श्रृष्टि स्थिति संहार

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श्रृष्टि

 असत-कार्य वाद: श्रृष्टि के मूल में कोई जीवित कारण नहीं है। प्रकृति यानि अचित तत्त्व से चेतन का उद्भव होता है।

सत-कार्य वाद: हर श्रृष्टि के मूल में कोई जीवित कारण अवश्य होता है। आधुनिक विज्ञान और वेदान्त दर्शन, दोनों ही सत-कार्यवाद ही मानते हैं। विज्ञान के अनुसार सूक्ष्म से स्थूल का उद्भव होता है। वेदांत दर्शन के अनुसार स्थूल (ब्रह्म) से सूक्ष्म (जीवात्मा) की श्रृष्टि होती है। इस जगत के आदि कारण , जगत-कारण (कारणस्य करणं) भगवान श्रीमन नारायण को ही ‘ब्रह्म’, ‘परमात्मा’ और ‘भगवान’ से संबोधित किया गया है। ब्रह्म का अर्थ है बृहद, विशाल। वेदों का उपदेश है:- “कारणं तु ध्येय”। जगत-कारणत्वं ब्रह्म का ध्यान करो।

श्रृष्टि का अर्थ है:

  • सूक्ष्म पदार्थों का सकल पदार्थों में परिवर्तन। श्रृष्टि से पहले सबकुछ निराकार, नामविहीन होता है।
  • जीवात्माओं को देह और इन्द्रियाँ प्रदान करना
  • जीवात्मा के ज्ञान (धर्मभूत ज्ञान) का विस्तार करना

उदाहरण:

एक मिट्टी के बर्तन के श्रृष्टि में तीन कारणों का होना आवश्यक है:

  1. मिट्टी: मिट्टी के स्वरुप परिवर्तन से ही बर्तन का निर्माण होता है। क्या बर्तन मिट्टी से अलग है? नहीं, बल्कि बर्तन तो मिट्टी का ही परिवर्तित स्वरुप है। इसे ही उपादान कारण कहते हैं।
  2. कुम्हार: अब, खुद के द्वारा मिट्टी एक बर्तन में बदल नहीं सकता। कुम्हार मिट्टी को एक बर्तन में बदलता है तो, बनाने में बर्तन, कुम्हार भी मिट्टी की तरह कारण है। कुम्हार बर्तन के श्रृष्टि में निमित्त कारण है। निमित्त कारण का स्वरुप-परिवर्तन नहीं होता। वह श्रृष्टि की प्रक्रिया का नियंत्रक होता है।
  3. चक्का: अब, केवल मिट्टी के साथ, कुम्हार मटका नहीं बना सकता है, उसे लकड़ी के पहिये और कुछ अन्य की आवश्यकता होती है। पहिया बर्तन के श्रृष्टि में सहायक है। इसे सहकारी कारण कहते हैं।

एक अन्य उदाहरण लेते हैं। कपड़े के निर्माण में धागा उपादान कारण है, बुनकर निमित्त कारण और मशीन सहकारी कारण? बिना इन तीन कारणों जब किसी सांसारिक वस्तु की श्रृष्टि संभव नहीं है तो फिर इस ब्रह्माण्ड या भौतिक जगत की श्रृष्टि इन तीन कारणों क बिना कैसे संभव है? इस ब्रह्माण्ड की श्रृष्टि में उपादान कारण, निमित्त कारण और सहकारी कौन-कौन हैं? ब्रह्म ही सृष्टि का उपादान कारण, निमित्त कारण और सहकारी कारण है।

  1. उपादान कारण: ब्रह्म ही इस जगत की श्रृष्टि में उपादान कारण है।

एको अहम् बहु श्याम

उपादान कारण तो परिवर्तित होता है, फिर ‘निर्विकार’ भगवान उपादान कारण कैसे हो सकते हैं। यहाँ भी शरीर-आत्मा भाव है। शरीर-आत्मा भाव, घटक श्रुति

चेतन-अचेतन विशिष्ट ब्रह्म, उपादान कारणं।

पूर्व में चर्चा हो चुकी है कि चेतन (आत्मा) और अचेतन (जड़) ब्रह्म के शरीर हैं और ब्रह्म समस्त चेतन और अचेतन के अन्तर्यामी आत्मा। ब्रह्म चेतन और अचेतन से विशिष्ट है, चेतन और अचेतन उसके विशेषण हैं। प्रलय-काल में समस्त चेतन और अचेतन सूक्ष्म रूप में होते हैं। उस वक्त चेतन आत्मा भी अचेतन की भाँती ज्ञानहीन और चेतनाहीन होता है। जीव की इस अवस्था को देख दया के अपार सागर भगवान द्रवित होकर श्रृष्टि करते हैं, जगत का निर्माण करते हैं। सूक्ष्म रूप में स्थित आत्मा को भगवान कर्म-योग्य शरीर और मन-बुद्धि देकर, इस जन्म-मृत्यु, सूक्ष्म-स्थूल और श्रृष्टि-प्रलय के चक्र से मुक्त होकर नित्य वैकुण्ठ जाने का अवसर देते हैं। श्रृष्टि करने के पीछे भगवान की यह आशा होती है कि हम अपने स्वरुप को पहचाने और भगवान की शरणागति कर इस संसार-सागर के परे भगवान के नित्य धाम जाने को तत्पर हों।

सूक्ष्म चेतन अचेतन वस्तु विशिष्ट ब्रह्म जगत-करणं।

स्थूल चेतन अचेतन वस्तु विशिष्ट ब्रह्म जगतकारी।।

वास्तव में सूक्ष्म रूप में स्थित चेतन और अचेतन ही उपादान कारण हैं। ब्रह्म चेतन और अचेतन के अंतरात्मा हैं और दोनों के धारक और पालक हैं, इसलिए वेदान्त ने ब्रह्म को ही उपादान कारण कहा है।

2.निमित्त कारण:

संकल्प विशिष्ट ब्रह्म एव निमित्त कारणं

भगवान अपने संकल्प-शक्ति मात्र से जगत की सृष्टि करते हैं, इसलिए भगवान निमित्त कारण हैं। निमित्त कारण का ज्ञानमय होना आवश्यक है। यदि निमित्त कारण ज्ञानमय न होगा तो श्रृष्टि कैसे करेगा। प्रकृत्ति निमित्त कारण नहीं हो सकती क्योंकि वह ज्ञानहीन है। इसलिए यह सिद्धांत कि प्रकृत्ति ही जगत-कारणत्वं है, गलत सिद्ध होता है। (अभिन्न निमित्तोपादान कारणं ब्रह्म

3.सहकारी कारण:

ज्ञान शक्ति विशिष्ट ब्रह्म एव सहकारी कारणं

ब्रह्म का ज्ञान, शक्ति और बल ही सहकारी कारण है। जो गुणरहित हो वो जगत-कारणत्वं कैसे हो सकता है? इसलिए ब्रह्म का निर्गुण होना गलत सिद्ध होता है। निर्गुण शब्द का अर्थ समस्त दूषणों से हीन होना है। अखिल हेय प्रत्यनिक

 

श्रृष्टि की प्रक्रिया

जगत प्रलय के काल में सूक्ष्म अवस्था में होता है। सूक्ष्म अचित तत्त्व से ‘मूल प्रकृति’; मूल प्रकृति से ‘महान’ और फिर उससे ‘अहंकार तत्त्व’ का उदय होता है। यह अहंकार तत्त्व, गुण रूपी अहंकार से अलग है। अहंकार  से कई तत्त्वों का सृजन होता है।

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कुल २४ अचेतन तत्त्व हैं (मूल प्रकृति, महान, अहंकार, मन, ५ कर्मेन्द्रियाँ, ५ ज्ञानेन्द्रियाँ, पंचभूत और पञ्च-तन्मात्र)। आत्मा २५ वाँ तत्त्व है और २६ वाँ तत्त्व ईश्वर हैं। पञ्च-तन्मात्र पंचभूत (सकल तत्वों) की सूक्ष्म अवस्था है।

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समष्टि श्रृष्टि (अद्वारक श्रृष्टि):

पञ्च-भूतों तक की श्रृष्टि भगवान स्वयं करते हैं।

व्यष्टि श्रृष्टि (सद्वारक श्रृष्टि)

अंडकटाकाओं के बाद की श्रृष्टि भगवान अन्तर्यामी होकर करते हैं।  यह कार्य भगवान ब्रह्मा, प्रजापतियों और काल के अन्तःमन में विराजकर करते हैं। हर अंडकटाका के एक ब्रह्मा होते हैं।

पंचीकरणं

पञ्चीकरणं उस प्रक्रिया का नाम है जब भगवान भिन्न-भिन्न तत्त्वों का मिश्रण कर प्राकृत संसार का निर्माण करते हैं।

आकाशात वायु: वायोर अग्निः

आकाश से वायु , वायु से अग्नि, अग्नि से भूमि और भूमि से आपः (जल) का निर्माण होता है। यहाँ भी शरीर-आत्मा भाव है। वास्तव में भगवान स्वयं ही पञ्च-भूतों का निर्माण करते हैं।

भगवान एक तत्त्व को दो भागों में बाटते हैं और तत्पश्चात प्रत्येक भाग को ४ भागों में। उस १/८ भाग का मिश्रण दूसरे तत्त्व के साथ करते हैं। इसी प्रकार, हर तत्त्व का एक दूसरे से मिश्रण कर प्राकृत संसार का निर्माण होता है।

  आकाश वायु अग्नि जल भूमि
आकाश १/२ (५०%) १/८ (१२.५%) १/८ (१२.५%) १/८ (१२.५%) १/८ (१२.५%)
वायु १/८ (१२.५%) १/२ (५०%) १/८ (१२.५%) १/८ (१२.५%) १/८ (१२.५%)
अग्नि १/८ (१२.५%) १/८ (१२.५%) १/२ (५०%) १/८ (१२.५%) १/८ (१२.५%)
जल १/८ (१२.५%) १/८ (१२.५%) १/८ (१२.५%) १/२ (५०%) १/८ (१२.५%)
भूमि १/८ (१२.५%) १/८ (१२.५%) १/८ (१२.५%) १/८ (१२.५%) १/२ (५०%)

 

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भगवान हर अंडकटाका १४ लोकों का निर्माण करते हैं। सत्यलोक (ब्रह्मलोक) में भगवान एक पुण्यात्मा को ब्रह्मा का पद देते हैं। इसके बाद की श्रृष्टि का भार ब्रह्मा पे होता है। ब्रह्मा संहार के कार्य के लिये रूद्र की उत्पत्ति करते हैं। संसार के पालन हेतु भगवान नारायण स्वयं विष्णु के रूप में ब्रह्मा और रूद्र के बीच अवतार लेते हैं। इसके बाद ब्रह्मा मनु आदि जीवों का निर्माण करते हैं।

