तिरुपावै 6

श्री गोदाम्बाजी ने पिछले ५ पाशुरों में व्रत की अवतारिका को बताया है और आगे १० गाथाओँ में सखियों को जगाती है

पुल्लम् सिलम्बिनकान् पुल्लरैयन् कोयिलिल्| वेल्लै विलिसन्गिन् पेररवम् केत्तिलैयो||

पिल्लाय एऴुन्दिराय पेय्मुलै नन्ञुण्डु| कल्ल च्चगडम् कलक्कऴिय क्कालोच्चि ||

वेल्लत्तरविल् तुयिल् अमरन्द वित्तिनै| उल्लत्तु कोन्दु मुनिवर्गलुम् योगिगलुम्||

मेल्ल एऴुन्दरि एन्ऱ पेर् अरवम् | उल्लम् पुगुन्दु कुलिन्देलोर एम्पाय्||

संस्कृत अनुवाद

Ts6

हिंदी छन्द अनुवाद 

Th6

images (1)

पक्षी भी चहक रहे हैं; क्या तुम मंदिर में महान शंख की प्रचण्ड ध्वनि नहीं सुन सकते?

जागो, हे युवा गोपी, अपने मन में यह विचार करना कि जिसने पुतना का दूध पिया है, जिसने पैरों के ठोकर से शकटासुर का संहार किया, वह जो पूरे ब्रह्मांड का निमित्त और उपादान कारण है, और वह जो क्षीरसागर में आदि-शेष पर शयन करते हैं; ऋषि और योगी अपने योग से धीरे-धीरे बाहर आ चुके हैं, जोर-जोर से हरि नाम का जाप करते हुए, उन नामों को हमारे दिलों में प्रवेश प्रवेश कर हमें तरोताज़ा करने दो।

वेद हमें अकेले आनंद लेना नहीं सिखाते हैं। केवालाघो भवति केवालादि (रिग-वेद)। जो अकेला खाता है, वह पाप खाता है। गोदा एक शिक्षिका होने के नाते, हमें भागवतों के संग आनंद लेने के लिए सिखाती हैं।

गोदा उन गोपियों के घर जाती है जो अभी तक सो रही थीं और उन्हें जगाती हैं। ऐसा क्यों है कि कुछ गोपियाँ अभी भी सो रही थीं? क्या वे निष्ठावान नहीं थे या कृष्ण के प्रति प्रेम नहीं रखते थे? ऐसा नहीं है। प्रभु की कृपा नशे की तरह है। जैसे नशा में अलग-अलग लोग अलग-अलग व्यवहार करते हैं, कुछ जमीन पर लुढ़कते हैं, कुछ सड़कों पर सोते हैं, कुछ गहरे दर्शन देते हैं; इसी तरह भक्त भी जिनपे भगवत-कृपा से भगवद-अनुभव में मंत्रमुग्ध होते हैं। गोदा हमें उस स्तर की भक्ति दिखाती हैं, ताकि हम उन्हें आत्मसात कर सकें। कुछ गोपियां इतनी भावुक थीं कि वे समय से पहले पहुंच गईं, कुछ पूरी रात सो नहीं पाईं और कुछ ऐसी भाव-समाधि में थीं कि वे हिल भी नहीं पा रही थीं। ठीक वैसे हीं जैसे दामोदर लीला को याद करने के उपरान्त, 6 महीने तक सठकोप सूरी आलवार मूर्छित रहे थे। भगवान को ‘अनंत’ कहा जाता है क्योंकि उनके ‘कल्याण-गुण’ अनंत हैं। सठकोप सूरी आलवार (नम्मालवार) का कहना है कि भगवान की महिमा का आनंद लेते हुए भक्त पागल हो जाते हैं, कुछ नाचने लगते हैं, कुछ रोने लगते हैं, कुछ भाव-समाधि में पहुंच जाते हैं। वे खुद को खो देते हैं और आनंद में डूब जाते हैं।

एक और कारण कि हमें हमेशा भक्तों की संगति में रहना चाहिए| जब हम फिसलते हैं तो वे हमें पकड़ लेते हैं। जैसे हरिद्वार में गंगा का प्रवाह तीव्र और अति-शीतल होता है, इसकारण हम एक जंजीर पकड़ कर स्नान करते हैं| वैसे ही ठगिनी माया दे बचने के लिए हमें हमेशा भक्तों का हाथ पकड़े रहना चाहिए। भगवान बढ़े तालाब की तरह है, जैसे बढ़े तालाब में एक दो व्यक्ति सधैर्य उत्तर नहीं सकते, उसी तरह भगदनुभव करने के लिए बहुत लोग मिलकर एकत्रित होते है ।

गोदा समूह में शामिल होने के लिए गोपीयों को आमंत्रित करती हैं। वह भक्ति के विभिन्न स्तरों के अवस्थाओं का वर्णन करती है ताकि हम उन्हें आत्मसात कर सकें। ऐसी करुणा है उनकी। द्वापर के गोपीओं ने व्रत किया लेकिन उन्होंने व्रत के बारे में स्वयं नहीं गाया। इस प्रकार द्वापर-युग की गोपियों की तुलना में श्री श्रीविल्लिपुत्तुर की गोपियाँ और भी श्रेष्ठ हैं।

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पुल्लम् सिलम्बिनकान् पुल्लरैयन् कोयिलिल् वेल्लै विलिसन्गिन् पेररवम् केत्तिलैयो

पुल्लम् – पक्षी भी;

सिलम्बिनकान् – चहक रहे हैं;

पुल्लरैयन् कोयिलिल्- पक्षियों के राजा (गरुड़) के गुरु के मंदिर में;

वेल्लै विलिसन्गिन् – सफेद शंख हर किसी का ध्यान आकर्षित करने में सक्षम;

पेररवम् – वज्र ध्वनि;

केत्तिलैयो? – क्या तुम नहीं सुन पा रहे हो?

गोदा एक गोपी के घर के सामने आती हैं और उसे जगाने की कोशिश करती हैं। अंदर शयन कर रही गोपी को यकीन नहीं है कि प्रातःकाल हो चूका है,  भले ही अन्य लोग जाग रहे हों। इसलिए गोदा यह साबित करने के लिए तर्क देती हैं कि यह जागने का समय है। क्या तुम पक्षियों की चहक नहीं सुन रही हो, गरुड़ के स्वामी (विष्णु) के मंदिर से सफ़ेद शंख की गूंजती ध्वनि नहीं सुन रही हो? क्या तुम उस आवाज़ को सुनने का भाग्य को खोने जा रही हो जो तुम्हें कृष्ण के पास जाने के लिए बुला रही है?

आतंरिक अर्थ:

पक्षी आचार्य और भक्त हैं, जो सुबह जल्दी उठे हैं, कृष्ण के कालेपन के दर्शन प्राप्त करने की इच्छा से। पक्षी की ध्वनि उनके उपदेश का संकेत दे रहे हैं जो हमें अज्ञानता रूपी निद्रा से जगाता है। शंख की ध्वनि अष्टाक्षर महामंत्र है। शंख की प्रचंड ध्वनि यह घोषणा करती है कि कृष्ण सर्व-शेषी (सभी का स्वामी) है और हम उसका शेष (अनन्त सर्व) हैं।

अगले 10 पासुरों में 10 गोपीयों का आंतरिक अर्थ 10 आलवारों को जगाने का है। इस श्लोक में पोइगई आलवार को जगाने का भाव है।

पिल्लाय एऴुन्दिराय

पिल्लाय :(भगवत-विषय में नयी) हे युवा गोपी!

एऴुन्दिराय – (जल्दी से) उठो;

चूंकि तुम भक्ति में नयी हो इसलिए सोचती हो कि तुम अकेले भगवान का आनंद ले सकती हो। लेकिन ओह मेरी सखी! कृपया उठो! यह आनंद तभी है जब हम सभी एक साथ आनंद लेते हैं। कृपया हमें आप के साथ जुड़ने और दोनों के लुत्फ़ उठाने का आनंद दें – कृष्ण का नटखटपन और आपकी संगति।

अंदर गोपी को आश्चर्य हुआ, “तुम सब कैसे जाग गए”? हर जगह गूंजते भक्तों के हरि नाम जप ने हमें जगा दिया और हमें एक ताजगी भरा अहसास दिलाया – बाहर की गोपियाँ कहती हैं।

भीतरी अर्थ:

कृपया अपने बचकाने रवैये को त्याग दें कि परमपिता परमात्मा और आप एक ही हैं और अपने सेवक-स्वामी संबंध के बारे में सच्चा ज्ञान प्राप्त करें और उसके प्रति जागृत हों!

पेय्मुलै नन्ञुण्डु कल्ल च्चगडम् कलक्कऴिय क्कालोच्चि

पेय्मुलै नन्ञुण्डु: पिया (उसकी आत्मा के साथ) दानव पुताना का जहरीला दूध (मां की तरह प्रच्छन्न);

कल्ल च्चगडम् : दुष्ट शकटासुर; (असुर/दानव जो गाड़ी के रूप में आया था)

कलक्कऴिय: अपना रूप खोना;

क्कालोच्चि:  अपने दिव्य पैरों को उठाया;

दो लीला यहाँ वर्णित है:

  1. पुतना के जहरीले दूध को पीकर उसकी आत्मा को खिंच लिया। भगवान कृष्ण के पैरों ने स्वयं कृष्ण को भी बचा लिया। इस प्रकार, भगवान के पैर स्वयं उनसे भी बड़े हैं। भगवन ने अपनी रक्षा कर समस्त ब्रज को बचाया क्योंकि गोप और गोपियाँ केवल कृष्ण को देखने के लिए ही जीवित हैं। भगवान की ऐसी कृपा “आश्रित-वात्सल्य-जलध” है। जब कन्हैया ने पूतना को छुआ, तब वह शुद्ध हो गयी और जब उसे जलाया गया तो चंदन की लकड़ी से भी अधिक सुगंध फैला।

पूतना ने ‘विष’ दिया, जबकि संसार हमें ‘विषय’ (इन्द्रिय-भोग की वस्तु) देता है। इस प्रकार, जब हम कृष्ण से संबंध जोड़कर विषय का उपयोग करते हैं, तो हम भी शुद्ध हो जाते हैं और परम-पदम प्राप्त करते हैं।

  1. जिसने अपने दिव्य पैरों की एक लात से शकटासुर को नष्ट कर दिया। शकटासुर एक ‘शकट’ यानी गाड़ी में था। गाड़ी शरीर का प्रतिनिधित्व करती है। दो पहिये कर्म हैं : पाप और पुण्य। कृष्ण स्वयं शरीर-बंधन को तोड़ देते हैं (अहैतुकी कृपा), पाप और पुण्य को नष्ट करते हैं और अपने अपने दिव्य चरण आत्मा को प्रदान करते हैं।

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आंतरिक अर्थ:

लड़कियां पुतना और शकटासुर की चर्चा कर रही हैं ताकि निद्रा त्यागने में असमर्थ गोपी को अपने कृष्ण के लिए आने वाले खतरों के बारे में सोचकर झटका लगे और वह जाग जाए।

काम और क्रोध का परिणाम अहंकार और ममकार से होता है, जिसका परिणाम होता है : ‘स्वातंत्रियम्’ अर्थात् गलत भावना कि हम कृष्ण से स्वतंत्र हैं| आत्मा के लिए यही विष है। आचार्य जहर को नष्ट करते हैं और इंद्रियों द्वारा संचालित हमारे शरीर (शकट) को सही दिशा देते हैं।

वेल्लत्तरविल् तुयिल् अमरन्द वित्तिनै

वेल्लत्त्क्षीरसागर में;

अरविल्दिव्य नाग के ऊपर;

तुयिल्शयन करते हुए;

अमरन्द: मदद करने और हमारी रक्षा करने के तरीकों के बारे में गहराई से चिंतन करते हुए;

वित्तिनै: सर्वोच्च भगवान जो ब्रह्मांड का निर्माता है;

प्रेम से आप्लावित हमारा दिल क्षीरसागर है और शरणागत आत्मा ‘आदि-शेष’ है। भागवान इस क्षीरसागर में निवास करने के लिए आते हैं और इस आत्मा रूपी विस्तर को अपना सनातन निवास बनाते हैं।

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उल्लत्तु कोन्दु मुनिवर्गलुम् योगिगलुम्

उल्लत्तु कोन्दु: ह्रदय में भगवान को धारण किये हुए

मुनिवर्गलुम्ध्यान करने वाला (सर्वशक्तिमान पर);

योगिगलुम्जो सेवा (कैंकर्य) करते हैं;

मुनि और योगी दो प्रकार के भक्त हैं-

  1. मुनि: वह जो हमेशा भक्ति में डूबा रहता है और
  2. योगी: जो अपनी गहरी भक्ति के कारण सेवाओं में भाग लेते हैं।

मेल्ल एऴुन्दरि एन्ऱ पेर् अरवम्

मेल्ल एऴुन्द: धीरे-धीरे उठें (बिना परम प्रभु को परेशान किए)

अरि एन्ऱ: दिव्य नाम (हरि: हरि: )

पेर् अरवम्: जोर से नाम-संकीर्तन;

नाम-संकीर्तन की निम्न परंपरा है:

  1. यात्रा के दौरान केशव।
  2. खाने के दौरान गोविंदा।
  3. सोते समय माधव।
  4. जागने के बाद हरि।

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उल्लम् पुगुन्दु: हमारे दिल में प्रवेश किया;

कुलिन्दे:- और ताज़ा;

एलोर एम्पाय्

हरिनाम संकीर्तन हमारे दिल में उतर कर कृष्ण से विरह के हमारे ताप को ठंढा कर रही है| इसलिए तुम भी जागो और हमारे दिव्य-समूह में शामिल हो|

हरिः हरति पापानिदुष्टचित्तैरपिस्मृतः

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स्वापदेश

एक अच्छा भोजन जब मित्रों और रिश्तेदारों के साथ आनंद लिया जाता है तो अकेले खाने की तुलना में अधिक खुशी मिलती है। यही कारण है कि गोदा अकेले सर्वशक्तिमान के दिव्य गुणों का आनंद नहीं लेना चाहती हैं, प्रत्येक गोपी के द्वार पर दस्तक देती हैं और उन्हें (6 से 15 वें श्लोक तक) के दिव्य अनुभव में शामिल होने के लिए जगाती है।

इन श्लोकों में गोदा एक दिव्य रहस्य को प्रकट करती हैं। भक्तों की सेवा भगवान की सेवा से बेहतर मानी जाती है। हम सभी सर्वोच्च प्रभु के संतान हैं। एक माँ चाहती है कि सभी बच्चे समान रूप से आनंद लें। इसलिए जब वे सभी हाथ मिलाएंगे और मां का मनोरंजन करेंगे तो वह सबसे ज्यादा खुश होंगी।

समान विचार वाले भक्तों के साथ समूहों में, प्रभु के दिव्य गुणों के अनुभव का आनंद लेना, भक्तों और भगवान दोनों को खुशी देता है।

प्रभात होने के तीन लक्षण बताये जाते है-
१.पक्षियों का कलकल निनाद
२.पक्षीराज मंदिर की शंख ध्वनि
३.योगियों का हरिनामोच्चारण
यहां पर सखी को बताया गया की सुबह हो गयी है पक्षी कोलाहल कर रहे है ।श्रीवैष्णव सुबह सभी मिलकर भगवान का नाम स्मरण कर रहे है । पक्षी के दो पंख होते है वैसे ही श्रीवैष्णव के लिए ज्ञान और अनुष्ठान रूपी दो पंख है । इन दोनों के रहने से मात्र सद्गति पा सकेगा ।
आचार्य भी इसी तरह रजस्तमगुणों से पूर्ण संसारी जीवात्त्माओं पर कृपा करके उन्हें इस विषयभोग रूपी नीन्द से उठाकर भगवान के सन्मुख करते है ।
आचार्य के श्री चरणों से संबंधित होनेवाला जीव गर्भगति, याम्यगति, धूमादीगति जैसे दूखी मार्गों को छोड़कर अर्चिरादीगति मार्ग द्वारा परमपद में सेवा का अधिकारी बना दिया जाता है ।
👉गर्भगति – शरीर छुड़ते ही दूसरे गर्भ में प्रवेश करना ।
👉याम्यगति – शरीर छुड़ते ही नरक में प्रवेश करना ।
👉धुमादिगति – शरीर छुड़ते ही स्वर्ग में प्रवेश करना ।
👉 अर्चिरादीगति – शरीर छुड़ते ही भगवान के धाम वैकुण्ठ में प्रवेश करना ।
शास्त्र बताता है की मीठी चीज का अनुभव अकेले नहीं करना किन्तु दूसरों से मिलकर उसका सेवन करना चाहिये । इस व्रत में भगवान का अनुभव मीठी चीज है, इसका अनुभव करने गोदम्बाजी सभी सखियों को जगाते हुए साथ मे बुलाती हुयी आगे बढती है ।
हमें जब कभी भी भगवान के दर्शन करने जाना है तो भागवतों के पुरुषकार से उनके साथ जाना चाहिये । अकेले नहीं जाना चाहिये । जैसे श्रीविभीषणजी ने भगवान के सन्निधि में जाने से पहिले सुग्रीव आदि पार्षदों का पुरुषकार माँगा । भगवान और भक्तों के मिलाप में दोनों तरफ सिफारिश करनेवाले भागवतों की आवश्यकता होती है ।

श्री गोदा रंगनाथ भगवान का मंगल हो

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Thirupavai 5

5

māyanai mannu vaḍa madurai maindanai |tūya perunīr yamunai turaivanai |

āyar kulattinil tōnnum aṇi-viḷakkai | tāyai kuḍal viḷakkan ceyda dāmodaranai |

tūyōmāy vandu nām tūmalar tūvit tozhudu | vāyināl pāḍi manattināl cindikka |

pōya pizhaiyum puhudaruvān ninnanavum | tīyinil tūśāhum ceppēlōr empāvāy ||

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Māyanai – one whose acts are inscrutable and mysterious;

Bhagwaan is Mayan or Mayavi i.e. possessor of Maya. Maya doesn’t mean illusion as said in Advait. Maya means ‘Moola Prakriti or Sankalpa gyanam of Brahman’. Just by mere Sankalpam, Brahman creates and destroys the universe full of mysterious details.

As per Yakshacharya’s Nirukta, Maya means wisdom or knowledge.

माया वयुनं ज्ञानम् (वे0 नि0 ध0 व0 22).

Thus, Advait concept of Maya being Avidya or Upaadhi goes against Vedas.

सर्वे निमेषा जज्ञिरे विद्युतः पुरुषादधि। (यजुर्वे0 32।2);

अजायमानो बहुधा विजायते (यजुर्वेद 31।19);

संभवामि आत्म मायया (BG 4.6);

निज माया निर्मित तनु माया गुण गोपार, चिदानंदमयी देह तुम्हारे (मानस).

Bhagwaan by his sankalp-shakti, incarnates as Padmanaabh to help devas, Jumps out of pillar as Narasimbha, maps three world as Trivikrama; born with Shankh-Chakra as Krishna etc. That Mayan has incarnated as Krishna and performing wonderful maayik activities. The birth of Apahatpaapma (Devoid of imperfections) is different from that of jeevatmas. We take birth to due to our karma and to eliminate our karma; due to our karma we feel pains and pleasures. The birth of Parmatma is not due to karma but Sankalpa (will). {जन्म कर्म च मे दिव्यम्}.

Maya also means kripa-shakti of Perumal through purushkaar ko Sri Mahalakshmi and Acharya. Bhagwaan through his efforts  makes jeevatma his sharnagata and declares that he has done Sharnagati. Thus, he gives to them.

स्वामी स्वशेषं स्ववशं स्वभरत्वेन निर्भरम्| स्वदत्त स्वधिया स्वार्थं स्वस्मिन् न्यस्यति मां स्वयम्|| (न्यास दशकम्).

Periya Thirumozhi 7.3.3 says, “Lord has come and taken abode in my heart. He appears to be unknown of other hearts to go and stay. He will not let me enter the loka of yama. To one who has done this favour, what can one do in return? How at all can I forget him? No No. Not Possible”.

Thus, Bhagwaan himself chooses the jeevatma, makes them sharnagata and accepts him through Acharya and Sri Mahalakshmi thayar. Our efforts are in fact obstruction to receive his kripa. Parmaatma is ‘pargat-swikaara’ not ‘swagat-swikaara’.

