तिरुपावै 13 वाँ पासूर

इस पासुर में एक ऐसी गोपी को जगाया जा रहा है जो अपने नैनों की सुंदरता के कारण विख्यात है। उपनिषद भाष्यकार उसे ‘पुष्प-सौकुमार्य-हरिनयन” गोपिका कहते हैं, जिन्हें अपने अतिसुन्दर आँखों पर सात्विक अभिमान है। ये सुन्दर आंखें भगवान को भी घायल कर देती हैं। भगवान से मिलन की यादों में ऐसी खोयी हैं कि सुबह उठ ही नहीं पायीं| सर्वगंध भगवान की खुशबु उनके महल में सर्वत्र थी। गोपी अपने मन में विचार करती है कि उसके नैनो से घायल भगवान स्वयं उसे खोजते उसके घर आएंगे।

वहीँ दूसरी ओर राम-पक्षपाती एवं कृष्ण-पक्षपाती गोष्ठियों में द्वंद्व हो जाता है| इसे नहीं-निंदा-न्याय ही समझना चाहिए। भगवान राम सौलभ्य-सौकुमार्य-माधुर्य-कारुण्य आदि गुणों की सीमा हैं। वह गुह को अपना ‘आत्मसखा’ कहकर गले लगाते हैं, सबरी के जूठे बैर खाते हैं और राक्षस विभीषण की शरणागति को स्वीकार करते हैं| वाल्मीकि उन्हें ‘अतीव-प्रियदर्शन’ ‘दृष्टिचित्तापहारिनम’ आदि विशेषणों से निवेदित करते हैं| दूसरी गोष्टी कहती है कि भगवान कृष्ण पूतना को भी माँ का दर्जा देते हैं, स्वयं अपने शरणागत के सारथी बनते हैं, उनके दूत बनकर जाते हैं, विदुर के घर साग खाते हैं|

समझदार और वृद्धा गोपियाँ बिच-बचाव करती हैं, “दोनों ही नारायण हैं”। राम को वाल्मीकि “भवान नारायणो देवः” कहते हैं तो कृष्ण को व्यास “नारायण: न हि त्वं!” ऐसा कहते हैं। सभी गोपियाँ मिलकर भगवान के दोनों ही स्वरूपों के लीलाओं का गान कर गोपिका को जगाती हैं। “जिन्होंने वकासुर का वध किया, दश सिरों वाले रावण का उद्धार किया।”

“बकासुर के मुख को फाड़ डालने वाले एवं अनायास ही (बिना किसी यत्न के) दुष्ट राक्षस (रावण) का वध करने वाले भगवान के पराक्रम का हम संकीर्तन कर रही हैं।”

कृष्ण-पक्षपाती एवं राम-पक्षपाती गोपियों में द्वन्द्व का गोदाम्बा समाधान करती हैं। बकासुर-हन्ता एवं रावण-हन्ता एक ही हैं।

पुळ्ळिन् वाय् कीण्डानैप् पोल्ला अरक्कनै

  किळ्ळिक् कळैन्दानैक् कीर्त्तिमै पाडिप्पोय्

पिळ्ळैगळ् एल्लारुम् पावैक्कळम् पुक्कार्

  वेळ्ळि एळुन्दु वियाळम् उऱन्गिऱ्ऱु

पुळ्ळुम् सिलम्बिन काण् पोदरिक्कण्णिनाय्

  कुळ्ळक् कुळिरक् कुडैन्दु नीरडादे

पळ्ळिक् किडत्तियो? पावाय् नी नन्नाळाल्

  कळ्ळम् तविर्न्दु कलन्दु एलोर् एम्बावाय्

व्रत धारिणी सभी सखियाँ, व्रत के लिये निश्चित स्थान पर पहुँच गयी है।

सभी सखियाँ सारस के स्वरुप में आये बकासुर का वध करने वाले भगवान कृष्ण और सभी को कष्ट देने वाले रावण का नाश करने वाले भगवान् श्रीरामजी का गुणानुवाद कर रही है।

आकाश मंडल में शुक्र ग्रह उदित हुये है, और बृहस्पति अस्त हो गये है। पंछी सब विभिन्न दिशाओं में दाना चुगने निकल गये।

हे! बिल्ली और हरिणी जैसे आँखों वाली, प्राकृतिक स्त्रीत्व की धनी!  क्या आज के इस शुभ  दिवस पर भी, हमारे साथ शीतल जल में स्नान न कर, हमारे साथ भगवद गुणानुवाद न कर, अकेली  अपनी शैया पर भ्रम में भगवान् सुख भोगती रहोगी ?

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आज त्रयोदश गाथा में ‘कुसुम-हरिण-नयन’ गोपी का उत्थापन हो रहा है।

उ वे मीमांसा शिरोमणि भरतन् स्वामी द्वारा संस्कृत छन्दानुवाद:

१३.बकासुरमुखच्छेत्तुर्दुष्टचेष्टस्य रक्षसः ।
अनायासेन संहर्तुः कीर्तयन्त्यः पराक्रमम् ।।
व्रतभूमिं गता बालाः सर्वा हरिणलोचने ! ।
दृश्यतेऽप्युदितः शुक्रो गुरुरस्तं गतस्तथा ।।
कूजन्ति पक्षिणः सर्वे परितः पङ्कजेक्षणे! ।
अस्माभिः सह संगम्य जले शीतेऽवगाह्य च ।।
नारीमणे ! त्वमस्नान्ती सुदिनेऽपि स्वपिष्यहो ।
रह: कृष्णेन भोगोऽत्र हेतुश्चेत्तमपि त्यज ।।

श्री उ वे रंगदेशिक स्वामी द्वारा विरचित ‘गोदा-गीतावली’ से संस्कृत गद्यानुवाद

श्री उ वे सीतारामाचार्य स्वामी द्वारा विरचित हिन्दी छन्द

यहाँ गोदाम्बा रावण का नाम भी नहीं लेना चाहतीं। सिर्फ ‘दुष्ट-राक्षस’ कहा है। ‘साधु-राक्षस’ विभीषण हैं। रावण ने सीताम्बा के प्रति जो अपचार किया है, उसके पश्चात उस दुष्ट का नाम लेना भी पाप है।

पूर्व में भी आया है “सिनत्तिनाल तेन इलंगै कोमानै सेत्त”। भगवान राम क्रोध को स्वीकार कर सुन्दर लंका को भस्म करते हैं। लंका की सुंदरता एवं रावण का वीर्य देखकर हनुमान भी विस्मित होकर कहते हैं यदि इसने अधर्म का आश्रय न लिया होता तो ये तीनों लोकों का रक्षक होता। भगवान ने भी उसके गर्व का खण्डन कर उसे सुधारने के अनेक प्रयत्न किए। उसके किरीट को गिराकर उसका गर्व भंग किया। फिर उसे रथ, शस्त्र आदि से रण में विहीन कर क्षमादान दे दिया। भगवान को आशा थी कि अब तो वो मेरे सौन्दर्य, औदार्य, वीर्य आदि देख मेरी शरण लेगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जब रावण ने उनके वाहन हनुमान को घाव दिए, तब भगवान क्रोध को धारण कर रावण का वध कर दिये। भगवान की करुणा और क्रोध, दोनों ही गुण हैं। क्रोध हमारे लिए दोष है क्योंकि हम क्रोध के वश में हो जाते हैं। जबकि भगवान लोक-कल्याण हेतु क्रोध को धारण करते हैं।

रावण प्रभु की वीरता का शिकार हुआ, सूर्पनखा प्रभु की सुन्दरता का और विभीषण प्रभु के दिव्य कल्याण गुणों का ।

यादवाभ्युदयम में श्री वेदान्ताचार्य स्वामी कहते हैं कि कन्हैया ने बकासुर के चोंच फाड़कर कर दो तरफ फेंक दिया और युवा गोपों ने उसके पंखों को नोंचकर तोरण बनाया ताकि फिर कभी यदि कोई भगवद अपचार को उद्यत हो तो उसे उसका परिणाम भी ज्ञात हो।

“प्रभात होने के तीन लक्षण गोदाम्बा बताती हैं:

  1. शुक्र ग्रह का उदय हो चुका है।
  2. वृहस्पति का अस्त हो रहा है।
  3. पक्षियाँ चहक रही हैं।

पक्षियों का चहकना तो 6ठे गाथा में भी कहा गया। यहाँ पुनरावृत्ति क्यों है? तब पक्षियों के अपने घोंसले से बाहर जाते समय परिजनों से बात करते हुए कलकल ध्वनि की चर्चा थी। अब तब के शोर की बात है जब वो आहार की तालाश में घूम रही हैं।

“हे पुष्प-हरि-नयन गोपी! उठो!

कृष्ण तुम्हारे नयनों से घायल होकर अवश्य तुम्हारे वश में हो जाएगा और हमें एच्छित ढोल प्रदान करेगा”

पुळ्ळिन् वाय् कीण्डानैप् : भगवान, जिन्होंने बकासुर का वध किया

यादवाभ्युदयम में श्री वेदान्ताचार्य स्वामी कहते हैं कि कन्हैया ने बकासुर के चोंच फाड़कर कर दो तरफ फेंक दिया और युवा गोपों ने उसके पंखों को नोंचकर तोरण बनाया ताकि फिर कभी यदि कोई भगवद अपचार को उद्यत हो तो उसे उसका परिणाम भी ज्ञात हो।

आतंरिक अर्थ

हम सब बगुले के समान कपटी हैं (बक-वृत्ति) । बगुला को बाहर से देखो तो साधू की तरह शान्त और ध्यानचित्त दिखता है लेकिन उसकी नजर अपने शिकार पर होती है। आचार्य इस बक-वृत्ति को श्री-सूक्ति का उपदेश कर नष्ट करते हैं, हमारे अन्दर सूक्ष्म नास्तिकता को दूर कर भगवद भक्त बनाते हैं।

बकासुर वो सभी लोग हैं जो बाह्य-रूप से वैष्णव दिखते हैं लेकिन उनसे मित्रता हमें आहिस्ता-अहिस्ता सद्मार्ग से दूर ले जाकर नास्तिक बना देती है ।

पोल्ला अरक्कनै : भगवान, जिन्होंने दुष्ट राक्षस (रावण) का वध किया

गोदा उस दुष्ट का नाम भी नहीं लेना चाहती जिन्होंने किशोरी जी को लाल जी से दूर किया । उसे दुष्ट राक्षस कहती हैं । विभीषण ‘साधू-राक्षस’ (नल्ला अरक्कन) है और रावण ‘दुष्ट-राक्षस’ ।

विभीषणः तु धर्मात्मा न तु राक्षस चेष्टितः | (रामायण)

आतंरिक अर्थ

रावण वो सभी लोग हैं जो दूसरों की सम्पत्ति चुराकर उसका भोग करना चाहते हैं, क्रोध, हवस और धन के मद में लोगों को त्रास देते हैं ।

हम भी भगवान की संपत्ति को भगवान से चुराकर उसे संसार में लगा रहे हैं । आत्मा भगवान की संपत्ति है और उसकी चोरी करने वाले हम सभी रावण ।

आचार्य हमारी इस रावण-वृत्ति को नष्ट कर भगवद-भागवत-कैंकर्य में लगाते हैं । रावण के दस मुख हमारी दस इन्द्रियाँ हैं ।

विभीषण सात्विक अभिमान हैं । आचार्य सात्विक अभिमान की रक्षा करते हैं और दुराभिमान को नष्ट करते हैं ।

अस अभिमान जाइ जनि भोरे। मैं सेवक रघुपति पति मोरे॥

  किळ्ळिक् कळैन्दानैक् : खेल-खेल में रावण का वध किया और विभीषण की रक्षा किया

प्रेमी जन अपने प्रेमास्पद की वीरता का गान कर गर्व अनुभव करते हैं

रावण प्रभु की वीरता का शिकार हुआ, सूर्पनखा प्रभु की सुन्दरता का और विभीषण प्रभु के दिव्य कल्याण गुणों का ।

 कीर्त्तिमै पाडिप्पोय् : उनकी कीर्ति का गान करेंगे

श्रीपरकाल आलवार के तिरुक्कोवलूर नामक दिव्य देश में जाते समय ‘समस्त प्रिय दिव्य देशों में (जाते समय) आपके दोनों चरणों का कीर्तन करके‘ इस उक्ति (स्वाभिमत दिव्यदेशे सर्वेष्वपि स्वचरणौ गीत्वा) के अनुसार और “पाथेयं पुण्डरीकाक्षनामसंकीर्तनामृतम्” के अनुसार भक्तों की शक्ति भगवान का नाम-संकीर्तन या द्वय-मन्त्रानुसन्धान ही होता है।

ब्राह्मो मुहूर्ते सम्प्राप्ते व्यक्तनीद्र: प्रसन्नधी: ।

प्रक्षाल्य पादावाचम्य हरिसंकीर्तनं चरेत् ।।

पिळ्ळैगळ् एल्लारुम् : छोटे उम्र की सभी लडकियाँ

पावैक्कळम् : व्रत के लिए पूर्व-निश्चित स्थान

पुक्कार् : पधार चुकी हैं

आतंरिक अर्थ

व्रत के लिए पूर्व-निश्चित स्थान का अर्थ है ‘कालक्षेप मण्डप’ जहां आचार्य श्री-सूक्तियों का उपदेश करते हैं और शिष्यगण अपने आचार्य का गुणानुवाद करते हैं ।

आगे गोदा प्रभात होने के लक्षण बताती हैं :

 वेळ्ळि : शुक्र ग्रह

एळुन्दु : उदय हो चूका है

 वियाळम् : वृहस्पति

उऱन्गिऱ्ऱु : अस्त हो चूका है

अन्दर सो रही गोपी प्रत्युत्तर देती हैं कि तुमलोग कन्हैया से मिलने को इतनी आतुर हो कि सभी तारें शुक्र और बृहस्पति प्रतीत हो रहे हैं । कोई और लक्षण हो तो बताओ ।

आतंरिक अर्थ

आचार्य के कालक्षेप से अज्ञान रूपी अन्धकार चला गया और ज्ञान रूपी प्रकाश का उदय हुआ ।

पुळ्ळुम् सिलम्बिन काण् : पक्षियाँ चहक रही हैं

पोदरिक्कण्णिनाय् : लाल कमल या हरिन के सामान आँखों वाली सखी

गोपी की आंखों की सुंदरता सम्मोहित करने वाली है। कन्हैया प्रथम प्रथम उसकी आंखों से ही सम्मोहित हुए थे। पुष्प सुकुमार  हरि नयन गोपी बिस्तर पर पड़े पड़े भगवान के दिव्य लीलाओं का गुना अनुवाद कर रही है वह पिछले रात सर्वगन्ध भगवान के साथ हुए मिलन के दिव्य गन्ध को अब तक अनुभव कर रही है

  कुळ्ळक् कुळिरक् कुडैन्दु नीरडादे : तुम शीत जल में स्नान किये बिना (कन्हैया के सानिध्य का आनंद ले रही हो)

 कृष्ण के विरह में हम सभी तप्त हैं, आओ इससे पहले कि सूर्योदय हो और जल भी तप्त हो जाए, हम ठण्ढे जल में स्नान करें।

आतंरिक अर्थ

काम और वासनाओं से तप्त जीवात्मा के लिए भागवतों का सहवास और आचार्य उपदेश ही शीतल जल में स्नान है । आचार्य और भागवतों का मंगलाशासन ही व्रत है।

पळ्ळिक् किडत्तियो? पावाय् नी नन्नाळाल्: तुम अब तक बिस्तर पर सो रही हो, यह कैसा आश्चर्य है

  कळ्ळम् तविर्न्दु कलन्दु : एकान्त में भगवद अनुभव का आनंद लेना छोड़ो

एलोर् एम्बावाय् : आओ हम अपना व्रत पूरा करें

तिरुपावै 12 वाँ पासूर

इस पाशुर में आण्डाल एक ऐसी सखी को जगा रही है, जिसका भाई कण्णन् (भगवान् कृष्ण) का प्रिय सखा है, जो वर्णाश्रम धर्म का पालन नहीं करता। जब कृष्ण वृन्दावन-गोवर्धन में रमण कर रहे होते हैं, तब इसी के कंधे पर हस्त रखकर भ्रमण करते हैं। कृष्ण-कैंकर्य में रत होने के कारण अपने वर्णाश्रम धर्म (गोपालन) में वांछित समय नहीं दे पाता।

जब पूर्ण निष्ठा और श्रद्धा से भगवान का कैंकर्य करते है, तब वर्णाश्रम धर्म के पालन का महत्व नहीं रहता। पर जब हम कैंकर्य समाप्त कर लौकिक कार्य में लग जाते है, तब वर्णाश्रम धर्म का पालन महत्वपूर्ण हो जाता है।

पिछले पासूर में गोदा गोपी को उसके कुल को ध्यान रख संबोधन करती हैं (ग्वालों के कुल में जन्मी सुनहरी लता, हेम लता!), इस पासूर में गोपी को उसके भाई के सम्बन्ध से पुकारती हैं (भगवत-कैंकर्य निष्ठ ग्वाले की बहन)| जिस दिवस गोदा गोपी के गृह उत्थापन हेतु पधारती हैं, उस दिवस उनका भाई कन्हैया के किसी विशेष कैंकर्य हेतु गया था। भगवत-भागवत-कैंकर्य विशेष धर्म है कि गायों को दुहना आदि वर्णाश्रम धर्म सामान्य धर्म हैं। प्रबल-निमित्त होने पर सामान्य धर्म को छोड़कर विशेष धर्म का पालन करना चाहिए| सामान्य परिस्थिति में उत्तम अधिकारी को भी नित्य-नैमित्यिक धर्म का परित्याग नहीं करना चाहिए। 

आज की गाथा में गोपी कहती हैं कि स्त्रियों के दुख को न जानने वाले कृष्ण का नाम मत लो। मृतकसंजीवन राम नाम लो, जिन्होंने अपनी प्रिय स्त्री के लिए रावण का वध किया।

“हम तेरे घर के प्रवेश द्वार पर खड़ी है, ओस की बुँदे हमारे सर पर गिर रही है।”

अन्दर से गोप-भगिनी गोपी कहती हैं, “उस छलिये कृष्ण का नाम न लो”।

गोदाम्बा प्रत्युत्तर देती हैं: “कृष्ण तो स्त्रियों का दुख नहीं जानता। हम मृतकसंजीवनी राम नाम गायेंगी।”

“हम भगवान राम, जिन्होंने सुन्दर लंका के अधिपति रावण पर क्रोध कर उसे मार दिया, जिनका नाम आनन्ददायक है,उनका गुण गा रहे हैं ।”

