँह तो खोलो”

सामान्यतः जब हम अपने केशों में फूल लगाते हैं तो वो कुछ काल के बाद मुरझा जाते हैं। किन्तु नप्पिनै के केशों के स्पर्श को पाकर तो पुष्प और भी खिल जाते हैं।

कृष्ण ने नप्पिनै को हाथ से पकड़कर शैया पर खींचा तो वो स्वयं उनके कोमल एवं पर्वत समान स्तनों पर गिर गए एवं उनके वाल्लभ्य से परवश हो वहीं सो गए।

(जब प्रबन्ध काव्य में नायिका के आँख, मध्यप्रदेश (कमर) एवं स्तन की चर्चा हो तो उनके अर्थ इस प्रकार समझने चाहिए:

सुन्दर काजल किये आँख: ज्ञान
पतली कमर : वैराग्य
कोमल स्तन : भक्ति)

अब कृष्ण कुछ बोलना चाहते थे तो नप्पिनै ने अपने आँखों के इशारे से कृष्ण को मना कर दिया। वो चाहती थीं कि पहले मैं ही जाकर किवाड़ खोलूँ। ये मेरी सखियाँ हैं।

बेचारी गोपियाँ अब नप्पिनै की आँखों की सुन्दरता की चर्चा करते हुए प्रश्न करती हैं कि क्या ये आपके पुरुषकारत्व के स्वरूप के अनुकूल है?

मैत्तडम् कण्णिनाय् नी उन् मणाळनै
एत्तनै पोदुम् तुयिल् एळ ओट्टाय् काण्
एत्तनैयेलुम् पिरिवु आऱ्ऱगिल्लायाल्
तत्तुवम् अन्ऱु तगवु एलोर् एम्बावाय्

“ओह ! अपनी आँखों को काजल से सजाने वाली, क्या तुम अपने पति को एक पल के लिये भी उठने नहीं दे रही ? क्या तुम उनसे एक पल भी दूर नहीं रह सकती, हमारे नज़दीक आने से उन्हें रोकना आपके स्वभाव और स्वरुप के अनुकूल नहीं लगता है ।”

व्याख्याकार कहते हैं कि लक्ष्मी देवी के आँखों में वस्तुतः कोई काजल नहीं है, अपितु काले भगवान को निरन्तर देखते रखने से उनके देह का रंग उनकी आँखों में बस गया है। लक्ष्मी देवी को निरन्तर देखने से भगवान की आँखें सूर्य के समान हो गयी हैं।

रामायण में वाल्मीकि कहते हैं कि राम और सीता के सभी गुण तो एक दूसरे के पूरक हैं, किन्तु सीता की आँखों का राम की आंखों से तुलना ही नहीं हो सकती। सीता की आँखों में जो वात्सल्य है, वो स्वतन्त्र भगवान की आँखों में कहाँ?

“ऐसे वात्सल्य पूर्ण आँखों से भगवान को अपने वश में कर, हमारा कल्याण कराने वाली, तुम भगवान को हमारे पास आने से रोक रही हो?
ये तुम्हारे स्वरूप एवं स्वभाव के अनुकूल नहीं है।”

स्वापदेश

19वीं गाथा का स्वापदेश:

16वें से 22 वें गाथा तक द्वय मन्त्रार्थ रहस्य का विवरण है। आचार्य, परमाचार्य, रामानुज स्वामी के सम्बन्ध से, श्री देवी का पुरुषकार प्राप्त कर हम भगवान की शरणागति करते हैं। अर्थात, श्री देवी के नित्ययोग में रहने वाले भगवान को हम उपाय के रूप में मानते हैं/मानसिक रूप से स्वीकार करते हैं।

16वें एवं 17वें गाथा में आचार्य का पुरुषकार दर्शाया गया। 18वें गाथा में लक्ष्मी देवी का पुरुषकारत्व एवं भगवान नित्य संश्लेष दर्शाया गया है। 21वें गाथा में ‘आकिंचन्य, अनन्य-गतित्व एवं महाविश्वास’ बताया गया है तो 22वें गाथा में ‘अनन्यार्ह शेषत्व एवं अनन्य भोग्यत्व’ की शिक्षा दी गयी है।