 

स्थिति (रक्षण-पोषण)

जिस प्रकार जल उपज का पोषण करता है उसी प्रकार करता है, उसी प्रकार भगवान अपने जीवात्माओं का पोषण-पालन करते हैं:

  • श्री विष्णु इस संसार में श्रीमन नारायण के प्रथम अवतार हैं।
  • भगवान हंस अवतार लेकर ब्रह्मा को वेदों का ज्ञान देते हैं और हयग्रीव अवतार लेकर वेदों की रक्षा करते हैं।
  • मनु और ऋषियों के द्वारा शास्त्र को स्थापित करते हैं।
  • स्वयं मृत्यु-लोक में अवतार लेकर जीवात्माओं को प्रशिक्षित करने हेतु विभिन्न लीलाएं करते हैं और गीता आदि शास्त्रों का उपदेश देते हैं।
  • धर्म और सत्य के मार्ग पर जीवात्माओं का मार्गदर्शन करने हेतु सभी प्राणियों और काल में अन्तर्यामी परमात्मा के रूप में रहते हैं।

जीवात्मा की आयु १०० वर्ष है। हमारा उत्तरायण देवताओं के लिये दिन और दक्षिणायन रात होता है। इस प्रकार हमारे एक वर्ष का देवताओं का एक दिन होता है। १२००० देव-वर्षों का एक चतुर्युग (एक युग-चक्र)। १००० चतुर्युगों का ब्रह्मा का एक दिन होता है और इतने ही समय की रात्रि। ब्रह्मा के रात्रि-काल में नैमित्यिक प्रलय (अवांतर प्रलय) होता है। ब्रह्मा के एक दिन (कल्प) में १४ मनु होते हैं। हर मनु की आयु ७१ चतुर्युगों की होती है। अभी हमलोग ब्रह्मा के द्वितीय परार्ध (दूसरा ५० वर्ष) में श्वेत-वाराह कल्प में वैवश्वत मन्वंतर के २८वें चतुर्युग के कलियुग में हैं। (द्वितीय परार्धे, श्वेतवाराह कल्पे, वैवश्वत मन्वंतरे, अष्टाविंशतितमे, कलियुगे)   ब्रह्मा के १०० वर्ष होने पर प्राकृत प्रलय होता है और सारी श्रृष्टि पुनः श्रीमन नारायण में समाहित हो जाती है। हर चतुर्युग में भगवान के अवतार होते हैं, यद्यपि उनके क्रम बदलते रहते हैं।

संहार (प्रलय)

संहार का अर्थ है जीवात्माओं को सूक्ष्म स्थिति में वापस खींचना ताकि लौकिक आकांक्षाओं के प्रति उनका आकर्षण काम हो। जैसे उद्दंड पुत्र को उसके हितार्थ पिता कुछ समय के लिये बंदी बनाकर रखते हैं। रूद्र, अग्नि, काल और अन्तर्यामी भगवान संघार को संचालित करते हैं।

प्रलय ४ प्रकार के होते हैं:

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  1. नित्य प्रलय: मनुष्य की आयु १०० वर्षों की है, उसके बाद उसे शरीर बदलना होता है।
  2. नैमित्यिक प्रलय: ब्रह्मा के १ दिन पूर्ण होने पर रूद्र ३ लोकों (भू:, भुवः, स्वः) को प्रलय जल में डुबो देते हैं। ब्रह्मा की रात्रि के पश्चात जब पुनः दिन आता है तो ब्रह्मा फिर से श्रृष्टि की प्रक्रिया शुरू करते हैं।
  3. आत्यातिक प्रलय: जीवात्मा लीला विभूति को त्यागकर नित्य विभूति को जाता है और फिर कभी वापस लौट कर नहीं आता।
  4. प्राकृत प्रलय: ब्रह्मा की आयु पूर्ण होने पर रूद्र समस्त लोकों का विनाश कर देते हैं और स्वयं ब्रह्मा में समा जाते हैं। सारे ब्रह्मा और समस्त लीला विभूति एक बार फिर से भगवान श्रीमन नारायण में समा जाते हैं।

 

श्रृष्टि स्थिति संहार का उद्देश्य

भगवान के लिये श्रृष्टि, स्थिति और संहार लीला मात्र है पर जीवात्मा के लिये यह कर्म-बंधन से मुक्त होने का मौका है। हम सभी अनादि काल से मृत्यु-लोक में अपने शुभ-अशुभ कर्मों का फल भोग रहे हैं। शुभ कर्मों के फलस्वरूप हमें सुख की प्राप्ति होती है और अशुभ कर्मों के फलस्वरूप दुःख की। इस तरह से शुभ (पुण्य) और अशुभ (पाप), दोनों ही प्रकार के कर्म हमें संसार में बंधने वाले हैं। हमारे कर्मों का अनंत कोष ‘संचित कर्म’ कहलाता है। उस संचित का वो भाग जो हमें इस जन्म में भोगना होता है, वो ‘प्रारब्ध कर्म’ कहलाता है। एक ‘कर्म योगी’ हमेशा पाप-कर्मों से दूर रहता है और पुण्य कर्मों को भगवान की सेवा के रूप में करता है एवं उसका फल भगवान को समर्पित करके ही उपभोग करता है।

अगर हम श्रृष्टि का उद्देश्य न समझें तो श्रृष्टि निरर्थक हो जायेगा पर निर्हेतुक कृपा के स्वामी भगवान प्रलय के पश्चात फिर से श्रृष्टि करते हैं। यह प्रक्रिया अनंत काल से जारी है।

श्रृष्टि और प्रलय, दोनों ही अवस्था में हम भगवान के अभिन्न अंश हैं। पूर्वाचार्यों ने ये बात विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से समझाया है:

१) नृत्य करता हुआ मोर:  जिस प्रकार मोर बादल को देख प्रसन्नचित्त होकर नृत्य करता है, उसी प्रकार भगवान भी हमारी माता महालक्ष्मी को देखकर प्रसन्न होते हैं और श्रृष्टि करते हैं। समझने हेतु अगर हम मोर को ब्रह्म, पंख को अचित और मोर की आँखों को चित (आत्मा) मान लें तो मोर का पंख फैलाकर नृत्य करना श्रृष्टि है और पंखों को समेट लेना ही संहार। दोनों ही स्थति में चित, अचित ब्रह्म से अभिन्न होते हैं। क्या पंख और मोर एक ही हैं? नहीं। क्या मोर पंख से भिन्न है? नहीं। उसी प्रकार चित और अचित भी ब्रह्म नहीं हैं पर ब्रह्म के अभिन्न अंश हैं।

२) समुद्र की लहरें: जिस प्रकार वायु के कारण समुद्र में लहरों का निर्माण होता है, उसी प्रकार भगवान के संकल्प शक्ति मात्र से संसार की श्रृष्टि होती है। अगर लहरों को चित, अचित  और समुद्र को ब्रह्ममान लें तो श्रृष्टि को संहार की प्रक्रिया स्पष्ट समझ आती है।

३) मकड़ी का जाल: इस उदाहरण में मकड़ी ब्रह्म है और जाल चित, अचित। जिस प्रकार मकड़ी जाल को फैलाती है और अंततः वापस अपने अन्दर खींच लेती है, उसी प्रकार भगवान भी चित, अचित को नाम, रूप आदि देकर इस संसार की श्रृष्टि करते हैं और प्रलय-काल में सारे चित,अचित भगवान में ही समा जाते हैं।

शरीर-आत्मा भाव, घटक श्रुति

प्रधान-प्रतितंत्र

शरीर-आत्मा भाव

वेदों को ‘अपौरुषेय, नित्य, शाश्वत और निराकार’कहा गया है। वेद भगवान के स्वांस हैं। वेद-व्यास स्वयं भगवान के ‘ज्ञान-शक्ति’ अवतार कहे जाते हैं, जिन्होंने वेदों को ४ भागों में विभाजित किया और तदन्तर प्रत्येक वेदों को ४ उप-भागों में:

  1. मंत्र संहिता (उपासना, यज्ञ और कर्म-कांड के मंत्र)
  2. ब्राह्मणम् (यज्ञों और कर्मकांडों की विस्तृत विधि)
  3. अरण्यक (संहिताओं और ब्राह्मणों के ऊपर टीका)
  4. उपनिषद या वेदांत (ब्रह्म-कांड)

हमारे यहाँ 3 नास्तिक (अवैदिक) और 6 आस्तिक (वैदिक) दर्शन हैं:

नास्तिक दर्शन

(१) चार्वाक  (२) बौद्ध  (३) जैन

आस्तिक (वैदिक दर्शन)

(१) न्याय (गौतम)

(२) वैशेषिक (कणाद)

(३) सांख्य (कपिल)

(४) योग (पतंजलि)

(५) पूर्व-मीमान्षा (जैमिनी)

(६) उत्तर-मीमान्षा (बादरायण)

मीमान्षा दर्शन

मीमान्षा का अर्थ है वैदिक आदेशों की पड़ताल और व्याख्या। मीमान्षा में कुल २० अध्याय हैं, जिनमें आखिरी के ४ अध्याय को ज्ञान-कांड या ब्रह्म-काण्ड कहा गया है, जिनमें विशुद्ध दर्शन है। अराधना किसकी की जाए, इसका उत्तर उत्तर-मीमान्षा में है जबकी अराधना कैसे की जाए, इसका उत्तर पूर्व-मीमान्षा में है। भगवान वेद-व्यास (बादरायण) ने वेदांत-दर्शन के सार-स्वरुप ‘ब्रह्म-सूत्र’ की रचना की।

अद्वैत दर्शन (शंकराचार्य)

  1. ब्रह्म निर्गुण है
  2. ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या, जीवा ब्रह्म एव ना परः
  3. ज्ञान ही मुक्ति का एक मात्र मार्ग है
  4. उपाधि या अविद्या के कारण जीव अपने को ब्रह्म का अंश मानता है पर उपाधि के नष्ट होने पर जीव ब्रह्म ही हो जाता है।Vi chu

विशिष्टाद्वैत दर्शन

  • ब्रह्म निर्गुण नहीं अपितु अनंत कल्याण गुणों से विशिष्ट है (अनंत कल्याण गुणाकार)। निर्गुण, निरंजन शब्द का अर्थ ब्रह्म का दोष-रहित होना है (अखिल हेय प्रत्यनिक)।
  • ब्रह्म द्वारा निर्मित होने के कारण जगत मिथ्या नहीं अपितु सत्य है। ब्रह्म, जीवात्मा और माया (तत्त्व-त्रय); तीनों ही सत्य और नित्य हैं।
  • जीव अणु और ब्रह्म का शाश्वत अंश है। आत्मा और प्रकृति, ब्रह्म से अपृथक और ब्रह्म के विशेषण हैं (अपृथक सिद्धि विशेषण) जैसे धोती से उसकी सफेदी। ब्रह्म चेतन आत्मा और अचेतन प्रकृति से विशिष्ट है। यह विशिष्ट ब्रह्म से पृथक कोई तत्त्व नहीं है। यही विशिष्टाद्वैत (विशिष्ट अद्वैत, विशिष्टयो: अद्वैतं)है।
  • भक्ति या शरणागति ही मुक्ति का सर्वोत्तम मार्ग है।
  • मुक्ति के बाद भी जीव ब्रह्म नहीं हो सकता। ज्ञान और आनंद में जीवात्मा ब्रह्म के बराबर हो जाता है। जीवात्मा मुक्ति के बाद नित्य वैकुण्ठ लोक में ब्रह्म की सेवा करता है।