कनैत्तु इळन्गऱ्ऱु एरुमै कन्ऱुक्कु इरन्गि
  
निनैत्तु मुलै वळिये निन्ऱु पाल् सोर
ननैत्तु इल्लम् सेऱाक्कुम् नऱ्चेल्वन् तन्गाय्
  
पनित्तलै वीळ निन् वासल् कडै पऱ्ऱि
सिनत्तिनाल् तेन् इलन्गैक् कोमानैच् चेऱ्ऱ
  
मनत्तुक्कु इनियानैप् पाडवुम् नी वाय् तिऱवाय्
इनित्तान् एळुन्दिराय् ईदु एन्न पेर् उऱक्कम्
  
अनैत्तु इल्लत्तारुम् अऱिन्दु एलोर् एम्बावाय्

श्री उ वे भरतन् स्वामी द्वारा संस्कृत छन्दानुवाद

१२.महिष्यः कलिताक्रोशा दयमानाः स्ववत्सकान् ।
स्मृत्वा भावप्रकर्षेण क्षरन्त्यः पय ऊधसा ।।
पङ्किलं यस्य कुर्वन्ति गेहं तत्सच्छ्रियोऽनुजे ! ।
मस्तके वृष्टिपाते, तेऽवलम्ब्य द्वारदण्डिकाम् ।।
क्रोधाल्लङ्काधिनाथस्य निहन्तारं मनोरमम् ।
गायन्तीष्वपि हाऽस्मासु नोद्घाटयसि ते मुखम् ।।
उत्तिष्ठेतः परं वा भोः ! केयं निद्रा महत्यहो ।
जनै : सर्वैरिदं ज्ञातम् अतः शीघ्रं प्रजागृहि ।।

श्री उ वे रंगदेशिक स्वामी द्वारा विरचित ‘गोदा-गीतावली’ से संस्कृत गद्यानुवाद

श्री उ वे सीतारामाचार्य स्वामी द्वारा विरचित हिन्दी छन्द

कनैत्तु : हताश और आशाहीन होकर जोर से आवाज कर रहे हैं;

चूँकि गोप कन्हैया की सेवा में गया है, गायों को दूहने वाला कोई नहीं है। गायों के थान कठोर हो रहें हैं और वो दूहे जाने हेतु जोर जोर से आवाज कर रही हैं।

“गाय और भैंस, जिनके छोटे छोटे बछड़े है, अपने बछड़ों के लिये, उनके बारे में सोंचते हुये अपने थनो से दूध अधिक मात्रा में बह रही है, उनके थनो से बहते दूध से सारा घर आँगन में कीचड़ सा हो गया।”

(गायों को दूहने वाला कोई भी नहीं है। भूख से बछड़े आवाज कर रही हैं। भावप्रकर्ष में गायों के थान से दूध स्वयं ही निकल रहा है और सारा मैदान कीचड़-कीचड़ हो गया है।

पेरियावाच्चान पिल्लै लिखते हैं कि ऊपर वर्षा की धारा है, नीचे दूध की धारा और बीच में भक्ति की धारा। गोदाम्बा कहती हैं कि इन तीन धाराओं में हम फँस गयी हैं। व्रत को कैसे जाएं।)

आतंरिक अर्थ:

भक्तों के संसार में डूबकर दुख पाते देह भगवान व्यथित होते हैं, और गजेन्द्र की पुकार पर दौड़ पड़ते हैं| इस शब्द का अर्थ रामानुज स्वामीजी जैसे कृपा-मात्र-प्रसन्नाचार्य भी है जिन्होंने संसारियों के हित में गोपुरम पर चढ़कर सबको अष्टाक्षर का उपदेश किया।

(यहाँ भगवान श्रीमन्नारायण के करुणा, मार्दव, वदान्य आदि कल्याण गुणों का अनुभव करना चाहिए, जो अपने पुत्रों के लिए बह रहे हैं।

यहां कृपामात्र-प्रसन्नाचार्य रामानुज स्वामी का भी स्मरण करना चाहिए। शिष्यों की योग्यता परीक्षण किए बिना, जिसे भी मोक्ष की इच्छा हो, उन सभी को मन्त्रार्थ प्रदान किये हैं। चाहें मैं स्वयं नरक चला जाऊं किन्तु सभी को वैकुण्ठ चले जायेंगे। ऐसा था उनका कारुण्य। गोष्ठीपूर्ण स्वामी ने उनका अपार कारुण्य देख उन्हें ‘एम्पेरुमानार’ कहा।

इळन्गऱ्ऱु एरुमै : युवा बछड़ों के साथ भैंस;

कन्ऱुक्कु इरन्गि : बछड़ों के लिए दया महसूस करना;

गायें अपने बच्चों के लिए चिंतित हैं जो उनका दुग्धपान करने में असमर्थ हैं

आतंरिक अर्थ:

भगवान अनंत जन्मों से हमें प्राप्त करने के लिए स्वयं प्रयत्न कर रहे हैं किन्तु हम उनकी कृपा का अनुभव नहीं कर पा रहे हैं ।

निनैत्तु मुलै वळिये निन्ऱु पाल् सोर : (विचार में डूबे रहने के कारण) गाय के थन से दूध लगातार बहने लगता है;
ननैत्तु इल्लम् : पूरे स्थान को गीला करते हुए

सेऱाक्कुम् : धूल से मिलने के कारण कीचड़युक्त हो जाता है

जैसे श्री रामचंद्र हनुमान को लगे चोट को सहन नहीं कर पाते, कृष्ण द्रौपदी के दुखों को सहन नहीं कर पाते, वैकुंठनाथ भी सुक्ष्मावस्था में अचितवत पड़े जीवात्मा के दुखों को सहन नहीं कर पाते और उनके कल्याण हेतु श्रृष्टि करते हैं; जीवात्मा को पुर्वकर्मानुसार शरीर और ज्ञान प्रदान करते हैं ।

यहाँ गाय के चार थान का अर्थ श्री भाष्य, गीता भाष्य, भगवद विषय और रहस्य ग्रंथ हैं । आचार्य ही कृपा मात्र से प्रसन्न होने वाले गायें हैं और शिष्य बछड़े ।

नऱ्चेल्वन् : जिसे कृष्ण की सेवा का सबसे बड़ा धन प्राप्त है;

“हे ! ऐसे घर में रहने वाली, भगवान् कृष्ण के कैंकर्य धन से धनि ग्वाल की बहन!”

कैंकर्य ही जीवात्मा की सबसे बड़ी संपत्ति है । लक्ष्मणो लक्ष्मी सम्पन्नः, लक्ष्मणो लक्ष्मी वर्धनः (रामायण) ।

(श्री सम्पन्न गोप की भगिनी! इस प्रकार से इस गोपी को उसके भ्राता के देह सम्बन्ध से उसे पुकारती हैं। यदि देह-सम्बन्धी भागवत हों, तो उनसे देह-सम्बन्ध में भी अभिमान रखना चाहिए। कुरेश स्वामी प्रायः यह निराशा व्यक्त करते थे कि मैं दाशरथि एवं गोविन्द जीयर की भाँति रामानुज स्वामी का देह-सम्बन्धी नहीं हूँ।)

(इस गोप को श्री-सम्पन्न क्यों कहा गया है? उसके घर दूध तो व्यर्थ जा रहा है। पशुधन का समुचित देखभाल नहीं हो रहा है। तो श्री कैसा?

सम्प्रदाय में कैंकर्य ही हमारा धन है। जब लक्ष्मण वन को जा रहे थे तब वाल्मीकि कहते हैं, “लक्ष्मणो लक्ष्मी सम्पन्न:”। जबतक राजकुमार थे तबतक “लक्ष्मीसम्पन्न” नहीं कहा। राज्य का त्याग करने पर ‘लक्ष्मीसम्पन्न’ कहे गए। भगवान राम का कैंकर्य मिलने पर ही उन्हें ‘लक्ष्मीसम्पन्न कहा गया।

‘भवांस्तु सह वैदेह्या गिरिसानुषु रंस्यते।
अहं सर्वं करिष्यामि जाग्रत स्स्वपतश्च ते’ ।।2.31.25।।

उसी प्रकार विभीषण मित्र, धन, महल आदि सहित लंका का परित्याग कर राम की ओर प्रयाण किया, तब वाल्मीकि कहते हैं “अन्तरिक्ष गत: श्रीमान“। सर्वस्व का त्याग करते हुए भी ‘श्रीमान’ हो गए।

गजेन्द्र अनेक काल तक ग्राह से युद्ध करते-करते थककर, हार मानकर भगवान की शरणागति करता है, तब कहते हैं ” नागराज श्रीमान“।

भगवान को मानसिक रूप से उपाय-उपेय स्वीकार करना ही वास्तविक धन है।

तन्गाय् : ओह! उसकी बहन;

ऐसे परम-वैष्णव का देह-सम्बन्धी होना परम सौभाग्य है ।

शास्त्रों में अहंकार की निंदा की गयी है लेकिन – आचार्याभिमान मोक्षाधिकार होता है|

  पनित्तलै : सिर पर गिर रहे ओस की बूंदों के बीच;

वीळ निन् वासल् कडै पऱ्ऱि : हम आपके आंगन में खड़े हैं;


सिनत्तिनाल् : क्रोध के कारण मारा गया (सीता देवी के अपहरण के लिए);

तेन् इलन्गैक् कोमानैच् चेऱ्ऱ : लंका का धनी राजा रावण

रावण के दिए घावों से भगवान विचलित नहीं हुए लेकिन जब रावण ने भगवान के तिरुवडी अर्थात हनुमान जी पर प्रहार किया तो भगवान क्रोधित हुए और रावण पर बाणों की वर्षा कर कर दिया

भगवान भागवतों पर किये गए अपचारों को क्षमा नहीं करते ।

आतंरिक अर्थ:

आचार्य हमारे स्वातन्त्रियम को नष्ट कर शरणागत बनाते हैं ।


  मनत्तुक्कु इनियानैप् : श्री राम जो हमारे मन को प्रसन्न करते हैं;

हमारे मन को प्रसन्न करने वाले: इस शब्द का अर्थ केवल श्री रामचंद्र ही हो सकता हैराम का अर्थ ही है : रमयति इति रामः ।

पाडवुम् : (हम) गाने के बाद भी;

नी वाय् तिऱवाय् : तुम अपने मुखारविन्द नहीं खोलती, अवाक हो!

सखी , “तुम अन्दर क्यों नहीं आती, बाहर ओस में क्यों खड़ी हो?

गोदा, “सारा द्वार तो दूध बहने से कीचड़युक्त हो गया है, हम कैसे आयें?”

सखी , “तुम उस छलिये कन्हैया का नाम मत लो”

गोदा, “हम प्रभु श्री रामचन्द्र जी के गुण गा रही हैं जो सबके मन में रमण करने वाले हैं, शत्रुओं पर भी दया करने वाले हैं”


इनित्तान् : कम से कम अब

एळुन्दिराय् : उठ जाओ

ईदु एन्न पेर् उऱक्कम् : ऐसा भी क्या अच्छी निद्रा है
  
अनैत्तु इल्लत्तारुम् : आस पड़ोस के सभी लोग

अऱिन्दु : जान गए कि तुम सो रही हो

एलोर् एम्बावाय् : चलो अपना व्रत पूरा करें

हे! सखी ! कुछ बोल नहीं रही हो, कितनी लम्बी निद्रा है तुम्हारी, अब तो उठो,  तिरुवाय्प्पाडि  (गोकुल} के सभी वासी तुम्हारी निद्रा के बारे में जान गये है।

ऐसे ज्ञानी भाई की बहन इतनी अज्ञानी कैसे हो सकती है । सात्विक जन ब्रह्म-मुहूर्त में उठते हैं, भगवान भक्तों की पुकार सुन उठते हैं और तुम चरमोपाय निष्ट भागवत गोष्टी को देख उठती हो|

अगर तुम भगवद-विषय में लीन हो तो ऐसे विषय का अकेले आनंद नहीं उठाना चाहिए|

तिरुपावै 11 वाँ पासूर

इस पाशुर में वर्णाश्रम धर्म का पालन बतलाया है।

आज की गाथा में जिस सखी का उत्थापन हो रहा है, उसका नाम सौवर्णलतिका सखी या कनकलता बाला (स्वर्ण लता सी सखी) है। गोकुल की विशाल गौ-सम्पदा एवं गोपी के सौन्दर्य एवं लावण्य से उसका सम्बोधन उसे जगाया गया है।

पिछले पासुर में गोदा एक आदर्श शरणागत को दर्शाती हैं| अब प्रश्न ये उठता है कि क्या भगवान को ही सिद्ध साधन मानने वाले, भगवान पर परम पुरुषार्थ का भार छोड़ निश्चिंत रहने वाले अपने कर्मों का भी त्याग कर देते हैं? इस पासुर में गोदा दर्शाती हैं कि परमैकान्ति भी अपने कर्मों का त्याग नहीं करते| भगवान अपने दासों को शास्त्र-विहित कर्मों में प्रेरित करते हैं|

प्रतिवादि भयंकर स्वामी इस गोपी को उत्तम अधिकारी कहते हैं जो लता के समान अपने आचार्य पर आश्रित है| पारतंत्रियम ही इस लता का सुगंध है|

कऱ्ऱुक् कऱवैक् कणन्गळ् पल कऱन्दु
  सेऱ्ऱार् तिऱल् अलियच् चेन्ऱु सेरुच् चेय्युम्
कुऱ्ऱम् ओन्ऱु इल्लाद कोवलर् तम् पोऱ्कोडिये
  पुऱ्ऱरवु अल्गुल् पुनमयिले पोदराय्
सुऱ्ऱत्तुत् तोळिमार् एल्लारुम् वन्दु निन्
  मुऱ्ऱम् पुगुन्दु मुगिल् वण्णन् पेर् पाड
सिऱ्ऱादे पेसादे सेल्वप् पेण्डाट्टि नी
  एऱ्ऱुक्कु उऱन्गुम् पोरुळ् एलोर् एम्बावाय्

हे गोकुल के उस महान कुल में जन्म लेने वाली सौवर्णलतिका सखी! जहाँ असंख्य संख्या में दुधारू बाल धेनु के समूह हैं, जो अत्यधिक संख्या में दूध प्रदान करती हैं। ऐसे गायों को दूहने वाले गोपगण, जो शत्रुओं के घर में जाकर उनके बल का नाश करते हैं एवं युद्ध में विजयी होते हैं।

हे! स्वर्णलता सी सखी, जिसकी कमर बिल में रह रहे सर्प के फन की तरह है और  अपने निवास में मोर की तरह है,अब तो बाहर  आओ|

हम सब तुम्हारी सखियाँ, जो तुम्हारी  रिश्तेदारों की तरह है , सभी तुम्हारे आँगन में खड़े, मन मोहन मेघश्याम वर्ण वाले भगवान् कृष्ण के दिव्य नामों का गुणगान कर  रहें हैं । तुम क्यों अब तक  बिना  हिले डुले, बिना कुछ बोले निद्रा ले रही हो?

उ वे मीमांसा शिरोमणि भरतन् स्वामी द्वारा अनुगृहीत एकादश गाथा का संस्कृत छन्दानुवाद

११.गणानां बालधेनूनां सुबहूनां दुहां यथा ।
शत्रूणां बलनाशः स्यात् तथा युद्धं वितन्वताम् ।।
निर्दोषगन्धगोपानां सौवर्णलतिके सखि ! । वल्मीकस्थितसर्पस्य भोगोपमनितम्बिनि ! ।।
श्रीमतित्वं समायाहि वन्यबर्हिर्णसन्निभे ! ।
सर्वाः सख्यः समागत्य प्रविश्य त्वद्गृहाङ्गणम् ।।
मेघश्यामस्य नामानि कीर्तयन्त्ययि ! सम्प्रति ।
कुतस्तथाऽपि निद्रासि वाचं च चलनं विना ।।

श्री उ वे रंगदेशिक स्वामी द्वारा विरचित ‘गोदा-गीतावली’ से संस्कृत गद्यानुवाद

श्री उ वे सीतारामाचार्य स्वामी द्वारा विरचित हिन्दी छन्द

पिछले पासुर में गोदा एक आदर्श शरणागत को दर्शाती हैं| अब प्रश्न ये उठता है कि क्या भगवान को ही सिद्ध साधन मानने वाले, भगवान पर परम पुरुषार्थ का भार छोड़ निश्चिंत रहने वाले अपने कर्मों का भी त्याग कर देते हैं? इस पासुर में गोदा दर्शाती हैं कि परमैकान्ति भी अपने कर्मों का त्याग नहीं करते| भगवान अपने दासों को शास्त्र-विहित कर्मों में प्रेरित करते हैं|

कऱ्ऱुक् कऱवैक्– दुधारू गायें;

गोकुल का धन क्या है? गायें| गायें चिर-यौवन को प्राप्त, बड़े-बड़े थान वालीं होती थीं| हो भी क्यों न| आखिर उन गौवंशों को स्वयं कृष्ण का स्पर्श प्राप्त था| ६०००० साल के राजा दशरथ जब राम के दर्शन करते हैं तो स्वयं तो नवयुवक की भाँती पाते हैं| गायों की तो बात ही क्या कहें जिन्हें गोविंद पुचकारते हैं, अपने दिव्य हस्तों से स्पर्श करते हैं| गोकुल की गायें का भोजन भगवान की बाँसुरी के सुर हैं| ऐसे गायों के दूध के बारे में क्या चर्चा की जा सकती है?  

