तिरुप्पावै 18

आज 18वीं गाथा में गोदाम्बा नप्पिनै (नीला देवी) को उठाती हैं। 17वीं गाथा में बलदेव के बाद कृष्ण को उठाया किन्तु कृष्ण उठे नहीं। गोपियों को अपनी भूल समझ आयी। उन्होंने कृष्ण से पूर्व उनकी महिषी/प्रिया नप्पिनै को नहीं उठाया था। वो उनकी सखी भी थीं और कृष्ण की परम प्रेयसी भी।

(जिस प्रकार उत्तर भारत में राधा जी गोकुल में कृष्ण की प्रेयसी एवं पत्नी के पत्नी के रूप में प्रसिद्ध हैं, उसी प्रकार दक्षिण में नप्पिनै अम्माजी। ऐसा भी कहते हैं कि नप्पिनै और राधा एक ही हैं। नप्पिनै कुम्भज की पुत्री थीं एवं कृष्ण ने 7 बेकाबू बैलों को बाँधकर नप्पिनै से विवाह किया था।)

गोपियाँ कहती हैं, “नन्दगोप की बहु, नप्पिनै (नीला), उठो!”

सीता भी स्वयं का परिचय ‘दशरथ महाराज की बहू’ के रूप में देती हैं, ‘मिथिलेश की पुत्री’ के रूप में नहीं। ऐसी ही भारतीय संस्कृति है। स्त्रियाँ श्वसुर के सम्बन्ध से अपना परिचय देती हैं।

श्री उ वे मीमांसा शिरोमणि भरतन् स्वामी द्वारा अनुगृहीत अष्टादश गाथा का संस्कृत छन्दानुवाद:

१८.स्रवन्मदेभतुल्यो यः सङ्ग्रामे नो पलायते ।
महाभुजबलो नन्दो गोपस्तस्य स्नुषे! वरे! ।।
सुगन्धिचिकुरे ! नीले ! द्वारमुद्घाटयाधुना ।।
सर्वतः कुक्कुटा रुत्वोद्बोधयन्त्ययि ! मानुषान् ।।
सङ्घशो माधवीकुञ्जे कूजन्ति बहुशः पिका : ।
कन्दुकाञ्चितहस्ते ! भो नामानि कमितुस्तव ।।
वयं गातुं समायाता वलयानां क्वणेन हि।
आगत्य पाणिपद्माभ्यां हृषितोद्घाटनं कुरु ।।

श्री उ वे रंगदेशिक स्वामीजी के गोदा-गीतावली से

श्री उ वे सीतारामाचार्य स्वामीजी द्वारा हिन्दी छन्दानुवाद

उन्दु मद कळिऱ्ऱन् : मदमस्त हाथियों को जीतने वाले

ओडाद तोळ् वलियन् : शक्तिशाली योद्धाओं का सामना करने वाले एवं युद्ध में कभी पीछे नहीं हटने वाले
नन्द गोपालन् : नन्दगोप की

मरुमगळे : बहु

नप्पिन्नाय् : नीला देवी

“ओ ! हाथी से बलवान, विशाल कांधो वाले, जो युद्ध में कभी पीछे नहीं हटते, ऐसे नन्दगोप की पुत्रवधु!”

कृष्ण ने कुवलयापीड हाथी को परास्त किया था। ये गुण उनमें पिता से ही तो आये हैं। इसलिए नन्दगोप को ‘हाथी से भी बलवान’ कहा है। किन्तु नंदगोप के पास गायें थीं, हाथी तो नहीं थे। यहाँ ऐसा समाधान है कि नन्द जी एवं वसुदेव जी परम मित्र थे। एक की संपत्ति दूसरे की भी थी। वसुदेव जी के पास तो अनेक हाथी थे।
पूर्व में भी कहा गया है कि गोप गण अत्यन्त बलवान थे एवं शत्रुओं के घर जाकर उनके गर्व को नष्ट कर देते थे। तभी तो कंस स्वयं कभी भी गोकुल नहीं आया, अपने दैत्यों को ही भेजता रहा और फिर कृष्ण को मथुरा बुला लिया।

गन्दम् कमळुम् कुळली :सुगन्धित केशों वाली!

कडै : दरवाजा;   

तिऱवाय् : खोलो

“सुगन्धित केशों वाली! किवाड़ खोलो!”

“आप सोच रही होंगी गोपियाँ यह सोच चली जायेंगी की अन्दर कोई भी नहीं है। किन्तु आपके केशों के सुगन्ध यह सूचित कर रहे हैं कि आप भीतर ही हैं”

(हमारे केशों में तो स्वाभाविक गन्ध नहीं होता। सुगन्धित बनाने के लिए पुष्प आदि लगाते हैं। किन्तु लक्ष्मी जी के केशपाश तो पुष्प को भी गन्ध देने वाले हैं।)

नप्पिनै बोलती हैं, “आधी रात्रि को क्यों आयी हो तुमलोग? सुबह हो गयी क्या?”

अबतक तो गोदाम्बा अनेक सखियों को उठायीं एवं प्रभात के लक्षण बतायीं। किन्तु अब तो नीला देवी भी ऐसा ही कह रही हैं।

गोदाम्बा, “कुक्कुट (मुर्गा) शब्द कर रहे हैं।”

“कुछ मुर्गे तो प्रति याम शब्द करते हैं। अर्ध रात्रि को वो शब्द कर रहे होंगे। या तुमलोगों ने उसे डरा दिया होगा और वो शोर कर रहे हैं।”

“माधवी लता पर कोकिल शब्द कर रहे हैं।”

“माधवी लता तो अत्यन्त मृदु होते हैं। उनपे शयन करने वालों के लिए क्या दिन, क्या रात।”

पन्दार विरलि

हे हाथों में गेंद रख भगवान के संग खेलने वाली”

(शयन से पूर्व जब कृष्ण एवं नप्पिनै गेंद से खेल रहे थे तब नप्पिनै जीत गयीं एवं पारितोष के रूप में उस गेंद को अपने पास रख लिया।)

ये गेंद “लोकवत्तु लीला कैवल्यम्” का स्मरण दिलाते हैं। नीला देवी के हस्त में यह गेंद उनके पुरुषकारत्व का सूचक है।

(गेंद नार (नरों के समूह) हैं। नप्पिनै पुरुषकारिणी हैं।

गेंद (नार) — नप्पिनै —- कृष्ण)

गेंद की तरह हमें भी पकड़िए एवं अपने पति के प्रति हमारा पुरुषकार कीजिये।

क्रीडतो बालकस्येव चेष्टां तस्य निशामय ।
अप्रमेयोऽनियोज्यश्च यत्र कामगमो वशी ।।
मोदते भगवान् भूतैर्बालः क्रीडनकैरिव ।
त्वं न्यञ्चद्भिरुदञ्चद्भिः कर्मसूत्रोपपादितैः ।
हरे विहरसि क्रीडां कन्दुकैरिव जन्तुभिः ।।

(विष्णु पुराण 12.18-19)

The ball in the hand of Nappinai represents the sansaara, krida of divine dampati

नप्पिनै, “तुमलोगों के आने का कारण क्या है?”

उन् मैत्तुनन् पेर् पाड

“हम आपके पति के नामों को गाएंगीं।”

कैसे नाम? कृष्ण का निन्दन करने वाले नाम। वो गेंद में हार गए हैं। तुम तो हमारी सखी हो। हम तुम्हारी तरफ से पक्ष लेकर कृष्ण की निन्दा करेंगीं। (राम भी जब वन में सीता से हारते हैं तो लक्ष्मण भी सीता का पक्ष लेकर राम की हँसी उड़ाते हैं।)

नप्पिनै, “ठीक है, आकर दरवाजा खोल लो!”

“अपने लालिमा लिए हाथों से, चूड़ियों को खनकाते हुए, आप ही दरवाजा खोलिये”

(भगवान के अभय हस्त “मा शुच:” की शिक्षा देते हैं। किन्तु हमारे लिए तो आपके लालिमा लिए हाथ ही रक्षक हैं। ये हमें भगवान के स्वातन्त्र्य से रक्षा करते हैं।)

(चूड़ियाँ सुहाग की प्रतीक हैं। जब पति दूर हों तो दुबली हाथों से चूड़ियाँ स्वयं बाहर आ जाती हैं। लक्ष्मी जी का तो कभी भगवान से विश्लेष होता ही नहीं। इसलिए सदा सर्वदा रहने वाले अपने चूड़ियों की खनखनाहट सुनाओ)

वन्दु तिऱवाय् मगिळ्न्दु एलोर् एम्बावाय् !