रामानुजाचार्य स्वामीजी के लिये सबसे बड़ी चुनौती शास्त्र के उन वाक्यांशों का विवेचन करना था जो जीव और ब्रह्म की एकता प्रतिपादित करते हैं। रामानुज स्वामीजी ने बोधायन-वृत्ति और सठकोप सूरी आलवार के सिद्धांतों के अनुसार “शरीर-आत्मा भाव”, “कार्य-कारण भाव”, “प्राकार-प्राकारी भाव” और “अपृथक सिद्धि विशेषण” के जरिये भेद श्रुति एवं अभेद श्रुती; जो परस्पर विरोधाभासी प्रतीत होते थे, उनका सामंजस्य किया।

अभेद श्रुति

अभेद श्रुति वेदों के वो मंत्र हैं जो जीव और ब्रह्म की एकता प्रतिपादित करते हैं।

  1. अहं ब्रह्मास्मि – “मैं ब्रह्म हुँ” ( बृहदारण्यक उपनिषद १/४/१०)
  2. तत्वमसि – “वह ब्रह्म तु है” ( छान्दोग्य उपनिषद ६/८/७)
  3. अयम् आत्मा ब्रह्म – “यह आत्मा ब्रह्म है” ( माण्डूक्य उपनिषद १/२)
  4. प्रज्ञानं ब्रह्म – “वह प्रज्ञानं ही ब्रह्म है” ( ऐतरेय उपनिषद १/२)
  5. सर्वं खल्विदं ब्रह्मम् – “सर्वत्र ब्रह्म ही है” ( छान्दोग्य उपनिषद ३/१४/१)

भेद श्रुति

भेद श्रुति जीव और ब्रह्म के मध्य भेद तो स्थापित करते हैं।

  1. नित्योऽनित्यानां चेतनश्चेतनानाम् एको बहूनां यो विदधाति कामान् ।। क.उ. २.२.१३; श्वे.उ. ६.१३

नित्य चेतन सर्वशक्तिमान् सर्वाधार परमात्मा अकेले ही बहुतसे नित्य चेतन जीवात्माओंके कर्मफलभोगोंका विधान करते हैं

  1. भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वासर्वं प्रोक्तं त्रिविधं ब्रह्ममेतत् ॥ श्वेताश्वतर उप.१.१२

मनुष्य भोक्ता (जीवात्मा), भोग्य (प्रकृति) और इन दोनोंके प्रेरक (ईश्वर) को जानकर सब कुछ जान लेता है। फिर कुछ भी जानना शेष नहीं रहता। प्रकृति, आत्मा और उन दोनोंके आधार तथा नियामक परमात्मा — ये तीनों ब्रह्मके ही रूप हैं।

  1. क्षरं प्रधानममृताक्षरम हरः क्षरत्मानाविशते देव एकः।। (श्वेताश्वतर उप.१.८०)

प्रधान यानि प्रकृति का नाम क्षर है और उसके भोक्ता अविनासी आत्मा का नाम अक्षर है। प्रकृति और आत्मा, इन दोनों का शासन एक देव पुरुषोत्तम करता है।

  1. द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते।

तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति।। (अथर्ववेद काण्ड 9.14.20; ऋग्वेद मण्डल 1.164.20;                                                                                      कठ0 1.3.1; मुण्डक0 3.1.1; श्वेताश्वतर उप. ४.१.६)

यह मनुष्य शरीर मानो एक पीपलका वृक्ष है। ईश्वर और जीव — ये दोनों सदा साथ रहनेवाले दो मित्र मानो दो पक्षी हैं। ये दोनों इस शरीररूप वृक्षमें एक साथ एक ही हृदयरूप घोंसलेमें निवास करते हैं। शरीरमें रहते हुए प्रारब्धानुसार जो सुखदुःखरूप कर्मफल प्राप्त होते हैं? वे ही मानो इस पीपलके फल हैं। इन फलोंको जीवात्मारूप एक पक्षी तो स्वादपूर्वक खाता है। अर्थात् हर्षशोकका अनुभव करते हुए कर्मफलको भोगता है। दूसरा ईश्वररूप पक्षी इन फलोंको खाता नहीं? केवल देखता रहता है अर्थात् इस शरीरमें प्राप्त हुए सुखदुःखोंको वह भोगता नहीं? केवल उनका साक्षी बना रहता है।

  1. यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः। अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः।।गीता 15.18।।

“क्योंकि मैं क्षर से परे और अक्षर से भी उत्तम हूँ, इसलिए लोक और वेद में पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हूँ”।

घटक श्रुति (जो भेद और अभेद श्रुति का मेल कराते हैं)

  1. यः पृथिव्यां तिष्ठन्। पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरो यमयति स त आत्मान्तर्याम्यमृतः – {शतपथब्राह्मणम् १४.६.७.[७]}
  2. य आत्मनि तिष्ठन् आत्मनोऽन्तरो यमात्मा न वेद यस्यात्मा शरीरं य आत्मानमन्तरो यमयति स त आत्मान्तर्याम्यमृतः – {शतपथब्राह्मणम् १४.६.७.[३०]}

‘जो आत्मा में स्थित होकर आत्मा की अपेक्षा भी आन्तरिक है, जिसको आत्मा नहीं जानता, आत्मा जिसका शरीर है, जो आत्मा के अन्दर रहकर उसका नियमन करता है, वह अन्तर्यामी अमृत तेरा आत्मा है।’

  1. यः सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्सर्वेभ्यो भूतेभ्योऽन्तरो यं सर्वाणि भूतानि न विदुः। यस्य सर्वाणि भूतानि शरीरं यः सर्वाणि भूतायन्तरो यमयति। एष त आत्मान्तर्याम्यमृतः (बृहदाअरण्यक उ0 3।7।15)

‘जो सब भूतों में स्थित होकर समस्त भूतों की अपेक्षा आन्तरिक है, जिसको सब भूत नहीं जानते, सब भूत जिसके शरीर हैं, तथा जो सब भूतों के अन्दर रहकर उनका नियमन करता है, वह सर्वान्तर्यामी अमृत तेरा आत्मा है।

  1. एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति ।

तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ।।  कठोपनिषद 2.2.12 ।।

जो परमात्मा सदा सबके अन्तरात्मारूपसे स्थित हैं, जो अद्वितीय और सर्वथा स्वतन्त्र हैं, वे ही सर्वशक्तिमान् सर्वभवनसमर्थ परमेश्वर अपने एक ही रूपको अपनी लीलासे बहुत प्रकारका बना लेते हैं। उन परमात्माको जो ज्ञानी महापुरुष निरन्तर अपने अंदर स्थित देखते हैं।

  1. अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः। अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च।। गीता 10.20।।

(अर्जुन! सब भूतों के हृदय में स्थ्ति आत्मा मैं हूँ और मैं ही सारे भूतों का आदि, मध्य और अन्त हूँ)।।

  1. सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च (गीता 15।15)
  2. ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशोऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।। (गीता 18।61)
  3. न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्। (गीता 10।39) (मुझसे पृथक कोई भी चल या अचल वस्तु नहीं है।)
  4. जगत् सर्वं शरीरं ते  (वालमीकि रामायण-युद्धकाण्ड-117/25

प्रभो!सम्पूर्ण जगत आपका शरीर है  और उसी के अधीन हैं । जैसे देह देही आत्मा के अधीन रहता है । और जैसे आत्मा सम्पूर्ण देह में व्याप्त रहता है ठीक इसी प्रकार परमात्मा भी सम्पूर्ण चराचर में व्याप्त है

इसके अतिरिक्त रामानुजाचार्य ने निम्न साक्ष्य प्रस्तुत किये हैं: छान्दोग्य उप. (४.२.२-३);   बृहदाअरण्यक उ0 (५.७.३); मुण्डक (३.१.१); तैत्रिय उप (११.६); श्वेताश्वर उप (१.१२, १.१७, १.२५, ६.३३); ऐतरिय उपनिषद.

Lord Varadraaj

शरीर-आत्मा भाव

““समस्त चित और अचित ब्रह्म के शरीर हैं क्योंकि वो पूरी तरह से ब्रह्म द्वारा नियंत्रित और ब्रह्म पे आश्रित हैं तथा ब्रह्म के अधीनस्थ हैं। सूक्ष्म (प्रलय) और स्थूल (सृष्टी), दोनों ही अवस्था में आत्मा और प्रकृति ब्रह्म का शरीर है” (श्री-भाष्य १.१.९) । घटक श्रुति के अनुसार भगवान हर वस्तु और हर आत्मा में अन्तर्यामी के रूप में निवास करते हैं। अपनी निर्हेतुक कृपा और जीवात्मा के प्रति असीम प्रेम के कारण भगवान प्रत्येक आत्मा में परमात्मा के रूप में निवास करते हैं। इस तरह, हर आत्मा भगवान का अभिन्न अंश और भगवान का विशेषण (अपृथक सिद्धि विशेषण) है। rules from within.