कणन्गळ् पल– असंख्य की संख्या में;

गोकुल में असंख्य गायों के झुण्ड हैं और हर झुण्ड में असंख्य गायें हैं|

आतंरिक अर्थ

यहाँ असंख्य संख्या से भगवान के अनन्त गुण समूहों का स्मरण होता है।

संख्याता नैव शक्यन्ते गुणा: दोषा: च शार्ङ्गिण:।
अनन्तश्च प्रथमो राशि अभावो इति पश्चिम:।

भगवान के गुणों के समूहों की गणना नहीं कर सकते क्योंकि वो अनन्त हैं। भगवान के दोषों की भी गणना नहीं कर सकते क्योंकि वो हैं ही नहीं।

उसी प्रकार यहाँ नारायण शब्दार्थ भी प्राप्त होता है। नर के समूह को नार कहते हैं। ऐसे अनेक समूह होने के कारण नार का बहुवचन है नारा:। नारों के अयन हैं नारायण।

जिस प्रकार आकाश के तारे अनन्त हैं, उसी प्रकार भगवद रामानुज स्वामीजी के सद्शिष्यों की गिनती भी अनंत है| शिष्यों के पाप भी अनन्त हैं लेकिन बलिष्ट गोपों की भाँती रामानुज सम्बन्ध भी पापों का उन्मूलन कर मोक्ष प्रदान करता है|

नार का अर्थ है नरों के समूह| नर का अर्थ है जिसका कभी नाश न हो अर्थात जीवात्मा| जीवात्मा अनन्त हैं और उनके अन्दर अन्तर्यामी रूप में और बाहर बहिर्व्याप्ति में निवास करने वाले हैं नारायण| 

अणोरणीयान् महतो महीयान् आत्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम् (कठोपनिषद)

अणोरणीयान् महतो महीयान्
आत्मा गुहायां निहितोऽस्य जन्तोः ।
तमक्रतुं पश्यति वीतशोको
धातुः प्रसादान्महिमानमात्मनः ॥ – श्वेताश्वतरोपनिषत् ३-२०

कऱन्दु– दूहना;

गोकुल के गोप और गोपियाँ वर्णाश्रम धर्म में निपुण हैं| गायों को दुहना को दुष्कर कार्य नहीं| उनके थान दूध से लबालब होती हैं| एक गाय, थान छूते हीं, अनेक बाल्टियाँ भर सकती हैं| दूध बाल्टियों से भरकर नीचे गिरते हैं और सर्वत्र दूध की सुगन्ध फैल जाती है|

आतंरिक अर्थ

अनंत गायों के दूहने का अर्थ है अनन्त भगवान नारायण के अनन्त नाम, रूप, लीला आदि का स्मरण और चिंतन करना|

दूसरा आतंरिक अर्थ है आचार्य का अनन्त शिष्यों को ज्ञानोपदेश करना| जिस प्रकार आकाश के तारे अनन्त हैं, उसी प्रकार भगवद रामानुज स्वामीजी के सद्शिष्यों की गिनती भी अनंत है| शिष्यों के पाप भी अनन्त हैं लेकिन बलिष्ट गोपों की भाँती रामानुज सम्बन्ध भी पापों का उन्मूलन कर मोक्ष प्रदान करता है|

सेऱ्ऱार्  शत्रु;

तिऱल् अलियच्– बल को नष्ट कर देना;

चेन्ऱु सेरुच्– जो शत्रुओं के इलाके में जाते हैं;

चेय्युम्: जो युद्ध में विजयी होते हैं;

गोप अत्यंत बलवान हैं| गोपों के शत्रु कौन हैं? भगवान के शत्रु ही गोपों के शत्रु हैं| कंस ने अनेक दैत्यों को भेजा लेकिन स्वयं कभी गोकुल नहीं आया| इसका कारण शक्तिशाली गोपों का भय था|

आतंरिक अर्थ:

हमारे शत्रु : उपायांतर (कर्म, ज्ञान, भक्ति योग), उपेयांतर  (भगवान से तुच्छ वस्तुओं की माँग करना), अहंकार (स्वतंत्र बुद्धि, मोक्षोपाय हेतु प्रयत्न करना)

कुऱ्ऱम् ओन्ऱु इल्लाद बिल्कुल दोषरहित;

कोवलर् तम् पोऱ्कोडिये – ग्वालों के कुल में जन्मी सुनहरी लता, हेम लता!

 पुऱ्ऱरवु अल्गुल्  : तुम्हारे कटि सर्प के समान हैं

पुनमयिले – अपने घरेलू मैदान में मोर की तरह;

पोदराय्– कृपया बाहर आओ!

यहाँ सुनहरी लता कहकर समुध्य शोभा का वर्णन है और सर्प के समान कटि प्रदेश कहकर अवयव शोभा (अंग विशेष) की शोभा का वर्णन है| क्या एक स्त्री दूसरे स्त्री के सौन्दर्य पर मुग्ध हो सकती है?

द्रौपदी की शोभा देख स्त्रियाँ मुग्ध होकर सोचती थीं कि काश मैं पुरुष होती| भगवान श्री रामचंद्र के शोभा को देख दंडकारण्य के ऋषि सोचते थे कि काश मैं स्त्री होता|

आतंरिक अर्थ

श्री वैष्णव भी आचार्य के दिव्य मंगल विग्रह के सौन्दर्य का अनुसंधान करते हैं| गोष्ठिपूर्ण स्वामी अपने आचार्य अलवंदार के पीठ की शोभा से मुग्ध हो उसे कछुए कके पीठ के समान अपना रक्षक मानते थे| कलिवैरी दास स्वामीजी के शिष्य सिर्फ इसलिए जीवित रहना चाहते थे ताकि अपने अपने आचार्य के श्री मुखमंडल से टपक रहे पानी के बूंदों (कावेरी स्नान के पश्चात) का दर्शन कर सकें|

प्रतिवादी भयंकर स्वामी इस गोपी को उत्तम अधिकारी कहते हैं जो लता के समान अपने आचार्य पर आश्रित है| पारतंत्रियम ही इस लता का सुगंध है|

आचार्य भी मोर की भाँती हैं| जिस प्रकार जहरीले कीट मोर से दूर रहते हैं, उसी प्रकार विरोधी स्वरुप भी शिष्य से दूर रहते हैं| जिस प्रकार मोर प्रसन्न होकर अपने पंख फैलाकर नृत्य करती है, उसी प्रकार आचार्य भी सद्शिष्य को पाकर प्रसन्न होकर ज्ञान विकास करते हैं|  

सुऱ्ऱत्तुत् तोळिमार् एल्लारुम् – आपके सभी रिश्तेदार और दोस्त;

 वन्दु – इकट्ठे हुए हैं;

निन् मुऱ्ऱम् पुगुन्दु – आपके आंगन में;

मुगिल् वण्णन् पेर् पाड– काले बादलों की तरह रंग वाले उस सुंदर कृष्ण के दिव्य नामों को गाते हुए भी;

आत्म और देह बंधू महान व्यक्तियों के पास इकठ्ठे होते हैं| एम्बार और दासरथी स्वामी रामानुज स्वामी के देह सम्बन्धी थे और कुरेश स्वामी, किदाम्बी आच्चान आदि उनके आत्म-सम्बन्धी|

सिऱ्ऱादे पेसादे – स्थिर और शान्त (अचल और अवाक);

सेल्वप् पेण्डाट्टि नी– आप, जो हमारे लिए धन हैं;

एऱ्ऱुक्कु उऱन्गुम् पोरुळ् एलोर् एम्बावाय्– तुम अभी तक क्यों सो रहे हो?

स्थिर और शान्त तुम भगवद अनुभव में लीन हो| अपने पारतंत्रियम के ज्ञान के कारण तुम सोचती हो कि यह भगवान का कर्तव्य है कि तुम्हें आकर प्राप्त करें, तुम स्वयं से कोई प्रयत्न नहीं करना चाहती| परन्तु हम तुम्हारे सौन्दर्य को देखना चाहते हैं| जिस प्रकार तुम्हारा भ्राता अपने वर्णाश्रम धर्म में रत हैं, हमें भी कैंकर्य में विलम्ब नहीं करना चाहिए| उठो सखी, भागवतों की गोष्ठी में सम्मिलित हो

तिरुपावै 9वाँ पासूर

तूमणि माडत्तुच् चुऱ्ऱुम् विळक्केरिय
  दूपम् कमळत् तुयिल् अणै मेल् कण् वळरुम्
मामान् मगळे मणिक्कदवम् ताळ् तिऱवाय्
   मामीर् अवळै एळुप्पीरो? उन् मगळ्दान्
ऊमैयो अन्ऱिच् चेविडो अनन्दलो?
  एमप् पेरुन्दुयिल् मन्दिरप्पट्टाळो?
मामायन् मादवन् वैगुन्दन् एन्ऱु एन्ऱु
  नामम् पलवुम् नविन्ऱु एलोर् एम्बावाय्

श्रीरंगम् उ वे मीमांसा शिरोमणि भरतन् स्वामी द्वारा नवम् गाथा का संस्कृत छन्दानुवाद।

९. रत्नैः स्वच्छैः कृते हर्म्ये दीपे ज्वलति सर्वतः ।
प्रसृते धूपगन्धे च शयाने! मृदुतल्पके ।।
मातुलस्य सुते ! शीघ्रं कवाटं मणिनिर्मितम् ।
निरर्गलीकुरुष्व त्वं तामुत्थापय मातुलि ! ।।
दुहिता तव मूका किम् एडा वा तन्द्रिता किमु ।
मन्त्रैर्वा दीर्घनिद्रायां बद्धा किं वा निरोधिता ।।
महामायेति वैकुण्ठेत्यम्बुजारमणेति च ।
एवं बहूनि नामानि संकीर्यैनां प्रबोधय ।।

आज जिस गोपी का उत्थापन हो रहा है वो गोदाम्बा की मामा की पुत्री है। यूँ तो हमारे लिए देह सम्बन्ध में आसक्ति रखना उचित नहीं है, वैष्णव आत्मबन्धुओं से ही सम्बन्ध रखना चाहिए। (यहाँ वशिष्ठ जी का पुत्र शक्ति की मृत्यु के बाद एवं भगवान व्यास का पुत्र शुकदेव जी के सन्यास के पश्चात देहसम्बन्ध के प्रति आसक्ति ध्यातव्य है। इस कारण हमारे आळ्वार ऋषियों से भी श्रेष्ठ हैं।) किन्तु यदि देहसम्बन्धी यदि आत्मबन्धु भी हों तो यह परम आश्चर्य की बात है। इससे उत्तम क्या हो सकता है।

उसका घर परिशुद्ध मणियों से निर्मित है। शठकोप आळ्वार भी एक स्थान पर कहते हैं “यहाँ सबके घर दोषरहित मोतियों से निर्मित हैं।”
आचार्यों के अनुसार यहाँ दोषरहित मुक्त जीव को कहा गया है (जो पहले दोषयुक्त थे, अब भगवद-कृपा से दोषरहित हो नित्य लोक में हैं।) परिशुद्ध नित्य जीवों को कहा गया है। वो अस्पृष्ट-संसार-गन्ध हैं।
स्वामी श्री जनन्याचार्य के अनुसार पिछले पाशुर में गोपियों ने एक मुक्तात्मा गोपी (कृष्णवाल्लभ्यशालिनी गोपी) को जगाया और अब एक नित्य जीव गोपी को जगा रहे हैं ।

मानो श्री कृष्ण का स्वागत करने के लिए, इस गोपी ने अपने पूरे महल में दीप जलाए हैं ताकि श्री कृष्ण उसका हाथ पकड़ कर यहां टहल सकें, या शायद केवल एक ही दीपक प्रज्वलित था, किंतु उस एक दीपक की ही अनगिनत परछाइयां महल में जड़े हुए रत्नों में खूबसूरती से जगमगा रहीं थीं ।

अन्दर धूप की सुन्दर खुशबू फैली है और गोपी सुन्दर मृदु और नरम विस्तर पर सोयी है।

“क्या यह बिस्तर इतना मुलायम है की श्री कृष्ण विरह के महान दुख को भी शांत कर दे?”

“परिशुद्ध रत्न से निर्मित घर में, जो दीयों के प्रकाश से जगमग है, सर्वत्र धूप की सुगन्ध है (अर्थात कृष्ण तुम्हारे घर आये होंगे, तुमने अकेले ही आनन्द ले लिया) उसमें मृदु विस्तर पर सो रही मामा की पुत्री! उठो, मणिमय द्वार को खोलो।”

यहाँ गोपियाँ कठोरता दिखाते हुए, “मेरी सखी” न कहके अपने मामा से उसके सम्बन्ध से “मामा की बेटी” कहकर बुलाती हैं।

लेकिन कृष्णानुभव में लीन मातुलपुत्री गोपी फिर भी न उठी तो गोपियों ने अब अपनी मामी को पुकारा! देहसम्बन्ध के कारण, कड़े शब्दों का भी प्रयोग करती हैं।

“हे मामी! आप क्यों इसे जगा रहीं हैं? क्या आपकी बेटी मूर्ख है? गूँगी है? बहरी है? अथवा थककर सोयी है (कृष्ण के साथ अकेले-अकेले क्रीडा करके), किसी के द्वारा मन्त्रशक्ति से परवश की हुई है?

हम कब से भगवान के अनेक नामों का कीर्तन कर रही हैं। “महामायापति! माधव (अम्बुजारमण)! वैकुण्ठ!”

अथवा तीन वर्गीकरण के नामों का कीर्तन कर रही हैं: मायि (सौलभ्य), माधव (लक्ष्मीपति), वैकुण्ठ (परत्व)। माधव नाम मध्य में लेने का अर्थ है कि सौलभ्य और परत्व, दोनों ही लक्ष्मीपतित्व के कारण ही है। यही भगवान का असाधारण गुण है।

अब गोपी जागती है। “तुमलोगों ने भगवान का सहस्रनाम ही नहीं, मेरा भी सहस्रनाम बोल लिया। गूँगी, बहरी, मूर्ख, आलसी, अभिमन्त्रित आदि।”

मातुलपुत्री गोपी उठकर परिशुद्ध रत्नमय किवाड़ खोलती हैं और गोदाम्बा की गोष्ठी में शामिल हो जाती हैं।

श्री प्रतिवादी भयंकर अण्णंगराचार्य स्वामीजी महाराज कहते हैं कि “मणि

तूमणि माडत्तुच् चुऱ्ऱुम् विळक्केरिय
दूपम् कमळत् तुयिल् अणै मेल् कण् वळरुम्
मामान् मगळे मणिक्कदवम् ताळ् तिऱवाय्
मामीर् अवळै एळुप्पीरो? उन् मगळ्दान्
ऊमैयो अन्ऱिच् चेविडो अनन्दलो?
एमप् पेरुन्दुयिल् मन्दिरप्पट्टाळो?
मामायन् मादवन् वैगुन्दन् एन्ऱु एन्ऱु
नामम् पलवुम् नविन्ऱु एलोर् एम्बावाय्

इस पाशुरम् में एक ऐसी गोपी को जगाया जा रहा है जो कि आत्म तत्त्व का पूर्ण ज्ञान रखने वाली तथा एक आदर्श शरणागत हैं। इन गोपिका को यह पूरी जानकारी है कि यह श्री कृष्ण का कर्त्तव्य है कि वे उन्हें लेने आएं और उनके साथ रहें, क्योंकि वह समझती हैं कि हमारा स्वभाव श्री कृष्ण के परतंत्र ही रहने का है और श्री कृष्ण का स्वभाव भी आकर हमें (भवसागर से) बचाने का है ।

अन्य गोपियों सहित किशोरी श्री गोदा महारानी अपने मामा अर्थात अपनी माता के भाई, की बेटी को जगाने आयी हैं । चूंकि वे करीबी संबंधी हैं अतः गोदा उनसे व्यंग्यपूर्ण ढंग से बात करती हैं । अपने सगे संबंधियों में सब व्यंग्य और हास्यपूर्वक बात करते हैं और कोई भी उससे दुखी नहीं होता वरन् सुखी ही होते हैं । वे वक्ता के भाव समझ लेते हैं ।
ऐसा प्रतीत होता है कि यह गोपी कण्णा को परम प्रिय थी क्यूंकि वे इस गोपी से नित्य मिलने आया करते थे । इनका पूरा घर भी परम सुंदर है, जिसमे मीठी खुशबू से भरे सुंदर कमरे हैं जिनमें रत्न जटित सुकोमल शैय्या है, और इनके घर के आंगन में सुंदर बगीचा भी है । और यह किशोरी गोपी श्री कृष्ण के साथ अपने अनुभव को याद करते हुए समाधिस्थ हैं । स्वामी श्री जनन्याचार्य के अनुसार पिछले पाशुर में गोपियों ने एक मुक्तात्मा गोपी को जगाया और अब एक नित्य जीव गोपी को जगा रहे हैं ।

तूमणि माडत्तुच्
।।
। । स्वभाव से शुद्ध और कीमती रत्नों से जगमगाता हुआ महल।

रत्न दो प्रकार के होते हैं । पहले प्रकार के रत्न नित्य शुद्ध व तीनों कालों में दोषों से सदैव अछूते रहते हैं । दूसरे प्रकार के रत्नों में शुरुआत में कुछ दोष रहते हैं किन्तु फिर तराश कर उन्हें भी शुद्व कर दिया जाता है । इसी प्रकार नित्यात्माएं तथा श्री गरुड़ जी, श्री विष्वक्सेन जी, श्री पांचजन्य जी आदि सदैव से मुक्त रहे हैं और मुक्तात्माएं कभी संसार में थी किन्तु अब श्री वैकुंठ में हैं ।


आंतरिक अर्थ


श्री प्रभु का निवास कहां है? हमारे हृदय में । हमारा निवास कहां है? श्री प्रभु के हृदय में । हमारा हृदय श्री प्रभु का निवास स्थान है और श्री प्रभु का हृदय हमारा निवास स्थान है । तथापि हमारा हृदय कर्म द्वारा दूषित है । हमारा शरीर भी पंच महाभूतों से बना है अतः यह भी दूषित है । अतः श्री प्रभु का घर दूषित है लेकिन हमारा घर (श्री प्रभु का हृदय) परम शुद्ध है । इसी प्रकार इस गोपी का घर मणियों से सज्जित है । महान भक्तों का निवास सदैव श्री प्रभु के हृदय में रहता ही है । हम सब भी रत्न ही हैं किन्तु दूसरे प्रकार के, यानी कि अभी दोषों से युक्त हैं । श्री प्रभु हमारे हृदय में रहकर हमें साफ करते हैं । जिस प्रकार रत्न प्रकाश में चमकते हैं, हम भी ज्ञान रूपी चमक से युक्त हैं । हमारा ज्ञान अल्प है वहीं श्री प्रभु का ज्ञान पूर्ण है ।


श्री प्रतिवादी भयंकर अण्णंगराचार्य स्वामीजी महाराज कहते हैं कि “मणि माडत्त” असल में जीवात्मा व ब्रह्म के बीच प्रकाशवान नवविध संबंध है हैं । “तूमणि माडत्त” उसे समझने के लिए हमारी बुद्धि अथवा धर्मभूत है

चुऱ्ऱुम् विळक्केरिय – सब जगह दिव्य दीपक जगमगा रहे हैं ।
चुऱ्ऱुम् – सब जगह
विळक्केरिय – दिव्य दीपक


मानो श्री कृष्ण का स्वागत करने के लिए, इस गोपी ने अपने पूरे महल में दीप जलाए हैं ताकि श्री कृष्ण उसका हाथ पकड़ कर यहां टहल सकें, या शायद केवल एक ही दीपक प्रज्वलित था, किंतु उस एक दीपक की ही अनगिनत परछाइयां महल में जड़े हुए रत्नों में खूबसूरती से जगमगा रहीं थीं ।
लेकिन दरवाजा खोलने के लिए प्रार्थना करने वाली गोपियों को अंदर विराजमान प्रकाश का भान कैसे हुआ? क्योंकि महल रत्न जड़ित है अतः कुछ हद तक पारदर्शी भी है, इसी से वे अंदर देख पाईं । आंडाल दुखी होकर कहती हैं कि इधर हम सबके हृदय अंधकार में डूब रहे हैं, उधर तुम प्रकाश से भरे हुए कमरे में किस तरह सो सकती हो?

