तिरुपावै 3

 

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ओन्गि उलघऴन्द उत्तमन् पेर् पाडि| नान्गल्ल् नम् पवैक्क साट्री नीरडिनाल्|

थीन्गिन्द्रि नाडेल्लम् थिन्गल् मुम्मारि पेय्धु| ओन्गु पेरुण चेन्नेल् उडू कयल् उघल|

पून्कुवलै पोदिर् पोरि वन्दु कन्न्पदुप्प| तेन्गादे पुक्किरिन्दु सीर्त मुलै पट्री|

वान्ग कुदम् निरैक्कुम् वल्लल्ल् पेरुम् पसुक्कल्| नीन्गाध सेल्वम् निरैन्देलोर् एम्पावै||

ओन्गि उलघलन्द उत्तमन् पेर् पाडि :

ओन्गि : लंबा हो जाना;

उस प्रभु की स्तुति गाते हुए, जिन्होंने अपना स्वरुप विस्तार कर सारे संसार को माप लिया। पर और व्यूह रूपों की स्तुति के बाद इस पासूर में गोदा विभव अवतार रूप की वंदना कर रही हैं। देवों के प्रति स्नेह और करुणा के कारण और 3 पग भूमि दान में महाबली के द्वारा मिलने की ख़ुशी में भगवान बढ़ते गए और विशालकाय हो गए। अनेक विभव अवतारों में से, सर्वाधिक  वामन अवतार की चर्चा वेदों में की गई है। वाल्मीकि ने रामायण में किसी अन्य विभव अवतार का उल्लेख नहीं किया है, लेकिन वे त्रिविक्रम अवतार को छोड़ नहीं सके। शठकोप सूरी आलवार को भी वामन और वराह अवतार से विशेष प्रेम था।

आंतरिक अर्थ:

भागवान सर्वदा अन्य लोगों के लाभ के लिए काम करने में खुश होते हैं। जब अहंकार और स्वातन्त्रियम से जूझता संसारी  विलाप करता है कि उनके लिए कौन उद्धारकर्ता होगा, भागवान तुरंत मदद के लिए दौड़ते हैं।

उलघ्: तीनों लोक

अऴन्द: मापा (अपने दिव्य पैरों से);

जब भगवान ने अपने तीन कदमों से सारे संसार को नाप लिया तो उनके चरण संसार के सभी जीवों के सर पे पड़े| योग्यता, अयोग्यता का विचार किये बिना भगवान सबको आशीर्वाद देना चाहते थे| जिस प्रकार प्रेमवश माँ अपने शिशु को गले लगाती है, यह सोचे बिना कि शिशु इसे अनुभव कर पा रहा है या नहीं; उसी प्रकार अपार प्रेम के सागर भगवान ने सबको अपना आशीष दिया, चले वो भगवान से प्रेम करते हों या नहीं|

जैसे-जैसे वह आकार में बढ़ते गये, उसी अनुपात में चक्र, शंख, गदा आदि भी बड़े होते गए। दृश्य के चित्रण में टिप्पणीकार भावपूर्ण हैं। पाठकों को मानसिक रूप से कल्पना करनी चाहिए। बाली अपने कर्तव्य को पूरा कर खुश था और इंद्र खुश था क्योंकि वह अपने धन को वापस पा सका, लेकिन अफसोस! कोई भी चिंतित नहीं था कि अंतरिक्ष में प्रगति करते हुए उनके चरण किन बाधाओं और चोटों का अनुभव करेगा। आलवार इस दर्द का अनुभव करते हैं|

ऊत्तमन्: उत्तम पुरुष

श्री पेरिया-आच्चान-पिल्लई इस दुनिया में लोगों की तीन श्रेणियों का वर्णन करता है:

  1. अधम: वह जो दूसरों की कीमत पर अपनी प्रगति चाहता है।
  2. मध्यम: जो सोचता है कि दूसरे भी भली प्रकार जियें और मेरा भी नुकसान न हो।
  3. उत्तम: जो यह महसूस करता है कि मेरी सुख-सुविधाओं की कीमत पर भी दूसरों की प्रगति हो।