 

mannu vaḍa madurai maindanai – the King of northern Mathura (ever glowing with divine association);

Mathura always has bhagwat-sambandham in every yuga. srI vAmana avathAra did a long penance in this place; Shatrughna took care ruling this place after winning lavaNAsura and other asurAs, and now as krishNan he is here for butter, ghee, milk, and the gopikAs). Mannu means most sacred place and maindanai means son (of Mathura).

 

tūya perunīr – pure and deep river;

yamunai turaivanai – one who plays in the bank of Yamuna;

It is said that the purity of the waters of the Yamuna river is due to Lord Kṛṣṇa and the Gopis playing in them, gargling and splashing themselves. The waters experienced the Divine touch of the Lord and therefore have become pure. It touched the lotus feet of Krishna and gave way to Vasudeva (Bhagwat-kainkaryam). She also became one of the asht-mahishi of Dwarika. Thus name of Krishna became ‘yamunai turaivanai’ i.e. consort of Yamuna.

Swami Vedant Desikan says (Goda stuti. 12), “Godavari had earned bad name after it didn’t reveal the abduction of Sita to Ram-Lakshman although Sita hd pleaded to do so with tearful eyes. It earned fame after ‘Goda’ incarnated and took this name”. Unlike Godavari, Yamuna always participated in bhagwat-kainakaryam.

āyar kulattinil tōndrum – incarnated in the cowherd clan;

aṇi-viḷakkai – auspicious radiant jewel like lamp; he is a mangaLa dIpam (lamp) in Gokula.

 

To all the cowherd boys of Gokula (āyar kula), who consider Krishna as means and goal; he is the uddharaka. ‘tondrum’ here used deliberately by Goda instead of ‘pirantum’ indicates that Bhagwaan is not born from womb but he takes avataram.

 

tāyai kuḍal viḷakkan ceyda – one who illuminated the Mother’s (Yasoda’s) womb;

dāmodaranai – the Lord (who accepted Mother Yasoda tying Him with a small rope and hence has the mark in His body);

People appreciate his mother yasOda for giving birth from her womb to such a wonderful child. The name ‘Damodara’ indicates the ‘Bhakt-paaratantriyam’ of Krishna. Nanjeeyar (Vedanti swami) says that to conceal that mark of tying of ropes, he wears cloth around his hip. But everyone got to know about his theft and punishment by mother Yashoda and became popular as ‘Damodara’. If we mediate on this kalyaan-guna of Krishna, our ties of samsaram is removed. Sri Parashar Bhattar says that he shows his marks and gets us to have and show our marks (in our shoulders, shankham-chakram).

 

Next part of the paasuram tells us what happens to the karma accumulated before Sharanagati and those performed after it.

 

श्रेयांशी बहु विघ्नानी प्रभवन्ति महताम अपि.

Good works are followed lot of dangers.

If we are singing the glory of the Lord, all the devatas are with us. The gopis had a query; even the so powerful Rama’s crowning ceremony didn’t happen on the day the great sage vasistha marked, so how can we be sure that our vow will go on without any hindrance? Everyone loved Rama so much, everything was set, but he took kankanam for the forest.

Whose fault it was? Was it fault of Kaikeyi, Manthara, Dasaratha or Ram?

Bharata answers:

न मंथाराया: न मातुरस्य; दोषों न राज्ञः न राघवस्य च|

मत पाप एव अत्र निमित्तम आसीत, वन प्रदेशे रघुनन्दन: स्यात||

Manthara was afterall a servent maid. Any mother has bias for his son. Neither is the fault of father, nor of Rama. It’s my paapam which came out all of the sudden to bring misfortune.

अवश्यम अनु भोक्तव्यं कृत कर्म शुभ-अशुभम|

but, we have so many papas and punya, how would they go?

Andal answers we need not cleanse all our sins to undertake this vow since we are going to surrender to that Lord who is pure in all aspects and capable of burning all our sins and making our vow successful. He is such a Lord who forgoes anything for the sake of His devotees.

अग्नो प्रोतं प्रदुयत. After sharanagati, all the karma vanishes like cotton subjected to fire.

Sita says, “yasya tvaya sah, sah swargah, yasya tvaya vina sah narakah”. So, being with kanna is swargam and being without kanna is Narakam.

For a sharanagat, Krishna’s grace is punya and lack of Krishna’s grace is paapam. But he is not here with us? His name is more powerful them Krishna himself. Mantra is always available. It was the name of Krishna which protected Draupadi. Mantram is like an ornament and God is like Gold biscuit. All the u need is to feel it, realize it. So, chant the man – We (who He has to reach for);

tūyōmāy vandu – come to Him with purity (in mind, words and deed);

Come to Him with purity (in mind, words and deed); Purity of accepting His greatness and hence surrendering to Him. Purity means considering him to be the means and goal.

(Vandu nam): His compassion doesn’t allow Him to wait till the devotees come to Him. It’s his effort since many births which made you devoted to him.

 

tūmalar tūvit – adorn Him with fresh flowers;

We have come to you with beautiful flowers to worship. Flowers even thrown by lovers are accepted by God however those offered without love and with full Vedic process is not accepted by God. What did Vidura offered? Is there any rule to love someone? Is there rule for mother how to love child?

God is fond of our ‘hriday kamalam’. Offer your heart as lotus to him. He does not see the size of our kainkaryam because there is nothing that is too big in this world for him, and mainly because no kainkaryam is small for him. He only sees our affection/bhakthi/care

 

tozhudu – pay our obeisance;

prostrate and pay our obeisance. Make all your services as his services. Any activity that you do, make AS his service. (not IS his service).

 

vāyināl pāḍi – sing His praise with our tongue;

Sing His praise with our tongue. Kulsekhar azhwar says, “O my tongue! Taste this Narayana Mantra. Once you taste it, you won’t be able to live without it”.

 

manattināl cindikka – meditate in our mind;

Contemplate in our minds. Think and sing is not correct. Sing and think. Sing as outpour of your love.

Thus Goda explained the use of all the three equipments (Body, Mouth and Mind) and the essence of they have been provide to us. Trikaran shuddhi:

Mind: Thinking of God

Tongue: Chanting of names

Body: kainkaryam, Prostrating and supplicating.

 

 

pōya pizhaiyum – past sins (committed before realizing our relation with Him);

pugudaruvān nindranavum – those committed later (without our knowledge);

tīyinil tūśāgum – will vanish like cotton in a fire;

All our past sins and mistakes without remiss will be made to disappear like cotton burnt in a flame.

 

ceppu – (so) sing His glory;

Just singing is enough to burn our sins (tongue chants His names without the mind or body involved);

What to sing? Goda devi gave five names of the names bringing the glories of the lord.

  1. Māyanai – one whose acts are inscrutable and mysterious.

Maya is an un-imaginable natural power, ability beyond our apprehension/imagination. Aascharyam. He is maayanai or mayawi. Don’t run after maya but maayan kanna. Catch hold of the owner.

The word ‘maayan’ reminds of the beautiful leelas of kanna e.g. playing with gopas, stealing butter etc.

  1. mannu vaḍa madurai – the King of northern Mathura (ever glowing with divine association);
  2. maindanai: Powerful person.
  3. tūya perunīr – pure and deep river;
  4. yamunai turaivanai – one who plays in the bank of Yamuna;
  5. āyar kulattinil tōndrum – born in the cowherd clan;
  6. aṇi-viḷakkai – auspicious radiant lamp;
  7. tāyai kuḍal viḷakkan ceyda – one who illuminated the Mother’s (Yasoda’s) womb. By his actions people started praising his mother. He is always called “Yashoda-nandan”, “yashoda maiyya ka natkhat”.

One who ties up everyone, every deva with his maya was tied by Yashoda by ropes.

  1. dāmodaranai – the Lord (who accepted Mother Yasoda tying Him with a small rope and hence has the mark in His body). Nammalvar feeling the damodar leela felt unconscious for 6 months. That’s glory of Yashoda. It spread like ‘wild-fire’ although he try to conceal her and he began to be told as ‘Damodar’. YasOdhA got all credit for managing Her “wild” son.

 

Hey Mayan! Hey Mathura-nanadan! Hey balashaali! Hey Yamuna-teera Vihar raseeka! Nannjan vraj aanandjana! Hey Matri-garbh prakaashika! Hey Damodar!

18

Swapadesham:

If our intentions are good and filled with devotion- if we praise the Almighty with our mouth, and meditate on His divine qualities and use our sense organs to do service to Him and His devotees then by His grace all the obstacles in our way will be burnt to ashes.

Thirupavai 4

āzhi mazhai kannā onnu nī kai karavēl | azhiyuḷ pukku muhandu koḍārtēṛi |

uzhi mudalvan uruvampōl mey kaṛuttu | pāzhiyan tōḷ uḍaip paṛpanābhan kaiyil

āzhipōl minni | valamburi pōl ninnu adirndu |tāzhāde śārṅgam udaitta śara mazhaipōl|

vāzhā ulahinil peydiḍāy | nāṅgaḷum mārgazhi nirāḍa mahizhndelōr empāvāy ||

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Every object of the universe depends on each other. We can’t be independent. We depend on prakriti and prakriti depends on us. We depend on devatas and devatas depend on us.

(parasparah bhayanto, shreyah param avapyasath; BG 4th chap).

Devatas are some power around us, beyond our apprehension and which support our life on earth e.g. light, heat, cold etc. How their form would be, that’s different issue but we take care of nature forces and they take care of us. Unfortunately, we are not taking care of nature. They are always helping us though we are abusing them. Live well and let live others well. When a person is good, everything is good for them and when person is bad, everything is bad for them. Just like a colored glass. We need all the devas to cooperate with us for our survival.

In this song Goda says, not only prakriti but devatas too would be with us. Devatas doesn’t mean God. There can’t be many Gods. Would there be a word like skies, airs etc.? Similarly, God too is a singular word. It can’t be plural. If Gods are many, there would star wars. There are many devatas, 330 millions. God is only one. Even the word ‘demi-God’ is not correct. They are just another category of aatmas who are given body beyond our comprehension. Aatma is given body for experiencing some kind of karma.

 

When Goda started the vrata, all the devas came with folded hands to serve her as she is preyasi of Krishna. She requests varuna devata. Varuna devata, representing all the devatas stood before Goda. “Krishna likes you and Krishna is our boss, so let me do some service to you”.

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Āzhi – Majestic and vast like the ocean;

 mazhai kannā – Varuna deva , the deity of rain;

It’s habit of gopis of gokul to call everyone as kanna. Kanna (most loving one) and kannan are used to call Krishna with love. E.g milkman kanna. Gopis refer Varuna as kanna as they see kanna in everyone. Bhagwaan gave the responsibility of creation and destruction to devatas like Brahma and Rudra respectively but the job of saving or sustenance to he kept to himself in form of Vyuha avatar (Vishnu). Parjanya devata is doing similar job in preserving the nation so they call him kanna.

 

विक्रेतु कामाकिन गोप कन्या, मुरारी पादार्पित चित्त-वृत्ति|

धध्याधिकम मोह वशाद वोचत गोविन्द दामोदर माधवेति||

Gopis sell crying, “Milk, curd, Butter” and they absent mindedly cries, “Govind, Damodar, Madhava”.

Commentators quote a story. A devotee was too much attached to his chappals kept outside the temple. He approached Parashar Bhattar requesting him to grant chappal on his head. Actually he meant ‘sathaari’ but being his mind fixed on chappal, he pronounced chappal instead of sathari. Gopis always dipped in Krishna-anubhavam always saw Krishna in everything and always chanted krishna’s names from his mouth.

 

INNER MEANING:

A Sharnagata approach devatas with thought that kanna is their antaryaami. Thus, they worship kanna only.

1st pAsuram – paratvam (nArAyaNan);

2nd pAsuram – vyUham (kshIrAbdhi nAthan);

3rd pAsuram – vibhavam (thrivikraman);

In this pAsuram, they sing of antaryAmitvam (inside varuNa dheva; the rain god)

 

– you;

kai karavēl – don’t withhold;

 ondrum – even a bit;

 Goda calls Varuna to be as kanna who showers his infinite kalyaan gunas on one and all, whether they are deserving or not. So, Goda requests (in fact orders) Varuna devata to shower rains in every part of world.

sarvEsvara (god for all) came down to be born and live here in Gokula to follow the orders of gOpikAs, letting them make fun of him, (bends to show his back as a table for these girls to write on; they try bangles for size on his wrist etc). He went as messenger of pandavas, drove chariot for them and got wounds on his face.

 

azhiyuḷ pukku dive deep into the ocean;;

 mugandu koḍu – fill and give (the ocean water);

 ārtu – with the sound of thunder;

 ēṛi – rise high in the sky;

Plunge deep into ocean, fill yourself and rise high in sky with thunder sounds. Like how hanuman came back with such an enthusiasm after locating and meeting Sita, and like how the other vAnaras were showing the enthusiasm upon seeing how Hanuman was returning.

Inner meanings:

The ocean is Upanishads and the clouds are acharya. Shishyas surrenders to acharya and request for upadesham on rahsya mantras. Without holding back any, pour on us the rain of gyaanam and anandam of Bhagwat-anubhavam. Taking the quintessential meanings and roaring like lion, pour your mercy on us.

 

uzhi mudalvan – the primordial cause;

Like kanna at the time of dissolution keeps everyone in his abdomen and at the time of creation, again gives then name and form out of compassion. Like kanna sees all of us who have not yet gained a body, and feels sorry for us and with so much kindness starts his creation process with just his sankalpam (thinking in his mind), and then he would get bright with happiness – You, the rain dhEvata, also should have similar kindness towards us.

Gopis call him ‘padmanabhan’; one who created Brahma from his navel and who in turn created the world.

 

uruvampōl – like His divine form;

 mey kaṛuttu – become dark hue;

O Parjanya! Take the colour of kannan i.e. be dark clouds. The colour of dark clouds resembles the divya-mangal-vigraham of Kannan. Krishna protects all the jivas during Pralaya by keeping them during. Out of compassion, he starts new cycle of creation and provides name and form as per the previous karma of the particular jiva. There is no cruelty or biased-ness in him as he provides body to the aatmas as per their previous karma only. This cycle of creation and deluge and karma of individual is anadi, beginning less (BS 2.1.35).

Sathkopa Suri too says: “gyAlam padaiththa em mugil vaNNanE” (O! the one who created the worlds, whose color is like dark clouds)

 pāzhiyan tōḷ uḍai – one who has strong and beautiful shoulders;

 paṛpanābhan kaiyil – in the right hands of the Lord who has the lotus in His naval;

The divine hands of ‘Padmanabha’ with strong and admirable shoulders are not just attractive but also powerful. His strong shoulders protect the entire universe and are sweeter than milk boiled off its water.

Out of the beautiful navel Brahma is born on a lotus. It’s called called Vyashti srishti. Later creation is controlled by Lord being antaryaami of Brahma which is called Samashti srishti.

 āzhipōl minni – Blaze with lightning like the Discus;

The divine hands of kannan is holding Shankham and Chakram. Goda personifies the lightning of the rain as blazing discuss of Perumal. His discuss and conch creates fear in the heart of enemies and fills devotees with joy. Similary, seeing the lightening of rain-bearing clouds, people gets elated elated with joy.

 

valamburi pōl – (in the left hand) like the Divine conch;

nindru adirndu – stay and sound (thunder);

O rain devata! Produce a thunder that elates the farmers and other people waiting for rains.

The shankham (valamburi) is so close to Bhagwaan and so bhaagyashaali that it gets to taste the beautiful lips of kannan. None other than Mahalakshmi has this privilege. Goda asks for the taste of lips of Narayana from Shankham in her Nachiyar Thirumozhi. Out of happiness of getting the sweet taste of lips of Perumal, it roars loud. In kurukshEtra, the conch sounded by krishNa made the kauravas dead scared, and Pandavas very happy. The tumultuous sound of ‘Panchajanya shankh’ is meant to proclaim the Lord’s saving grace.

sa घोषो ….

What’s a deadly weapon for enemies is an adorable ornament of Krishna for devotees.

Note:

Goda again doesn’t say that ‘sudarshan chakra’ resembles lightening but she compares lightening with Sudarshana chakra. Let there be lightening like that of Sudarshana chakra. The use of sudarshana chakra never goes in vain. Similary, let there be dark clouds, lightening followed by good rains.

Out of his compassion, kanna created brahma from His navel who in turn created the world. You should also be compassionate and make creation happy and pleasant with rains

Here comes the beauty of Mother Poetry.

What to compare to what.

Superior things should never be compared to inferior things.

Let us review few examples how poets usually describe:

ex: 1: SriyahPathi eyes are like Lotus Flowers.
ex: 2: Sriyahpathi compassion is like a cloud.

Lotus flower by evening becomes pale, will that be a comparison to SriyahPathi’s eyes?

Cloud after raining little bit gets pale, will that be a shower of SriyahPathi compassion?

No, not at all.
That means, we don’t know how to describe things properly.

In this Pasuram
Mother is teaching us we can not compare SriyahPathi to any material objects, however material objects can be compared with him.
Let us learn how Mother ordering to rain God.

Hey Rain God!!

“Go and drink water from depth of the ocean and “become the color of SriyahPathi”.
(We need rains across the earth, so drink water from Ocean, and not from small lakes)

Then Lightning like a “Sudarshana Perumal”.
Then “Thunder” like a “Panchajanyam”
Then rain like “Lord Sri Rama Chandra’s arrows”

(Please note, Here mother Go:da comparing material objects to SriyahPathi Divya Ayu:dhams and not vice versa).

Inner meanings:

Sound of counch denotes Pranavam. Pranavam denotes ‘shesh-sheshi bhaava’.

Akaar: अकारार्थो विष्णु: जगदुदय रक्षा प्रलयकृत: अकार denotes Vishnu who creates, controls, and destroys.

Makaar: मकारार्थो जीवः तदुपकरनम वैष्णवं इदम्|: मकार denotes jeevatma

Ukaar: उकारो अनन्यार्घम नियमिति संबंधमनयो:| : उकार denotes ananyaargh-sheshatvam ananya sharanatvam of jeevatma (मकार) toward Bhagwaan (अकार). उकार denotes Sri Mahalakshmi thayar too.  

 

tāzhāde – without delaying; abundant

 śārṅgam udaitta śara mazhaipōl – like the arrows showered from the bow śārṅga shower abundant rain;

We should get enough rains, without delay, 3 times a month.

Like how the Sarngam bow of Sri Ramchandra pours arrows and saves his devotees and pious people, you too pour rain and save the people yearning for good rains.

Valmiki says, “When Sri Rama killed around fourteen thousand demons at Janasthanam, then nobody ever looked at Him take His bow, fix an arrow and drag the string till His ear and shoot it at lightening speed. Everyone just watched the demons fall down”. He killed taduka in single arrow and protected the yajnas of rishis remaining awake for several days and punishing the demons. He protected the rishis of the demons who used to kill and eat the rishis in Dandkaranya. Such is is karunyam and vatsalyam.

 

 vāzhā – (for everyone in the world) to live;

ulahinil peydiḍāy: Pour your rain, O the rain dhEvathai.

With those arrows of perumAL the rAkshasas were not saved; but you pour the rain for the whole world/ everyone to live well.

 

 nāṅgaḷum – and also we who are undertaking the vow;

 magizhndu – with joy;

 mārgazhi nirāḍa – to enjoy ritual bath in marghazhi;

We will undertake the marghazhi ritual bath and hence you can get satisfied with service; we will bath in the divine experience of Krishna along with Krishna and enjoy the rain (heat of separation vanishes) along with the sound of thunder and brightness of lightning;

Varuna devata asked, “I wanted to do something for you, but you are asking me to rain which I have been already doing.”

Goda replied, “We would bath with kanna, u watch the leela and be rejoiced. That is the reward for you”.

 

Inner meanings:

 The attitude of the girls is that Universal well-being is primary and their own rejoicings are only secondary. This expression implies that they live for others and not for their own sake. Happiness lies in seeing the Lord happy and serving his devotees.

Acharyas too shower their teaching on us like arrows of Sarngam for our gyanam so that we are able to be a Sharnagata or Prapanna and accept Perumal as both Upayam and Upeyam.

The clouds dark like the form of the Lord Krishna. Here, Goda doesn’t say that kanna resembles like ‘neel megh shyaam’ or bluish-black-clouds; but she says that clouds resemble the colour of kanna. O clouds, become dark-hued like kanna and shower rains.