“हमारे लिए, सन्तुष्ट होकर, प्रसन्न होकर आईये एवं किवाड़ खोलिये।”

स्वापदेश

इस गाथा में एक महत्वपूर्ण शिक्षा मिलती है कि बिना अम्माजी के पुरुषकार के भगवान की प्राप्ति नहीं होती। रामावतार में श्री देवी (सीताम्बा) पुरुषकारिणी हैं। वराह अवतार में भू देवी पुरुषकारिणी हैं। कृष्णावतार में नीला देवी गोकुल में पुरुषकारिणी हैं।

विशेष परिस्थितियों में भगवान चाहे तो बिना पुरुषकार के भी अपना लें। तब भगवान स्वयं ही पुरुषकार करते हैं एवं स्वयं ही उपाय भी।

क्या भगवान में कारुण्य नहीं है, जो बिना अम्माजी के पुरुषकार के नहीं अपनायेंगे?
यह भगवान के कारुण्य की पराकाष्ठा है कि उन्होंने अम्माजी को पुरुषकारिणी बनाया एवं उनके पुरुषकार से आने वाले जीवों को उनके पूर्व कर्मों पर विचार किये बिना उनकी शरणागति को स्वीकार करने का संकल्प लिया।

तिरुप्पावै 17

आज 17 वीं गाथा में गोदाम्बा नन्दगोप के महल में प्रवेश कर क्रमशः नन्द जी, यशोदा जी एवं बलराम जी का उत्थापन करती हैं।

व्याख्याकार पेरियवाच्चान पिल्लै (कृष्णपाद सूरी) कहते हैं कि कृष्ण के पोते अनिरुद्ध को तो ऊषा ने अपहृत कर अपना लिया था। क्या कृष्ण के साथ भी गोदाम्बा ऐसा ही करेंगी?

प्रथम नन्द जी को क्यों उठाया गया? यशोदा को क्यों नहीं? क्योंकि यशोदा नन्द जी एवं कृष्ण-बलराम के मध्य में सोयी हैं। उनके दाहिनी ओर नन्द जी एवं बायीं ओर बलराम हैं। यहाँ माता का पुरुषकारत्व समझा जा सकता है। पुत्र के प्रति वात्सल्य एवं पति के प्रति वल्लभ्य होने के कारण माता का पुरुषकार अचूक है।

यहाँ नन्दगोप आचार्य हैं एवं यशोदा नारायण महामन्त्र। तो क्रम ऐसा है: आचार्य – रहस्यार्थ – भगवद-प्राप्ति


श्रृंखला : तिरुप्पावै (गोदा देवी जी का दिव्य व्रत)

अम्बरमे तण्णीरे सोऱे अऱन्जेय्युम्
  एम्पेरुमान् नन्दगोपाला एळुन्दिराय्
कोम्बनार्क्केल्लाम् कोळुन्दे कुलविळक्के
  एम्पेरुमाट्टि यसोदाय् अऱिवुऱाय्
अम्बरम् ऊडु अऱुत्तु ओन्गि उलगु अळन्द
  उम्बर् कोमाने उऱन्गादु एळुन्दिराय्
सेम्बोन् कळल् अडिच् चेल्वा बलदेवा
  उम्बियुम् नीयुम् उऱन्गु एलोर् एम्बावाय्`

ओह ! वस्त्र अन्न जल दान करने वाले, हे नाथ नन्दगोप उठो, हे ! छरहरे बदन वाली ग्वालकुल की नायिका, हे! ग्वालकुल की दीपस्तम्भ, ओ ! यशोदा पिराट्टी अवगत हो जाइये! हे !आकाशीय गृह तारों के राजा! जिन्होंने  आकाश को चीरते  हुए सारे संसार को मापते हुए  ऊपर उठे ,आपको अब नींद से  जागना चाहिए | हे लाली लिये स्वर्णिम पायल धारण करने वाले बलराम ! आप दोनों भाइयों को अब उठ जाना चाहिये।

श्री उ वे मीमांसा शिरोमणि भरतन् स्वामी द्वारा अनुगृहीत 17वीं गाथा का संस्कृत छन्दानुवाद:

१७.
अम्बरं नीरमन्नं च दातर्नो नाथ ! धार्मिक ! ।
नन्दगोप! त्वमुत्तिष्ठ, नायिके! ललनोत्तमे ! ।।
उद्बुद्ध्यस्व यशोदेऽम्ब ! गोपवंशप्रदीपिके ! ।
देवेशोत्तिष्ठ खं भित्वा वर्धित्वा क्रान्तवन् ! जगत् ।।
काञ्चनं नूपुरं धर्तः ! श्रीयुत ! त्वं सहानुजः ।
उत्तिष्ठ बलदेव ! त्वं मैव स्वपिहि सम्प्रति ।।

श्री उ वे रंगदेशिक स्वामी द्वारा विरचित ‘गोदा-गीतावली’ से संस्कृत गद्यानुवाद

श्री उ वे सीतारामाचार्य स्वामीजी द्वारा हिन्दी छन्द अनुवाद:

जब भी भगवान का आश्रयण ग्रहण करते हैं, तो उसे उचित मार्ग से ग्रहण करना चाहिए। श्री शठकोप आळ्वार कहते हैं, “वेदों के सारार्थ को जानने वालों भक्तों का आश्रयण लेकर भगवान के चरण कमलों का आश्रयण लेना चाहिए”।
जब भी हम किसी दिव्यदेश जाते हैं, हमें सर्वप्रथम उस दिव्यदेश में निवास करने वाले महापुरुषों के दर्शन करने चाहिए। उनके पुरुषकार से मन्दिर में प्रवेश कर आचार्यों, नित्य सूरियों, अम्माजी के पश्चात इस क्रम से भगवान के दर्शन करते हैं।

अम्बरमे : वस्त्र ही

तण्णीरे : जल ही

सोऱे  : अन्न ही

अऱन्जेय्युम् : देने वाले
एम्पेरुमान् : स्वामी

नन्दगोपाला : नन्द गोप

एळुन्दिराय् : उठिए

“वस्त्र ही, जल ही, अन्न ही दान करने वाले, हे हमारे स्वामी नन्दगोपाल, उठिए!”

‘वस्त्र ही, जल ही, अन्न ही’ ऐसा क्यों कहा गया? नन्द जी जब वस्त्र दान करते हैं, तो इतनी दक्षता से करते हैं मानों उन्होंने बालपन से सिर्फ वस्त्र ही दान करने का कार्य किया है। किसको किस प्रकार के वस्त्र चाहिए, उनके नाप से, उनके योग्य वस्त्र सरलता से दान करते हैं नन्द जी। इसी प्रकार जल एवं अन्न भी।

हे नन्द जी! जब आप सभी को धारक, पोषक एवं भोग्य वस्तुएँ प्रदान करते हैं, तो हमारे धारक, पोषक एवं भोग्य, तीनों ही कृष्ण ही हैं। हमें भी हमारा अभीष्ट प्रदान कीजिये।

(भगवान भी आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी; सभी को उनके अभीष्ट प्रदान करते हैं। उसके बाद भी मांगने वालों को ही ‘उदार’ भी कहते हैं।

चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन।

आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ।।7.16।।

उदाराः सर्व एवैते (गीता 7.18)

आचार्यों का भी ज्ञान ऐसा है मानों ये संस्कृत वेद ही पढ़ाते हैं, द्राविड़ वेद ही पढ़ाते हैं, न्याय ही पढ़ाते हैं आदि।)

कोम्बनार्क्केल्लाम् कोळुन्दे :गोप कुल की लता में पल्लव समान

कुलविळक्के : मङ्गल दीप
एम्पेरुमाट्टि यसोदाय् : स्वामिनी यशोदा

अऱिवुऱाय् : उठिए

“गोप कुल की लता में पल्लव समान एवं कुलदीपक यशोदा, हमारी स्वामिनी, उठिए!”