सर्वोच्च भगवान ने न केवल आकार में बल्कि स्थिति में भी खुद को कम किया। भगवन ने अपने भक्तों के लिए क्या नहीं किया! क्या किसी को भीख मांगना पसंद है? भगवान भिखारी बन गए। अपने लिए नहीं, बल्कि इंद्र के लिए। वह भिक्षा माँगने की वाक्य रचना भी नहीं जानते था लेकिन बली को उसकी सुंदरता ने मोहित कर दिया और उनसे कुछ मांगने के लिए कहा। अंत में, सभी को वही मिला जो वे चाहते थे, हर कोई खुश था और भगवन भी अपने बच्चों को खुश देखकर खुश थे।  परमात्मा ने बिना किसी बिल की मांग के सूर्यप्रकाश दिया| उन्होंने सृष्टि  के पश्चात आत्मा को शरीर, मन और बुद्धि प्रदान की ताकि वे मुक्ति के लिए प्रयत्न करें।

यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः। अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः।। गीता15.18।।

 

पेर पाडि: उत्तमपुरुष के नाम और उनकी महिमा का गायन करते हैं।

यदि भगवान सोने की टिकिया हैं, तो उनका नाम सोने के आभूषण जैसा है। प्रभु का ‘नाम’ स्वयं भगवान से भी अधिक प्रभावकारिता रखता है। कर्म, ज्ञान और भक्ति योगी भी सांसारिक लक्ष्यों के लिए या मोक्ष के लिए नाम जपते हैं, लेकिन शरणागत के लिए  नाम  स्वयं पुरुषार्थ  है (लक्ष्य है), क्योंकि भगवान तक पहुँचने के लिए भगवान स्वयं ही साधन है। हमने पहले ही आचार्य और रामानुज स्वामीजी के माध्यम से उनके कमल के चरणों में समर्पण कर दिया है, इसलिए साधन के तौर पे हमें कुछ करने की आवश्यकता नहीं है। प्रपत्तों के लिए नाम जप भगवत-कैंकर्य रूप है, साधन नहीं।

हमें कभी भी ‘अधम पुरुषों’ के बारे में बात नहीं करनी चाहिए। ऐसे लोगों के बारे में नहीं बोलना स्वयं एक महान गुण है। जब से हम उनके बारे में बात करते हैं, उनके बुरे गुण भी हमें छूते हैं और अंततः दूषित हो जाते हैं। इसलिए, हमें हमेशा ‘उत्तम पुरुष’ (नारायण) की महिमा गानी चाहिए। हम भगवान को नहीं छू सकते लेकिन हम उनके नामों को छू सकते हैं, उसका स्वाद ले सकते हैं, महसूस कर सकते हैं।

 

नान्गल्ल् नम् पवैक्क साट्री नीरडिनाल्

नान्गल्ल् :– हम (जिनका  नाम और महिमा का जाप किए अस्तित्व संभव नहीं);

नम् पवैक्क साट्री :- हमारे व्रत के बहाने;

नीरडिनाल् – अगर हम दिव्य स्नान करते हैं;

हम व्रत के बहाने कृष्ण से मिलने और उनका आनंद ले सकेंगे क्योंकि कल तक हमारे बुजुर्ग हमारी निगरानी कर रहे थे और कण्णन के साथ खेलने की अनुमति नहीं दे रहे थे। हम अलगाव के ताप पर काबू पाने के लिए अपने अनुष्ठान रूपी कृष्णानुभव में स्नान करेंगे। यहाँ स्नान का अर्थ है । कृष्ण के दिव्य नामों और कल्याण-गुणों में स्नान।

 

थीन्गिन्द्रि नाडेल्लम् थिन्गल् मुम्मारि पेय्धु

थीन्गिन्द्रि :- बिना किसी खतरे के;

नाडेल्लाम् :- देश भर में;

थिन्गल् – मासिक;

मुम्मारि पेय्धु :- बारिश की तीन अवधि;

जब पांडव गुप्त-अवस्था में थे, तब भीष्म ने पांडवों की खोज करने के लिए एक अद्भुत तरकीब बताई- “जिस स्थान पर 3 अवधि की वर्षा होती है, वहाँ कोई भी रोग नहीं, कोई बीमारी नहीं; विश्वास करो कि पांडव केवल वहाँ ही रह रहे हैं”। ऐसा क्यों? इसका कारण यह है कि पांडव हमेशा भगवान के दिव्य नामों का जाप करते थे। यदि कहीं पर सच्चे भक्तों की उपस्थिति हो तो उस स्थान पर हमेशा समृद्धि रहेगी।