All other poets compare Krishna with worldly matters, e.g. lotus like eyes. But, it’s actually an insult of great person to be compared with lower entities. Suppose we say king that he walks like his watchman.

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 Swapadesham:

Anyone known or unknown will come to help if one follows his/her dharma. In Ramayana, even monkeys came to help Sri Rama whereas even his own brother vibheeshana did not support Ravana’s adharmic act.

Acharya is the one who has full knowledge of Brahman (Brahma jnanam), who has totally dissociated himself from anything other than Parama Purusha. He is the one who performs the ordained duties without fail (nithya, naimitthika karma), one who has dipped himself in the ocean of divine attributes of Paraman, one who constantly contemplates on these divine attributes of the Lord and sheds tears of joy. Just like how a cloud takes away pure water from the salty waters of the ocean and showers it as cool potable water, an acharya preaches the Bhagavad vishayam and tatvams (truths), which are the most distilled essence of the Vedas. Similar to how the clouds tend to move with breeze and cause rains at different places, so does an acharyan move from place to place and cause (jnana mazhai) rain of wisdom and truths.

Just like a water bearing cloud, an Acharya is one who gives knowledge but does not expect anything in return. This pasuram teaches us that it is only through an Acharyan’s anugraham that one could ever attain Param-Padam.

(LakshmInAthAkhya Sindhou Sataripu jalatha: praapya KaaruNya neeram—-

DesikEndhra pramoukai:);

this slOkam describes how the KaaLa Megham named Swamy NammAzhwAr plunged deep into the ocean of DayA known as LakshmInArAyanan and showered copiously on the mountain peak (Naathamuni) and how those auspicious waters flowed from there in the form of two fountains (Pundarikaksha and Rama mishra), which joined to form the river (AaLavandAr) and which entered into the immense lake of RaamAnujA; That lake overflowing with Jn~Ana theertham exited through 74 sluices (74 SimhAsana adhipathis) to bless the samsAris continuously.

Damodara had two mothers. We too have two mothers: Asthakshari (Which makes us Sri Vaishnava) and Gayatri mantra (Which makes us dwija).

 

 

 

 

तिरुपावै 5

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आज की गाथा में मथुरा में, यमुना तट पर बिहार करने वाले मायापति दामोदर भगवान का मंगलाशासन किया जाता है।

तिरुपावै पञ्चम गाथा:

आश्चर्यचेष्टितं शश्वत्प्रसिद्धमधुरापतिम् ।
प्रभूतस्वच्छपानीय-यमुनातटखेलिनम् ।।
गोपवंशे समुद्भूतं सख्यो ! मङ्गलदीपवत् ।
जननीगर्भविद्योतं दामोदरमभिस्तुत ।।
विशुद्धा एनमर्चित्वा प्रसूनैः शुचिभिर्वयम् ।
वाचाऽस्य नाम संकीर्त्य मनसा चिन्तयेमहि ।।
बुद्धिपूर्वं कृतं पापम् अपि भावि प्रमादजम् ।
कृते त्वेवं प्रदूयेत तूलवज्जातवेदसि ।।५।।

आश्चर्यजनक कार्य करने वाले मायापति, जो उत्तर मथुरा (मधुरा) के अधिपति जो पवित्र एवं गहरी यमुना के तटों पर विहार करते हैं, जो ग्वालों के वंश में गोकुल में अवतार लेकर गोपकुल के प्रकाशमान मङ्गल दीप बन गए हैं। जिन्होंने माता यशोदा के गर्भ को औज्जल्यमान किया। जो दामोदर हैं (जिन्हें यशोदा ने रस्सी से बाँध दिया था)।

हम उस दामोदर भगवान के पास पवित्रता से जायेंगीं, उन्हें ताजे पुष्प समर्पित करेंगी।

कैंकर्य:

देह से उनका अभिवादन करेंगीं, हाथों से पुष्प समर्पण, मुख से उनका नाम संकीर्तन करेंगी एवं मन से उनका चिन्तन करेंगी।

सखियों ने प्रश्न किया कि यदि व्रत में कोई विघ्न आया तो?

गोदा उत्तर देती हैं कि उन भगवान की कृपा से पूर्व जन्मों के सारे पाप एवं पूण्य एवं अज्ञानवशात किये गए आगामी पाप एवं पूण्य, रुई में लगी अग्नि के समान नष्ट हो जाते हैं।

ऐसे भगवान के नाम गाओ

1. हे मायापति!

2. हे मधुराधीश!

3. हे यमुनातटविहारी !

4. हे नंदजन-व्रज-आनंदरंजन!

5. हे मोतियुक्य मंगल दीप

6. हे मातृ-गर्भ-प्रकाशक!

7. हे दामोदर!

संस्कृत अनुवाद

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हिंदी छन्द अनुवाद 

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इस पाशुर में दामोदर भगवान का मंगलाशासन किया जाता है।

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मायनै मन्नु वडमदुरै मैन्दनै, तूय पेरुनीर यमुनै त्तुरैवनै।

आयर कुलत्तिनिल तोंड्रुम अणि विळक्कै, त्तायै क्कुडल् विळक्कम् शैय्द दामोदरनै।

त्तुयोमाय् वन्दु नाम् तुमलर् तूवी त्तोळुदु, वायिनाल् पाडि मनत्तिनाल् शिन्दिक्क।

प्पोय पिऴैयुम् पुगुदरुवान् निनरन्वुम्, तियिनिल् तुशागुम् शेप्पेलोर् एम्पावाय्।।

मायनै: जिसका कृत्य अलक्ष्य और रहस्यमय है

भगवान मायन या मायावी हैं अर्थात माया के स्वामी| माया का अर्थ मिथ्या नहीं, जैसा अद्वैत में कहते हैं| माया का अर्थ है मूल प्रकृति या ब्रह्म की संकल्प शक्ति| संकल्प मात्र से ब्रह्म विविधता और आश्चर्योंसे भरी इस संसार की श्रृष्टि और प्रलय करता है|

यक्षाचार्य के निरुक्त के अनुसार माया का अर्थ है ज्ञान|

माया वयुनं ज्ञानम् (वे0 नि0 ध0 व0 22).

इस प्रकार अद्वैत का यह सिद्धांत की माया का अर्थ अविद्या या उपाधि है, श्रुति विरुद्ध प्रतीत होता है|

सर्वे निमेषा जज्ञिरे विद्युतः पुरुषादधि। (यजुर्वे0 32।2);

अजायमानो बहुधा विजायते (यजुर्वेद 31।19); 

संभवामि आत्म मायया (BG 4.6);

निज माया निर्मित तनु माया गुण गोपार, चिदानंदमयी देह तुम्हारे (मानस).

भगवान अपनी संकल्प शक्ति से पद्मनाभ के रूप में, देवताओं के हित हेतु, क्षीरसागर में अवतार लेते हैं, खम्भा फाड़कर नरसिंह के रूप में आते है, त्रिविक्रम के रूप में तीन पग में समस्त संसार को माप लेते हैं, कृष्ण के रूप शंख-चक्र धारण किये हुए चतुर्भुज रूप में अवतार लेते हैं, आदि| अपहतपाप्मा (समस्त दोषों से रहित) भगवान का अवतार जीवात्मा के जन्म से भिन्न होता है| जीवात्मा अपने कर्मों के कारण और कर्मों का फल भोगने हेतु विभिन्न शरीरों में जन्म लेते हैं और कर्मों के कारण सुख-दुःख का अनुभव करते हैं जबकि परमात्मा का अवतरण कर्मों के कारण नहीं अपितु अपनी संकल्प शक्ति और करुणा आदि कल्याण-गुणों के कारण होता है| {जन्म कर्म च मे दिव्यम्}.

स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति। स इमाँल्लोकानसृजत।। (ऐतरेय उपनिषद 1.1.1.)

माया का अर्थ भगवान की कृपा शक्ति भी है, जो श्री महालक्ष्मी और आचार्य के पुरुषकार से आत्मा का उद्धार करता है| भगवान अपने प्रयत्नों से जीवात्मा को शरणागत बनाते हैं फिर ये घोषणा कर देते हैं कि जीवात्मा ने शरणागति किया है, और इस प्रकार उसे अर्चिरादी-मार्ग प्रदान करते हैं|

स्वामी स्वशेषं स्ववशं स्वभरत्वेन निर्भरम्| स्वदत्त स्वधिया स्वार्थं स्वस्मिन् न्यस्यति मां स्वयम्|| (न्यास दशकम्).

पेरिया तिरुमोज़ी (7.3.3) में कहते हैं, “भगवान ने आकर मेरे ह्रदय में अपना धाम बसा लिया है| वो दूसरे हृदयों के बारे में अज्ञात प्रतीत होते हैं, मेरे ह्रदय को छोड़ कहीं नहीं जाते| वो मुझे यम के लोक में नहीं जाने देंगे| मैं ऐसे भगवान को बदले में क्या दे सकता हूँ? क्या मैं उन्हें भूल सकता हूँ? नहीं! नहीं! कभी नहीं”|

इस प्रकार भगवान स्वयं जीवात्मा को चुनते हैं (यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः), उसे शरणागत बनाते हैं और नित्य-कैंकर्य प्रदान करते हैं| हमारे स्वयं के प्रयास तो भगवत-कृपा में बाधक है| भगवान ‘परगत-स्वीकार’ हैं न की ‘स्वगत-स्वीकार’|

मन्नु वडमदुरै मैन्दनै: उत्तर मथुरा के सम्राट (जो भगवत-संबंध से नित्य उज्जवल है)

मथुरा का हर युग में भगवत-संबंध से युक्त रहा है| बालक ध्रुव और वामन भगवानकी तपस्थली, त्रेता में शत्रुघ्न जी ने लवणासुर का वध कर यहाँ शासन किया, द्वापर में कृष्ण रूप में माखन, घी, दूध और गोपिकाओं का आनंद ले रहे हैं| मन्नु का अर्थ पवित्र स्थान और मैन्दनै का अर्थ है पुत्र (मथुरा का)|

तूय पेरुनीर: पवित्र और गहरी नदी

यमुनै त्तुरैवनै: जो यमुना में उसके तट पर क्रीडा करते हैं

ऐसा कहा जाता है कि यमुना के जल की पवित्रता इस कारण है क्योंकि लीला-पुरुषोत्तम भगवान कृष्ण ने इसमें गोपिकाओं संग जल क्रीडा किया है और इस प्रकार यमुना का श्रीकृष्ण से देह-संबंध हुआ| यमुना ने वसुदेव महाराज को रास्ता प्रदान किया (भागवत-कैंकर्य) और भगवान के चरण स्पर्श किये (भगवत-कैंकर्य)| यमुना (कालिंदी) द्वारिका में भगवान की अष्ट-महिषी हैं| इस प्रकार भगवान के एक नाम हुआ ‘यमुनै त्तुरैवनै’ अर्थात यमुना के सहचारी|

श्री वेदांत देशिक जी (गोदा स्तुति.12) में कहते हैं “गोदावरी ने तब बुरा नाम कमाया था जब उसने राम-लक्ष्मण को सीता के अपहरण का खुलासा नहीं किया था, हालांकि सीता ने आंसू भरी आँखों से ऐसा करने की विनती की। इसने ‘गोदा’ के अवतार और यह नाम लेने के बाद पवित्र हुई। गोदावरी के विपरीत, यमुना ने हमेशा भगवत-भागवत-कैंकर्य में भाग लिया।

भगवत कार्य में विघ्न न करते हुए निर्भय होकर भगवद् प्रेम करना अत्यंत आवश्यक है । कंस से निर्भय होकर यमुनाजी ने कृष्ण को मथुरा से वृन्दावन पहुंचाने के लिए पानी को सुखा दिया । इसके विपरीत गोदावरी नदी ने रावण द्वारा सीताजी के अपहरण का समाचार श्रीरामजी तक नहीं पहुंचाया । रावण से डरते हुए भगवत कार्य से वंचित रह गयी ।

आयर कुलत्तिनिल तोंड्रुम: ग्वालों के वंश में अवतार लिया|  

अणि विळक्कै: गोकुल के शुभ प्रकाशमान और रत्नयुक्त मंगल दीप हैं|

गोकुल के ग्वाल-वंश (आयर कुल) के कृष्ण ही उपाय और उपेय हैं| गोदा यहाँ अभिप्राय से ‘तोंड्रुम’ का प्रयोग करती हैं, ‘पिरंतुम’ का नहीं क्योंकि भगवान प्रकट होते हैं, जन्म नहीं लेते|

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त्तायै क्कुडल् विळक्कम् शैय्द: जिसने माता के (यशोदा के) गर्भ को प्रकाशित किया

दामोदरनै: भगवान, जिन्हें यशोदा ने रस्सी से ओखल में बाँध दिया और उनके कमर में उसका चिन्ह है

लोग ऐसे अद्भुत बच्चे को अपने गर्भ से जन्म देने के लिए उसकी माँ यशोदा की सराहना करते हैं। दामोदर लीला भगवान के ‘भक्त-पारतन्त्रियम’ गुण को दर्शाता है| नन्जीयर (वेदांती स्वामीजी) कहते हैं कि इस चिन्ह को छुपाने के लिए भगवान अपने कमर के ऊपर वस्त्र लपेटे रहते हैं| यह चिन्ह भगवान रंगनाथ में दिख सकता है, इसलिए नए वस्त्र को वह डालने के बाद ही भीगे वस्त्र हटाया जाता है| लेकिन सबको उनके माखन-चोरी और मैया द्वारा दिए गए सजा की पता चल गया और यह बात जंगल में आग की तरह फैली| सब उन्हें ‘दामोदर! दामोदर!’ कहने लगे| भगवान के इस कल्याण-गुण का अनुसंधान करने से हमारे सांसारिक बंधन दूर हो जाते हैं| श्री पराशर भट्टर स्वामीजी कहते हैं कि भगवान अपना चिन्ह दिखाते हैं और जीवात्मा को अपना चिन्ह दिखाने को कहते हैं (तप्त-शंख-चक्र).

त्तुयोमाय् वन्दु: आपके पास पवित्रता-पूर्वक आये हैं (मन, वचन और कर्म की पवित्रता से)

नाम्: हमलोग

निर्मल मन जन सो मोहि भावा,

पवित्रता का अर्थ है स्वयं को भगवान का शेषी स्वीकार करना और भगवान को उपाय और उपेय स्वीकार करना|

तुमलर् तूवी: ताजे पुष्पों को समर्पित करना

विशेष तौर पे भगवान हमारे ह्रदय कमल के प्रेमी हैं| भगवान हमारे कैंकर्य का आकार नहीं अपितु भाव और प्रेम देखते हैं| यदि किसी अतिथि तो कॉफी पिलाना हो तो सीधे उनके मुंख में नहीं डाल सकते| हम उन्हें एक सुंदर कप में देते हैं| अतिथि से अधिक प्रेम हो तो विशेष आकर्षक कप निकालते हैं| उसी प्रकार भगवान को प्रेम अर्पित करने हेतु हम पुष्प आदि भगवान को समर्पित करते हैं| प्रेमियों द्वारा फेंका हुआ पुष्प भी भगवान को प्रिय होता है और अप्रेमपुर्वक वैदिक विधि से अर्पित पुष्प भी भगवान स्वीकार नहीं करते| भगवान पुष्प नहीं, हमारा प्रेम ग्रहण करते हैं|

त्तोळुदु: भगवान को अभिवादन अर्पित करना

नमः शब्द का अर्थ है कि मैं (मकारार्थो जीवः) स्वयं के लिए नहीं हूँ, भगवान का हूँ (न + म)| दण्डवत प्रणाम अर्थात दंड की तरह गिर जाना नमः शब्द अर्थात अहंकार-शुन्यता को दर्शाता है| हमें अपने सारे कर्मों को भगवान की सेवा की तरह करना चाहिए (इसका ये अर्थ नहीं कि सारे कर्म भगवान की सेवा हैं)|

वायिनाल् पाडि: जीभ से उनकी महिमा गाओ

कुलशेखर आलवार कहते हैं कि हे मेरे जीभ, नारायण महामंत्र का आस्वादन करो| एक बार अगर आस्वादन कर लिया तो इसके बिना रह नहीं पाओगे|

मनत्तिनाल् शिन्दिक्क: मन से उनका चिंतन करो

सोचकर गाना उचित नहीं, प्रेम और भावपूर्वक गाओ और फिर उसके अर्थों का चिंतन करो| अपने प्रेम के अभिव्यक्ति के लिए गाओ|

इस प्रकार गोदा ने त्रिकरण शुद्धि का मार्ग बताकर ये समझाया कि शरीर, मन और जीभ हमें क्यों मिले हैं|

प्पोय पिऴैयुम्: पूर्व के पाप कर्म (भगवान से अपना नित्य संबंध के ज्ञान से पूर्व)

पुगुदरुवान् निनरन्वुम्: बाद में किये गए पाप कर्म (हमारे ज्ञान के बिना)

तियिनिल् तुशागुम्: आग लगे रुई की तरह नष्ट हो जायेंगे

शेप्प: ऐसे भगवान की महिमा गाओ

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क्या गायें:

  1. मायनै: ( हे मायापति! )मूल प्रकृति/ लीला विभूति के स्वामी, संकल्प शक्ति से संसार का निर्माण करने वाले, कृपा शक्ति से जीवों को शरणागत बनाने वाले और आश्चर्यजनक लीलाएं करने वाले|

  2. मन्नु वडमदुरै: (हे मथुरा-नंदन! ) उत्तरी मथुरा के सम्राट (जो उनके नित्य संबंध से प्रकाशमान है)

  3. मैन्दनै: (हे बलशाली) शक्तिशाली पुरुष

  4. तूय पेरुनीर: पवित्र और गहरे नदी के समान

  5. यमुनै त्तुरैवनै: ( हे यमुना-तट-विहारी रसिक! ) यमुना तट पर विहार करने वाले

  6. आयर कुलत्तिनिल तोंड्रुम: ( हे नंदजन-व्रज-आनंदरंजन! ) गोकुल के ग्वाल वंश में जन्म लेने वाले

  7. अणि विळक्कै: मोतियुक्य मंगल दीप

  8. त्तायै क्कुडल् विळक्कम् शैय्द: (हे मातृ-गर्भ-प्रकाशिका!) मैया यशोदा के गर्भ को प्रकाशित करने वाले| (यशोदा-नंदन, यशोदा-मैया का लाडला)

  9. दामोदरनै: ( हे दामोदर! ) भगवान, जिन्हें यशोदा ने रस्सी (दाम) से उखल में बाँध दिया था| उस चिन्ह को देख यशोदा मैया कि ख्याति हुई कि ऐसे नटखट बालक को उन्होंने संभाल रखा है|

 

स्वापदेश:

यदि हमारे इरादे अच्छे और भक्ति-भाव से परिपूर्ण हैं, यदि हम उस पुरुषोत्तम कि महिमा अपने मुख से गाते हैं, मन में उनके दिव्य कल्याण-गुणों और लीलाओं चिंतन करते हैं, इन्द्रियों और शरीर से उनकी और उनके भक्तों की सेवा करते हैं, तो भगवान अपनी कृपा से हमारे सारे विघ्न खत्म कर देते हैं| शरणागति के पश्चात पूर्व के संचित कर्म और आगामी कर्मों को खत्म कर देते हैं| 

भगवान दामोदर के दो मातायें है एक जन्म देनेवाली (देवकी) और दूसरी पोषण करनेवाली ( यशोदा)। इसी तरह श्रीवैष्णवों के लिऐ जन्म देनेवाले दो मन्त्र है अष्टाक्षरी मन्त्र ( श्रीवैष्णव बनाता है ) और गायत्री मन्त्र ( द्विजत्व बनाता है)।

ऐसे मंत्रों का उपदेश देनेवाले आचार्य के श्रीचरणों का आश्रयण लेने मात्र से सभी पाप ताप नष्ट होकर परमपद के अधिकारी बनाये जाते है ।
श्री गोदा रंगनाथ भगवान का मंगल हो

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तिरुपावै 4

ब्रह्मांड की हर वस्तु एक-दूसरे पर निर्भर करती है। हम स्वतंत्र नहीं हो सकते हम प्रकृति पर निर्भर हैं और प्रकृति हम पर निर्भर है। हम देवता पर निर्भर हैं और देवता हम पर निर्भर हैं।