स्त्रियों का स्वरूप पारतंत्र्य होने के कारण उन्हें लता का उपमान दिया जाता है। लता जिस प्रकार किसी पर आश्रित होकर ऊपर बढ़ती है, वैसी ही आदर्श शरणागत हैं यशोदा स्वामिनी जी।


जिस प्रकार लता में कोई भी रोग हो तो लक्षण सर्वप्रथम पल्लव में दिखते हैं, उसी प्रकार गोपकुल में कुछ भी अशुभ हो तो सर्वप्रथम यशोदा का मुख ही उदास होता है।

यशोदा जी, आप कुलदीपक हैं। कृष्ण प्रकाशमान दीपक हैं। आप हमें कृष्ण विरह के अन्धकार में मत रखिए।

(यहाँ गोपियाँ नन्द एवं यशोदा स्वामी एवं स्वामिनी कहकर पुकारती हैं। क्योंकि वो ही कृष्ण को प्रदान करेंगे। कृष्ण को प्रेम से ‘नन्द के कुमार’ और ‘यशोदा के बाल सिंह’ कहती हैं।)

अम्बरम् : आकाश

ऊडु अऱुत्तु : छेदते हुए

ओन्गि : बड़े हुए

उलगु अळन्द : तीनों लोकों को माप लिया
उम्बर् कोमाने : देवाधिदेव

उऱन्गादु : नींद को त्यागिये

एळुन्दिराय् : उठिए

“हे कृष्ण! आप वामन अवतार में भिक्षा के रूप में तीन पग भूमि पाकर आप बढ़ते गए और तीन पग से समस्त संसार को नापकर देवों एवं मनुष्यों को वासस्थान प्रदान किया। हे संसार के रक्षक! हमारी भी रक्षा कीजिये।”
“देवों, मनुष्यों, सभी के ऊपर अपने पादारविन्द रखने वाले हे सौलभ्यमूर्ति! हमें भी स्वीकार कीजिये।”

“संभवतः तीनों लोकों को नापने के क्रम में आपके चरणों को कष्ट हुआ एवं थकान से आप सो रहे हैं। इसलिए हम आपका मंगलाशासन कर रही हैं।”

(जब कृष्ण नहीं उठे तो गोपियाँ समझीं कि क्रम में कुछ गड़बड़ हुयी है। हमने बलराम को नहीं उठाया।)

सेम्बोन् कळल् अडिच् चेल्वा बलदेवा
उम्बियुम् नीयुम् उऱन्गु एलोर् एम्बावाय्`

“हे लाली लिये स्वर्णिम पायल धारण करने वाले बलराम ! आप दोनों भाइयों को अब उठ जाना चाहिये।”

बलराम जी के अवतरण से पूर्व देवकी के कोई भी पुत्र जीवित नहीं रहे। उनके अवतरण के पश्चात कोई भी मृत नहीं हुआ। इस कारण उन्हें मातृ-गर्भ-प्रकाशक’ कहते हैं। उनके चरणों के स्पर्श के कारण ही देवकी के गर्भ में आने वाले कृष्ण जीवित रहे। इस महिमा को जानते हुए, उनके चरणों में लालिमा लिए स्वर्ण कुण्डल धारण कराए गए हैं।

लक्ष्मण के अवतार में तो आप सोये ही नहीं थे। निरन्तर कैंकर्य किया। जागिये और हमें भी कैंकर्य प्रदान कीजिये।

आप भगवान के शैया हैं। आपके जागे बिना तो भगवान भी उठेंगे नहीं।

ये भगवान के लिए जीवात्म-प्राप्ति का उत्तम अवसर है कि हम उनके द्वार पर आए हैं। वरना हमें ढूँढते हुए उन्हें हमारे द्वार आना होगा।

इसलिए आप दोनों भाई अब जल्दी से उठिए।

तिरुप्पावै 15

आज की 15वी गाथा तिरुपावै ग्रन्थ के मध्य में है एवं तिरुपावै का सार है। इसे ‘तिरुपावै में तिरुपावै’ कहते हैं। जिस प्रकार सहस्रगीति (तिरुवाईमोलि) में “एम्माविडु” दशक पारतंत्र्य की शिक्षा देते हुए सम्पूर्ण ग्रन्थ का सार है, उसमें भी ‘तनक्के आघ’ पासूर। तिरुपावै की 15वीं गाथा भी, पारतंत्र्य की पराकाष्ठा भागवत-शेषत्व की शिक्षा देता है।

गोदाम्बा अन्दर सो रही सखी को “बालशुक” कहकर सम्बोधित करती है। ये गोपी अत्यन्त मधुर स्वर के कारण प्रसिद्ध है। अन्दर सोते हुए कुछ कृष्ण-संबंधित राग गुनगुना रही है एवं उसी में भाव-विभोर है।

वेद कहते हैं, “आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यः मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः।” प्रथम दो गोपियाँ ‘श्रोतव्यः’ की शिक्षा देती हैं। मध्य की गोपियाँ ‘मन्तव्य:’ की शिक्षा देती हैं। 15वें पासूर की गोपी ‘निदिध्यासितव्यः’ की शिक्षा देती हैं।

श्रृंखला : तिरुप्पावै (गोदा देवी जी का दिव्य व्रत)

एल्ले इळम् किळिये इन्नम् उऱन्गुदियो
  चिल्लेन्ऱु अळियेन्मिन् नन्गैमीर् पोदर्गिन्ऱेन्
वल्लै उन् कट्टुरैगळ् पण्डे उन् वाय् अऱिदुम्
  वल्लीर्गळ् नीन्गळे नानेदान् आयिडुग
ओल्लै नी पोदाय् उनक्कु एन्न वेऱु उडैयै
  एल्लारुम् पोन्दारो पोन्दार् पोन्दु एण्णिक्कोळ्
वल् आनै कोन्ऱानै माऱ्ऱारै माऱ्ऱु अळिक्क
  वल्लानै मायनैप् पाडु एलोर् एम्बावाय्

श्री उ वे भरतन् स्वामीजी द्वारा संस्कृत अनुवाद

१५.शुकशाबोपमेये! भोः किन्निद्रास्यधुनाऽप्यहो ।
मा स्माह्वयत दुःश्राव्यम् आयाम्याभीरबालिकाः !।।
चिरादेवोक्तिकाठिन्यं समर्थे! विद्म भोस्तव ।
समर्थास्तत्र यूयं हि भवान्येषैव वा तथा ।।
सत्वरं त्वं समायाहि पृथक्कृत्येन किं तव ।
किमु सर्वाः समायाता ? आमेत्य गणय स्वयम् ।।
मत्तं कुवलयापीडं हन्तारमतिदक्षिणम्।
शत्रूणां बलविध्वंसे मायिनं कीर्तयेमहि ।।

श्री उ वे रंगदेशिक स्वामी द्वारा विरचित ‘गोदा-गीतावली’ से संस्कृत गद्यानुवाद

श्री उ वे सीतारामाचार्य स्वामी द्वारा विरचित हिन्दी छन्द अनुवाद

(इस पाशुर का अर्थ, देवी अपनी सखियों के संग जगाने आयी एक सखी के द्वार पर खड़ी,  बाहर खड़ी सखियों और भीतर की सखी के मध्य वार्तालाप के अनुरूप दिया है।)

एल्ले इळम् किळिये इन्नम् उऱन्गुदियो

गोदाम्बा : हे ! युवा तोते जैसी नवयौवना, मधुर वार्तालाप वाली, हम सब तेरे द्वार पर खड़ी हैं, और तुम निद्रा ले रही हो ?

गोदाम्बा पुकारती हैं, “तुम बालशुक के समान मधुर वार्तालाप करती हो। तुम्हें लिए बिना हम कैसे जा सकती हैं। कृष्ण को रिझाने हेतु तुम हमारे साथ अवश्य आओ।”

(सामान्यतः हम समझते हैं कि भगवान का कैंकर्य ही प्राप्य है किन्तु सम्प्रदाय में भागवतों से चर्चा करना, उनके सुख-दुःख बाँटना भी परम प्राप्य है। यदि हम भोजन कर रहे हों या भगवद-अर्चन कर रहे हों और कोई भक्त गृह पधारें; तब हम उसे बीच में रोककर, उठकर उनका सत्कार करते हैं। यही विशेष धर्म है।)

चिल्लेन्ऱु अळियेन्मिन् नन्गैमीर् पोदर्गिन्ऱेन्

अन्दर की सखी : हे! भगवद प्रेम में परिपूर्ण सखियों, इतने क्रोध में न बोलो, मैं  अभी आ रही हूँ ।

वल्लै उन् कट्टुरैगळ् पण्डे उन् वाय् अऱिदुम्

गोदाम्बा : तुम वार्ता में बहुत चतुर हो, हम सब हम आपके अशिष्ट शब्दों के साथ-साथ आपके मुंह को भी  बहुत पहले से जानते हैं।

वल्लीर्गळ् नीन्गळे

अन्दर की सखी : तुमलोग ही कठोर वचन बोल रही थी।

नानेदान् आयिडुग

“अच्छा, मैं ही गलत हूँ। अब बोलो मुझे क्या करना है?”

