श्रीनिवास आश्रित हित अपना, अर्चा रूप बनाते हैं।
द्रवित हृदय से आये गिरि पर, वेङ्कटनाथ कहाते हैं ।।
व्रात जनों के रक्षण हित, रक्षा-कङ्कण बन्धवाते हैं ।
शरणागत पर प्रेममयी, शीतल अँखिया दिखलाते हैं ।।
दक्षिण कर से सब प्रकार, युग चरण उपाय बताते हैं ।
त्यों वामे करसे भव के लघु तरतर भाव बताते हैं ।।
अन्य हाथ में शङ्ख सुदर्शन, धर ऊँचे दिखलाते हैं।
‘डरो नहीं तुम डरो नहीं तुम, डरो नहीं हम आते हैं’ ।।
मैं हूँ अखिल लोक के नायक मुकुट पहन बतलाते हैं।
देखो वेद पुराण सूत्र गण, मेरे ही गुण गाते हैं ।।