देवता हमारे आस-पास कुछ ऐसी शक्ति हैं, जो हमारी इन्द्रियों की पहुँच से परे हैं और जो पृथ्वी पर हमारे जीवन का देते हैं। जैसे प्रकाश, गर्मी, ठंड आदि। उनका स्वरूप कैसा होगा, यह एक अलग विषय है लेकिन हम प्राकृतिक शक्तियों का ध्यान रखते हैं और वे हमारा ख्याल रखते हैं। दुर्भाग्य से, हम प्रकृति की देखभाल नहीं कर रहे हैं। वे हमेशा हमारी मदद कर रहे हैं हालांकि हम उनका शोषण कर रहे हैं। हमारे पूर्वजों का सिद्धांत रहा है कि अच्छी तरह जियो और दूसरों को भी जीने दो। जब कोई व्यक्ति अच्छा होता है, तो उसके लिए सब कुछ अच्छा होता है और जब व्यक्ति बुरा होता है, तो उसके लिए सब कुछ बुरा होता है। बिल्कुल रंगीन कांच की तरह। हमें अपने अस्तित्व में सहयोग करने के लिए सभी देवों की आवश्यकता है।

इस गीत में गोदा कहते हैं, न केवल प्रकृति बल्कि देवता भी हमारे साथ होंगे। देवता का अर्थ भगवान नहीं होता है। बहुत से भगवान नहीं हो सकते। क्या कोई शब्द जैसे आसमानें, हवायें, जलें आदि होगा? इसी प्रकार, ईश्वर भी एक विलक्षण शब्द है। यह बहुवचन नहीं हो सकता है। यदि देवता कई हैं, तो वर्चस्व-युद्ध होंगे। कई देवता हैं, ३३० करोड़ पर ईश्वर केवल एक ही है। यहां तक कि ‘demi-god’ शब्द भी सही नहीं है। देवता सिर्फ एक अन्य श्रेणी के हैं जिन्हें हमारी समझ से परे शरीर दिया जाता है। अपने कर्मफलों का अनुभव करने के लिए आत्मा को शरीर दिया जाता है।

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जब गोदा ने व्रत शुरू किया, तो सभी देवता हाथ जोड़कर उनकी सेवा करने के लिए आए, क्योंकि वे कृष्ण की प्रेयसी हैं। वह वरुण देवता से निवेदन करती है। वरुण देवता, सभी देवता का प्रतिनिधित्व करते हुए, गोदा के सामने खड़े थे। “कृष्ण आपको पसंद करते हैं और कृष्ण हमारे बॉस हैं, इसलिए मुझे आपकी कुछ सेवा करने दें”।

आळि मऴै(क्) कण्णा ओन्ऱु नी कै करवेल्; आळि उळ् पुक्कु मुगन्धु कोदु आर्तु एरि

ऊळि मुदल्वन् उरुवम् पोल् मेय् कऱुत्तु (प्); पाळिय् अम् तोळुदै(प्) पर्पानाबन् कैयिल्

आळि पोल् मिन्नि वलम्बुरि पोल् निन्ऱदिरन्दु; ताळादे शार्न्गम् उदैत शरमळै पोल्

वाळ उलगिनिल् पेय्धिडाय् नान्गळुम्; मार्गळि नीराद मगिळन्द एलोर् एम्पावाय्

श्रीरंगम् मीमांसा शिरोमणि भरतन् स्वामी द्वारा तिरुपावै चतुर्थ गाथा का संस्कृत छन्दों में अनुवाद:

गम्भीर ! वृष्टिनिर्वोढस्त्वमौदार्यं मनागपि ।
मा स्म गूहः, समुद्रान्तः प्रविश्यादाय जीवनम् ।।
गर्जञ्छनैः समुत्थाय जगत्कारणवद् भजन्।
कालिमानं निजे गात्रे रम्योरुभुजशालिनः ।।
पद्मनाभस्य हस्तस्थं चक्रं व द्युतितं भजन् ।
दक्षिणावर्तशङ्ख चाप्यनुकुर्वन् रवे स्थिरम् ।।
शाङ्ग्रेरितेषुवृष्ट्या त्वं तुल्यं वर्षाविलम्बितम् ।
लोकोज्जीवाय नो हृष्टया मार्गशीर्षाप्लवाय च ॥४॥

हे तेजस्वी एवं विशाल पर्जन्य कृष्ण ! घनघोर बारिश करो, थोड़ा भी अपने पास मत रखना। गहरे समुद्र में डुबकी लगाकर स्वयं को जल से भर लो एवं सभी को प्रदान करो। सिंह गर्जन की आवाज के साथ ऊपर उठो।

(महासागर उपनिषद हैं और बादल आचार्य हैं। शिष्य आचार्य के समक्ष आत्मसमर्पण करते हैं और रहस्य मंत्रों के उपदेश का अनुरोध करते हैं। बिना कुछ अपने पास रखे, आचार्य हम पर भगवद-अनुभव के आनंद की वर्षा करें। सर्वोत्कृष्ट अर्थ निकालकर शेर की तरह दहाड़ते हुए, हम पर अपनी कृपा बरसाओ।)

हे पर्जन्य देव! जगत के प्रधान कारण भगवान पद्मनाभ के वर्ण की तरह नील-श्याम के हो जाओ। वो भगवान पद्मनाभ, जिनके शक्तिशाली एवं मनोहर कन्धे हैं, जिनके नाभी में कमल है; उनके दाहिने हाथ में विराजमान चक्रराज के समान बिजली की तरह प्रकाशित हो। भगवान के बायें हाथ में विराजमान दक्षिणावर्त शङ्ख की तरह गड़गड़ाहट भरी ध्वनि करो। भगवान के शांर्ङ्ग धनुष की भाँति बिना देरी किये अनवरत वर्षा करो।

जगत के उज्जीवन हेतु आप वर्षा करें। आप भी उल्लास के साथ हमारे व्रत के दर्शन करें।

(चक्र शक्ति का प्रतीक हैं एवं शङ्ख ज्ञान का। आचार्य ज्ञान एवं अनुष्ठान से पूर्ण होते हैं। शांर्ङ्ग धनुष के बाणों की भाँति वो हमें भी ज्ञान एवं अनुष्ठान प्रदान करते हैं।)

संस्कृत अनुवाद

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हिंदी छन्द अनुवाद

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इस पाशुर में आण्डाळ् कहती है की नित्य भगवान के नाम स्मरण से हमारे कर्मानुसार किये हुये पाप और पुण्य कर्म धूमिल हो जाते है।

पाप कर्म अग्नि में जलती हुयी रुई की तरह जल कर भस्म हो जाते है, भविष्य में अनजाने में किये दुष्कर्म, कमल के पत्तों पर पानी की तरह, बिना किसी निशान के मिट जाते है।

विशेष बात यह है की भगवान आप के सारे गत कर्म मिटा देते है, और भविष्य में भी अनजाने में हुये गलत कर्मो को मिटा देते है, पर साथ ही जानकारी रख कर किये हुये दुष्कर्मों के दुष्फल भी देते है।

आळि – तेजस्वी और समुद्र की तरह विशाल;

मऴै(क्) कण्णा– वरुण देवता, जिनके अन्तर्यामी कृष्ण हैं ;

सभी को कण्णा (कृष्ण) कहना गोकुल की गोपियों स्वभाव है। कण्णा (सबसे अधिक प्यार करने वाला) और कण्णन का इस्तेमाल कृष्ण को प्रेमपूर्वक बुलाने के लिए किया जाता है। जैसे “दूधवाला कण्णा”। गोपियों ने वरुण देव को कण्णन के रूप में संदर्भित किया क्योंकि वे हर किसी में कण्णा देखते हैं। भगवान ने ब्रह्मा और रुद्र जैसे देवों को क्रमशः सृजन और विनाश की ज़िम्मेदारी दी थी, लेकिन उन्हें पालन या स्थिति का कार्य खुद व्यूह अवतार (विष्णु) के रूप में रखा। पर्जन्य देवता राष्ट्र के संरक्षण में समान कार्य कर रहे हैं, इसलिए गोपी उन्हें कण्णन कहते हैं।

विक्रेतु कामकिल गोप कन्या, मुरारी पदार्पित चित्तः वृत्ति|

दद्यादिकम् मोह वशद वोचद् , गोविन्द दामोदर माधवेति||

गोपियाँ दूध, दही और मक्खन बेचने जातीं हैं पर वे अनुपस्थित मन से आवाज देती हैं, “गोविंद, दामोदर, माधव”।

टीकाकार एक कहानी उद्धृत करते हैं। एक भक्त को मंदिर के बाहर रखी अपनी चप्पलों से बहुत अधिक लगाव था। उन्होंने पराशर भट्टर के पास आये और उनसे सिर पर चप्पल देने का अनुरोध किया। वास्तव में उनका कहने का मतलब ‘सठारी’ था, लेकिन उनका मन चप्पल पर स्थिर था, इसलिए उन्होंने सठारी के बजाय चप्पल का उच्चारण किया। गोपियों ने हमेशा कृष्णानुभवं में डुबकी लगाई, कृष्ण को हमेशा हर वस्तु में देखा और हमेशा मुख से कृष्ण के नामों का जप किया।

आंतरिक अर्थ

एक शरणागत को देवताओं के पास इस विचार से ही जाना चाहिए कि कृष्ण उनके अन्तर्यामी हैं। इस प्रकार, वे केवल कृष्ण की ही पूजा करते हैं।

आकाशात् पतितं तोयं यथा गच्छति सागरम् । सर्वदेव नमस्कारः केशवं प्रतिगच्छति ॥

आकाश से गिरा हुआ जल, जिस किसी भी प्रकार सागर को ही जा मिलता है; वैसे ही किसी भी देवता को किया गया नमस्कार केशव (कृष्ण) तक ही पहुँचती है ।

नी – आप;

कै करवेल्– रोकें नहीं;

ओन्ऱु – थोड़ा सा भी;

गोदा ने वरुण देव को कण्णन (कृष्ण) की तरह बनने को कहा जो सभी पर अपने अनंत कल्याण गुणों की वर्षा करते हैं, चाहे वे योग्य हों या नहीं। गोदा अनुरोध करतीं हैं (वास्तव में आदेश) कि वरुण देवता दुनिया के हर हिस्से में बारिश की बौछार करें।

सर्वेश्वर (समस्त प्रपंच के स्वामी) अवतार लेकर भूलोक आए और गोकुल में रहते हैं, गोपिकाओं के आदेशों का पालन करते हैं, उन्हें अपना मज़ाक बनाने देते हैं (गोपियों के लिखने के लिए एक मेज के रूप में अपनी पीठ झुकाते है; गोपियाँ उनपे चूड़ियाँ आज़माती हैं; उन्हें गोपी बनाती हैं; आदि)। वह पांडवों के दूत के रूप गए, उनके लिए रथ खींचा और उनके चेहरे पर जख्म भी आये।

आळि उळ् पुक्कु– समुद्र की गहराई में डुबकी लगाओ;

मुगन्धु कोदु – स्वयं को जल से भर लो और सभी को प्रदान करो (समुद्र का जल);

आर्तु – गर्जन की आवाज़ के साथ;

एरि – आकाश में ऊपर उठो;

गहरे समुद्र में डुबकी लगाकर, अपने आप को भरने के बाद, गर्जन की आवाज़ के साथ आकाश में उच्च उठो। जैसे हनुमान सीता का पता लगाने और उनसे मिलने के बाद गर्जन करते हुए उत्साह के साथ वापस आए और हनुमान जी को लौटते देख दूसरे वानर जिस तरह उत्साह दिखा रहे थे।

आंतरिक अर्थ:

महासागर उपनिषद हैं और बादल आचार्य हैं। शिष्य आचार्य के समक्ष आत्मसमर्पण करते हैं और रहस्य मंत्रों के उपदेश का अनुरोध करते हैं। बिना कुछ अपने पास रखे, आचार्य हम पर भगवद-अनुभव के आनंद की वर्षा करें। सर्वोत्कृष्ट अर्थ निकालकर शेर की तरह दहाड़ते हुए, हम पर अपनी कृपा बरसाओ।

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ऊळि मुदल्वन् : प्रधान कारण;

जैसे प्रलय के समय कृष्ण हर किसी को अपने उदर में रखते हैं और सृजन के समय फिर से करुणा से नाम और रूप देते हैं। भगवान हम सभी को देखता है जिसने अभी तक शरीर प्राप्त नहीं किया है तब लिए खेद महसूस करता है और इतनी दयालुता के साथ सिर्फ अपने संकल्प मात्र श्रृष्टि की प्रक्रिया शुरू करते है (मन में सोचकर), और फिर वह खुशी के साथ उज्ज्वल हो जाते हैं – आप, बारिश के देवता, हमारे प्रति भी ऐसी ही कृपा करें।

गोपियों ने उन्हें ‘पद्मनाभन’ कहा; जिसने अपनी नाभि से ब्रह्मा की रचना की और जिसने संसार की रचना की।

उरुवम् पोल्उनके दिव्य रूप की तरह;

मेय् कऱुत्तुनील श्याम वर्ण के हो जाओ;

हे परजन्य देव! कन्नन का रंग लें अर्थात् काले बादल हो जाएँ।

काले बादलों का रंग कन्नन के दिव्य-मंगल-विग्रह जैसा दिखता है। कृष्ण प्रलय के दौरान सभी जीवों की रक्षा करते हैं। करुणा से, वह सृष्टि के नए चक्र की शुरुआत करता है और प्रत्येक जीव को पिछले कर्म के अनुसार नाम और रूप प्रदान करता है। उसमें कोई क्रूरता या पक्षपात नहीं है क्योंकि वह अपने पिछले कर्म के अनुसार ही शरीर को शरीर प्रदान करता है। व्यक्ति और सृष्टि और प्रलय का यह चक्र और आत्मा के कर्म अनादि है, जिसकी शुरुआत कभी नहीं हुयी|

वैषम्यनैर्घृण्ये न सापेक्षत्वात्तथाहि दर्शयति।।

न कर्माविभागादिति चेन्नानादित्वात् ।।ब्रह्म सूत्र 2.1.34-35।।

शठकोप सूरी भी कहती हैं: ” ग्यालम् पदैथ्थ एम् मुगिल् वण्णन्E ” (जिसने दुनिया बनाई, जिसका रंग काले बादलों की तरह है)

पाळिय् अम् तोळुदै(प्) – वो, जिसके पास मजबूत और सुंदर कंधे हैं;

पर्पानाबन् कैयिल् जिनके नाभि में कमल है उन भगवान के दाहिने हाथों में;

पद्मनाभ के दिव्य हाथ, मजबूत कंधे न केवल आकर्षक हैं, बल्कि शक्तिशाली भी। पद्मनाभ के सुंदर नाभि से उत्पन्न कमल पर ब्रह्मा का जन्म हुआ है। इसे व्यष्टि सृष्टि कहा जाता है। बाद की सृष्टि भगवान ब्रह्मा बह्मा के अन्तर्यामी होकर नियंत्रित करते हैं, जिसे समष्टि सृष्टि कहा जाता है।

आळि पोल् मिन्नि – भगवान के चक्र की तरह बिज़ली के साथ चमको;

कृष्ण के दाहिनी और बाएं हस्त में क्रमशः चक्र और शंख हैं| गोदा मेघ के बिजली को भगवान के चक्र से

Personification करती हैं| भगवान के शंख-चक्र दुष्टों के ह्रदय में कंपन और संतों के ह्रदय में दिव्य आनंद प्रकट करते हैं| इसी तरह, बारिश वाले बादलों की चमक को देखकर लोग खुशी से झूम उठते हैं।

वलम्बुरि पोल् – (बाएं हाथ में) दिव्य शंख की तरह;;

निन्ऱदिरन्दु; – ठहरें और ध्वनि करें (गड़गड़ाहट);

हे वर्षा देवता! एक गड़गड़ाहट पैदा करें जो किसानों और अन्य लोगों के ह्रदय में आह्लाद उत्पन्न करे, जो कि बारिश की प्रतीक्षा कर रही है।

शंखम (वलम्बुरी) भागवान के इतने करीब और भाग्यशाली हैं कि इन्हें भगवान के खूबसूरत होठों का स्वाद चखने को मिलता है। महालक्ष्मी के अलावा किसी को भी यह विशेषाधिकार नहीं है। गोदा अपने ‘नचियार थिरुमोजी’ में शंखम से नारायण के होठों का स्वाद पूछती हैं। भगवान के होठों का मीठा स्वाद पाने की खुशी में यह जोर से दहाड़ता है। कुरुक्षेत्र में, कृष्ण द्वारा लगाए गए शंख ने कौरवों को भयभीत कर दिया, और पांडव बहुत खुश हुए। पाँचजन्य शंख की कर्कश ध्वनि भगवान रक्षण-अनुग्रह की घोषणा करने के लिए है| दुश्मनों के लिए जो एक घातक हथियार है, वो भक्तों के लिए कृष्ण का एक प्यारा आभूषण है।

स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्। नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन्।। गीता1.19।।

{वह भयंकर घोष आकाश और पृथ्वी पर गूँजने लगा और उसने धृतराष्ट्र के पुत्रों के हृदय विदीर्ण कर दिये।}

ध्यान दें:

गोदा फिर से यह नहीं कहती हैं कि सुदर्शन चक्र मेघ की बिजली से मिलती-जुलती है बल्कि वह सुदर्शन चक्र के साथ मेघ की बिजली की तुलना करता है। सुदर्शन चक्र की तरह हल्का होने दें। सुदर्शन चक्र का प्रयोग कभी व्यर्थ नहीं जाता। उसी प्रकार, काले बादल, बिजली और अच्छी बारिश हो।

अपनी करुणा से, भगवान ने अपनी नाभि से ब्रह्मा की रचना की, जिसने दुनिया को बनाया। आप भी दयावान बनें और बारिश के साथ सृजन को खुश और सुखद बनाएं|

आंतरिक अर्थ:

शँख की ध्वनि प्रणव को दर्शाती है। प्रणव शेष-शेषी भाव को दर्शाता है।
अकार: अकारार्थो विष्णु: जगदुदय रक्षा प्रलयकृत: अकार विष्णु को दर्शाता है जो सृजन, नियंत्रण और विनाश करते हैं।
मकर: मकारार्थो जीवः तदुपकरनम वैष्णवं इदम् |: मकार ने जीवात्मा को निरूपित किया
उकारः उकारो अनन्यार्घम नियमिति संबंधमनयो: | : उकार जीवात्मा (मकार) का भागवान (अकार) के प्रति अनान्यार्घ-शेषत्वं और अनन्य शरणत्वंम् दर्शाता है| उकार श्री महालक्ष्मी माता को भी दर्शाता है।

ताळादे – देरी के बिना; प्रचुर

शार्न्गम् उदैत शरमळै पोल् – सारंग धनुष के बाण-वर्षा की तरह प्रचुर वारिश;

हमें बिना देरी के, महीने में 3 बार पर्याप्त बारिश होनी चाहिए।

जैसे श्री रामचंद्र का सर्जना धनुष बाणों की वर्षा करता है और अपने भक्तों और धर्मपरायण लोगों को बचाता है, वैसे ही आप भी वर्षा करें और अच्छी बारिश के लिए तरस रहे लोगों को बचाएं।

वाल्मीकि कहते हैं, “जब श्री राम ने जनस्थानम में लगभग चौदह हज़ार राक्षसों का वध किया, तब किसी ने भी उनकी ओर ले जाते हुए नहीं देखा, एक तीर को ठीक किया और स्ट्रिंग को उसके कान तक खींचकर उसे हल्की गति से गोली मार दी। हर कोई बस राक्षसों को नीचे गिरते देखा। ” उन्होंने एकल बाण में ताड़का का वध किया और कई दिनों तक जागते हुए ऋषियों के यज्ञों की रक्षा की और राक्षसों को दंडित किया। उन्होंने दण्डकारण्य में ऋषियों को मारने और खाने वाले राक्षसों के ऋषियों की रक्षा की। ऐसा है करुण्यम और वात्सल्यम।

वाळ उलगिनिल् पेय्धिडाय् नान्गळुम्;

मार्गळि नीराद मगिळन्द एलोर् एम्पावाय्

vāzhā – (दुनिया में सभी के) उज्जीवन के लिए;

ulahinil peydiḍāy: आप वर्षा करें, हे पर्जन्य देवता.

nāṅgaḷum – और हम जो व्रत कर रहे हैं;

magizhndu – उल्लास के साथ;

mārgazhi nirāḍa – अनुष्ठान स्नान का आनंद लेने के लिए;