(यहाँ बालशुक गोपी एक उत्तम शिक्षा देती है। यदि भागवत हमारे कुछ दोष गिनायें, हमारी निन्दा करें तो उसे मान लेना चाहिए। जैसे राम के वनवास में भरत जी अपना ही दोष मानते हैं; मंथरा, कैकेयी, दशरथ या राम का दोष नहीं।

यदि वो क्रोध में कुछ वचन बोलें तो हमें प्रत्युत्तर नहीं देना चाहिए। यदि दोनों तरफ से लोग क्रोध में निन्दा वचन बोलें तो विषय गम्भीर हो जाएगा।

पराशर भट्ट की एक वैष्णव निन्दा कर रहा था। तब पराशर भट्ट ने उन्हें पारितोषिक हार प्रदान किया।

ओल्लै नी पोदाय् उनक्कु एन्न वेऱु उडैयै

गोदाम्बा : जल्दी से उठो। क्या तुम्हारे जागने में कोई बाधा है?

एल्लारुम् पोन्दारो

अन्दर की सखी : क्या सब लोग जाने के लिए आ गए?

पोन्दार् पोन्दु एण्णिक्कोळ्

गोदाम्बा : आ गए हैं। (एक तुम ही आखिरी बची हो)। आकर गिनती कर लो


वल् आनै कोन्ऱानै माऱ्ऱारै माऱ्ऱु अळिक्क
  वल्लानै मायनैप् पाडु एलोर् एम्बावाय्

कुवलयापीड़ हाथी को मारनेवाले, अपने शत्रुओं का बल हरने वाले, अद्भुत गतिविधियां करने वाले भगवान् कृष्ण के गुणानुवाद करेंगे।

भगवान को क्षति पहुँचाने की चेष्टा करने वाले कुवलयापीड हैं। यहाँ भगवान के जीवन-रक्षण के प्रयत्न में हानि पहुँचाने वाले अहँकार एवं ममकार को समझना चाहिए।

गोपियाँ अपना स्त्री-अभिमान छोड़कर भगवान के पास स्वयं जा रही हैं। स्त्री-अभिमान यह है कि प्रेमी ही प्रेमिका के पास आकर प्रेम-निवेदन करेगा।

श्री रङ्गनायकी अम्माजी

श्रीमते रामानुजाय नमः

तनियन : श्री वैष्णव गुरु परम्परा

किन्तु भगवान इन असंख्य अण्डों का निर्माण क्यों करते हैं? मोर अपने पंख फैलाकर नृत्य क्यों करता है? मोरनी को मोहने हेतु|

उसी प्रकार भगवान भी किसी अन्य प्रकार से जीवों की रक्षा कर सकते थे| किन्तु सृष्टि और प्रलय के चक्र के द्वारा ही जीवों की रक्षा क्यों करते हैं? महालक्ष्मी अम्माजी को प्रसन्न करते हेतु|सृष्टि का प्रधान हेतु है लीला या क्रीडा| इसका प्रधान उद्देश्य है लक्ष्मी देवी (श्री देवी) की प्रसन्नता|

(मोर का उदहारण सर्वाधिक उचित है| जिस प्रकार मोरनी को प्रसन्न करने हेतु मोर अपने पंख फैलाकर नृत्य करता है, वैसे ही भगवान इस सूक्ष्म प्रकृति को नाम-रूप प्रदान करते हुए फैलाते हैं (स्थूल प्रकृति)| मोर के पास ही पंख होता है, मोरनी के पास नहीं| उसी प्रकार जगत के कारण एकमात्र भगवान ही हैं| श्री देवी जगत की सृष्टि में पुरुषकार हैं|)

महालक्ष्मी भगवान के लिए इतने महत्वपूर्ण हैं कि उनकी प्रसन्नता हेतु भगवान सृष्टि प्रलय आदि व्यापार करते हैं? प्रहलाद आदि भक्तों के लिए तो इतना बड़ा कार्य नहीं करते?

क्योंकि श्री देवी भगवान की स्वरुप-निरूपक धर्म हैं| भगवान की पहचान है – श्रियः पतित्वम्|

भक्तिसार आलवार कहते हैं: तिरुविला देवै तेरेमिल देवै| अर्थात जिनके वक्षस्थल में श्री देवी का निवास नहीं है, मैं उसे नहीं मानूंगा|

शठकोप आलवार कहते हैं: अगल्गिल्लेन इरैयुम एन्ड्र अलर मेल मंगई उरई मार्वा|

अर्थात् आपसे अनपायनी रहने वालीं सुकोमल पद्मजा, जो नित्य आपके वक्षस्थल में रहती हैं|

भगवान के वक्षस्थल में एक त्रिभुजाकार चिन्ह है, जिसे श्रीवत्स चिन्ह कहते हैं| यह भगवान के दिव्य मंगल विग्रह में लक्ष्मी देवी का निवास स्थान है|अतः श्री देवी के बिना भगवान तो भगवान ही नहीं हैं|

श्री देवी का हमारे गुरु परम्परा में क्या स्थान है?

श्री वैष्णव सम्प्रदाय में तीन मन्त्र हैं| मूल मन्त्र (नारायण अष्टाक्षरी महामन्त्र) बद्रिकाश्रम में नारायण ऋषि ने नर ऋषि को प्रदान किया| द्वय मन्त्र क्षीराब्धि में भगवान विष्णु ने लक्ष्मी देवी को दिया| चरम श्लोक भगवान कृष्ण ने कुरुक्षेत्र में अर्जुन को दिया| किन्तु किसी भी मन्त्र की गुरु-शिष्य परम्परा नहीं चली|

श्रीरंगम में रंगनाथ भगवान ने ये तीनों मन्त्र रंगनायकी अम्माजी को दिए| रंगनायकी अम्माजी ने मन्त्र प्राप्त कर इसे आगे बढ़ाया और इस प्रकार श्री वैष्णव सम्प्रदाय बना|

भगवान का उभय लिङ्गत्व

श्रुतियों ने भगवान को निर्गुण भी कहा है एवं सगुण भी| भगवान निर्गुण हैं या सगुण, इस संशय का समाधान भगवद रामानुज स्वामी करते हैं:

निर्गुण का अर्थ प्राकृत हेय गुणों का अभाव होना| प्राकृत अर्थात् प्रकृति-जन्य गुण : – सत्त्व, रजस और तमस| हेय अर्थात् दोष| जिस प्रकार गरुड़ के पास सर्प नहीं आ सकते, उसी प्रकार भगवान में लेश मात्र भी हेय गुण नहीं होते जैसे असूया, बुढ़ापा, मतिभ्रम, भय, शोक आदि|

सगुण का अर्थ है समस्त कल्याण गुणों के सहित होना जैसे ज्ञान, शक्ति, तेज आदि; वात्सल्य, सौशील्य, सौलभ्य आदि|

अनेक श्रुति वाक्यों में भगवान को एकसाथ हेय गुणों से रहित एवं कल्याण गुणों से युक्त बताया गया है:

छान्दोग्य उपनिषद् 8.7.2

य आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसंकल्पः|

पाप, बुढ़ापा, मृत्यु, शोक, भूख, प्यास आदि से मुक्त एवं सत्यकाम और सत्यसंकल्प|

अनेक वेद वाक्य भगवान के सगुणत्व का वर्णन करते हैं:

यस्सर्वज्ञस्स सर्ववित्, यस्य ज्ञानमयं तपः| (मुण्डक उपनिषद् 1.1.9)

पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते, स्वाभाविकी जानवलक्रिया च| (श्वेताश्वतरोपनिषद्.8)

सत्यकामस्सत्यसङ्कल्पः| (छान्दोग्य उपनिषद् 8.7.2)