आंतरिक अर्थ


यद्यपि रत्न हों, तथापि बगैर प्रकाश के कुछ नहीं देखा जा सकता । हम अकार वाच्य नारायण को शास्त्र वचन के बगैर नहीं समझ सकते । यह किशोरी कहीं दीयों के बीच में है, अर्थात शास्त्र प्रमाणों के बीच में है । जब दिए अच्छी तरह जलाए जाएंगे, हम ब्रह्म के बारे में सही जिज्ञासा कर पाएंगे (शास्त्रयोनित्वात्, १.१.३ ब्रह्म सूत्र) । वेद ज्ञान के मुख्य स्रोत है, और इतिहास व पुराण उनके साथ ही व्याख्यात्मक रूप में हैं ।


दूपम् कमळत् तुयिल् अणै मेल् कण् वळरुम्


दूपम् कमळ – धूप की सुंदर खुशबू जो फैली हुई है
तुयिल् अणै मेल् – एक नरम मुलायम बिस्तर के ऊपर (जो हर उस व्यक्ति को सुला देगा, जो उस पर लेटेगा)
कण् वळरुम् – तुम लेटी हुई सोई हो ।


जब इधर हम हमारे प्रिय कृष्ण के विरह में हैं, तब उधर तुम किस तरह धूप की सुंदर खुशबू का आनंद ले सकती हो? यह बिस्तर इतना मुलायम है की यदि कोई व्यक्ति न भी चाहे तो भी इस पर उसे नींद आ जाएगी । गोपियां सोचती हैं, “क्या यह बिस्तर इतना मुलायम है की श्री कृष्ण विरह के महान दुख को भी शांत कर देता है? यह किस तरह हो सकता है कि तुम सुख से बिस्तर पर सोते रहो, और हम ना तो अच्छी खुशबूदार धूप का आनंद ले सकें, और यदि तुम्हारे जैसा सोने के लिए बिस्तर मिले भी, तो वह प्रिय विरह के कांटो का ही बिस्तर हो? ऐसा लगता है श्री कृष्ण तुम्हारे साथ ही हैं, तब ही तुम द्वार नहीं खोल रही हो ।”


यहां पर धूप से अच्छे अभ्यास/कर्म का अभिप्राय है । इस प्रकाश से, जो कि शास्त्रों का ज्ञान रूप है, हमें अच्छा अभ्यास मिलता है । यह बिस्तर ज्ञान का स्वरूप है, और यह ज्ञान पंच आत्मक है, यानी अर्थ पंचक । यह कन्या पंच गुणात्मक बिस्तर पर है । ऐसे व्यक्ति अपने आप को प्रकट नहीं करते । हमें उनके पास जाना होता है । उनका अभ्यास देखकर उनसे ज्ञान प्राप्त करना होता है । अभ्यास/क्रिया से हम किसी व्यक्ति के ज्ञान का अंदाजा लगा सकते हैं ।

मामान् मगळे मणिक्कदवम् ताळ् तिऱवाय्


मामान् मगळे – हे मेरे मामा की पुत्री!
मणिक्कदवम् ताळ् तिऱवाय् – कृपया अपने कीमती रत्न जड़ित द्वार को खोलो ।


गोदा यहां व्यंग्यात्मक भाषा में कह रही हैं, “अहो! तुम नर्म बिस्तर पर हो, तुम्हारे कमरे में सुगंध और प्रकाश है, जरूर श्री कृष्ण तुम्हारे साथ होंगे । अतः जल्दी द्वार खोलो, हमें भी श्री कृष्ण का संग चाहिए ।

आंतरिक अर्थ


श्री प्रतिवादी भयंकर अण्णंगराचार्य स्वामी जी महाराज के अनुसार हमारे देह संबंधी दो प्रकार के होते हैं, अनुकूल और प्रतिकूल । हमें अनुकूल देह संबंधियों का संग पाने की कोशिश करनी चाहिए, जो भगवत भागवत और आचार्य कैंकर्य में हमारा सहयोग दें । वहीं दूसरी ओर हमें प्रतिकूल बंधु जनों के संग का त्याग करना चाहिए । नीति शास्त्र के अनुसार, एक भागवत परनिंदा के मामले में अप्रवीण होते हैं, अपने ऊपर हुए दोषारोपणों के लिए बहरे, और पर दोष दर्शन के लिए अंधे होते हैं ।


मामीर् अवळै एळुप्पीरो? – हे मामी जी! आप क्यों नहीं उसे जगा रही हैं?
उन् मगळ्दान् – क्या आपकी बेटी
ऊमैयो – मुर्ख है
अन्ऱिच् – या फिर
चेविडो – बहरी है
अनन्दलो – क्या थकी हुई है (लगता है पहले वह श्री कृष्ण के साथ खेल रही थी)
एमप् ()- क्या उसपर और कोई नजर रखे हुए है?
पेरुन्दुयिल् मन्दिरप्पट्टाळो? – क्या किसी मंत्र के वश में वह लंबे समय तक निद्रा को प्राप्त है?


अचानक उन गोपी की मां उन्हें जगाने आ गईं । अन्य गोपियां उनकी मां से व्यंग्य करने लगीं । “क्या श्री कृष्ण उनके साथ हैं और उन्हें दरवाजा खोलने नहीं दे रहे हैं?”

आंतरिक अर्थ


श्री प्रतिवादी भयंकर अण्णंगराचार्य स्वामी जी महाराज कहते हैं, “प्रपन्न जन अष्टाक्षर मंत्र के जादुई प्रभाव में आ जाते हैं (स्वरक्षणे स्व अन्वय निवृत्ति न्याय) ।

श्री वैष्णव जन सदैव द्वय मंत्र का अर्थानुसंधान करते रहते हैं व भाव समाधि में चले जाते हैं । वरवर मुनि स्वामी जी महाराज सदैव दबी आवाज में कुछ न कुछ कहते रहते और फिर अचानक भाव समाधि में चले जाते, मानो एक भ्रमर पुष्प का चुनाव करते वक्त आवाज करता है, लेकिन रसपान करते समय शांत हो जाता है । प्रपन्न जनों को यह पसंद नहीं आता कि हम उन्हें संसारी या शारीरिक संबंधों से संबोधित करें, वरन उन्हें अडियार (भागवत बंधु, रामानुज दास) संबोधन से बुलाए जाना परम प्रिय है । लापरवाही के अंधकार से बाहर आओ और मिलो उनसे जो है:

मामायन् – वे जिनके कार्यकलाप परम आश्चर्यजनक है और हमारी कल्पना से परे हैं ।

जहां एक तरफ भगवान अंतर्यामी है और श्री वैकुंठ में निवास करते हैं, वही भगवान हमारी तरह के श्री विग्रह धारण कर अवतार लेते हैं और हमारे लिए सुलभ हो जाते हैं । यदि गोपियां कहेंगी, “नाचो, फिर मैं तुम्हें माखन दूंगी” तो कृष्ण मक्खन के लिए नाचेंगे । अतः वे मामायन हैं । मामायन से इस तथ्य का बोध होता है कि कृष्ण गोपियों के स्तर पर उतर कर अपनी नटखट शरारतों व आश्चर्यजनक लीलाओं से सुलभ होते हैं । भौतिक संसार में हम यह देखते हैं कि एक व्यक्ति जो कि थोड़ा भी ऊंचे स्तर का हो, चाहे वह सामाजिक हो या कोई और, वह सुगम सुलभ नहीं होते । वहीं दूसरी ओर भगवान श्री कृष्ण जो हर किसी के परम स्वामी हैं, सबको सुलभ है । वे परम है, अतः स्वातंत्र्य और परत्व में निहित कल्याण गुण उनमें स्वभावतः हैं । यह सौलभ्य, गोपियों को अपने दिव्य कर्मों द्वारा आकर्षित करना, क्या यह इनके परत्व के संदर्भ में अजीब नहीं है?

मादवन् – लक्ष्मी नाथ इंदिरा लोकमाता मा (अमरकोश १.१.६३) और ()(अमरकोश २.५.५९८) । अतः माधव का अर्थ है लक्ष्मी के पति ।

क्योंकि वह हमारी मां के साथ हैं, अतः हम रक्षा के लिए निश्चिंत हैं । मां के साथ होने से उनमें सदैव करुणा भरपूर रहती है । इसीलिए मां उनके हृदय में निवास करती हैं । राम उन असुर का वध नहीं करते जब मां सीता उनके पक्ष में होती हैं । महान अपराध करने के बावजूद भी मां ने जयंत को अभय दान दिया । जब श्रीराम ने पृथ्वी को पापी असुरों से विहीन करने का प्रण लिया, तब मां अपने संकल्प से लंका गईं, लेकिन अभागे रावण ने उनके बात नहीं सुनी ।
भगवान का सौलभ्य उनका महालक्ष्मी पिराट्टी के साथ होने से उपजता है ।


वैगुन्दन् – वैकुंठ के स्वामी


वे परम शासक और परम शक्तिमान भगवान होते हुए भी करुणा के समुद्र है । वह असली भोक्ता हैं । वहीं इधर हम उनके द्वारा भोग्य हैं ।
अमूमन वह जो सुगम होते हैं, वह मूल्यवान नहीं होते, और जो मूल्यवान होते हैं वह सुगम नहीं होते । वहीं श्री प्रभु परम तो हैं ही, उनका सौलभ्य उनके परत्व में चमक का काम करता है और यह दोनों गुण उनके श्रियः पतित्व से हैं ।


एन्ऱु एन्ऱु नामम् पलवुम् नविन्ऱु एलोर् – इस प्रकार हमने भगवान के कई मंगलमय नामों का संकीर्तन किया है

(लेकिन आपकी बेटी अभी भी नहीं उठी हैं)
हमने भगवान के परत्व की और सौलभ्य की ही नहीं इनके कारण रूप उनके श्रियः पतित्व की भी बात की है । फिर भी आपकी बेटी उठ नहीं रही ।


एम्बावाय् – अपने मन से निश्चय करें और हमारे साथ आएं ।


स्वापदेश


आचार्य ही मामायन हैं, जो कई परम आश्चर्यजनक कृत्य करते हैं, (जैसे कि उपदेश द्वारा संसारियों को वैष्णव बना देना) । आचार्य माधव यानी महा तपस्वी भी हैं और वैकुंठ यानी वैकुंठ प्रदानत्व गुण से युक्त हैं । हमें सदैव अनुकूल देव संबंधियों के संग में रहना चाहिए और प्रतिकूल देह संबंधियों से उदासीन रहना चाहिए । प्रपन्न जन ही हमारे सच्चे संबंधी यानी आत्मबंधु हैं ।
तब क्या हो जब हम हमारे करीबी मित्र या रिश्तेदार को शरणागत होने के लिए समझा ना सकें? ऐसी स्थिति में हमारी तरफ से हमें उन्हें उदासीन प्रेम दिखाना चाहिए, और भक्तों के सत्संग का आनंद उठाना चाहिए । भक्त ही हमारे सच्चे संबंधी हैं, क्योंकि वह आत्मा के संबंध से हमारे अपने हैं अर्थात आत्मबंधु हैं । लेकिन यदि परम सौभाग्य से हमें कोई भागवत जन देह के संबंध में मिल जाए, तो हमें उस संबंध को बढ़ाना चाहिए । इसीलिए गोदा देवी इस नौवे पद में इस एक गोपी को नाम से ना बुलाकर वरन उसके साथ अपने देह के संबंध का संबोधन देकर ही बुलाती हैं और यह इंगित करती हैं की वे इस संबंध को बहुत अहमियत देती हैं ।


अड़ियेन यश भारद्वाज द्वारा भाषांतरित

अडीएन माधव श्रीनिवास रामानुज दास

नव-विधा सम्बन्धं : जीवात्मा के परमात्मा से नौ प्रकार के संबंध

तिरुपावै 10वाँ पासूर

आज की गाथा में जिस गोपी का उत्थापन किया जाता है उसे ‘गोपियों में रत्न’/ ‘गोपीजनशिरोमणि’ और ‘स्वामिनी’ कहकर सम्बोधित किया गया है। आचार्यों ने इस गोपी को सिद्ध-उपाय निष्ठ आदर्श शरणागत कहा है| भगवान पुरुषार्थ है और स्वयं उपाय भी| भगवान स्वयं अपने प्रयत्न से जीवात्मा को प्राप्त करते हैं क्योंकि जीवात्मा भगवान की संपत्ति है| जो सभी साधनों का अवलंबन छोड़ भगवान को ही सिद्ध-उपाय मानते हैं, वो आदर्श शरणागत हैं|

जितना प्रयत्न बाकि गोपियाँ भगवान तक पहुँचने के लिए करती हैं, उतना ही प्रयत्न भगवान इस श्रेष्ठ गोपी तक पहुँचने के लिए करते हैं| कर्म-ज्ञान-भक्ति को साधन मानने वाले कई जन्मों से प्रयत्नशील हैं जबकि भगवान को ही सिद्धोपाय मानने वाले निश्चिन्त होते हैं| यहाँ गोपी के शयन का अर्थ अपना भार गोविन्द पर निश्चिन्त रहना है|

10

श्रीरंगम् उ वे मीमांसा शिरोमणि भरतन् स्वामी द्वारा अनुगृहीत दशम गाथा का संस्कृत छन्दानुवाद:

१०.अनुष्ठाय व्रतं स्वर्गं विशन्त्यस्मत्सुरक्षिके ! ।
नोद्घाटयन्ति ये द्वारं ते ददत्युत्तरं न किम् ।।
सुगन्धितुलसीमूर्धाऽस्माभिर्नारायणस्तु यः ।
ईडितो दास्यते भेरीं पुण्यरूपेण तेन हि ।।
यमास्यं कुम्भकर्णो यः कदाचित्प्रापितः पुरा ।
निर्जितः सोऽपि तुभ्यं नु दीर्घनिद्रामदात् किमु ।।
महातन्द्रायुते ! हेऽम्ब ! गोपीजनशिरोमणे! ।
विवेकसहिताऽऽगत्य कवाटोद्घाटनं कुरु ।।

श्री उ वे रंगदेशिक स्वामी द्वारा विरचित ‘गोदा-गीतावली’ से संस्कृत गद्यानुवाद

“हे सखी! क्या तुम्हें व्रत का फल रूप स्वर्ग मिल गया है?”

यहाँ स्वर्ग का अर्थ है कृष्णानुभव। रामायण में सीता माँ कहती हैं:
य: त्वया सह स स्वर्ग: निरयो य: त्वया बिना।

भगवान के संग रहना, उनका अनुभव करना ही स्वर्ग। उनका अनुभव न होना ही नरक है।

हमारे व्रत का फल क्या है? कृष्णानुभव। वो तुम्हें अभी ही प्राप्त हो गया। तभी तो तुम सो रही हो। कृष्ण तुम्हारे साथ ही, तुम्हारे घर में हैं।

“हे हमारी स्वामिनी! किवाड़ नहीं खोल सकती (कृष्ण के संग होने के कारण) तो कम से कम मुँह तो खोल सकती हो। हमारा प्रत्युत्तर तो दो।”

अन्दर से स्वामिनी गोपी प्रत्युत्तर देती है, “क्या प्रमाण है कि कृष्ण मेरे साथ हैं?”

गोदाम्बा प्रत्युत्तर देती हैं, “तुम्हारे घर से तुलसी की सुगन्ध आ रही है। तुम दोनों छुपने का प्रयत्न कर सकती हो लेकिन तुलसी की सुगंध को नहीं छूपा सकती।”

स्वामिनी गोपी: ““ यदि मैं एक बार भी उनका आलिंगन कर लूँ तो शरीर कई दिनों तक सुगंधित रहता है| और वो अन्दर कैसे आ सकते हैं? दरवाजा तो बंद है”।

गोदाम्बा: “वो नारायण हैं, सर्वत्र विद्यमान हैं| क्या उन्हें दरवाजे रोक सकते हैं?

गोपी गीत में गोपिकाएँ कहती हैं: ‘न खलु गोपिका नन्दनो भवान् अखिल देहिनाम् अन्तरात्मदृक।’

“हम जिनका गुणगान कर रही हैं, जो पुण्य रूप भगवान हमें ढोल (कैंकर्य) प्रदान करेंगे, एक बार की बात हैं, वो नारायण रामावतार में कुम्भकर्ण को काल के गाल में भेज दिया था। वो कुम्भकर्ण भी तुमसे निद्रा प्रतिस्पर्धा में हार गया और पुरस्कार में तुम्हें अपनी नींद भी दे दिया।”

“मुझे बाहर आने में थोड़ी देर क्या हुई, तुम इतने कड़े शब्दों का प्रयोग क्यों कर रही हो?”

“हे हमारी गोष्ठी की दुर्लभ बेशकीमती रत्न, क्या हम तुम्हें बाहर आते हुए देख सकते हैं? अच्छे से तैयार होकर बाहर आओ, हम अपना व्रत पूर्ण करेंगी।”

स्वामिनी गोपीजनशिरोमणि गोपी द्वार खोलकर बाहर आती हैं एवं गोष्ठी में शामिल हो जाती हैं।

संस्कृत अनुवाद

10

हिंदी छन्द अनुवाद

10

हे सखी! तुमने तो स्वर्ग की अनुभूति प्राप्त करने के लिये तपस्या भी की है ।

द्वार खुला नहीं है, पर फिर भी जो अंदर है वह आवाज़ तो दे सकते है ।

क्या पहले के समय में कुम्भकरण ,जो भगवान् के हाथो यमपुरी पहुँच गया ,जिस भगवान् नारायण का हम सदा गुणगान करते है,जो सदा साथ रहकर हमें कैंकर्य प्रदान करते है , वह तुमसे हारकर अपनी निंदिया तुम्हे दे दी?