हम मार्गशीर्ष अनुष्ठान स्नान करेंगे और इसलिए आप सेवा से संतुष्ट हो सकते हैं। हम कृष्ण के संग कृष्णानुभव का आनंद लेते हुए मेघ की गड़गड़ाहट और बिजली की चमक की आवाज़ के साथ बारिश में स्नान करेंगे और इस प्रकार कृष्ण से वियोग का हमारा ताप दूर होगा|

वरुण देवता ने पूछा, “मैं आपके लिए कुछ करना चाहता था, लेकिन आप मुझे बारिश करने के लिए कह रहे हैं जो मैं पहले से कर रहा हूं।”

गोड़ा ने उत्तर दिया, “हम कन्ना के साथ स्नान करेंगे, आप लीला देखेंगे और आनन्दित होंगे। यह आपके लिए इनाम है ”।

आंतरिक अर्थ:

  1. गोपियों का रवैया यह है कि सार्वभौमिक कल्याण प्राथमिक है और उनकी खुद की खुशी केवल अप्रधान। इस अभिव्यक्ति का तात्पर्य है कि प्रभु को प्रसन्न देखकर और अपने भक्तों की सेवा करने में ही हमारी खुशी निहित है।
  2. आचार्य भी हमारे ज्ञान के लिए सारंग के बाणों की तरह हमें उपदेश देते हैं ताकि हम एक शरणागत/ प्रपन्न बन सकें और नारायण को उपाय और उपेय दोनों के रूप में स्वीकार कर सकें।
  3. बादल भगवान कृष्ण के रूप की तरह काले हैं। यहाँ, गोदा यह नहीं कहता है कि कण्णा नीले-काले-बादलों जैसा दिखता है; लेकिन वह कहती है कि बादल कण्णा के रंग हैं। हे बादलों, कण्णा के रंग के हो जाओ और सारंग की तरह बारिश करो, पाँचजन्य की तरह गर्जन करो और चक्र की तरह चमक उत्पन्न करो।

स्वापदेश:

कोई भी ज्ञात या अज्ञात मदद करने के लिए आएगा यदि कोई अपने धर्म का पालन करता है। रामायण में, यहां तक कि बंदर भी श्री राम की मदद करने के लिए आए थे, जबकि अपने भाई विभीषण ने रावण के अधार्मिक कार्य का समर्थन नहीं किया था।
लक्ष्मीनाथास्य सिंधौ सतरिपु जलथ: प्राप्य कारुण्य नीरम्
वेदांत देशिक स्वामी कहते हैं कि लक्ष्मीनारायण के दया रूपी समुद्र में डुबकी लगाकर श्री सठकोप सूरी आलवार ने पहाड़ की चोटी (नाथमुनि) पर प्रचुरता से वर्षा किया| वह शुभ पानी दो फव्वारे (पुंडरीकाक्ष और राम मिश्रा) के रूप में बहते हुए नदी के रूप हो गए (आलवन्दार यामुनाचार्य) और रामानुज रूपी विशाल झील में प्रवेश किया| ज्ञान और भक्ति से लबालब यह झील 72 सिंघासानाधिपतियों रूपी जलमार्ग के द्वारा संसारियों का उद्धार कर रही है|

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Thirupavai 3

ōṅgi ulahaḷanda uttaman pēr pāḍi| nāngaḷ nam pāvaikku śāttu nīrāḍināl |

tīṅginni nāḍellām tingaḷ mummāri peydu|ōngu peruñ cennelūḍu kayal uhaḷa|

pūnguvalai pōdīl poṛivaṇḍu kaṇpaḍuppa| tēngādē pukkirundu cīrtta mulai pattivāṅga| 

kuḍam niṛaikkum vaḷḷal perum paśugaḷ| nīṅgāda śelvam niṛaindelōr  empāvāy ||

 

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Vedas are so vast. Upanishads are the quint essence of Vedas. All that is said in Vedas was given by Goda devi in Tamil language in form of beautiful songs. Each song speaks of some part of the Vedas.

In the first song she assured us that if we have real seeking attitude, interest, desire; that is enough qualification. He guides us to an acharya who provides essence of all the knowledge in form of mantra. That mantra generates love in our heart and then we start singing glories of the lord. Lord comes down to support the system of the earth in multiple forms. He descends to a place called vyuha in 4 forms:  Vasudeva, Sankarshana, Pradyumna, Aniruddha. Vasudeva is ultimate controlling abode while Sankarshana is abode to dissolve the system not working properly. Now, he want to redo the whole things and for that he chooses another vyuha called Aniruddha. All these system is supported by another vyuha called Pradyumna. Since he is so kind enough to step down and come to us, do namaskaram to that foot. Everyday we wake up, we first chant glories of his divine feet. When we are following vratam for him, we avoid luxurious things other than necessary for our daily conduct. We observe control over the food. We try to speak sweet since all the creation we see around is the creation of lord. Why should be speak harsh words to others other than when we need to rectify someone. Help the needy people and spend for good causes. Both kinds of charity we need to do. Just living is called ‘jeevanam’ while living in good way is called ‘ujjivanam’. Goda teaches us ‘ujjivan maargam’.

In 3rd verse, Gopis got curiosity and enquired Goda, “What are we going to get out of this vratam”? What do we get out of this Thirupavai vratam?  There are certain works done with selfish goals, harming the society (adhama). Other works which are done with self-interest along with the interest of environment and society (madhyama). Every creature of the universe is mutually related. Uttama or highest are those people who works without any expectation of results and in benefit of society and environment. All they want is pleasure of God. Although we don’t desire result, still it comes to us. Uttama people distribute them to the world.  Gopikas belong to the third category (Uttama).

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Ongi ulagalandha utthaman per padi

Singing the praise of the Lord who rose and measured the worlds.

ōṅgi – grow tall;

After glorifying para and vyuha forms, Goda is praising vibhava form of Lord. Out of his affection and kindness to help devas and also out of happiness that mahabali granted him 3 feet of hand, he grew tall and taller. Out of numerous vibhava avtaras, vamana avatar is discussed most in Vedas. Valmiki didn’t mention any other Vibhava avtaaram in Ramayana but he couldn’t omit Trivikrama avatar. Sathkopa Suri azhwar too had special love for Vamana and Varaha avtaara.

Inner meanings:

Bhagwaan is ever happy to do the work for other people’s benefit. When Samsaaris struggling with ahankaram and swatantriyam, one day wonders who will be the savior for him, Bhagwaan immediately rushes for help.

 ulagu – all the three worlds

aḷanda – measured (with His divine feet);

When he measured all the worlds (with his 3 steps’ land), his foot touched all the people’s heads as he was fond of giving blessings to one and all. Even when some of them were not understanding his love to them, he still was fond of touching everyone like how a mother would hug her child sleeping next to her without thinking whether the child will be aware of her hug or not.

As he rose in size, even the discus, the conch, the mace, all became proportionally large. Commentators are eloquent in portrayal of the scene. Readers should mentally visualize. Bali was happy to havehave fulfilled his duty and Indra was happy as he could regain his wealth, but alas! None appeared worried as to what obstacles and injuries the foot would experience in its progress through space.

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Uttaman: that great one;

Sri Peria-acchān-Piḷḷai describes the four categories of people in this world:

  1. adhama: one who keeps thriving at cost of others.
  2. madhyama: one who thinks others should live as well as he should live.
  3. Uttama: one who feels that others should live comfortably even at the expense of one’s own comforts.

The supreme Lord reduced himself not just in size but in status as well. What not Bhagwaan did for his devotees! Does anyone like begging? God became a beggar. Not for his own sake but for Indra. He didn’t even know how to ask, nor he knew the syntax for it. But Bali was captivated by his beauty and asked him to demand something. Finally, everyone got what they wanted and everyone was happy, Bhagwaan too was happy seeing his children happy.

He gave Sunlight without demanding any bill. What if we don’t pay electricity bill? Powe gets cut off. But Bhagwaan keeps granting us regardless of whether we aknowldege him or not.  He provided body, mind and intelligence after creation to aatmans so that they endevour for liberation. There is no selfishness on his part at all. He is always concerned about others.

 

Per paadi: sing names and glories of the Uttama Purusha.

If he is the gold bar, his nAma is like gold jewel. The ‘Name’ of the Lord possesses greater efficacy than even the Lord Himself. Karma, gyaan and Bhakti Yogis too chant names for either mundane goals or for moksha but for sarnagatas, saying his nAmams is swayam purushArtham (that itself is the goal), because, for the goal of reaching Him, he himself is the means. We have already surrendered to His lotus feet with the help of AchArya and Ramanuja.

We should never talk about adhama purushas. Not speaking about such people itself is a great quality since when we talk about them, their bad qualities too touch us and ultimately get spoiled. So, we should always sing glories of Uttama. We may not touch God but we can touch his names, taste it, feel it.

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Naangall nam pavaikku sattri neeradinal

nāngaḷ– We (who cannot exist without chanting his glories);

nam pāvaikku śāttri – in the pretense of our vow;

nīrāḍināl – if we take a divine bath;

We would be able to meet and enjoy Krishna in disguise of the vratam as till yesterday our elders were policing us and not allowing to play with kannan. We would take our ritual bath overcoming our heat of separation. Bath here means mingle with krishNa with the knowledge of our (everpresent) relationship with Him (sambandha gyAna pUrvakam). Bathing in divine names and kalyaan-gunas of Krishna.

 

Theengindri  nadellam  thingal mummari peydhu

tīṅgindri – without any danger;

nāḍellām – throughout the country;

tingaḷ – monthly;

mummāri peydu – three spells of rain;

When Pandavas were in incognito, Bhisma told a wonderful trick to discover Pandavas- “The place where there is 3 spell of rains, no theifs, no diseases; believe that Pandavas are staying there only”. Why so? It’s because Padavas were always chanting the divine names of God. If there is presence of sincere devotees there will always be prosperity in that place.

In Raama Raajya, there were 9 days of Sunshine and one day of abundant rain. This cycle repeated itself every month. Thus, there were three periods of rain each month. The land was fertile and there were no inauspiciousness caused by water shortage. Such prosperity will arise from the proper observance of ThiruppAvai Vratha.

 

ōngu peruñ cennelūḍu – (due to that) in between tall and swelling red paddy;

 kayal ugaḷa – fishes wriggling among them;

Paddy would grow tall just like Trivikrama, without use of manures and hybrid seeds. (Great ācāryas like Sri Bhaṭṭar and Sri Ālavandār, if they happened to see red lotus flowers in paddy fields, with full-grown paddy stalks bending before them, used to be reminded of the lotus Feet of the Lord, being worshipped by many devotees prostrating themselves). Like how mArIchA out of fear saw rAmA in every tree, after he was thrown far away by rAmA, here the gOpikAs see vAmana when they see tall grass.

Sufficient Water nurtures the crop. Wonderful fishes, having grown big like baby elephants would jump between the paddy.

Inner Meanings:

Taking divine bath is Upadesham of Sarnagati by Sadacharya to Shishya. Shishya gets rid of feeling of svAtantriyam (feeling independent of Narayana) and thus giving too much importance to body and material comforts. Three times rains indicates development of 3 baisc qualities in us:

 1) ananyArha sEshathvam, 2) ananya sharaNatvam, and 3) ananya bhOgyatvam

There would be abundant water means Upadesam, study of  Prabhandhams and enjoyment of the ArchA moortis at their dhivya desams through pilgrimages. The strong fishes jumping with joy in the paddy fields are the happy AchAryAs, who recognize that their have borne fruit. Fish used to be cultivated in the paddy fields to eat the mosquito larvae.

Another interpretation is that Goda would cherish to be a fish in this stream to be able to gleefully witness Lord Ranganatha. The fishes would grow fat with fertile food (bhagwat, bhaagawat and acharya-anubhavam). They simply jump and dance and enjoy with tearful eyes, the ever-beautiful form of Lord.

 

Poonkuvalai  podir pori vandu kannpaduppa

pūnguvalai pōdīl – on the beautiful blue lily flowers;

pori vandu: and beautiful bees

kaṇpaḍuppa – doze off;

On the freshly blossomed blue lily flower; pōdu, the bees that enter the flower to drink the honey due to the beautiful surrounding and doze off peacefully on the flower.

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Inner meanings

Andal longs for such an experience in Krishna-contemplation. Andal aspires for the experience of a beetle that sat on the blue lily to suck honey and remains there for whole night. Varvar Muni too explains the arthanusandhaan of ‘Dvaya-mantram’ like a sound making bee sits on flower and starts silently drinking the honey.

It also refers to Sriman NarAyaNa sleeping without worry in our heart lotuses (Hrudhaya Kamalas) that His work through His AchAryAs has been successful. He sleeps like a content farmer, who has realized abundant crops.

 

Thengathe pukkirindhu seertha mulai pattri,  Vaanga kudam niraikkum vallall perum pasukkal

tēngādē – without hesitating;

pukkirindhu: get to and try

seertha mulai pattri: by holding with both the hands the big nipples of

vāṅga – pull;

kuḍam niṛaikkum – fill the cans;

vaLLal – with generosity

perum pasukkaL – healthily grown cows

 

The overflowing udders of the cows are so full that no effort is needed to milk them, but huge muscle power needed to lift the pot. Place the pot and it gets filled with milk automatically and again replace it with another pot. Even very strong cowherds hesitate to milk these cows as the cows are capable of filling innumerable cans by just the touch of the udder.

The benevolent cows that fill pots with prosperity are prosperity and wealth of Braja. Every home is filled with ghee and butter. No effort in taking out the milk but huge effort needed in churning them. So much butter is filled in the milk as the cows grow with Krishna, with the touch of Krishna, hearing music of flute of Krishna. This is natural generosity and fulfillment of God’d will.

Inner meanings:

Cows refers to the most generous AchAryAs, who do not expect any returns. The four udder through which this milk of Knowledge flows are: Vedam, Smruthi, Saathvika PurANams and AzhwAr Paasurams.

 

Neengadha selvam niraindhelor empavai

Everlasting riches fill our lives, my girls.

As a result of the vratam, the beauty of the nature will be preserved, wealth of home would be preserved, all other creatures will be preserved and human beings will live long without any diseases.

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Swapadesham:

Our body is the field. It’s not just ordinary rain that fall but its great fall of our great guru’s words by which inner diseases like jealousy, ego are calmed down. Thus, our body becomes good fertile land (kshetram).

इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते: गीता 13.2 .

It yields many good crops i.e. good qualities in us which enjoy and shares to others. Thus we would be able to help people like cows. Real wealth of our’s is to serve the Lord and his world.   

Just like when u plant trees for shade, it would give fruits. Along with that birds would find shelter, environment gets cleaned, rains come, similarly when we perform activities to please lord, we even materials comforts in this life too.

तिरुपावै 3

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तिरुपावै तृतीय गाथा (श्रीरंगम मीमांसा शिरोमणि उ वे भरतन् स्वामी द्वारा संस्कृत रूपांतरण)

लोकान् संवर्ध्य विक्रान्तुरुत्तमस्याभिधां वराम्।
गीत्वा कुर्याम चेत्स्नानम् अस्मद्व्रतमिषाद्वयम् ।।
देशे सर्वत्र निर्बाधं मासे त्रिर्वर्षणं भवेत्।
प्रवृद्धव्रीहिसस्येषु विहरेयुर्झषाः सुखम् ।।
पुष्प्यत्कुवलसूनेषु शयीरन् रम्यषट्पदाः ।
गोष्ठं प्रविश्य निःशङ्क पीनोधः कर्षणे गवाम् ।।
महत्यो दानशौण्डास्ताः पूरयेयुर्घटान् बहून् ।
अक्षयाः परिपूर्णाश्च भवेयुस्तेन संपदः ।। ३ ।।

हे सखियों, हम उस उत्तम पुरूष के नामों का कीर्तन करेंगी जो बलि के द्वार पर भिक्षा माँगने आये और बड़े होते होते, तीनों लोकों को अपने चरणों से माप लिया।

(उत्तम पुरूष वो है जो अपना अहित होते हुए भी दूसरों का हित करे। भगवान भक्तों के हित के लिए भीख तक मांगने को तैयार हो गए और तीनों लोकों को मापने के क्रम में सभी के शिरस पर अपना चरण रख दिया। उनके चरणों को कितना कष्ट हुआ होगा जब वो तीनों लोकों में जा रहा था)।

ये व्रत तो बहाना है, हमें तो कृष्ण का अनुभव करना है। किन्तु सुनों हमारे व्रत का फल क्या होगा:

1. तीन काल की निर्बाध वर्षा होगी, बिना किसी खतरे के। उन्नत धान के फसलों के बीच, जल में हृष्ट-पुष्ट मछलियाँ उछालेंगी, क्रीडा करेंगी।

(सदाचार्य द्वारा शरणागति का उपदेश ही दिव्य स्नान है। शिष्य ‘स्वातंत्रियम’ के बोध से मुक्त हो जाता है। 3 अवधि की बारिश का अर्थ है शिष्य में 3 प्रमुख गुणों का विकाश:

अनन्यार्घ शेषत्वं 2. अनन्य शरणत्वं 3. अनन्य भोग्यत्वं
पर्याप्त वर्षा का अर्थ है सत्संग, प्रबंधों का अध्ययन, अर्चा विग्रह के कैंकर्य का आनंद और दिव्य देशों की तीर्थ यात्रा। पुष्ट धान के पौधे शिष्य हैं। उछलती मछलियाँ आचार्यों जो अपने शिष्य के जीवन को सफल होता देख आनंदित हैं।)

2. सुन्दर नीले लिली के पुष्पों पर मधुमक्खियाँ भ्रमर करेंगी एवं रस पीते पीते वहीं सो जायेंगी।

(यहाँ आन्तरिक अर्थ सतत मधुमक्खी की तरह द्वय मन्त्र के अर्थानुसंधान का है, जैसा वरवरमुनि स्वामी करते थे)

3. हमारी गायें इतनी पुष्ट होंगी की वो बाल्टी भर-भरकर दूध देंगी। दूध दुहने में तो कोई कष्ट नहीं होगा किन्तु बाल्टी उठाते उठाते ग्वाले थक जायेंगे। गायों के थन इतने लबालब भरे हुए हैं कि उन्हें दूध देने के लिए किसी भी प्रयास की आवश्यकता नहीं है, लेकिन बाल्टी को पुनः-पुनः उठाने के लिए मांसपेशियों की अत्यधिक शक्ति की आवश्यकता होती है। बर्तन थनों के नीचे रखते ही अपने आप दूध से भर जाता है और फिर दूसरा बर्तन बदला जाता है। यहां तक कि बहुत मजबूत ग्वाले इन गायों को दूध देने में संकोच करते हैं क्योंकि गाय केवल एक थन के द्वारा असंख्य बर्तनों को भरने में सक्षम हैं।

(गायों से तात्पर्य उदार आचार्यों से है। चार थन जिसके माध्यम से ज्ञान का यह दूध बहता है: वेद, स्मृति, सात्त्विक पुराण और आलवार दिव्य प्रबंध।)

चिरस्थायी धन हमारे जीवन में भरने के लिए, मेरी सखियों व्रत करो।

वृन्दावन के धन कौन हैं? कृष्ण ही।

संस्कृत अनुवाद

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हिंदी छन्द अनुवाद 

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ओन्गि उलघलन्द उत्तमन् पेर् पाडि :

ओन्गि : लंबा हो जाना;

उस प्रभु की स्तुति गाते हुए, जिन्होंने अपना स्वरुप विस्तार कर सारे संसार को माप लिया। पर और व्यूह रूपों की स्तुति के बाद इस पासूर में गोदा विभव अवतार रूप की वंदना कर रही हैं। देवों के प्रति स्नेह और करुणा के कारण और 3 पग भूमि दान में महाबली के द्वारा मिलने की ख़ुशी में भगवान बढ़ते गए और विशालकाय हो गए। अनेक विभव अवतारों में से, सर्वाधिक  वामन अवतार की चर्चा वेदों में की गई है। वाल्मीकि ने रामायण में किसी अन्य विभव अवतार का उल्लेख नहीं किया है, लेकिन वे त्रिविक्रम अवतार को छोड़ नहीं सके। शठकोप सूरी आलवार को भी वामन और वराह अवतार से विशेष प्रेम था।

आंतरिक अर्थ:

भागवान सर्वदा अन्य लोगों के लाभ के लिए काम करने में खुश होते हैं। जब अहंकार और स्वातन्त्रियम से जूझता संसारी  विलाप करता है कि उनके लिए कौन उद्धारकर्ता होगा, भागवान तुरंत मदद के लिए दौड़ते हैं।

उलघ्: तीनों लोक

अऴन्द: मापा (अपने दिव्य पैरों से);

जब भगवान ने अपने तीन कदमों से सारे संसार को नाप लिया तो उनके चरण संसार के सभी जीवों के सर पे पड़े| योग्यता, अयोग्यता का विचार किये बिना भगवान सबको आशीर्वाद देना चाहते थे| जिस प्रकार प्रेमवश माँ अपने शिशु को गले लगाती है, यह सोचे बिना कि शिशु इसे अनुभव कर पा रहा है या नहीं; उसी प्रकार अपार प्रेम के सागर भगवान ने सबको अपना आशीष दिया, चले वो भगवान से प्रेम करते हों या नहीं|

जैसे-जैसे वह आकार में बढ़ते गये, उसी अनुपात में चक्र, शंख, गदा आदि भी बड़े होते गए। दृश्य के चित्रण में टिप्पणीकार भावपूर्ण हैं। पाठकों को मानसिक रूप से कल्पना करनी चाहिए। बाली अपने कर्तव्य को पूरा कर खुश था और इंद्र खुश था क्योंकि वह अपने धन को वापस पा सका, लेकिन अफसोस! कोई भी चिंतित नहीं था कि अंतरिक्ष में प्रगति करते हुए उनके चरण किन बाधाओं और चोटों का अनुभव करेगा। आलवार इस दर्द का अनुभव करते हैं|

ऊत्तमन्: उत्तम पुरुष

श्री पेरिया-आच्चान-पिल्लई इस दुनिया में लोगों की तीन श्रेणियों का वर्णन करता है:

  1. अधम: वह जो दूसरों की कीमत पर अपनी प्रगति चाहता है।
  2. मध्यम: जो सोचता है कि दूसरे भी भली प्रकार जियें और मेरा भी नुकसान न हो।
  3. उत्तम: जो यह महसूस करता है कि मेरी सुख-सुविधाओं की कीमत पर भी दूसरों की प्रगति हो।

सर्वोच्च भगवान ने न केवल आकार में बल्कि स्थिति में भी खुद को कम किया। भगवन ने अपने भक्तों के लिए क्या नहीं किया! क्या किसी को भीख मांगना पसंद है? भगवान भिखारी बन गए। अपने लिए नहीं, बल्कि इंद्र के लिए। वह भिक्षा माँगने की वाक्य रचना भी नहीं जानते था लेकिन बली को उसकी सुंदरता ने मोहित कर दिया और उनसे कुछ मांगने के लिए कहा। अंत में, सभी को वही मिला जो वे चाहते थे, हर कोई खुश था और भगवन भी अपने बच्चों को खुश देखकर खुश थे।  परमात्मा ने बिना किसी बिल की मांग के सूर्यप्रकाश दिया| उन्होंने सृष्टि  के पश्चात आत्मा को शरीर, मन और बुद्धि प्रदान की ताकि वे मुक्ति के लिए प्रयत्न करें।

यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः। अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः।। गीता15.18।।

3

पेर पाडि: उत्तमपुरुष के नाम और उनकी महिमा का गायन करते हैं।

यदि भगवान सोने की टिकिया हैं, तो उनका नाम सोने के आभूषण जैसा है। प्रभु का ‘नाम’ स्वयं भगवान से भी अधिक प्रभावकारिता रखता है। कर्म, ज्ञान और भक्ति योगी भी सांसारिक लक्ष्यों के लिए या मोक्ष के लिए नाम जपते हैं, लेकिन शरणागत के लिए  नाम  स्वयं पुरुषार्थ  है (लक्ष्य है), क्योंकि भगवान तक पहुँचने के लिए भगवान स्वयं ही साधन है। हमने पहले ही आचार्य और रामानुज स्वामीजी के माध्यम से उनके कमल के चरणों में समर्पण कर दिया है, इसलिए साधन के तौर पे हमें कुछ करने की आवश्यकता नहीं है। प्रपत्तों के लिए नाम जप भगवत-कैंकर्य रूप है, साधन नहीं।

हमें कभी भी ‘अधम पुरुषों’ के बारे में बात नहीं करनी चाहिए। ऐसे लोगों के बारे में नहीं बोलना स्वयं एक महान गुण है। जब से हम उनके बारे में बात करते हैं, उनके बुरे गुण भी हमें छूते हैं और अंततः दूषित हो जाते हैं। इसलिए, हमें हमेशा ‘उत्तम पुरुष’ (नारायण) की महिमा गानी चाहिए। हम भगवान को नहीं छू सकते लेकिन हम उनके नामों को छू सकते हैं, उसका स्वाद ले सकते हैं, महसूस कर सकते हैं।

नान्गल्ल् नम् पवैक्क साट्री नीरडिनाल्

नान्गल्ल् :– हम (जिनका  नाम और महिमा का जाप किए अस्तित्व संभव नहीं);

नम् पवैक्क साट्री :- हमारे व्रत के बहाने;

नीरडिनाल् – अगर हम दिव्य स्नान करते हैं;

हम व्रत के बहाने कृष्ण से मिलने और उनका आनंद ले सकेंगे क्योंकि कल तक हमारे बुजुर्ग हमारी निगरानी कर रहे थे और कण्णन के साथ खेलने की अनुमति नहीं दे रहे थे। हम अलगाव के ताप पर काबू पाने के लिए अपने अनुष्ठान रूपी कृष्णानुभव में स्नान करेंगे। यहाँ स्नान का अर्थ है । कृष्ण के दिव्य नामों और कल्याण-गुणों में स्नान।

थीन्गिन्द्रि नाडेल्लम् थिन्गल् मुम्मारि पेय्धु

थीन्गिन्द्रि :- बिना किसी खतरे के;

नाडेल्लाम् :- देश भर में;

थिन्गल् – मासिक;

मुम्मारि पेय्धु :- बारिश की तीन अवधि;

जब पांडव गुप्त-अवस्था में थे, तब भीष्म ने पांडवों की खोज करने के लिए एक अद्भुत तरकीब बताई- “जिस स्थान पर 3 अवधि की वर्षा होती है, वहाँ कोई भी रोग नहीं, कोई बीमारी नहीं; विश्वास करो कि पांडव केवल वहाँ ही रह रहे हैं”। ऐसा क्यों? इसका कारण यह है कि पांडव हमेशा भगवान के दिव्य नामों का जाप करते थे। यदि कहीं पर सच्चे भक्तों की उपस्थिति हो तो उस स्थान पर हमेशा समृद्धि रहेगी।

रामराज्य में 9 दिन धूप और एक दिन प्रचुर वर्षा होती थी। इस चक्र ने हर महीने खुद को दोहराया। इस प्रकार, हर महीने तीन बार बारिश होती थी। भूमि उपजाऊ थी और पानी की कमी के कारण कोई अशुभता नहीं थी। ऐसी समृद्धि तिरुप्पावई व्रत के उचित पालन से उत्पन्न होगी।

ओन्गु पेरुण चेन्नेल् उडू:  (उस वजह से) लंबा और उन्नत लाल धान के बीच;

कयल् उघल: उन के बीच में उछलती मछलियाँ;

बिना खाद और हाइब्रिड बीजों के उपयोग के; धान त्रिविक्रम की तरह लंबा हो जाता है। (श्री भट्टर और श्री आलवन्दार जैसे महान आचार्य जब धान के खेतों में लाल कमल के फूलों को उनके सामने झुकने वाले धान के डंठल के साथ देखते थे, भगवान के चरण कमलों को याद याद करते थे; भक्त जिनकी पूजा और साष्टांग प्रणाम कर रहे हैं |)। जैसे डर से मारीच ने हर पेड़ में राम को देखता, जब वो राम के बाण के  द्वारा बहुत दूर जा गिरा था। गोपिकाओं को लंबे धान से वामन अवतार का स्मरण हो रहा है।

पर्याप्त पानी फसल का पोषण करता है। अद्भुत मछलियां, बच्चे हाथी की तरह बड़े होने के कारण धान के बीच में उछल-कूद रहे हैं|

आंतरिक अर्थ:

सदाचार्य द्वारा शरणागति का उपदेश ही दिव्य स्नान है। शिष्य ‘स्वातंत्रियम’ के बोध से मुक्त हो जाता है। 3 अवधि की बारिश का अर्थ है शिष्य में 3 प्रमुख गुणों का विकाश:

  1. अनन्यार्घ शेषत्वं 2. अनन्य शरणत्वं 3. अनन्य भोग्यत्वं

पर्याप्त वर्षा का अर्थ है सत्संग, प्रबंधों का अध्ययन, अर्चा विग्रह के कैंकर्य का आनंद और दिव्य देशों की तीर्थ यात्रा। पुष्ट धान के पौधे शिष्य हैं। उछलती मछलियाँ आचार्यों जो अपने शिष्य के जीवन को सफल होता देख आनंदित हैं।

दूसरा भाव यह है कि गोदा भगवान रंगनाथ को उल्लासपूर्वक देखने में सक्षम होने के लिए इस धारा में एक मछली होने चाहती हैं। मछलियाँ उपजाऊ भोजन (भगवत-भागवत-आचार्य-अनुभव) से पुष्ट होती हैं। जिस प्रकार पुष्ट मछलियाँ कूदती हैं, उसी प्रकार भक्त भी कूदते और नृत्य करते हुए और आंसू भरी आंखों के साथ भगवान के सुंदर रूप का आनंद लेते हैं।

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पून्कुवलै पोदिर् पोरि वन्दु कन्न्पदुप्प:

पून्कुवलै पोदिर्: सुंदर नीले लिली के फूलों पर;

पोरि वन्दु: और सुंदर मधुमक्खियों का;

कन्न्पदुप्प :आँख लग जाना;

ताजे खिलने वाले नीले लिली के फूल पर; (पोदि) मधुमक्खियों जो सुंदर वातावरण के कारण शहद पीने के लिए फूल में प्रवेश करती हैं और फूल के रस का आनंद लेते हुए उनकी आँखें लग जाती हैं।

आतंरिक अर्थ:

कृष्ण-चिंतन में इस तरह के अनुभव के लिए अंडाल तरसती है। अंडाल एक मधुमक्खी के अनुभव की आकांक्षा रखती हैं जो नीली लिली पर शहद चूसने के लिए बैठी है और पूरी रात वहाँ रहती है। वरवर मुनि भी  ‘द्वय-मन्त्रम’ के अर्थानुसंधान की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि जैसे कि ध्वनि करता हुआ मधुमक्खी फूल पर बैठ जाता है और शांत होकर  शहद का रसास्वादन करने लगता  है, उसी प्रकार द्वय महामंत्र का अर्थानुसंधान करना चाहिए।

दूसरा भाव यह है कि हमारे हृदया कमल में चिंता किए बिना सो रहे श्रीमन नारायण को भी संदर्भित करता है क्योंकि आचार्य के माध्यम से उनका कार्य  सफल रहा है। वह एक संतुष्ट किसान की तरह सोते हैं, जिन्होंने प्रचुर मात्रा में फसलों का एहसास किया है।

तेन्गादे पुक्किरिन्दु सीर्त मुलै पट्री, वान्ग कुदम् निरैक्कुम् वल्लल्ल् पेरुम् पसुक्कल्

तेन्गादे – बिना हिचक;

पुक्किरिन्दु: उठो और कोशिश करो

सीर्त मुलै पट्री: दोनों हाथों से बड़े थनों को पकड़कर

वान्ग – खींचें;

कुदम् निरैक्कुम् – बाल्टी भरना;

वल्लल्ल् – उदारता के साथ;

पेरुम् पसुक्कल् – पुष्ट विकसित गायों;

गायों के थन इतने लबालब भरे हुए हैं कि उन्हें दूध देने के लिए किसी भी प्रयास की आवश्यकता नहीं है, लेकिन बाल्टी को पुनः-पुनः उठाने के लिए मांसपेशियों की अत्यधिक शक्ति की आवश्यकता होती है। बर्तन थनों के नीचे रखते ही अपने आप दूध से भर जाता है और फिर दूसरा बर्तन बदला जाता है। यहां तक कि बहुत मजबूत ग्वाले इन गायों को दूध देने में संकोच करते हैं क्योंकि गाय केवल एक थन के द्वारा असंख्य बर्तनों को भरने में सक्षम हैं।

सम्पन्नता से घड़े भरने वाली परोपकारी गायें ब्रज की समृद्धि और सम्पदा हैं। हर घर में घी और मक्खन भरा होता है। दूध निकालने में कोई शक्ति की आवश्यकता नहीं लेकिन मथने में भारी प्रयास की जरूरत होती है। दूध में इतना मक्खन भरा होता है क्योंकि कृष्ण के साथ गायों का विकास होता है, कृष्ण के स्पर्श से, कृष्ण की बांसुरी का संगीत सुनकर। गायों की स्वाभाविक उदारता ईश्वर की इच्छा की पूर्ति है।

आतंरिक अर्थ:

गायों से तात्पर्य उदार आचार्यों से है। चार थन जिसके माध्यम से ज्ञान का यह दूध बहता है: वेद, स्मृति, सात्त्विक पुराण और आलवार दिव्य प्रबंध।

नीन्गाध सेल्वम् निरैन्देलोर् एम्पावै:

चिरस्थायी धन (कृष्ण) हमारे जीवन में भरने के लिए, मेरी लड़कियों व्रत करो।

व्रतम के परिणामस्वरूप, प्रकृति की सुंदरता को संरक्षित किया जाएगा, घर की संपत्ति को संरक्षित किया जाएगा, अन्य सभी प्राणियों को संरक्षित किया जाएगा और मनुष्य बिना किसी बीमारी के लंबे समय तक जीवित रहेंगे।

स्वापदेश:

हमारा शरीर क्षेत्र है। यह केवल साधारण बारिश नहीं है, बल्कि इसके द्वारा हमारे महान गुरु के वचनों की वृष्टि है, जिससे ईर्ष्या, अहंकार जैसे आंतरिक रोग शांत हो जाते हैं। इस प्रकार, हमारा शरीर अच्छी उपजाऊ भूमि (क्षेत्रम्) बन जाता है। {इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते: गीता 13.2 }। यह कई अच्छी फसलों की यानी हमारे अंदर अच्छे गुण पैदावार करता है जिसे हम स्वयं आनंद लेते हैं और दूसरों को बांटते हैं। इस प्रकार हम गायों की तरह लोगों की मदद करने में सक्षम होंगे। हमारे लिए असली धन भगवान और उसकी दुनिया की सेवा है।

जब आप छाया के लिए पेड़ लगाते हैं तो यह फल देता है। इसके साथ ही पक्षियों को आश्रय मिल जाता है, पर्यावरण साफ हो जाता है, बारिश आती है| इसी तरह जब हम भगवान को खुश करने के लिए गतिविधियां करते हैं, तो हम इस जीवन में भी सुख-सुविधाओं को प्राप्त करते हैं।

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तिरुपावै द्वितीय पासुर

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तिरुपावै द्वितीय गाथा: (उ वे मीमांसा शिरोमणि भरतन् स्वामी द्वारा अनुगृहीत संस्कृत छन्द)

सार्थकं भुवि जीवन्त्यः ! कृष्णसंश्लेषहेतुना।
अस्मद् व्रतार्थमस्माभिः कर्तव्याः शृणुत क्रियाः ।।
क्षीराब्धौ सावधानं यः शयानः परमःपुमान् ।
पादाब्जे तस्य गायेम न पिबेम पयोघृते ।।
प्रत्यूषे स्नाम नो पुष्पं कज्जलं वा धरेमहि ।
अकृतं प्राक्तनैर्नैव कुर्याम न च पैशुनम् ।
ददाम वटुभिक्षुभ्याम् आतृप्तेरुचिताय च ।
उज्जीवनविधामेवं विचिन्त्य स्याम निर्वृताः ।। 2।।

इस संसार में जो भी जीने के लिए पैदा हुए हैं, वो हमारे व्रत के विषय में सुनें। हे मेरी प्यारी गोप-सखियों, इस व्रत के नियम सुनो:

पहली बात: क्षीरसागर में अति मनोहरता से शयन कर रहे उन परमपुरुष उनके चरणों की महिमा गाओ।

दूसरी बात: व्रत में दूध और घी जैसी आकर्षक चीजों का त्याग करेंगी।

तीसरी बात: सूर्योदय से पहले जल्दी स्नान करें।

चौथी बात: काजल और आभूषणों का उपयोग नहीं करना।

5 वीं बात: हमारे बुजुर्गों ने जो किया, हम करते हैं। उन्होंने क्या नहीं किया, हम बचते हैं

6 वीं बात: कोई बेकार की चर्चा (gossip) नहीं। दूसरों का बुरा मत बोलो।

7 वीं बात: दान और भिक्षा।

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संस्कृत अनुवाद

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हिंदी छन्द अनुवाद

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वैयथु वर्वीर्घाल् ! नमुम् नम् पवैक्कु :

जो सभी इस दुनिया में रहते हैं! सुनो, हमारी योजना, हमारा व्रत।

वैयाट्टु – इस दुनिया (पृथ्वी) में;

अंडाल सिर्फ श्री-विलीपुटूर की गोपियों को निर्देश नहीं दे रहीं है, बल्कि पूरी दुनिया को जो कृष्णानुभव के आनंद लेने के इच्छुक हैं। दूसरे पासुर में अंडाल उन लोगों को बुलातीं हैं, जो इस धरती पर मौजूद होने के बजाय अपना उज्जीवन चाहते हैं।

तमिल में वैयट्टु का अर्थ वाहन भी है।

कठ (३.३) कहती है,

आत्मान्ँ रथिनं विद्धि शरीर्ँ रथमेव तु ।

बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ।। 1.3.3 ।।

“शरीर रथ है, आत्मा रथी है, बुद्धि सारथी है और मन अश्व रूप इन्द्रियों का नियंत्रण करने वाले रस्सी।”

वास्तव में यह रथ या वाहन इस सांसारिक दुनिया में तब तक यात्रा कर रहा है जब तक यह रथी त्रिपाद-विभूति (शाश्वत दुनिया) तक नहीं पहुंच जाता है। गोदा अनगिनत जीवों को संबोधित करती हैं जो विभिन्न वाहनों में, विभिन्न सड़कों पे, सांसारिक गतिविधियों के लिए यात्रा कर रहे हैं।

किसी को भी भौतिक आकांक्षाओं में डुबो देने में सक्षम इस दुनिया में, अंडाल उन लोगों को पुकारती हैं जो प्रभु के लीला का आनंद लेने की सौभाग्यशाली हैं। भक्त दांतों के बीच जीभ या कीचड़ में कमल के समान होते हैं।

वाऴवीरगाऴ- जो जीने के लिए पैदा हुए हैं;

मानव शरीर में रहना ही हमारे लिए भगवान का सबसे बड़ा उपहार है। भगवान नारायण अपनी निर्हेतुक कृपा और हमारी दिव्य माँ महालक्ष्मी के पुरुषकार से हमें शरीर, मन और बुद्धि प्रदान करते है; ताकि हम इस कर्म बंधन से बाहर आकर श्री वैकुंठ में भगवान की अनंत सेवा का आनंद ले सकें।

नम्म – हम (जो उन्हें हमारा एकमात्र आश्रय मानते हैं);

नम्म पाविक्कु – हमारे व्रत के लिए;

मानव जन्म भी हमें वृन्दावन में मिला। हम खास हैं क्योंकि कृष्ण ने हमें चुना है। धन्य है आप सभी गोपिकाएँ। हमारा व्रत इंद्रजीत या दशरथ की तरह नहीं है, बल्कि सभी के कल्याण के लिए है।

च्चैयुम किरिशैगऴ: हमारे भगवान के लिए हमारे व्रत का जो भी विवरण है,

हम जो सामान्य चीजें करते हैं, उनके लिए भी बहुत आचरण और निषेध होता है। गोपीकाओं ने गोदा से सवाल किया कि अब जब हम उच्चतम लक्ष्य के लिए इकट्ठे हो गए हैं, तो नोम्बू (व्रत) के लिए क्या करना और क्या नहीं करना है? सांसारिक वस्तुओं के लिए, सांसारिक लोगों के लिए बहुत सारे नियम हैं; लेकिन जिसे कृष्ण के प्रति प्रेम है, उनके लिए कोई नियम नहीं हैं। नियम उनका पालन करते हैं। वे जो कुछ भी करते हैं वह नियम बन जाता है। क्या एक माँ को यह बताना पड़ता है कि बच्चे से प्रेम कैसे करना है?