भगवान को हेय गुणों से रहित बताने वाली श्रुतियाँ:

क्षयन्तमस्य रजसः पराके। (साम0 17।1।4।2), (ऋक्स0 2।6।25।5)

विश्वं पुराणं तमसः परस्तात्  (तैत्तरीय अरण्यक 3.12.39)

सत्त्वादयो न सन्तीशे यत्र च प्राकृता गुणाः ।

न हि तस्य गुणास्सर्वे सर्वैर्मुनिगणैरपि ॥

वक्तुं शक्या वियुक्तस्य सत्त्वाद्यैरखिलैर्गुणैः ॥” (विष्णु पुराण)

यहाँ पराशर महर्षि प्रथम भगवान में सत्त्व, रजस एवं तमस से युक्त प्राकृत गुणों का भगवान में निषेध बताते हैं एवं पुनः भगवान को अनगिनत कल्याण गुणों से युक्त बताते हैं|

संख्यातुं नैव शक्यन्ते गुणा: दोषाश्च शार्न्गिणः।

अनन्तश्च प्रथमः राशि अभाव: इति पश्चिम:।।

भगवान के गुणों एवं दोषों को गिनना सम्भव नहीं है| गुण अनन्त हैं एवं दोषों का अत्यन्त अभाव है|

सकल जगत का शरीरक होने पर भी दोषरहित होना

शरीर के विकारों से आत्म-स्वरुप में विकार नहीं आता| आत्मा अविकार ही रहता है| बाल, युवा, वृद्धावस्था आदि विकार शरीर के होते हैं, आत्मा बाल, युवा आदि अवस्थाओं को प्राप्त नहीं होता|

शरीर के विकार बद्ध जीवों को कर्मवशत: प्रभावित करते हैं| जीवों को शरीर से सुख-दुःख कर्म के कारण प्राप्त होते हैं|

“न ह वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्ति” (छान्दोग्योपनिषद 8.12.1)

देहधारी के लिए सुख और दुःख से कभी मुक्ति नहीं है| जब तक कोई व्यक्ति शरीर में रहता है, उसे अच्छे और बुरे का अनुभव होता रहेगा, लेकिन जब आत्मा शरीर से मुक्त हो जाती है (अशरीर हो जाती है), तो उसे ये सुख-दुःख छू नहीं पाते हैं|

किन्तु वेद प्रमाण से हीं भगवान शरीर में विद्यमान रहते हुए भी

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्ष परिषस्वजाते ।

तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति अनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति” ।।

दो सुन्दर पंखों वाले पक्षी, घनिष्ठ सखा, समान वृक्ष पर ही रहते हैं; उनमें से एक वृक्ष के स्वादिष्ट फलों को खाता है, अन्य खाता नहीं अपितु अपने सखा को देखता है।

यहाँ एक पक्षी जीव है और दूसरा परमात्मा| एक ही शरीर में दोनों अवस्थित हैं| फल यहाँ कर्म के सूचक हैं| जीव अपने कर्मों का भोग करता है किन्तु परमात्मा कर्म फलों का अनुभव नहीं करता, वो सिर्फ साक्षी है|

कर्तृत्व जीवात्मा का ही होता है इसलिए कर्मों का फल भी जीवों को ही भोगना है| भगवान को कर्ता इस कारण कहा जाता है क्योंकि भगवान के अनुमति दान के बिना जीव कोई प्रयत्न नहीं कर सकता|

रुद्र आदि देवताओं का जगद कारणत्व असम्भव होना एवं विष्णु का जगद कारणत्व

श्रीमते रामानुजाय नमः

अब ग्रन्थ में आगे का विषय है: रुद्र आदि देवताओं का जगद कारणत्व असम्भव होना एवं विष्णु का जगद कारणत्व।

यद्यपि श्रुतियों में ब्रह्मा-विष्णु-रुद्र-इन्द्र आदियों का भी कारणत्व और कार्यत्व प्राप्त होता है, किन्तु जगत का कारण कोई एक ही हो सकता है। जगत का निमित्त और उपादान कारण एक से अधिक नहीं हो सकता।

यदि ऐसा कहे कि एक ही ईश्वर के ये विभिन्न रूप हैं तो इन सभी देवताओं का ऐक्य स्वीकार करना होगा। शास्त्रों में कई ऐसे प्रमाण प्राप्त होते हैं कि एक ब्रह्म ही ब्रह्मा-विष्णु-रुद्र के रूप में आकर सृष्टि, स्थिति और संहार करता है।

विष्णुरेव परं ब्रह्म त्रिभेदमिह पठ्यते ।
सृष्टिस्थित्यन्तकरणीं ब्रह्मविष्णुशिवात्मिकाम् ॥

विष्णु ही परम ब्रह्म हैं जो ब्रह्मा, विष्णु एवं तीन भेद में सृष्टि, स्थिति एवं संहार करते हैं|

विष्णु पुराण 1.2.66 में भी

सृष्टिस्थित्यन्तकरणीं ब्रह्मविष्णुशिवात्मिकाम् ।
स संज्ञां याति भगवानेक एव जनार्दनः ॥६६॥

स्त्रष्टा सृजाति चात्मानं विष्णुः पाल्यपाति च ।
उपसंह्रियते चान्ते संहर्ता च स्वयं प्रभुः ॥६७॥

ऐसे भी प्रमाण प्राप्त होते हैं कि स्व-स्वरूप से ब्रह्म स्वयं विष्णु अवतार में आते हैं। (स्व स्वरूपात् स्वयं विष्णुस्सत्वेन पुरुषोत्तम:)। ब्रह्मा और रुद्र भगवान के नियमन में कार्य करते हैं। भागवत पुराण में ब्रह्मा स्वयं कहते हैं कि भगवान के द्वारा नियुक्त होकर उनकी आज्ञा से वो सृष्टि करते हैं। उन्हीं की आज्ञा से रुद्र प्रलय करते हैं।

सृजामि तन्नियुक्तोऽहं हरो हरति तद्वश: ।
विश्वं पुरुषरूपेण परिपाति त्रिशक्तिधृक् ॥ 2.6.32 ॥

इन दोनों ही प्रमाणों का सामनाधिकरण्य से यह प्राप्त होता है भगवान का विष्णु अवतार स्व-स्वरूप से होता है। ब्रह्मा और रुद्र भगवान के शरीर होने से, भगवान के द्वारा किसी कार्य विशेष के लिए स्व-शक्ति द्वारा नियुक्त होने से वो भगवान के शक्त्यावेश अवतार कहे जा सकते हैं। साक्षात अवतार के रूप में तो कहीं भी वर्णन प्राप्त नहीं होता।

महाभारत शान्ति पर्व में ब्रह्मा रूद्र से कहते हैं-

विष्णुरात्मा भगवतो भवस्यामिततेजसः । तस्माद्धनुज्यसंस्पर्श स विषेहे महेश्वरः ।।

ब्रह्मरुद्रसंवादे-
तवान्तरात्मा मम च ये चान्ये देहिसंज्ञिताः ।
सर्वेषां साक्षिभूतोऽसौ न ग्राह्यः केनचित् क्वचित् ।।

तुम्हारे अन्तरात्मा और मेरे भी और सभी देहधारियों के आत्मा

यहाँ ब्रह्मा और रुद्र के अन्तरात्मा भगवान को कहा गया है। अर्थात वो भगवान के शरीर हैं।

वेदों के प्रमाण से यह सिद्ध होता है कि प्रलय के बाद एवं सृष्टि से पहले सिर्फ नारायण (विष्णु) ही थे|

महोपनिषद

एको ह वै नारायण आसीत्।
न ब्रह्मा न ईशानो नापो नाग्निः न वायुः नेमे द्यावापृथिवी न नक्षत्राणि न सूर्यः।

सृष्टि काल में ब्रह्म से ब्रह्मा और रूद्र की सृष्टि का वर्णन मिलता है, किन्तु विष्णु की सृष्टि का नहीं| अर्थात्, विष्णु स्वयं भगवान के ही रूप हैं|

नारायण उपनिषद्

नारायणाद्ब्रह्मा जायते । नारायणाद्रुद्रो जायते । नारायणादिन्द्रो जायते । नारायणात्प्रजापतिः प्रजायते । नारायणादद्वादशादित्या रुद्रा वसवः सर्वाणि छन्दांसि नारायणादेव समुत्पद्यन्ते। नारायणात्प्रवर्तन्ते । नारायणे प्रलीयन्ते। एतदृवेदशिरोऽधीते ॥

