श्रीमद भागवतम महात्म्य भाग 2

श्रीमद भागवतम महात्म्य भाग 1

सूत गोस्वामी कहते हैं की जब सुकृत इकठ्ठा होते हैं तो कभी-कभी चलते फिरते भी विवेक प्राप्त हो जाते हैं।

कर्नाटक में तुंगभद्रा नदी के निकट एक गाँव था। उस गाँव में आत्मदेव (आत्मा चासो देवः आत्मदेवः) नाम के एक ब्राह्मण थे और उनकी पत्नी का नाम था धुंधुली। आत्मा पर जब अज्ञान का धुंध होगा तो व्यक्ति कभी सुखी नहीं हो सकता। इसलिए मीरा कहती हैं:

घूँघट के पट खोल रे, तोहे पिया मिलेंगे।

आत्मदेव के दुःख का कारण था पुत्र का न होना। वास्तव में हम अपना दुःख खुद बटोरते हैं। एक बार वो कहीं से कथा कहकर लौट रहे थे की लोगों का ऐसा वार्तालाप सुना जिसने उनके दुःख को कुरेद दिया। लोग कह रहे थे, “आत्मदेव पंडित तो अच्छा है पर है तो निपुत्तर ही। निपुत्तर का चेहरा देखना भी पाप ही है”। हाताश और निराश आत्मदेव शरीर परित्याग करने की मंशा से जंगल चले गए जहाँ उनकी भेंट एक सन्यासी से हुयी। उन्होंने से सन्यासी से पुत्र की याचना की।

सन्यासी ने पूछा, “पुत्र क्यों चाहिए”।
“सुख के लिये”
संसार का इतिहास ऐसा नहीं है की किसी को पुत्र से सुख हुआ हो। उदाहरण के लिये महाराज सागर के ७००० पुत्र उन्हें सुख नहीं दे सके। भौतिक विषयों से सुख प्राप्त करने की चेष्टा चलनी से दूध पिने के समान है”।
काहू न कोउ सुख दुख कर दाता। निज कृत कर्म भोग सबु भ्राता।।.
मनुष्य अपने अच्छे कर्मों के फलस्वरूप सुख एवं बुरे कर्मों के फलस्वरूप दुःख पता है। कोई किसी को सुख या दुःख नहीं देता। अगर आनंद चाहते हो तो चित को आनंदमय परमात्मा से जोड़ो। ‘पद, पैसा, प्रतिष्ठा और परिवार’ असत और निरानंद हैं और इनसे कभी आनंद की प्राप्ति नहीं हो सकती। इनसे सुख का अनुभव करना ऐसे ही हैं जैसे कुत्ता को हड्डी से और ऊंट को काँटा चबाने से आनंद मिलता है। वास्तव में है भूल, पर कहता है tasteful. कोई ऐसा सुख नहीं जिसके भीतर दुःख ढंका हुआ न हो।

व्यक्ति जन्म से ही ४ दुःख लेकर आता है- रोग, शोक, बुढ़ापा और मौत। पत्नी भी तो ये ४ दुःख लेकर आती है, इसलिए कुल जोड़कर दुःख हो गए ८। पुत्र हुआ तो कुल मिलाकर १२ दुःख हो गए। यदि पुत्रवधू आयी तो कुल मिलाकर हो गए १६। इसलिए अगर शाश्वत सुख चाहते हो तो आनंदस्वरूप परमात्मा से संबंध जोड़ो।

 

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पतंजलि ने पाँच क्लेश बताये हैं:- अविद्या, अस्मिता (मैं), राग (अपने से), द्वेष (दूसरे से) और अग्निभेष (मरने का भय)। हरिः हरति पापानि। भगवान सभी पापों और पाप जनित दुखों को हर लेते हैं। सुख हमें बाहर से मिलता है जबकि आनंद अन्दर से।
मोहग्रस्त होने के कारण आत्मदेव को सन्यासी की बात समझ में नहीं आयी। जब वो पुत्र की माँग पे अड़े रहे तो सन्यासी ने आम का फल दिया। धुन्धुकी को यह सोचकर रातभर नींद नहीं आयी कि यदि फल खाने से शरीर भारी हो गया तो चलना-फिरना दुष्कर हो जायेगा और यदि जन्म से पहले अटक गया तो मर ही जाऊँगी। इस डर के मारे उसने फल गाय को खिला दिया। उसकी छोटी बहन जो गर्भवती थी और ६ पुत्र पहले से थे उसने उससे अपना अगले संतान को रख लेने का प्रस्ताव दिया। उसने वादे अनुरूप अपना बेटा चुप-चाप धुन्धुकी को दे दिया। उसका नाम हुआ धुंधकारी। उधर गौशाले में गैया ने भी बच्चे को जन्म दिया जिसका शरीर मानव का था पर कर्ण गाय का, इसलिए उसका नाम हुआ गोकर्ण।

आत्मदेव तो बड़े प्रसन्न थे पर बाप बनने के साथ संताप भी आया। धुंधकारी बड़ा उत्पाती हुआ। वह जुआ खेलने लगा, मद्यपान करने लगा। प्रतिदिन आत्मदेव के पास शिकायतें आनी लगी आत्मदेव को सन्यासी की सीख याद आने लगी। हालाँकि गोकर्ण बड़े संस्कार-संपन्न थे। (गोकर्णः पण्डितो ज्ञानी धुन्धुकारी महाखलः)। जब आत्मदेव ने धुंधकारी को समझाना चाहा तो उसने पिता पर हाथ चला दिया। पुत्र से पीटने के बाद आत्मदेव एकांत में, गोशाला में बैठकर रो रहे थे।

गोकर्ण की उनपर नजर पड़ी। गोकर्ण ने पिता को समझाया, आपके दुःख का कारण पुत्र नहीं, पुत्र-मोह है। आपने पुत्र से जो नाता जोड़ लिया वही दुःख का कारण है। ममता, मेरापन, मैं पिता और मेरा पुत्र; यही दुःख का कारण है। ममता शरीर से सुरु होती है, फिर परिवार पर आती है। देह से सुरु होने वाली ममता पहले पत्नी में, फिर पुत्र में आती है। हमारा सबसे पहला संबंध तो परमात्मा से है। जब शरीर नहीं था, पत्नी नहीं थी, पुत्र नहीं आया था तब हमारा भगवान से संबंध था। उस भगवान से संबंध जोड़िए।”
ममता तु न गयी मेरो मन से
पाके केश जन्म के साथी, ज्योति गयी नयनन से।
टूटे बसन, बचन नहीं निकलत; शोभा गयी मुखन से।।
ममता तु न गयी मेरो मन से।
सुख-दुःख वास्तव में है नहीं पर ममता के कारण हमें सुख-दुःख अनुभव होता है। जैसे चिता तो रोज ही जलती है पर जबतक यह ज्ञान नहीं होता कि चिता में जलने वाला शरीर मेरे संबंधी का था, तब तक आंसू नहीं आते। यदि कोई दुश्मन मरा हो तो अति-सुख का अनुभव होता है। ममता के कारण ही धुंधकारी ने आत्मदेव को मारा था वरना सारा समाज तो उन्हें आदर देता था। बाप को बेटे से ममता है इसीलिए बेटा बाप की इज्जत नहीं करता। धुंधकारी ने आत्मदेव को नहीं बल्कि आत्मदेव ने धुंधकारी को पकड़ रखा था।

तब सन्यासी की बात समझ में नहीं आयी थी क्योंकि आत्मा पर मोह और ममता की बाधा थी। पुत्र से पीटने के बाद विवेक उत्पन्न हुआ और ममता हट गयी। जब मोह का पर्दा हट गया तो गोकर्ण की बात समझ में आ गयी।

जबतक ममता नहीं हटेगी, तबतक शास्त्र के उपदेस समझ में नहीं आयेंगे। अज्ञान से ममता उत्पन्न होती है और ममता से दुःख। विवेक का उदय होने पर ममता हट जाती है और भक्ति का उदय होता है। बिना ममता गए भक्ति नहीं आती। मनुष्य जब थकता है तो भगवान की ओर झुकता है। माया ईश्वर की शक्ति है जिसका काम ही है हमें ठोकर देते रहना। कभी किसी ठोकर से विवेक उत्पन्न हो गया तो ममता हट जाएगी और जीवन आनंदमय हो जायेगा।

आत्मदेव ने वन-प्रस्थान किया और भागवतम के दशम स्कंध का ध्यान करते हुए शरीर त्याग दिया। आत्मदेव में कर्मधारय समास है- “आत्मा चासो देवः आत्मदेवः”; अर्थात आत्मा देव है, पुत्र, पत्नी या रिश्तेदार नहीं। आत्मा केवल परमात्मा का है।

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एक बार मैं गया के पास एक गाँव से श्राद्ध करा कर लौट रहा था। कुछ ही दूर गया था कि एक नौजवान पैरों पर गिरा गया और कहने लगा, “बाबा वापस चलिए। अभी आप जिस का श्राद्ध करा कर लौट रहे हैं, मैं उसका बेटा हूँ।” जब मैंने उसके बेटा होने पर भी सही समय पर उपस्थित न होने के कारण उसे डांट सुनाई तो कहने लगा, “बाबा! मैं अमेरिका मैं रहता हूँ। जब भी मैं कहता था कि भारत में ही रहकर नौकरी करूँगा तो डांटने लगते, “जब मैं सबको सुनाकर कहता हूँ कि मेरा बेटा अमेरिका में रहता है तो सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। जब अमेरिका में ही रहने की बात करता तो कहते कि अमेरिका में किसको सुनाऊंगा। अमेरिका जाकर तो अपने गरीब होने का एहसास होता है”। सुख और दुःख सापेक्ष है। कैसा सुख मिला कि बेटा से श्राद्ध भी न करा सके। ये आत्मा का सुख नहीं है। ये सुख तो अहंकार का है। केवल परमात्मा ही आत्मा को आनंद दे सकता है। सुख बाहर से मिलता है जबकि आनंद अन्दर से।

मोह निशा सब सोवनिहरा। देखत सपन अनेक प्रकारा।
यह जग जामिनी जागहिं जोगी। परमारथी प्रपंच बियोगी।।
जानिअ तबहीं जीव जग जागा। जब सब विषय बिलास बिरागा।।