श्री-भाष्य (२.१.९) में रामानुज स्वामीजी शरीर को परिभाषित करते हैं। कोई भी पदार्थ जो एक आत्मा अपने उद्देश्यों के लिए पूरी तरह से नियंत्रित करने और आधार देने में सक्षम है, और जो पूरी तरह से आत्मा के अधीनस्थ संबंध रहता है, वो उस आत्मा का शरीर है। हमारा शरीर पूरी तरह से हमारे नियंत्रण में है और हम इसे आकार देते हैं और अपने उद्देश्यों के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं किन्तु ज्योंहि आत्मा शरीर से निकलती है शरीर का जल्द ही क्षय हो जाता है, और इसके तुरंत बाद यह ज्ञात होता है कि यह एक शरीर नहीं है।

जब हम एक आत्मा को शरीर से संयुक्त देखते हैं, तो हम व्यवहारिक रूप से दोनों को पृथक नहीं अपितु अवियोज्य (अभिन्न) देखते हैं। उदाहरण:- जब हम किसी को लंगड़ा, गोरा, कुण्डलों वाला, या दंडी स्वामी आदि संबोधनों से पुकारते हैं, तो हम वास्तविक में उस आत्मा को पुकारते हैं यद्यपि लंगड़ा, गोरा, कुण्डलों वाला, या दंडी स्वामी आदि का संबंध शरीर से है। जब हम किसी को नाम से पुकारते हैं, तो क्या नाम का संबंध आत्मा से है? नहीं, आत्मा को अनाम है। नाम तो शरीर का होता है, पर शरीर चेतनाहीन है, कभी पलटकर जबाब नहीं देगा। हम शरीर की पहचान से आत्मा को पुकारते हैं और आत्मा संबोधन को स्वीकार भी करता है। आत्मा स्वयं ज्ञानमय और ज्ञानयुक्त है पर बिना शरीर के वह कोई भी कार्य नहीं कर सकता। इस तरह से हम देखते हैं कि आत्मा और शरीर में घनिष्ठ और अवियोज्य संबंध है।

उसी प्रकार जब हम हम यह कहते हैं कि हर वस्तु ब्रह्म है, तो हम वास्तव में उस वस्तु के अन्तर्यामी ब्रह्म को ही संबोधित कर रहे हैं। “मैं ब्रह्म हूँ”, कहने का आशय मेरे अन्दर विराजमान परमात्मा से है। क्योंकि हर वस्तु ब्रह्म का शरीर है और ब्रह्म उसके अन्तर्यामी आत्मा; इसलिए हर वस्तु को ब्रह्म कहा गया है क्योंकि वो ब्रह्म का अभिन्न अंश है। शरीर का कोई भी संबोधन आत्मा को ही प्रेरित होता है।

श्रीभाष्य (१.४.२७) में स्वामीजी बताते हैं कि प्रलय काल में प्रकृति और सूक्ष्म अवस्था में और सृष्टि के बाद नाम और रूप से युक्त; दोनों ही परिस्थिति में ये भगवान के शरीर होते हैं। जीवात्माओं के imperfections और दोषों से और प्रकृति के परिवर्तन से ब्रह्म जो इनका शरीरि है, अछूता रहता है (अखिल हेय प्रत्यनिक)। ब्रह्म आनंदमय, दोष-रहित, सर्वज्ञ और अविकार है। शरीर के किसी भी परिवर्तन से आत्मा में कोई विकार नहीं आता।

  • अहम् ब्रह्मास्मि:- इसका अर्थ यह है कि ‘अहम ब्रह्मात्म को स्मीत्यर्थ:’। अर्थात अहम् पदवाची जो जीव है, इसके भीतर अन्तर्यामी रूप से परमात्मा विराजते हैं।
  • तत्वमसि:- इसका अर्थ हुआ- तदात्मकोसि, अर्थात तत् शब्द वाच्य जो परमात्मा है, वह सदा तुम्हारे अन्तर्यामी रूप से विराजते हैं। वह आत्मा के भी आत्मा हैं।
  • जीवो ब्रह्मः :- इसका भावार्थ ‘जीवो ब्रह्मात्मक इति भावः’ (जीव का आत्मा ब्रह्म है)।
  • सर्वं खल्विदं ब्रह्मम् :- इदं दृश्यमान सर्वं अपि ब्रह्म ब्रह्मात्मकमित्यत्यर्थः, याने जो कुछ यह दिखाई पड़ता है, इन सब के भीतर अन्तर्यामी रूप से परमात्मा विराजते हैं ।
  • एको अहम बहुस्याम :- श्रृष्टि के आदि में भगवान संकल्प करके जीवों को उनके कर्मों के अनुसार शरीर प्रदान करते हैं। इनके रूप, नाम के विभाग करके अन्तर्यामी रूप से अनेक होकर, इनके कर्मों के अनुसार इनका नियमन करने के लिये, अपनी अहैतुकी कृपा से, सदा इनके अन्दर विराजमान होकर रहते हैं।
  •  यच किञ्चिज्जगत्यस्मिन् दृश्यते श्रूयतेऽपि वा

         अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः ॥।। (नारायण उपनिषद)

  • सुबालोपनिषद-‘ एष सर्वभूतान्तरात्मा अपहृतपाप्मा दिव्यो देव एको नारायणः 

इस जगत में जो कुछ देखा या सुना जाता है, उन सब के भीतर श्रीमन नारायण व्याप्त होकर विराजते हैं।

इति सर्वं समंजसम

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References:

  1. ramanuj.org
  2. https://www.gitasupersite.iitk.ac.in
  3. http://hi.krishnakosh.org/%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3/%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%AE%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%AD%E0%A4%97%E0%A4%B5%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A4%BE_-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%AA%E0%A5%83._247
  4. https://narayanastra.blogspot.in

 

Rahasya Traya (रहस्य मंत्र)

श्री वैष्णव संप्रदाय में दीक्षित (गुर्मुख) भक्तों के लिये

नीचे दिए गए लिंक से डाउनलोड करें

रहस्य त्रय

पञ्च-संस्कार विधि के भाग के रूप में मंत्रोपदेश (रहस्य मंत्रो के उपदेश) दिया जाता है। उसमें आचार्य द्वारा शिष्य को 3 रहस्यों का उपदेश दिया जाता है। श्री पराशर भट्ट ने ‘अष्ट-श्लोकी’ में पहली बार इसके गूढ़ अर्थों को लिखित रूप दिया। श्री पिल्लै लोकाचार्य स्वामी ने मुमुक्षुपड़ी में इसके अर्थों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया एवं श्री वरवर महामुनि ने अपने व्याख्यान में इसके अर्थों को सरल भाव में समझाया। स्वामी वेदांत-देशिका ने भी ‘संप्रदाय-परिशुद्धि’ एवं ‘रहस्य-त्रय सारम्’ में विस्तृत वर्णन किया है।

 

“Krishnastu Bhagwaan Swayam”

Srimate Ramanujaay Namah

Scriptures says that seeing any difference in different forms of God or gradations between them are one of the nine hatred (nava-dweshas) which leads one to “hell of the hells”. To clarify, we don’t say that Narayana is superior to Krishna or Narayana is the father of Krishna or Narayana is having some qualities greater than Krishna. For us, God is unlimited, present in infinite forms. The God, present in infinite forms, present inside every aatmas, source of creation and destination of pralaya is Narayana. Krishna is one of his infinite forms. Rama is one of his infinite forms. We neither differentiate nor apply gradations. Can a person be higher or lower than himself? Can a person ride on his head using ladder?

In all his infinite forms, Narayana is complete, without any blemishes.

Coming to a verse of Srimad Bhagwatam, whose one-fourth has been taken a slogan. The whole concept of Krishna being superior from his own other forms hangs on this single thread of misinterpretation. Any explaination should not contadict Shruti (Vedas and Upnishads). If one doesn’t accept Vedas as highest authority, he can’t be considered a Vaidikan.

  1.   “Eko ha vai Naaraayana Aasit, Na brahma nesaanaha {MahOpanishad (1.1) “ (Only Narayana was there in the very beginning); “Apahatapaapma Divyo devaha Eko Naaraayana:” (Only Narayana is untouched from Paap or sins.)

  2.  Taitriya Aranyaka, Atharv-Veda, “Narayana Pram Brahma, Tattvam Narayan Param

  3. Panini Vyakaran (Astadhyayi AshtadhyAyi (8.4.3)), the `Na-kaaram’ makes the word `nArAyaNa’ a proper noun. The vedas invariably use the `nArAyaNa’ term (rolling the tongue for `na-kAram’) as opposed to `nArAyana’. On the contrary, terms like devki-putra, `Rudra’, `Siva’, `Indra’, `Agni’, `Hiranyagarbha’ are common nouns that have general meanings like  ‘all-attractive’, `Auspicious One’, `Foremost One’, etc. Hence, statements like `Siva eva kevalam’ are addressed to nArAyaNa only as Siva means auspiciousness. The nArAyaNa suktam contains words like ‘Sivamachyutam’, where this is seen explicitly.

  4. There is a rule known as chAga pashu nyAyA, (“Vishesha sabdaartha prathipaadita arthe saamaanya sada ganaartha paryavasaanam”). Comprehending the meaning of common nouns using the meaning conveyed by the particular noun and identifying the common nouns with the entity that is denoted by the particular noun in the given relevant context is “Chaaga Pasu Nyaaya”.Those general terms, common nouns  occurring in the same context as a specific term (proper noun like nArAyaNa) would make these general terms connote the specific term.

  5. For example, shruti says, ‘sacrifice an animal (paShu) at one point and then later on says, ‘sacrifice a goat’. Since the sacrifice in both contexts is the same, it is correct to interpret ‘paShu’ in the first vAkya as referring to the goat only.

  6. Thus, If only Narayan existed prior to deluge, that means Krishna, Ram etc. are his vibhav expansions. Any other interpretation would contradict Shruti. 

 

As per Veer_Raghavacharya

krsnastu bhagwan swayam

Confusions occur because meanings are taken out of context.

In the previous two verses (1.3.26-27), Suta says that the number of incarnations of Sriman nArAyaNa (Hari) are  innumerable like thousands of rivulets flowing from a river & goes on to say that RishIs & devas (demigods), Manus & prajApatis are all amsAs of Lord Hari. Coincidently, some verses before to this Suta listed Balraam and Krishna as 19th and 20th incarnation of Sriman Narayan. So, any meaning should be related to context.

The sloka 1.3.2 talks about bhagavan Aniruddha and 1.3.5 mentions him as Avataari as follows:

यस्याम्भसि शयानस्य योगनिद्रां वितन्वत: ।
नाभिह्रदाम्बुजादासीद्ब्रह्मा विश्वसृजां पति: ॥

From him who sleeps in yoganindra on water, menifisted Brahma, the creater and master of visva from lotus from his lake like navel. 1.3.2

एतन्नानावताराणां निधानं बीजमव्ययम् ।
यस्यांशांशेन सृज्यन्ते देवतिर्यङ्‍नरादय: ॥ 1.3.5

He is the unlimited reservoir of multifarious avataaras, the infallible seed from whose portion of portion (of the potency), devataas, animals and human beings are created.

And the lists of avataaras begin from the 6th sloka. Krishna and Balarama come as 19th and 20th avataara

एकोनविंशे विंशतिमे वृष्णिषु प्राप्य जन्मनी । रामकृष्णाविति भुवो भगवानहरद्भ‍रम् ॥ २३ ॥

In the nineteenth and twentieth incarnations, the Lord advented Himself as Lord Balarāma and Lord Kṛṣṇa in the family of Vṛṣṇi [the Yadu dynasty], and by so doing He removed the burden of the world.

As Krishna says in Bhagwat Gita:

यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा। तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसंभवम्।।10.41।।

Whatever object [All living beings] is verily endowed with majesty, possessed of prosperity, or is energetic, you know for certain each of them as having a part of My power as its source.