अतः सिद्धान्त यह है भगवान स्वयं ब्रह्मा, विष्णु एवं रूद्र के तीन रूप लेकर सृष्टि, स्थिति एवं संहार करते हैं। इन त्रिमूर्ति में विष्णु स्वयं भगवान के स्व-स्वरुप से अवतार हैं, अर्थात भगवान ही हैं| ब्रह्मा और रूद्र का भगवान के अवतार के रूप में वर्णन नहीं आता। भगवान उन्हें सृष्टि एवं प्रलय का कार्य करने हेतु अपनी शक्ति-विशेष से सम्पन्न करते हैं। अतः ये दोनों भगवान के गौण अवतार (शक्त्यावेश) हैं|

अर्थात् में विष्णु स्वयं भगवान हैं एवं रक्षण का कार्य करते हैं जबकि सृष्टि एवं प्रलय का कार्य भगवान ब्रह्मा एवं रूद्र के अन्तर्यामी होकर करते हैं।

भगवान का सर्व-शब्द-वाच्यत्व

वेदों में कई स्थलों पर प्राण, आकाश, महत, इन्द्र, प्रजापति आदि का जगद-कारणत्व कहा गया है।

महर्षि व्यास स्वयं ब्रह्म सूत्र में इन प्रमाणों का सामानाधिकरण्य करते हैं।

वेदों में प्राप्त होता है कि भगवान चित-अचित में अनुप्रवेश करके उनमें नाम और रूपों की सृष्टि करते हैं। वो सभी भगवान के शरीर होने से सभी नाम और रूप भगवान को संबोधित करते हैं।

अनेन जीवेनात्मना अनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि इति । – छान्दोग्योपनिषत् ६-३-२

इस प्रकार भगवान का सर्व-शब्द-वाच्यत्व है। सभी शब्दों के प्रधान वृत्ति में अर्थ भगवान ही हैं।

कई मतों का कहना कि वहाँ अनुप्रवेश भगवान का नहीं अपितु जीवात्मा का होता है। अतः ये सभी नाम रूप जीवात्मा के हैं।

किन्तु वेद कहते हैं ‘तत् सृष्ट्वा । तदेवानुप्राविशत् ॥‘ – (तैत्तिरीयोपनिषत् २-६-६)। सृष्टि करने वाले ने अनुप्रवेश किया है। जगद्व्यापारवर्जम् [वे.सू. ४.४.३३] सूत्र से कोई भी जीवात्मा जगत की सृष्टि नहीं कर सकता। अतः अनुप्रवेश भगवान का ही हुआ है।

अतः आकाश, प्राण, इन्द्र आदि शब्दों के अर्थ भगवान ही हैं। उन प्रमाणों में भगवान को ही जगत का कारण कहा गया है।

भेद-अभेद श्रुतियों का रामानुज-दर्शन में तात्पर्य

अब तक हम अचेतन और जीवात्म स्वरुप निरूपण पढ़ चुके हैं| इश्वर स्वरुप निरूपण में भगवान सर्व-शरीरक होना एवं इस विषय में श्रुति-स्मृति प्रमाण भी अध्ययन कर चुके हैं| अब आगे भेद-अभेद श्रुतियों रामानुज मत में किस प्रकार निर्वाह होता है, ये पढेंगे|

वेदों में भेद परक श्रुति भी प्राप्त होते हैं जो जीव और ब्रह्म के मध्य भेद बताते हैं और जीव-ब्रह्म के मध्य अभेद बताने वाले अभेद श्रुति भी प्राप्त होते हैं| भेद श्रुति के उदाहरण हैं:

क्षरं प्रधानममृताक्षरम हरः क्षरत्मानाविशते देव एकः।। (श्वेताश्वतर उप.१.८०).

नित्योऽनित्यानां चेतनश्चेतनानाम् एको बहूनां यो विदधाति कामान् ।। क.उ. २.२.१३| इत्यादि|

अभेद श्रुति के उदाहरण है:

अहं ब्रह्मास्मि – “मैं ब्रह्म हुँ” ( बृहदारण्यक उपनिषद १/४/१०)
तत्वमसि – “वह ब्रह्म तु है” ( छान्दोग्य उपनिषद ६/८/७)
अयम् आत्मा ब्रह्म – “यह आत्मा ब्रह्म है” ( माण्डूक्य उपनिषद १/२)
प्रज्ञानं ब्रह्म – “वह प्रज्ञानं ही ब्रह्म है” ( ऐतरेय उपनिषद १/२)
सर्वं खल्विदं ब्रह्मम् – “सर्वत्र ब्रह्म ही है” ( छान्दोग्य उपनिषद ३/१४/१

भेद एवं अभेद श्रुतियों का समानाधिकरण्य घटक श्रुतियों के आधार पर करते हैं| शरीर-आत्मा भाव, घटक श्रुति

समानाधिकरण्य का अर्थ है: भिन्न प्रवृत्ति शब्दानाम् एकस्मिन् अर्थे वृत्ति:| भिन्न प्रवृत्ति के श्रुति वाक्यों को एक अधिकरण देकर एक अर्थ में लाना, दोनों के परस्पर मतभेद को दूर करना समानाधिकरण्य है| घटक श्रुति चेतन और अचेतन समस्त को भगवान का शरीर बतलाता है|

यस्यात्मा शरीरं य आत्मानमन्तरो यमयति स त आत्मान्तर्याम्यमृतः – {शतपथब्राह्मणम् १४.६.७.[३०]}

इत्यादि प्रमाण हैं| चित और अचित सभी अवस्था में भगवान के शरीर होने के कारण सर्वदा चित और अचित को संबोधन भगवान का ही बोध कराते हैं|

शरीर-आत्मा का समानाधिकरण्य

लौकिक एवं वैदिक, दोनों व्यवहार में हम देखते हैं कि शरीर के प्रति किया गया सम्बोधन आत्मा का बोध कराता है| जैसे ‘वेदविद ब्राह्मण‘| यहाँ दोनों शब्द एक विभक्ति में प्रयुक्त हुए हैं| वेदविद आत्मा हैं| ब्राह्मण शरीर है| आत्मा का कोई वर्ण नहीं होता| किन्तु ‘वेदविद ब्राह्मण’ से शरीर को नहीं बल्कि शरीरक जीवात्मा को ही सम्बोधित किया जा रहा है| उसी प्रकार ‘राजा स्वर्गकाम:’ में राजा शरीर और स्वर्गकाम: आत्मा| किन्तु ‘स्वर्ग की इच्छा वाले राजा’ कहने से राजा शरीरक जीवात्मा को सम्बोधित किया जा रहा है| उसी प्रकार ‘पुत्र देखता है’ में पुत्र शरीर को सम्बोधन है जबकि देखना आत्मा का क्रिया है|

इन सभी उदाहरणों में हम देखते हैं कि शरीर को किया गया सम्बोधन वस्तुगत्या आत्मा को सम्बोधित करती है| ‘वेद जानने वाला ब्राह्मण’ का अर्थ है ‘ब्राह्मण शरीरक वेद जानने वाला जीवात्मा’| यहाँ शरीर-आत्म-भाव-समानाधिकरण्य है| इसी प्रकार अभेद श्रुतियों का निर्वाह करते हैं| शरीर वाचक शब्दों का शरीरि पर्यन्त अभिदेय करने में कोई विरोध नहीं है|

अपृथक-सिद्ध विशेषण

अपृथक-सिद्ध विशेषण को विशिष्ट वस्तु कहते हैं| अपृथक-सिद्ध अर्थात् जो कभी पृथक होकर न रहता हो| हमारा शरीर को एक जीवनकाल तक ही अपृथक होता है| यहाँ शरीर-आत्म सम्बन्ध कर्म सम्बन्ध से औपाधिक है| किन्तु समस्त चित-अचित का भगवान का शरीर होना निरुपाधिक है| समस्त चित-अचित वस्तुतः केवल भगवान के ही शरीर हैं| शरीर की परिभाषा हम ऊपर पढ़ चुके हैं| ‘दंडी पुरुष’ या ‘कुण्डली पुरुष’ सम्बोधन इस कारण होता है क्योंकि उस व्यक्ति से दण्ड या कुण्डल अपृथक रहता है| हमने उस व्यक्ति को जब भी देखा है, दण्ड या कुण्डल के साथ ही देखा है| दंडी या कुण्डली कहने से दण्ड धारण करने वाले व्यक्ति अर्थात् आत्मा का बोध हो रहा है| यही प्रकार-प्रकारी-भाव समानाधिकरण्य है|