आत्मदेव के चले जाने के बाद केवल माँ-बेटे ही रह गए। धुंधकारी बड़ा हुआ और चरित्रहीन हो गया। माँ के गहने बेचने लगा और माँ मना करती तो उसे पीटने भी लगा। माँ दुःख के मारे कुएं में कूद कर मर गयी। मुर्खता, कुसंग और जवानी इन तीनों के जोड़ में धुंधकारी हत्या, डकैती और लूट कर धन इकट्ठा करने लगा और पाँच-पाँच वैश्यायों को घर लाकर बैठा दिया। एक दिन जब लूट में बड़ा हाथ लगा तो उन वैश्याओं ने धुंधकारी को हाथ-पैर रस्सी से बाँधकर और आग से मार-मार कर प्राण निकाल दिया और उसे जमीन में गाड़कर और धन आपस में बाँटकर भाग गयी। धुंधकारी बड़ी बेरहमी से मरा और मरने के बाद भयंकर ब्रह्मपिसाच बना। उसके आतंक से गाँव के गाँव वीरान हो गए।

कई दिन बीतने पर गोकर्ण अपनी जन्मभूमि घुमने आये। सायंकाल में सान्ध्योपासना कर ही रहे थे मेघ-गर्जना सुनाई पड़ी, पर आकाश में मेघ तो थे ही नहीं। मेघ की तरह गर्जना करने वाला , शेर कि दहाड़ने वाला और हाथी की तरह चिन्घारने वाला कौन है? समझ गए कि कोई अदृश्य आत्मा की पुकार है। गायत्री मंत्र पढ़कर जल छींटा तो धुंधकारी में बोलने कि शक्ति आ गयी। “मैं तुम्हारे कान देख पहचान गया। मैं तुम्हारा भाई धुंधकारी हूँ। मैंने गिन-गिनकर पाप किये जिसका परिणाम है की आज भूख लगती है लेकिन खा नहीं सकता, प्यास सताती है लेकिन पानी भी नहीं पी सकता, नींद आती है लेकिन सो नहीं सकता। बेचैन होकर घूमता रहता हूँ। भाई! हमारा उद्धार करो। गोकर्ण रात भर गायत्री मंत्र का जप करते रहे, वेद-वेदांत सुनाते रहे पर कोई असर नहीं हुआ। गया, बदरीनाथ और अनेक तीर्थों में जाकर पिंड दे आये पर कोई असर नहीं हुआ।

व्याकुल गोकर्ण ने सूर्य देव का उपस्थान किया। गोकर्ण ने कहा, “श्रीमद भागवत का सप्ताह करो गोकर्ण”। उन्होंने सारी विधि बतायी। अषाढ़ महीने शुक्ल-पक्ष नवमी से पूर्णिमा तक भागवत सप्ताह का आयोजन किया। संयोग से बगल में बाँस का टुकड़ा गिरा था और उसमें चींटी लगने से छेद भी था। प्रेत ने उसी में अपने को समाहित कर लिया।

शरीर तीन प्रकार के होते हैं। स्थूल शरीर २४ तत्त्वों से बना है जिसका विवेचन गीता के १५वें अध्याय में हुआ है। सूक्ष्म शरीर १७ तत्त्वों से बना होता है जो आत्मा के साथ होता है। तीसरा है कारण शरीर जो अति-सूक्ष्म और प्रलय काल में होता है। जैसे पेड़ स्थूल है, गुठली कारण और फल सूक्ष्म। जैसे गुठली से ही आम का पेड़ बनता है उसी तरह कारण शरीर से ही सृष्टी के बाद स्थूल शरीर बनता है। गुठली जड़ है जबकि पेड़ चेतन। प्रलय काल में आत्मा भी लगभग अचेतन अवस्था में होता है। भगवान दया से द्रवित होकर स्थूल शरीर देते हैं ताकि जीवात्मा मुक्ति के लिये साधना कर सके (सा वै मोक्ष्यार्थ चिंतकः)।

पहला दिन का पाठ हुआ तो एक गाँठ फटी। लोग समझ न पाए कि क्या आवाज हुयी। दूसरे दिन दूसरी गाँठ फटी और सातवें दिन होते-होते तो बाँस फट्टी के रूप में बदल गया। दिव्य रूप में कोई प्रकट हुआजो किसी के पहचान में नहीं आया। गोकर्ण जी ने सारी बात बतायी। “ ये मेरा भाई था। महा-दुष्कर्म करने वाला, पिशाच बना था। श्रीमद भागवत की कृपा से पिशाच की योनी से छूटकर स्वर्ग चला गया”।

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लोगों ने कहा, “महाराज! भागवत तो हमने भी ७ दिन सुना फिर हमारा कुछ क्यों नहीं हुआ”? गोकर्ण जी कहा, “आप उस लगन और श्रद्धा से नहीं सुन पाए जो गोकर्ण के पास थी”। श्रावण महीने, शुक्ल-पक्ष नवमी से पूर्णिमा तक दूबारा सप्ताह हुआ गोकर्ण जी की कृपा से, ग्रामवासियों के आत्मा के कल्याण के लिये। श्रीमद भागवत की कथा निर्मोह होकर सुनने से ग्रामवासियों का भी कल्याण हुआ, सबकी मुक्ति हो गयी।

हम सभी अपने कानों से एक समान ही श्रवण करते हैं पर मन द्वारा मनन और भक्ति सबका अलग-अलग होता है। वक्ता तो सबको एक समान ही सुनाता है पर श्रोताओं के मन और भक्ति भाव एक समान नहीं होता; सबके जन्म, संस्कार, संगत और ग्राह्य बुद्धि भी भिन्न-भिन्न होते हैं। जैसे वर्षा तो एक-समान ही होती है पर किसी खेत में बढ़िया फसल होती है और किसी में खराब। इसलिए कथा के अंत में हर व्यक्ति अलग-अलग निष्कर्ष के साथ निकलता है।

धन्या भागवती वार्ता प्रेतपीड़ाविनाशिनी ।

सप्ताहोऽपि तथा धन्यः कृष्णलोकफलप्रदः ॥

 

सारांश:

सूत जी महाराज बताते हैं की दो बार सप्ताह गोकर्ण जी ने किया और एक बार सनकादिक कुमारों ने ज्ञान, वैराग्य और भक्ति के उज्जीवन के लिये लेकिन सबसे पहले सप्ताह हुआ, वो था राजा परीक्षित के लिये शुकदेव जी महाराज के द्वारा। कलयुग के बीते ५०११८ वर्ष हो चुके हैं। जब कलयुग का केवल ३० वर्ष बीता था तब श्रीमद भागवत का सप्ताह, शुकदेव जी के द्वारा, परीक्षित महाराज के उद्धार के लिये। उपरोक्त कथाओं से दो बातें स्पष्ट हैं:
1. भागवत कथा ज्ञान और वैराग्य की मूर्छा को दूर करता है, भक्ति प्रसन्नचित्त होकर नृत्य करने लगती है और मुक्ति, जो भक्ति की दासी है, समीप आ जाती है।
2. भागवत कथा निर्मोह होकर सुनने से एक प्रेत का भी उद्धार हो सकता है।
श्रीमद भागवत एक कड़वी मिश्री है। अगर कड़वी दवा सीधे दी जाये तो बच्चा लेने के लिये तैयार नहीं होता लेकिन वही कड़वी दवा अगर मिश्री के साथ मिला कर दी जाए तो बच्चा खा लेता है। श्रीमद भागवत में कथाएँ मिश्री हैं और सिद्धांत (शिक्षाएँ) कड़वी दवा। अगर हम दोनों का सेवन करें तो ‘दुखालयम अशाश्वतं’ से ‘नित्य आनंद’ की ओर निश्चित ही जायेंगे। एक प्रकार के मिट्टी  में कोई विशेष फसल, किसी विशेष मौसम में बढ़िया पैदावार देती है। कलयुग में भागवत पुराण का भी वैसा ही महत्व है क्योंकि इसमें स्वयं भगवान श्री कृष्ण का वास है।
सप्ताहश्रवणाल्लोके प्राप्यते निकटे हरिः ।
अतो दोषनिवृत्त्यर्थमेतदेव हि साधनम् ॥
शृण्वतां सर्वभूतानां सप्ताहं नियतात्मनाम् ।
यथाविधि ततो देवं तुष्टुवुः पुरुषोत्तमम् ॥
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Authenticity of Itihaas and Purans

इति ह पुरावृत्तमास्ते यस्मिन् स इतिहासः
Meaning:- Something that has happened in past and has been recorded as it is, is called Itihaas
पुरा अपि नवम् इति पुराणम्
Something which is old (in history) but every new and afresh (in teachings and meanings) is called Purans.

Let me quote how all the traditional Vedic Acharyas Accepted PURANS as praman subsidiary to Vedas and as explanatory text to Vedas.

Here are some array of quotations from Traditional Vedic Scholars:Kautilya aka Chanakya (300 BC) in Arthashatra 5.13–14

पश्चिम इति इतिहास श्रवणे| पुराणम् इति वृतिमाख्यायियकौधारणं धर्मशाष्त्रम् अर्थशास्त्रं च इतिहासः||Meaning: In the later (west) part of the day; hear Itihaas. Itihaas means PURAN, Vritti upakhyaika, dharmashastra and Itihaas (Ramayan, Mahabharat).

kautilya belongs to 300 BC and mention of study of Purans and Itihaas by one of the brightest minds of India ever should really be adhered.Shukra-neeti 3.38

धर्मतत्त्वं हि गहनमतः सत्त्वसेवितं नरः| श्रुतिस्मृति पुराणानाम कर्म कुर्यात विचक्षनह||Meaning: The tattva of dhara is really deep. So, one should follow Shruti, Smriti and PURANS to do karma.

Sayan in commentry on vedas has quoted Purans and established the authenticity of Purans as explanatory texts to Vedas:krishna Yajur-Ved Sayan bhasya page 3:

उपनीतस्य एव अध्ययन अधिकारम…..…………कथं तर्हि तयो: – पुराणादिभिरिति ब्रूमः|Meaning: only those who are upaneet (got Yagyopaveet) have right to study Vedas. How would they be uplifted? By study of Purans etc.

Atharv-Ved Sayan Bhasya page 6

पौरोहित्यम च अथर्वेदिकम कार्यं……………..तथा च विष्णुपुराणे ‘पौरोहित्यम शांतिकपौष्टिकानी राज्ञामअथर्ववेदेन कारयेद..|Atharvedi shuld be called for Purohit karma since the Purohit karmas like Rajyabhishek etc. has been described in Atharv-Veda.As said in Vishnu Puran, “Purohit works in Kings works should be done by Atharv-Vedi ony. Brahmatva in Vedas is also based on this only”.