After, Suta Maharshi mentions various amsha avtaars of Krishna, rishis gathered there got confusion that what’s difference between previously mentioned avtaars (Vaaraha, Narasimha, Rama, Krishna) etc and these rishis, Sanakaadis, sons of Manu? Are they same. Is there no any difference? Suta replies, “among these avtaars, the previous ones were Purna-avtaara.”

Now the question arises as to whether, all these incarnations (rishis, manus and others) are actually “svayam bhagavAn” i.e. nArAyaNa Himself. To clarify that, sUtar is telling in the verse 1.3.28 that rishIs, anya dEvatAs (dEvAs), manus and others (above mentioned avatArams”) are not “svayam bhagavAn” ( not ” nArAyaNA Himself), but KrishNa is bhagavAn Himself. So, obviously, SUta muni wants to reiterate that rishis and others are only amsAvatArAs (ie. They are not same as nArAyaNa) and are different from Narayan’s svayam avatArams (like Ram, KrishNa).

The commentator says, ” Krishnasya swayam bhagwaan iti Krishnasya purnatvam sthapitvam….. purvekteshu hiranyagrabha-sanakaadishu keshaanchit Vaaraaha-Narayana-Matya-Kurma-Mohini-nrisingh-Rama-avtaaraanaam purnanaam ..pramrishyante”.

Meaning: By Swayam bhagwaan address of Krishna, his purna-avataaratvam is established. He is Purna avtaara of Vishnu. Among previously stated Hiranyarbha (Brahma), Sanakaadi etc; Vaaraaha-Narayana-Matya-Kurma-Mohini-nrisingh-Rama etc avtaars are Purna or complete.”

He says in the end, “Vaaraah aadi avtaaraam purnatvam tu Puranaadi eva gantavam, sarva-avtaar asaadhaaranatvam upasangharati …lokam yuge yuge pratiyuge mridayanti“.

Meaning: The Purnatva of Vaaraah etc avtaars are established in Purans etc, here it is established that all the avtaars are extraordinary and they loka in the loka every yuga to protect Indra.

That’s the difference. Amsha avtaars never protects Indra. They are for other purposes. It’s Only Purna avtaars that protect Indra.

The commentator explains ‘Purna avtaara’ as shad-guna purnatvam. Amsha avtaars have some of these shad-gunas mentioned in Vishnu Purana (6.5.74).

ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः।  ज्ञानवैराग्योश्चैव षण्णां भग इतीरणा।। (विष्णु पुराण ६.५.७४)

“सम्पूर्ण ऐश्वर्य, सम्पूर्ण धर्म, सम्पूर्ण यश, सम्पूर्ण ज्ञान और सम्पूर्ण वैराग्य – इन छहों का नाम ‘भग’ है”। ये सब जिसमें हों, उसे भगवान कहते हैं।

Amsha avtaars have expansion of dharma gyaana of Bhagwaan while Avtaars are dharmi gyaana itself. In simple words, Purn avtaars or swayam bhagwaan forms are Bhagwaan itself. He himself comes as Vaaraha, Mohini, Rama etc. In Amsha avtaara, he gives some of his qualities to a jeeva through expansion of dharma-bhoota gyana.

As per Madhvacharya

Detailed explanation of “Krishnastu Bhagwaan Swayam” (SB 1.3.28) is given in below link along with quotations from Gita-Bhasya of Madhava

Krishnastu bhagwaan swayam

  1. When it is said that Krishna is the amshi (the whole), and that Varâha, etc., are amsha-s, there is another problem — in the subsequent verse of the Bhâgavata, it is said: `indrArivyAkulaM lokaM mR^iDayanti yuge yuge’ — when there is trouble from enemies of Indra, “they” protect Yuga after Yuga. Here, the verb mR^iDayanti is in the plural form, and so also should the subject be. Yet, in your interpretation, we came across only Krishna for the subject.
  2. Thus, here Krishna is not an specific noun but it represents all the ‘Swayam Avtaars’ of Narayana.
  3. For mR^iDayanti (they protect) — a plural, the subject should be plural and an interpretation with the singular subject-word `kR^ishhNa’ is also not possible for this reason. It cannot be said that the referent is the plural “fragments” referred to earlier: when some subject is brought in between, for the meaning after this subject, the reference given before cannot be used. If you say that propriety rather than proximity is a concern in interpretation here, then we say that we will demonstrate propriety without sacrificing proximity, so that that argument does nothing to save your interpretation.
  4. In the previous two verses (1.3.26-27), Suta says that the number of incarnations of Sriman nArAyaNa (Hari) are  innumerable like thousands of rivulets flowing from a river & goes on to say that RishIs & devas (demigods), Manus & prajApatis are all amsAs of Lord Hari. Coincidently, some verses before to this Suta listed Balraam and Krishna as 19th and 20th incarnation of Sriman Narayan. So, any meaning should be related to context.
  5. Now the question arises as to whether, all these incarnations (rishis, manus and others) are actually “svayam bhagavAn” i.e. nArAyaNa Himself. To clarify that, sUtar is telling in the verse 1.3.28 that rishIs, anya dEvatAs (dEvAs), manus and others (above mentioned avatArams”) are not “svayam bhagavAn” ( not ” nArAyaNA Himself), but KrishNa is bhagavAn Himself. So, obviously, SUta muni wants to reiterate that rishis and others are only amsAvatArAs (ie. They are not same as nArAyaNa) and are different from Narayan’s svayam avatArams (like Ram, KrishNa).

LINK: BHAGAVAD GITA X-41

ete swa ansha kala punshah

source: http://madhwaprameyamahodadhi.blogspot.com/2014/06/krishnastu-bhagavan-svayam.html

Presenting in simple words:

  1. As per rules of grammar, singular noun follows singular verb and plural noun follows plural verb.
  2. since the verb ‘mridayanti’ here is plural (prathama pursha, bahuvachana); the subject Krishna should also be Plural noun. It is not a singular noun.
  3. So, the noun ‘Krishna’ is not singular but denotes ‘all the Purna-avtaars’ of Vishnu. It has been discussed above.
  4. If claims are made that ‘ete’ is subject here; all earlier mentioned avtaars are subject; then again you runs into grammatical error.
  5. An objector says: While doing anvaya (interpretation), one is required to consider sannidhi (proximity) and yogyatA (propriety). Even when sannidhi is not available, yogyatA is a must, and in fact,] yogyatA is a stronger consideration than sannidhi. So giving prominence to sannidhi alone is not acceptable. So say you? Let it be so. Without giving up sannidhi, we will demonstrate yogyatA. yogyatA with sannidhi is better in comparison with yogyatA without sannidhi.

Study in detail, the bhashya of Madhvacharya and Sri Raghavendra Tirth: http://www.dvaita.org/shaastra/gita/bg1041.html

Explaination using Chhatri Nyayam in Vishishtadvaita Sampradaya:

“ete” can be interpreted using CHHatri Nyayam:It is described as follows : “chatrinO gacchanti” a group of people having umbrellAs are going. Actually, not everyone in that group needs to hold an umbrella. This usage, though addresses the group as a whole, it doesn’t convey that everyone in that group has an umbrella. Thus, according to “chatri nyAyam”, eventhough the adressing be done to the whole group, as if everyone has the same characteristic (eg: holding the umbrella), still, it needn’t convey that _everyone_ in that group has that characteristic ie. the intention is to just refer to those who actually posses that characteristic (holding an umbrella), though adressing is done to the whole group as such.Lets see how “chatri nyAyam” is employed in this verse (1.3.28). All avatArams of the type Nrusimha , RAma are Poorna avatArams only, since they are taken by the same person nArAyaNa. Eventhough all the poorna avatArms ( no umbrella) seems to be grouped with that of many other avatArams (anupravesa / amsAvatAra etc; with umbrellA ) by the word “ete”, its actual import from the application of “chatri nyAyam” is that the word “ete” refers only to the amsa avatArams (with umbrella). So, the comparison of KrishNAvatAram is strictly not with _all_ the avatArams that has been listed before, but only with other amsa avatArams. The word “ete”, though addresses the whole group of avatArams that has been listed so far, the intention is to refer to only those avatArams that are amsAvatArams (with umbrella). If one fails to recognize the “chatri nyAyam ” employed, it leads him/her into a contradiction

 

The concept of Paribhasha Sutra:

Jiva Goswami has taken one-fourth of the shloka out and projected as a separate parenthetical phrase. He calls it a paribhaasa sutra, which is found in the beginning and through which entire shastra can be interpreted.

Objection: The portion he takes as paribhaasa-sutra is not in the beginning but in the middle of the shloka and in the middle of 3rd chapter of first canto.

This whole concept of paribhaasa sutra is funny. What if ‘advaitins’ take ‘TAT TVAM ASI’ as paribhaasa sutra and interprets entire Vedas on it’s basis?

Not accepting SB 1.3.23

Althogh 1.3.23 clearly says Krishna as 20th avtaara, they don’t accept it. Argument given is, “facts meant to emphasized is placed later and is of more value than previous facts“.

Do they even realize that it contradicts with the very concept of Paribhasha Sutra which is a part of verse found in beginning of the text? If second logic is accepted, Paribhasha Sutra turns of Zero Value.

Purv Mimansha 6.5.54

Bteween two contradictory expiatory injunctions, a later one is of greater force and sublates the earlier one.

REPLY:

There is no contradiction at all. The shlokas SB 1.3.23 and SB 1.3.28 are not contradictory but gives similar meanings. 1.3.23 says Krishna is avtaara of Vishnu while 1.3.28 says he is Purna avtaara of God, different from Amsha avtaars.

If you want to take only later parts as more authentic, I would go for 11th and 12th Skandha.

SB 12.12.2: Shuka says that so far I have narrated various leelas of VISHNU.

12.12.2 suta concludes as leela of vishnu

or, When Mahavishnu Says Krishna that You are my amsha:

10.79.58 mahavishnu and Krishna

For more pramans from Srimad bhagwatam:

Study: Krishna and Vishnu (In Srimad Bhagwatam)

Krishna and Vishnu (4 handed form)

Krishna and Vishnu (The husband of lakshmi)

Next, Madhvacharya talks about Black and white hairs of Vishnu incarnating as Krishna and Balarama….. that is subject matter of our next post.

Stay tuned.