रामराज्य में 9 दिन धूप और एक दिन प्रचुर वर्षा होती थी। इस चक्र ने हर महीने खुद को दोहराया। इस प्रकार, हर महीने तीन बार बारिश होती थी। भूमि उपजाऊ थी और पानी की कमी के कारण कोई अशुभता नहीं थी। ऐसी समृद्धि तिरुप्पावई व्रत के उचित पालन से उत्पन्न होगी।

 

ओन्गु पेरुण चेन्नेल् उडू:  (उस वजह से) लंबा और उन्नत लाल धान के बीच;

कयल् उघल: उन के बीच में उछलती मछलियाँ;

बिना खाद और हाइब्रिड बीजों के उपयोग के; धान त्रिविक्रम की तरह लंबा हो जाता है। (श्री भट्टर और श्री आलवन्दार जैसे महान आचार्य जब धान के खेतों में लाल कमल के फूलों को उनके सामने झुकने वाले धान के डंठल के साथ देखते थे, भगवान के चरण कमलों को याद याद करते थे; भक्त जिनकी पूजा और साष्टांग प्रणाम कर रहे हैं |)। जैसे डर से मारीच ने हर पेड़ में राम को देखता, जब वो राम के बाण के  द्वारा बहुत दूर जा गिरा था। गोपिकाओं को लंबे धान से वामन अवतार का स्मरण हो रहा है।

पर्याप्त पानी फसल का पोषण करता है। अद्भुत मछलियां, बच्चे हाथी की तरह बड़े होने के कारण धान के बीच में उछल-कूद रहे हैं|

 

आंतरिक अर्थ:

सदाचार्य द्वारा शरणागति का उपदेश ही दिव्य स्नान है। शिष्य ‘स्वातंत्रियम’ के बोध से मुक्त हो जाता है। 3 अवधि की बारिश का अर्थ है शिष्य में 3 प्रमुख गुणों का विकाश:

  1. अनन्यार्घ शेषत्वं 2. अनन्य शरणत्वं 3. अनन्य भोग्यत्वं

पर्याप्त वर्षा का अर्थ है सत्संग, प्रबंधों का अध्ययन, अर्चा विग्रह के कैंकर्य का आनंद और दिव्य देशों की तीर्थ यात्रा। पुष्ट धान के पौधे शिष्य हैं। उछलती मछलियाँ आचार्यों जो अपने शिष्य के जीवन को सफल होता देख आनंदित हैं।

दूसरा भाव यह है कि गोदा भगवान रंगनाथ को उल्लासपूर्वक देखने में सक्षम होने के लिए इस धारा में एक मछली होने चाहती हैं। मछलियाँ उपजाऊ भोजन (भगवत-भागवत-आचार्य-अनुभव) से पुष्ट होती हैं। जिस प्रकार पुष्ट मछलियाँ कूदती हैं, उसी प्रकार भक्त भी कूदते और नृत्य करते हुए और आंसू भरी आंखों के साथ भगवान के सुंदर रूप का आनंद लेते हैं।

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पून्कुवलै पोदिर् पोरि वन्दु कन्न्पदुप्प:

पून्कुवलै पोदिर्: सुंदर नीले लिली के फूलों पर;

पोरि वन्दु: और सुंदर मधुमक्खियों का;

कन्न्पदुप्प :आँख लग जाना;

ताजे खिलने वाले नीले लिली के फूल पर; (पोदि) मधुमक्खियों जो सुंदर वातावरण के कारण शहद पीने के लिए फूल में प्रवेश करती हैं और फूल के रस का आनंद लेते हुए उनकी आँखें लग जाती हैं।

आतंरिक अर्थ:

कृष्ण-चिंतन में इस तरह के अनुभव के लिए अंडाल तरसती है। अंडाल एक मधुमक्खी के अनुभव की आकांक्षा रखती हैं जो नीली लिली पर शहद चूसने के लिए बैठी है और पूरी रात वहाँ रहती है। वरवर मुनि भी  ‘द्वय-मन्त्रम’ के अर्थानुसंधान की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि जैसे कि ध्वनि करता हुआ मधुमक्खी फूल पर बैठ जाता है और शांत होकर  शहद का रसास्वादन करने लगता  है, उसी प्रकार द्वय महामंत्र का अर्थानुसंधान करना चाहिए।