Here, sayan first quoted Vishnu Puran, then he goes on to quote Matsya Puran, Markandey Puran and Skand Puran.Atharv-Ved Sayan bhasya page 5

यथा स्कंदे कमलालयखंडे आथार्वणमंत्रानाम जापमत्रेण अभिमत फलसाधनत्वं उक्तं, “ यस्त…………………………सो ध्रुवं”|Meaning: As kamlaalay khand of Skaand Puran says that just by chanting the Atharv mantra one gets desired results.

Sayan in Rig Ved bhasya:

ऐतरेयतैतरीयकाठकादिशाखासूक्तानि हरिश्चंद्रनचिकेताद्युपख्यानी ……तेषु तेष्वितिहासग्रंथेसुस्पष्टिकृतानि उपनिषदु उक्तश्च सृष्टिस्थितिलयादयो ब्राह्मपाद्मवैष्णवादिपुराणेषु स्पष्टि कृताः|Meaning: Dharma and Brahm-gyaan given in Harischandra and nachiketa dialogues in Aittreya and taittriya sakha are well explained in Itihaas (Ramayan and Mahabharat) and the details of creation, sustenance and dissolution given in upanishads are well-explained in BRAHMA, PADMA and VISHNU PURANS.

Nyay darshan ( Maharshi Vatsyayan Bhasya 4.1.62)

//ते वा खल्वे इति अथर्व अंगिरस एतत इतिहास पुराणस्य प्रामाण्यभ्यवदन – “इतिहासपुराणं पंचमं वेदानां वेद” इति छान्दोग्यः (७.२.१)//Meaning: The famous Atharv-Vedi have authenticated ITIHAAS and PURANS. It’s said, “ Itihaas and Puran are fifth Veda.”

Maharshi Patanjali Mahabhasya (Paspasahnik 1.1.1)

वाको वाक्यम् इतिहास पुराणः ….शब्दस्य प्रयोग विषयःMeaning: vaakovaakya, ITIHAAS, PURANS; there are the places of experiments of words.

Uttar-Meemansha 6.13.33

तस्मात् मूलमितिहासपुराणम्

Are Vedic Gods different from Puranic Gods?

Let’s see Sayan bhasya for the Vedic mantras which declare ‘Vishnu as supreme’ and ‘abode of Vishnu as supreme’. Sayan clearly says that Vishnu here is one mentioned in Itihaas and Purana.

तिरुपावै 1: पहला पासुर

तिरुपावै एवं श्री वैष्णव सम्प्रदाय का सार है: “नारायणने नमक्के परै तरूवान् “। ( नारायणो हि भेरीं नः संश्रिताभ्यः प्रदास्यति ।)

नारायण ही हमें परम पुरुषार्थ (भगवद-अनुभव-जनित-प्रीतिकारिता-कैंकर्य) प्रदान करेंगे। इस पद से आकिंचन्यम् और अनन्य-गतित्वम् की शिक्षा मिलती है।

संस्कृत रूपांतरण:-

मार्गशीर्षो ह मासोऽयं पौर्णमासी शुभं दिनम्।
आयात स्नातुमिच्छन्त्यो! हे विलक्षणभूषणाः !।। ऋद्धिमद्‌गोकुलावासाः ! श्रीमत्यो! गोपबालिकाः!।
तीक्ष्णशक्त्योग्रकर्माणि कर्तुर्नन्दस्य बालकः ।।
सौन्दर्यपूर्णनयनयशोदासिंहपोतकः ।
मेघश्याम सुरक्ताक्षः सूर्येन्दुसदृशाननः ।।
नारायणो हि भेरीं नः संश्रिताभ्यः प्रदास्यति ।
अवगाह्य ततः स्नाम श्लाघेरन् येन भूभवाः ।।

(श्रीरंगम मीमांसा विद्वान भरतन् स्वामी द्वारा विरचित संस्कृत छन्द रूपांतरण)

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संस्कृत अनुवाद

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हिंदी छंद अनुवाद

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मार्घळित्तिंगळ – वैष्णव मार्घळि (मार्गशीर्ष) मास
मदि निरइंद नन्नाळाल – पवित्र पूर्णमासी

कठोपनिषद (1. 3. 4) अपने इस उद्घोष से सबको जगा रहा है:
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ।
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ।। 

(उठो, जागो, और जानकार श्रेष्ठ पुरुषों के सान्निध्य में ज्ञान प्राप्त करो । )

इस पद में कुछ गोपियां श्री आयरपाडि (गोकुल) की बाकी की गोपियों को, जो कुल मिला कर पांच हजार मानी गई हैं, भोर में जल्दी जगा रहीं हैं, ताकि वे सब मिलकर श्री कृष्ण से जीवन के पुरुषार्थों के प्रतीक परई (ढोल) की प्राप्ति करें। यहां हम परम पथ पर अपने जैसे साधकों के साथ रहने, जिसे सत्संग कहा जाता है, के सिद्धांत से परिचित हो रहे हैं। पिछले दिन प्रभु सब गोपियों के साथ देर तक खेलते रहे, और फिर उनसे कहा, “कल सवेरे आना। और सबके साथ आना। “
कुछ गोपियाँ ऐसी थी जो ज़रा भी नहीं सोईं। वे आपस में यह विमर्श करने लगीं कि कल कृष्ण से मिलने के बाद क्या करेंगे। कुछ गोपियाँ कृष्ण से होने वाले भावी मिलन के अनिर्वचनीय सुख की प्रत्याशा में ही बेहोश हो गिरीं। वे सवेरे उठ न पाईं। कुछ गोपियाँ दर्पण के आगे घंटो खड़ी रहीं, और अपने श्रृंगार में विविध बढ़ाव घटाव करने लगीं, जिसका एकमात्र लक्ष्य कृष्ण को सुखी करना था। गोदा महारानी इन सब को उठा रहीं है, ये सोचते हुए की कृष्ण उनको तबतक नहीं अपनाएंगे जबतक वे सब के सब साथ जाएं।

यहाँ श्रीवैष्णव मत के एक विलक्षण सिद्धांत पर प्रकाश डाला गया है : भगवान के पथ पर अकेले चलना उतना उत्तम फलदायक नहीं है जितना उन पथ पर अन्य साधकों को साथ लेकर चलना है। सांसारिक सुखों के विपरीत, जो कि बांटने पर घाट जाया करते हैं, आध्यात्मिक सुख बांटने से बढ़ जाता है
मदि – चन्द्रमा/ ह्रदय/ बुद्धि; निरइंद – पूर्ण; नन्नाळाल – पवित्र

पूर्णिमा तिथि शुभ तथा भक्ति सम्बंधित कार्यों को शुरू करने के लिये उत्तम तिथि मानी गयी है। साथ ही, पूर्णचन्द्र की चांदनी में सब गोपियाँ एक दूसरे को देख सकती हैं और समूह में जाकर श्री प्रभु के संग का लुत्फ़ उठा सकती हैं। क्योंकि इन सब गोपियों की मुखाकृति पूर्णचन्द्र के सदृश है ही, अतः समस्त प्रदेश में शतशः पूर्णचन्द्रों का ौदय हो गया है! “नन्नाळाल” शब्द से बोध हो रहा है की बीते दिन दुःखद रहे, क्योंकि वे श्री कृष्ण से विरह में बिताए गए|

जब श्री दशरथ श्री राम प्रभु का पट्टाभिषेक करने के लिए उद्यत हुए, तो वशिष्ठ मुनि ऐलान करते हैं की ऐसा कोई भी क्षण जिसमे श्री राम को राजा बनाया जाएगा, वही क्षण स्वतः अपने आप में ही परम पवित्र और कल्याणकारी बन जाएगा। वाल्मीकि मुनि इस चित्रा नक्षत्र को परम पवित्रतम घोषित करते हैं। और देखा जाए तो शुभ व्यक्तियों के लिए सब कुछ शुभ ही बन जाता है। मार्गशीर्ष महीना शुभ है, शुक्ल पक्ष भी उपस्थित है और चांदनी भी पूर्ण है जिसमे श्री कृष्ण का आनंद लिया जाए सके। आत्मा के लिए वही दिन परम पवित्र बन जाता है जिस दिन वह हरि शरणागत हो जाती है। जब अक्रूर जी को कंस ने वृन्दावन से श्री बलराम और श्री कृष्ण को लाने भेजा, तो प्रभु को देखने के ख़याल से ही वे नाचने लगे। आह! क्या अद्भुद भगवद प्रेम है!

आतंरिक अर्थ:
मदि का अर्थ ह्रदय भी होता है| मदि निरइंद नन्नाळाल का अर्थ हुआ जब ह्रदय में कोई कलंक या संकोच विचार न हो, जब पूरा ह्रदय प्रभु के समागम को उत्सुक हो, मन में कोई अन्य कामना न हो| यह पासुर काल का पराश्रय और गोपिओं की विलक्षनता और विशेषता बता रहा है| गोपियाँ शुद्ध भक्ति, प्रेम और समर्पण की प्रमाण हैं| जब कोई सत्कार्य करने को इच्छुक हों तो भगवत कृपा से सारे मुहूर्त और नक्षत्र स्वतः पवित्र हो जाते हैं| इस मास में चन्द्र, मन और बुद्धि तीनों पूर्ण और पवित्र हैं| “चन्द्रमा मनसो जातः”| जब ह्रदय में भगवत-प्रेम हो तो मन और बुद्धि भी पवित्र हो जाते हैं|”मधि” शब्द का एक अर्थ “ज्ञान” भी होता है। जब हमें श्री कृष्ण मिलन प्राप्त हो जाता है, तब हमारा धर्मभूत ज्ञान (गुणात्मक ज्ञान, अर्थात वह ज्ञान जो आत्मा का गुण है) पूर्ण व दिव्य बन जाता है।
निराड पोदुवीर – जो हितार्थी हैं वे दिव्य अनुभव में स्नान करें

गोदा देवी वर्षा के लिए यह व्रत कर रही है। वर्षा ही क्यों? उन्हें स्नान करना है। श्री प्रभु के अनंत कल्याण गुणों में उन्हें स्नान करना है। प्रत्येक गुण उनकी जीव पर अहैतुकी दया का द्योतक है। पानी आकाश से आता है, किन्तु ये कल्याण गुण गण केवल श्री प्रभु से ही आते हैं। पर हम किस तरह उनको प्राप्त करें? केवल श्री प्रभु ही उनके दाता है। परकाल सूरी (तिरुमळीशी आळ्वार) भी भगवान के कल्याण गुणों में अपने अनवरत निमज्जन के बारे में बताते हैं। अतः श्री गोदा देवी सबको आमंत्रित क्र रही हैं, “व्रत के लिए सब तैयार हो जाओ! कल भोर सब मिलकर आना।”
श्री प्रभु को प्राप्त करने के क्या योग्यता चाहिए? बस तीव्र इच्छा, और कुछ भी नहीं। साँसारी लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए बहुत से श्रम और साधन की ज़रूरत पड़ती है, किन्तु परात्पर लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कोई श्रम या साधन नहीं चाहिए। अगर कोई श्री कृष्ण का आनंद चाहता है तो केवल इसकी तीव्र इच्छा हो। एक प्रश्न यह किया जा सकता है की इच्छा की भी ज़रूरत क्यों पड़ रही है? उत्तर यह है की हम चेतन जीव है, हममे निर्णय लेने के लिए ज्ञान है। तो आचार्य ने बाकी सब कमी पूरी कर ही दी है, हमें बस इच्छा करनी है।