Adiyen Ramanuja dasan

References:

  1. http://www.ramanuja.org/sv/bhakti/archives/apr2000/0185.html
  2. htmlhttp://www.dvaita.org/shaastra/gita/bg1041.html
  3. http://madhwaprameyamahodadhi.blogspot.com/2014/06/krishnastu-bhagavan-svayam.html
  4. Srimad Bhagwatama bhashya of Veer-Raghavacharya

प्रपत्ति (शरणागति)

प्रपत्ति (शरणागति, न्यासं, आत्मसमर्पण, आत्म-निक्षेपं, भरन्यासम)

अनन्यसार्थे स्वाधिष्ठे महाविश्वासपूर्वकं, तदेको उपायताकांक्ष प्रपत्ति शरणागति।

जब व्यक्ति यह समझता है कि वो खुद अपनी रक्षा करने में असमर्थ (कर्म, ज्ञान एवं भक्ति से हीन) है और भगवान के अलावा कोई और उसकी रक्षा करने में समर्थ नहीं हैं तो वह भगवान को असहाय भाव में रक्षा करने को पुकारता है। मन कि इस अवस्था को को शरणागति (शरणं आगति) कहते हैं। अपनी हार स्वीकार कर भगवान को उपाय बनने की विनती करना ही उपाय है। ‘उप आयते इति उपायः’। जो लक्ष्य के करीब ले जाए उसे उपाय कहते हैं। शरणागति में तत्त्व नारायण हैं, पुरुषार्थ भी नारायण हैं और हित (उपाय) भी नारायण ही हैं।

अहमस्य अपराधानाम आलयः अकिंचनोगति: ।

     त्वमेव उपाय भूतो में भवति प्रार्थनाम इति शरणागति।।

     शरणागति इति उक्त्वा सा देवेऽस्मिन प्रयुज्यताम। (अहिर्बुध्व संहिता)

अपनी आत्मा को परमात्मा को सौंप देना ही शरणागति (आत्म-निक्षेप) है।

आत्मा आत्मीय भारन्यासो ही आत्मनिक्षेप उच्यते। (लक्ष्मी तंत्र 17.29)

प्रपत्ति दो मूल धातु से बना है- ‘प्र’ और ‘पद’। ‘प्र’ का अर्थ है ऊँचा और ‘पद’ यानि कदम। अर्थात सर्वोच्च की ओर कदम बढ़ाना ही प्रपत्ति है।

प्रमाण

  1. नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो, न मेधया न बहुना श्रुतेन।

        यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः, तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूँ स्वाम्॥

{मुण्डक उपनिषद (3.2.3) और कठोपनिषद (1.2.23)}

लघु सिद्धांत में रामानुज स्वामीजी, इस श्लोक की व्याख्या करते हुए लिखते हैं:

यथा अयं प्रियतमः आत्मानम् प्राप्नोति, तथा भगवान स्वमेव प्रयतत इति भगवतैव उक्तं।

अर्थ: जैसे हम अपने प्रियतम को स्वयं प्रयत्न कर प्राप्त करते हैं, वैसे ही भगवान स्वयं, अपनी निर्हैतुक कृपा से, शरणागत जीवात्मा को अपना लेते हैं।  एक शरणागत को भगवत-प्राप्ति हेतु अपनी ओर से कोई प्रयत्न नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करना भगवान की निर्हैतुक कृपा में बाधा होगा।

  1. यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै ।

        तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ॥ – (श्वेताश्वतरोपनिषत् 6-18)

जो श्रृष्टि के आरम्भ में ब्रह्मा को उत्पन्न करता हैऔर जो उसके लिये वेदों को प्रवृत करता है, अपनी बुद्धि को प्रकाशित करने वाले उस देव की मैं मुमुक्षु शरण ग्रहण करता हूँ।

  1. अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।

      तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः।। (गीता 8.14)

जो पुरुष मुझ में अनन्य-चित्त होकर सदा ही निरंतर मुझ पुरुषोत्तम को स्मरण करता है, जो मेरे साथ निरंतर संपर्क चाहता है, उसे मैं सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ।

अहं सुलभ’ की व्याख्या करते हुए स्वामीजी लिखते हैं: अहम् एव प्राप्यः न मद्भाव ऐश्वर्यादिकः

मैं एकमात्र वस्तु हूं जो वह प्राप्त करना चाहता है और न कि मेरे किसी भी तरीके की संप्रभुता आदि। मैं उससे बहुत प्रिय हूं, वह मुझे याद किए बिना खुद को बनाए रखने में असमर्थ है। मैं उसे खुद को प्राप्त करने के लिए आवश्यक भक्ति अभ्यास में पूर्ण परिपक्वता प्राप्त करने की क्षमता प्रदान करता हूं।

तात्पर्य चन्द्रिका में स्वामी वेदांत देशिका ‘अहमेव’ शब्द की व्याख्या करते हुए लिखते हैं:

परमकारुणिकस्य ममैव अयं भर इति अभिप्रायः

  1. राम चरम श्लोक (रामायण युद्धकाण्ड 18.33)

जब विभीषण अपना सब कुछ त्यागकर भगवान की शरण में आते हैं तो भगवान ने शरणागति-मार्ग की व्याख्या करते हुए कहा:

‘सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते | अभयं सर्व भूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम ||’

जो एक बार भी मेरी शरण में आकर ‘मैं तुम्हारा हूँ’ ऐसा कहकर मुझसे अभय चाहता है, उसको मैं सब भूतों का अभयदान देता हूँ, यह मेरा व्रत है।

  1. कृष्ण चरम श्लोक (गीता 18.66)

    भगवान ने गीता में पहले कर्म-योग, उसके बाद ज्ञान योग और फिर भक्ति योग की विस्तृत व्याख्या की। सभी प्रकार के योगों के बारे में भगवान से सुनने के पश्चात अर्जुन ने अपनी असमर्थता व्यक्त की तो भगवान ने आखिरी उपदेश दिया:

सर्व धर्मान परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज |

अहं त्वा सर्व पापेभ्यो मोक्षिष्यामी मा शुचः||

सभी उपायों (कर्म-योग, ज्ञान योग, भक्ति योग) को त्यागकर मेरी शरणागति करो, मैं तुम्हारे सभी पापों को नष्ट कर तुम्हें मोक्ष प्रदान करूँगा|

  1. लक्ष्मी तंत्र (१७.१००)
  2. शरणागतिः इति उक्त्वा सा देवे अस्मिन प्रयुज्यताम।

         इदं तितिरिष्टाम पारं सर्वे नाश्यन्ति तातक्षनात।। {अहिर्बुधन्य संहिता (37.3)}

  1. (स्त्रोत रत्न. 22)

    न धर्म निष्ठो, न च आत्मवेदी; न भक्ति माम त्वात चरणारविन्दे। अकिंचनो अनन्यगति शरण्यं, त्वत पाद मूलं शरणम् प्रपद्ये ।।

हे प्रभो! मैं न निष्ठापूर्वक धर्म का पालन (कर्म-योग) करनेवाला हूँ और न आत्म-तत्त्व (ज्ञान-योग) का ज्ञाता हूँ। न आपके चरण कमलों की भक्ति में संपन्न हूँ, न कोई अन्य साधन प्राप्त करने में समर्थ हूँ। असहाय अवस्था में, अन्य कोई गति न होने के कारण, आपके चरणतल में शरणागति करता हूँ।

  1. कोटि विप्र वध लागहिं जाहूं। आये शरण ताजऊँ नहीं ताहू।।

       सनमुख होई जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अध नासहिं तबहीं।(रामचरितमानस)

 

उपाय को दो भागों में वर्गीकरण किया गया है:

१) साध्योपाय: वह उपाय जो हमारे द्वारा स्थापित किया जाये और हमारे द्वारा क्रियाशील हो। इसे स्वगत स्वीकारा भी कहते हैं क्योंकि इस उपाय में हम अपने प्रयत्नों द्वारा भगवान तक पहुँचने का प्रयत्न करते है। उदाहरण स्वरुप बांदरी का बच्चा जो स्वयं उछलकर अपने माँ को पकड़ता है। इसलिए इस उपाय को मर्कट-किशोर-न्याय भी कहते हैं। कर्म योग, ज्ञान योग और भक्ति योग साध्योपाय है।

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२) सिद्धोपाय: वह उपाय जो पहले से स्थापित है और हमें सिर्फ उसका चुनाव करना है। इसे परगत स्वीकारा भी कहते हैं क्योंकि इस उपाय में हमारे भगवान तक पहुँचने का उत्तरदायित्व भगवान पर ही होता है और भगवान ‘सत्य-संकल्प’ हैं, कभी भी अपनी जिम्मेदारी से नहीं चूकते। उदाहरण स्वरुप बिल्ली का बच्चा जिसे पकड़कर ले जाने की जिम्मेदारी स्वयं बिल्ली की है। इसलिए इस उपाय को मर्घर-किशोर न्याय भी कहते हैं। शरणागति सिद्धोपाय है। शरणागति भी भक्ति ही है पर भक्ति योग में भक्ति उपाय है और शरणागति में स्वयं भगवान ही उपाय हैं। एक शरणागत कर्म, ज्ञान, भक्ति सबका अनुशीलन करता है पर उपाय के तौर पर नहीं बल्कि सिर्फ भगवान के मुखोल्लाष के लिये। इस मार्ग में सफलता कि १०० फीसदी गारंटी है क्योंकि बांदरी का बच्चा शायद चूक भी जाए अपनी माँ को पकड़ने में, पर बिल्ली अपने बच्चे को सुरक्षित उस पार करने में कभी नहीं चुकती। यह उपाय खास तौर पर अयोग्य, लाचार और सभी साधनों से हीन साधकों के लिये है।

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पञ्चरात्र आगम में आता है:भक्त्या परमया भावी, प्रपत्या वा महामदे। (भक्ति और प्रपत्ति ही केवल दो मार्ग हैं भगवान तक पहुँचने के लिये।)दोनों ही मार्ग के अपने फायदे और कमियाँ हैं। भक्ति योग के कर्म और ज्ञान योग दो अंग हैं। ज्ञानयुक्त कर्म ही भक्ति की ओर ले जाता है। भक्ति योग में मन, बुद्धि और शरीर निर्बाध भगवान की ओर होने चाहिए (अनन्य चिंतयतो माम; सततं कीर्तयन्तो माम)। प्रपत्ति मार्ग की सबसे बड़ी परेशानी यह है की मानसिक रूप से एक शरणागत के ढाँचे में ढलना मुश्किल है और दूसरा यह की हमें शरण्य (भगवान) के प्रति यह अटूट श्रद्धा होनी चाहिए की वो अवश्य हमारी रक्षा करेंगे। लेकिन एक बार शरणागत होने के बाद आगे का मार्ग अत्यंत सुगम हो जाता है।

उदाहरणस्वरुप छत पे जाने के दो उपाय हैं। एक तो सीढियों के द्वारा और दूसरा लिफ्ट से। सीढ़ी से चढ़ना साध्योपाय है क्योंकि व्यक्ति को अपने सामर्थ्य पर भरोसा है। लिफ्ट के द्वारा जाना सिद्धोपाय है क्योंकि लिफ्ट का उपयोग करने का अर्थ ही है की हमने अपनी हार स्वीकार कर ली है कि हम अपने स्वयं के प्रयास से छत पे चढ़ने में असमर्थ हैं और दूसरा की हम जल्दी से जल्दी छत पे जाना चाहते हैं। इस उदाहरण में लिफ्ट भगवान हैं और लिफ्टमैन गुरु। हमें लिफ्ट और लिफ्टमैन पर पूर्ण विश्वास होने की जरुरत है।

अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम। तस्मातकारुण्यभावेन रक्ष रक्ष परमेश्वर।।

शरणागत होने के लिये पूर्वापेक्षा

यूँ तो सभी तरह से अयोग्य होना ही सबसे बड़ी योग्यता है प्रपत्ति में, फिर भी आचार्य कुछ पूर्वापेक्षा बताते हैं:

अनन्यसार्थे स्वाधिष्ठे महाविश्वासपूर्वकं, तदेको उपायताकांक्ष प्रपत्ति शरणागति।

1) स्वाधिष्ठे अनन्यसार्थे (निराश्रयता) :-

  1.  आकिंचन्यम: शरणागति ‘अहंकार, ममत्व और स्वातंत्र्य’ का त्याग है। इस दुनिया में कोई भी व्यक्ति अपनी हार स्वीकार करने को तैयार नहीं है। हर व्यक्ति अपने-अपने अलग अलग प्रकार के अभिमान के साथ जी रहा है। अहंकार त्याग करने की मुश्किल के कारण ही शरणागति मुश्किल दृष्टिगोचर होती है। हमें यह स्मरण रखना चाहिए की सर्वोत्तम तत्त्व क्या है, सर्वोत्तम पुरुषार्थ क्या है और उसका उपाय क्या है। अगर मैं अपने प्रयासों से मोक्ष प्राप्त करने में सक्षम होता तो कई हजार वर्ष पहले ही कर चूका होता। आकिंचन्यम का अर्थ है अपने आप को कर्म, ज्ञान और भक्ति से हीन समझना और पछताते हुए भगवान से उपाय बनने की प्रार्थना करना। “हे श्रीमन नारायण! मैं सभी साधनों से हीन हूँ पर मैं आपके दिव्य धाम में आपके नित्य कैंकर्य की प्रार्थना करता हूँ कृपया अपने अहैतुकी कृपा से मुझे मोक्ष प्रदान करें।
  2. अनन्य-गतित्वं : इस बात का पूर्ण विश्वास की भगवान के अलावा कोई और हमारी मदद नहीं कर सकता। लोकाचार्य स्वामी बताते हैं की यदि पिता रक्षक होते तो हिरण्यकशिपू ने प्रह्लाद की रक्षा की होती। यदि माता रक्षक होती तो कैकेयी ने भरत की रक्षा की होती, यदि भाई रक्षक होता तो रावण ने विभीषण की रक्षा की होती। यदि पति रक्षक होते तो द्रौपदी के पाँच महाबली पतियों ने उनकी रक्षा की होती। यदि हम स्वयं अपने रक्षक होते तो गजराज ने ग्राह से स्वयं की रक्षा की होती। इन सभी की रक्षा श्रीमन नारायण ने ही की इसलिए श्रीमन नारायण ही एकमात्र रक्षक हैं। अन्य देवताओं के पास इस भाव से जाना की वो हमारी रक्षा करेंगे, यह शरणागति के प्रतिकूल है। शिव, इंद्र आदि देवता स्वयं संसार-मंडल में फंसे हैं अपनी रक्षा के लिये श्रीमन नारायण पर आश्रित हैं।

2) महाविश्वास : श्रीमन नारायण पर यह पूर्ण विश्वास की वो अवश्य ही हमारी रक्षा करेंगे। अगर महाविश्वास न हो तो फिर शरणागति का अर्थ ही क्या है।

उपजई राम चरण विश्वासा, भवनिधि तरहीं नर बिनहिं प्रयासा

संसारकूपे पतितोऽत्यागाधे, मोहान्धपूर्णे विषयाभितप्ते।

करावलम्बं मम देहि विष्णो, गोविन्द दामोदर माधवेति।।

हे गोविन्द! दामोदर! माधव! मैं मोह रूपी अंधकार से व्याप्त और समस्त विषयों की ज्वाला (दावाग्नि) से संतप्त इस संसार रूपी गहरे कुएँ में पड़ा हूँ। हे विष्णो! आप मेरा हाथ पकड़कर इस कुएँ से बाहर निकालिए। मुझे अपने हाथ का सहारा दीजिये, मैं अपने प्रयत्न से बाहर नहीं निकल सकता।

सवाल) भगवान हमारे ‘उपाय’ बनने को क्यों तैयार होंगे?

उत्तर):  भगवान हमेशा ही हमारे उपाय बनने को उत्सुक रहते हैं पर हमें अपने बल, बुद्धि और सामर्थ्य पर यकीन होता है। हम भगवान से पृथक हो इस संसार का आनंद लेना चाहते हैं, इसलिए भगवान हमारे ‘उपाय’ नहीं बनते। जबतक हम अपनी हार स्वीकार कर भगवान से असहाय अवस्था में प्रार्थना नहीं करेंगे तबतक भगवान हमारे उपाय कैसे बन सकते हैं। गजेन्द्र और द्रौपदी के संकट में भी भगवान ने तबतक ‘उपाय’ बनना स्वीकार नहीं किया जबतक उन्होंने शरणागति नहीं की।

(नारायण अखिलगुरो भगवन नमस्ते)। (गजेन्द्र स्तुति)

कृष्ण! कृष्ण! महायोगिन्! विश्वात्मन! विश्वभावन। प्रपन्ना पाहि गोविन्द कुरुमध्येवासीदतीम्। (द्रौपदी स्तुति)

कोई कंजूष से महा-कंजूष व्यक्ति ही क्यों ना हो, यदि कोई भिखारी उसका चरण पकड़ ले तो वह कुछ न कुछ भीख अवश्य देगा तो फिर अपार-वात्सल्यमय भगवान हमारे उपाय बनने को तैयार क्यों नहीं होंगे। एक मालिक अपने कर्मचारियों को उनके योग्यता के अनुसार ही वेतन देता है पर यदि कोई उसके आगे दंडवत हो जाये और अपनी लाचारी जताए तो मालिक बिना किसी योग्यता के कुछ रुपये अवश्य देगा। इसी तरह हमारे कर्म, ज्ञान और भक्ति हीन होने के वावजूद भी हमें मोक्ष अवश्य प्रदान करेंगे अगर हम उनके चरणों का आश्रय लें। ऐसा स्वयं भगवान की प्रतिज्ञा है. (धनं मदीयं तव पाद-पड़्कजं)।

जिस तरह एक बछड़ा के धूल में लिपटे होने के वावजूद गाय उसे चाट-चाटकर साफ करती है, उसी प्रकार भगवान भी अपने शरणागतों के दोष और पूर्व के संचित पाप नहीं देखते। (वात्सल्यं),

सवाल) क्या शरणागति उपाय है?

उत्तर) वास्तव में शरणागति उपाय नहीं योग्यता (व्याचम) है। उपाय तो केवल श्रीमन नारायण की अहैतुकी कृपा है।

सवाल) क्या कोई भी शरण्य बन सकता है?

उत्तर) एक आदर्श शरण्य के पास निम्न दो गुण होने चाहिए:

१) परत्वं : जिसके जोड़ का दूसरा कोई न हो।

२) सौलभ्यम: जो सर्व-सुलभ हो ( भगवान अन्तर्यामी, अर्चा और आचार्य के रूप में सर्व-सुलभ हैं)

सवाल) क्या शरणागति कोई भी कर सकता है?

उत्तर): हाँ। शरणागति में जाति, कुल, रंग, जन्म आदि का कोई भेद नहीं है। शबरी (शूद्र वर्ण में जन्म); निषाद, सुग्रीव (बन्दर), विभीषण (राक्षस), विदूर (दासीपुत्र) इत्यादि उदाहरण हैं।

मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः। 

स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ।। (गीता 9.73)

“हे अर्जुन! स्त्री, वैश्य, शूद्र तथा पापयोनि चाण्डाल आदि, जो कोई भी हो; वे भी मेरी शरण में आकर परमगति को ही प्राप्त होते हैं”।

आनयैनं हरिश्रेष्ठ दत्तमस्याभयं मया।

                                      विभीषणो वा सुग्रीव यदि वा रावणः स्वयं।। ( रामायण युद्धकाण्ड 18.34)

हे वानरश्रेष्ठ सुग्रीव! वह व्यक्ति विभीषण हो अथवा स्वयं रावण भी हो, तो भी उसको ले आओ, मैं उसे अभी अभयदान दे दूँगा।

 

शरणागति के 6 अंग

आनुकूलश्च संकल्पः प्रातिकूलश्च वर्जनं; रक्षिष्यती इति विश्वासः,

गोप्त्रिप्त वर्णनश्तथा;कार्पण्य आत्मनिक्षेपे षड्विधा शरणागति।।

१) भगवान के अनुकूल कर्म करना

२) भगवान के प्रतिकूल कर्म का परित्याग

३) यह विश्वास की भगवान अवश्य हमारी रक्षा करेंगे

४) भगवान से शरणागति की प्रार्थना करना, दैन्यभाव (कार्पण्यं)

५) स्वयं को कर्म, ज्ञान और भक्ति से हीन समझना (कार्पण्यं)

६) आत्मा जो की भगवान की सम्पत्ति है, भगवान को वापस सौंप देना।
कहानी: परकाल सूरी आलवार एक बार जब शालिग्राम गए थे, जहाँ विश्व का सबसे गहरा दर्रा है, उन्होंने देखा की दो कीड़े आपस में बात कर रहें हैं। पहले कीड़े ने कहा मैं दर्रे के उस पार सामने वाली पहाड़ी पे जाउँगा। दुसरे कीड़े ने मानने से इनकार कर दिया। एक कीड़े की आयु ही कितनी होती एक पहाड़ से उतरकर दूसरे पहाड़ पर चढ़ने में तो उसके कई जन्म बीत जायेंगे। दोनों में शर्त लगी। पास ही एक शेर छलाँग लगाने को था। उस कीड़े ने अपने को उसके पैरों के सामने कर लिया और वो शेर के पैर से चिपका हुआ उस पार चला गया। यही शरणागति है। सभी प्रकार से मोक्ष के अयोग्य होने के वावजूद भी अगर हम श्रीमन नारायण के चरणों का आश्रय लें तो श्रीमन नारायण अवश्य ही हमें परमपद देंगे।

टिप्पणी:- नारायण के प्रति कोई भी शरणागति बिना श्री (महालक्ष्मी माता) के पूर्ववर्ती शरणागति के सफल नहीं होती।

‘श्री’ शब्द महालक्ष्मी मैया को सूचित करता है, यह श्री सूक्तं से स्पस्ट है| हम माता महालक्ष्मी के माध्यम से भगवान नारायण की शरणागति करते हैं| वात्सल्यमयी माता (लक्ष्मीआषः ऋषिकेष: देव्या कारुण्यरुपया) अपने पुत्रों को उसके दोषों समेत अपनाती हैं और हमारे अनर्थों को नष्ट कर, भगवान के समक्ष हमारे शरणागति कि सिफारिश करती हैं| माता के इस गुण को ‘पुरुषकारत्वं’ भी कहते हैं|

श्री शब्द का निम्न ३ अर्थ बताये गए हैं:

१) श्रयते श्रीयते इति श्रियः

जो भगवान का आश्रय लेती हैं एवं जीवात्माओं को आश्रय प्रदान करती ।

२) श्रुनाती श्रावयति इति श्रियः

जो जीवात्माओं के प्रार्थनाओं को सुनती हैं एवं भगवान को सुनाती हैं (बाधा चढ़ा कर) ।

३)श्रृनाती श्रीनाति इति श्रियः

जो हमारे पापों सहित संचित कर्मों को नष्ट करके हमें निर्मल बनाती हैं एवं भगवान के करीब लाती ।

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वेदांत तत्त्वय तत्त्वज्ञम, मंत्रनम अर्थदकम गुरु|

श्रीमन्नारायणाचार्य रामानुजम यतिम भजे||

तत्त्व, हित, पुरुषार्थ

तत्त्व क्या है, जीवन का लक्ष्य (पुरुषार्थ) क्या होना चाहिए? उपाय (means) क्या है लक्ष्य प्राप्त करने का??