हे आराम से निद्रा लेने वाली अनमोलरत्न ,उठो निद्रा त्याग कर किवाड़ खोलो।

इस पासुर में गोदा ऐसी श्रेष्ठ गोपी के महल आती हैं जो कान्हा की अत्यंत प्रिया है| कान्हा अक्सर उसके संग रहते थे| वह नित्य प्रति कान्हा के अनुभव में लीन रहती थी| आचार्यों ने इस गोपी को सिद्ध-उपाय निष्ठ आदर्श शरणागत कहा है| भगवान पुरुषार्थ है और स्वयं उपाय भी| भगवान स्वयं अपने प्रयत्न से जीवात्मा को प्राप्त करते हैं क्योंकि जीवात्मा भगवान की संपत्ति है| जो सभी साधनों का अवलंबन छोड़ भगवान को ही सिद्ध-उपाय मानते हैं, वो आदर्श शरणागत हैं|

जितना प्रयत्न बाकि गोपियाँ भगवान तक पहुँचने के लिए करती हैं, उतना ही प्रयत्न भगवान इस श्रेष्ठ गोपी तक पहुँचने के लिए करते हैं| कर्म-ज्ञान-भक्ति को साधन मानने वाले कई जन्मों से प्रयत्नशील हैं जबकि भगवान को ही सिद्धोपाय मानने वाले निश्चिन्त होते हैं| यहाँ गोपी के शयन का अर्थ अपना भार गोविन्द पर निश्चिन्त रहना है|

10

नोऱ्ऱुच् – व्रत करते हुए

शरणागतों के लिए उपाय और उपेय; दोनों भगवान ही हैं| गोपियों का व्रत क्या है? भगवान के अनन्त कल्याण गुणों का अनुभव करना, उनका यशोगान करना, नाम-संकीर्तन करना|

ऐसा लगता है कि तुमने व्रत का फल प्राप्त कर लिया है| कान्हा तुम्हारे साथ हैं और इसी कारण तुम दरवाजा नहीं खोल रही|

चुवर्क्कम् पुगुगिन्ऱ – स्वर्ग/ सुवर्ग का अनुभव करते हुए;

साधारण लोगों के लिए स्वर्ग इन्द्रलोक है और नरक यमलोक किन्तु रामायण में सीता कहती हैं

“ आपके साथ रहना ही मेरे लिए स्वर्ग और आपके बिना रहना नरक”

गोदा व्यंग करती हैं, “ तुम कान्हा के संग हो और कान्हा का अकेले अनुभव करना चाहती हो, इस कारण दरवाजा नहीं खोल रही| दरवाजा खोलो हे सखी! हम कान्हा को तुमसे नहीं छिनेंगे|

आतंरिक अर्थ:

अन्तिमोपाय निष्ठ श्री वैष्णवों के लिए सुवर्ग का अर्थ है श्री वैष्णव साधू गोष्ठी| व्रत है भागवतों का मंगलाशासन और तदीय आराधन|

अम्मनाय्!:  ओ हमारी स्वामिनी!

गोदा अन्दर सो रही गोपी को ‘हमारी स्वामिनी’ कहकर तंज कसती हैं| हमारा स्वभाव तो श्री वैष्णवों के दास होने का है, कहीं भगवान ऐसा न समझें कि तुम अपने को स्वामिनी समझ द्वार पर आये वैष्णवों का अभिनन्दन-वन्दन न कर भागवत-अपचार कर रही हो| भागवत-कैंकर्य तो भगवत-कैंकर्य से भी श्रेष्ठ है|

अपने ऊपर हो रहे व्यंगों को सुन गोपिका चुप रहना ही उचित समझती हैं या द्वार पर आये श्री वैष्णवों को देख ख़ुशी के मारे कुछ बोल नहीं पा रही हैं| बाहर गोपिकाएँ समझती हैं कि अन्दर कान्हा हैं, इस कारण गोपिका दरवाजा नहीं खोल रही|

माऱ्ऱमुम् तारारो वासल् तिऱवादार् — तुम दरवाजा नहीं खोल रही, अब क्या कुछ बोलोगी भी नहीं?

हम तुम्हारे खामोशी को सहन कर पाने में असमर्थ हैं| दरवाजा बंद है तो कम से कम मुख तो खोल दो| अन्दर तुम अपने को कान्हा को समर्पित कर चुकी हो, वह तुम्हें दरवाजा नहीं खोलने दे रहे लेकिन कुछ तो बोलो कम से कम| चलो कान्हा तुम्हारे ही हैं, लेकिन तुम तो हमारी हो न| कान्हा के रूप से तुम्हारी आँखें नहीं हट रहीं लेकिन मुख तो खोल सकती हो न?

गोपी कहती है: “ तुम कहती हो कि कान्हा मेरे साथ हैं| इसका क्या प्रमाण है”?

नाऱ्ऱत् तुळाय् मुडि:

तुम दोनों छुपने का प्रयत्न कर सकती हो लेकिन तुलसी की सुगंध को नहीं छूपा सकती.

गोपी जबाब देती है, “ यदि मैं एक बार भी उनका आलिंगन कर लूँ तो शरीर कई दिनों तक सुगंधित रहता है| और वो अन्दर कैसे आ सकते हैं? दरवाजा तो बंद है”

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नारायणन्: नारायण (हर आत्मा जिनका घर है और जो हर आत्मा के घर हैं)

“वो नारायण हैं, सर्वत्र विद्यमान हैं| क्या उन्हें दरवाजे रोक सकते हैं? क्या वह तुम्हारे अन्तर्यामी नहीं हैं”? गोपी गीत में गोपिकाएँ कहती हैं

“आप केवल यशोदा के पुत्र नहीं, सभी के अंतरात्मा हैं”| ऐसी ज्ञानी थीं गोपिकाएँ|

नम्माल् पोऱ्ऱप् पऱै तरुम्:

हमलोग (साधारण गोप कन्यायें) जिनका गुणगान करती हैं और जो हमें परम पुरुषार्थ (परई) प्रदान करते हैं|

भगवान का ऐसा सौलभ्य है कि साधारण कुल में जन्में गोप कन्यायों के लिए भी अति-सुलभ हैं|

पण्डु ओरु नाळ् कूऱ्ऱत्तिन् वाय् वीळ्न्द कुम्बकरुणनुम्

एक बार की बात है, भगवान के हाथों वध होने वाला कुम्भकरण भी नींद में तुमसे हार जाए|

कुम्भकरण हमेशा सोता रहता था और इस कारण वह विभीषण की तरह भगवत-कैंकर्य न कर सका| वह कुम्भकरण भी तुमसे हार गया| कुम्भकरण तो 6 महीने में एक बार जागता था, तुम सृष्टि जब से हुयी है, तब से सो रही हो| हारने वाला व्यक्ति अपनी सम्पत्ति विजेता को सौंप देता है| ऐसा लगता है कि कुम्भकरण भी तुमसे हारकर अपनी नींद तुम्हें सौंप गया|

गोपिका सोचती है कि ये लोग मेरी तुलना ऐसे व्यक्ति से कर रहें जिसके कारण अम्माजी भगवान से दूर हुयीं| वह चुप ही रहती है|

आतंरिक अर्थ:

कुम्भकरण तमोगुण का प्रतीक है| वैष्णव सत्त्व-गुणी होते हैं| तमोगुण का अर्थ है आलस्य, इर्ष्या आदि जो हमें भगवत-भागवत-कैंकर्य से दूर कर देता है|

कुम्भकरण का एक अर्थ कुम्भ से उत्पन्न होने वाले ऋषि अगस्त्य भी हैं| जैसे अगस्त्य ऋषि ने बिन्ध्य के गर्व को चूर कर दिया वैसे ही आचार्य भी शिष्यों के अंदर आये अभिमान रूपी शत्रु को दूर करते हैं| जैसे अगस्त्य ऋषि समस्त सागर को पी गए वैसे ही आचार्य भी श्रोतिय ब्रह्मनिष्ठ होते हैं|

आऱ्ऱ अनन्दल् उडैयाय् – क्या हम तुम्हें जागकर बाहर आते हुए देख सकते हैं?

अरुम् कलमे!- दुर्लभ बेशकीमती रत्न;

श्री वैष्णव गोष्ठी में आत्म-गुण संपन्न वैष्णव ही रत्न होते हैं| ज्योंहीं उत्तम अधिकारी गोपी उठकर बाहर आती है, गोदा उसे दुर्लभ रत्न कहके महिमामण्डित करती हैं|

तेऱ्ऱमाय् वन्दु तिऱ – अच्छे से तैयार होकर बाहर आओ.

*स्वापदेश*:
1. हम श्री वैष्णव भी वैसे ही हैं, जिनके सभी व्रत पूर्ण हो गए हैं। शठकोप आळ्वार कहते हैं कि हमें सभी व्रतों के फल मिल गया। महाभारत में कहते हैं कि जिन्हें कृष्ण का अनुभव मिल गया, उनके सारे व्रत पूर्ण हो गए। हम श्री वैष्णव भी कर्म योग, ज्ञान योग, भक्ति योग, प्रपत्ति योग आदि का उपाय रूप में त्याग कर चुके हैं। हम उपाय रूप में कोई व्रत या तपस नहीं करते।

2. भगवान का अनुभव ही हमारे लिए स्वर्ग है और उनका अनुभव न होना ही नरक।
3. भगवान ही पुण्य हैं। पुण्य का अर्थ है वो जो सुख प्रदान करे। मोक्ष प्रदान करने वाले पुण्य हमारे लिए भगवान ही हैं।
4. अन्तिमोपाय निष्ठ श्री वैष्णवों के लिए स्वर्ग का अर्थ है श्री वैष्णव साधू गोष्ठी| व्रत है भागवतों का मंगलाशासन और तदीय आराधन

एलोर् एम्बावाय्

: आओ हम अपने व्रत को पूरा करें

स्वापदेश

 

मुमुक्षुओं के लिए, पूण्य और पाप दोनों ही जंजीर हैं | पूण्य का सुख भोगने हेतु और पाप का दुःख भोगने हेतु पुनः जन्म लेना होता है| अन्तिमोपाय निष्ठ वैष्णव मोक्ष का भार भगवान और आचार्य पर छोड़ निश्चिंत रहते हैं| उनके लिए कर्म भागवतों का कैंकर्य है, ज्ञान भागवत-परतंत्र के अपने आत्मस्वरूप का अनुभव करना है और भक्ति तदीय अराधन है| 

भगवान हमारे अपराधों का विचार कर हमें मोक्ष से वंचित कर सकते हैं लेकिन हमारी आचार्य-निष्ठा देख, अपने प्रिय भक्त का स्मरण कर आनंदित भगवान हमें तुरंत स्वीकार कर लेंगे| जैसे अपने बछड़े को देख गाय दूध देने लगती है और ग्वाले को दूध मिल जाता है|

Ishopanishad — Vishishtadvaita Vedanta {विशिष्टाद्वैत वेदान्त}

Author: Srimaan Sribhashyam Srinivasacharyulu The last chapter of Sukla yajurveda deals with the knowledge about Brahman and is called as ISAvASyOpanishad. It contains eighteen mantras according to the followers of kANva s’ Akha, while the followers of mAdhyandina s’Akha have only seventeen mantras. Both Sri S’ankaraand Sri Vedanta Desika have written commentaries for all the […]

Ishopanishad — Vishishtadvaita Vedanta {विशिष्टाद्वैत वेदान्त}

Thirupavai. 10

nōttuc cuvarkkum puhukinna ammanāy!

māttamum tārārō vācal tiravādār ? |

nātta tuzhāi muḍi  nārāyaṇan |  nammāl

pōtta paṛai tarum puṇṇiyanāl | paṇḍoru nāḷ

kūttattin vāy vīzhnda kumbha karuṇanum |

tōttum unakkē perunduyil tān tandānō ? |

ātta anandal uḍaiyāy! arungalamē! |

tēttamāy vandu tiṛa vēlōr empāvāy ||

Meanings:

Goda arrives at the home of a very special Gopi. She is so special and very close to the residence of Krishna and hence is blessed to get the divine experience of Krishna whenever she aspired for the same. Goda calls her in sarcasm.

she wakes up a gOpi, who is very dear to kaNNan emperumAn. She is explained as a sidha sAdhana nishta, one who has surrendered fully to emperumAn and so emperumAn likes her the most. The love that all gOpikAs have towards krishNan and the effort they take to go behind him – that is the effort Kannan takes to go behind this gOpikA – they are waking up such a gOpikA in this pAsuram.

There is mention of Rama in the pasuram. One may remember that Rama didn’t protect Sugriva when he too shelter of Rama for the first time. Next time, when Lakshmana gave him garland and he approached Rama through Rama, he protected him. Only to teach a lesson Rama didn’t protect Sugriva for the first time. We too should approach God through his devotees/ Acharya/ Ramanuja.

NŌTTRU- undertaking vratha

Goda says in Sarcasm that it seems as though you are observing the vratam. What is their vratam? Means and Goal are same. Their vratam is experiencing Krishna.

O Girl! It seems Krishna is with you. That’s why you are not opening the door.

CUVARKKAM PUHUKINDRA – enjoying Svargam;

For mundane people, Svarga is place where Indra resides and Naraka is place where Yama resides. But, for devotes, Svarga is being with Krishna and Naraka is being without Krishna. Sita says in Ramayanam, “Yah Tvaya sah, sa svargah”.

O Gopi! Krishna is with you and you are enjoying him, that’s why you are not opening the door. Open the door, we won’t take Krishna away from you.

AMMANĀY!:  Oh our leader!

You are our leader and you are enjoying Krishna alone. It’s duty of people advanced in spirituality to take neophyte devotees with them, correct them and remove their doshas.

MĀTTRAMUM TĀRĀRŌ VĀCAL TIRAVĀDĀR?

Even if you don’t open the doors cant you even utter a word?

If someone comes at our home, we welcome them by coming forward with sweet words. It seems you are so much immersed in experiencing Krishna that you are not able to speak even a word.

They are saying this as they are not able to tolerate her silence; if the door is closed, should the mouth also be closed? Can you not reply to the relatives even if you are having a lot of wealth? Inside your house you have given yourself to kaNNan, but can you not even give your talking to us? He is not letting you get up but can you not at least say a few words to us? While looking at him, can you not lend your ears to us? You may not want to give your krishNan, can you not give us yourself (for going to the nOnbu)?

The gOpikA replies, “You are blaming me that I am keeping kaNNan here. Do you think he is here?”

The Gopi woke up and began to run to come out. Goda says, “Don’t come out like Tara. Get properly dressed and come out”. Tara approached lakshmana directly coming out of bed. Lakshmana couldn’t even rise his head to see her.

NĀTTRA TUZHĀI MUḍI: Both of you can try to hide but the fragrance of the tulasi in His head can never be hidden.

Bhagwaan is always with Tulasi. The fragnance of Tulasi is coming out of your home. Even if you don’t open your mouth to confirm, the fragrance confirms his presence.

Gopi replied, “If he hugs me just once, his fragrance will be with me even after bathing nine times; I came to bed after meeting you all, and you all came to my door last evening itself to wake me up. With so many of you standing there, and with elders’ protection of the house, would He have been able to enter this house?”?

NĀRĀYAṇAN: He is Narayanan;

He is present inside and outside everyone. ‘antar bahir cha tat sarvam vyaapt Narayan sthitam’.  He is present inside even those who don’t accept Him what to say about devotees like you;

NAMMĀL PŌTTA PAṛAI TARUM- whose praise we sing and thereby receive our goal of divine service (kainkaryam) from Him;

PAṇḍORU NĀḷKŪTTATTIN VĀY VĪZHNDA KUMBHA KARUṇANUM – our supreme Lord who is the personification of dharma (that which leads us to our goal); Once upon a time, that kumbhakarna, One who fell prey to death, failed in front of you.

Earlier there was one kumbhakarana who kept sleeping and hence missed the opportunity of enjoying and surrendering (like vibheeshana) under the divine feet of Sri Rama who has incarnated to uplift the jeevatmas and entrapped in gratitude fought in the side of ravana and paved way for his death himself.   Probably that kumbakarana lost in a battle between you two in sleeping long hours and as a result gave his sleep also to you.

ĀTTRA ANANDAL UḍAIYĀY! – One with a beautiful slumber!

 ARUNGALAMĒ!- One like a rare jewel;

 TĒTTRAMĀY VANDU TIṛA- Shake of your stupor and open the door.

Inner meanings:

For a devotee, the vratam is Krishna himself. What would they get out of vratam? Krishna.  To achieve Krishna, one don’t need to perform any means to get him. Goda introduces us to one such devotee in that stage of devotion. She immersed in experiencing Krishna and keep relishing the divine experiences. Such devotees become our leader and we should approach them. We should her to their teachings and their realizations.

Everyone is eligible to get God. One just needs to surrender to Acharya. They have to open the doors. What are the doors? The doors are ignorance. After doors are open, we see the Narayana, husband of Tulasi.

Kumbhakaran here means sage Agastya as he was born from kumbh (pot). He had drunk the entire ocean in one sip. Acharyas ingulf the entire ocean of shastras and provide whatever needed to us. We don’t need to get lost in the forest of shastras but simply approach a devotee who have assimilated the Vedas.

Agastya controlled the Vindhya when he was rising in ego. Similary, Acharya scolds us to bring divine qualities in us.

LESSON FOR THE DAY

All theists aim at doing good deeds to gain punyam (result of good deeds) and get away from papam (result of sins). Jeevas take birth in this world due to the accumulated karma (combination of papa and punya).  In case of those who aspire to get rid of this cycle of life and death and attain salvation (moksha) both punya and papa are obstacles.

Punya is like a golden Hand cuff and papa is like a Iron Hand cuff both are anyway going to bind us in this samsara (cycle of birth and death).  So to get rid of this bondage both our papa and punya has to be nullified.  But how does that happen?

Andal answers “nAttra tuzAi mudi nArAyanan nammAl pOttra parai tarum punniyan”  With the help of punniyan- Narayanan adorning the fragrant tulasi garland who we praise and who will grant us the requested parai (servitude).

Bhagwaan himself is the means to reach him.

So should we stop all the other so called good deeds we do today?  No we need to continue to do all the good deeds and refrain from sins with greater enthusiasm since that is the only way we can please our master (the supreme Lord) who has ordained so through the Vedas.  But while doing the same we need to do it only for His happiness and not for any other benefits, then that supreme Lord will grant us His divine abode.

Tiruppavai Hindi 7th

गोपियों की नींद हमसे अलग है। हम भगवान की उपेक्षा से सो रहे हैं। नींद का अर्थ है, आसपास का अज्ञान होना। हम ईश्वर के लिए 'शेष' होने के अपने स्वरूप से अनभिज्ञ हैं। गोपियाँ अपने स्वरूप के ज्ञान से सो रही हैं। वे भौतिक सुखों से अनभिज्ञ और कृष्ण के साथ अपने संबंधों के ज्ञान से सो रहे हैं।
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जर्ति संयमी।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः।।2.69 ।।
वह जो सभी प्राणियों के लिए रात्रि है, उसमें स्व-नियंत्रित मनुष्य जाग रहा है; जब सभी प्राणी जाग जाते हैं, तो मुनि (ऋषि) के लिए रात होती है।

अनगिनत गोपियों में से 10 गोपियाँ सोई हुई हैं और वे गोष्ठी में शामिल नहीं हुई हैं। यह प्रतीकात्मक है और सुंदर कहानी के पीछे बहुत सारे छिपे अर्थ हैं।

कीसु कीसु एन्ऱु एन्गुम् आनैच्चात्तन् कलन्दु
  पेसिन पेच्चरवम् केट्टिलैयो पेय्प्पेण्णे
कासुम् पिरप्पुम् कलकलप्पक् कै पेर्त्तु
  वास नऱुम् कुळल् आय्च्चियर् मत्तिनाल्
ओसै पडुत्त तयिर् अरवम् केट्टिलैयो
  नायगप् पेण्पिळ्ळाय् नारायणन् मूर्ति 
केसवनैप् पाडवुम् नी केट्टे किडत्तियो
  तेसम् उडैयाय् तिऱ एलोर् एम्बावाय्

श्रीरंगम उ वे मीमांसा शिरोमणि भरतन् स्वामी द्वारा अनुगृहीत सप्तम गाथा का संस्कृत छन्द अनुवाद:

7.
कीचुकीच्विति सर्वत्र भारद्वाजाख्यपक्षिभिः।
किं संश्लिष्य कृतं रावं नाश्रौषीर्मतिवर्जिते ! ।।
सुगन्धिकुन्तला गोप्यः कोमला दधिमन्थने ।
प्रवृत्तास्तद्रवं तासां भूषाणां शिञ्जया समम् ।।
मिलितं नायिकेऽस्माकम् अश्रौषीद् भवती न किम्।
नारायणं हि सौशील्यविग्रहं केशवं वयम् ।।
कीर्तयामस्तथाऽपि त्वं शृण्वती शयिताऽस्यहो ।
महातेजस्विनि ! क्षिप्रम् उद्घाटय कवाटिकाम् ।।७॥

आज की गाथा में गोदा सखियों सहित दूसरी गोपी को जगाने जाती हैं जो सभी की नायकी है। पहले पासूर में युवा गोपी को जगाती हैं तो अब नायकी को। गोदा किसी को छोड़ना नहीं चाहती। यदि कोई वैष्णव ज्ञान अनुष्ठान में कम भी हो तो उसे त्यागना नहीं चाहिए। सत्संग के प्रभाव से वो शीघ्र ही ज्ञान-अनुष्ठान से युक्त हो जाएगा। (गीता: अपि चेत् सुदुराचारो …)

“देखो! भारद्वाज पक्षियाँ ‘कीच्-कीच्’ शोर मचा रही हैं। क्या तुम ये प्रभात के लक्षण नहीं सुन रही हो?”