पोदुमिन – कृपया आएं
नेरिळयीर – आभूषणों से अलंकृत कन्याएं

जब गोपियाँ जल्दी जल्दी स्नान करने जा रहीं थीं, तब क्या उन्होंने समय निकालकर खुद को आभूषणों से सजाया होगा? क्योंकि वे हमेशा श्री कृष्ण के बारी में ही सोचती रहती हैं, और क्योंकि उन्हें ये भी नहीं अंदाज़ा रहता की श्री कृष्ण कब अचानक से उनके पास पहुँच जाएंगे, इसीलिए वे हमेशा खुद को अलंकृत रखने की आदत बना चुकी हैं।
गोदा देवी उनका अदब से स्वागत करती है। हर भागवत का भरपूर सम्मान किया जाना चाहिए, बगैर ये देखे कि उनकी आयु या जाती क्या है। गोपियों का सौभाग्य था की वे श्री कृष्ण के ही क्षेत्र में, उन साथ समय में, उन्ही की आयु के साथ वहां मौजूद थी। इससे बढ़कर सौभाग्य कुछ नहीं हो सत्ता की मनुष्य का जन्म मिले और उसी जन्म में आचार्य संग भी प्राप्त हो जाए। पंचसंस्कार एक जीवात्मा का नया जन्म है, इससे श्री रामानुज स्वामीजी की तिरुवडी(श्रीचरण) से सीधा सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। यहाँ प्राकृत देह छूट जाता है, उसी दिन जीवात्मा का परमात्मा से विवाह अर्थात चिरकाल व्यापी मिलन हो जाता है।
शिर् मल्गुम्: संपन्न
आय्यपाडि: गोकुल
च्चेल्व च्चिरूमिर्घाळ्: यौवन और धन से

गोकुल का धन क्या है? कृष्ण और गायें ही गोकुल के धन है। भगवान का सौशील्य और सौलभ्य गुण गोकुल का धन है| सर्व्यापी परमात्मा ने ग्वाल का रूप धारण किया है और गोकुल में खेल रहे हैं। दूध प्रचूर मक्खन से भरा है। उन्हें दूध दुहने लिए किसी भी प्रयास की आवश्यकता नहीं थी, लेकिन उन्हें मथने के लिए बड़ी मात्रा में ताकत लगानी पड़ती है। कृष्ण ने खुद गायों की देखभाल की। घास कभी भी घास नहीं खाते या पानी नहीं पीते बल्कि गायों ने कृष्ण की बांसुरी के संगीत को खाया और पिया। वे कृष्ण के मनमोहक रूप को देखते थे और खुश हो जाते हैं। भगवान का वात्सल्यमय स्पर्श ही उनका उज्जीवन है| इस प्रकार उन्होंने दूध दिया। दूध को मक्खन में मथ लिया गया। मक्खन किसका है? लेकिन गोपियाँ कहती थीं, “मेरा मक्खन”। इसलिए, कृष्ण को उन्हें पाप से बचाने के लिए अपनी ही संपत्ति (माखन) की चोरी करनी पड़ी।

जब लक्ष्मण खाली हाथ राम के पीछे गए, तो उन्हें वाल्मीकि ने “लक्ष्मणो लक्ष्मी (धन) संपन्न: ” कह संबोधित किया, क्योंकि लक्ष्मण जी को असली धन मिला जो कि राम-कैंकर्य है। इसी तरह जब विभीषण ने लंका छोड़ दिया और श्रीराम की शरणागती करने के लिए खाली हाथ पहुंचे, तो उसे श्रीमान ’(धनी) के रूप में संबोधित किया गया, क्योंकि अब केवल विभीषण को वास्तविक धन मिला – जो राम के साथ संबद्ध है। इसी प्रकार, गजेन्द्र को श्रीमद् भागवत में श्रीमन के रूप में संबोधित किया गया है।

जीवात्मा का वास्तविक धन भगवत-शेषत्वं और पारतन्त्रियं विशिष्ट ज्ञान है| लक्ष्मण स्वातन्त्रीयं तथा अन्य-शेषत्वं से रहित थे। विभीषण के पास पारतन्त्रियं था, लेकिन अनन्य- शेषत्वं का अभाव था। जब उन्होंने रावण के प्रति अपने शेषत्व का त्याग कर दिया, तो वे श्रीमान बन गए। गजेंद्र और द्रौपदी में अनन्य- शेषत्वं था, लेकिन उनमें पारतन्त्रियं का अभाव था। जब उन्होंने अपने स्वातन्त्रीयं को त्याग दिया तो वे श्रीमान बन गए।
परवश जीव स्ववश भगवंता, जीव अनेक एक श्रीकंता|

सौशील्य और सौलभ्य अवतारों के महत्वपूर्ण कल्याण-गुण हैं। कृष्ण ग्वालों के साथ खेलते एवं खाते हैं, यह देख ब्रह्मा भी भ्रमित हो गए। कल्याण गुण अवतारों में अधिक प्रकाशित होते है। परमपदम में हर कोई परिपूर्ण है, इस कारण वहाँ उन्हें अपनी अहैतुकी कृपा से निम्न जीवों का उद्धार करने का अवसर नहीं मिलता। कुलशेखर आलवार बताते हैं, “शरारती बच्चे ने अपनी बाहों के माध्यम से गोता लगाया, दही के एक बर्तन के गहराई में, इसे खाया और उनका पूरा चेहरा सफेद रंग का हो गया। उसके चेहरे पर डर था। वह न तो रो सकता था, न ही रोने के लिए अपने आग्रह को नियंत्रित कर सकता था। काँपते हुए हाथ जोड़कर उसने यशोदा के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। यह देखकर, यशोदा को परम अप्रतिम आनंद मिला”। भगवान के पास एक खतरनाक विशेषता भी है: निरंकुश स्वातंत्र्य। इस प्रकार, हमें हमेशा दयालु माँ महालक्ष्मी और आचार्य के माध्यम से आत्मसमर्पण करना चाहिए।

कूर् वेल्: एक धारदार हथियार (कुछ टीकाकारों का मत है कि कृष्ण ही धारदार हथियार हैं क्योंकि वे गोपियों के ह्रदय में प्रेम उत्तेजित करते हैं और फिर छुप जाते हैं)
कोडुन् तोऴिलन्: क्रूर व्यवहार
नन्दगोपन् कुमरन्: नंदगोप के पुत्र
एरार्न्द कण्णि यशोदै: यशोदा के प्रेमपूर्ण आँखों में
इळम शिङ्गम: युवा सिंह की तरह
नंद-गोप की सुरक्षा में वह अत्यंत विनम्र और आज्ञाकारी है लेकिन यशोदा के प्रेम में वह एक युवा शेर है। गोकुल में कोई भी प्राणी असुर को बदल सकता है और कृष्ण पर हमला कर सकता है; इस कारण वो सर्वदा कन्हैया की रक्षा हेतु धारदार हथियार लिए रहते हैं। सर्व-व्यापी भगवान यशोदा मैया की आँखों में हैं। क्या हम उनकी आँखों के आकार की कल्पना कर सकते हैं?

नंदगोप आचार्य हैं। कृष्ण हमेशा आचार्य के नियंत्रण में हैं। आचार्य देहात्माभिमान (मैं-मेरापन, शरीर को आत्मा समझना) को दूर करते हैं। केवल आचार्य के माध्यम से हम भगवान को प्राप्त कर सकते हैं। नंदगोपा के हाथ में हमेशा कृष्ण की रक्षा के लिए एक तेज भाला होता है। यह आचार्य की पहचान है। उनके कन्धों पे और हाथों में शंख और चक्र है।

नंद: जो हमेशा भगवत-साक्षात्कार के आनंद में लीन रहते हैं;
गोप: शिष्यों के स्वरुप की रक्षा करने वाले।

यशोदा नारायण महामंत्र हैं| यशः ददाति सा यशोदा | यह मन्त्र ही हमारा अभिमान है| दैवाधिनम् जगत् सर्वं, मंत्राधिनम् तु दैवतम्, तत मंत्रं ब्राह्मणाधिनम, | भगवान मन्त्र के अधीन हैं और मन्त्र आचार्य के अधीन| सीधे उनके पास मत जाओ। यह सही तरीका नहीं है| पहले उनके पास जाओ जिन्हें कृष्ण का ज्ञान है| कृष्ण की कृपा हमें नंदगोप और यशोदा के माध्यम से मिलती है।
गुरु बिना भवनिधि तरहिं न कोई, जो विरंची शंकर सम होई|
मन्त्र प्राप्त होते ही भगवान हमारे पास हो जाते हैं| गोपियाँ यशोदा के पास कितनी भी शिकायतें लेकर जाएँ लेकिन यशोदा ने कभी नहीं माना| इसी प्रकार मन्त्र हमारी रक्षा करता है|
कार: श्याम बादलों के जैसा रंग
मेनि: शरीर
च्चेङ्गण: लाल आँखें
कदिरमदियम् पोल् मुगत्तान्: चेहरा सूर्य और चन्द्र के समान

भगवान के दिव्य-मंगल-विग्रह का रंग काले बादल की तरह है जो अभी-अभी बरसने को तैयार हो| भगवान भी सदैव अपने कल्याण-गुणों की वर्षा के लिए तैयार रहते हैं| भगवान का मुख सूर्य और चन्द्र के समान है अर्थात सूर्य की तरह दीदिपत्यमान और चन्द्र की तरह शीतलता प्रदान करने वाले| लाल आँखें भगवान की हमारे प्रति करुणा करुणा को दर्शाता है| जैसे सूर्य समस्त विश्व का पोषण भी करता है और विनाश वैसे ही भगवान भी| भक्तों का पोषण और दुष्टों का विनाश|