विशेष कर 19वें गाथा में जगत का सृष्टि क्रम बताया गया है।

ईषत्त्वत्करुणानिरीक्षणसुधासन्धुक्षणाद्रक्ष्यते
नष्टं प्राक्तदलाभतस्त्रिभुवनं संप्रत्यनन्तोदयम् ।

जब भगवान का स्वातन्त्र्य ऊपर आता है तो जगत का प्रलय हो जाता है। जब माता का वात्सल्य ऊपर आता है तो जगत की सृष्टि होती है। ऊपर के श्लोक में आलवन्दार कहते हैं कि जब पूर्व में आपकी करुणादृष्टि नहीं थी तो तीनों लोकों का नाश हो गया था। अब जब आपकी करुणा दृष्टि पड़ी है, तो यह अनन्त प्रकार से उदित हुआ है। नाम रूप से विहीन प्रलय काल में पड़े जीवात्मा वर्ग अब नाम-रूप-करण-कलेवर से विशिष्ट हो जाते हैं।

भगवान का नप्पिनै के कजरारी आँखों से घायल हो जाना एवं उनके कोमल स्तन के स्पर्श से परवश हो जाने के अनेक विशेषार्थ हैं, जो श्री वचन भूषण में वर्णित हैं। उस अवस्था में भगवान लक्ष्मी देवी की कोई भी बात नहीं टाल सकते। तब मैया हमें भूलती नहीं। भगवान से अपने आश्रितों की रक्षा करवाती हैं।

नप्पिनै द्वारा कृष्ण को किवाड़ खोलने से मना करने के भी विशेषार्थ हैं। इसे स्थूणा-निखनन-न्याय से समझना चाहिए। जब हम एक स्तम्भ भूमि में ठोकते हैं, तब उसे हिला-दुला कर देखते हैं कि मजबूती से गड़ा है या नहीं।
उसी प्रकार जब लक्ष्मी देवी कहती हैं ये इस जीव को त्याग दीजिये, ये पापी है; तब भगवान कहते हैं, “एन अडियार इन सैदार, सैयारे नन सैयार”। “मेरे भक्त ऐसा नहीं कर सकते। किया भी है तो ठीक ही किया”। भगवान के इस प्रत्युत्तर से लक्ष्मी देवी प्रसन्न हो जाती हैं कि मेरी शिक्षा से भगवान अपना पारतंत्र्य समझ चुके हैं।

19वें पासूर में आन्तरिक अर्थ:

कुवलयापीड अहंकार है।
भगवान के पलँग के चार आधार हमारे चार अभिमान हैं:

  1. ज्ञातृत्व अहंकार (मैं सब जानता हूँ)
  2. कर्तृत्व अहँकार (मैं कर्ता हूँ, मैं सब कुछ कर सकता हूँ)
    3.भोक्तृत्व अहँकार (मैं भोक्ता हूँ)
  3. शेषत्व-अहँकार (मैं स्वतन्त्र हूँ)

पंच-शयन के शैया का अर्थ अर्थ-पंचक ज्ञान है:

  1. स्व-स्वरूप (मैं कौन हूँ)
  2. पर-स्वरूप (भगवान कौन हैं)
    3.उपाय स्वरूप (प्राप्त करने का साधन क्या है)
  3. पुरुषार्थ स्वरूप (प्राप्ति का फल क्या है)
  4. विरोधी स्वरूप (प्राप्ति के विरोधी क्या हैं)

श्वेत चादर हमारा मन है। उज्ज्वल दीपक हमारा धर्मभूत ज्ञान है। इस दीपक के तेल हमारे वेद हैं। इसके ऊपर हमारे हृदय के डहर आकाश में शयन कर रहे लक्ष्मी-नारायण हैं।