केऴिरो! : हे गोपियों सुनो।

प्यार हमें कुछ करने के लिए मजबूर करता है; प्यार हमें कुछ से बचने के लिए मजबूर करता है। हम भक्ति से जो भी कार्य करते हैं, उन्हें सुनो। गोदा उन्हें सचेत कर रही है, क्योंकि वह शिक्षिका हैं। संसार मंडल के अनगिनत जीवात्माओं को गोदा संबोधित करती है।

पार्कडलुल्ल : क्षीर-सागर में;

पैय तुयिन्न – दिव्य भगवान अपनी योगिक समाधि में;

इस पासुर में गोदा क्षीरसागर में भगवान शयन मुद्रा का ध्यान करती हैं। क्षीर-सागर में भागवत आदि-शेष पर शयन कर रहे हैं। वह देवों की दु:ख भरी पुकार सुनने और उनकी रक्षा करने के लिए श्रीविकुंठ से क्षीर-सागर उतर आये है। (मध्ये क्षीर पयोधि शेष शायने)।

आमतौर पर, कोई सोता हुआ बदसूरत दिखाई देता है, लेकिन भगवन विष्णु के शयन-मुद्रा में अद्भुत आकर्षण है! गोदा अपनी नाचियार थिरुमोडी (5.11) में श्रीरंगम के लोगों की तारीफ करती हैं जो श्री रंगनाथ के शायित रूप को टकटकी लगाकर देखने में सक्षम हैं। वे मोक्ष को भय मानते हैं और मृत्यु से डरते हैं क्योंकि यह श्री रंगनाथ को एकटक से देखने के उनके आनंद को समाप्त कर देगा। यदि किसी को इस धरती पर ही कृष्णके संग का आनंद लेने का सौभाग्य मिला है, तो वह वैकुंठ की इच्छा क्यों करेगा? पाराशर भट्ट स्वामी कहते हैं कि अगर वह श्री रंगनाथ को नहीं पाते हैं तो वे श्री वैकुंठम से लौट जायेंगे। तिरुप्पणा आलवार कहते हैं:

Kondal vannanaik kovalanay venney, Unda vayan en ullam kavarndhanai|

Andar kon ani arangan en amudhinaik, Kanda kangal marronarinaik kanave||

अर्थ:

मैंने उन्हें देखा है जिसका रंग काले बारिश के बादलों की तरह है। उनका सुन्दर मुख, जिसने चरवाहों के मक्खन को निगल लिया| वह देवों के देवता है, वह भगवान रंगनाथ हैं| वह मेरा अमृत है, मेरा जीवन है! मेरी आँखों ने मेरे भगवान को देखा है, अब कुछ और नहीं देखेंगे!

परमन: परम। अद्वितीय,

सौंदर्य में (शयन मुद्रा उनकी दिव्य सुंदरता को बढ़ाता है और वो भी आदिशेष पर) और दिव्य गुणों में।

क्षीर-सागर में भगवान का परत्व श्री वैकुंठ के समान ही है। उन्होंने आदि-शेष को आधार बनाकर क्षीरसागर में कदम रखा। श्रुति कहती है, “ना तत सम: नभ्यदिकस्च्च ” (उसके समान या उससे श्रेष्ठ कोई नहीं है)।

विश्वामित्र जब श्री राम को जगाने गए तब उनकी शयन मुद्रा की उनकी सुंदरता में ऐसे डुब गए कि अपना उद्देश्य ही पूरी तरह से भूल गए| श्री राम को खड़े-खड़े निहारते हुए यह सोचकर कौसल्या की प्रशंषा कर रहे थे कि बारह वर्षों से हर रोज प्रभु के इस दिव्य सौंदर्य का अनुभव करने का सौभाग्य उन्हें मिला। सीता राम के शयन मुद्रा को देख रही थी, तभी इंद्र के पुत्र जयंत ने उनपर हमला किया, लेकिन उन्होंने श्रीराम को जगाया नहीं। उग्र राम ने जयंत की ओर घातक बाण चलाया। द्वारका की महिषीयाँ भी कृष्ण के शायित-मुद्रा को एकटक से देखती रहती थीं।

(मोक्ष’ जाने की चर्चा करते हुए, एक बार नंजीयर (वेदांती स्वामी) यह गंभीर विचार कर रहे थे कि कैसे भगवान के पिता दशरथ केवल स्वर्ग ही गए और श्री वैकुण्ठ नहीं। भट्टर ने टिप्पणी कि, “उन्हें वास्तव में नरक जाना चाहिए था| दशरथ ने सोचा था कि उनका वचन अधिक महत्वपूर्ण था (सामान्य-धर्म); उन्होंने यह नहीं सोचा था कि कैसे श्रीराम के कोमल कमल के सदृश चरणों को जंगल में चलने के कारण चोट लगेगा (विशेष धर्म) । श्रीराम के पिता होने के भाग्य के कारण ही उन्हें स्वर्ग मिला”|

प्रेमवश हम जो भी व्रत की क्रियायें करते हैं, उन्हें सुनो:

अडि पाडी: उनके दिव्य चरणों की प्रशंसा गायेंगे;

हम उनके चरणों में, उनकी स्तुति गाते हैं। यह उसका पैर है जो उन्हें क्षीरसागर से हमारे पास लाता है, उसे हमारे पास लाता है। एक बच्चे के लिए माँ तक पहुँचने का स्थान उनका स्तन है, माँ के अन्य सभी अंग उसके लिए बहुत मायने नहीं रखते हैं। उसी प्रकार भक्तों के लिए पहुँचने का स्थान भगवान के चरण है। दैवी झगड़ों की महिमा गाते हैं। उनके दिव्य चरणों की महिमा। नाम-संकीर्तन हमारे लिए भोजन है। श्री वैकुंठ में, नित्य और मुक्ता जीव भगवान के चरण-कमल की महिमा गाते हुए अपना समय व्यतीत करते हैं।

मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्।

कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च।। Gita 10.9।।

पहला करने योग्य है नाम संकीर्तन| अब गोदा निषेध बताती हैं:

नय उण्णॊम : हम घी नहीं खाएंगे;

पाल उण्णॊम: हम दूध से परहेज करेंगे;

किसी भी व्रतम में हमें विलासी चीजों, प्रेम और कृतज्ञतावश त्याग करना होगा। दूध और घी को कृष्ण बहुत पसंद करते हैं। अब जब वह हमारे साथ नहीं है, हम उसके वियोग में जल रहे हैं, तो क्या हमें दूध और मक्खन का आनंद लेना चाहिए? जब कोई दोस्त आता है, तो हम उस भोजन को भूल जाते हैं जिसका हम आनंद ले रहे थे और उसके साथ कुछ बात करने लगे।उनके चरणों की महिमा गाना ही हमारे लिए भोजन है।

उण्णॊम का मतलब है खाना। वे दूध/घी नहीं पीने के बजाय ‘दूध’ नहीं खाएंगे? हो सकता है कि वह चरवाहे लड़कियों के बोलने का यही तरीका हो। गोदा हालांकि ब्राह्मण लड़की थीं, लेकिन वो गोपी भाव में इतना डूबी थी कि उनकी भाषा। दूसरा विनोदपूर्ण पक्ष यह है जब से श्रीकृष्ण का जन्म हुआ, तब से सारे घी और माखन वही खा जा जाते थे; इस कारण गोपियों को यह नहीं पता कि घी और दुःख खाया जाता है या पिया|

नाट काले – सुबह-सुबह;

निराडि – स्नान करना;

मान लीजिए कि कृष्ण अचानक हमारे साथ खेलने के लिए आते हैं, तो क्या हम उनसे कहेंगे, “कृष्ण! थोड़ा इंतज़ार करें। हम नहाएँगे और आएँगे ”? नहीं, हम सुबह जल्दी तैयार होंगे। उनके शरीर कृष्ण से विलग होने के दर्द से जल रहे हैं। इसलिए, वे सुबह जल्दी नहाना चाहते हैं।

मैयिएळुदोम् : अपनी आंखों को काजल से नहीं सजाएंगे;

मलारिट्टू नाम मुडियोम्: बालों को फूल से नहीं बांधेंगे;

खुद से हम अपने को नहीं सजायेंगे| क्यों? क्योंकि कृष्ण स्वयं अपने हाथों से गोपियों को सजाते थे। वह उनके बालों में फूल लगाते, पलकों पे काजल लगाते आदि। अगर हम खुद को नहीं सजाते हैं तो वह स्वयं हमें सजायेंगे। अगर कृष्ण जबरदस्ती श्रृंगार करते हैं, तो हम आनंद लेते हैं। प्रभु हमेशा चाहेंगे कि उनके भक्त सुंदर और खुश रहें।

भगवान ने कभी भी हमपे अपनी कृपा करने हेतु हमसे कोई अपेक्षा नहीं करते। भगवान बस इतना ही चाहते हैं कि हम उन्हें अपने ऊपर कृपा बरसाने में रुकावट न डालें (अप्रतिशेधम)| उनकी कृपा हमेशा धूप की तरह हमारे लिए खुली रहती है। लेकिन, अगर हम एक छाता पकड़ते हैं, तो यह हम पर नहीं पड़ेगा। हमें बस उनकी कृपा को स्वीकार करने की जरूरत है।

आतंरिक अर्थ:

काजल आंखों को चमक देता है: – ज्ञान योग

मलार: – भक्ति योग

हमने आपके पास पहुंचने के साधन के रूप में, ज्ञान या भक्ति, कुछ भी नहीं चुना।

शैयादन – वह जो हमारे बुजुर्गों द्वारा अभ्यास नहीं किया गया था;;

शैयोम – हम नहीं करेंगे;

हम अपने पूर्वजों द्वारा पीढ़ियों से चली आ रही संस्कृति और परंपरा के खिलाफ कुछ नहीं करेंगे। हमारे पूर्वजों (द्वापर युग की गोपियों) ने जो किया, हम करेंगे; हमारे पूर्वजों ने जो नहीं किया, हम नहीं करेंगे। बुजुर्ग कहते हैं, “हमें अकेले भगवान के पास नहीं जाना चाहिए। लोगों को साथ लेकर चलें”। जब विभीषण राम के पास पहुँचे तो 4 राक्षकों के साथ।

आतंरिक अर्थ:

भले ही वेद हमें कुछ करने की अनुमति देते हैं, लेकिन अगर हम हमारे पूर्वाचार्यों द्वारा इसका पालन नहीं किया जाता है, तो हम इसे नहीं करेंगे।

tīku (aīai – गपशप से बचें (जो दूसरों को नुकसान पहुंचाएगा);

cendrodom – और न ही कठोर शब्द कहें

अधिकांश लोगों को यह सबसे बड़ी बीमारी है। जब अच्छे शब्द बोलने का भी समय नहीं है तो फिर शब्द क्यों बोलें? ऐसा कुछ भी न बोलें जिससे दूसरों को दुख पहुंचे (कम से कम व्रत के दौरान)। अगर कोई आता है और अपने को सही करने के लिए कहता है, तो हम उसमें दोष ढूंढ सकते हैं; अन्यथा नहीं।

लंका में महीनों तक कठोर यातनाओं के बाद जब सीता राम के साथ गयीं, तो उन्होंने लोगों की मदद के लिए कृतज्ञता के साथ याद किया, लेकिन शिकायत का एक शब्द भी नहीं। पूरे २४,००० श्लोकों में, सीता की ओर से किसी भी संभावित शिकायत का कोई संदर्भ नहीं है, जो उनकी कष्टों, यात्राओं, कठिन-परीक्षाओं से संबंधित हो। यह संस्कृति है। महिलाओं में विशेष रूप से शिकायत करने की प्रवृत्ति होती है। हमें कभी भी किस्से नहीं चलाने चाहिए और न ही शिकायत करनी चाहिए। एक बार सीता ने लक्ष्मण से कुछ कठिन शब्द कहे और परिणाम बहुत कड़वे थे|

aiyamum – योग्य को दिया गया दान;

piccaiyum – ह्मचारी और सन्यासियों को भिक्षा;;

āndanaiyum – बहुतायत से (जब तक वे प्राप्त करने में सक्षम)

kai kāṭṭi – देना;

दान अच्छे व्यक्ति के लिए किया जाता है, अच्छे स्थान पर अच्छे समय में और अच्छे दिल से| (देशे काले च पात्रे च, तद दानं सात्त्विकं स्मृतं)| धर्म ऐसी चीज है जिसे हम परोपकार के रूप में करते हैं, बिना किसी अपेक्षा के। दान के लिए नियम बहुत हैं लेकिन धर्म के नियम नहीं हैं। यदि हम प्रशंसा पाने की अपेक्षा से कुछ दान करते हैं, तो यह संतुलित हो जाता है; कोई पुण्य खाता में नहीं जुड़ता।

यह न केवल देना है बल्कि तब तक बहुतायत देना है जब तक कोई माँगने वाला हो। यहाँ, इसका अर्थ ज्ञान और भगवत-अनुभव देना हो सकता है। करने के बाद, यह मत कहो कि मैंने ऐसा किया है। हमारा कर्तव्य यह अपेक्षा करना नहीं है, दूसरे इसे दूसरों को प्रोत्साहित करने के लिए फैला सकते हैं। बहुत से लोग जैसे वेद-पारायणक मात्र एक तुलसी-पत्र पर जीवन-भर काम करते हैं। दान न ज़्यादा करें और न ही कम।

आतंरिक अर्थ:

aiyyam – भगवान के स्वरुप और कल्याण-गुणों के बारे में ज्ञान; piccaiyum – आत्मा के स्वरुप के बारे में ज्ञान। kai kāṭṭi – दूसरों को जितना हम कर सकें, यह ज्ञान देना। भले ही हम अपने ज्ञान को साझा करते हैं लेकिन कर्तृत्व-बुद्धि को न रखना।

Uyyumarenni ugandhelor empavai: “Uyyum+aaRu+ yeNNI”

(Uyyum का अर्थ है मोक्ष। aaRu yeNNI का अर्थ है पुनः-पुनः इसका ध्यान करना।)

मोक्ष पाने के लिए नेक विचार सोचें, मेरी लड़कियां। जीवनाधार का हमारा कारण (उज्जीवनम) हमारे प्रभु के असीम, शुभ गुणों में डूब जाता है, इन उपनिषद कथनों की भावना में: “रसो वै सः”।

पहली बात: उनके चरणों की महिमा गाओ।

दूसरी बात: व्रत में दूध और घी जैसी आकर्षक चीजों का त्याग करना चाहिए।

तीसरी बात: सूर्योदय से पहले जल्दी स्नान करें।

चौथी बात: काजल और आभूषणों का उपयोग नहीं करना।

5 वीं बात: हमारे बुजुर्गों ने जो किया, हम करते हैं। उन्होंने क्या नहीं किया, हम बचते हैं

6 वीं बात: कोई बेकार गॉसिप नहीं। दूसरों का बुरा मत बोलो।

7 वीं बात: दान और धर्म।

हम, जो उनके माध्यम से उन तक पहुँचना चाहते हैं (उपाय के रूप में) लेकिन फिर भी वह तब तक इंतजार करने में असमर्थ हैं जब वह हमारे पास नहीं पहुँच जाता; ये कर्तव्य और निषेध करें। कर्म, ज्ञान, भक्ति को साधन के रूप में नहीं बल्कि उचित रूप से समय बिताने के लिए किया जाना चाहिए।

तो, अगले पासुर में, गोदा का वर्णन है कि हमें क्या मिलता है।

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स्वापदेश:

जहाँ तक सांसारिक चाह का विषय है, हम जो आज पसंद करते हैं वो कल नहीं और जो आज नहीं पसंद करते वो कल पसंद करेंगे- यह हमारे अपने कर्मों के कारण है- इस कारण क्या सही है और गलत ये बताना मुश्किल है क्योंकि हमारी चाह बदलते रहती है| लेकिन जब चाह भगवद-कैंकर्य का हो तो यह बिलकुल स्पष्ट है कि क्या करना चाहिए और क्या निषेध है| शास्त्र हमारे भले के लिए कुछ कर्तव्य और निषेध बताते हैं| हमारे पूर्वज जिन्होंने सत्य का अनुभव किया, उन्होंने शास्त्रोक्त निर्देशों का पालन किया और संतुष्ट जीवन जिया| हमें उनका अनुसरण करना है|
कर्तव्य और निषेध मनुष्यों के लिए हैं, पशु समाज से इसकी अपेक्षा नहीं की जाती| वो इनका पालन कर जीवन सफल कर सकते हैं| अनुशासित जीवन थोड़ा कष्टकर महसूस हो सकता है लेकिन आनंदमय बनाता है|
कर्तव्य तीन प्रकार के हैं- वाचिक, मानसिक और शारीरिक| परमात्मा की प्रशंसा का गायन करना, मन में भगवत-स्वरुप का ध्यान, जरूरतमंदों की मदद करना और आत्मा की सफाई और श्रृंगार पे ध्यान देना| अनावश्यक वार्तालाप और दूसरों की नींदा से बचना चाहिए|

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052582b920eba43abcdd413a26b37b66--art-corner-krishnab437a54381743549e2d7d27c55860063cde8de21c88077828940181107748525images (1)images (2)

श्री त्रिदंडी स्वामी जी के दिव्य ग्रंथ

जगदाचार्य श्रीमद  विष्वकसेनाचार्य स्वामीजी ( श्री त्रिदंडी स्वामी जी ) के दिव्य चरणों का मंगल हो| 220px-Vishwaksenacharya

(22 April 1905 – 2 December 1999)

काषायं यज्ञसूत्रं शुचिवपुषि तथा चोर्ध्वपुण्ड्रं च भाले,
यस्यास्ते -दक्षहस्ते कलिकुमतिगिरीन्देन्द्रवज्रं त्रिदण्डम्।
संसाराग्निप्रशान्त्यै -भृतजलममलं दारुपात्रं पवित्रं,
श्रीविष्वक्सेनसूरे: पदकमलयुगं श्रेयसे संश्रयामि।।

1.इशादि पंचोपनिषद भाष्य:

१. HindiBook-ishadi-panchopanishad

2. श्री वचन भूषण भाष्य

HindiBook–shri-vachana-bhushanam

3. छान्दोग्य उपनिषद भाष्य

HindiBook-chhandogya-upanishad

4. गीता भाष्य

गीता भाष्य

5. वार्तामाला टीका

HindiBook-vartamala

5. पुरुष-सूक्त:

पुरुष-सूक्त

6. श्री-सूक्त

Sri Suktam Tridandi Swami Ji

7. Sri Vaishnava kritya darpana: https://drive.google.com/file/d/0B9lkdEaIaFUDUUstZTA5ck5yZHM/view

8. Vaidika Yoga teeka: https://archive.org/details/VedicYogaSangrahaTridandiSwamiJi/page/n9/mode/2up

9. Bhagwata Geeta teeka of Varvar muni: https://archive.org/details/gitarthasangrahadipika/page/n7/mode/2up

ध्रुव चरित्र

हम मनु की संतान हैं। “मनोर जासौ अयतौ सुख: च”। मनु की संतान होने के कारण ही हम मननशील, चिन्तनशील मानव/मनुष्य हैं। उन्हीं मनु की संतानों में उत्तानपाद हुए थे। संस्कृत भाषा की यही सुन्दरता है कि शब्द में ही उनके जीवन की प्रक्रिया वैसे भर दी जाती है, जैसे छोटे से पीपल के बीज में विशाल वृक्ष। कोई भी लैब में यह साबित नहीं कर सकता की छोटे से बीज में इतना विशाल वृक्ष कैसे छिपा था वरना बरसिम्ह का बीज तो इतना बड़ा होता है।

उत्तानपाद शब्द का अर्थ ही है, जिनका पैर उठा हुआ हो। यानि जीवन के संघर्ष की लड़ाई में उनका पैर उठ चूका है और अब वो गिरेंगे। गिरते कब हैं? जब आपका भीतर का दुश्मन बलवान हो जाता है, जब आप भीतर से टूट जाते हैं तो जीवन से पराजित हो जाते हैं। बड़े मनोवैज्ञानिक हैं भागवत की कथाएँ।