नारायणने: सर्व-अन्तर्यामी और सर्वाधार नारायण

व्रत के लिए जपने वाला मन्त्र: नारायण महामंत्र| नराणां नित्यानाम् अयनम् इति नारायण | जो समस्त प्राणियों के आधार हैं, जो सबके अन्तर्यामी हैं और सारे प्राणी जिनके अन्दर हैं वही नारायण हैं| नारायण का अर्थ कोई एक निश्चित  रूप नहीं अपितु वह जो अनंत रूपों में विद्यमान हैं, सर्वत्र और सर्व-काल में व्याप्त हैं|

परै कमर में बांधकर बजाया जाने वाला ढोल है| तो क्या गोपिकाएँ इतना ही चाहती हैं? 29वें पासुर में गोदा बताती हैं कि परै का अर्थ है भगवान का नित्य-कैंकर्य| गोदा कहती हैं कि भगवान अवश्य हमें अपना नित्य-कैंकर्य प्रदान करेंगे, चिंता मत करो| महाविश्वास शरणागति का एक प्रमुख अंग है| हमें भगवान और भगवत-कृपा पर यह महाविश्वास होना चाहिये कि भगवान अवश्य हमें अपना नित्य-कैंकर्य प्रदान करेंगे|

पारोर्: जो भी इस विश्व में हैं
पुगऴ: उत्सव मनायें/ प्रशंसा करें
प्पड़िन्द: व्रत को पूर्ण करने हेतु
एलोर एम्पावाय: सुनो और मन में धारण करो, ओ लड़कियों|

सबलोग भगवत-शरणागति के योग्य हैं| केवल श्रीविल्लिपुत्तुर ही नहीं अपितु समस्त विश्व| शरणागति के लिए योग्यता क्या है? इच्छा मात्र ही भगवत-प्राप्ति के लिए पर्याप्त है| शरणागति/प्रपत्ती तो परगत-स्वीकार है| भगवान स्वयं अहैतुकी कृपा से जीवात्मा को चुनते हैं और अपनी शरण में लेते हैं| अपने प्रयासों से कोई भगवान को प्राप्त नहीं कर सकता|

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो, न मेधया न बहुना श्रुतेन।

यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः, तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूँ स्वाम्॥

{मुण्डक उपनिषद (3.2.3) और कठोपनिषद (1.2.23)}

लघु सिद्धांत में रामानुज स्वामीजी, इस श्लोक की व्याख्या करते हुए लिखते हैं:

यथा अयं प्रियतमः आत्मानम् प्राप्नोति, तथा भगवान स्वमेव प्रयतत इति भगवतैव उक्तं।

अर्थ: जैसे हम अपने प्रियतम को स्वयं प्रयत्न कर प्राप्त करते हैं, वैसे ही भगवान स्वयं, अपनी निर्हैतुक कृपा से, शरणागत जीवात्मा को अपना लेते हैं।  एक शरणागत को भगवत-प्राप्ति हेतु अपनी ओर से कोई प्रयत्न नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करना भगवान की निर्हैतुक कृपा में बाधा होगा।

हमारा प्रत्येक कर्म, ज्ञान, भक्ति भगवत-मुखोल्लास हेतु है

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तिरुपावै पहला पासुर: स्वापदेश

दिव्य सूक्तियों का सामान्य अर्थ (वाच्यार्थ) लोक-व्यवहार का होता है| यह अन्योपदेश भी हो सकता है| दिव्य प्रबंधों में प्रकट वेदांत-तत्त्व को ‘स्वापदेश‘ कहा जाता है| अपने उज्जीवन के लिए स्वयं को उपदेश ‘स्वापदेश’ कहा जाता है|

स्वामी जनन्याचार्य जी पहले पासुर के स्वापदेश को संक्षेप में कहते हैं:

प्राप्य प्रापकंगल इरंदुम नारायणने|

(उपाय और उपेय, दोनों नारायण ही हैं)| परम पुरुषार्थ (प्राप्य वस्तु) नारायण ही हमें परम पुरुषार्थ प्रदान करेंगे| अवगाहन-स्नान साध्य रूप प्रपत्ति है| प्रापक समस्त मुमुक्षु हैं, प्रपत्ति में कोई भी जन्म, वर्ण आदि भेदभाव नहीं हैं| सभी योग्य हैं| इच्छा मात्र ही पर्याप्त पूर्वापेक्षा है|

पहला पासुर में अर्थ-पंचक और ‘तत्त्व, हित, पुरुषार्थ’ का ज्ञान दिया है गोदाम्बा जी ने:

प्राप्यस्य ब्रह्मणो रूपम्, प्राप्तस्य प्रत्यादात्तमन: ।

प्रप्तोपाय फलम् प्राप्ते: तथा प्राप्ति विरोधि च ।।

वदन्ति सकला वेदाः सेतिहास पुराणका: ।

मुनयेस्य महत्मान : वेद-वेदान्त पारगा: ।।

“नारायणने नमक्के परै तरुवान”

1. परमात्मा स्वरुप: नारायणने
नराणां नित्यानाम अयनम् इति नारायण।

जो समस्त आत्माओं को अन्दर और बाहर से आधार देता है (अंतर्व्याप्ति और वहिर्व्याप्ति) वही नारायण हैं| नारायण शब्द के दो अर्थ हैं:
1. परत्वंम् : सारे आत्मा जिनके अन्दर हैं|
2. सौलाभ्यम्: जो सारे आत्माओं के अन्दर हैं|

2. जीवात्मा स्वरुप: नमक्के

सारे जीवात्मा भगवान के शेषी और परतंत्र हैं| आण्डाल इस शब्द से प्रपन्न जीवात्मा के लक्षण बताती हैं: आकिंचन्य (मेरे पास अपना कोई सामर्थ्य नहीं है); अनन्य गतित्व (भगवन के अलावा मेरी दूसरी अन्य गति नहीं है) और महाविश्वास (भगवान अवश्य मेरी रक्षा करेंगे)|

3. उपाय स्वरुप (हित; परमात्मा को प्राप्त करने का साधन क्या है): नारायणने तरुवान

एकमात्र नारायण ही उपाय हैं| नारायण की कृपा ही नारायण तक ले जा सकती है, कर्म, ज्ञान या भक्ति नहीं|

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4. उपेय स्वरुप (लक्ष्य या पुरुषार्थ क्या है): परै

परै का अर्थ है भगवत-कैंकर्य, लेश-मात्र भी स्वयं के लिए आशा से रहित| शास्त्र मोक्ष का निम्नप्रकार से वर्णन करते हैं:
1. सालोक्यं: भगवान के लोक, श्री-वैकुण्ठ में निवास करना|
2. सारुप्य: भगवान के समान रूप होना (चतुर्भुज, शंख-चक्र सहित)
3. सामीप्य: जीवात्मा नित्य परमात्मा के संग होता है और इस अनुभव में पलकांतर का भी वियोग नहीं है|
4. सायुज्य: श्रीवैकुण्ठ में जीवात्मा परमात्मा से इतनी अन्तरंगता से जुड़ा होता है मानो दो नहीं एक ही हों, जैसे पानी और शक्कर|

5. विरोधी स्वरुप: (जीवात्मा को उपेय प्राप्ति में बाधक):

हमारा स्वातंत्रियम और अन्य-शेषत्वं|

Glory of the Marghasheersh month

As per the Solar calendar, this month is called Dhanur masam. In Dhanur masam, the rashi(constellation) is dhanur. The crossing of the Sun from one nakshatra (rashi) to another is called Sankranti. The Sun leaves the Dhanur nakshatra and enters the Makar nakshatra on the day called Makar Sankranti.

As per the Lunar calendar it’s called Marghali masam or Marg-shirsh maasam. The full Moon and one star are taken as the point of reference for calculating the dates in the Lunar calendar. In this month, the raashi or Nakshatram (Star) is the Margshirsham .

BG(10.35): Masaaanam marghshirshoham

मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः।।10.35।।

Of months, I am Margasira (Nov-Dec). And of seasons I am the season of flowers.

This is the month of harvest i.e. harvest reaches home. Season too is very conjurial. This is the month of Pious dharmaas. People perform dharma-anusthaan in the month. In this month, the Sattva Guna is most dominant.

Supreme Lord Narayana although shares the creation responsibility with Brahma, and with Rudra the responsibility of dissolution of the Universe, but He doesn’t give the duty of protection to anyone. He himself is the protector as Vishnu. That’s why Krishna says that among all the months, He is Maargshirsh.

This month is the Brahma-muhurt of Devas, as our one year is one day for them; our uttarayan being their day and dakshinayan being their night. This month is also cold, so people of Gokula are not coming to disturb the divine leela of Gopikas with Krishna.

‘Maarg’ means way. Karma, gyaan and Bhakti are the ways. In all these ways one relies on their own

power of Karma, Gyaan or Bhakti to achieve God. But the best way is Bhagwaan himself, the safest and the surest way. That’s why he is ‘maarg-shirsh’ i.e. topmost maarg. This vrat is also “Marghshirsh vratam”.

In general examples we see the goal and the means to be different. For example, to reach a College, the goal is the College, and the means are some means of transport like bus or bike etc. But, to achieve God, God himself is the means. Just like for a crying child, The Upey(goal) is the Mother and the Upaay (means) too is the Mother only. He/She wants to get to the mother’s lap and cries. How would he/she go into the Mother’s lap? Mother herself picks and places him/her in her lap. Take another example. To call a cow we show him grass and when it comes we feed grass itself. In case of param Purusharth too, God is goal and he himself is the means to reach him.

Brahm means: bruhyati, brahmyati iti brahm. That which is big and makes everyone who reaches him equally big.

Goda wanted to reach Krishna. She asked her guru and father, Sr Vishnuchitt Swami. He recommended her to do the vratam that gopis did in Dwapar to get Krishna.

Thus, in Sri Goda’s mind, Lord Sri Vatpatrashaayi became Krishna, Sri Villiputtur became Gokul, and her friends became Gopikas. Krishna had special love for a special gopi: Nappinai (Nila devi). She was daughter of his maternal uncle. Krishna wanted to marry her but he had to tame 7 bulls to marry her.

Goda could actually smell the fragnance of Krishna and gopikas i.e. makhan and ghee. That much was she immersed in the bhavana. Goda devi became a gopika in her bhavana. Her language even changed to that of a gopika, although she being born in Brahmin family.

The 30 verses are divided into group of 5 verses each. Each group of verses carries very deep meaning.

Gopikas got Krishna only for certain period but Sri Goda got his eternal association. Although She simply imitated,  but still she got greater grace. If we too imitate her, we too would get even higher grace. There is no limit of his grace. Since our Aandal is with him to say, “Hey! They are my sons and daughters.”