“तुम सभी मिलकर शोर मचाओगे तो पक्षियाँ तो जाग ही जायेंगी”

“एक पक्षी नहीं, सभी स्थानों पर पक्षियाँ शोर मचा रही हैं। दाना चुगने जाने से पूर्व पक्षियाँ अपने परिजनों से बात करती हैं, बच्चों को दुलार करती हैं और पूरे दिन के निकल जाती हैं”।

“गोकुल में भी पंच-लक्ष गोपियाँ हैं। तुम सभी उठ जाओगी तो पक्षियों को भी लगेगा कि सुबह हो गयी।”

“अरे मतिवर्जिता (पागल लडकी)! देखो दूसरा लक्षण बताती हूँ। गोकुल की आजीविका ही है दधि-मन्थन करना। क्या तुम दही मथने की ध्वनि नहीं सुन रही हो? गोकुल के दूध एवं दही इतने गाढ़े होते हैं कि उन्हें मथने हेतु कठिन श्रम करना होता है। इससे जोर से दही मथने का शोर होता है। गोपिकाओं के आभूषण आपस में टकराते हैं, उनकी ध्वनि तुम नहीं सुन रही? श्रम के कारण उनके केश-बन्धन खुल जाते हैं, उनके केशों में लगे पुष्प टूट कर बिखर जाते हैं। क्या तुम वो सुगन्ध का अनुभव नहीं कर रही? दधि-मन्थन के समय वो प्रेम से ‘गोविन्द! दामोदर! माधव!” संकीर्तन कर रही हैं”

(दधि मन्थन, आभूषण के खनक एवं नाम संकीर्तन की ध्वनि दशगुणित आवरणों को पर कर वैकुण्ठ तक जा रही है और वहाँ के नित्य सूरियों को मानो लज्जित कर रही हों कि आपलोग क्या परमपद का आनन्द ले रहे हो? अभी आनन्द तो व्रज में है।)

और तुम हमारी नायिका हो। बाहर आओ, हमें दर्शन दो।”

गोपी विचार करती है कि हमारा स्वरूप तो शेषत्व का है। ये मुझे नायिका कहकर उपहास कर रही हैं। वो मौन हो जाती है। तब बाहर खड़ी गोपियाँ अन्दर झाँककर देखती हैं तो वो गोपी तेजोवान दिख रही थी। अर्थात तो कृष्णानुभव में लीन थी।

“सर्व-अन्तर्यामी नारायण मूर्ति (साकार) बनकर केशव नाम से हमारे बीच आये हैं। जब उन्होंने हमें रास-क्रीडा को बुलाया है तो तुम हृदय में उनके दर्शन कर क्यों मुग्ध हो? हे तेजस्विनी! बाहर आओ! दरवाजा खोलो ”

नायकी गोपी को अपनी भूल का अनुभव होता है और वो बाहर आकर गोष्ठी में शामिल हो जाती है।

(केशव नाम अत्यन्त महत्वपूर्ण है। केशी दैत्य को मारने वाले को केशव कहते हैं। ब्रह्मरुद्रयो: जनक: केशवः। क अर्थात ब्रह्मा, ईश अर्थात शिव (क + ईश – केश)। इन दोनों जिनके अंग से जन्म लेते हैं वो हैं केशव।

केशव मार्गशीर्ष माह के लिए अभिमानी देवता हैं। वह श्रीमन नारायण के उप-व्यूह मूर्ति में से एक है। इसलिए इस महीने में केशव की पूजा करनी होती है

पक्षियों के आपस में बात करने के दो आन्तरिक अर्थ हैं:

दिव्या दम्पति अपने बच्चों के संस्कार बंधन के बारे में एक दूसरे से बात कर रही हैं और उन्हें इससे बाहर निकालने की योजना बना रही हैं।
जब एक भागवत किसी कारणवश कुछ दिनों के लिए गोष्ठी से दूर चला जाता है तो उसके अलगाव का दर्द कम करने हेतु भक्तजन आपस में उस भागवत का मंगलाशासन करते हैं|

संस्कृत अनुवाद

Ts7

हिंदी छन्द अनुवाद

Th7

अंडाल सिर्फ एक गोपी को जगाने से संतुष्ट नहीं होती है, बल्कि चाहती हैं कि गोकुल में प्रत्येक गोपी इस दिव्य अनुभव में शामिल हो और इसलिए प्रत्येक के दरवाजे पर दस्तक देती हैं । एक श्रेष्ठ यह भक्त चाहता है कि हर व्यक्ति सर्वेश्वर भगवान का समान रूप से आनंद ले, क्योंकि वह सभी के पिता हैं।

जैसे दादा अपने पोते को अपने बच्चे से ज्यादा प्यार करता है; भागवान भी अपने भक्त से ज्यादा अपने भक्त के भक्त को प्यार करते हैं। इस प्रकार, हमें भगवान के भक्त के भक्तों की सेवा करनी चाहिए। हम जितना नीचे उतरते हैं, हमें भगवान से उतना ही प्यार होता है।

18 pasuram

कीसु कीसु एन्ऱु – समूह में पक्षियों का प्रकीर्णन;

एन्गुम– सभी दिशाओं में;

आनैच्चात्तन् –  भारद्वाज पाक्षी;

चिड़ियाँ / भारद्वाज पाक्षी के कोरस (जो एक बच्चे की मीठी बात की तरह लगता है) को सुबह के समय में देखना। ānaiccāttan का अर्थ कुवलयापीड हाथी (आनई) का वध करने वाले या गजेन्द्र का उद्धार करने वाले भगवान कृष्ण भी है|

गोदा: ओ भ्रान्त बालिके! तुम सो रही हो?

भ्रान्त बालिका गोपी: क्या भोर हो गयी? इसका प्रमाण क्या है?

गोदा: क्या तुम भारद्वाज पक्षियों के चहचहाहट को नहीं सुन रही?

भ्रान्त बालिका गोपी: एक पक्षी के जागने से क्या होता है? वो भी शायद इस कारण क्योंकि तुम शोर मचा रही हो|

गोदा: सिर्फ एक पक्षी नहीं सखी! सभी दिशाओं में पक्षियाँ आपस में बात कर रही हैं|

पक्षी पूरे दिन भोजन इकट्ठा करते हैं और शाम को लौटते हैं। सुबह में, वे आगामी जुदाई के दर्द में बात कर रहे हैं। क्या आप इसे नहीं सुन पा रहे हैं? जैसे पक्षी जुदाई के दर्द में बात कर रहे हैं, क्या कान्हा से अलगाव महसूस नहीं होगा? जब पक्षी भी अपने जीवनसाथी को छोड़ने के लिए चिंतित होते हैं और अलग रहते हैं तो आप कृष्ण से अलग रहते हुए कैसे सो सकते हैं? हे गोपी उठो! कान्हा से मिलने चलें।

आतंरिक अर्थ:

सभी पक्षियों के आपस में बात करने का अर्थ है सत्संग| भटके जीवों को भक्तगण सत्संग में लाते हैं और उनका उद्धार करते हैं| जब सभी भक्त सत्संग गोष्ठी कर रहे हैं तब तुम सो रही हो?

मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्।

कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च।।10.9।।

भागवत भगवान के गुणानुवाद में ही अपना कालक्षेप करते हैं|

भाग्योदयेन बहुजन्म समर्जितेन। सत्संगमम् च लभते पुरुषो यदा वै।

अज्ञान हेतुकृत मोह मदान्धकारनाशं विधाय हि तदो दयते विवेक । (भागवत-माहात्म्यम् 2.76).

अर्थ: एक जन्म का नही अनन्त जन्मों के भाग्य जब उदय होते है तो हो सत्संग कथा और संतो के प्रवचन सुनने इच्छा हो पाती हो । ये कृपा गुरु और गोविन्द की होती है। जो हमें ऐसे बचन सुनाने और सुनने का मोका मिलता है

जब द्रवहिं दीन दयाल राघव साधू-संगत पाईये| (विनयपत्रिका)

पेसिन – आपस में बात करना;

पेच्चरवम् – बात की आवाज़;

केट्टिलैयो? – क्या आपने (यह) नहीं सुना?

पेय्प्पेण्णे – भ्रान्त बालिके! (मतिवर्जिता लड़की) (भक्ति से अच्छी तरह वाकिफ है लेकिन वही भूल गई है);

कल मुग्धा गोपी का उत्थापन हुआ। आज जिस गोपी का उत्थापन हो रहा है, उसे भ्रान्त या मतिवर्जिता कहकर सम्बोधित किया गया है। चूँकि ये आपस में सखियाँ हैं, इसलिए कठोर शब्दों का भी प्रयोग करते हैं। जब शयन कर रही गोपी रूठ जाती है, तब उसे ‘नायिका’ और ‘तेजस्विनी’ कहकर उसकी प्रशंसा भी करती हैं।

आतंरिक अर्थ:

  1. दिव्या दम्पति अपने बच्चों के संस्कार बंधन के बारे में एक दूसरे से बात कर रही हैं और उन्हें इससे बाहर निकालने की योजना बना रही हैं।
  2. जब एक भागवत किसी कारणवश कुछ दिनों के लिए गोष्ठी से दूर चला जाता है तो उसके अलगाव का दर्द कम करने हेतु भक्तजन आपस में उस भागवत का मंगलाशासन करते हैं|

‘भ्रान्त बालिका गोपिका ‘ ‘भागवत-अनुभव’ में खो जाने वाले भागवत-भक्त हैं और परिणामस्वरूप एक प्रलाप जैसा दिखता है! ऐसा नारायण का ‘निर्हितुकी-कृपा’ है।

कासुम् – एक प्रकार का आभूषण जिसे विशेष रूप से ग्वालों द्वारा पहना जाता है;

पिरप्पुम्– एक अन्य आभूषण;

कलकलप्पक्: गोपिकाएँ एक साथ शोर कर रहे हैं जब वे मंथन की रस्सी का उपयोग करके दही को मथ रहे हैं।

कै पेर्त्तु– अपने हाथों को आगे-पीछे करें;

वास नऱुम् कुळल् – अत्यंत सुगंधित केशबंधों के साथ;

गोकुल में सभी प्रातःकाल उठ जाते हैं और मिलकर दधिमंथन करते हैं| थकावट के कारण, उनके बालों के गाँठ खुल जाते हैं और जो सर्वत्र मीठी खुशबू भर देते हैं। गोकुल में दही इतना गाढ़ा होता है कि इसे कठिनाई और कठिन प्रयत्न से मथना पड़ता है और इस कारण इनके बालों के गुच्छे खुल जाते हैं और हर जगह खुशबू फैलाते हैं।

गोकुला की गोपियों के हाथ चूड़ियों और अन्य आभूषणों से सुसज्जित हैं। वे मंथन करते हुए जोर-जोर से गा रही  हैं। मंथन करते हुए कान्हा के दिव्य नाम गा रहे हैं। क्या आप उन्हें नहीं सुन सकते? कुलशेखर आलवार जीभ के सामने नमन करते हैं और इसे नारायण के नाम को पीने का अनुरोध करते हैं। गोकुल की गोपियाँ हमेशा नारायण के नाम पर गाती और इनके गुणानुवाद में मग्न रहती थीं।

आतंरिक अर्थ:

अष्टाक्षरी, द्वयं और चरम श्लोक (जो हमें समाश्रयण के दौरान हमारे आचार्य से प्राप्त होते हैं) के रहस्य अर्थों को एक साथ सुना जाता है, और लोग मुकुंद के शेष और परतंत्र होने के उनके स्वभाव का अनुभव कर रहे हैं। रहस्य-मंत्रों की सुगंध पर्यावरण को दिव्य बना रही है।

आय्च्चियर् मत्तिनाल् ओसै पडुत्त तयिर् अरवम् केट्टिलैयो?

आय्च्चियर्गोपिकाएँ;

मत्तिनाल्दही मथनी के साथ;

ओसै पडुत्तशोर;

तयिर् अरवम्दही की आवाज;

केट्टिलैयो?  – क्या तुम नहीं सुन रही?

गोपियों ने चूड़ियाँ, मंगलसूत्र और अन्य गहने पहने थे। गोकुल में दूध निकालना आसान काम है क्योंकि गायों के थन दूध से भरे होते हैं लेकिन उन्हें मथना महान मांसपेशियों की शक्ति का काम है। दूध में इतना मक्खन होता है कि उन्हें दूध को मथने के लिए अत्यधिक शक्ति का इस्तेमाल करना पड़ता है। जब गोपियाँ दूध को मथती हैं, तो उनका शरीर हिल जाता था और उनके आभूषण आवाज करते थे। चूड़ियों के अलावा दही मथने से भी आवाज आ रही है।

आतंरिक अर्थ:

वेद व्यास और आचार्यों ने वेदों को स्मृति और उपब्राह्मनों सहित मथा और जीवात्मा का शेषत्व और पारतंत्रियम घोषित किया। इसका अनुभव कर भागवत जन भगवान का संकीर्तन कर रहे हैं, क्या तुम नहीं सुन रही?

वेदान्त ग्रंथ दूध हैं और पूर्वाचार्यों के रहस्य ग्रंथ मक्खन।

नायगप् पेण्पिळ्ळाय् नारायणन् मूर्ति

नायगप् पेण्पिळ्ळाय्! –  ओ! सभी युवा लड़कियों के नेता; (ओ कन्या मणि)

नारायणन् मूर्तिनारायण रूपी कृष्ण, नारायण के अवतार;

(अंदर गोपी को अपनी गलती का अहसास हुआ – जब मैं भागवतदास भागवतों का नौकर हूं, अब एक नेता के रूप में बुलाकर व्यंग कर रही हैं। तुरंत अंडाल आगे गाती है, ताकि अन्य गोपियों से जुड़ने के लिए गोपी शीघ्र आगे बढ़े।)

हम नारायण की स्तुति गा रहे हैं, जिन्होंने हमारे बीच अवतार लिया। ऐसा है उनका कारुण्य और आप सो रहे हैं?

नारायण का अर्थ है, जो हमें बाहर से और अंदर से आधार दे| जो हर आत्मा के अन्दर व्याप्त हैं (अंतर्व्याप्ति) और हर आत्मा जिनके अन्दर व्याप्त है (बहिर्ब्याप्ति) । नारायण हमारे भीतर हैं और हम नारायण के भीतर हैं। वह हमारे लिए अदृश्य है, फिर भी वह नीचे आते हैं और हमें दिखाई देते है। ऐसा है उनका कारुण्य।

आतंरिक अर्थ

क्षीरसागर में अनंत शेष की शैया पर निवास करने वाले भगवान ने हमारे ह्रदय को क्षीरसागर बनाया (उपनिषद् दहर आकाश कहते हैं) और आत्मा को अनंत शेष की शैया बना अन्तर्यामी रूप में निवास कर रहे हैं। अपार करुणाकर भगवान ने और अधिक सुलभ होना चाहा और अर्चा मूर्ति रूप में प्रकट हुए। करुणाकर भगवान इतने सुलभ हुए और तुम सो रही हो? उठो और भगवान वटपत्रशायी के कैंकर्य में उपस्थित हो।

केसवनैप् पाडवुम् नी केट्टे किडत्तियो

केसवनैप्: सुंदर घुंघराले बाल वाले, केशी को मारने वाले।

पाडवुम्जबकि भी (हम) गाते हैं;

नीआप

केट्टे किडत्तियो क्या हमारा गाना सुनने के बाद भी आप इस तरह लेट सकते हैं?

 केशव का अर्थ है लंबे सुंदर बाल वाले। चलो दिव्य व्रत करें और उसकी सुंदरता का आनंद लें।

केशव का अर्थ है दानव केशी (केशी-हंता) का वध करने वाले। अंदर गोपी सो रही है और बाहर गोपियों के गीतों का आनंद ले रही है। वह जानती थी कि अगर वह बाहर आती है, तो वे गाना बंद कर देंगे, ताकि वह नाटक कर रही थी जैसे कि वह अभी भी सो रही है। उसे झटका देने के लिए, गोपियों ने ‘केशव’ नाम का उल्लेख किया। गोपी अंदर झटके से उठी कि कृष्ण खतरे में है, वह केशी से लड़ रहा है। राम ने खर-दूषण की 14,000 सेना को मारने के बाद, उसके शरीर पर घावों के साथ वापसी की। उसे देखते ही, सीता जल्दी से चली गई और उसे प्यार और स्नेह से गले लगा लिया। आप कृष्ण और केसी के बीच लड़ाई के बारे में सुनकर भी कैसे सो सकते हैं?

केशव का अर्थ है ब्रह्मा और शिव के पिता। केशव ब्रह्मांड का एकमात्र रक्षक है। ऐसे भगवान ने हमें अपने साथ खेलने के लिए आमंत्रित किया है और आप सो रहे हैं?

केशव मार्गशीर्ष माह के लिए अभिमानी देवता हैं। वह श्रीमन नारायण के उप-व्यूह मूर्ति में से एक है। इसलिए इस महीने में केशव की पूजा करनी होती है

आतंरिक अर्थ:

कर्म, ज्ञान और भक्ति योगी को बहुत चिंता करनी पड़ती है क्योंकि किसी भी प्रक्रिया के अनियंत्रित होने के बाद उन्हें फिर से जन्म लेना होगा। एक शरणागत चिंताओं से रहित है और उसे आनंद है क्योंकि उसने सभी उपायों को त्याग दिया है। भागवान स्वयं उनके लिए उपाय हैं। अंदर गोपी एक ऐसी आदर्श शरणागत है।

तेसम् उडैयाय् तिऱ एलोर् एम्बावाय्

तेसम् उडैयाय्ओ चमचमाती सुंदरी! (हे तेजस्विनी!)