तत्त्व, हित, पुरुषार्थ

एक बार की बात है, एक राजा प्रमोद करने हेतु वन में गया पर उसका छोटा-सा बच्चा वन में कहीं खो गया। शिकारियों के समाज ने उसे पाला-पोसा और वह बच्चा शिकारियों के बीच बड़ा हुआ। एक बार शहर का एक व्यक्ति वन से जा रहा था तो उसने उस बालक को देखा जिसकी हरकतें तो बिल्कुल शिकारियों के जैसे थी पर रंग-रूप में वह बाकियों से बिल्कुल अलग था। उसने पूछताछ की तो पता चला की इस बालक को वन में अकेला पाया गया था। उस व्यक्ति को समझते देर न लगी की यह राजा का ज्येष्ठ पुत्र ही है। उसने राजकुमार से बात की तुम वास्तव में राजकुमार हो और राजा की अपार सम्पत्ति के उत्तराधिकारी। बालक को विश्वास नहीं हुआ और वह अपने साथियों के साथ खेलने लगा। उस व्यक्ति ने अपने तर्कों से बालक को समझाया तो बालक को समझ में आ गया की वो वास्तव में राजकुमार ही है। वो छोटी सी सम्पत्ति और छोटे से समाज में ख्याति के लिये संघर्ष कर रहा था जबकि राजा की असीमित सम्पत्ति और सुख-शांतिमय जीवन उसे बस राजा का पुत्र बन जाने मात्र से मिल जायेगा। बालक अपने पालकों का आशीर्वाद लेकर राजमहल की ओर दौरा। राजा को खबर मिली तो उसने रास्ते में फूल बिछवा दिए और अपने पुत्र को कलेजे से लगा लिया। ये उदाहरण स्वामी वेदांत देशिका अपने ‘रहस्य-त्रय सारम्’ में देते हैं।

हम सभी उस परमात्मा की संतान हैं पर अपने दिव्य आनंद और दिव्य सम्पत्ति को न केवल छोड़ दिया है अपितु उसका हमें एहसास भी नहीं है। भौतिक संसार एक जेल की भाती है और प्रकृति के तीन गुण इसकी बेड़ियाँ हैं। हम सभी ए-ग्रेड कैदी बनकर खुश हैं या उसके लिये हड्डी-तोड़ मेहनत कर रहें। पर कैदी तो आखिर कैदी ही है चाहे वो आईएएस कैदी हो या विद्वान कैदी। बुद्धिमान व्यक्ति वही है जो इस जेल के बाहर जाने की सोचता है। गुरु हमें इस बात का ज्ञान दते हैं की हम वास्तव में इस जेल के निवासी नहीं अपितु परमात्मा की असीम सम्पत्ति हमारे प्रतीक्षा में है। शाश्वत, ज्ञानमय और आनंदमय जीवन हमारी प्रतीक्षा कर रहा है। हम चेतन और शाश्वत हैं और जड़ एवं अशाश्वत प्रकृति से हमारा संबंध नहीं बल्कि चेतन, शाश्वत और आनंदमय परमात्मा से है। जीवात्मा और परमात्मा सजातिय हैं जबकि जीवात्मा और प्रकृति विजातिय।

नित्यो नित्यानाम चेतनस्य चेतानानाम, एको बहूनां यो विदधाति कामान।

गुरु हमें रहस्य-मंत्र देकर जेल से बाहर जाने का रास्ता बता देते हैं। जब हमें पूर्ण-विश्वास हो जाता है की हम वास्तव में भगवान के हैं तो अपने हम भगवान की शरणागति करते हैं और भगवान हमें वैकुण्ठ-धाम में बास देते हैं।

दैवी ही ….

हम सभी अपने जीवन में अपनी रूचि के हिसाब से लक्ष्य निर्धारित करते हैं और लक्ष्य लक्ष्य तय करने के बाद लक्ष्य को प्राप्त करने का उपाय ख्होजाते हैं। इसे ही वेदांत की भाषा में ‘तत्त्व, हित, पुरुषार्थ’ कहते हैं। व्यक्ति जिस तत्त्व को यथार्थ मानता है, वैसा ही पुरुषार्थ (लक्ष्य) भी निर्धारित करता है और उसके बाद उपाय की तालाश करता है।

तत्त्व हित (उपाय) पुरुषार्थ (लक्ष्य)
१) अचित नौकरी,विवाह,रत्न, गाड़ी,महल,ब्यूटी-पार्लर इत्यादि ऐश्वर्यानुभवम (भौतिक सुख)
२) चित कर्म योग, ज्ञान योग कैवल्यानुभवं (आत्म-साक्षात्कार)
३) ईश्वर भक्ति योग, शरणागति कैंकर्यानुभवं (भगवत-साक्षात्कार)

 

अगर हम अचित (जड़) वस्तु को ही सच्चाई समझते हैं या अपने आप को चेतन जानने के बावजूद जड़ वस्तु को ही सर्वोत्तम मानते हैं तो हमारा पुरुषार्थ (लक्ष्य) होता है विषयों का भोग कर भौतिक सुख उठाना। भौतिक सुख के भी कई स्तर हैं। इन्द्रियों के सुख से उपर है मन का सुख और उससे उपर है बुद्धि का सुख और उससे भी ऊपर है अहंकार का सुख। जैसे भारत-पकिस्तान क्रिकेट मैच का आखिरी ओवर चल रहा हो और माँ हमें हमारा पसंदीदा खाना लेकर दे तो वो हमें नहीं रुचेगा क्योंकि मन का सुख इन्द्रियों के सुख से उपर है। बुद्धि का सुख उठा रहे वैज्ञानिक या शतरंज खिलाड़ी को इन्द्रियों या मन का सुख तुच्छ लगता है। अहंकार का सुख सबसे उपर है। मान लिया हमने महल तैयार किया या महंगी कार खरीदी तो उसका सुख हमें तबतक नहीं मिलेगा जबतक कोई आकर हमारे महल एवं कार की प्रशंसा ना करे या अपने से दूसरों की तुलना कर उसे तुच्छ न समझें। सुख वास्तव में महल, कार या गहनों में नहीं है क्योंकि ये सब तो अचेतन, ज्ञानहीन और निरानंद वस्तु हैं, सुख अहंकार को मिल रहा है।

जब व्यक्ति अपार भौतिक सुखों (पद, पैसा, प्रतिष्ठा, परिवार) के बावजूद शांति महसूस नहीं करता तो वह आत्म-चिंतन करता है। जब वह चेतन (आत्मा) को सर्वश्रेष्ठ समझता है तो आत्म-साक्षात्कार ही पुरुषार्थ बन जाता है और उपाय होता है कर्म-काण्ड या ध्यान-योग।

जब व्यक्ति यह महसूस करता है कि चेतन सर्वश्रेष्ठ तत्त्व नहीं अपितु वह ईश्वर के नियंत्रण में है तो भगवत-साक्षात्कार पुरुषार्थ बन जाता है। उपाय भक्ति या प्रपत्ति है जिसके बारे में विस्तार से अगले लेख में बताया गया है।

 

 

 

पञ्च-संस्कार: दीक्षा का अर्थ

“पञ्च संस्कार”

हमारे पूर्वाचार्यो के अनुसार, एक क्रिया-विधि है, जिसके द्वारा श्रीवैष्णव बना जाता है।  इस विधि को “संप्रदाय में दीक्षा” कहा जाता है। इसे ‘गुर्मुक’ होना भी कहते हैं। इसका अर्थ है गुरु, अग्नि एवं भगवान के समक्ष भगवान की शरणागति करना। पद्म पुराण में वैष्णव कि पहचान निम्न रूप में दी गयी है:

ताप: पुण्ड्र: तथा नाम: मंत्रो यागश्च पंचम:”(पद्म पुराण) विस्तृत अध्ययन के लिये निम्न लिंक को खोलें

दीक्षा

अर्थ-पंचक , श्री वैष्णव संप्रदाय का आधार

अर्थ पंचक का अर्थ है “पंच आधार” (जिसे आवश्यक रूप से समझा जाना चाहिए)।

प्राप्यस्य ब्रह्मणो रूपम्, प्राप्तस्य प्रत्यादात्तमन: ।
प्रप्तोपाय फलम् प्राप्ते:, तथा प्राप्ति विरोधि च ।।
वदन्ति सकला वेदाः, सेतिहास पुराणका: ।
मुनयेस्य महत्मान :, वेद-वेदान्त पारगा: ।।

अर्थ पंचक इस प्रकार हैं:

१) स्व-स्वरुप (जीवात्मा) : प्राप्तस्य प्रत्यादात्तमन:

२) पर-स्वरुप, परमात्मा-स्वरुप (ईश्वर, ब्रह्म) : प्राप्यस्य ब्रह्मणो रूपम्

३) प्राप्य-स्वरुप, उपेय-स्वरुप, फल-स्वरुप (पुरुषार्थ, लक्ष्य) :  फलम् प्राप्ते:

४) उपाय स्वरूप (साधन, हित) : प्रप्तोपाय

५) विरोधी स्वरुप (बाधाएं) : प्राप्ति विरोधि च

इसे आसान भाषा में इस प्रकार याद किया जा सकता है – YAHOO

Y- You (स्व-स्वरुप)

A- Access (पर-स्वरुप)

H- hita (उपाय स्वरूप)

O- objective (फल-स्वरुप) ;  O- obstruction (विरोधी स्वरुप)

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arth-panchak

References:

https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/thathva-thrayam/