She sung the Thiruppavai and gave the essence of the Vedas. 
Details of vrata:

1) Take Snanam(Bath) before sunrise

2) Perform Anusthanam(Rituals).

3) Take Sripad Tirtham of Acharyas and Chant the guru-parampara mantra.

4) Do dhyanam of Narayana mahamantra.

5) Aradhana(Worship)

6) Offer havish (pongal)

7) Sing the Thirupavai

8) Offer Aarati

9) Sattumurai (final two verses)

10) Spend the month singing glory of the lord.

She enjoyed, and shared our Lord with all the children like us. Like mom feeds her children, Goda too feeds us, her children the nectar of her songs.

मार्घशीर्ष महीने का वैभव

सौर तिथि के अनुसार, इस महीने का नाम धनुर्मास है | इस महीने में धनुर नक्षत्र रहता है | सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करना संक्रांति कहलाता है | इस महीने में सूर्य धनुर नक्षत्र से मकर नक्षत्र में प्रविष्ट होता है, और उस दिन को मकर संक्रांति कहते हैं |

चांद्र तिथि के अनुसार इस महीने को मार्ग़ली मास और मार्गशीर्ष मॉस कहते हैं | पूर्ण चंद्र और एक विशष्ट तारे से चांद्र तिथि का निर्णय किया जाता है | इस महीने में मार्गशीर्ष नक्षत्र लगा रहता है, इस कारण महीने का नाम मार्गशीर्ष हुआ|

भगवद्गीता(१०.३५ ) में भगवान नारायण स्वयं कहते हैं:

मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः।।10.35।।

मैं मासों में मार्गशीर्ष (दिसम्बर जनवरी के भाग) और ऋतुओं में वसन्त हूँ।।

यह महीना फसलों की कटाई का महीना है। मौसम भी बेहद मनभावन रहता है।  यह पवित्र धर्मों को सम्पादित करने का महीना है, इसमें लोग धनुर्मास आराधना करते है। इस महीनेमें सत्त्व गुण प्रधान रहता है।  

परम पुरुष श्री नारायण वैसे तो सृष्टि का कार्य ब्रह्मा जी से करवाते हैं, और संहार का कार्य  श्री रूद्र से करवाते हैं, किन्तु पालन का कार्य वे स्वयं श्री विष्णु रूप में करते हैं। अतः श्री कृष्ण कहते हैं के समस्त मासों में वे मार्गशीर्ष मास हैं।

यह महीना देवताओं का ब्रह्म मुहूर्त है। हमारे लिए जब सूर्य उत्तरायण रहते हैं, तब
देवताओं के लिए दिन होता है, और जब दक्षिणायन रहते हैं, तब देवताओं के लिए रात्रि रहती है है।  यह महीना शीत वातावरण वाला भी है, अतः गोकुल के अन्यान्य लोग श्री कृष्ण और गोपियों की लीलाओं से अलग अनभिज्ञ ही रहेंगे। अतः यह गोपिकाओं के लिए कृष्णानुभवम के लिए सर्वश्रेष्ठ मास है|

“मार्ग” यानी रास्ता। 

कर्म, ज्ञान व भक्ति ही मार्ग हैं। इन तीनों मार्गों में पथिक स्वयं के बल पर आश्रित रहता है।  लेकिन सबसे श्रेष्ठतम और सुरक्षित मार्ग तो स्वयं श्री भगवान ही हैं। इसी कारणवश भगवान शीर्षतम मार्ग, मार्गशीर्ष हैं। इसलिए व्रत का नाम भी मार्गशीर्ष व्रत है।

देखा जाए तो ज़्यादातर प्रकरणों में लक्ष्य व साधन अलग अलग होते हैं। उदाहरणार्थ यदि किसी को कॉलेज जाना हो, तो कॉलेज हो गया लक्ष्य, और चलना, मोटर बाइक इत्यादि जैसे परिवहन साधन हो जाते हैं साधन। किन्तु श्री भगवान को प्राप्त करने के लिए एकमात्र उपाय भी स्वयं श्री भगवान ही स्वयं हैं।

जैसे किसी रोते हुए बालक के लिए माँ ही उपाय और उपेय दोनों है। वह बाला अपनी माँ की गोद मेंजाना चाहता है, अतः केवल क्रंदन करता है। अब वह अपनी माँ की गोद तक किस प्रकार पहुंचेगा? स्वयं माँ ही बालक को उठाकर अपनी गोद में रख लेंगी। एक और दृष्टांत यह है कि एक गौ को बुलाने के लिए हम उसे हरी घांस दिखा सकते हैं, और जब वह गौ आ जाए, तब वही घांस उसको खिला देंगे। ठीक इसी तरह, परम पुरुषार्थ के लिए भी, श्री भगवान ही उपेय और उपाय दोनों हैं।

शिशु बिल्ली जीवात्मा है और माँ परमात्मा
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महाविश्वास शरणागति का एक महत्वपूर्ण अंग है| महाविश्वास के साथ माँ पे आश्रित किशोर के लिए साधन और साध्य माँ ही हैं|

“बृहति बृंहयति इति ब्रह्म” इस उपनिषदोक्ति से ब्रह्म शब्द का अर्थ समझा जा सकता है। वह जो स्वयं बड़ा है, और उनको भी बड़ा करता है जो उसतकपहुँच जाते हैं, उसे ब्रह्म कहते हैं।

श्री गोदा महारानी को श्री कृष्ण तक पहुंचना था| उन्होंने इसके लिए अपने पिता व गुरु श्री विष्णुचित्त स्वामीजी महाराज से सलाह ली। उन्होंने सुझाव दिया कि गोदा देवी वही व्रत करें, जिसे द्वापर युग में गोपिकागणों ने श्री कृष्ण को प्राप्त करने के लिए किया था।

अतः, अपने मन में अत्यंत सुन्दर और विलक्षण भाव बनाकर गोदा देवी ने श्रीविल्लिपुत्तूर के श्री वटपत्रशायी भगवान को कृष्ण माना, श्री विल्लिपुत्तूर को गोकुल माना, और अपनीसहेलियों को ब्रज गोपिकाएं माना। नप्पिणइ जो की स्वयं नीला देवी हैं, वे श्री प्रभु के विशेष स्नेह को प्राप्त करती हैं। वे उनके मामा की बेटी हैं। श्री प्रभु को उनसे विवाह करने का मन था, और उसके लिए एक शर्त को पूरा करते हुए उन्होंने सात भयंकर अलमस्त सांडों को नियंत्रित किया।

गोदा महारानी अपने भाव की प्रगाढ़ता में इस तरह डूबीं की उन्हें स्वतः गोकुल, गोपियों और श्री प्रभु की सुगंध आती थी, जिसमें मक्खन और घी की खुशबू मिली हुई थी| ब्राह्मण कुल में पली बढ़ी गोदा की भाषा भी बिलकुल गोपिकाओं जैसी हो गयी| भाव की इसउच्चतम अवस्था में स्थित श्री गोदा महारानी ने स्वयं को भी एक गोपिका ही अनुभव किया।

श्री तिरुप्पावई के तीस पद पांच पांच के समूहों में विभाजित हैं, और हर समूह अपने अंदर अपार भाव सौंदर्य और सार्थकता समेटे हुए है।

एक विनोद का भाव यह है की गोपिकाओं को श्री प्रभु का संग बस कुछ समय तक मिला (लीला में), परन्तु श्री गोदा मैया को श्री प्रभु का अनंतकाल व्यापी मिलन प्राप्त हुआ है। देखा जाए तो उन्होंने केवल गोपियों का अनुकरण ही किया, परन्तु फिर भी उन्हें विशेषतर कृपा प्राप्त हुई। अतः यदि हम उनका अनुकरण करेंगे, तो हमें विशेषतम कृपा प्राप्त होगी!

श्री प्रभु की कृपा का कोई ठौर नहीं है। और हमारी श्री गोदा मैया तो प्रभु के साथ विराज ही रही है, ताकि वे यह कह सकें, “अहो! ये तो मेरे अपने बालक ही है!”    गोदा देवी ने वेदों केसार स्वरूप श्री तिरुप्पावई का गान किया है।

व्रत के कुछ नियम

१ सूर्योदय से पूर्व स्नान

२ अनुष्ठान इत्यादि

३ आचार्यों के श्रीपाद तीर्थ को पाना तथा गुरु परंपरा मंत्र का गान

४ नारायण महामंत्र पर ध्यान लगाना

५ आराधना

६ हविष्य देना

७ श्री तिरुप्पावई का गान करना

८ आरती उतारना

९ शत्तुमुरई

१० पवित्र महीने को श्री प्रभु के नाम रूप लीला गुण का गान करना

श्री गोदा देवी ने श्री प्रभु से आनंद प्राप्त किया और उस आनंद को हमसे, जो उनके बालक हैं, कृपावश बांट रही हैं। जिस प्रकार एक माँ अपने बच्चे का भरण पोषण करती है, उसीप्रकार श्री गोदा देवी ने अपने गीतों द्वारा हमारा पोषण किया है।       

गोदाम्बा जी का संक्षिप्त जीवन चरित्र

श्रीमद भागवत पुराण ( 11.5)


कृतादिषु प्रजा राजन् कलाविच्छन्ति सम्भवम् ।
कलौ खलु भविष्यन्ति नारायणपरायणाः ॥ ३८॥
क्वचित्क्वचिन्महाराज द्रविडेषु च भूरिशः ।
ताम्रपर्णी नदी यत्र कृतमाला पयस्विनी ॥ ३९॥
कावेरी च महापुण्या प्रतीची च महानदी ।
ये पिबन्ति जलं तासां मनुजा मनुजेश्वर ।
प्रायो भक्ता भगवति वासुदेवेऽमलाशयाः ॥ ४०॥

भावार्थ: कलियुग में द्रविड़ देश में स्थित ताम्रपार्नी, वैगै, पयस्विनी (पालारु), कावेरी आदि प्रसिद्ध एवं पवित्र महानदियों के तट पर कई भगवद्भक्तों का अवतार होगा, जिनके द्वारा भक्ति का व्यापक प्रचार और प्रसार होगा|

कलियुग के ४० दिन बीतने पे सठकोप सूरी आलवार (नाम्माल्वार) का अवतरण हुआ| आलवार श्री विष्वक्सेन के अवतार थे| वो यह सोचते हुए विलाप करने लगे कि हाय! कितना अभागा हूँ मैं| ४० दिन पहले आता तो साक्षात् भगवान के दर्शन हो जाते| इस वेदना से उनके ह्रदय में तड़पन बढ़ गया, ह्रदय द्रवित हो गया और द्रविड़ में भक्ति उत्पन्न हुयी:

उत्पन्ना द्रविडे साहं वृद्धिं कर्णाटके गता । क्वचित्क्वचिन्महाराष्ट्रे गुर्जरे जीर्णतां गता ॥
(श्रीमद भागवतम महात्म्य 1. 48)

द्रविड़ में १२ आलवारों का अवतार हुआ| आलवार का अर्थ है भगवत-प्रेम में निमग्न रहना| आलवारों के काव्य-रचनाओं (सूक्तियों) को दिव्य-प्रबंध कहते हैं| इन्हें द्रविड़ वेद या द्रविड़ोपनिषद भी कहा जाता है| कालांतर में भक्ति कि यह धारा नाथ मुनि, रामानुज और रामानंद जैसे महा-आचार्यों से सिंचित होकर जनसामान्य तक सर्व-सुलभ हुआ| विशिष्टाद्वैत का प्रमुख सिद्धांत है- भगवान का सर्ववस्तु स्वरूपी होना| “सियाराममय सब जग जानी”| कबीर भी कहते हैं:

भक्ति जन्मी द्रविड़ में, उत्तर लाये रामानंद|

गोदा का अविर्भाव एक छोटी शिशु के रूप में पूज्य विष्णुचित्त के नन्दवन में, एक तुलसी पौधे की छाया में हुआ| अषाढ़ मास के पूर्वफाल्गुनी नक्षत्र में अयोनिजा गोदा प्रकट हुयीं| यथावत् विष्णुचित्त बड़े सबेरे फूल चुनने अपने नन्दवन आए| चारों तरफ का वातावरण निस्तब्ध, सुन्दर एवं मनमोहक था| आलवार ने एक तुलसी पौधे की छाया में एक अद्भुत दृश्य देखा| उस स्थान पर पवित्र दीप्ति दिखाई दी, चारों तरफ प्रकाश फैल रहा था| निकट पहुँचाने पे उन्होंने वहाँ एक लावण्यमयी कन्या को देखा|
निस्संतान विष्णुचित्त उनकी अतुल सुन्दरता, दिव्य तेज और कान्ति देख वे आनंद विभोर हो गए|

विष्णुचित्त ने बड़े प्रेम से गोदा का पालन-पोषण किया| उन्होंने बचपन से ही गोदा को भगवान की दिव्य लीलाओं का रसास्वादन कराया गया था और इस प्रकार गोदा का मधुर बचपन भगवत-प्रेम में लीन रहा| श्री विष्णुचित्त हर रोज़ वटपत्रशायी भगवान के लिए सुघंदित पुष्पों की माला बनाते थे| गोदा भी अपने पिताजी के साथ रोज़ फुलवारी जातीं, पुष्प चुनतीं और फूलमालाएं गुथती| मालाएँ गूंथते विष्णुचित्त गोदा को भगवान के कल्याण-गुणों को और उनकी मधुर लीला का पान कराते| परमभक्त विष्णुचित्त के संरक्षण में भगवान के प्रति प्रेम और भक्ति तीव्र होती जाती थी|

गोदा भगवान को ही अपना पति मानने लगी| भगवान के योग्य और प्रिय बनना ही उनके जीवन का लक्ष्य हो गया| उन्हें बराबर यह चिंता होने लगी कि भगवान ने उसे दर्शन क्यों नहीं दिए|

एक दिन पिता की अनुपस्थिति में गोदा ने भगवान वटपत्रशायी के निमित्त टोकरी में रखी सुन्दर और मनमोहक मालाएँ निकालकर स्वयं पहन लिया| अपने कुंतल और गले में मालाओं को सजाकर उन्होंने खुद को आईने में देखा और सामने खड़ी होकर सोचने लगी – “अरे ! कितनी सुन्दर माला है | मै खुद इस माला के प्रति आकर्षित हो रही है | क्या यह माला पहनकर मै भगवान के साथ योग्य हूँ या अयोग्य हूँ”? अपनी सुन्दरता को निहारकर वह बहुत आह्लादित हुयीं और उन्हें दृढ विश्वास हो गया कि वह भगवान रंगनाथ के अनुकूल और पूर्ण रूप से प्रिय लगेंगी| तुरंत उन्होंने पुष्पमालाओं को उतारकर पूर्ववत् टोकरी में रख दिया| कई दिनों तक यह क्रम चलता रहा लेकिन पिता इससे अनभिज्ञ रहे|

श्री विष्णुचित्त पुष्पमालाओं को यथावत् ले जाकर मंदिर में भगवान को समर्पित करते थे| मालाओं की अनुपम सुन्दरता और सुगंध को पाकर अर्चकों ने समझा की यह आलवार की पवित्र भक्ति के कारण है|

रोज की तरह, जब एक दिन गोदा पुष्पमालाओं से सजकर, भगवान की प्रेम-धारा में बहते हुए, उसके रसोस्वादन में मग्न रही, तभी श्री विष्णुचित्त वहाँ पहुँच गए| पिता ने देखा – गोदा भगवान के भोग्य वस्तु को (असमर्पित माला) स्वयं पहनकर उसका रसास्वादन कर रही थी | यह देखकर
विष्णुचित्त बहुत व्याकुल और निराश हुए और तदन्तर उन्होंने यह माला भगवान को अर्पण नहीं किया| गोदा के इस व्यवहार से वह अत्यंत दुखी हुए| उन्होंने विचार किया कि न जाने कितने दिनों से यह कन्या इस तरह का कार्य कर रही होगी| इससे भी दुखी हुयी और उनके आँखों में आंसूओं की धारा बहने लगी| विष्णुचित्त ने उन्हें मीठे स्वर आश्वासन और उपदेश किया|

विष्णुचित्त ने दुबारा नन्दवन से फूल चुनकर पुनः मालाएँ गुंथीं और भगवान को समर्पित किया| रोज की तरह मालाओं में महक और सुन्दरता का अनुभव नहीं हुआ| उन्होंने सोचा कि कहीं गोदा के उक्त कार्य के कारण भगवान नाराज तो नहीं हो गए? मानसिक चिंता में लेटे-लेटे उनकी आँख लग गयी कि तभी उनकी आँखें चौंधिया गयीं| अद्भुत प्रकाश और अनुपम सुन्दरता का दृश्य है| इस प्रकार स्वप्न में भगवान के दिव्य दर्शन पाकर वह आनंद विभोर हो गए|भगवान ने उनसे पूछा कि उन्होंने आज सुगंधरहित पुष्पमालाएं अर्पित की| आलवार क्षमा याचना करने लगे तो भगवान ने कहा, “गोदा की घृत एवं भुक्त मालाएँ ही मुझे प्रिय हैं| मैं उन्हीं मालाओं की प्रतीक्षा में हूँ| अपनी घृत पुष्प-मालाएँ और वाचिक-मालाएँ समर्पित करने के लिए ही गोदा का अवतार हुआ है”| इतने में आलवार की नींद खुल गयी और वह चकित होकर चरों ओर देखने लगे| उनके मन में आनंद की लहरें उठनें लगीं|

इस आनंद प्रदायक स्वप्न पर विचार करते हुए उन्होंने गोदा को जगाकर उसे अपने स्वप्न से अवगत कराया| यथावत वे और नंदवन जाकर फूल चुनकर लाये और उनकी मालाएँ गूंथकर गोदा के सामने रखा और उन्हें कहा कि वो इन्हें धारण करके वापस कर दें| गोदा आनंद से पुलकित हो गयीं और उनके आँखों में प्रेमाश्रु की धारा बहने लगी| गोदा ने मालाएँ पहनीं और उन्हें उतारकर प्रेम व श्रद्धा सहित आलवार के हाथों में दे दिया| अब उन मालाओं की नयी सुन्दरता और सुगंध पाकर गोदा के प्रति आलवार की श्रद्धि की श्रीवृद्धि हुई| उन्होंने प्रेम से यह कहकर यह आशीर्वाद दिया, “तुम मेरी आण्डाल् हो”| आण्डाल् अर्थात उज्जीवित करने वाली|

आगे तो इसका क्रम बन गया| विष्णुचित्त मालाएँ गूंथकर गोदा के कुंतल और गले में सजाते और फिर उनके हाथों से मालायें लेकर भगवान वटपत्रशायी को समर्पित करते| उस वक्त से गोदा का नाम ‘शुडिक्कादुत्त नाच्चियर’ या ‘अमुक्तमाल्यादा’ हो गया|

उम्र के साथ-साथ आण्डाल् की भक्ति की भावना तीव्र प्रणय-भावना में बदल गयी| पिता ने उन्हें गोपियों द्वारा किया गया कात्यायनी व्रत करने का उपदेश किया| अब तो आण्डाल (गोदा) के लिए अपना स्थान श्रीविल्लिपुत्तूर ही व्रज भूमि हो गया, भगवान वटपत्रशायी श्री कृष्ण हो गए और उनकी सखियाँ गोपियाँ| श्री कृष्ण के विरह में द्वापर की गोपियाँ जिस प्रकार विरह का अनुभव करती थीं, उसी प्रकार का अनुभव गोदा भी करने लगीं| भाव-समाधि में उन्होंने तिरुप्पावै दिव्य-प्रबंध की रचना की| व्रत का उद्देश्य लोक कल्याण के अलावा यह उद्देश्य था श्री रंगनाथ उनके पति बनें|

गोदा जी की श्री रंगनाथ से विवाह की कथा ‘नाच्चियार थिरुमोरी’ में है जिसमें १४३ सूक्तियाँ हैं|

तिरुप्पावै (गोदा देवी जी का दिव्य व्रत)

लक्ष्मीनाथ समारम्भाम नाथ यामुन मध्यमाम|

अस्मद आचार्य पर्यन्ताम, वन्दे गुरु परम्पराम||

श्री विष्णुचित्त कुलनंदन कल्पवल्लिम, श्री रंगराज हरिचंदन योगदृश्यां|

साक्षात् क्षमां करुणया कमलामिवान्यां, गोदाम अनन्यशरण: शरणं प्रपद्ये||

अर्थात: श्री गोदा (आंडाल्) श्री विष्णुचित्त के कुल नंदवन में आविर्भूत कोमल कल्पलता सम सुन्दर कन्या हैं| श्री रंगनाथ रूपी हरिचंदन वृक्ष के योग से अतिलावण्यमयी और मनोहर दिखाई देती हैं| यह मूर्तिमान भूमि देवी हैं और लक्ष्मी देवी के समान क्षमाशील और करुणामयी हैं| निराश्रित मैं उस गोदा देवी की शरण लेता हूँ|