तिऱकृपया दरवाजा खोलो;

गोदा खिड़की से अंदर की खामोशी से आश्चर्यचकित होकर झाँकती है और भगवद-गुणानुवाद अनुभव कर रही गोपी के दिव्य तेज का आभास होता है। इसलिए गोदा अब उससे दरवाजा खोलने का अनुरोध करता है ताकि वे उसकी तेज का पूरा आनंद ले सकें।

आप तपस्वी-हित-पुरुषार्थ के ज्ञान होने के कारण ही तेजमय हैं। बाहर आओ और अपनी खुशी की बाढ़ से हमें आह्लादित करो।

आतंरिक अर्थ:

गोपी को ‘भागवत-पारतंत्रियम ’का एहसास हुआ और वो कैंकर्य करने के लिए बाहर आयी।

स्वापदेश:

तिरुपावै का मुख्य उद्देश्य भक्तों के साथ है। अच्छी संगती में होना, भगवान के अनंत कल्याण गुणों के अनुभव में होना और अपनी कर्तव्य और जिम्मेदारी निभाना।

दही से सारवस्तु निकालने के लिए उसका मंथन किया जाता है।इसी तरह से महान आचार्य लोग भी वेद सागर का मंथन कर उससे सारभूत अर्थों को निकालते हैं। जैसे *मुमुक्षुप्पड़ी* नामक रहस्य ग्रंथ में श्रीलोकाचार्य स्वामीजी लिखते हैं कि, जैसे तीन घड़ों में अलग अलग दही भरकर मक्खन निकालकर मिला देते हैं, इसी तरह से तीनों वेदों के मंथन से निकाले हुवे अकार – उकार – मकार को मिलाकर यह प्रणव बना हुआ है , मंथनध्वनी शब्द से प्रणव जैसे सारतम शब्दों के व्यंग्यार्थ सूचित किये जाते हैं ।
गोपियाँ उठती, बैठती, काम करती, सभी अवस्थाओं में भगवान श्रीकृष्ण का ही शुभ नाम व चेष्टितों का गान किया करती है । *अत एव दही,दूध,मक्खन इत्यादि बेचने के लिए उनको टोकरी में, अपने सिरपर रखकर रास्ते में जाते जाते भी ये लोग भगवद अनुभव में लिप्त होने के कारण दही दूध इत्यादि पुकारने के बदले में गोविंद दामोदर माधव* पुकारती फिरती हैं ।
भगवत नाम संकीर्तन की आवाज नहीं आ रही है क्या ? इसका अर्थ है अनेक भागवत जन भगवत कैंकर्य करने के लिए आह्वान करते है , लेकिन यह जीव सांसारिक विषय भोगों को भोगता हुआ भगवत कैंकर्य में भाग नहीं लेता ।
कवाट खोलने के लिए विनंती करती हुई कहती है की आचार्यानुभव और चिंतन करने की रूचि अकेले करना छोड़कर हम से भी मिलकर करो । इससे विदित होता है की भगवत भागवत कैंकर्य अकेले नहीं करना सभी को साथ में लेकर करना ।
*श्री गोदा रंगनाथ भगवान का मंगल हो*
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अंश कौन, अंशी कौन?

नमो नारायण 

कल शाम एक पूजनीय आचार्य जी ने कहा कि मैं श्री करुणा-काकुस्थ के दिव्य गुणों का वर्णन करने के योग्य नहीं क्योकि मैं भगवान के सभी रूपों में अभेद की भावना रखता हूँ| योग्य तो तब होता जब ये भेद-बुद्धि होती कि राम रूप ही एकमात्र मूल रूप है ब्रह्म का (और उनके अनुसार ऐसा कहने से ब्रह्म सीमित भी नहीं होता| अनंत ब्रह्म का क्या सिर्फ एक ही रूप संभव है या वो अनंत रूपों में विद्यमान है? ) हमारे लिए उनके सभी रूप पर-स्वरुप हैं| वामन, नरसिंह, कुर्म, राम, कृष्ण, अनिरुद्ध, रंगनाथ, बद्रीनाथ, अनिरुद्ध, संकर्षण, अन्तर्यामी…. इन सभी रूपों में भगवान पूर्ण ही हैं, पर-तत्त्व ही हैं|
कोई व्यक्ति स्वयं से बड़ा या छोटा नहीं हो सकता|

हयग्रीव परमोपासक वादिराज तीर्थ स्वामी हयग्रीव और विष्णु में अभेद ही मानते रहे, तो आपके मतानुसार तो वो हयग्रीव की उपासना के अधिकारी नहीं रहे? अधिकारी तो तब होते जब हयग्रीव और विष्णु में भेद बुद्धि रखते और हयग्रीव को पर-स्वरुप मान अन्य सभी रूपों को उनका अंश मानते?

रामचरितमानस की मैं वैसी ही व्याख्या करूँगा जैसा आचार्यों से श्रवण किया है और जैसा पूर्वाचार्यों के ग्रंथों में पढ़ा है|

प्रश्न है कि यदि और राम और विष्णु में भेद नहीं करते तो स्कन्द पुराण के रामायण माहात्म्य के इस श्लोक का क्या जो ब्रह्मा-विष्णु-महेश को श्री राम का अंश बताता है?

विष्णु पुराण में भी ऐसा ही श्लोक मिलता है:

शक्तयो: यस्य देवस्य ब्रह्मविष्णुशिवात्मिका..

समाधान:

प्रथम तो अंश-अंशी भाव को समझना होगा| भगवान के अंश का क्या अर्थ हो सकता है?

  1. भगवान की आत्मा का एक टुकड़ा? या,
  2. भगवान की शक्ति या प्राकार का अंश? या,
  3. स्वयं भगवान

तीनों की विवेचना करते हैं:-

1. ये तो संभव ही नहीं क्योंकि ज्ञानस्वरूप आत्मा ‘अविकार’ है| उसका कोई टुकड़ा संभव ही नहीं|

2. शक्ति और शक्तिमान एवं प्राकार और प्राकारी के मध्य भेद तो सिद्ध है|

यदि विष्णु को राम की शक्ति प्राकार मानते हैं तो विष्णु को जीवात्मा मानना होगा| तत्त्व-त्रय के सिद्धांत में तीन तत्त्व हैं: ईश्वर, जीव, प्रकृति| ईश्वर की शक्ति या प्राकार ईश्वर से भिन्न है, इस प्रकार यह तो जीव तत्त्व या प्रकृति तत्त्व ही होगा| भयंकर भेदवादी भी ऐसा नहीं ही मानेंगे| यदि और कोई युक्ति हो तो उन विचारों का स्वागत है|

गोस्वामीजी कहते हैं:-

जीव अनेक एक श्रीकंता

एकमात्र श्रीदेवी के पति ही ईश्वर हैं, बाकि सब जीव|

वेदों में और पुराणों में श्रीदेवी तो लक्ष्मी ही हैं, और श्रीकांत भगवान विष्णु| यदि यह आग्रह हो कि श्री लक्ष्मी नहीं हैं, तो श्री सूक्त और विष्णु-पुराण का क्या अर्थ रह जायेगा?

3. अंश और अंशी एक ही हैं| यह निष्कर्ष ही उचित प्रतीत होता है| भगवान के भगवान के अंश होने का अर्थ स्वयं भगवान ही हैं| अनंत भगवान अनंत रूपों से युक्त होकर भक्तों को दर्शन देते हैं| भगवान और भगवान में कोई भेद नहीं, और बड़ा भगवान और छोटा भगवान जैसा विभाजन नहीं|

अंश का क्या अर्थ कहा जाए? भगवान विष्णु के श्वेत-श्याम केशों से बलराम-कृष्ण के अवतार की बात भी पराशर महर्षि कहते हैं|

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यहाँ भी अगर प्राकार-प्राकारी या शरीर-आत्मा भाव लगायें तो कृष्ण को जीवात्मा मानना होगा| विष्णु के अंश का कृष्ण बनकर आने का अर्थ है कि स्वयं विष्णु ही कृष्ण बनकर आये, न कि कोई जीवात्मा|

समाधान बस एक ही है|भगवान के अंश होने का अर्थ है भगवान का स्वयं अपने धर्मी ज्ञान के साथ अन्य रूप में प्रकट होना| इस प्रकार ही विष्णुचित्त स्वामी ने विष्णु-पुराण उपरोक्त्त श्लोक का अर्थ किया है| भगवान स्वयं विष्णु के रूप में प्रकट होते हैं और ब्रह्मा और शिव में उनके शक्ति के अंश का आवेश होता है|

शक्तयो: यस्य देवस्य ब्रह्मविष्णुशिवात्मिका| यहाँ आत्मिका का अर्थ है: भगवान स्वयं विष्णु हैं, भगवान की आत्मा या धर्मी ज्ञान स्वयं प्रकट है विष्णु के रूप में तथा शिव और ब्रह्मा के वह अन्तर्यामी हैं|

Kumbhokanam Mahabharat Vanaparva 86th Adhyaya 24th shloka

Esha Narayanah Sriman Ksheerarnava niketanah|

Naagparyankam Utsrijya hi aagato mathuram purim||

ऐष नारायणः श्रीमान क्षीरार्णवनिकेतन।नागपर्यंकं उत्सृज्य आगतो मथुरांं पुरीम्।।

*Meaning:*The Narayana along with Sri, who was residing Ksheera ocean, left his serpent bed and descended to Mathura.

क्षीरसागर में शेष नाग पर शयन करने वाले नारायण अपने नाग पर्यंक को छोड़कर मथुरा नगरी में आ गए

ऐसा ही अर्थ श्री बलदेव विद्याभूषण (गौडीय सम्प्रदाय के भाष्यकार) भी करते हैं| ब्रह्म-सूत्र के अनुसार ब्रह्म में सजातीय भेद नहीं हो सकता| स्वांश का अर्थ है स्वयं भगवान और विभिन्नांश हैं जीवात्मा| जीवात्मा भगवान की शक्ति का अंश है| मत्स्य कुर्म आदि स्वयं भगवान हैं जबकि सनकादि, नारद आदि जीवात्मा, विभिन्नांश, भगवान की शक्ति के अंश|

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गौडीय सम्प्रदाय के गोविंद भाष्य में ‘अंश-अंशी में अणुमात्र भेद’ भी स्वीकार्य नहीं है|’कृष्णस्तु भगवान स्वयं’ का अर्थ भी इतना ही कि मत्सय, वाराह आदि स्वांश स्वयं भगवान कृष्ण हैं और वर्णित मनु आदि विभिन्नांश उनकी शक्ति मात्र हैं|शक्ति और शक्तिमान में भेद सिद्ध है फिर भी शक्ति को शक्तिमान का अंश कहा जा सकता है|अक्सर लोग इस विषय पर हमसे लड़ने आ धमकते हैं, ऐसे भेद-बुद्धि वाले आँख खोलकर देख लें|

भागवत पुराण के अनुसार भगवान नारायण स्वयं विष्णु हैं एवं ब्रह्मा और शिव के अन्तर्यामी

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स्कन्द पुराण के श्लोक का यही अर्थ है| नारायण स्वयं विष्णु हैं और शिव, ब्रह्मा के अन्तर्यामी| नारायण स्वयं ही कृष्ण, राम आदि रूप लेकर आते हैं| जीवात्मा के भगवान के अंश होने का अर्थ है भगवान के शरीर का अंश होना, उनकी अचिन्त्य शक्ति का अंश होना|

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श्रीमते रामानुजाय नमः

आलवार एम्पेरुमानार जीयर तिरुवाडिगले शरणम्

तिरुपावै 8

कीळ् वानम् वेळ्ळेन्ऱु एरुमै सिऱु वीडु
  मेय्वान् परन्दन काण् मिक्कुळ्ळ पिळ्ळैगळुम्
पोवान् पोगिन्ऱारैप् पोगामल् कात्तु उन्नैक्
कूवुवान् वन्दु निन्ऱोम् कोदुकलम् उडैय
पावाय् एळुन्दिराय् पाडिप् पऱै कोण्डु
  मावाय् पिळन्दानै मल्लरै माट्टिय
देवादि देवनैच् चेन्ऱु नाम् सेवित्ताल्
  आवा एन्ऱु आराइन्दु अरुळ् एलोर् एम्बावाय्

 श्रीरंगम् उ वे मीमांसा शिरोमणि भरतन् स्वामी द्वारा अनुगृहीत अष्टम् गाथा का संस्कृत छन्दानुवाद

८.प्राची दिक् पाण्डुरा जाता महिष्यः प्रसृता अये।
तुषारासिक्तघासानां चरणाय च सर्वतः ।।
त्वदन्याः प्रस्थिता बाला गमनैकप्रयोजनाः ।
ततस्ता विनिवर्त्य त्वाम् आह्वातुं वयमागताः।।
वनितोत्तम ! उत्तिष्ठ कृष्णवाल्लभ्यशालिनि ! ।
भञ्जकं केशिवक्त्रस्य मल्लघ्नं देवदैवतम् ।।
गायन्त्य उपगम्याथो भेरीं लब्धुं नमेम चेत्।
हा हन्तेत्येष आलोच्य दयाम्भोधिः प्रसत्स्यति ।।

आज जिस तीसरी गोपी का उत्थान कर रही हैं, वो बहुत ही प्यारी और खुशमिजाज लड़की है। इसकी विशेषता है कि अपने सौन्दर्य (भक्ति) से कृष्ण के हृदय में भी कौतुहल उत्पन्न कर देती हैं। इसलिए इनका नाम है ‘कोदु कलमुडैय पावै’ (कृष्णवाल्लभ्यशालिनी गोपी)। ऐसी गोपी को छोड़कर तो बिल्कुल ही नहीं जा सकते, वरना कृष्ण हमें स्वीकार नहीं करेंगे।

(तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः।।7.17।।)

गोदाम्बा प्रभात के लक्षण बताती हैं:

“पूर्व दिशा में आकाश श्वेत हो रहा है और गौ सुबह के शीतयुक्त घांसों को चर रहे हैं”

(व्याख्याकार कृष्णपादसूरी आश्चर्य व्यक्त करते हैं कि ब्राह्मण कुल में जन्मी गोदा को गोप कुल की इस विधा का भी ज्ञान है कि सुबह दूध दूहने से पूर्व गायों को शीतयुक्त घाँस खिलाते हैं। भावसमाधि में कितनी डूब चुकी हैं वो!)

कृष्णवाल्लभ्यशालिनी गोपी प्रत्युत्तर देती है, “तुम सभी गोपियाँ चन्द्रमुखी हो। एक साथ जब इतनी चन्द्रमुखी गोपियाँ एकत्र हो जायेंगी तो उनके उनके मुख के प्रकाश से ही अंधेरी रात में भी उजाला हो जाएगा।

और ये गाय और भैंस नहीं, अंधेरा ही चलता हुआ प्रतीत हो रहा है।”

“तुम्हें छोड़कर सभी गोपियाँ मङ्गल स्नान को प्रस्थान कर चुकी हैं”

“सब मुझे छोड़कर चली गईं? फिर मेरे उठने का क्या लाभ?”

“सभी तुम्हारी राह देख रहे हैं, मैं सबको रोककर आई हूँ। बस हम कुछ गोपियाँ तुम्हें जगाने तुम्हारे घर आई हैं”

“हमारे व्रत का प्रयोजन क्या है?”

“हमारा व्रत स्वयं-प्रयोजन है, उपेय रूप है। (पोवान पोगिनारै) हमारा प्रयाण किसी गम्य तक पहुंचने हेतु नहीं अपितु जाने के लिए ही जा रहे हैं।

(अक्रूर यात्रा, तिरुमलै यात्रा एवं अर्चिरादि यात्रा; ये तीन स्वयं-प्रयोजन हैं। यात्रा ही आनन्ददायक है।

हम प्रायः किसी गम्य की इच्छा में सदैव दुखी रहते हैं। वो प्राप्त हो जाये, तो भी दुखी ही रहते हैं। हमें यह सोचना चाहिए कि हमें दुखी देखकर भगवान भी दुखी होंगे एवं हमें प्रसन्न देखकर भगवान भी प्रसन्न होंगे। भगवान ने इतना कुछ दिया है। उस कृतज्ञता के भाव से, उनकी प्रसन्नता हेतु, हमें सदैव प्रसन्न रहना चाहिए।”

“हे गोपियों में उत्तम! हे कृष्णवाल्लभ्यशालिनी! उठो!