अभेद श्रुतियों का अर्थ

‘तत्वमसि’ में तद सर्व कारण ब्रह्म है| त्वं जीवात्म-शरीरक ब्रह्म का वाच्य है| तदात्मकोसि, अर्थात तत् शब्द वाच्य जो परमात्मा है, वह सदा तुम्हारे अन्तर्यामी रूप से विराजते हैं।

‘अहम् ब्रह्मास्मि’ में अहं शब्द का अर्थ अहं वाच्य जीवात्मा के शरीरक परमात्मा है| ‘अहं ब्रह्मात्मको अस्मि’| अर्थात अहम् पदवाची जो जीव है, इसके भीतर अन्तर्यामी रूप से परमात्मा विराजते हैं।

सर्वं खल्विदं ब्रह्मम् :- इदं दृश्यमान सर्वं अपि ब्रह्म ब्रह्मात्मकमित्यत्यर्थः, याने जो कुछ यह दिखाई पड़ता है, इन सब के भीतर अन्तर्यामी रूप से परमात्मा विराजते हैं ।

रामानुज मत में सामानाधिकरण्य श्रुति-सम्मत है| अन्तर्यामी ब्राह्मण आदि वेद भागों में प्राप्त होने वाले घटक श्रुति के द्वारा ही भेद श्रुति एवं अभेद श्रुति का समानाधिकरण्य किया गया है| किन्तु अद्वैत मत में अनेक प्रकार के समानाधिकरण्य की वैरूप्य कल्पना की गयी है| जीव-ऐक्य में अभेद समानाधिकरण्य, जड़-ब्रह्म ऐक्य में बाधार्थ समानाधिकरण्य एवं कार्य-कारण अभेद में आरोपित-उपादान आदि धर्म समानाधिकरण्य | रामानुज मत में सर्वत्र अपृथक-सिद्ध विशेषण के सामानाधिकरण्य से समाधान हो जाता है और श्रुति-मर्यादा भी बनी रहती है|

जीवात्म-ऐक्य का खण्डन

आत्म-बहुत्व का विषय भी विवाद योग्य नहीं है। यदि जीवात्म-ऐक्य होता तो एक व्यक्ति के द्वारा अनुभव किया गया विषय दूसरों को भी अनुभव हो जाता। यदि किसी व्यक्ति को किसी काल में सुख-दुःख की प्राप्ति हुई है तो दूसरों को भी उसी काल में वही सुख-दुःख प्राप्त होना चाहिए।
किन्तु ऐसा नहीं होता है।

यदि ऐसा कहे कि अविद्या रूपी उपाधि के कारण जीवात्म-भेद है तो ऐसा कहना भी उचित नहीं है। वेदों ने मुक्ति की अवस्था में भी अनन्त जीवात्मा बताए हैं।
यथा- सदा पश्यन्ति सूरय:। (यहाँ बहुवचन का प्रयोग हुआ है।)

अब ग्रन्थकार कहते हैं कि ये उपाधि सभी जीवों के लिए एक ही हैं, या भिन्न? एक ही हैं ऐसा कहने से दोष आएगा। यदि भिन्न कहें तो ऐसा कहना कि कल जो तुम्हारे तुम्हारे द्वारा अनुभव किया गया था, आज मेरे द्वारा अनुभव किया गया। ये व्यवहार सम्भव नहीं होता।
श्रुत-प्रकाशिका में इसका विस्तृत खण्डन है।

अतः जीव तीन प्रकार के हैं। तीनों ही अनन्त हैं। भगवान के शेषभूत, शरीरभूत एवं उनके अधीन हैं। यह सिद्ध इस प्रकार सिद्ध हुआ।

इस विषय पर भाष्यकार स्वामी का भगवद गीता 2.12 पर भाष्य भी देखना चाहिए जहाँ भगवान स्वयं ही जीवात्म-भेद एवं जीव-ब्रह्म भेद को पारमार्थिक बताते हैं।

आचार्य पूछते हैं कि कृष्ण ज्ञानी हैं या नहीं? यदि नहीं तो गीता क्यों पढ़ते हो? यदि हाँ तो भगवान स्वयं तत्त्व-ज्ञान के काल में भेद का ज्ञान क्यों दे रहे हैं?

यदि ऐसा कहे कि ज्ञानी को भी भेद का दर्शन होना बाधित-अनुवृत्ति है, जैसे वस्त्र के जल जाने पर भी वो कुछ काल तक वस्त्र जैसा ही दिखता है। तो भी यह समझना चाहिए कि ज्ञानी को भी मिथ्या के दर्शन तो होते हैं जैसे रेगिस्तान में जल का दिखना। किन्तु ज्ञानी उस भ्रम से प्यास बुझाने का व्यवहार तो नहीं करते।
यदि कृष्ण को भेद के दर्शन हो भी रहे हैं तो इसका उपदेश अर्जुन को क्यों करते?

यदि अर्जुन और कृष्ण एक ही है और अर्जुन का भिन्न रूप में अस्तित्व भ्रम मात्र है तो भी ज्ञानी कृष्ण उसे उपदेश क्यों कर रहे हैं? कोई अपनी ही छाया से बात करता है क्या?

सत्-ख्याति : जगत सत्यत्वम्

श्रीमते रामानुजाय नमः।

यथार्थं सर्व विज्ञानम्। विशिष्टाद्वैत में सभी ज्ञान सत्य हैं|

शुक्तिका में रजत का आभास, रेगिस्तान में जल का आभास आदि भ्रम और स्वप्न में तात्कालिक पदार्थों का अनुभव भी सत्य है, असत्य नहीं। रज्जु में सर्प या खम्भे में पुरूष का भ्रम भी सत्य है।

इसकी व्याख्या यहाँ की गई है|

श्री वैष्णव सम्प्रदाय में ‘सत्-ख्याति’ का सिद्धान्त है। “यथार्थं सर्व विज्ञानम्”। अर्थात सभी ज्ञान सत्य हैं। जगत सम्पूर्ण रूप से सत्य है क्योंकि ज्ञान के सभी विषय से सत्य है।

बौद्ध मत में असत-ख्याति है अर्थात शून्यवाद। योगाचार बौद्धों में ज्ञान-ख्याति है, अर्थात जगत ज्ञान मात्र है। अद्वैत मत के ज्ञानवाद बौद्ध दर्शन के समान होने कारण उसे प्रच्छन्न बौद्ध भी कहते हैं। अद्वैत मत ‘अनिर्वचनीय ख्याति’ है। सत् अपि न, असत् अपि न। जगत का पारमार्थिक दृष्टि से अस्तित्व ही नहीं है, इसलिए सत् नहीं कह सकते। जगत का व्यवहार होता है, इस करण असत् भी नहीं कह सकते।

विशिष्टाद्वैत में ‘पंचीकरण’ के सिद्धान्त से भ्रम भी सत्य हैं। पंचीकरण

रेगिस्तान में जल का भ्रम होना भी सत्य है क्योंकि पृथ्वी तत्त्व में जल तत्त्व भी पंचीकरण की प्रक्रिया से विद्यमान है। पूर्व में हम पंचीकरण पढ़ चुके हैं। पंचीकरण

यदि जल विद्यमान है तो उसका व्यवहार क्यों नहीं होता?
क्योंकि जल अति अल्प मात्रा में विद्यमान है। इस कारण उससे प्यास नहीं बुझा सकते।

शुक्तिका (sea shell) में रजत का भ्रम होता है। शुक्तिका तो पृथ्वी तत्त्व है और रजत अग्नि/तेज तत्त्व। पृथ्वी में अग्नि तत्त्व होने के कारण ये भ्रम भी सत्य ही है। यदि सत्य है तो हमेशा ये भ्रम क्यों नहीं होता? प्रकाश के reflections आदि उपाधि के कारण ये भ्रम उत्पन्न हुआ है। उपाधि न होने से भ्रम नहीं होता|

रज्जु में सर्प का भ्रम

अँधेरे में रज्जु (रस्सी) में सर्प का भ्रम होता है। यहां समझने की बात यह है कि रज्जु में सर्प का ही भ्रम क्यों हुआ? हाथी का क्यों नहीं? अश्व का क्यों नहीं? और सर्प भी क्या रेंगता हुआ या फण उठाये भ्रम हुआ?