तिरुप्पावै गोदा देवी द्वारा विरचित दिव्य प्रबंध है| तिरुप्पावै की ३० सूक्तियों में समस्त उपनिषद् और शरणागति का अनुष्ठान निहित है|

संस्कृत में गोदा का अर्थ होता है: सुन्दर एवं मधुर शब्द|

तमिल में गोदा का अर्थ होता है: पुष्पमाला|

गोदा यानि आंडाल ने भगवान को दोनों ही अर्पित किया|

व्याकरण और दर्शन के ज्ञान से रहित होने के वावजूद हम युवा श्री वैष्णवों ने गोदा जी की इस दिव्य, अद्भुत दिव्य प्रबंध के हिंदी अनुवाद का संकल्प लिया है| अनुवाद में हमारा अपना कुछ भी नहीं| विभिन्न आचार्यों के कालक्षेप द्वारा जो कुछ सिख और समझ पाया, वही जस का तस भगवद-गोष्ठी को समर्पित कर रहा हूँ:

तनियन

  1. पहला तनियन: https://ramanujramprapnna.blog/2019/03/15/%E0%A4%A4%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%A8-1/
  2. दूसरा तनियन: https://ramanujramprapnna.blog/2019/03/16/%E0%A4%A4%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%A8-2/
  3. तीसरा तनियन: https://ramanujramprapnna.blog/2019/03/16/%E0%A4%A4%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%A8-3/

गोदा जी का दिव्य चरित्र

  1. https://guruparamparaihindi.wordpress.com/2014/12/15/andal/
  2. गोदाम्बा जी का संक्षिप्त जीवन चरित्र :https://ramanujramprapnna.blog/2019/03/17/%E0%A4%97%E0%A5%8B%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AC%E0%A4%BE-%E0%A4%9C%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BF%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%A4/

मार्घशीर्ष (धनुर्मास) की विशेषता:

  1. मार्घशीर्ष महीने का वैभव:Link: https://wp.me/p9Ex6B-7w

पासुर (गाथा):

  1. तिरुपावै पहला पासुर (व्रत का उपोद्घात)
  2. तिरुपावै पहला पासुर: स्वापदेश
  3. तिरुपावै 2 (व्रत के नियम)
  4. तिरुपावै 3 (व्रत का बाह्य फल)
  5. तिरुपावै 4 (न केवल प्रकृति बल्कि देवता भी हमारे साथ होंगे।)
  6. तिरुपावै 5 (व्रत के विरोधियों का नष्ट होना)
  7. तिरुपावै 6 (मुग्धा गोपी का उत्थापन)
  8. तिरुपावै 7वाँ पासूर (भ्रान्त/मतिवर्जिता गोपी का उत्थापन)
  9. तिरुपावै 8 (कृष्णवाल्लभ्यशालिनी गोपी का उत्थापन)
  10. तिरुपावै 9वाँ पासूर (मामाजी की बेटी गोपी का उत्थापन)
  11.  तिरुपावै 10वाँ पासूर (गोपीजनशिरोमणि/स्वामिनी गोपी का उत्थापन)
  12. तिरुपावै 11 वाँ पासूर (स्वर्णलता गोपी का उत्थापन)
  13. तिरुपावै 12 वाँ पासूर (कृष्ण-कैंकर्य-प्राप्त गोप की बहन गोपी का उत्थापन)
  14. तिरुपावै 13 वाँ पासूर (पुष्प-सौकुमार्य-हरिनयन नारीमणि गोपी का उत्थापन)
  15. तिरुपावै 14 वाँ पासूर (लज्जाहीन एवं वाचाल गोपी का उत्थापन, इसने सभी सखियों से वादा किया था कि वह सबसे पहले उठकर सबको जगा देगी परन्तु वह स्वयं सो रही है|)
  16. तिरुप्पावै 15 (बालशुक गोपी का उत्थापन)
  17. तिरुपावै 16 वाँ पासूर (नन्दगोप के महल के द्वारपाल एवं क्षेत्रपाल का उत्थापन)
  18. तिरुप्पावै 17 (नन्द जी, यशोदा मैया एवं बलदेव जी का उत्थापन)
  19. तिरुप्पावै 18 (नप्पिनै (राधा) देवी का उत्थापन)
  20. तिरुप्पावै 19 (नप्पिनै के स्तन पर सो रहे कन्हैया का उत्थापन)
  21. तिरुप्पावै 20 (कृष्ण एवं नप्पिनै का उत्थापन)
  22. तिरुप्पावै 21 ( कन्हैया के प्रति अकिंचनत्व, अनन्य-गतित्व एवं महाविश्वास का प्रकाशन )
  23. तिरुप्पावै 22 (अनन्य-गतित्व एवं अनन्यार्ह शेषत्व का प्रकाशन )

तनियन. 3

भावार्थ

हे गोदा देवी! आप दामिनी के सदृश अंगकान्ति वाली हैं! आपने उस माला को, जो श्री रंगनाथ भगवान के लिए थी, पहले स्वयं पहना तथा उसके बाद उसे श्री भगवान को प्रदान किया | काव्य कला में निपुणता से आपने सुप्रसिद्ध एवं प्राचीन तिरुप्पवई की रचना करी | कई सुन्दर कंकणों से विभूषित हे श्री गोदा देवी! हमपर अपनी करुणा दृष्टि करिये जिससे हम उसी तीव्रता से श्री कृष्ण में प्रेम रखें, जिस तीव्रता से आपने कामदेव को कहा था, “हे कामदेव! कृपया प्रसन्न हों और मुझे वेंकटगिरि के प्रभु की दुल्हन व दीन दासी बना दें ! ”

तात्पर्य

शुडर्कोडिये – स्वर्णमयी लता | लता को बढ़ने के लिए किसी सहारे की आवश्यकता रहती है | वे हमारे सबके सहारे श्री भगवान ही हैं | वे ही ” उपाय” हैं |

 शूडिकोडुत्त – पहले स्वयं को (पुष्पमाल से) आभूषित किया, उसके बाद श्री भगवान को | इस कारण गोदाम्बा जी को शूडिकोडुत्त नाचियार भी कहा जाता है|

तोल्पावई – प्राचीन विधान

पाडि अरुळ वळ्ळ – आपकी गान और काव्य कला में निपुणता | गोपियों ने व्रत के विषय में कोई गायन नहीं किया लेकिन गोदा जी ने व्रत के विषय में गाया और शिक्षा दिया| इस तरह से गोदा द्वापर की गोपिकाओं से भी महान हैं|

पल्वळयाय – आपके करकमल कंकणों से विभूषित हैं | ये इंगित करते हैं की वे अपने सहारे, अपने वल्लभ श्री भगवान् के साथ विराज रही हैं | प्रभु ने आपको अपनी मौजूदगी से शोभायमान किया है | वो आपकी आज्ञाओं का पालन करते हैं | वो आपके सरस दयालु पति हैं | आप, हमारी माँ, उनतक अपनी पहुँच का बहुत अच्छे से इस्तेमाल करती हैं!

यहां एक और गहरा प्रयोग यह है की प्रियतम की मौजूदगी में नायिका के लिए कंकण भी अंगूठी बन जाते हैं, और वियोग में अंगूठी भी कंकण बन जाती है | तो कंकणों का सांकेतिक और आलंकारिक प्रयोग है |

कुछ ऐसे ऋषि हैं जिन्होंने श्री भगवान के लिए तप किया, पर फिर आते हैं हमारे आळ्वार संत, जिनके लिए श्री भगवान तप करते हैं!

ऐसी हमारी आळ्वार गोदा महारानी की जय हो!

नाचियार थिरुमोज़ी में गोदा जी तिरुमला के श्रीनिवास श्री वेंकटेश्वर भगवान से प्रार्थना करती हैं कि वो उन्हें श्री रंगनाथ को पति रूप में देकर अनुगृहित करें | रामानुज स्वामीजी ने जब तिरुपति में गोविन्दराज मंदिर का निर्माण करवाया तो वहाँ माता के रूप में श्री गोदाम्बा जी को ही प्रतिष्ठित करवाया|

तनियन. 2



भावार्थ

संत कवयित्री श्री आण्डाल का अवतरण श्रीविल्लिपुत्तूर (पुदुवई) में हुआ था, जो कि  राजहंसों से आच्छादित चावल के खेतों तथा जलाशयों से घिरा हुआ था | हम सब  श्री आण्डाल का वंदन करते हैं जिन्होंने अपने मधुर स्वर में गाये हुए गीतों की माला को श्री भगवान को अर्पित करी, तथा अपनी पहनी हुई उच्छिष्ट माला को भी उन्हें अर्पित किया |

व्याख्या

वयर – फसल

अन्नम – हंस

श्रीविल्लिपुत्तूर के खेत राजहंसों से भरे हुए हैं |  जब हम लोग साधारण खेतों को देखते हैं, तो हमें तो केवल बतख-बगुले ही दीखते हैं, जो अपने स्वभावानुरूप विचरण करते एवं मछलियों का शिकार करते रहते हैं | लेकिन श्रीविल्लिपुत्तूर के खेत विलक्षण हैं | वे सुन्दर हंसों से भरे हुए हैं | हंसों की विशेषता होती है की वे दूध और पानी को अलग कर सकते हैं | 

हम जीव ही हंस हैं और ये शरीर क्षेत्र| हम स्वयं भी क्षेत्र हैं और परमात्मा हंस|

(इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते, गीता 13.२ ) |

ये सब केवल सामान्य हंस नहीं, बल्कि परमहंस हैं, जैसे श्री रामानुज, श्री वरवर महामुनि, श्री वेदांत देशिक | हंस बेहद सुंदरता पूर्ण ढंग से चलते हैं | गोदा देवी इन हंसों को सुंदरता पूर्ण ढंग से चलना सिखाती हैं, अतः उन्हें “अन्नवयळ् पुदुवइ आण्डाळ ” इस नाम से पुकारा गया है |

उन्होंने रंगनाथ भगवान को कई सुन्दर गीतों की माला(जैसे तिरुप्पवई) अर्पित करी | इसे अलावा उन्होंने स्वयं एक पुष्पमाला पहनी और उस पहनी हुई उच्छिष्ट माला को रंगनाथ भगवान् को अर्पित किया |

उन्होंने हम जीवआत्माओ को समझाया है, ” तुम स्वयं एक माला बन जाओ और स्वयं को श्री भगवान को अर्पित कर दो | अपने मुख से उनके नामों का संकीर्तन करो | उनको किसी के दबाव में नहीं, बल्कि स्वतः प्रेम से अर्पित करो | ”

हमें श्री गोदाम्बा के नामों का भजन करना चाहिए |