दूसरा भाव यह है कि हमारे हृदया कमल में चिंता किए बिना सो रहे श्रीमन नारायण को भी संदर्भित करता है क्योंकि आचार्य के माध्यम से उनका कार्य  सफल रहा है। वह एक संतुष्ट किसान की तरह सोते हैं, जिन्होंने प्रचुर मात्रा में फसलों का एहसास किया है।

 

तेन्गादे पुक्किरिन्दु सीर्त मुलै पट्री, वान्ग कुदम् निरैक्कुम् वल्लल्ल् पेरुम् पसुक्कल्

तेन्गादे – बिना हिचक;

पुक्किरिन्दु: उठो और कोशिश करो

सीर्त मुलै पट्री: दोनों हाथों से बड़े थनों को पकड़कर

वान्ग – खींचें;

कुदम् निरैक्कुम् – बाल्टी भरना;

वल्लल्ल् – उदारता के साथ;

पेरुम् पसुक्कल् – पुष्ट विकसित गायों;

गायों के थन इतने लबालब भरे हुए हैं कि उन्हें दूध देने के लिए किसी भी प्रयास की आवश्यकता नहीं है, लेकिन बाल्टी को पुनः-पुनः उठाने के लिए मांसपेशियों की अत्यधिक शक्ति की आवश्यकता होती है। बर्तन थनों के नीचे रखते ही अपने आप दूध से भर जाता है और फिर दूसरा बर्तन बदला जाता है। यहां तक कि बहुत मजबूत ग्वाले इन गायों को दूध देने में संकोच करते हैं क्योंकि गाय केवल एक थन के द्वारा असंख्य बर्तनों को भरने में सक्षम हैं।

सम्पन्नता से घड़े भरने वाली परोपकारी गायें ब्रज की समृद्धि और सम्पदा हैं। हर घर में घी और मक्खन भरा होता है। दूध निकालने में कोई शक्ति की आवश्यकता नहीं लेकिन मथने में भारी प्रयास की जरूरत होती है। दूध में इतना मक्खन भरा होता है क्योंकि कृष्ण के साथ गायों का विकास होता है, कृष्ण के स्पर्श से, कृष्ण की बांसुरी का संगीत सुनकर। गायों की स्वाभाविक उदारता ईश्वर की इच्छा की पूर्ति है।

 

आतंरिक अर्थ:

गायों से तात्पर्य उदार आचार्यों से है। चार थन जिसके माध्यम से ज्ञान का यह दूध बहता है: वेद, स्मृति, सात्त्विक पुराण और आलवार दिव्य प्रबंध।

 

 

नीन्गाध सेल्वम् निरैन्देलोर् एम्पावै:

चिरस्थायी धन (कृष्ण) हमारे जीवन में भरने के लिए, मेरी लड़कियों व्रत करो।

व्रतम के परिणामस्वरूप, प्रकृति की सुंदरता को संरक्षित किया जाएगा, घर की संपत्ति को संरक्षित किया जाएगा, अन्य सभी प्राणियों को संरक्षित किया जाएगा और मनुष्य बिना किसी बीमारी के लंबे समय तक जीवित रहेंगे।

स्वापदेश:

हमारा शरीर क्षेत्र है। यह केवल साधारण बारिश नहीं है, बल्कि इसके द्वारा हमारे महान गुरु के वचनों की वृष्टि है, जिससे ईर्ष्या, अहंकार जैसे आंतरिक रोग शांत हो जाते हैं। इस प्रकार, हमारा शरीर अच्छी उपजाऊ भूमि (क्षेत्रम्) बन जाता है। {इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते: गीता 13.2 }। यह कई अच्छी फसलों की यानी हमारे अंदर अच्छे गुण पैदावार करता है जिसे हम स्वयं आनंद लेते हैं और दूसरों को बांटते हैं। इस प्रकार हम गायों की तरह लोगों की मदद करने में सक्षम होंगे। हमारे लिए असली धन भगवान और उसकी दुनिया की सेवा है।

जब आप छाया के लिए पेड़ लगाते हैं तो यह फल देता है। इसके साथ ही पक्षियों को आश्रय मिल जाता है, पर्यावरण साफ हो जाता है, बारिश आती है| इसी तरह जब हम भगवान को खुश करने के लिए गतिविधियां करते हैं, तो हम इस जीवन में भी सुख-सुविधाओं को प्राप्त करते हैं।

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Author: ramanujramprapnna

studying Ramanuj school of Vishishtadvait vedant

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