जिन्होंने केशी नाम के अश्वासुर का मुख फाड़ दिया, जो चाणूर-मुष्टिक आदि मल्लों के हन्ता हैं, जो देवाधिदेव हैं, हम उनके नामों का संकीर्तन करेंगी। बाहर आकर अपनी दयादृष्टि हमारे ऊपर डालो! कृष्ण विरह में दुबली हो चुकी हम सभी शीत और कुहासे में तुम्हारे द्वार पर खड़ी हैं।”

केशी और मल्लों का नाम सुन गोपी कृष्ण के प्रति से भयभीत हो जाती है और शीघ्रता से दरवाजा खोलकर बाहर आ जाती है। जब केशी दैत्य व्रज की ओर चला था, तब नारद जैसे ज्ञानी भी कृष्ण के प्रति भयभीत हो गए थे। जब कृष्ण ने केशी का वध कर दिया, तब नारद ऋषि ने उनका नाम रखा: केशव।

tirupavai #day8

संस्कृत अनुवाद

Ts8

हिंदी छन्द अनुवाद 

Th8

इस आठवें पद में श्री गोदा महारानी और उनकी सखियां अब एक विशेष गोपी को जगा रहीं हैं । यह गोपी इतनी महिमावती है कि बाकी सब की सब गोपियों को आकर इन्हे जगाना पड़ रहा है


(मिक्कुळ्ळ पिळ्ळइग़ळुम) क्योंकि ये गोपी परम अलंकृत और श्री प्रभु की अत्यंत प्रिया है (कोथुकलम उडय पावाइ) । गोदा देवी इन श्री कण्णन एम्पेरुमान् के मन को भाने वाली परम उत्साहित और इसी उत्साहवश सोने में असमर्थ गोपी को जगा रहीं हैं ।
‌ बाहरी दृष्टि से गोदा महारानी सोती हुई गोपियों को जगाती हुई मालूम पड़ती हैं, लेकिन असल में यह कार्य कई गहरे अर्थों को समेटे हुए है । श्री प्रभु ने भी कुछ शिक्षाएं दी हैं, अर्जुन को, लेकिन वे सब नीरस हैं । वहीं श्री गोदा महारानी ने अपनी शिक्षाएं खूबसूरत कथा और बातचीत के लहज़े में दीं ।
‌ पक्षियों की चहचहाहट आचार्यों की शिक्षाओं का प्रतीक हैं । हम तक उनकी कृपा श्री भागवतों के माध्यम से पहुंचती है । गोदा महारानी और सभी गोपियां इन विशेष गोपी से पक्षियों की आवाज़ सुनकर जग जाने को कहती हैं । घंटाध्वनि कैंकर्य का प्रतीक है। जब हम जग जाते हैं व श्री आचार्य को सुनते हैं, तब वे हमें कैंकर्य में लगाते हैं, और हम धीरे धीरे योगी और मुनियों के स्तर पर चढ़ते हैं।

अगर हम साथी भक्तों को छोड़ दें और कण्णा तक अकेले पहुंचना चाहें, तब वे हमें स्वीकार नहीं करेंगे । हमारे साथ के भागवतों की कृपा से, उनके पुरष्कार से, वे हमें स्वीकार करते हैं । जिस तरह एक चूहा जो किसी ऐसे व्यक्ति के सूटकेस में पहुंच जाए जो हवाई जहाज से अमरीका जा रहा हो, किसी वीज़ा या आप्रवासन नियमों के बंधन की परवाह के बगैर स्वयं भी अमरीका पहुंच जाता है, उसी प्रकार हम भी उस परम चरम लक्ष्य तक पहुंच जाएंगे यदि हम ऐसे भक्तों के साथ हैं।

कोथुकलम उडय पावाइ – हे प्यारी खुशमिज़ाज़ लड़की (श्री प्रभु का विशेष प्यार और समान पाने वाली)


पावाइ का अर्थ होता है एक सुंदर लड़की । यह गोपी इतनी सुन्दर है की यह श्री प्रभु के हृदय में भी कौतूहल जगाती है । इतनी रूपवती कि अपनी एक चितवन से श्री प्रभु को मदमत्त कर सकती हैं । अतः इनको उडय पावाइ कहकर संबोधित किया गया है । श्री गोदा महारानी इनको किस तरह छोड़ सकती थीं ? यह गोपी श्री प्रभु को विशेष प्यारी है ।

तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः।।7.17।।

उनमें भी मुझ से नित्ययुक्त, अनन्य भक्ति वाला ज्ञानी श्रेष्ठ है, क्योंकि ज्ञानी को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह मुझे अत्यन्त प्रिय है ।

कीळ्वानम् वेळ्ळेंड्र एरुमइ सीर्वीड : क्षितिज प्रकाशवान् होता जा रहा है, और भैंसें मुलायम घास चर रही हैं ।


कीळ्वानम् : पूर्व दिशा का आकाश
साफ व श्वेत दिख रहा है
सीर्वीड : (जल्दी भोर के समय) दुहने से पहले थोड़े समय के लिए चरने को छोड़ी गई
मेइवान : (ओस युक्त घास पर) चरने के लिए
परंदनकान् : (मैदानों में) फैली हुई

गाेदाम्बा सूर्योदय के लक्षणों को चिह्नित करती हैं । अंधेरा नष्ट व पूर्व में सूर्य उदय हो रहा है । गाय भैंसों को सवेरे के लिए चरने दिया जा रहा है । अंदर से उस गोपी का जवाब आता है, “आप सब सूर्योदय की प्रतीक्षा कर रहे थे (ताकि श्री कृष्ण विरह से मुक्त हों) लगातार पूर्व दिशा की ओर निहार रहे थे । आप सब तिंगल तिरुमुग़त्त सेयिळैयार (चन्द्र समान मुख वाली) हैं, और आप ही के मुख का प्रतिबिंब पूर्वाकाश में प्रकट हुआ है । और तो और आप सब दूध दही छाछ इत्यादि श्वेत पदार्थों को नित्य देख देख कर श्वेत रंग की ही आदत है इसीलिए आपको आकाश भी श्वेत प्रतीत हो रहा है । आपके पास इनके अलावा भोर का कोई और लक्षण है ?”
भैंसों को सवेरे घास दी जाती है । जब वे अपनी घास खा लेते हैं (सीर् वीड), तब उन्हें दुहा जाता है और कृष्ण उनको लेकर जंगल की ओर जाते हैं, व शाम से पहले नहीं लौटते । सूर्य उदित होने वाला है, और तुम अभी भी सो रही हो ? सुनो, अगर अभी नहीं उठी, तो कृष्ण जो कि ग्वाल हैं, गायों के पीछे पीछे चले जाएंगे और अपने नित्य कार्य में लग जाएंगे । “फिर हम किसका दर्शन कर पाएंगे ? कृपया उठ जाओ ।” श्री पेरियावाचान पिळ्ळइ (व्याख्यान चक्रवर्ती) अपना परम आश्चर्य प्रकट करते हैं कि अग्निहोत्र और यज्ञादिक के ज्ञाता, ब्राह्मण श्री विष्णुचित्त की पुत्री आंडाळ अब पूरी तरह से गोपी बन चुकी हैं क्योंकि वे उनके सब कार्यों और रीति रिवाजों से परिचित हैं ।

भैंसें सबसे मूर्ख जीवों में शामिल हैं, जैसा कीचड़ कहीं भी मिल जाए, वे उसी में लोट जाते हैं, व हमेशा चलती सड़कों के बीच खड़े हो जाते हैं व रास्ता छोड़ने को तैयार नहीं होते । ओ सखि ! भैंसों की तरह मूर्ख न बनो !

आंतरिक अर्थ
क्या हम तमोगुण से पूर्णतया अछूते रह सकते हैं ? नहीं । तो हमें उसे भी दुह लेना चाहिए अर्थात उससे काम निकाल लेना चाहिए । दुग्ध श्वेत का व भैंसें काले रंग के होते हैं । श्वेत सत्त्व गुण का प्रतीक है । हमें तमोगुण से भी सात्त्विक भाव खींचना है । जगत को श्री भगवान से जोड़कर उसने आनन्द लेना है ।
आचार्य वृंद ही हैं जो इन भैंसों को दुहते हैं ।

मेइवान परंदनकान् मिक्कुळ्ळ पिळ्ळइग़ळुम
पोवान् पोग़िन्रारैप्प पोक़ामल कात्त

वानम का अर्थ होता है आकाश । श्री कूरेश स्वामीजी सुंदराबाहू स्तवम में कहते कहते हैं, ” यं तं विदुर्दहरमष्टगुणोपजुष्टं, आकाशं औपनिषदीषु सरस्वतीषु ” जो कि ब्रह्मसूत्र “दहर उत्तरेभ्यः”(१.३.१४) पर आधारित है ।

मेइवान परंदनकान् मिक्कुळ्ळ पिळ्ळइग़ळुम
पोवान् पोग़िन्रारैप्प पोक़ामल कात्त
मिक्कुळ्ळ पिळ्ळइग़ळुम : और बाकी सभी लड़कियां
पोवान् पोग़िन्रारै : जो सिर्फ जाने के लिए ही जा रही हैं
पोक़ामल कात्त : जाने से रोकी गईं

वे जिनका जाने का मकसद ही अपने आप में जाना मात्र ही था व बाकी बची हुई लड़कियां रोक ली गईं । जब हम (मिक्कुळ्ळ पिळ्ळइग़ळुम) जाने वालीं थीं, तब हमने १० गोपीकाओं को अनुपस्थित पाया । अतः वे जाने से रोक दी गईं (पोक़ामल कात्त)
श्री कृष्ण तक पहुंचने का फल क्या है ? क्या कोई शिशुअपनी मां की ओर किसी दूसरी वस्तु को लक्ष्य करके जाता है ये केवल स्वयं अपनी मां को ही लक्ष्य करके जाता है ? अगर हमें कृष्ण मिल जाएं, तो और क्या मांगना बाकी रह जाएगा ? वहां जाना ही अपने आप में लक्ष्य है । लेकिन वहां हने सबके साथ जाना है, बिना किसी को छोड़े । जब विभीषण श्री राम के पास शरणागति के लिए गए थे, तो अकेले नहीं, वरन् दस लोगों के साथ गए थे ।

उन्नैक् कूवुवान वन्द निन्रोम्


उन्नैक् कूवुवान : आपको बुलाने के लिए
वन्द निन्रोम् : (आपकी दहलीज़ पर) यहां हम खड़े हैं

कोदुकलमुडय पावाइ एळुंदिराइ पाडिप् परइ कोंड


एळुंदिराइ : उठ जाओ
पाडि : गाओ (कृष्ण के दिव्य गुणों को)
परइ कोंड : (श्री कृष्ण से) परइ प्राप्त करो

हम इधर आए, और आपकी शैय्या के पास खड़े हुए, बिल्कुल विभीषण की तरह जोनाए और दृढ़ता से आकाश में खड़े रहे (श्री राम को देखने के लिए) । इससे साफ साफ यह दर्शाया गया है कि हमें श्री प्रभु के निकट श्री भागवतों की कृपा के बगैर अकेले नहीं जाना चाहिए । विभीषण श्री राम के पास चर राक्षसों के साथ गए, अकेले नहीं ।

ओ लड़की! उठो जागो, हमारे साथ गाओ और इच्छित वर मांगो ।
हम सब अब परम सौभाग्यशालिनी हुई हैं, क्योंकि हमने श्री कृष्ण को अनुभव किया है, अपने हृदय में ही भी बल्कि प्रत्यक्ष । उनके गुणों का गान करना ही गोपियों के लिए उज्जीवन है । उनके लिए यह सांस लीने की तरह है । और फलस्वरूप श्री कृष्ण हमें परइ प्रदान करेंगे । परइ दूसरों के लिए व्रत का फल है, किन्तु गोपियों के लिए वह केवल श्री कृष्ण की सेवा ही है । स्वयं कृष्ण ही फल हैं । कण्णा के बगैर हम और किसी भी फल का क्या करेंगें ? कोई भी लोक बगैर उनके किसी काम का नहीं है ।
क्या गाएं? गोदा महारानी हमें तीन नाम देती हैं :

मावाइ पिळंदानइ : अश्वासुर हंता
मल्लरइ माट्टिय : चाणूर मुष्टिक मर्दन देवाधिदेव

मावाइ पिळंदानइ मल्लरइ माट्टिय : उन प्रभु से जो राक्षसों और मल्लों को मार चुकें हैं
मा वाइ पिळंदानइ : वे प्रभु जिन्होंने जंगली घोड़े के रूप में आया हुआ असुर केशी का मुख फाड़ कर खोल दिया था
मल्लरइ माट्टिय : वो जिन्होंने दो मल्लों (चाणूर व मुष्टिक) को जीता व मारा

कृष्ण ने असुर घोड़े, व दो मल्ल जिनके नाम चाणूर व मुष्टिक हैं, उनको मारा । कृष्ण ने ऐसा केवल गोपों और गोपियों को बचाने के लिए किया । स्वयं को बचाकर वस्तुतः उन्होंने गोपी गोप वृंद की ही रक्षा की ।
ओ गोपी ! कृष्ण पर धेनुकासुर व मल्ल आक्रमण कर रहे हैं और तुम हो कि अबतक सो रही हो !

आंतरिक अर्थ :


हमारी इन्द्रियां ही घोड़े हैं, जैसा कि कृष्ण ने भगवद्गीता में कहा है । घोड़ों का उनपर कोई असर नहीं होता जो भागवतों की सन्निधि में रहते हैं । ये इन्द्रियां रूपी घोड़े इन्द्रियों के तत् तत् विषयों रूपी घास को चरते हैं । ये पुलिहोर प्रसाद से ज़्यादा पिज़्ज़ा की तरफ आकर्षित हैं ! जब हम कृष्ण को हमारे रक्षक के रूप में स्वीकार करते हैं, तब कृष्ण स्वयं उस इन्द्रिय सुख भोग को फाड़ देते हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह उन्होंने केशी का मुख फाड़ दिया था । यानी, कृष्ण हमारी इन्द्रियों को सुधारते हैं, उन्हें नष्ट नहीं करते ।

इसका एक गुप्त अर्थ ये भी है कि यह घोड़ा हमारे अहंकार व ये दोनों मल्ल काम व क्रोध का प्रतीक हैं । ये तीनों भगवद् साक्षात्कार के मार्ग में हमारे सबसे बड़े बाधक हैं ।
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
(गीता ३.३७)

कामनाएं कभी पूरी व तृप्त नहीं होती । जीव को वह कभी सुखी नहीं रहने देती । ये काम रूपी मल्ल हमें कुचल रहा है । दूसरा मल्ल क्रोध का प्रतीक है । यह हमारी विवेक शक्ति को नष्ट कर देती है । यह दोनों रजस् के प्रतीक कंस से आ रहे हैं ।
श्री प्रभु के महान भक्तों के संग से को स्थितप्रज्ञ हैं, इं दोनों को काबू किया जा सकता है । उनकी मौजूदगी में हम काफी विकसित महसूस करते हैं । गोदा देवी ऐसी महान गोपिका को जगा रही हैं । कृपया हमारे पास रहें । प्रकाश अंधकार को नष्ट करता है । लेकिन जैसे ही प्रकाश चला जाता है, अंधकार स्वतः वापिस आ जाता है । अतः प्रकाश अंधकार को पूरा नष्ट नहीं कर सकता, व केवल उसके ऊपर कुछ समय तक अपना वर्चस्व स्थापित कर सकता है । इसीलिए हमें सदा सर्वदा भागवतों की सन्निधि में रहना चाहिए ।
ये दो मल्ल अहंकार और ममकार के भी प्रतीक हैं ।

देवाधिदेवनइ सेन्नृ नाम सेवित्ताल


देवाधिदेवनइ : नित्यासूरी वृंद के प्रभु (वो नित्यसूरी जिनके नित्य कैंकर्य में सदा रत उनके दिव्य लोक में सदा निवास करते हैं)
सेन्नृ नाम सेवित्ताल : अगर हम जाकर उन्हें प्रणाम निवेदित करेंगे
आराइंद : वे हमसे (हमारे कष्ट के बारे में) पूछेंगे
आवावेन्नृ अरुळेलोर : दयाप्लावित हो (वे हम पर) कृपा करेंगे


वैसे तो कृष्ण “देवाधिदेव” हैं, किन्तु अपने सौलभ्य से वे हमें सुलभ हो जाते हैं । वे हमारे साथ नाच व गा रहे हैं । इस सब के बावजूद भी आप सो क्यों रही हैं? जिस तरह मिठाई के लालच में बच्चे भजन गा लेते हैं, उसी तरह गोपियों के दिखाए हुए एक मुट्ठी माखन के लालच में कृष्ण अपनी कमर पर ढोल बांधे हुए नृत्य करते हैं (घट नृत्यं) । सर्वशक्तिमान व सर्वव्यापी ईश्वर भी गोपियों को परम सुलभ है । अतः उनका नाम “वडुक्क आडुम पिळ्ळइ” है ।
ईश्वर करुणा सागर हैं व सदैव सूर्य कि भांति हैं पर कृपा वृष्टि करते हैं । हम स्वयं ही खोए हुए हैं क्योंकि हम सदैव उनके करुणामय अनुग्रह को ठुकराते रहे हैं ।

हमें उनके पास जाना चाहिए । उनकी कृपा पाने के लिए काषाय वस्त्र, तप, व बड़ी बड़ी पूजाएं नहीं चाहिए । द्रौपदी ने कौन सी तपस्या करी थी ? वह तो शरीर से उस समय पवित्र भी नहीं थीं । वह उस वक्त रजस्वला थीं, व स्नान आदि भी नहीं किया था । श्री पेरियवाचान पिळ्ळई स्वामीजी महाराज इसका इस प्रकार अर्थ करते हैं : “हम सब उनके घर उनको अपने विरह ग्रस्त तन की दशा दिखाने का रहे हैं ।”

आवावेन्नृ आराइंद अरुळेलोर एंपावाइ

वे ज़रूर हम पर कृपा बरसाएंगे । जब विभीषण ने श्री राम की शरणागति ग्रहण की थी, तब विभीषण को शरण देने चाहिए या नहीं, यह फैसला करने के लिए श्री राम ने एक सभा बुलाई । जहां सुग्रीव और बाकियों ने इसके खिलाफ अपनी राय दी, वहीं श्री प्रभु ने साफ कह दिया, “सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते| अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम||” (वा रा ६/१८/३३)

जब श्री प्रभु जाकर विभीषण से मिले, तब उनसे इतनी देर इंतज़ार करवाने के लिए क्षमा मांगी । यह कहते हुए की उन्हें विभीषण को जल्दी अपना लेना चाहिए था, वे प्रायश्चित्त करने लगे । ऐसी महानतम दया है श्री प्रभु की । जैसे ही कोई उनके सम्मुख होता है, तुरंत ही वे उसे अपना लेते हैं ।

भक्तों के लिए कृष्ण को सुख देना ही पुण्य व कृष्ण को सुख न देना ही पाप है ।

स्वापदेश

आंडाल अपनी सखियों में से एक को बुलाती हुई कहती हैं, ” हे कोथुकलम उडय पावाइ (परम उत्साहित लड़की) ! मैं दूसरों को जो व्रत के स्थान पावाइकालम् की ओर जा रहे थे, रोककर तुम्हें जगाने आई हूं ताकि तुम भी भगवदानुभव कर सको ।”

मुमुक्षु के लिए बढ़ती श्वेतिमा (वेळ्ळेनृ) एक महत्त्वपूर्ण बदलाव का प्रतीक है । आचार्य संबंध से पहले मुमुक्षु के लिए अंधकारमय निशा थी । किन्तु आचार्य अनुग्रह प्राप्त होने से भोर में ब्रह्म मुहूर्त आ गया है । हम तुम्हें आचार्य तक के हमारे सफर में शामिल करने व लेने आए हैं, वे आचार्य जो हमारी इन्द्रियों को विनाशकारी प्रवृत्तियों में जाने से बचाते हैं, वे आचार्य जो ज्ञान और अनुष्ठान सकती द्वारा हमारी नास्तिकता व कुदृष्टि ( विपरीत ज्ञान व वेद मंत्रों के गलत अर्थ समझना) नष्ट कर देते हैं । अतः सर्वेश्वर से भी श्रेष्ठ श्री आचार्य देव हैं । उनके तनियन श्लोक द्वारा हमें उनके गुणों का गान करना चाहिए । “सेन्नृ नाम सेवित्ताल” का आंतरिक अर्थ “आचार्य के प्रति प्रणाम” है, जो मूर्खों से भी बहुत (ज्ञान विषय) बुलवा सकते हैं । हम मृग समान ज्ञानहीन मूर्ख पशु हैं । श्री प्रभु आचार्य के रूप में अंतःक्षेप करते हैं, व जिस तरह केशी का मुख फाड़कर खोल दिया था, उसी प्रकार हमारा मुख खुलवाकर श्री प्रभु के ही नाम रूप का गान करवाते हैं । अतः आचार्य के पादपद्मों में गिरकर अत्यंत दीनता युक्त होकर अपने संदेहों को हल करवाना चाहिए ।