उत्तानपाद की दो पटरानियाँ थीं- सुनीति और सुरुचि।

सुनीति यानि सुन्दर नीति। नीति का अर्थ है सदाचार, धर्म। ये तीनों शब्द अलग हैं पर सच्चाई एक ही है। “ध्रीयते धार्यते इति धर्मः”। धर्म का अर्थ है कर्तव्य, जो हमें धारण करता है। कर्तव्य के विपरीत कर्म करना ही अधर्म है। आँख का जो कर्तव्य है वो कान का नहीं हो सकता। समाज के हर वर्ग को अपना नियत कर्म करना चाहिए। जैसे शरीर को तभी स्वस्थ समझा कहा जाता है जब उसके सारे अंग ठीक काम करें, वैसे ही समाज भी तभी स्वस्थ कहा जाता है जब सभी अपने-अपने अपने धर्म का पालन करें।

सुरुचि यानि सुन्दर रूचि। रूचि का अर्थ है इच्छा या चाह। गुणों के तारतम्य से रूचि सात्त्विक, राजस या तामसी होती है। इन दोनों के नाम से ही इनके जीवन का चरित्र स्पष्ट है। सुनीति के पुत्र का नाम ध्रुव रखा गया और सुरूचि के पुत्र का नाम उत्तम। राजा की आसक्ति नीति में कम और रूचि में अधिक थी इसलिए उनका नाम उत्तानपाद हुआ। ध्रुव उत्तम से बड़े थे।

एक बार की बात है, राजा उत्तम को अपनी गोद में लिये सिंघासन पे बैठे थे। ध्रुव ने देखा तो उसकी भी इच्छा हुयी अपने पिता के गोद में बैठने की और वह धीरे-धीरे अपने पिता के करीब पहुँच गया। पिता ने डर से छोटी रानी की ओर देखा पर सुरुचि ने मना कर दिया और ध्रुव की ओर मूंह करके के कहा:

“ रे ध्रुव मेरा पुत्र करहीं, चाह न कर नृप गोदन का

चाहे मेरा सुत बनना तो ध्यान धरो पुरुषोत्तम का”

सुरुचि ने कहा कि अगर तु राजा की गोद में बैठना चाहता है तो तुझे मेरी कोख से जन्म लेना होगा और इसके लिये तुझे भगवान की तपस्या करनी होगी।

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रानी की इस बात पे उत्तानपात कुछ भी नहीं कह सके। ममता, मोह व्यक्ति को कितना कमजोर कर देती है। चक्रवर्ती सम्राट चाहते हुए भी अपने पुत्र को गोद में न ले सके। ध्यान दें, मूल बात से अलग न जाएँ। जब तक की ज्ञान यानि विवेक और उसका साथी वैराग्य न होगा तब तक जीवात्मा भगवान का नहीं होगा। अब वो पत्नी के हो गए। पहले पति थे, अब हो गए मोमबत्ती। पत्नी कहेगी वही सुनेंगे। पत्नी जलेगी तो ये भी जल जायेंगे, पत्नी मरेगी तो ये भी मर जायेंगे। याद रखें, हम अपने शुभ-अशुभ संस्कार से अनंत काल से इस संसार में भटक रहे हैं। कितनी बार आम के पेड़ से फल बने, फल से फिर गुठली और गुठली से फिर से आम। यह कब से हो रहा है इसका कोई दिन या तारीख बताने वाला नहीं है।

आकर चार लाख चौरासी। जोनि भ्रमत यह जीव अविनाशी।।

फिरत सदा माया कर प्रेरा। काल कर्म सुभाव गुन घेरा॥ कबहुँक करि करुना नर देही। देत ईस बिनु हेतु सनेही॥

जैसे नदी के प्रचण्ड प्रवाह में लकड़ियाँ बह रही हैं, कभी किनारे से सट जा रही हैं, कभी हट जा रही हैं। वैसे ही काल की धारा में हम सब बह रहे हैं। कब से पुत्र, पति, पत्नी, पिता बन रहे हैं इसका कोई हिसाब किताब नहीं है।

माँ का मार्गदर्शन

ध्रुव और उत्तम दोनों ही उत्तानपाद के बच्चे हैं पर पूर्व-संस्कार अलग अलग है। एक ही बाप का बेटा, कोई कवि बन जाता है, कोई विद्वान तो कोई चोर। आप लाख कोशिश करो सुधरने का, नहीं सुधरेगा क्योंकि पूर्व-जन्म का संस्कार अलग-अलग है। ध्रुव का पूर्व-संस्कार उद्भुत हुआ। वह आँखों में आंसू लिये, तेज धड़कन के साथ अपनी माँ के पास पहुँचा। जो आश्रय होता है उसी के पास तो व्यक्ति पहुंचता है। माँ ने कहा, “बेटा! ये सुख और दुःख मान्यता-सापेक्ष हैं। एक व्यक्ति किसी बात से सुखी हो जाता और दूसरा उससे दुखी”। ध्रुव के मन में सौतेली माँ की बात बैठ गयी थी। उसने माँ से पूछा, “माँ ये पुरुषोत्तम क्या होता है? भगवान गीता में बताते हैं:

यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः। अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः।।15.18।।

क्षरं प्रधानममृताक्षरम हरः क्षरत्मानाविशते देव एकः।। (श्वेताश्वतर उप.)

क्षर (शरीर), अक्षर(आत्मा) और ईश्वर, यही तत्त्व त्रय है। ध्रुव नव कहा, “माँ! यदि परमात्मा के ध्यान धरने से काम बनता है तो क्यों न मैं ध्यान धरुँ”? माँ घबरा गयी। छोटा बच्चा है, आज ही से भगवान के ध्यान में लग जायेगा तो मेरा क्या होगा। इसी के सहारे तो मैं अपने दिन गुजार रहीं हूँ। दुर्दिन में भी सुदिन मना रही हूँ। माँ समझती है, “बेटा, ननिहाल चलो। तुम्हारी नानी प्यार करती है, तुम्हारे नाना तुझे दुलार दते हैं। वहीं दिन बीत जायेगा”। लेकिन ध्रुव के मन में यह बात बैठ गयी, “ध्यान धरो पुरुषोत्तम का”।

ध्रुव का अर्थ ही है अटल, जो हिले न, डुले न। ध्रुव के हठ को देखकर माँ मान गयी।

गुरुर्न स स्यात्स्वजनो न स स्यात्पिता, न स स्याज्जननी न सा स्यात्।

              दैवं न तत्स्यान्न पतिश्च स स्यान्न, मोचयेद्यः समुपेतमृत्युम् ॥ ( भागवत ५.५.१८)

मौत की साया सबके सर पर है। उस विभीषिका से जो त्राण दिला दे, वही स्वजन है। वास्तव में माता, पिता, गुरु और स्वजन का कर्तव्य यही है कि वो अपने पुत्र और शिष्य को परमात्मा के राह में आगे बढ़ाये। कुतिया भी अपने बच्चों से प्यार करना जानती है। अगर हम भी अपने बच्चों से इतना ही प्यार करते हैं, संसार में रहने भर, तो यह प्यार नहीं बल्कि दुत्कार है। हमारे गुरुदेव कहते हैं:

है जननी जगत सो, जो भगवत में लगा दे। है पूज्य गुरु सो, जो भगवत में लगा दे।

है स्वजन वही, जो भगवत में लगा दे। जल्लाद है वही जो, इस जगत में फंसा दे।।

माँ का मातृत्व, वात्सल्य छलक गया। वात्सल्य का अर्थ अंध-आसक्ति नहीं है। माँ ध्रुव के मन की उत्कंठा देख आशीर्वाद दिया, “जा बेटा! तेरा मार्ग निष्कंटक हो। मेरा रोम-रोम तुम्हें आशीर्वाद देने के लिये तैयार है”। माँ ने ह्रदय से लगाया, आँख से आंसू छलक आये। ह्रदय से माँ और पिता का आशीर्वाद हो और जीवन में सफलता न मिले, ऐसा हो नहीं सकता। सौतेली माँ के डांट से ध्रुव को चोट लगी, ममता टूट गयी। माँ से ममता थी पर माँ ने सही राह दिखाया। बाल्यावस्था में लगी चोट को मनुष्य जल्दी भूल जाता है पर जो चोट गहरी लगे, उसे जीवन भर नहीं भूलता। बार-बार यह उदाहरण दिया गया है कि बिना ममता गए भक्ति नहीं आती।‘होई विवेक मोह-भ्रम भागा, तब रघुनाथ चरण अनुरागा’। माया का काम ही हमें ठोकर देना, दुःख देना ताकि हमारी ममता छूटे और हमें यह आत्मानुभव हो कि हमारा संबंध इस दुखों की नगरी  (दुखालायम अशाश्वतं) से नहीं है अपितु हम वास्तव में भगवान के हैं

 

गुरू नारद महर्षि की परीक्षा और मार्गदर्शन:

ध्रुव कुछ दूर ही चला था कि उसके सत्य-संकल्प की परीक्षा लेने नारद जी आ गए। बालक, जो मात्र साढ़े चार वर्ष का था, चरणों में लोट गया और प्रार्थना करने लगा:

बाबा राह बता दो हमको।

गंगा पाप हरति हिमकर तप, सुरतरु हर दारिद को।

संत दरश पाप …..

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गंगा पापं शशि तापं, दैन्यं कल्पतरु यथा, पापं तापं च दैन्यं च हरति संत समागम।

नारद जी ने कहा, “छोटा बच्चा है, अभी तो खेलने खाने का उम्र है। माँ की बात से घायल होकर घर से निकल गया। क्या भगवत-प्राप्ति सुलभ है”? ध्रुव ने स्पष्ट कहा, “आप राह बताईये, घर लौटने को मत कहिये”।

चल जाऊं कहीं, तल जाऊं कहीं; मिट जाऊं कहीं घर जाऊं नहीं।

कट जाऊं कहीं, मिट जाऊं कहीं; तल जाऊं कहीं घर जाऊं नहीं।।

नारद जी ने हिला-डुला कर देख लिया, फिर कहा, “वृन्दावन के पास मधुवन चले जाओ। वहाँ तुम ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’; द्वादश अक्षर मंत्र का ध्यान करना”। जैसे श्रीमद वाल्मीकि रामायण के २४००० श्लोकों को मथकर चौबीस अक्षर का गायत्री मंत्र निकाला गया है वैसे ही भागवत के बारहों स्कंध में से एक-एक अक्षर मक्खन की तरह निकालकर यह मंत्र बना है। अगर खखन हो तो खा लेना। बहुत ही प्रत्यक्ष फल मिलता है इस मंत्र का।

“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”


ओम (ॐ) सभी ग्रंथों का सार है। अकार भगवान विष्णु हैं और मकार जीव। उकार जीवात्मा और परमात्मा के मध्य के संबंध को दर्शाता है। प्रणव (ॐ) धनुष है और आत्मा बाण। जो प्रणव रूपी धनुष से आत्मा रूपी बाण को शरीर से त्यागता है, वो लौटकर इस लोक में नहीं आता, मुक्त हो जाता है।

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नमः (न + मः) शब्द का अर्थ है – मेरा कुछ नहीं है, सबकुछ भगवान का है। मैं स्वयं भी अपना नहीं हूँ, भगवान का हूँ। नमः शब्द का अर्थ समर्पण और अहंकार का त्याग है।

भग शब्द में तद्धित प्रत्यय लगाने से बना है ‘भगवत्’। ‘भगवत्’ का अर्थ है कला।

 

ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः।  ज्ञानवैराग्योश्चैव षण्णां भग इतीरणा।। (विष्णु पुराण ६.५.७४)

“सम्पूर्ण ऐश्वर्य, सम्पूर्ण धर्म, सम्पूर्ण यश, सम्पूर्ण ज्ञान और सम्पूर्ण वैराग्य – इन छहों का नाम ‘भग’ है”। ये सब जिसमें हों, उसे भगवान कहते हैं।

उत्त्पतिं प्रलयं चैव भुतानमागतिं गतिम्।

                           वेत्ति विद्यामविद्याम च स वाच्यो भगवानिति।। (विष्णु पुराण ६.५.७८)

अर्थात “उत्पत्ति और प्रलय को, भूतों के आने और जाने को तथा विद्या और अविद्या को जो जानता है, वही भगवान है”। अतः भगवान’ का अर्थ सर्वऐश्वर्यसंपन्न, सर्वज्ञ और साक्षात् परमेश्वर है।

वासुदेव का अर्थ है, “जो सबमें बसे”। इस प्रकार द्वादश अक्षर मंत्र का अर्थ हुआ, “ ओंकार स्वरुप, सबमें बसने वाले, भगवान को नमस्कार”।

 

ध्रुव की ध्रुव तपस्या

ध्रुव चले गए मधुवन में जहाँ कईल के काँटे और घोर जंगल था। मथुरा स्टेशन से दक्षिण का भाग मधुवन कहलाता था। मनुष्य का तो वहाँ जाना ही दुर्लभ था। याद रखें, यदि भगवान के राह में चलने का दृढ निश्चय कर लोगे तो तो आपके मार्ग की बाधाओं को दूर करने का दायित्व भगवान का हो जाता है। जैसे हम सब ने माँ का बेटा बनकर देख लिया। नाक से नेटा आ गया, आँख से किच्ची, शरीर गन्दा हो गया, जो भी हो साफ करना माँ का ही काम है और इसके लिये माँ को कहना भी नहीं पड़ता। माँ का बेटा बन गए तो तो माँ सारी गन्दगी साफ करती है, इत्र या रुमाल नहीं खोजती। जब एक माँ ऐसा कर सकती है तो माँ से हजारों गुना अधिक वात्सल्य के निधि जो भगवान हैं, क्या वो तुम्हारे राह के सारे विघ्न दूर नहीं करेंगे। भगवान का होकर तो देखो जरा, भगवान की राह पे चलकर देखो तो जरा। भगवान का हो गये, फिर सारी जिम्मेदारी भगवान कि हो गयी।

१. पहले तो वह कंद, मूल, फल जो भी मिल जाता उसी को खाकर १ महीने तक नित्य प्रति जप करता और भगवान का काल्पनिक जो भी रूप आता, उसी का ध्यान करता।

2. फिर दूसरा महीना आया तो कंद-मूल भी कौन खोजने जाये, पत्ता खाने लगा। हर १२वें दिन पे वह स्थान बदल देता। शरीर सुखने लगा पर कोई परवाह नहीं।

३. तीसरा महीना आया तो पत्ता भी त्याग दिया, सिर्फ जल पीकर रहने लगा।

४. चौथे महीने में पानी पीना और पांचवें महीने में हवा लेना भी छोड़ दिया। बिना श्वांस लिये खड़े रह गया।

५. छठे महीने में तो उसके शरीर के रोम-रोम से अग्नि के कण प्रकट होने लगे। इतना तेज निकला कि देवताओं के लोक में हलचल मच गयी। इंद्र घबराया कि छोटा क्षत्रिय बालक अवश्य मेरा पद लेना चाहता है। उसने विघ्न डालने का प्रयास किया पर निष्फल हो गया।

उस ध्रुव को लाख बाघ सिंह आते हैं।

पर वैर छोड़ प्रेम ही बढ़ाते हैं, साथ बैठ पास चाट-चाट जाते हैं।।

अंत में भगवान ने देखा की ६ महीने बीत गए, छोटा बच्चा अपना निश्चय नहीं बदल रहा, अब बिलम्ब लगाना अच्छा नहीं। जिस रूप का वह ध्यान कर रहा था, उस रूप को भगवान ने बाहर खींच लिया। व्याकुल होकर ध्रुव ने आँखें खोला तो देखा कि जिसका चिंतन वो कर रहा था वो उसके सामने खड़े थे।

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हमने पहले बताया था, ज्ञान होगा फिर वैराग्य होगा तब भक्ति आएगी लेकिन ध्रुव जी ने साबित कर दिया कि ज्ञान-वैराग्य नहीं है तो चिंता मत करो, केवल भगवान के भरोसे तुम उसकी ओर बढ़ चलो। इसका नाम है शरणागति। जैसे बच्चा माँ की शरण में आ चुका हो।

वैष्णवाचार्य कहते हैं, “बिल्ली के बच्चे पर और बांदरी के बच्चे पे ध्यान दो। क्या अंतर है? जब संकट आता है तो बांदरी भागती है और वो बच्चे को नहीं पकड़ती, बच्चा ही बंदरिया को पकड़ता है (मर्कट किशोर न्याय, साध्योपय)। अयोध्या वृन्दावन में जाकर खुद देख लेना। बिल्ली का बच्चा माँ को कभी नहीं पकड़ता, वो अपनी माँ पर आवलम्बित है (मार्जर किशोर न्याय,सिद्धोपाय)। बिल्ली खुद बच्चे को पकड़ती है, वो भी टांग या पूंछ नहीं; गर्दन। कभी ऐसा नहीं हुआ की बिल्ली बच्चे को पकड़ रही थी, गर्दन में दांत गर गया, घाव हो गया। यही शरणागति मार्ग है। भगवान पर पूर्ण रूप से समर्पित हो जाना”।

ध्रुव की इच्छा हो रही थी भगवान की वंदना करने की, उनके स्वरुप का गुणगान करने की पर कुछ पढ़े-लिखे तो थे नहीं। भगवान ने अपने बायें हाथ से शंख धीरे से उनके गाल में छुआ दिया। शंख ज्ञान का प्रतिक है। ध्रुव स्तुति करने लगे:

योऽन्तःप्रविश्य मम वाचमिमां प्रसुप्तां, सञ्जीवयत्यखिलशक्तिधरः स्वधाम्ना ।

अन्यांश्च हस्तचरणश्रवणत्वगादीन्, प्राणान् नमो भगवते पुरुषाय तुभ्यम् ॥

“जिसने मेरे अंतःकरण में प्रवेश कर अपने तेज से मेरी इस सोयी हुयी वाणी को को सजीव कर दिया, जो इन्द्रियों और प्राणों को चेतना देते हैं, उस अन्तर्यामी परमात्मा को मैं नमन करता हूँ” ।

संसार में किसी भौतिक वास्तु की चाह अगर है तो याद रखो, मुक्ति नहीं मिलेगी। संसार में लौट जाना पड़ेगा। चाह ही राह में बाधा बन कर आती है।

चाह गयी चिंता मिटी, मनवा बेपरवाह। जिसको कछु न चाहिए सोई शहंशाह।।

कब यह विवेक पैदा होगा कहा नहीं जा सकता। विवेक तभी पैदा होगा जब पूर्व का संचित पुण्य उदित हो। ऐसे कई उदहारण हैं। लेकिन पुण्य-पूंज उदित होने कि आशा में साधना मत छोड़ो। भगवान मिलेंगे, इस विश्वास के साथ साधना में लगे रहो।

जहाँ राम तहाँ काम नहीं, जहाँ काम तहाँ राम। तुलसी कबहू न हो सके रवि रजनी एक ठाम।।

भगवान ने गोद में बैठाकर ध्रुव से उसकी इच्छा पूछी। कहा, “तु मन में कुछ भाव लेकर आया था। राजा के गोद में बैठने की चाह थी। तुम्हारी वासना पूर्व-जन्म से थी गद्दी पाने की। जाओ, गद्दी तुम्हें मिलेगी। भगवान ने माथे पर हाथ रखा। इधर, नारद ऋषि उत्तानपाद के पास आये और उन्हें उनका सौभाग्य बताया। “राजन! अब भी तुम मोह निद्रा में रानी का गुलाम बनकर जीना चाहते हो तो यह सबसे बड़ा दुर्भाग्य होगा”। उत्तानपाद की आँख खुल गयी। उत्तानपाद हाथी और बाजा सजाकर ध्रुव की आगवानी करने पहुंचे।

जो रो रो घर से जाता है, वो बाजा से घर आता है।

जिसको यह जगत भगाता है, उसको ईश्वर अपनाता है।।

राजा अब स्त्री के गुलाम नहीं अपितु ज्ञान के गुलाम हो गये। देर लगाये बिना ध्रुव को गद्दी सुपुर्द कर दिया और वन को प्रस्थान किये। ज्ञान से वैराग्य आता है। वैराग्य ही वास्तविक सुख देता है। राज्य, परिवार या सम्पत्ति किसी को शांति नहीं दे सकते। अब सही में उत्तानपाद हो गये। पैर उठा और फिर लौटकर घर नहीं आये।