नहीं।

रज्जु में सर्प का भ्रम इस कारण क्योंकि रज्जु और सर्प के कुछ विशेषण एक समान हैं। दोनों एक आकार के हैं। अन्धकार की उपाधि के कारण रज्जु के वो विशेषण तो ग्रहण हुए जो सर्प के समान हैं किन्तु उन विशेषणों का ग्रहण नहीं हुआ जो सर्प से भिन्न है। इस कारण व्यक्ति को वहाँ सर्प का भ्रम हुआ।

किन्तु जो ज्ञान ग्रहण हुआ है, वो तो सत्य ही है। कुछ ज्ञान ग्रहण नहीं हुआ है (रज्जू का वह विशेषण जो सर्प से भिन्न है, वो ग्रहण नहीं हुआ), अर्थात अख्याति है। कुछ ज्ञान ग्रहण हुए हैं, जो सर्प के समान हैं, इस कारण सर्प का भ्रम हुआ है।

किन्तु ज्ञान का विषय तो सत्य ही है, असत्य नहीं।

उसी प्रकार रेगिस्तान में जल का ज्ञान भी भ्रम है किन्तु सत्य ज्ञान है। उपाधि के कारण केवल जल ही दिखा, पृथ्वी नहीं। किन्तु, जो दिखा वो सत्य ज्ञान ही है।

इस कारण भ्रम भी यथार्थ ज्ञान है किन्तु व्यवहारानुगुण नहीं है।

इसी प्रकार स्तम्भ (खम्भे) में पुरुष का भ्रम होना सत्य है क्योंकि खम्भा की आकृति पुरुष के समान है।

यदि असत्य ज्ञान ही होना था तो खम्भा में सर्प का भ्रम हो जाता, या रज्जु में पुरुष का भ्रम हो जाता। किन्तु ऐसा तो किसी को नहीं अनुभव होता|

धर्मभूत ज्ञान

हम पूर्व में पढ़ चुके हैं कि जीवात्मा ज्ञान-स्वरुप भी है और ज्ञानाश्रय भी| जीवात्मा ज्ञान का आश्रय/अधिकरण है, इस ज्ञान को धर्मभूत ज्ञान कहते हैं|भूत अर्थात जीवात्मा| धर्म अर्थात गुण| स्वरुप ज्ञान को धर्मि ज्ञान भी कहते हैं| धर्मि अर्थात जिसमें धर्म/गुण हो| वस्तु-स्वरुप कहने का अर्थ है, वो वस्तु स्वयं| जीव-स्वरुप का अर्थ है जीवात्मा स्वयं| जीवात्मा ज्ञान-स्वरुप है अर्थात् जीवात्मा स्वयं ज्ञान है| स्वरुप ज्ञान अर्थात स्वयं जीवात्मा| इस धर्मि जीवात्मा का धर्म की तरह है धर्मभूत ज्ञान|

स्वरुप ज्ञान की ही तरह धर्मभूत ज्ञान भी स्वरुप से नित्य है| अर्थात नष्ट नहीं होता| धर्मभूत ज्ञान के स्वरुप में कोई विकार नहीं होता किन्तु उसका संकुचन और विस्तार होता है| धर्मभूत ज्ञान स्वयं-प्रकाश (ज्ञानस्वरूप) द्रव्य है, यह हम पूर्व में पढ़ चुके हैं| अब प्रश्न यह है यदि धर्मभूत ज्ञान स्वयंप्रकाश है तो उसका ज्ञान हमें स्वयं ही क्यों नहीं होता? वो इन्द्रियों के द्वार पर क्यों निर्भर है?

“आत्मा मनसा संयुज्यते , मन इन्द्रियेण , इन्द्रियमर्थेन ततो ज्ञानम् ” ।

उत्तर यह है कि बद्ध जीवों का कर्म के वश होने के कारण उनका ज्ञान संकुचित होता है| अचित शरीर उनके ज्ञान के स्वयं-प्रकाशत्व को आवरण करता है| हमारे इन्द्रियों की क्षमता के अनुसार ही ज्ञान का प्रसार हो पाता है| मुक्त एवं नित्य जीवात्माओं का ज्ञान इन्द्रियों के द्वार से संकुचित नहीं है| उनके ज्ञान का सर्वत्र प्रसार होने के कारण यह नियम नहीं है कि आँखों से ही देखेंगे या कानों से ही शब्द को ग्रहण करेंगे| उनका चित ज्ञानमय शरीर धर्मभूत ज्ञान को सीमित नहीं करता|

सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न आदि ज्ञान की ही विशेष अवस्थाएं हैं| अनुकूल ज्ञान सुख है और प्रतिकूल ज्ञान दुःख| उसी प्रकार ज्ञान ही एक अवस्था में प्रेम, द्वेष, इच्छा आदि बन जाता है| प्रयत्न साक्षात् तो ज्ञान की अवस्था नहीं है किन्तु चिकीर्षा रूपी ज्ञान का ही परिणाम है|

स्वरुप-ज्ञान और धर्मभूत ज्ञान भिन्न द्रव्य नहीं हैं| दोनों ही ज्ञान द्रव्य हैं|

कुछ लोग स्वरुप ज्ञान और धर्म ज्ञान को भिन्न-भिन्न पदार्थ मानते हैं किन्तु ऐसा मानने का कोई प्रमाण नहीं है| जिस प्रकार सूर्य स्वयं प्रभा का घनीभूत है और उसके किरण भी प्रभा हैं, किन्तु दोनों में भेद है| प्रभा सूर्य पर आश्रित है| उसी प्रकार दोनों ही ज्ञान द्रव्य ही हैं किन्तु धर्म ज्ञान स्वरुप ज्ञान से ही निकलता है एवं उसी पर आश्रित होता है| जैसे किरणें भी अग्नि द्रव्य हैं और दीपक भी अग्नि द्रव्य है, उसी प्रकार दोनों ही ज्ञान द्रव्य ही हैं| दोनों भिन्न पदार्थ नहीं हैं

कुछ लोगों के मत में धर्मभूत ज्ञान द्रव्य नहीं हो सकता, क्योंकि यह जीवात्मा का गुण है। पूर्व में हमने पढ़ा था कि पदार्थ के दो भेद हैं: द्रव्य और अद्रव्य (गुण)। जो गुण है वो द्रव्य कैसे हो सकता है। किन्तु “ज्ञान” एकमात्र द्रव्य है, जो गुण भी है। प्रभा (किरण) की भाँति। प्रभा तेजस द्रव्य भी है और दीपक पर आश्रित भी।

ज्ञान द्रव्य भी है और गुण भी

न्याय में द्रव्य उसे कहते हैं जो गुण या क्रिया का आश्रय हो। ज्ञान क्रिया का आश्रय है क्योंकि इसमें संकोच और विस्तार होता है। मूर्च्छा की अवस्था में शून्य होता है तो मुक्ति की अवस्था में अनन्त। ज्ञान में संयोग, वियोग आदि गुण भी हैं। इस कारण ज्ञान का द्रव्यत्व सिद्ध होता है।

ज्ञान को गुण इसलिए कहना उचित है क्योंकि रूप, रस, गन्ध आदि की तरह ही यह अपने (धार्मि) जीवात्मा से स्वतन्त्र नहीं रहता, अर्थात धर्मि पर ही आश्रित मिलता है।
स्वतन्त्र द्रव्य कहना इसलिए उचित है क्योंकि जहाँ जीव नहीं है, वहाँ भी धर्मभूत ज्ञान होता है। जैसे मुक्त जीवों का ज्ञान विभू होता है।

ज्ञान के करण

ज्ञान के कारण तीन हैं: प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम। प्रत्यक्ष द्वारा जनित ज्ञान अनुभव है। प्रत्यक्ष अनुभव से मन में जो संस्कार जमा होता है, उससे बाद में जनित ज्ञान को स्मृति कहते हैं। इसलिए स्मृति भी प्रत्यक्ष ज्ञान ही है।